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रविवार, जुलाई 17, 2011

कहानी श्रृंखला -13 (पंजाबी)


समंदर की तरफ खुलती खिड़की  -  जसबीर भुल्लर



                                                                                                         

वे घरों को नहीं लौट सकेंगे। इंतज़ार करते-करते माएं बूढ़ी हो जाएंगी और मर जाएंगी। पता नहीं वे संख्या में कितने थे।मैं भी उन्हीं में से था। मेरी आँखों में भी सेल्युलॉयड के सपने थे। वे सपने भी फ़िल्म का रूप नहीं ले पाए थे, पिघल कर आँखों में जम गए थे।
एक साल !
दो साल !
और फिर तीन साल !

बंबई मुझे घूंट-घूंट कर पीती जा रही थी। समुंदरी हवा के फूलों में महक नहीं थी। मैं अपनी मुहब्बत के दिनों का भगौड़ा था, मुझे बंबई की गलबहियां चाहिए थीं परंतु बंबई के पास न बाँहें थीं और न ही कांधा। बंबई रूह रहित ताबूत थी। मेरी तीन वर्षों की लाश उसमें पड़ी तिड़क रही थी। मैं अब अपने वो तीन साल कहाँ से लाऊँ? छत से लटक रहा पुराना पंखा चीख रहा था। मेरे कमरे के दोनों साथी जा चुके थे।घोष और देसाई आज फिर जगह-जगह जाएंगे। निर्माता और निर्देशकों से मिलने की कोशिश करेंगे। कभी किसी दर से झाड़ खा कर लौट आएंगे और किसी अन्य दरवाज़े से भ्रम की उंगली थाम लेंगे। जब वे शाम को लौटेंगे, उनके जिस्म में दिन भर की थकावट होगी और हाथों में सपनों की किरचें।

मैं आज किसी स्टुडियो का चक्कर नहीं लगाना चाहता था। मैं अपनी ज़िल्लत को एक दिन का विराम देना चाहता था। मेरे जाने से वैसे भी कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला था। गर्म हवा उसी तरह ख़ामोश रहने वाली थी। मैं बड़ा अभिनेता नहीं था। मैं एक्सट्रा था, मिन्नतों की भीड़ में घिरा एक एकस्ट्रा।

    -                  -                    -


मैं अकेला नहीं था।
नमकीन टापू पर आदमियों का हजूम था।
वे किधर जा रहे थे?
वे क्या ढूंढ रहे थे?
मैं उनके पीछे-पीछे क्यों चल पड़ा था?
थकी सड़कों को भी मेरी आवारगी से कोई गिला न था।
दोपहर को मैंने कोलाबा के एक पारसी रेस्तरां में भरपेट भोजन किया, चाय पी और चल पड़ा।
मैं चाहता था कि मैं इतना चलूं, इतना थक जाऊं कि शाम तक अपनी तरफ लौटने का ख़याल ही न आए।
मेरे चारों तरफ परेशान समंदर था। अगली सुबह अभी दूर थी। अभी तो चिपचिपा दिन बाकी था। मेरे और अगली सुबह के बीच रात का आगमन शेष था।

मैंने लोकल बस पकड़ी और बंबई सेंट्रल जा उतरा। लैमिंगटन रोड होते हुए मैं कृष्णा सिनेमा जा पहुंचा। वहाँ खड़ा मैं फिल्मों के पोस्टर देखता रहा। अभी शाम नहीं ढली थी। मैं कृष्णा सिनेमा के पीछे कृष्णा पूरी हाउस में जा बैठा। मुझे चाय की तलब नहीं थी, परंतु मुझे अभी कुछ वक्त और गुज़ारना था। मैंने एक कप चाय मंगवाई और धीरे-धीरे घूंट भरने लगा। बाहर ठर्रे वाला खुदाबख्श दिखा तो मैं उठ खड़ा हुआ। चाय के पैसे दिए और बाहर निकल आया। मैंने उससे एक अधिया लिया और पुराने अख़बार के टुकड़े में लपेट कर बोतल को कंधे पर लटकते झोले में डाल लिया। मैंने घड़ी देखी, मेरे पास और दो घंटों का वक्त था। शाम के धुंधलके में मैं चौपाटी तट पर पहुंच गया। बीच पर रौनक बढ़ रही थी। भेल-पूरी और चाट वालों के गिर्द हजूम एकत्र हो गया था। लोग चटपटी चीज़ें खाने के लिए तड़प रहे थे। समंदर बिलकुल अकेला था।

‘बाबू, तफ़रीह के लिए साथ चाहिए क्या?’
एक अठारह-उन्नीस वर्षीया युवती ने बेझिझक मेरा हाथ पकड़ लिया।
मैंने उसका हाथ झटक दिया।
उसकी आवाज़ में मिन्नतें सी थीं, ‘बाबू कोई लफड़ा नहीं, कुछ नहीं, एक घंटे का सिर्फ़ दस टका। तुम से जास्ती नहीं मांगता।’
अचानक चौपाटी जगमगाने लगी परंतु पेड़ों की तरफ कोई प्रकाश नहीं था। जोड़े इधर-उधर झाड़ियों जैसे पेड़ों के नीचे बैठे थे। अंधेरा अभी इतना गहरा नहीं हुआ था कि उन्हें छुपा ले। ये पेड़ छाया देने के काम नहीं आते थे, इसी काम आते थे। उस युवती का भी कोई कसूर नहीं। मैं ही बेध्यान सा एक पेड़ के नीचे खड़ा था। पेड़े के नीच खड़े होने का अभिप्राय: यही था कि मुझे औरत का साथ चाहिए था। इन पेड़ों के नीचे लोग किराए के साथी के लिए देर रात तक बैठे रहते थे। उस युवती से पिंड छुड़ा कर मैं आगे बढ़ गया। कार पार्किंग वाले खंभे के पास से गुज़रते हुए मुझे पुराने दिन याद हो आए। खंभे के नीचे दो-तीन युवक खड़े थे।

शाम ढलते ही बंबई वेश्या क्यों बन जाती है?
ये युवक एक-एक करके कीमती कारों में बैठेंगे और चल देंगे। बूढ़ी और अधेड़ औरतें इन युवकों की ग्राहक थीं। इन औरतों के पति फाइव स्टार संस्कृति में डूबे हुए थे। उन्होंने अलग फ्लैटों में रखैलें ऱख छोड़ी थीं। कईयों के पति विदेशों में थे। वे देश में जरूर आया करते थे परंतु बीवियों के लिए नहीं। बीवियां अपने एकाकीपन की आग में सुलगते हुए ब्लयु फिल्मों का आनंद लेतीं और नशे में तारी होकर सो जातीं।

वेश्या का काम जब पुरुष करे तो उसे क्या कहते होंगे? ऐसे शब्दों की तो पुराने वक्तों में ज़रूरत ही नहीं पड़ी होगी। खंभे के पास से ग़ुज़रते हुए मैंने यूं ही सोचा और खंभे से आँख चुरा कर अपनी गति बढ़ा दी। मुझे डर था कि मेरी कोई पुरानी ग्राहक मुझे पहचान कर फिर पीछे न पड़ जाए। फाकामस्ती के दिनों में मुझे क्या-क्या नहीं करना पड़ा था। सड़क पार करके मैंने लोकल बस स्टैंड से फारस रोड की बस ले ली।
जब पहली बार मेरे पाँवों में बीमार गली की उलझनें पड़ीं तो मैं परेशान सा हो गया था। यह अचानक ही हो गया था कि मेरा एकाकीपन दोस्ती के चेहरे तलाशता उस बाज़ार में पहुँच गया था। वेश्याएं जगह-जगह खड़ी थीं, मोड़ पर, जंगलों के पीछे, छज्जों पर। वे गिद्ध की भाँति ग्राहकों को घेर लेती थीं। अश्लील वाक्यों में छुपी मिन्नत। मुझे लगा, वह मैं था, क़तार में खड़ा एक्सट्रा। वह मेरा अपना भाईचारा था। उस वक्त मैं किसी भी चौबारे की सीढ़ियां चढ़ सकता था और मैं अपने चौबारे की अंधेरी और सीलन भरी सीढ़ियां चढ़ गया था।

उस चकले के समूचे वातावरण में एक चिकना सा अंधेरा पसरा हुआ था। एक उदास सी ख़ामोशी ठहरी हुई थी। धंधे वाले कमरे में लकड़ी की खप्चियों के तीन छोटे-छोटे कैबिन बने हुए थे। बाकी जगह में एक मैला और पुराना सोफ़ा पड़ा था। सोफे के सामने एक बेंच था। सौदा तय होते वक्त वेश्याएं आकर बेंच पर बैठ जाती थीं। इतनी तंग जगह में ग्राहक को सहूलियत होती थी। सौदा तय होने के पश्चात् चुनी गई वेश्या बैठी रहती और शेष उठकर भीतर चली जाती थीं। वेश्याएं चार थीं और कैबिन तीन। कई बार ग्राहक को सोफे पर बैठ कर केबिन के खाली होने का इंतज़ार करना पड़ता था। लकड़ी के केबिन, बस नाम मात्र का ही पर्दा थे।

मुझे देख मैडम मुस्कराईं और पुन: ग्राहक के साथ मेल-तोल में जुट गईं। मैं मैडम के पास पड़े स्टूल पर बैठ गया।
कुलविंदर ग्राहक के सामने बेंच पर बैठी हुई थी। पंजाबी बाबू को कुलविंदर के पंजाबन होने पर शक था।
बेटी, सेठ से पंजाबी में बात करो।
कुलविंदर ने टूटी-फूटी पंजाबी बोलने की कोशिश की। कई ग्राहक भी अजीब थे। वे अपनी मान्यताओं, विश्वास और धर्म उठाकर कर चकले पर ले आते थे परंतु उन लड़कियों का धर्म जिस्म था। यह उनके लिए जीने का ज़रिया था। वे अपने ग्राहक के धर्म का सम्मान करती थीं। ग्राहक का धर्म बचाने की ख़ातिर वे अपना नाम भी बदल लेती थीं और धर्म भी। नाम कौन सा पहले भी असली होता था। पंजाबी बाबू ने मैडम की फीस चुकाई और कुलविंदर की बाँह पकड़ उठ खड़ा हुआ। केबिन खाली नहीं था। वह फिर बैठ गया।
केबिन से आती आवाज़ें उनकी ख़ामोशी में और भी ऊँची प्रतीत होती थीं।
‘बहुत दिनों बाद आए हो।’ भीतरी आवाज़ों को ढकने के लिए मैडम ने ऊँचे स्वर में कहा।
‘बस, आ ही नहीं पाया।’
मैडम उठ खड़ी हुई, ‘चलो, भीतर चलो।’

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दूसरे कमरे में नीचे दरी बिछी हुई थी। दीवार के साथ समेटे हुए विस्तर पड़े थे। लड़कियां इस कमरे में बैठती थीं, सोती थीं, रहती थीं। इस कमरे में लकड़ी के तख्तों की पार्टीशन से मैडम के लिए एक कमरा अलग बना हुआ था। कमरे की खिड़कियां समंदर की तरफ खुलती थीं। एक खिड़की मैडम के केबिन में थी और एक लड़कियों के कमरे में। शाम के वक्त समंदर की लहरें शोर मचाने लगती थी। क्रोधी लहरें पत्थरों से टकरा कर बिखर जाती थीं। समंदर की बेबसी साफ़ झलकती थी।

लड़कियां समंदर से परेशान थीं। समंदर उनको उदास करता था। मैडम उठकर धंधे वाले कमरे में जा चुकी थी।
मैंने गिलास खाली कर दूसरा पेग बनाया। पानी लाने के लिए उठने लगा तो कमरे का मैला पर्दा उठाकर शीरीं ने भीतर झांका। वह अभी खाली हुई थी। उसने दौड़ कर आकर मेरे गले में बाँहें डाल दी। मैं शीरी को अच्छा लगता था। मैंने हैरान होकर सोचा, कहीं शीरी कोई ख्वाब तो नहीं पाल बैठी।

चकले की लड़कियां पगली थीं। कोई मलबे की ईंटों की तरफ इशारा करता था तो वे घर बनाने लगतीं। उनके ऐसा करने पर धंधा चौपट होने का संशय बढ़ जाता। उस वक्त ज़रूरी हो जाता था कि उन्हें वहां से बदल दिया जाए। नया चकला, नया नाम, नए ग्राहक, क्या पता ख्वाब फिर से बने या न बने। कोई सपनों की कौड़ियां बिखेरने वाला आए, न आए।शीरी ने पानी लाकर मेरा गिलास भर दिया और अपने लिए अलग पेग बना लिया। ‘कई ग्राहक तो बस सरदर्द ही होते हैं। अभी जो गया है वह तो रट लगाए बैठा रहा कि.....’ शीरी ने गिलास एक ही झटके में आधा खाली कर दिया और नीचे रख कर बोली, ‘सच अमर मैंने तो उसको साफ़ बोल दिया कि भई यह तो मेरा पेशा है परंतु मेरे होठों पर सिर्फ़ एक का ही हक है।’

मैंने हैरानी से शीरी की तरफ देखा। शीरी की आँखें भर आईं थीं। घुटने पर ठुड्डी टिकाए, नाखुन से दरी पर लकीरें खींचने लगी और फिर सर उठा कर धीरे से कहा, ‘अमर मैं वेश्या ही सही, पर.....। मैं अपनी कोई चीज़ तो किसी को पवित्रता के साथ दे सकूं।’ समूचे चकले पर हर वक्त बोझिल सा अंधेरा फैला रहती था। मुझे उस पल अंधेरे की बोझिलता की वजह समझ आई। मैंने जल्दी से शराब का गिलास खाली कर दिया। उस रात मैंने खूब शराब पी, उलटियां कीं और सो गया। तड़के मेरी नींद खुली। रात के जागरण के बाद थकी-टूटी लड़कियां बेसुध सोई पड़ी थीं। वे किसी उजड़े काफ़िले की भाँति इधर-उधर पसरी हुई थीं। वे दोपहर तक इसी तरह सोई रहेंगी। जब लोगों का दिन चढ़ता है तब चकले के बेटियों की रात होती है।

मेरा सर दुख रहा थी। मुँह का सवाद भी बकबका सा था। मैंने दीवार से तकिए की टेक लगा ली और अधलेटा सा पड़ा रहा। वह कमरा पंखविहीन चिड़ियों का घोंसला था। सोई हुई वे बहुत मासूम और भोली लग रही थीं जैसे कि बहनें हुआ करती हैं। वे सचमुच बहनें ही लग रही थीं। वे मेरे साथ शरारतें भी बहनों की भाँति ही करती थीं। कभी कोई मेरे कंधों से पकड़ कर मुझे पीछे की तरफ गिरा जाती। कोई पास से गुजरते वक्त मेरे बाल बिखेर जाती। कोई कंघी लेकर मेरे बालों में अलग तरह से कंघी करने लगती। कोई मेरे कंधे से झोला उतार कर टटोलने लग जाती। मैं भूखा नंगा ग्राहक इस चकले का इतना क़रीबी कैसे हो गया? मैं चकले के बिस्तर पर घर के सदस्य की भाँति पड़ा हुआ था और मुझे रिश्तों के चेहरे नज़र आ रहे थे।

मैंने सोचा जब मैं बड़ा ऐक्टर या डायरेक्टर बन जाऊंगा तो एक बहुत बड़ा बंगला खरीदूंगा। सभी को वहाँ ले जाऊंगा। वहाँ ये एक कमरे में इस तरह दरी बिछा कर नहीं सोएंगी। सभी वहाँ रहेंगी और मैं एक-एक करके अपने हाथों इनकी शादियां करूंगा। मै़डम शायद मुझसे भी पहले जग गई थी। उसने मुझे पानी पिलाया और फिर दो गिलासों में चाय ले आई। चाय पीते हुए मैंने उसे अपने मन की बात बताई। वह खिलखिला कर हंस पड़ी। लड़कियां नींद में ही सिहर उठीं। हंसते-हंसते फिर वह रोने लगी। मन कुछ हल्का हुआ तो उसने आँखें पोंछ डालीं। लंबी आह भरकर कहा, ‘अमर बहन बनने का नसीब किसी वेश्या के पास नहीं होता। बस बीवी बनने का छोटा सा सपना होता है, वह सपना भी कुछ बरसों तक आँखों में रहकर खुद ही मर जाता है।’

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मैं कल्याण स्टुडियो से बाहर आया तो पूरे पाँच सौ रुपए मेरी जेब में थे। ऐकस्ट्रा के काम के पाँच सौ रुपए। मैं चकित था। मेरी ड्राइवरी काम आ गई थी। ऐकस्ट्राज की उस भीड़ में मैं अकेला था जिसे ड्राइवरी आती थी। अत: मुझे चुन लिया गया। रोल कुछ ऐसा था, हीरोइन बदमाशों के चंगुल से निकल भागी थी। मैं ट्रक में स्मगलिंग का सामान ले रहा था। हीरोइन सामने से गिरती पड़ती आ रही थी। वह मेरे ट्रक के सामने गिर कर बेहोश हो गई। मैं उसे उठा कर अड्डे पर ले गया। हीरोइन को दोनों बाँहों में उठाए मैं बड़े हॉल में पहुँचा, ‘बॉस, आप के लिए तोहफा लाया हूँ।’
‘कट।’

मुझे पहली बार डायलॉग बोलने का मौका मिला था। मुझे उम्मीद जगी कि धीरे-धीरे बड़े रोल भी मिलने लगेंगे। मैं अपनी खुशी किसी के साथ बांटना चाहता था। कहाँ जाऊँ? मैंने दोस्तों के बारे सोचा तो मैडम का चकला याद आया। यह धंधे का वक्त नहीं था। मैं बेहिचक जा सकता था। मैंने मिठाई ख़रीदी। गरम-गरम समोसे पैक करवाए और फारस रोड पहुँच गया। सभी लड़कियां मेरे गिर्द झुरमुट डाल कर बैठ गईं। उनकी खुशी संभाली नहीं जा रही थी। वे शूटिंग की एक-एक बात जानना चाहती थीं।

‘हेमा मालिनी कैसी है ?’
‘तुमने तो हेमा से बातें भी की होंगी।’
‘इतनी भारी को तुमने उठाया कैसे ?’
मैं फ़िल्म में अपने रोल के बारे में उन्हें बढ़ा-चढ़ा कर बताता रहा।
चाय पीते वक्त मुझे ध्यान आया कि मैडम नहीं थी।
शीरी ने मेरे थैले से पत्रिकाएं निकाल कर दरी पर बिखेर दीं। माला और शीरी एक ही पत्रिका में कोई तस्वीर देख रहीं थीं। कुलविंदर और राधिका समोसे खाने में जुट गईँ।

‘मैडम कहाँ है ? ’ मैंने पूछा।
‘अस्पताल।’ शीरी ने पत्रिका बंद कर परे रख दी।
‘असपताल ? ’
‘उन्हें तो एक हफ्ता हो गया दाखिल हुए।
मुझे कैसे पता चलता। मैं इतने दिन आया जो नहीं था। मेरे पास पैसे नहीं थे न। मैंने पूछा, ‘अब क्या हाल है?’
‘पता नहीं।’
‘क्यों?’
‘हमें जाने की मनाही है न। दादा तो कुछ बताता ही नहीं। उसकी लाल-लाल आँखें देख कर वैसे भी बात करने की हिम्मत नहीं होती।’ शीरी ने मेरी बाँह पकड़ कर मिन्नत की, ‘प्लीज आप जाकर पता कर आएं न।’ मुझे और कोई काम नहीं था। मैं खाली ही था। रास्ते में मैंने फल वाले से केले और अंगूर खरीद कर अलग-अलग लिफाफों में डलवा लिए। उसे किसी के आने की उम्मीद नहीं थी। वह आँखें बंद किए पड़ी थी। उसके चेहरे पर सड़क किनारे लावारिस पड़े किसी अनाथ के चेहरे जैसे लाचारी थी। चेहरे के पीलेपन ने उसकी लाचारगी के रंग को और गहरा कर दिया था।

मैंने बिस्तर के पास पड़ी तिपाई पर दोनों लिफाफे रख दिए। उसने आँखें खोलीं और घबरा कर सजग सी हो गई। पलंग के साथ टेक लगा कर अधलेटी सी बैठ गई। कुछ पलों तक उसकी आँखें हैरानी से मुझे देखती रहीं। उसके होंठ मुस्कराए और आँखों से आँसू बहने लगे।
मैंने लोहे का स्टूल खींचा और उसके क़रीब हो कर बैठ गया। मैंने उसके हाथ को सहलाया, ‘प्लीज़ मैडम।’ उसने जल्दी से आँखें पोंछ डालीं और फिर दाएं-बाएं देखा। यह मरीज़ों से मुलाकात का वक्त था। दोनों तरफ की मरीज़ महिलाएं अपने-अपने रिश्तेदारों से बातें कर रही थीं। हमारी तरफ किसी का ध्यान नहीं था। उसने धीरे से कहा – ‘अमर, प्लीज़ यहां मुझे मैडम मत कहो।’

मुझे उसका नाम नहीं मालूम था। अपना नाम तो उसे भी नहीं मालूम था। उसने पता नहीं अब तक कितने चकले देख लिए थे। हर नए चकले पर वह नए नाम से रही थी। अब वह सिर्फ़ ‘मैडम’ थी और चकले की मैड़म का कोई नाम नहीं होता। 
‘अमर जानते हो मैं बहुत अकेली थी। निराश से स्वर में उसने कहा।’ 
‘बंबई में हम सभी अकेले हैं।’
‘नहीं अमर। तुम नहीं समझते। शाम के वक्त सभी मरीज़ों के पास कोई न कोई मिलने वाला बैठा होता है। एक मैं ही थी....।’ उसने आँसू पोंछ लिए परंतु आँखें फिर भी नम ही रहीं। उसने कहा, ‘मुझे भय था कि कहीं मुझे अस्पताल से निकाल ही न दिया जाए। सब देखते होंगे कि मेरे पास कोई नहीं आता। अब तुम आ गए हो न, मुझे अस्पताल से अब कोई नहीं निकाल सकता।’
‘परंतु मैं तो यहाँ किसी डॉक्टर को नहीं जानता।’
‘इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अब वे लोग समझेंगे कि मैं भी इज़्ज़तदार महिला हूँ।’
उसका भय किसी मासूम बच्चे के भय समान था।
‘अगर ऐसी बात है, तो मैं रोज़ आया करूंगा।’
‘सच।’ पल भर के लिए तो मानो उसे यकीन ही नहीं आया। उसने बालसुलभता से कहा, ‘पहले तो मैं मुलाकात के टाईम पर आँखें बंद किए पड़ी रहती थी। अब मैं बैठ कर तुम्हारा इंतज़ार किया करूंगी।’
‘अगर दादा बारी-बारी से लड़कियों को भी आने की इजाज़त दे दे तो....।’
‘नहीं अमर। देखते ही उनके वेश्या होने का पता चल जाता है। फिर तो यहाँ कोई मेरा इलाज भी नहीं करेगा।’ दीवार की तरफ देख उसने ठंडी आह भर कर कहा, ‘वैसे भी यह धंधे का वक्त होता है न। लड़कियों को तैयार होकर बैठना होता है।’

जब मैंने उसे फल खा लेने की हिदायत दी तो एक बार फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने आँखें पोंछी और आवाज़ देकर साथ वाली मरीज़ को फल लेने के लिए कहा। मैंने उठ कर मैडम के हाथ से लिफाफा ले कर उस मरीज़ की तरफ बढ़ाया। मैडम ने ज़ोर देकर उसे फल दिए। दूसरी तरफ की मरीज़ को भी इसी तरह ज़ोर देकर फल दिए। उसकी कोशिश थी कि सभी देख सकें कि उसे भी कोई मिलने आया है।
मैडम की बीमारी भी अजीब थी। बैठे-बैठे उसका दिल डूबने सा लगता। बेहोश हो जाती। जब होश आता तो बेहद सर दर्द करता। लगता सर टुकड़ों में बंट जाएगा।

वे पहले से अच्छी थीं परंतु लगता था उसका असली इलाज डॉक्टर के पास भी नहीं था। कोई रिश्ता सर उठा रहा था यह मेरा जानलेवा एकांत था। मैं आए दिन उसे मिलने अस्पताल पहुँच जाता। उसके पास स्टूल खींच लेता और फिर बहुत देर तक हम लोग धीरे-धीरे बातें करते रहते।
‘माँ को यह नाम बहुत पसंद था। पिता जी को यह नाम पसंद नहीं था। साहिबा प्रेमिका का नाम जो ठहरा, इसलिए।’
‘साहिबा! ’
‘हाँ साहिबा!’ वह मानो खुद से ही बातें करने लगी। माँ कहा करती, ‘कोई राजकुमार घोड़े पर सवार हो आएगा और मेरी साहिबा को अपने साथ ले जाएगा। चली जाने के बाद मैं अपनी साहिबा को याद कर बहुत रोया करूंगी। माँ को रोना अच्छा लगता था। रोना मुझे भी अच्छा लगने लगा है।’ वह जो मृग-तृष्णा बन उसे चकले तक ले आया था, उसकी भला वह क्या बात करती। बोलना चाहा परंतु...

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मेरे लिए उन्हें कैमरे का ऐंगल बदलने की ज़रूरत नहीं थी। हीरो ने मेरे मुँह पर घूंसा मारा। घूंसा असली था। मेरी आँखों के समक्ष तारे नाचने उठे। मैं पीछे की तरफ गिरा और लकड़ी की रेलिंग तोड़ नीचे आ गिरा। शॉट ओ. के. हो गया। परंतु मेरा जबड़ा अभी भी दुख रहा था। मैं लकड़ी की रेलिंग समेत नीचे गिरा था। मेरी पीठ भी बुरी तरह दुख रही थी। एक्सट्रा के काम की पेमेंट उसी दिन हो जाती है परंतु मेरे अभी एक-दो सीन बाकी थे। यानी अभी और पिटाई खानी शेष थी। उसके बाद ही पैसों का भुगतान होना था। मैं वापिस पहुंचा तो गेस्ट हाउस के कांउटर पर घोष खड़ा था। उसने मुझे तार थमा दी। मेरे कंधे पर हाथ रख कर उसने एक-दो बार थपथपाया।

मैं हाथ में पकड़े क़ाग़ज़ के टुकड़ों से डर गया था। बिना कोई बात किए मैं कमरे में आ गया परंतु अक्षरों की ज़बान ख़ामोश नहीं थी। मेरे हाथ में पकड़ा क़ाग़ज़ कंपकपाया। माँ नहीं रही थी। पथराया सा मैं वही बैठ गया। मेरे सामने रखा तार पंखे की हवा से फड़फड़ा रहा था।
क्या आख़िरी वक्त में माँ ने मुझे याद किया होगा? मेरा नाम लेकर पुकार होगा? उम्मीद से दरवाज़े की तरफ देखा होगा?
काग़ज़ का टुकड़ा हवा से फड़फड़ाया और उड़ कर कमरे के कोने में जा लगा। आते वक्त मैं माँ को सपनों के सब्ज़ बाग दिखा आया था। माँ सपनों की तासीर जानती थी। मुझे रोकने के लिए उसने आख़िरी बार मिन्नत की। मेरी तरफ अपनी बाँह बढ़ाई। उसका हाथ मुझ तक नहीं पहुँचा परंतु मैं उसके हाथों की काँपती उंगलियों को देखता रहा था। उस दिन मेरे सपनों के कुहासे में माँ की मिन्नतें खो गई थीं। मैं चारपाई से उठकर नीचे फर्श पर बैठ गया था। घुटनों में सर दिए मैं पता नहीं कितनी देर यूं ही बैठा रहा।

कमरे में तीन चारपाईयों की जगह थी। तीन चारपाईयां लगाने के बाद चलने तक की जगह नहीं बचती थी। हरेक ने चारपाई की जगह किराए पर ले रखी थी, कमरा किराए पर नहीं लिया था। हम एक दूसरे के लिए अजनबी थे। बेशक अब थोड़ा-बहुत परिचित हो गए थे परंतु इतनी भी निकटता नहीं थी कि मेरी माँ की मृत्यु पर वे दरी बिछा कर बैठ जाते। दोनों बारी-बारी आए। अपने-अपने बिस्तर पर बैठ कर अफसोस जताया, कपड़े बदले और तौलिया लपेट बारी-बारी से बाथरूम में घुस गए। मैंने चारपाई की पाटी पर सर टिका दिया और बहुत देर तक यूं ही लेटा रहा। चारपाई की पाटी दोस्त का कांधा नहीं था। मैं उठा और चारपाई के नीचे से ट्रंक बाहर निकाला फिर खाली पड़े ट्रंक को देखा। ट्रंक बंद कर अपने बटुए को खंगाला। मेरे पास तिरेपन रुपए कुछ पैसे थे। गाँव जाने के लिए एक तरफ का किराया भी पूरा नहीं था।
एक बार सोचा देसाई या घोष से कुछ रुपए उधार ले लूं परंतु वे मेरे क्या लगते थे? वे भला मुझे क्यों रुपए देंगे, वे तो खुद भूख से संघर्ष कर रहे थे।

अब गाँव में भला जाना भी किसके पास था? माँ ही एक अंतिम कड़ी थी जो मुझे और गाँव को जोड़ती थी और अब वह भी टूट गई थी।
मैंने बटुआ फिर से जींस की जेब में डाल लिया और खाली ट्रंक को ताला लगा पैर से नीचे ठेल दिया। माँ गुज़र गई थी। मुझे रोना चाहिए था। मैं जी भर के रोना चाहता था परंतु मुझे रुलाई नहीं आ रही थी। गुबार सा मेरे ज़हन में जम गया था। मेरा दिमाग सुन्न सा हो गया था, मैं कुछ भी महसूस करने की शक्ति गंवा चुका था।

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मेरा मोक्ष द्वार फारस रोड तक आकर ख़त्म हो गया। मेरे सामने फिर वही उदास सीलन भरी सीढ़ियां थीं। मैडम मैले सोफ़े पर बैठी थी। उसने हैरान होकर मेरे बिखरे वजूद की तरफ देखा। उस वक्त एक ही ग्राहक था। माला के साथ उसका किराया तय कर वह उठ खड़ी हुई और मेरा हाथ पकड़ कर दूसरे कमरे में ले गई, ‘क्या बात है?’
‘मैडम ....माँ......माँ.....।’
मैडम मेरे साथ दरी पर बैठ गई। धीरे-धीरे माँ की मौत की ख़बर सारी लड़कियों को पता चल गई। बारी-बारी से सभी मेरे पास आकर बैठ गईं। नया ग्राहक आने पर वे उठ कर चली जातीं, जो खाली होती वह वापिस आकर मेरे पास बैठ जाती।
वे मेरे साथ माँ की बातें करती रहीं। मेरे पास बैठ वे खुद भी बहुत उदास हो गई थीं। मैं अपनी माँ की बातें कर रहा था। वे अपनी माँ की बातें सुन रही थीं।

ये चकला मेरा घर नहीं था। अब मुझे चलना चाहिए। इस वक्त मैं उनका वक्त खोटा कर रहा था।
‘मैं चलता हूँ। मैं उठ खड़ा हुआ।’
मैडम धंधे वाले कमरे में बैठी थी। उसने मेरी तरफ देखा।
‘मैं अब चलता हूँ।’मैंने अपनी बात दोहराई।
धंधे के वक्त कोई वेश्या अपने चकले की सीढियां नहीं उतरती परंतु चकले का उसूल भूल कर वह मेरे साथ चल पड़ी।
कुछ सीढ़ियां उतरने के बाद वह अंधेरे में ठिठक गई, ‘सुनो।’
मैं भी रुक गया।
‘इस वक्त कहां जाओगे?’
सीढ़ी के निचले सिरे पर सड़क की एक स्याह क़तार दिख रही थी।
उसने हाथ पकड़ कर मुझे रोक लिया और अधिकार से कहा, ‘आज मैं तुम्हें अकेले नहीं रहने दूंगी।’

मेरी नींद खुल गई। पता नहीं मैडम रात को कितनी देर तक जगती रही थीं। वह अभी भी गहरी नींद में थी। उसकी बाँई बाजू मेरे सर के नीचे थी। दाहिनी बाजू मुझे लपेटे हुए थी। मैं नन्हें की भाँति उसके परों में सर छुपाए बेहोशी की नींद में सोया रहा था।
मुझे कुछ घुटन सी महसूस हुई। हैरान हो कर देखा समंदर की तरफ की खिड़की बंद थी।
                                                                                                  
समंदर की तरफ की खिड़की हमेशा खुली रहती थी। दूर तक फैला गहरा नीला समंदर और शांत से दिखते उसके सीने में छुपे असंख्य ज्वार-भाटे तब मैडम की खामोश आँखों में समा जाते थे।वह समंदर से अपनी पहचान पूछा करती और उदास हो जाया करती थी।

मैंने करवट बदली तो मैडम की भी नींद खुल गई। वह मेरी तरफ देख मुस्कराई। मेरे सर के नीचे से अपनी बाँह हटाई और उठ कर बैठ गई। रात को मैंने खिड़की बंद कर दी थी, सोचा समंदर का शोर तुम्हारी नींद खराब न करे।

केबिन के बाहर दरी पर लड़कियां बेहोशी की नींद सो रही थीं। मैं उठ कर तैयार हुआ और चलते समय दस के तीन नोट मैडम की तरफ बढ़ा दिए। उसने हैरानी मेरी तरफ देखा और पीछे मुड़कर समंदर की तरफ की खिड़की खोल दी। समुंदरी हवा के झोंके चकले की भड़ास को उड़ा ले गए। समंदर की तरफ मुंह किए ख़ामोशी से कुछ देर वह नीले पानी को देखती रही। उसकी आँखों में जमी बर्फ धीरे-धीरे पिघलने लगी। उस बर्फ के नीचे दबे सपने धीरे-धीरे नग्न हो गए थे। वे सपने बेशक उसकी आँखों के थे, परंतु वह उनकों नहीं देख रही थी।

उसने आँखें पोंछी और फिर माँ की भाँति मेरे बालों में हाथ फिराया। मुझे कंधे से लगा कर मेरा माथा चूमा। मेरा रुपयों वाला हाथ पीछे करते हुए भीगे स्वर में कहा, ‘सौदाई, तुझे इतना भी नहीं पता, इस रिश्ते की कोई क़ीमत नहीं अदा की जाती। चकले पर आकर भी नहीं।’

दस के तीन नोट झुलसे हुए काग़ज़ की भाँति मेरे हाथ में भुर-भुरा गए।
उसके  कंधे से लग कर मैं नन्हे बालक की भांति हिचकियां ले रोने लगा।


       पंजाबी से अनुवाद - नीलम  शर्मा 'अंशु'
(11-07-2011)

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