रविवार, अप्रैल 19, 2026

कहानी - 82 बतरस (पंजाबी से हिन्दी)

 पंजाबी कहानी           

(उर्मिला आनंद स्मृति पुरस्कार (भारत) 2025 से सम्मानित कहानी।)                          

                                                    

                  बतरस


                                       अंबर हुसैनी  

                         अनुवाद नीलम शर्मा अंशु                                                                                                                           

दही के लिए एक परात को जामन लगेगा या दोनों को?

शाहणी! शाहणी जी!

हाँ! हाँ क्या कहा तूने करामते?’ शाहणी मानो ख़्वाब से जगी हों।

ख़ैरियत तो है न शाहणी जी, कहाँ खोई हुई हैं?’ करामते ने हैरानी से पूछा।

हाँ! हाँ! सब ठीक है क्या कह रही थी तुम?’

मैंने पूछा कि दही के लिए एक परात को जामन लगेगा या दोनों को?’ करामते ने अपना सवाल दोहराया।

पता नहीं या डेरे से बाली को आवाज़ दे कर बुला ले। उसे पूछ लेती हूँ कि कितने मेहमान होंगे आज डेरे पर?

शाहणी जी, सब ख़ैरियत है न... कहीं शाह जी फिर किसी...

करामते मुँह लगी थी, परंतु इतनी भी नहीं कि बड़े शाह के बारे में सीधे सवाल पूछने की हिम्मत कर सके, जो सब कुछ जानते हुए भी कहने की हिम्मत शाहणी में भी नहीं थी।

हाँ!... हाँ!... सब ठीक है। अपनी कही बात की कमी का अहसास होते ही, खुद को क्रोध और दु:ख की आड़ में छुपाते हुए शाहणी ने कहा।

शाहणी का नाम तो ग़ज़ाला था, परंतु इस घर में ब्याह कर आते पहले साल ही वह शाहणी बन गई थी। अब तो शाहणी को अपना नाम भी याद नहीं रहा होगा। शायद अपने दहेज की पेटियों में अपनी शादी के वक्त के चमकीले कपड़ों, नरम ख़्वाबों जैसी शनील की रजाइयों, यौवन के सपनों के साथ-साथ, ग़ज़ाला तथा उसके अरमान भी रख कर वक्त की नेप्थलीन रूपी गोलियां डाल कर भूल चुकी थी।

ये पेटियां भी अजीब होती हैं। बिलकुल अपनी मालकिनों का साया। अपनी गुंजाइश से ज़्यादा सामान सहेज लेती हैं। अगर सामान कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाए तो बस दो जनों को ऊपर बिठा कर ज़ोर लगाओ और फिर इन्हें बंद कर दिया जाए। ये पेटियां, शादी के दौरान बड़े चाव से बनाए सामान, सालों-साल इस तरह सहेजे रखती हैं कि एक समय तो गृहणियां भूल जाती हैं कि उन्होंने पेटियों में रखा क्या-क्या था। बिलकुल जैसे इन पेटियों की मालकिनें पहले खुद में अपनी सारी ख़्वाहिशें, ख़्वाब, शौक छुपाती हैं... फिर दु:ख, पति के ऐब, अपनी हर वक्त होती बेइज़्ज़ती सब कुछ रख देती हैं। अगर कभी दु:खों से ज़्यादा भर जाएं तो ज़ेहन पर माता-पिता की इज़्ज़त, सब्र और असह्य चीज़ों का वज़न रख कर होठों का ढक्कन बंद और सब कुछ अंदर गुम...

शाहणी ने भी ऐसा ही किया था, जब ब्याह कर आई और आते ही पता चला कि शाह जी को उनके सिवा शायद दुनिया की हर महिला तथा डेरे के कई कच्ची उम्र के मुरीदों से मुहब्बत है।

शाहणी तो पेटी में रखा वह खेस (ओढ़ने वाली मोटी चादर) थी, जो बस गिनती पूरी करने के लिए रखा गया था। इसलिए कभी उस खेस की भाँति अपने भीतर की ग़ज़ाला को बाहर निकाल कर न धूप लगवाई, और न ही देखा।

अब वह बस शाहणी थी।

शाहणी... इस हवेली की वह मालकिन, जिसके पास करने के काम, ज़िम्मेदारियां तो थी परंतु मल्कीयत न हवेली की थी, न हवेली वालों की। उसकी मल्कीयत बस कामगारों पर शाहणी होने के किरदार को निभाने में थी। इसलिए ग़ज़ाला पेटी में बंद एक भूला-बिसरा खेस हो गई थीं।

जब वह ब्याह कर आईं तो छठे कि सातवें महीने उसकी सास गिर कर कूल्हे की हड्डी तुड़वा बैठी थीं। उस दिन से उसे शाह की शाहणी का ख़िताब मिल था और साथ ही पूरे घर की ज़िम्मेदारी भी।

आज क्या बनेगा? किस कामगार को कितना अनाज देना है? घर की बेटियों को ईद-शबरात में क्या जाएगा? बैठक में किस मेहमान के लिए दावत पकेगी और किस के लिए सिर्फ़ चाय? सब वही बताती थी।

पूरा गाँव उसके भाग्य का गुण-गान करता। बेचारी बहुओं की तो ज़िंदगी गुज़र जाती ससुराल वालों की ख़िदमत करते, फिर भी मुख़तारी न मिलती। और... शाहणी सातवें महीने में घर की मालकिन बन गई थीं। ऊपर-नीचे एक के बाद एक चार बेटे जने कि शाह को बीवी चाहिए थी या नहीं, घर संभालने के लिए गृहिणी और वंश चलाने के लिए वारिस तो चाहिए ही थे।

ग़ज़ाला ने पहले तीन-चार बरसों में ही शाह की ये दोनों ज़रूरतें पूरी करके बदले में घर का इख़्तयार, और ताउम्र उसकी इकलौती बीवी तथा बच्चों की माँ होने का हक अपने नामकर लिय़ा था।

और इससे ज़्यादा किसी गृहिणी को भला क्या चाहिए?

सारे समाज का साझा फैसला और जवाब था – कुछ नहीं। इससे ज़्यादा किसी गृहिणी को कुछ दरकार नहीं हो सकता। यह खुश-किस्मती और नियामतों की पराकाष्ठा है।

ग़जाला ने हर आज्ञाकारी बीवी की भाँति इसे स्वीकार कर लिया था।

बदले में समाज ने उसे पवित्रता के ऊँचे पायदान पर बिठा कर शाहणी बना दिया था।

वर्तमान शाह की पत्नी और भावी शाह की माँ। ऊँचा रुतबा श्रद्धा का उफान ले आया था। औरतें आतीं, हाथ चूमतीं, सेविकाएं आकर पहले पाँव छूतीं, फिर काम को हाथ लगातीं।  मुरीदियों के साथ आए बच्चे सर आगे बढ़ाकर दुलार लेते। ...और 24 वर्षीया ग़ज़ाला 40 की बन कर उन्हें डाँट लगातीं, नसीहतें और दुआएं देती।

इस सारी कश्मकश में किसी के ज़ेहन में ही नहीं आया कि दस-पंद्रह बरसों बाद पेटियों में से सारा सामान निकाल कर, इस कीमती परंतु बेकार के सामान को धूप लगवाना और फिर से संभाल कर रख देना भी ज़रूरी है। नहीं तो पेटियों में पड़े-पड़े इन्हें दीमक भी लग जाती है और अगर सामान को दीमक लग जाए तो इसका अर्थ होता है कि आपने उसकी सही संभाल नहीं की। लापरवाह और सुघड़ न होने का ठप्पा लग जाता है।

बिलकुल उसी तरह जैसे कभी-कभीअरे तुम तो मालकिन हो इस घर की। तुम्हारे बिना यह घर कैसे चले, एक दिन भी नहीं चल सकता! और...मेरे बच्चों की माँ कहकर मुहब्बत और सम्मान की फीकी सी धूप लगवा कर आदमी उनकी संभाल और अपने अच्छे होने का ठप्पा लगवा लेते हैं।

परंतु इस बार कुछ भिन्न हो गया था। शाहणी की पेटी में से पूरा ख़्वाब और चाव निकले तो उसका दिल उस बच्चे की भाँति ज़िद कर बैठा, जो पेटी में से निकली किसी फ़िजूल सी वस्तु या चमकीली रजाई की रट लगा लेता है कि अब इसे पेटी में नहीं रखना, मुझे ओढ़ना है। और... माँओं को भी पता रहता है कि विगत दस बरसों की भाँति आने वाले बरसों में भी उस रजाई का उपयोग नहीं होने वाला। इसलिए बच्चे को देकर जान छुड़ा लेती हैं। शाहणी के भीतर का बच्चा भी इस बार ग़ज़ाला... सतरह वर्षीया ग़ज़ाला को देख कर रट लगा बैठा कि अब इसे फिर से भीतर नहीं, बाहर निकाल कर रखना है।

उसने अपने भीतर के बच्चे को कभी ऐसी इजाज़त नहीं दी थी। सच पूछें तो उसके भीतर के बच्चे ने कभी ऐसी ज़िद पहले की भी नहीं थी। उस पर खुश-क़िस्मत और पाक बीवी होने का दबाव ही बहुत था। मानो अच्छा कहलवाने को जी भी चाहता हो तो भी कई बच्चे शरारत नहीं करते, उसने भी कभी दी गई इजाज़त के अलावा अपनी ख़्वाहिश का इज़हार नहीं किया था।

इस बार उसके दिल में ऐसी ज़िद को उभारने वाला था मानी। जैसे शरारती और निकम्मे बच्चों को पतंग उड़ाते, हँसते देख अच्छे बच्चे भी कभी-कभी जीने की, मन-मर्ज़ी करने की ग़लती कर, अच्छे बच्चे नहीं रहते, मानी को देख कर वह भी शाहणी नहीं रही थी, ग़ज़ाला होने लगी थी।

मानी को घर के बैठकखाने में सेवा-टहल के काम के लिए थोड़े दिन पहले ही रखा गया था। पहले यही काम उसके पिता ने किया था। अब उसका पिता चाचा करमदाद वृद्धावस्था के कारण सारा दिन बैठक और बावर्चीखाने की दौड़-भाग में असमर्थ था। एक दिन शाह को अच्छे मूड में देख, उसने इजाज़त माँगी कि मेरी जगह यह ख़िदमत करने का सौभाग्य मेरे बेटे को दिया जाए। मुझे हुक्का धरने, बैठ कर पीरों की सेवा करने का काम दे दीजिए।

शाह ने उदारता से इजाज़त दे दी और अब मानी घर में आने लगा।

ऊँचा लंबा, गोरा-चिट्टा और अपनी खूबसूरती के नशे में अपनी हैसियत भूला, मानी खिल-खिला कर हँसता और रुतबे का लिहाज़ किए बिना हर महिला से बोलता-बतियाता। खुद भी खुश रहता और फ़र्ज़ों के बोझ तले दबी सेविकाओं को उनके भीतर की महिला की झलक दिखा अपना मतलब साध लेता।

उसकी नस्लों ने इस घर की सेवा का सम्मान अर्जित किया था। अत: बिन कहे सब के ज़ेहन में था कि नमक-हलाली उसके खून में रची-बसी होगी। सभी भूल गए कि युवावस्था का खून रगों में नहीं रहना चाहता, फिर नमक कैसे पच सकता था।

पहली बार उसके बे-नमक खून की झलक उस दिन दिखी, जिस दिन कपड़े वाला हवेली में आया था। शाहणी ने सभी सेविकाओं को लाल, पीले, गुलाबी सूट लेकर दिए और अपने लिए वही बेरंग सूट चुने जैसा कि वे पिछले कई बरसों से पहनती आ रही थीं। सफेद, सलेटी, हल्के रंगों के सूट... जो उदास, उजड़ी और बेरंग पवित्रता भरी फ़िज़ा में पहने जाते हैं।

पास खड़ा वह अपनी और शाहणी की हैसियत को भूल कर कह बैठा था -

नहीं शाहणी नहीं। यह नहीं... वह लाल रंग वाला सूट लीजए, आप पर बहुत फबेगा।

कई चुभती निगाहें उसकी तरफ उठीं। परंतु इस हवेली की सभी औरतों को उनके अस्तित्व का अहसास दिलाने वाला एकमात्र मर्द मानी! ही था, इसलिए नज़रों से अधिक कोई बात न हुई।

अरे पगले! की आड़ में उसकी गुस्ताखी को छुपा दिया गया। शाहणी ने भी तीखी निगाह से उसे देख, लिया तो बेरंगा सा सूट ही, परंतु पता नहीं क्यों रात को एकांत में बैठी कई बार उस लाल सूट को याद करने से खुद को रोक न सकी।

बहुत बेताब होकर शीशे के सामने खड़े हो खुद को निहारने लगी।

वह लाल सूट आप पर बहुत जंचेगा।

कितनी ही बार वह जुमला उसके कानों में गूंजा।

मुझ पर भी भला कुछ फबता है?’

मैं भी सुंदर लगती हूँ?’

मैं कितनी सुंदर हुआ करती थी!

उसके सतरहवें साल की समृतियों ने आकर, रुतबे तथा सब्र का बोझ उतार, एकदम भीतर के ख़्वाब बाहर निकाल दिए।

ये सभी ख़्वाब, इच्छाएं और रीझें आज भी उसके भीतर ही थीं परंतु अभी वे बेरंग नहीं हुई थीं और दीमक भी नहीं लगी थी।बस शाहणी उन्हें बिसर गई थीं।

उस रात सपने में शाहणी ने खुद को लाल सूट पहने देखा और अपनी खूबसूरती से डर कर उठ बैठीं। उसे खूबसूरत लगने का कोई हक नहीं था, वह बस पाक दिख सकती थी।

मानी को अगले कई दिनों तक बिना वजह ही डाँट लगाती रही। वह भी सर्वगुण संपन्न था, तिस पर फिल्मों का शौकीन।

न में भी हाँ होती है! में विश्वास रखने वाला। ...और अपने ही हुस्न का पुजारी।

बातें बढ़ने लगीं, ख़्वाब फिर से ज़िंदा होने लगे। ग़ज़ाला का सतरहवां साल किसी बदरूह की भाँति उसके लाख डरने, दुआएं पढ़ने के बाद भी बार-बार आने लगा। अब शाहणी पर कब्ज़ा करके, उसमें ग़ज़ाला जीने लगी।

लाल सूट के बाद, खुद को पायल, सुर्खी, चूड़िय़ों में देखने लगी। सालों बाद किसी को शाहणी में औरत दिखाई दी थी। और शाहणी लाख जतन करके भी उस आँख की तरफ देखने से खुद को रोक नहीं पा रही थी, जिसमें ग़ज़ाला नज़र आ रही थी।

पहरे कड़े थे और रुतबे का वज़न बहुत ज़्यादा।  इसलिए चोर दरवाज़े ढूँढने ज़रूरी हो गए थे परंतु घर के भेदियों से अधिक कौन जानता है कि चोर दरवाज़े कहाँ-कहाँ हैं...

शाहणी भी एक दिन अपने हुस्न को देखने की चाह में इसी चोर दरवाज़े को लाँघ कर उसके पास पहुँच गई कि शाहणी के सौंदर्य को देखने के लिए उसकी बातों का दर्पण भी ज़रूरी था।

घाघ व्यापारी ने देखा कि अब ग्राहक का दिल आ गया है, और मन मुताबिक कीमत माँगी जा सकती है... सो माँग ली।

गज़ाला के भीतर की शाहणी जागी, शायद बीवी, माँ और औरत भी... सो उसे लानतें दे वापस लौट आईं।

परंतु कब तक...

उसका बड़प्पन,  ज़िम्मेदारी, रुतबा, मुकाम उसके पाँवों में ज़ंजीर डालते पर मीठी बातों, और उन बातों में दिखता अपने हुस्न की तारीफ़ का नशा उसे मजबूर करता।

इस नशे की तलब से मजबूर एक दिन वह व्यापारी को उसकी मनचाही कीमत दे बैठी। हर नशा करने में पहली बार झिझक होती है। जब लत लग जाए तो फिर आदमी खुद को बेच कर भी मनपसंद पुड़िया खरीदने लग जाता है।

शाहणी भी अपने मुकाम, इज़्ज़त की लाखों बेड़ियां अपने पाँवों में डालतीं... डर, ख़ौफ के ताले लगाती... परंतु भीतरी नशे के समक्ष मजबूर हो, फिर उसी के दरवाज़े पर पहुँच जातीं।

और वह मनचाही कीमत वसूल कर लेता कि मुफ़त नशा तो एक एकाध बार ही मिलता है, बाद में तो पूरी-पूरी कीमत वसूली जाती है।

शाहणी जानती है जिस दिन वह पकड़ी जाएगी, उसी दिन मार दी जाएगी परंतु कोई यह नहीं जानता कि वह वहाँ जिस्म नहीं, बात-रस के नशे के लिए जाती है। मनचाही बातों की पुड़िया लेकर कानों का नशा पूरा करती है। जिस्म तो वह कीमत है जो उसे उस बतरस के लिए चुकानी पड़ती है। क्य़ोंकि

                   कुछ कीमतें होती हैं वज़नी

                   कुछ ख़्वाहिशें होती हैं अनोखी

                   और कुछ नशे होते हैं अवल्ले।

 

                                                          ***     


    



                  साभार - कृति बहुनमत, भिलाई, अप्रैल 2026

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