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सोमवार, अगस्त 09, 2010


पंजाबी शायर शिव कुमार बटालवी के 75 वें जन्मदिन
( 23जुलाई) पर विशेष






पंजाबी लेखक बलवंत गार्गी ने अपने दोस्तों पर बहुत से रेखाचित्र लिखे हैं। प्रस्तुत है उनकी पुस्तक हसीन चेहरे से साभार, शिव बटालवी पर लिखा उनका रेखाचित्र।






शिव बटालवी


0 बलवंत गार्गी



शिव बटालवी के साथ मेरा करार था। जब मैं चंडीगढ से दिल्ली अपनी कार में जाता तो उसे अपने साथ चलने के लिए कहता। रास्ते में बीयर की दो बोतलें, भुना हुआ मुर्गा तथा तीस रुपए नकद।



शिव स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से छुट्टी लिए बिना ही कई बार मेरे साथ दिल्ली जाता। शिव को न तो शराब पिलाने वालों की कमी थी और न ही मुर्गा खिलाने वालों की। वास्तव में उसके बारे में यह बात गलत प्रचारित थी कि लोग उसे शराब पिलाते थे। उसके पास यदि जेब में एक हजार रुपया होता तो वह दिन में ही दोस्तों को शराब पिलाने तथा खिलाने पर खर्च कर देता। वह शाही आदमी था और शाही फ़कीर। उस में खुद को बर्बाद करने की शक्ति थी।



उसने मुझसे कहा, ‘ये साली औरतें सदा रोती रहती है कि कि फलां मर्द ने मेरी अस्मत लूट ली। आप अपने हुस्न को बैंक के लॉकर में रख दें। मैं बैंक में काम करता हूँ। बहुत से लॉकर हैं वहाँ। नोटों की गड्डियां, सोने के ज़ेवर, हीरे। परंतु कोई ऐसा लॉकर नहीं जहाँ औरत अपने हुस्न या जवानी को रखकर चाबी जेब में डाल ले ? इस साले हुस्न ने तो तबाह होना ही है------- तो तबाही किस बात की ? प्यार से हुस्न चमकता है। जवानी मचती है। अस्मत का पाखंड तो कुरुप औरतों ने रचा है......इन्सानी जिस्म को कोई चीज़ मैला नहीं कर सकती । हमेशा निखरा तथा ताज़ा रहता है हुस्न।’



शिव के साथ कार में सफ़र करने का कोई सौदा नहीं था, यह तो एक प्रकार का प्यार था। मैं कार में लोगों को ढोने के हक में नहीं। सफ़र मेरे लिए बड़ी सूक्ष्म तथा आध्यात्मिक चीज़ है। यदि कोई यार साथ हो तो सौ मील का सफ़र मिनटों में कट जाता है। यदि कोई बोर आदमी साथ हो तो दो मील का सफ़र भी दो हज़ार मील लगता है।
एक दिन सुबह-सुबह शिव मेरे घर आया और कहने लगा, ‘आज शाम को कपूरथले में मुशायरा है। तुम मेरे साथ चलो।’



मैंने कहा, ‘मैं नहीं जा सकता। किसी और को ले जाओ।’
शिव ने कहा, ‘टैक्सी ले कर आऊंगा। अकेला। किसी और कंजर को मत बताना। चंडीगढ़ भरा पड़ा है मुफ़्तखोरों से। यूं ही साथ चल देंगे उठकर। मैं टैक्सी में सूअर को लाद कर ले जा सकता हूँ, परंतु किसी बोगस राईटर को नहीं। तुझे चलना पड़ेगा। मैं तुझे बीयर की तीन बोतलें तथा भुना हुआ मुर्गा खिलाऊंगा रास्ते में, साथ में तीस रुपए।’
मैंने कहा, ‘मेरा रेट पचास रुपए है।’ वह मान गया।



शिव को मुशायरे से पाँच सौ रुपए मिलने थे। प्रबंधकों ने यह बात छुपा रखी थी और चाहते थे कि शिव इस बारे में किसी और से बात न करे वर्ना दूसरे कवि नाराज़ हो जाएंगे।



पाँच सौ रुपयों में से शिव ने ढाई सौ रुपए टैक्सी के देने थे और शेष खर्च के लिए। शाम पाँच बजे वह टैक्सी ले कर आ पहुँचा। मुझे साथ लिया और टैक्सी भागने लगी।
शिव ने टैक्सी चालक से कहा, ‘सरदार जी, ज़रा इस कॉलोनी की तरफ गाड़ी घुमा दें। मुझे एक दोस्त से मिलना है।’
मैंने कहा – ‘पहले ही देर हो चुकी है।’
‘चिंता मत कर, दो मिनट ही तो मिलना है एक लड़की से। वह मेरी दोस्त है।’
टैक्सी कॉलोनी की सड़कों पर घूमती रही। शिव घर भूल गया था। न तो नंबर याद था, न गली। तीन-चार जगह टैक्सी रोक कर पूछा परंतु पता न चला। टैक्सी घूमकर मुड़ी तो नीम का एक पेड़ दिखा। शिव ने कहा, ‘बस यहीं रुकिए। यही है।’



टैक्सी से उतर कर उसने घंटी बजाई। एक युवती ने दरवाज़ा खोला। लंबे काले बाल, सुंदर नक्श।
शिव बोला, ‘थोड़ी देर के लिए आया हूँ। कहाँ है तेरा मियाँ ? ’
‘ड्यूटी पर गए हैं। कल लौटेंगे।’
‘अच्छा तो चाय पिलाओ मेरे दोस्त को। जानती हो न इन्हें ? ’
उसने मेरा परिचय करवाया।
वह चाय बनाने लगी। शिव जूतों सहित दीवान पर लेट गया।
मैंने इर्द-गिर्द नज़र डाली। दीवार पर एक बंदूक तथा कारतूसों की पेटी लटक रही थी। शायद किसी फौजी का घर था या वन विभाग के अधिकारी का। एक तरफ ऊंचे चमकते बूट।
वह चाय तथा बिस्कुट ले आई।



शिव ने कहा, ‘मैं चाय नहीं पीयूंगा। यह सिर्फ़ बलवंत के लिए है।’
वह आंगन में खेल रहे अपने बच्चे को ले आई। शिव ने उसके गालों को गुदगुदाया। फिर कहा – ‘मुझे मुशायरे में जल्दी पहुँचना है। तुम भी साथ चलो।’
उसने कहा – ‘मैं कैसे जा सकती हूँ। वे कल सुबह लौटेंगे।’ शिव ने लापरवाही से कहा- ‘कह देना शिव के साथ गई थी। तुझे वह कुछ नहीं कहेगा। अरे, शायर के साथ जा रही हो, किसी व्यापारी के साथ नहीं। चलो, जल्दी करो।’



यह कह कर शिव उठा और उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘शिव.... बस मेरा नाम ले देना, यूं ही मत डरो। चलो, जल्दी करो।’
मैंने सोचा, यह क्या बकवास किए जा रहा है। यदि कहीं इसके पति को पता चल जाए तो इसी बंदूक से दोनों को उड़ा देगा। मैं भी बीच में मारा जाऊंगा।
परंतु मैंने देखा कि वह महिला बच्चे को पड़ोसन के पास संभाल आई और शिव के साथ चल पड़ी। मुझे यह दृश्य अब तक नहीं भूलता कि वह खुले बालों की चोटी करती हुई शिव के साथ बैठी थी और टैक्सी कपूरथले की ओर भागी जा रही थी।
वहाँ पहुंचे तो साढ़े नौ बज चुके थे और मुशायरा चल रहा था।



यह मुशायरा गुरु नानक देव जी के पाँच सौवे प्रकाश उत्सव के उपलक्ष्य में था। प्रिंसीपल ओ. पी. शर्मा ने धूमधाम से यह मुशायरा रचाया था। स्टेज के पीछे शराब की छबील लगी हुई थी। शिव तथा मुझे देखते ही दो-तीन कर्मचारी आगे बढ़े। स्वागती आलिंगन किए और व्हिस्की के गिलास पेश किए। शिव ने पाँच-सात घूंटों में गिलास ख़त्म किया।
हम भीतर स्टेज पर गए तो शिव को देख कर पूरे हॉल में खुशी की लहर दौड़ गई और तालियों से सारा वातावरण गूंज उठा। दो-चार लड़कों तथा लड़कियों की जोशीली आवाज़ें भी सुनाई दीं।



स्टेज पर पच्चीस-तीस शायर विराजमान थे। इन में प्रो. मोहन सिंह, मीशा, साधु सिंह हमदर्द तथा बलराम भी थे। पाँच-छह कवियों ने हमारी उपस्थिति में कविताएं पढ़ीं तो उनकी विषय-वस्तु कुछ इस प्रकार थी – ‘बाबा नानक अब तुम मत आना। यहाँ रिश्वतें, झगड़े, बंटवारे, रगड़े। तुम मत आना।’ या फिर – ‘बाबा तुम आकर देखो देश में कितना भ्रष्टाचार है। गरीबों पर जुल्म होता है। लोग नंगे, भूखे फिरते हैं। तू आकर देख।’



मोहन सिंह ने अपने महाकाव्य ‘ननकायण’ में से नज़्म पढ़ी जिसमें वह तलवंडी की शाम का वर्णन करता है। सारी नज़में शाम, नाम, काम, धाम आदि शब्दों से भरी पड़ी थीं। मुशायरे में थकावट थी, ख़यालों का बुढ़ापा।
शिव उठा तो सारे हॉल में बेचैनी दौड़ गई। उसने नज़्म पढ़ी, सफ़र।
आँखें बंद कर, तथा बाँह ऊंची कर उसने माइक्रोफोन के सामने गुनगुनाया। नशीले धीमे स्वर लरज़े और लोगों के दिल की धड़कन की तारों को किसी ने मिज़राब से छेड़ा।
अचानक उसकी आवाज़ ऊंचे स्वरों में गूंजी। वह नानक को चुनौती दे रहा था। एक शायर दूसरे शायर से मुख़ातिब था। वह नानक से कह रहा था, ‘देख तेरी कौम में कितना सफ़र किया है, तुझसे आगे। यह आज पहुंची है नाम से तलवार तक।’



नाम से तलवार तक के शब्द गूंजे तो जवानों के सीने में सचमुच समूची कौम के निमन-चेतन की लालसाएं जाग उठीं। पूरे हॉल में शिव गूंज रहा था। उसका कद बहुत ऊँचा लग रहा था और उसकी आवाज़ में पैगंबरों वाला ओज़ था। लोगों में सिहरन पैदा करने की शक्ति, उन्हें रुलाने, जगाने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा।



हॉल में सन्नाटा था। बीच-बीच में हल्की सी आह निकलती थी। फिर जादूभरी मुग्धता। नज़्म ख़त्म हुई तो लड़कियों ने आवाज़ें दीं – ‘की पुच्छदे ओ, हाल फकीरां दा।’ शिव मु्स्कराया तथा नया मूड बनाने के लिए फिर से गुनगुनाया। नज़्म गाने लगा जो उसने सैंकड़ों बार गई थी और हर बार लोगों के दिल को छू गई थी । जब उसने ऊंचे स्वर में कहा –




‘तकदीर तां साडी सौकण सी
तदबीरां साथों न होईयां
न झंग छुटेया, न कन्न पाटे
झुंड लंग गिया, इंझ हीरां दा।’






हॉल में बैठे सभी लोग तड़प उठे। कॉलेज की लड़कियों के सीने में हूक उठी। वे हीरों का ही रूप थी। युवकों के सीने में साँपों ने डंक मारे क्योंकि वे सभी ऐसे रांझे थे जो कान नहीं पड़वा सके थे।



एक दर्द भरा माहौल छा गया। शिव तीन नज़में पढ़कर हटा तो कोई और शायर खड़ा न हो सका। समां टूट गया तथा मेला उजड़ गया।
शिव बाहर निकला तो उसने एक कर्मचारी से कहा- ‘कुत्तो, व्हिस्की क्या सिर्फ़ आते वक्त ही पिलानी थी ? गिलास लाओ।’



एक आदमी ने व्हिस्की का एक गिलास भर कर शिव को पकड़ाया और दूसरा मुझे। वहाँ एक मुंशी बैठा था जो शायरों को रुपए देकर रसीदें ले रहा था। उसने शिव को एक लिफ़ाफ़ा थमाया और रसीदी टिकट पर उसके दस्तखत ले लिए। शिव ने नोट गिने बिना ही लिफ़ाफ़ा जेब में डाल लिया।
हम तीनों बाहर निकले तो ओ. पी. शर्मा ने कहा कि डिनर की व्यवस्था उसके घर पर थी। सभी वहाँ चले गए।
शिव ने हामी भरी। हम इकट्ठे चल पड़े।
थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि शिव अंधेरे में कहीं गुम हो गया था।



सुबह मैं गहरी नींद में सोया पड़ा था, जब शिव ने आकर मुझे जगाया, ‘उठो अब वापिस चलें चंडीगढ़। उसे भी रास्ते में छोड़ना है। हम टैक्सी में बैठे हैं जल्दी करो।’
मैं तैयार होकर बाहर आया तो शिव तथा वह महिला मेरा इंतज़ार कर रहे थे। टैक्सी वापिस दौड़ने लगी। उसी कॉलोनी में नीम के पेड़ के पास रुकी। शिव तथा उसकी दोस्त बाहर निकले। घर के सामने जीप खड़ी थी।
वह बोली, ‘वे आ गए हैं।’
शिव ने कहा, ‘चल अंदर चलें। बलवंत, तुम भी आ जाओ।’
मैंने अंदर जाने से इन्कार कर दिया। मुझे दीवार पर टंगी बंदूक याद आ रही थी, कारतूसों की पेटी तथा चमकते ऊँचे बूट। अभी ही कोई घटना घटने वाली थी।
शिव ने मुझे खींच कर कहा - ‘आ यार, दो मिनट लगेंगे।’
मैं दुविधा में था। इस पागल ने......
शिव की दोस्त आगे थी तथा हम दोनों पीछे। पता नहीं क्या होगा अब।
शिव ने अंदर घुसते ही मुस्करा कर कहा, ‘ले भाई संभाल अपनी बीवी। मैं ले गया था मुशायरे में।’
वह सुंदर सा युवक था। बोला - ‘आईए, बैठिए, चाय पीकर जाईएगा।’
शिव ने कहा, ‘हमें जल्दी में हैं। हम चलते हैं।’ उसने झूमते हुए उसका आलिंगन किया और फिर हम चंडीगढ़ के लिए रवाना हुए।
मैं शिव की बेबाक कशिश पर चकित था और महिला की दिलेरी पर।

शिव एक संकल्प था, सृजनात्मकता का प्रतीक, एक ऐसी शक्ति जो शारीरिक होते हुए भी आध्यात्मिक थी।



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मैंने गुरु नानक देव पर लाईट ऐंड साउंड ड्रामा लिखा। इस नाटक के प्रदर्शन की रुप-रेखा तैयार की। इसके गीत शिव ने लिखे। वह एक महीना मेरे घर रहा। हम दोनों जन्म साखियों को पढ़ते तथा नाटक की बाणी के एक-एक शब्द का रसपान करते। शिव सुबह चार बजे उठ बैठता। रोज़ दो-तीन गीत लिखकर मुझ जगाता – ‘ले सुन।’

नानक के जन्म पर लिखा गीत उसने गाकर सुनाया –


‘हरिया नी मांए, हरिया नी भैणे।
हरिया ते भागी भरिया।
मेरे हरे दे चंद सूरज हाण......।’


इस जन्म पर तारे मिठाईयां बाँट रहे हैं । धरती उसक दाई......।



वह गा रहा था और मेरी आँखों में आँसू थे। उसने नानक के घर से चले जाने का गीत लिखा। किस प्रकार माता तृप्ता तथा सुलखणी नानक के बिछोड़े का संताप झेलती हैं। शिव ने ऊँची आवाज़ में सहराई के स्वरों में गाया -



‘इक दे सिर दा साँई चल्लिया
इक दी अक्ख दा नूर।
इक दे थण विच विरहा रोवे
इक दी माँग संधूर।’


उसने कहा, तुम सो रहे थे। मैंने सोचा एक नज़्म और लिख लूं। एक ग्रामीण लड़की कहती है –



‘कोठे चढ़ के कत्त लग्गी
आ पूणी नूं आग्ग पई
पट्टां दे विच्च पींघां पईयां
हुस्न जवानी रज्ज गई
सावे टोभे दे शीशे दी
चिप्पर-चिप्पर भज्ज गई।’



शिव ने यह नज़्म मुझे दिखाई। इसमें दो-चार पंक्तियां काटी हुई थी। ये पंक्तियां भी उसने काट दी थी –



‘खेतां विच्चों सूरज-रंगी
टौरे वाली पग गई।’



वह कई बार खूबसूरत पंक्तियां तथा अलंकार काट देता। ऐसी पंक्तियां जो कोई दूसरा शायर नहीं लिख सकता, शिव आसानी से लिख डालता। उसके शब्दों की सजावट में चमत्कार था, नाटकीयता थी। दो अलग शब्दों को तथा चित्रों को अजीब तरह से जोड़ता था। उसने बिंबों तथा प्रतीकों का ऐसा प्रयोग किया कि वे उसके नाम साथ ही जुड़ गए। किसी की हिम्मत नहीं थी कि ‘भट्ठी वालीए’ या ‘कंडियाली थोर’ या ‘सप्पणी’ या ‘चंदरे रुख’ या ‘पुठड़े तवे’ जैसे शब्दों का प्रयोग करे।



यदि वह प्यार का गीत लिखता या खुशी का तो उसी वक्त कब्रों या मृत्यु के विषय में भी गीत लिखता था। नानक पर रहस्यवादी कविता के बाद उसी वक्त उसने ‘उधाले’ पर नज़्म लिखी। वह ‘अलख़ बछड़ी’ की बात करता है जो सौ खूंटे उखाड़ कर भागी जाती है। एक में कहानी, नशा तथा वैराग्य है, दूसरी में जिस्म का शूकता वेग तथा वर्जित प्यार। शिव बहुपक्षीय तथा बहुमुखी कवि था।


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लंदन में उसे बी.बी.सी वालों ने कहा, ‘तुम ग़म के शायर हो, इसे बारे में कुछ बताओ।’
शिव ने कहा, ‘काहे का ग़म ? मुझे कोई ग़म नहीं। मुझे कोई ग़म नहीं, मज़े से शराब पीता हूँ। महबूबाओं ने प्यार दिया। बेशुमार लड़कियों ने इश्क किया। काफ़ी रुपया है। यार, दोस्त हैं। नेक बीवी है। काहे का ग़म। मुझे कोई ग़म नहीं। मैं ग़म की कविता लिखता हूँ हँसकर। मुझे अपना कोई ग़म नहीं। दुनिया का ग़म अवश्य मेरे भीतर है। जो शायर निज़ी ग़म का रोना रोते हैं, उनकी कविता फीकी होती है।’



जब मैं लंदन गया तो लोग महफ़िलों में उसकी बातें करते थे। गलासगो गया तो उसकी बात। टोरांटो गया तो उसके बात तथा न्यूयॉर्क की पंजाबी महफ़िलों में भी उसी की चर्चा।
वह मृत्यु के बाद एक मिथक बन गया है – मंटो की भाँति, सहगल की भाँति। यदि किसी ने शिव के साथ खाना खाया, या बस में सफ़र किया या शराब पी या उसकी तिल्ले वाली चप्पल ठीक की या रेशमी कुर्ता सिला तो वह गर्व से शिव की बात करता है। ऐसी शोहरत तथा प्यार किसी विरले को ही नसीब होता है।



शिव ने अपनी मृत्यु अठाईस साल की उम्र ही निर्धारित कर ली थी। कोई शक्ति उसे मरने से नहीं रोक सकती थी। जब किसी का नाम ही शिव बटालवी हो तो उसकी मौत जवानी में ही लिखी होती थी। उसने अपनी कलम से अपना मरसिया खुद लिखा।



वह भरी जवानी में मरने का इच्छुक था। एक बार शराब पीकर नशीली आँखों से देखते हुए वह मुझसे कहने लगा – ‘मैं बूढ़ा होकर नहीं मरना चाहता। बुड्ढे की मौत बड़ी ज़लील चीज़ है। जापान के समूराई सूरमे अपने जिस्म को सुडौल तथा खूबसूरत बनाते हैं। जब जिस्म की खूबसूरती चरम पर होती है तब वे अपने पेट में तलवार घोंप कर हाराकेरी की रस्म अदा करते हैं और मौत की गोद में समा जाते हैं। चैरी का फूल पूरी तरह खिलता है और बड़ी शान से गिरता है। मरना कोई चैरी के फूल से सीखे।’



शिव ने अपनी मौत की फूलों से तुलना की है। उसने जवानी में मरने की खूबसूरती का वर्णन किया और इसकी रस्म भी पूरी की। चंडीगढ़ में हम अक्सर मिलते। वह सर्दियों में मलागीरी कोट तथा मफ़लर पहन कभी-कभी स्टेट बैंक आता। वहाँ से उठकर मेरे साथ। मेरे बहुत मजबूर करने पर भी वह कॉफी न पीता। उसके खून में शराब इस क़दर घर कर गई थी कि चाय या कॉफी उसे अच्छी नहीं लगती थी। सिर्फ़ शराब ही उसके शरीर को शीतलता दे सकती थी। कई बार वह बिना सोडे या पानी के शराब की शीशी में से सीधे तीन-चार घूंट भर लेता जिससे उसका मन शांत तथा एकाग्र हो जाता। उसमें रचना-शक्ति दौड़ने लगती। वह पहले से भी ज़्य़ादा नम्र हो जाता। उसमें बर्दाश्त करने की ग़ज़ब की शक्ति थी।



नए शायर, नौजबान इन्कलाबी शायर, प्रयोगवादी शायर उसके विरुद्ध बोलते। उसे सामाजिक चेतना से वंचित कहते। भला ऐसी कविता का क्या मतलब, जब कि मुल्क में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, भूख है, और शिव चाँद, सूरज और कच्ची कंध मले दंदासा की बातें करता है। वह समाज से कट गया है।



ऐसे कवि पत्रिकाओं में उसके विरुद्ध लिखते रहे तथा मंचों पर बोलते रहे परंतु कोई भी मुशायरा शिव के बगैर मुकम्मल नहीं होता था। कवि सम्मेलनों में लोग पहली बात यही पूछते कि इस मुशायरे में शिव आ रहा है या नहीं।



शिव अपनी बढ़िया कला तथा सृजन शक्ति के बारे सजग था। लोग उसे निराशावादी कवि कहकर बदनाम करते रहे। कुछ उसे वासना का कवि कहते। कई लोग उसके कविता में से तकनीक गलतियां निकालते रहे। कई उसकी नकल करके उससे बेहतर कवि होने का दावा करते रहे पर शिव शोल की भाँति जलता रहा और रौशनी बिखेरता रहा।



उसने कहा, ‘सारी प्रकृति एक दूसरे की निंदा तथा प्रशंसा है। हमारा जन्म ही निंदा तथा प्रशंसा के संभोग से होता है। मेरा सबसे बड़ा निंदक या प्रशंसक मैं खुद हूँ। अपनी पीड़ा की निंदा मैंने अपने गीतों से की और मेरे गीतों की निंदा लोगों ने की। इसकी वजह मेरी शोहरत के प्रति ईर्ष्या के सिवा कुछ नहीं। ईर्ष्या हमेशा घटिया को बढ़िया से होती है।’



उसके जीवित रहते मैंने उस पर कई लेख लिखे, उसकी कई कविताओं का उसे साथ बिठाकर अंग्रेजी में अनुवाद किया परंतु उसकी मृत्यु के बाद पंजाबी में कोई लेख नहीं लिखा। प्रशंसात्मक लेख लिखने का काम मैंने उसके निंदकों के लिए छोड़ दिया था, जो बढ़-चढ़कर रोने तथा मातमी गीत गाने के लिए तत्पर थे।



शिव की मृ्त्यु एक निज़ी ग़म भी था और समूचा ग़म भी। ऐसी पीड़ा कई बार इन्सान के अंदर ही रह जाती है।अब शिव को गुज़रे बारह साल हो गए हैं। उस की कविता, उसकी याद, उसकी उदास हँसी, टिप्पणियां तथा झिंझोड़ डालने वाले गीत उसी तरह ताज़ा हैं। वह लंदन में पाँच-छह महीने रहकर वापस आया तो मैं उससे मिलने गया। 21 सेक्टर में उसने मकान बदल लिया था।



वहाँ पहुँचा ते देखा कि शिव के ड्रॉइंग रूम में गोल-मटोल रबड़ की फूली हुई कुर्सियां थी। कुछ विदेशी चीज़ें। उसका प्रशंसक तथा शिष्य दीपक मनमोहन भी वहीं बैठा था। एक लंबी लड़की किचन में रोटी बना रही थी, उसकी प्रशंसक। अरुण भी खुशी से काम कर रही थी। घर में खुशहाली थी।



शिव बातें करने लगा तो मैंने देखा कि वह उन छह महीनों में बदल गया था। उसके कपोल भर गए थे तथा उसके चेहरे पर धुएं जैसी एक छाया सी थी। मैं सोचता रहा कि क्या वह ज़्यादा सेहतमंद हो गया था या बीमार।



उसने कहा, ‘ये देख रबड़ की कुर्सियां। लंदन से लाया हूँ ये। इनमें हवा भरो और चाहे एक मन की औरत बैठ जाए, चाहे बारह मन की धोबिन....बड़ी देर हो गई बाईस्कोप देखे.... दिल्ली का कुतुबमीनार देखो, आगरे का ताज देखो, बारह मन की धोबिन देखो.....ये लोग कहाँ चले गए ?’

मैंने कहा, ‘लंदन की कोई बात सुना। क्या हाल है वहाँ के लोगों का ?’
‘सब पौंडों (पाउंड) के भूखे हैं । हर कोई शायर तथा लेखक। उन्होंने बर्तानिया को फ़तेह कर लिया है। वे पंजाब से आए लेखक की सेवा भी करते हैं और उससे नफ़रत भी। मुझे वहाँ पाकिस्तान की शायरा ... सर मुहम्मद इकबाल की पोती....बहुत खूबसूरत लड़की मुझ पर फिदा हो गई.....उसकी चिट्ठियां....और तीन चार और लड़कियों का....मैंने अचार डालना है इन लड़कियों का......शराब पिलाते मुझे तथा मेरे गीत सुनते...मैंने कह दिया था कि मैं पाँच सौ पाउंड लूंगा। एक शाम का.....और उन्होंन पैसे दिए.....घुटने टेककर। मैं तो शायर हूँ.....शिव......उनका बाप.... पर वह लड़की सायरा बानो....या नसीम बानो मुझ पर फिदा हो गई......पर मुझे क्या परवाह....मुझे घर याद आ रहा था...अरुण....बच्चे.....व्हिस्की .....मेरा बेटा......।’



इन टूटे-फूटे शब्दों नें शिव की सारी मानसिक स्थिति बयां कर दी। टुकड़े हुआ दिल...काँपते शब्द तथा बेढंगे वाक्य....इनमें अंदरूनी तर्क था। वह इस तरह बोल रहा था जैसे मुझे नहीं किसी और से कह रहा हो।



कई दिनों बाद पता चला कि शिव बीमार है। मैं उसे मिला तो उसकी बातें और भी उखड़ी हुई तथा बेतुकी थीं। मुझे अब तक याद है उसका धूंसर चेहरा तथा बुझी आँखें।



वह ज़िदगी से निराश हो गया था। निराशा के गहरे कुँए में डूब कर उसने कई ऐसी कविताएं लिखीं जो समूची परंपरा के विरुद्ध थीं। इनमें एक अजीब दिव्य-दृष्टि थी जो कई बार उस इन्सान में आ जाती है जो मृत्यु को देख रहा हो। जिसे किसी का डर न हो। जो अंधेरी कोठरी में छत फाड़ने वाली चीख़ मार सके ताकि सोए पड़े लोग जाग सकें। इसी मानसिक अवस्था में उसने कविताएं रचीं – कुत्ते, फाँसी, लुच्ची धरती। वह धरती को माता कहते-कहते थक गया था। इसके अलावा वह देख रहा था कि पाखंडी तथा हर प्रकार का साहित्यिक और राजनीतिक व्यक्ति धरती को माँ कह कर लूट रहा था। शिव ने धरती को ‘लुच्ची’ कह कर अपने इर्द-गिर्द को चौंकाया। परंपरागत नमस्कार को त्याग कर धरती गो क्रोध से लुच्ची कहा – जैसे कोई जवान बेटा अपनी माँ को गाली दे।



लोगों ने शिव को गालियां दी। शिव और क्रोधित हो गया तथा कहने लगा, ‘बेवकूफों ! कुत्तो मेरी बात सुनो। मैं सच कह रहा हूँ। मेरी बात सुनो।’
कई लोगों ने उसे ललकारा तथा कहा कि उसकी विचार-धारा उलटी है। शिव ने कहा – ‘हाँ, मैं उलटा हूँ – शीशे की भाँति आपका अक्स हूँ, जो आपको उलटा लगता है।’
धीरे-धीरे शिव अपने भीतर ही भीतर धंसता गया। लोगों ने जो कहा, उसी तरह का बन कर दिखाने की ज़िद में और भी बातें करने लगा, जिनमें हक़ीक़त की चिंगारियां थीं। कईयों ने कहा - शिव बतौर शायर मर गया है। वह बिलकुल मर गया है। शिव मरने के लिए तैयार हो गया।
मुझे पता चला कि शिव अस्पताल में है और मुझे याद कर रहा है। मैं अस्पताल गया तो वह प्राईवेट कमरे में चारपाई पर पड़ा था। दवा की शीशियां, अस्पताल की अजीब सी बू तथा घुटन। उसके पैरों की तरफ वही लंबी सुंदर युवती बैठी थी जो उसके घर रोटी बना रही थी।
एक रात वह अस्पताल से निकल कर चला गया। मैं अस्पताल में नहीं मरना चाहता। उसे फिर से अस्पताल में दाखिल किया गया। उसकी हालत बिगड़ती गई।



बिस्तर पर पड़ा वह कई बार ज़ोर-जो़र से रोता और आवाज़े लगाता – ‘मैं मर रहा हूँ। कहाँ है मेरे यार दोस्त ? कुत्तो मैं जा रहा हूँ। ढूंढोंगे शिव को !’



उसके अधिकतर दोस्त व्यस्त थे। किसी के पास वक्त नहीं था। साहित्य समारोह हो रहे थे। भाषण चल रहे थे। कॉफी हाउस में लेखकों, अध्यापकों तथा अख़बार वालों का जमघट लगा रहता था। उनके पास वक्त नहीं था कि शिव से मिलने जाएं।



मुझे एक शाम संदेसा मिला कि शिव मुझे याद कर रहा है। उसने मुझे फौरन मिलने के लिए कहा क्योंकि वह चंडीगढ़ छोड़ कर अगली सुबह बटाला जा रहा था। चंडीगढ़ उसे रास नहीं आया था। वह सेक्टर 21 के मार्केट के पिछवाड़े एक दोस्त के घर ठहरा हुआ था, जिस का पता मैंने नोट कर लिया था।



रात हो चुकी थी। सोचा सुबह उसे मिलने जाऊंग। मुझे डर लगा कि वह कहीं मुझे बिना मिलो न चला जाए। एक अजीब ख़ौफ़ तथा बेचैनी मेरे भीतर थी कि यदि वह बटाला चला गया तो पता नहीं कब मुलाकात हो।



मैं सुबह साढ़े पाँच बजे उठा, कार स्टार्ट की और सेक्टर 21 के उस पते पर गया। लोग सोए हुए थे। तीन मंजिले मकान शांत थे। मुझे वह मकान ढूंढने में कुछ समय लग गया। घबराहट बढ़ती गई।



अंत में जब मकान मिला तो पता चला कि शिव आधा घंटा पहले वहाँ से चला गया था।
मैंने पूछा – ‘कहाँ ?’
‘बटाला।’
मैंने फौरन कार घुमाई और बस अड्डे पर गया। बटाला जाने वाली बस का पता किया। आधा घंटा बस अड्डे पर घूमता रहा। शिव जा चुका था।



फिर पता लगा कि शिव अपनी बीवी तथा बच्चों सहित टैक्सी में बटाला गया था। उसकी हालत बहुत ख़राब थी। उसने टैक्सी को सेक्टर 22 के बत्तियों वाल चौंक पर रोका, जहाँ शाम को दोस्तों के साथ लोहे के जंगले के पास खड़ा होता था। उसने टैक्सी का दरवाज़ा खोला। नफ़रत से थूका और कहा – ‘कभी नहीं आऊँगा मैं इस कुत्ते शहर में।’



चंडीगढ़ पत्थरों का शहर था, बटाला लोहे का। दोनों शहरों ने उसे प्यार दिया, शिव ने इन शहरों को गीत दिए। दोनों शहरों को उसने प्यार भी किया और नफ़रत भी।
बटाला वह कुछ ही दिन रहा। फिर अरुण के साथ अपने ससुराल के गाँव चला गया जो पठानकोट से पंद्रह मील दूर पहाड़ के क़दमों में है।



यहाँ हरियाली थी, छोटे घर थे, खेत थे। शिव इस घर के चौबारे में रहा जहां अत्यंत गर्मी थी।
रात को उसे नींद न आती। कई बार वह आवाज़े देता और रोता। ‘मैं अकेला हूँ लोगों। मैं अकेला रह गया। कहाँ हैं मेरे यार ? ’



दूर खेतों में गीदड़ रोते और भांय-भांय करती रात में शिव की आवाज़ें खो जातीं। 6 मई, 1973 की रात को शिव की आत्मा सदा के लिए सो गई।


पंजाबी से अनुवाद – नीलम शर्मा अंशु’