रविवार, अप्रैल 19, 2026

कहानी - 82 बतरस (पंजाबी से हिन्दी)

 पंजाबी कहानी           

(उर्मिला आनंद स्मृति पुरस्कार (भारत) 2025 से सम्मानित कहानी।)                          

                                                    

                  बतरस


                                       अंबर हुसैनी  

                         अनुवाद नीलम शर्मा अंशु                                                                                                                           

दही के लिए एक परात को जामन लगेगा या दोनों को?

शाहणी! शाहणी जी!

हाँ! हाँ क्या कहा तूने करामते?’ शाहणी मानो ख़्वाब से जगी हों।

ख़ैरियत तो है न शाहणी जी, कहाँ खोई हुई हैं?’ करामते ने हैरानी से पूछा।

हाँ! हाँ! सब ठीक है क्या कह रही थी तुम?’

मैंने पूछा कि दही के लिए एक परात को जामन लगेगा या दोनों को?’ करामते ने अपना सवाल दोहराया।

पता नहीं या डेरे से बाली को आवाज़ दे कर बुला ले। उसे पूछ लेती हूँ कि कितने मेहमान होंगे आज डेरे पर?

शाहणी जी, सब ख़ैरियत है न... कहीं शाह जी फिर किसी...

करामते मुँह लगी थी, परंतु इतनी भी नहीं कि बड़े शाह के बारे में सीधे सवाल पूछने की हिम्मत कर सके, जो सब कुछ जानते हुए भी कहने की हिम्मत शाहणी में भी नहीं थी।

हाँ!... हाँ!... सब ठीक है। अपनी कही बात की कमी का अहसास होते ही, खुद को क्रोध और दु:ख की आड़ में छुपाते हुए शाहणी ने कहा।

शाहणी का नाम तो ग़ज़ाला था, परंतु इस घर में ब्याह कर आते पहले साल ही वह शाहणी बन गई थी। अब तो शाहणी को अपना नाम भी याद नहीं रहा होगा। शायद अपने दहेज की पेटियों में अपनी शादी के वक्त के चमकीले कपड़ों, नरम ख़्वाबों जैसी शनील की रजाइयों, यौवन के सपनों के साथ-साथ, ग़ज़ाला तथा उसके अरमान भी रख कर वक्त की नेप्थलीन रूपी गोलियां डाल कर भूल चुकी थी।

ये पेटियां भी अजीब होती हैं। बिलकुल अपनी मालकिनों का साया। अपनी गुंजाइश से ज़्यादा सामान सहेज लेती हैं। अगर सामान कुछ ज़्यादा ही बढ़ जाए तो बस दो जनों को ऊपर बिठा कर ज़ोर लगाओ और फिर इन्हें बंद कर दिया जाए। ये पेटियां, शादी के दौरान बड़े चाव से बनाए सामान, सालों-साल इस तरह सहेजे रखती हैं कि एक समय तो गृहणियां भूल जाती हैं कि उन्होंने पेटियों में रखा क्या-क्या था। बिलकुल जैसे इन पेटियों की मालकिनें पहले खुद में अपनी सारी ख़्वाहिशें, ख़्वाब, शौक छुपाती हैं... फिर दु:ख, पति के ऐब, अपनी हर वक्त होती बेइज़्ज़ती सब कुछ रख देती हैं। अगर कभी दु:खों से ज़्यादा भर जाएं तो ज़ेहन पर माता-पिता की इज़्ज़त, सब्र और असह्य चीज़ों का वज़न रख कर होठों का ढक्कन बंद और सब कुछ अंदर गुम...

शाहणी ने भी ऐसा ही किया था, जब ब्याह कर आई और आते ही पता चला कि शाह जी को उनके सिवा शायद दुनिया की हर महिला तथा डेरे के कई कच्ची उम्र के मुरीदों से मुहब्बत है।

शाहणी तो पेटी में रखा वह खेस (ओढ़ने वाली मोटी चादर) थी, जो बस गिनती पूरी करने के लिए रखा गया था। इसलिए कभी उस खेस की भाँति अपने भीतर की ग़ज़ाला को बाहर निकाल कर न धूप लगवाई, और न ही देखा।

अब वह बस शाहणी थी।

शाहणी... इस हवेली की वह मालकिन, जिसके पास करने के काम, ज़िम्मेदारियां तो थी परंतु मल्कीयत न हवेली की थी, न हवेली वालों की। उसकी मल्कीयत बस कामगारों पर शाहणी होने के किरदार को निभाने में थी। इसलिए ग़ज़ाला पेटी में बंद एक भूला-बिसरा खेस हो गई थीं।

जब वह ब्याह कर आईं तो छठे कि सातवें महीने उसकी सास गिर कर कूल्हे की हड्डी तुड़वा बैठी थीं। उस दिन से उसे शाह की शाहणी का ख़िताब मिल था और साथ ही पूरे घर की ज़िम्मेदारी भी।

आज क्या बनेगा? किस कामगार को कितना अनाज देना है? घर की बेटियों को ईद-शबरात में क्या जाएगा? बैठक में किस मेहमान के लिए दावत पकेगी और किस के लिए सिर्फ़ चाय? सब वही बताती थी।

पूरा गाँव उसके भाग्य का गुण-गान करता। बेचारी बहुओं की तो ज़िंदगी गुज़र जाती ससुराल वालों की ख़िदमत करते, फिर भी मुख़तारी न मिलती। और... शाहणी सातवें महीने में घर की मालकिन बन गई थीं। ऊपर-नीचे एक के बाद एक चार बेटे जने कि शाह को बीवी चाहिए थी या नहीं, घर संभालने के लिए गृहिणी और वंश चलाने के लिए वारिस तो चाहिए ही थे।

ग़ज़ाला ने पहले तीन-चार बरसों में ही शाह की ये दोनों ज़रूरतें पूरी करके बदले में घर का इख़्तयार, और ताउम्र उसकी इकलौती बीवी तथा बच्चों की माँ होने का हक अपने नामकर लिय़ा था।

और इससे ज़्यादा किसी गृहिणी को भला क्या चाहिए?

सारे समाज का साझा फैसला और जवाब था – कुछ नहीं। इससे ज़्यादा किसी गृहिणी को कुछ दरकार नहीं हो सकता। यह खुश-किस्मती और नियामतों की पराकाष्ठा है।

ग़जाला ने हर आज्ञाकारी बीवी की भाँति इसे स्वीकार कर लिया था।

बदले में समाज ने उसे पवित्रता के ऊँचे पायदान पर बिठा कर शाहणी बना दिया था।

वर्तमान शाह की पत्नी और भावी शाह की माँ। ऊँचा रुतबा श्रद्धा का उफान ले आया था। औरतें आतीं, हाथ चूमतीं, सेविकाएं आकर पहले पाँव छूतीं, फिर काम को हाथ लगातीं।  मुरीदियों के साथ आए बच्चे सर आगे बढ़ाकर दुलार लेते। ...और 24 वर्षीया ग़ज़ाला 40 की बन कर उन्हें डाँट लगातीं, नसीहतें और दुआएं देती।

इस सारी कश्मकश में किसी के ज़ेहन में ही नहीं आया कि दस-पंद्रह बरसों बाद पेटियों में से सारा सामान निकाल कर, इस कीमती परंतु बेकार के सामान को धूप लगवाना और फिर से संभाल कर रख देना भी ज़रूरी है। नहीं तो पेटियों में पड़े-पड़े इन्हें दीमक भी लग जाती है और अगर सामान को दीमक लग जाए तो इसका अर्थ होता है कि आपने उसकी सही संभाल नहीं की। लापरवाह और सुघड़ न होने का ठप्पा लग जाता है।

बिलकुल उसी तरह जैसे कभी-कभीअरे तुम तो मालकिन हो इस घर की। तुम्हारे बिना यह घर कैसे चले, एक दिन भी नहीं चल सकता! और...मेरे बच्चों की माँ कहकर मुहब्बत और सम्मान की फीकी सी धूप लगवा कर आदमी उनकी संभाल और अपने अच्छे होने का ठप्पा लगवा लेते हैं।

परंतु इस बार कुछ भिन्न हो गया था। शाहणी की पेटी में से पूरा ख़्वाब और चाव निकले तो उसका दिल उस बच्चे की भाँति ज़िद कर बैठा, जो पेटी में से निकली किसी फ़िजूल सी वस्तु या चमकीली रजाई की रट लगा लेता है कि अब इसे पेटी में नहीं रखना, मुझे ओढ़ना है। और... माँओं को भी पता रहता है कि विगत दस बरसों की भाँति आने वाले बरसों में भी उस रजाई का उपयोग नहीं होने वाला। इसलिए बच्चे को देकर जान छुड़ा लेती हैं। शाहणी के भीतर का बच्चा भी इस बार ग़ज़ाला... सतरह वर्षीया ग़ज़ाला को देख कर रट लगा बैठा कि अब इसे फिर से भीतर नहीं, बाहर निकाल कर रखना है।

उसने अपने भीतर के बच्चे को कभी ऐसी इजाज़त नहीं दी थी। सच पूछें तो उसके भीतर के बच्चे ने कभी ऐसी ज़िद पहले की भी नहीं थी। उस पर खुश-क़िस्मत और पाक बीवी होने का दबाव ही बहुत था। मानो अच्छा कहलवाने को जी भी चाहता हो तो भी कई बच्चे शरारत नहीं करते, उसने भी कभी दी गई इजाज़त के अलावा अपनी ख़्वाहिश का इज़हार नहीं किया था।

इस बार उसके दिल में ऐसी ज़िद को उभारने वाला था मानी। जैसे शरारती और निकम्मे बच्चों को पतंग उड़ाते, हँसते देख अच्छे बच्चे भी कभी-कभी जीने की, मन-मर्ज़ी करने की ग़लती कर, अच्छे बच्चे नहीं रहते, मानी को देख कर वह भी शाहणी नहीं रही थी, ग़ज़ाला होने लगी थी।

मानी को घर के बैठकखाने में सेवा-टहल के काम के लिए थोड़े दिन पहले ही रखा गया था। पहले यही काम उसके पिता ने किया था। अब उसका पिता चाचा करमदाद वृद्धावस्था के कारण सारा दिन बैठक और बावर्चीखाने की दौड़-भाग में असमर्थ था। एक दिन शाह को अच्छे मूड में देख, उसने इजाज़त माँगी कि मेरी जगह यह ख़िदमत करने का सौभाग्य मेरे बेटे को दिया जाए। मुझे हुक्का धरने, बैठ कर पीरों की सेवा करने का काम दे दीजिए।

शाह ने उदारता से इजाज़त दे दी और अब मानी घर में आने लगा।

ऊँचा लंबा, गोरा-चिट्टा और अपनी खूबसूरती के नशे में अपनी हैसियत भूला, मानी खिल-खिला कर हँसता और रुतबे का लिहाज़ किए बिना हर महिला से बोलता-बतियाता। खुद भी खुश रहता और फ़र्ज़ों के बोझ तले दबी सेविकाओं को उनके भीतर की महिला की झलक दिखा अपना मतलब साध लेता।

उसकी नस्लों ने इस घर की सेवा का सम्मान अर्जित किया था। अत: बिन कहे सब के ज़ेहन में था कि नमक-हलाली उसके खून में रची-बसी होगी। सभी भूल गए कि युवावस्था का खून रगों में नहीं रहना चाहता, फिर नमक कैसे पच सकता था।

पहली बार उसके बे-नमक खून की झलक उस दिन दिखी, जिस दिन कपड़े वाला हवेली में आया था। शाहणी ने सभी सेविकाओं को लाल, पीले, गुलाबी सूट लेकर दिए और अपने लिए वही बेरंग सूट चुने जैसा कि वे पिछले कई बरसों से पहनती आ रही थीं। सफेद, सलेटी, हल्के रंगों के सूट... जो उदास, उजड़ी और बेरंग पवित्रता भरी फ़िज़ा में पहने जाते हैं।

पास खड़ा वह अपनी और शाहणी की हैसियत को भूल कर कह बैठा था -

नहीं शाहणी नहीं। यह नहीं... वह लाल रंग वाला सूट लीजए, आप पर बहुत फबेगा।

कई चुभती निगाहें उसकी तरफ उठीं। परंतु इस हवेली की सभी औरतों को उनके अस्तित्व का अहसास दिलाने वाला एकमात्र मर्द मानी! ही था, इसलिए नज़रों से अधिक कोई बात न हुई।

अरे पगले! की आड़ में उसकी गुस्ताखी को छुपा दिया गया। शाहणी ने भी तीखी निगाह से उसे देख, लिया तो बेरंगा सा सूट ही, परंतु पता नहीं क्यों रात को एकांत में बैठी कई बार उस लाल सूट को याद करने से खुद को रोक न सकी।

बहुत बेताब होकर शीशे के सामने खड़े हो खुद को निहारने लगी।

वह लाल सूट आप पर बहुत जंचेगा।

कितनी ही बार वह जुमला उसके कानों में गूंजा।

मुझ पर भी भला कुछ फबता है?’

मैं भी सुंदर लगती हूँ?’

मैं कितनी सुंदर हुआ करती थी!

उसके सतरहवें साल की समृतियों ने आकर, रुतबे तथा सब्र का बोझ उतार, एकदम भीतर के ख़्वाब बाहर निकाल दिए।

ये सभी ख़्वाब, इच्छाएं और रीझें आज भी उसके भीतर ही थीं परंतु अभी वे बेरंग नहीं हुई थीं और दीमक भी नहीं लगी थी।बस शाहणी उन्हें बिसर गई थीं।

उस रात सपने में शाहणी ने खुद को लाल सूट पहने देखा और अपनी खूबसूरती से डर कर उठ बैठीं। उसे खूबसूरत लगने का कोई हक नहीं था, वह बस पाक दिख सकती थी।

मानी को अगले कई दिनों तक बिना वजह ही डाँट लगाती रही। वह भी सर्वगुण संपन्न था, तिस पर फिल्मों का शौकीन।

न में भी हाँ होती है! में विश्वास रखने वाला। ...और अपने ही हुस्न का पुजारी।

बातें बढ़ने लगीं, ख़्वाब फिर से ज़िंदा होने लगे। ग़ज़ाला का सतरहवां साल किसी बदरूह की भाँति उसके लाख डरने, दुआएं पढ़ने के बाद भी बार-बार आने लगा। अब शाहणी पर कब्ज़ा करके, उसमें ग़ज़ाला जीने लगी।

लाल सूट के बाद, खुद को पायल, सुर्खी, चूड़िय़ों में देखने लगी। सालों बाद किसी को शाहणी में औरत दिखाई दी थी। और शाहणी लाख जतन करके भी उस आँख की तरफ देखने से खुद को रोक नहीं पा रही थी, जिसमें ग़ज़ाला नज़र आ रही थी।

पहरे कड़े थे और रुतबे का वज़न बहुत ज़्यादा।  इसलिए चोर दरवाज़े ढूँढने ज़रूरी हो गए थे परंतु घर के भेदियों से अधिक कौन जानता है कि चोर दरवाज़े कहाँ-कहाँ हैं...

शाहणी भी एक दिन अपने हुस्न को देखने की चाह में इसी चोर दरवाज़े को लाँघ कर उसके पास पहुँच गई कि शाहणी के सौंदर्य को देखने के लिए उसकी बातों का दर्पण भी ज़रूरी था।

घाघ व्यापारी ने देखा कि अब ग्राहक का दिल आ गया है, और मन मुताबिक कीमत माँगी जा सकती है... सो माँग ली।

गज़ाला के भीतर की शाहणी जागी, शायद बीवी, माँ और औरत भी... सो उसे लानतें दे वापस लौट आईं।

परंतु कब तक...

उसका बड़प्पन,  ज़िम्मेदारी, रुतबा, मुकाम उसके पाँवों में ज़ंजीर डालते पर मीठी बातों, और उन बातों में दिखता अपने हुस्न की तारीफ़ का नशा उसे मजबूर करता।

इस नशे की तलब से मजबूर एक दिन वह व्यापारी को उसकी मनचाही कीमत दे बैठी। हर नशा करने में पहली बार झिझक होती है। जब लत लग जाए तो फिर आदमी खुद को बेच कर भी मनपसंद पुड़िया खरीदने लग जाता है।

शाहणी भी अपने मुकाम, इज़्ज़त की लाखों बेड़ियां अपने पाँवों में डालतीं... डर, ख़ौफ के ताले लगाती... परंतु भीतरी नशे के समक्ष मजबूर हो, फिर उसी के दरवाज़े पर पहुँच जातीं।

और वह मनचाही कीमत वसूल कर लेता कि मुफ़त नशा तो एक एकाध बार ही मिलता है, बाद में तो पूरी-पूरी कीमत वसूली जाती है।

शाहणी जानती है जिस दिन वह पकड़ी जाएगी, उसी दिन मार दी जाएगी परंतु कोई यह नहीं जानता कि वह वहाँ जिस्म नहीं, बात-रस के नशे के लिए जाती है। मनचाही बातों की पुड़िया लेकर कानों का नशा पूरा करती है। जिस्म तो वह कीमत है जो उसे उस बतरस के लिए चुकानी पड़ती है। क्य़ोंकि

                   कुछ कीमतें होती हैं वज़नी

                   कुछ ख़्वाहिशें होती हैं अनोखी

                   और कुछ नशे होते हैं अवल्ले।

 

                                                          ***     


    



                  साभार - कृति बहुनमत, भिलाई, अप्रैल 2026

कहानी - 80 ਸ਼ਿਕਾਇਤੇਂ ਭੀ ਵਹੀਂ ਹੈਂ ਜਹਾਂ ਮੁਹੱਬਤ ਹੈ! (पंजाबी)

 

                          ਸ਼ਿਕਾਇਤੇਂ ਭੀ ਵਹੀਂ ਹੈਂ ਜਹਾਂ ਮੁਹੱਬਤ  ਹੈ!

                                                        -   ਨੀਲਮ ਸ਼ਰਮਾ ਅੰਸ਼ੂ                                                                       

       ਰਸ਼ਮੀ ਸੋਚ ਰਹੀ ਸੀਆਖਿਰ ਅਜਿਹਾ ਕੀ ਹੋ ਗਿਆ? ਬਹੁਤ ਜ਼ੋਰ ਲਗਾ ਕੇ ਵੀ ਉਹ ਸਮਝ ਨਹੀਂ ਸਕੀ ਕਿ ਇਹ ਸਭ ਕਿਉਂ ਹੋਇਆ। ਦਿਵਾਕਰ ਨੇ ਅਚਾਨਕ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਪੈਂਤਰਾ ਕਿਉਂ ਬਦਲ ਲਿਆ? ਉਹ ਇੰਝ ਕਿਵੇਂ ਕਰ ਸਕਿਆ?

          ਕਰਨਾ ਤਾਂ ਦੂਰ ਦੀ ਗੱਲ, ਉਹ ਤਾਂ ਸੋਚ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸਕਦੀ ਸੀ। ਅਚਾਨਕ ਉਸ ਨੂੰ ਕੀ ਹੋ ਗਿਆ ਸੀ? ਉਹ ਆਪਣੇ ਹੀ ਮਨ ਨੂੰ ਤਰਜੀਹ ਦੇਣ ਲੱਗ ਪਿਆ ਸੀਅੱਜ ਮੇਰਾ ਜੀ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ, ਮੇਰਾ ਦਿਲ ਨਹੀਂ ਚਾਹੁੰਦਾ, ਵਗੈਰਾ, ਵਗੈਰਾ। ਉਸਦੇ ਮਨ ਦੀ ਖ਼ਾਹਿਸ਼ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਰਸ਼ਮੀ ਦੇ ਮਨ ਦੀ ਖ਼ਾਹਿਸ਼ ਕੋਈ ਮਾਇਨੇ ਨਹੀਂ ਰੱਖਦੀ ਨਜ਼ਰ ਆਉਂਦੀ ਸੀ। ਅਣਖ ਤਾਂ ਦੋਹਾਂ ਵਿੱਚ ਸੀ। ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਕਦੇ ਆਪਣੀ ਅਣਖ ਨੂੰ ਤਰਜੀਹ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ ਸੀਹਮੇਸ਼ਾ ਦਿਵਾਕਰ ਦੀ ਖ਼ਾਹਿਸ਼ ਨੂੰ ਤਰਜੀਹ ਦਿੱਤੀ, ਆਪਣੀ ਖ਼ਾਹਿਸ਼ ਦਾ ਗਲ ਘੁੱਟਿਆਉਸਨੂੰ ਲੱਗਦਾ ਸੀ ਕਿ ਦੋਸਤੀ ਵਿੱਚ ਹੰਕਾਰ ਨਾਂ ਦੀ ਚੀਜ਼ ਕਦੇ ਰੁਕਾਵਟ ਨਹੀਂ ਬਣਨੀ ਚਾਹੀਦੀ।

            ਕਦੇ-ਕਦੇ ਰਸ਼ਮੀ ਨੂੰ ਲੱਗਦਾ ਸੀ ਕਿ ਦਿਵਾਕਰ ਦੀ ਗੱਲ ਸਹੀ ਸੀ। ਉਹ ਕਹਿੰਦਾ, ਮੇਰੀ ਪਤਨੀ ਕਹਿੰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਤੁਹਾਨੂੰ ਔਰਤਾਂ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕਰਨ ਦਾ ਸਲੀਕਾ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ। ਤੁਹਾਡੇ ਪਰਿਵਾਰ ਵਿੱਚ ਧੀ, ਭੈਣ, ਭੂਆ ਜੋ ਨਹੀਂ ਸੀਗਿਆਂ ਤੁਸੀ ਔਰਤਾਂ ਨੂੰ ਸਮਝ ਨਹੀਂ ਪਾਂਦੇ

          ਰਸ਼ਮੀ ਨਾਲ ਦੋਸਤੀ ਦੀ ਗੱਲ ਸੁਣਕੇ ਉਸਦੀ ਪਤਨੀ ਰਾਜ ਬਹੁਤ ਖੁਸ਼ ਹੋਈ ਸੀ। ਹੈਰਾਨੀ ਵੀ ਹੋਈ ਕਿ ਆਮ ਔਰਤਾਂ ਵਾਂਗ ਈਰਖਾ ਨਾ ਹੋਕੇ, ਉਸਨੂੰ ਸਗੋਂ ਖੁਸ਼ੀ ਹੀ ਹੋਈ ਸੀ ਕਿ ਕੋਈ ਜ਼ਹੀਨ ਔਰਤ ਉਸਦੇ ਪਤੀ ਦੀ ਦੋਸਤ ਵੀ ਹੈ।

          ਰਸ਼ਮੀ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਬੁਰਾ ਲੱਗਿਆ, ਜਦੋਂ ਹੋਲੀ ਵਰਗੇ ਤਿਉਹਾਰ ਦੇ ਦਿਨ ਸ਼ਾਮ ਨੂੰ ਦਿਵਾਕਰ ਨੇ ਖੁਦ ਹੀ ਮਿਲਣ ਦਾ ਸਮਾਂ ਮੁਕੱਰਰ ਕੀਤਾ। ਫਿਰ ਮਿਲਣ ਤੇ…… ਉਸਦਾ ਰਵੱਈਆ ਪਹੇਲੀ ਵਾਂਗ ਲੱਗ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਆਉਂਦੇ ਹੀ ਕਹਿਣ ਲੱਗਾ,ਜੋ ਵੀ ਗੱਲ-ਬਾਤ ਕਰਨੀ ਹੈ, ਜਲਦੀ ਕਰੋ, ਮੈਨੂੰ ਜਰੂਰੀ ਕੰਮ ਹੈ, ਕਿਤੇ ਜਾਣਾ ਹੈ।

          ਰਸ਼ਮੀ ਹੈਰਾਨ ਸੀ ਕਿ ਦੋ ਘੜੀ  ਗੱਲਾਂ ਵੀ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀਆਂ ਅਤੇ ਆਉਂਦੇ ਹੀ ਫ਼ਰਮਾਨ ਸੁਣਾ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਮੈਂ ਕਿਤੇ ਜਾਣਾ ਹੈ। ਰਸ਼ਮੀ ਨੂੰ ਇਹ ਤੁਕ ਸਮਝ ਨਹੀਂ ਆਈਜੇ ਆਉਂਦੇ ਹੀ ਤੁਰੰਤ ਜਰੂਰੀ ਕੰਮ ਤੋਂ ਕਿਤੇ ਜਾਣਾ ਸੀ, ਤਾਂ ਫਿਰ ਉਸਨੂੰ ਕਿਉਂ ਸੱਦਿਆ ਸੀ? ਕੀ ਲੋੜ ਸੀ?

          ਰਸ਼ਮੀ ਨੂੰ ਹੋਲੀ ਦਾ ਕਿੰਨਾ ਚਾਅ ਸੀ। ਸੋਚਿਆ ਸੀ, ‘ਚਲੋ, ਇਸੇ ਬਹਾਨੇ ਹੋਲੀ ਮਨ ਜਾਵੇਗੀ, ਵਰਨਾ ਵਰ੍ਹੇ ਬੀਤ ਗਏ ਸਨ ਅਬੀਰ ਅਤੇ ਗੁਲਾਲ ਦੀ ਛੋਹ ਨੂੰ ਤਰਸਦਿਆਂਦਿਵਾਕਰ ਦੀ ਕਾਹਲ ਦੇਖ ਕੇ ਮਨ ਮਸੋਸ ਕੇ ਕਹਿ ਦਿੱਤਾ, ਤੁਹਾਨੂੰ ਕਾਹਲ ਹੈ ਤਾਂ ਤੁਸੀ ਚਲੇ ਜਾਉ, ਕਿਤੇ ਦੇਰ ਨਾ ਹੋ ਜਾਵੇ। ਅਤੇ ਉਹ ਉਸਨੂੰ ਉੱਥੇ ਕੱਲੀ ਛੱਡ ਕੇ ਅਗਾਂਹ ਵਧ ਗਿਆ।

          ਰਸ਼ਮੀ ਹੈਰਾਨ ਸੀਕਿਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸਾਂਭਿਆ। ਬੜੇ ਚਾਅ ਨਾਲ ਫੁੱਲ ਲੈਕੇ ਗਈ ਸੀ ਕਿ ਫੁੱਲਾਂ ਨਾਲ ਔਰਗੈਨਿਕ ਹੋਲੀ ਮਨਾਵਾਂਗੇ ਅਤੇ ਦਿਵਾਕਰ ਦੇ ਜਾਂਦਿਆਂ ਹੀ ਗੁੱਸੇ ਵਿੱਚ ਸਾਰੇ ਫੁੱਲ ਪਰੇ ਸੁੱਟ ਮਾਰੇਭਲਾ ਫੁੱਲਾਂ ਦਾ ਕੀ ਕਸੂਰ ਹੋਇਆ? ਕਿਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਘਸੀਟਦੇ ਹੋਏ ਘਰ ਆਈ। ਮਨ ਹੀ ਮਨ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ ਕਿ ਹੁਣ ਦੋਹਾਂ ਵਿੱਚ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਬਚਿਆ। ਸ਼ੀਸ਼ੇ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਾਰ ਤਰੇੜ ਪੈ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਫਿਰ ਉਹ ਜੁੜਦਾ ਨਹੀਂ। ਨਹੀਂ, ਜੋ ਵੀ ਹੋਵੇ, ਇਹ ਰਿਸ਼ਤਾ ਨਹੀਂ ਨਿਭਣ ਵਾਲਾ।

          ਪਹਿਲੀ ਵਾਰ ਸੋਚਿਆ ਕਿ ਕਿਉਂ ਨਰਮ ਪੈ ਜਾਂਦੀ ਹਾਂ ਦਿਵਾਕਰ ਦੇ ਸਾਹਮਣਏਆਪਣੀ ਅਣਖ ਨੂੰ ਸਿਰ ਚੁੱਕਣ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਦਿੰਦੀ? ਜਵਾਬ ਮਿਲਦਾ, ਇਹੋ ਹੀ ਤਾਂ ਚਾਹਤ ਹੈ, ਸਮਰਪਣ ਹੈ। ਚਾਹਤ ਦਾ ਤਕਾਜ਼ਾ ਹੈ, ਜਿਸਨੂੰ ਤੁਸੀਂ ਦਿਲ-ਓ-ਜਾਨ ਨਾਲ ਚਾਹੋ, ਉਸਦੇ ਲਈ ਕਠੋਰ ਕਿਵੇਂ ਹੋ ਸਕਦੇ ਹੋ? ਫਿਰ ਉਹ ਤੁਹਾਡਾ ਆਪਣਾ ਕਿੰਨਾ ਕਰੀਬੀ ਹੀ ਕੋਈ ਕਿਉਂ ਨਾ ਹੋਵੇ।

 

 

          ਨਹੀਂ, ਕਠੋਰ ਤਾਂ ਬਣਨਾ ਹੀ ਪਵੇਗਾ। ਅਤੇ ਹੁਣ ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਦ੍ਰਿੜ ਨਿਸ਼ਚੈ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ ਕਿ ਉਹ ਆਪਣੇ ਵਲ੍ਹੋਂ ਕੋਈ ਪਹਿਲ ਨਹੀਂ ਕਰੇਗੀ, ਕੋਈ ਰਾਬਤਾ ਨਹੀਂ ਕਰੇਗੀ ਉਸਦੇ ਨਾਲ।  ਨਾ ਚਾਹੁੰਦਿਆਂ ਹੋਇਆਂ ਵੀ ਉਹ ਆਪਣੇ ਇਸ ਦ੍ਰਿੜ ਨਿਸ਼ਚੈ ਤੇ ਟਿਕੀ ਰਹੀ। ਲਗਭਗ ਦੋ ਹਫ਼ਤੇ ਤੱਕ ਦੋਹਾਂ ਵਿੱਚ ਸੰਵਾਦਹੀਨਤਾ ਬਣੀ ਰਹੀ। ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਰੋਕਿਆ ਕਿਸੇ ਵੀ ਕਿਸਮ ਦੇ ਸੰਵਾਦ ਤੋਂ।

          ਇੱਕ ਦਿਨ ਉਸਨੇ ਵੇਖਿਆ ਕਿ ਮੋਬਾਈਲ ਤੇ ਦਿਵਾਕਰ ਦੀ ਇੱਕ ਮਿਸਡ ਕਾਲ ਹੈ। ਆਪਣੇ ਆਪ ਤੇ ਕਾਬੂ ਰੱਖਦੇ ਹੋਏ ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਕੌਲਬੈਕ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ

          ਉਸਦੀ ਹੈਰਾਨੀ ਦੀ ਹੱਦ ਨਾ ਰਹੀ ਜਦੋਂ ਅਗਲੇ ਹੀ ਦਿਨ ਸਵੇਰੇ ਲਗਭਗ ਸਾਢੇ ਗਿਆਰਾਂ ਵਜੇ ਮੋਬਾਈਲ ਵੱਜ ਪਿਆਸਕਰੀਨ ਤੇ ਦਿਵਾਕਰ ਦਾ ਨੰਬਰ। ਜੱਕੋ ਤਕੀ ਵਿੱਚ ਉਸਨੇ ਹੈਲੋ ਕਹਿ ਹੀ ਦਿੱਤਾ।

       ਉਧਰੋਂ ਆਵਾਜ਼ ਸੁਣਾਈ ਦਿੱਤੀ, ਹੈਲੋ, ਕੀ ਹਾਲ-ਚਾਲ?

      ਜੀ, ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ। ਔਲ ਇਜ਼ ਵੈਲ, ਔਲਵੇਜ਼ ਵੈਲ।

          ਕਿਹੜੀ ਗੋਲੀ ਵੱਜ ਗਈ... ਕੀ ਗੱਲ ਕਰਨ ਦੀ ਵੀ ਮਨਾਹੀ ਹੈ?

          ਕੀ ਪਤਾ, ਚੱਲੀ ਹੋਵੇ...

          ਚਲੋ, ਛੱਡੋ। ਤੁਹਾਡੇ ਇਲਾਕੇ ਚੋ ਲੰਘ ਰਿਹਾ ਸੀ, ਸੋਚਿਆ ਫ਼ੋਨ ਹੀ ਕਰ ਲਵਾਂ।

          ਅਤੇ ਫਿਰ ਅਗਲੇ ਹੀ ਇੱਕ ਘੰਟੇ ਵਿੱਚ ਦੋਵੇਂ ਇੱਕ ਰੈਸਟੋਰੈਂਟ ਵਿੱਚ ਚਾਹ ਦੀਆਂ ਚੁੱਸਕੀਆਂ ਲੈ ਰਹੇ ਸਨ। ਸਭ ਕੁਝ ਭੁਲਾ ਕੇ ਰਸ਼ਮੀ ਫਿਰ ਨਾਰਮਲ ਹੋ ਗਈ ਸੀ।

      ਖੁਦ ਦਿਵਾਕਰ ਹੀ ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਦੋ-ਤਿੰਨ ਵਾਰੀ ਕਹਿ ਚੁੱਕਿਆ ਸੀ ਕਿ ਵੇਖੋ, ਸਾਨੂੰ ਵੇਖ ਕੇ ਤਾਂ ਲੱਗਦਾ ਹੀ ਨਹੀਂ ਕਿ ਕਦੇ ਲੜੇ ਹੋਈਏ। ਇੰਨੇ-ਇੰਨੇ ਦਿਨ ਗੱਲਬਾਤ ਬੰਦ ਰਹੀ ਹੋਵੇ। ਕੌਣ ਕਹੇਗਾ ਕਿ ਅਸੀਂ ਇੰਨੇ ਦਿਨਾਂ ਬਾਅਦ ਮਿਲੇ ਹਾਂ।

          ਜਿਵੇਂ ਇੰਨੇ ਦਿਨਾਂ ਤੱਕ ਸੰਵਾਦਹੀਨਤਾ ਰਹਿਣੀ ਉਸ ਲਈ ਬਹੁਤ ਹੀ ਮਾਮੂਲੀ ਗੱਲ ਹੋਵੇ ਅਤੇ ਰੁਟੀਨ ਦਾ ਹੀ ਹਿੱਸਾ ਹੋਵੇ। ਉਹ ਦਫ਼ਤਰੀ ਵਿਆਸਤਤਾ ਦੀ ਸਫ਼ਾਈ ਦਿੰਦਾ ਰਿਹਾ ਰਸ਼ਮੀ ਦਾ ਮੰਨਣਾ ਸੀ ਕਿ ਕੰਮ ਕਰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਬਹਾਨਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, ਪਰ ਕੰਮ ਨਾ ਕਰਨ ਦੇ ਸੌ ਬਹਾਨੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਦਫ਼ਤਰੀ ਵਿਅਸਤਤਾ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਕੀ ਇਨਸਾਨ ਘਰ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦਾ? ਘਰ ਜਾ ਕੇ ਖਾਂਦਾ-ਪੀਂਦਾ, ਸੌਂਦਾ ਨਹੀਂ? ਹੋਰ ਕੋਈ ਜ਼ਰੂਰੀ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ? ਕੀ ਉਸ ਨਾਲ ਫ਼ੋਨ ਤੇ ਗੱਲ ਕਰਨ ਲਈ ਹੀ ਸਾਰੀਆਂ ਵਿਅਸਤਤਾਵਾਂ ਸਾਂਭ ਰੱਖੀਆਂ ਹਨ?

          ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਕਿਹਾ, ਤੁਹਾਡਾ ਕੀ ਭਰੋਸਾ, ਕਦੋਂ ਫਿਰ ਭੁੜਕ ਜਾਓ। ਜੇਕਰ ਹੁਣ ਰੁਆਇਆ ਤਾਂ ਮੈਂ ਸ਼ਹਿਰ ਛੱਡ ਕੇ ਚਲੀ ਜਾਵਾਂਗੀ। ਸ਼ਹਿਰ ਹੀ ਕਿਉਂ, ਦੇਸ਼ ਵੀ ਛੱਡ ਜਾਵਾਂਗੀ। ਵੇਖਣਾ ਤਾਂ ਦੂਰ, ਅਵਾਜ਼ ਸੁਣਨ ਲਈ ਵੀ ਤਰਸ ਜਾਓਗੇ। ਇੰਨੀ ਦੂਰ ਕਿ ਫ਼ੋਨ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਜੇਬ ਦੀ ਫ਼ਿਕਰ ਕਰਿਆ ਕਰੋਗੇ।

          ਹਾਂ, ਬਿਲਕੁਲ ਠੀਕ ਸੋਚਿਆ ਸੀ ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ। ਦਸ-ਬਾਰਾਂ ਦਿਨਾਂ ਬਾਅਦ ਫਿਰੋਂ ਓਹੋ ਜਿਹਾ ਮੌਕਾ ਸਾਹਮਣੇ ਆਣ ਖੜ੍ਹਾ ਹੋਇਆ। ਦਿਵਾਕਰ ਦਾ ਇੱਕ ਆਰਟੀਕਲ ਸਥਾਨਕ ਅਖ਼ਬਾਰ ਵਿੱਚ ਛਪਿਆ ਸੀ। ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਸਵੇਰੇ-ਸਵੇਰੇ ਰਸਮੀ ਤੌਰ ਤੇ ਅਖ਼ਬਾਰ ਵੇਖੀ ਸੀ। ਫਿਰ ਰਸੋਈ ਦੇ ਕੰਮਾਂ ਵਿੱਚ ਰੁੱਝ ਗਈ। ਅਚਾਨਕ ਧਿਆਨ ਆਇਆ ਕਿ ਦਿਵਾਕਰ ਨੇ ਗੱਲੀਂ - ਗੱਲੀਂ ਆਰਟੀਕਲ ਭੇਜੇ ਜਾਣ ਬਾਬਤ ਦੱਸਿਆ ਸੀ। ਮੁੜ ਅੱਧੇ ਘੰਟੇ ਬਾਅਦ ਅਖ਼ਬਾਰ ਫਰੋਲੀ ਤਾਂ ਵੇਖਿਆ ਕਿ ਆਰਟੀਕਲ ਉਸ ਵਿੱਚ ਸੀ। ਸੋਚਿਆ ਦਿਵਾਕਰ ਨੂੰ ਫ਼ੋਨ ਕਰੇ। ਫਿਰ ਸੋਚਿਆਹੁਣ ਤੱਕ ਤਾਂ ਜਨਾਬ ਸੁੱਤੇ ਹੀ ਪਏ ਹੋਣਗੇ। ਕੱਲ੍ਹ ਰਾਤ ਟੂਰ ਤੋਂ ਦੇਰ ਨਾਲ ਵਾਪਸ ਮੁੜਣ ਦੀ ਗੱਲ ਕਹੀ ਸੀ। ਉਸਨੂੰ ਵੀ ਦਫ਼ਤਰ ਲਈ ਦੇਰ ਹੋ ਰਹੀ ਸੀ। ਸੋਚਿਆ ਦਫ਼ਤਰ ਪਹੁੰਚ ਕੇ ਅਰਾਮ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕਰ ਲਵੇਗੀ, ਪਰ ਅਜੇ ਉਹ ਰਸਤੇ ਵਿੱਚ ਹੀ ਸੀ ਕਿ ਦਿਵਾਕਰ ਦਾ ਫ਼ੋਨ ਆ ਗਿਆ।

          ਅੱਜ ਦੀ ਅਖ਼ਬਾਰ ਵੇਖੀ?

          ਹਾਂ, ਵੇਖੀ

          ਤਾਂ ਫ਼ੋਨ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ?

          ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਬਗੈਰ ਕੁਝ ਸੋਚੇ-ਵਿਚਾਰੇ ਕਹਿ ਦਿੱਤਾ, ਅਖ਼ਬਾਰ ਵਾਲਿਆਂ ਨੂੰ ਕੋਈ ਹੋਰ ਕੰਮ - ਧੰਧਾ ਤਾਂ ਹੈ ਨਹੀਂ। ਜਨਾਬ ਦਾ ਆਰਟੀਕਲ ਮਿਲਿਆ ਤੇ ਤੁਰੰਤ ਛਾਪ ਦਿੱਤਾ। ਹੋਰਾਂ ਨੂੰ ਤਾਂ ਕੰਮ-ਧੰਧਾ ਹੈ ਨਾ ਬਾਬਾ। ਅਜੇ ਰਸਤੇ ਵਿੱਚ ਹਾਂ, ਦਫ਼ਤਰ ਪਹੁੰਚ ਕੇ ਗੱਲ ਕਰਦੇ ਹਾਂ।

          ਦਫ਼ਤਰ ਪਹੁੰਚ ਕੇ ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਫ਼ੋਨ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਦਿਵਾਕਰ ਤਾਂ ਜਿਵੇਂ ਉਸ ਦੀ ਕਲਾਸ ਲੈਣ ਲਈ ਤਪਿਆ ਬੈਠਾ ਸੀ। ਤੂੰ ਮੈਂਨੂੰ ਸਮਝਦੀ ਕੀ ਏਂ? ਹਰ ਦੂਜੇ-ਤੀਜੇ ਦਿਨ ਕਦੇ ਨਾ ਕਦੇ ਅਖ਼ਬਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਮੇਰਾ ਨਾਂ ਛਪਿਆ ਵੇਖ ਕੇ ਤੂੰ ਸੜਦੀ ਏਂ ਤੈਨੂੰ ਮੇਰੀ ਖੁਸ਼ੀ ਵਿੱਚ ਖੁਸ਼ੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ। ਜੋ ਦੋਸਤ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਵਿੱਚ ਖੁਸ਼ ਨਾ ਹੋਵੇ, ਉਹ ਦੋਸਤ ਹੋ ਹੀ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ

          ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਕਿਹਾ, ਮੈਂ ਸੋਚਿਆ ਤੁਸੀਂ ਰਾਤੀਂ ਦੇਰ ਨਾਲ ਘਰ ਪਰਤੇ ਹੋਵੋਗੇ ਅਤੇ ਦੇਰ ਨਾਲ ਸੁੱਤੇ ਹੋਵੋਗੇ, ਇਸ ਲਈ ਸਵੇਰੇ-ਸਵੇਰੇ ਕੀ ਜਗਾਉਣਾ, ਦਫ਼ਤਰ ਪਹੁੰਚ ਕੇ ਗੱਲ ਕਰ ਲਵਾਂਗੀ।

          ਝੂਠ ਬੋਲਣ ਦੀ ਵੀ ਹੱਦ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਵੱਡੀ ਆਈ ਮੇਰੀ ਨੀਂਦ ਦੀ ਪਰਵਾਹ ਕਰਨ ਵਾਲੀ। ਸਵੇਰ ਤੋਂ ਮੈਨੂੰ ਵਥੇਰੇ ਫ਼ੋਨ ਅਤੇ ਮੈਸੇਜ ਆ ਚੁੱਕੇ ਹਨ। ਇੱਕ ਤੇਰਾ ਹੀ ਨਹੀਂ ਆਇਆ ਤਾਂ ਕੀ ਫ਼ਰਕ ਪੈ ਗਿਆ। ਤੈਨੂੰ ਤਾਂ ਮੇਰੀ ਖੁਸ਼ੀ ਹਜ਼ਮ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ, ਤੈਨੂੰ ਈਰਖਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ।

          ਅਤੇ ਪਤਾ ਨਹੀਂ ਕੀ-ਕੀ ਇਕੋ ਸਾਹ ਵਿੱਚ ਕਹਿ ਗਿਆ। ਕੁਝ ਵੀ ਸੁਣਨ ਨੂੰ ਤਿਆਰ ਨਹੀਂ ਸੀ।

          ਅਰੇ, ਕਾਹਦੀ ਈਰਖਾ? ਦੋਵਾਂ ਦੇ ਆਪਣੇ-ਆਪਣੇ ਵੱਖਰੇ ਫੀਲਡ ਸਨ। ਕੋਈ ਕੰਪੀਟੀਸ਼ਨ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਹੀ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਫਿਰ ਭਲਾ ਉਹ ਉਸ ਨਾਲ ਈਰਖਾ ਕਿਉਂ ਕਰੇਗੀ? ਦੋਵੇਂ ਆਪੋ - ਆਪਣੇ ਫੀਲਡ ਵਿੱਚ ਚੰਗੇ ਅਹੁਦਿਆਂ ਤੇ ਨਿਯੁਕਤ ਸਨ। ਸਾਹਿਤਕ ਰੁਚੀਆਂ ਵੀ ਮਿਲਦੀਆਂ-ਜੁਲਦੀਆਂ ਸਨ। ਫਿਰ ਈਰਖਾ ਦੀ ਕਿਹੜੀ ਗੁੰਜਾਇਸ਼? ਇਹ ਗੱਲ ਰਸ਼ਮੀ ਅੱਜ ਤੱਕ ਉਸਨੂੰ ਸਮਝਾ ਨਹੀਂ ਸਕੀ ਕਿ ਉਸਨੂੰ ਉਸ ਨਾਲ ਕਿਸੇ ਵੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਈਰਖਾ ਜਾਂ ਜਲਨ ਨਹੀਂ। ਜੋ ਵੀ ਹੋਵੇ, ਗੱਲ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਰਸ਼ਮੀ ਦੇ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਹੀ ਜਾਂਦੀ ਸੀ।

      ਫਿਰ ਉਸਨੇ ਸੋਚਿਆਸ਼ਾਇਰ ਬਸ਼ੀਰ ਬਦਰ ਸਾਹਿਬ ਠੀਕ ਹੀ ਫਰਮਾਂਦੇ ਹਨ-

    ਜ਼ਰਾ ਸੀ ਬਾਤ ਕਾ ਇਤਨਾ ਮਲਾਲ ਕਰਤੇ ਹੋ, ਸ਼ਿਕਾਇਤੇਂ ਭੀ ਵਹੀਂ ਹੈਂ ਜਹਾਂ ਮੁਹੱਬਤ  ਹੈ।

          ਰਸ਼ਮੀ ਹੱਕੀ-ਬੱਕੀ ਰਹਿ ਗਈ ਸੀ। ਹਾਸੇ-ਮਜ਼ਾਕ ਵਿੱਚ ਹਲਕੇ-ਫੁਲਕੇ ਅੰਦਾਜ਼ ਨਾਲ ਕਹੀ ਗਈ ਗੱਲ ਸੱਚਮੁੱਚ ਕਿੰਨੀ ਹਲਕੀ ਪੈ ਗਈ ਸੀ ਅਤੇ ਰਸ਼ਮੀ ਖੁਦ ਵੀ ਉਸ ਦੀ ਨਿਗਾਹ ਵਿੱਚ ਕਿੰਨੀ ਹਲਕੀ ਹੋ ਗਈ ਸੀ। ਜੋ ਇਨਸਾਨ ਮਜ਼ਾਕ ਬਰਦਾਸ਼ਤ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ, ਉਸਨੂੰ ਦੂਜਿਆਂ ਨਾਲ ਵੀ ਮਜ਼ਾਕ ਨਹੀਂ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ। ਖੁਦ ਦਿਵਾਕਰ ਨੇ ਤਾਂ ਹਾਸੇ ਵਿੱਚ ਕਈ ਵਾਰ ਇਸ ਤੋਂ ਵੀ ਜ਼ਿਆਦਾ ਭਿਆਨਕ, ਇੱਥੋਂ ਤੱਕ ਕਿ ਹਰਟ ਕਰਣ ਵਾਲੇ  ਕੁਮੇਂਟ ਕੀਤੇ ਸਨ। ਇੱਕ ਮਰਦ ਇੱਕ ਔਰਤ ਨੂੰ ਐਨੀਆਂ ਇਤਰਾਜ਼ਯੋਗ ਗੱਲਾਂ ਕਹਿ ਸਕਦਾ ਹੈ ਉਹ ਵੀ ਚੰਗਾ ਭਲਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਲਿਖਿਆ ਹੋ ਕੇ। ਖ਼ੈਰ, ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਕਦੇ ਵੀ ਉਸ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਨੂੰ ਤੂਲ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ। ਜੇ ਇਹੀ ਗੱਲ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਨੇ ਕਹੀ ਹੁੰਦੀ ਤਾਂ

          ਅਤੀਤ ਨੂੰ ਫਰੋਲ ਕੇ ਕੋਈ ਫ਼ਾਇਦਾ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਵਰਤਮਾਨ ਵਿੱਚ ਫਿਰ ਤੋਂ ਸੰਵਾਦਹੀਨਤਾ ਚੱਲ ਰਹੀ ਸੀ, ਅਤੇ ਉਹ ਸੋਚ ਰਹੀ ਸੀ ਕਿ ਆਖਿਰ ਇਹ ਸਭ ਕਦੋਂ ਤੱਕ ਚੱਲੇਗਾ। ਕਦੋਂ ਤੱਕ ਉਹ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਆਪਣੀ ਹੇਠੀ ਬਰਦਾਸ਼ਤ ਕਰਦੀ ਰਹੇਗੀਅਤੇ ਕਿਉਂ? ਕਿਉਂ ਉਹ ਹਰ ਰੋਜ਼ ਇੰਝ ਹੀ ਮਰਦੀ ਰਹੇ।

          ਅਚਾਨਕ ਉਸਨੂੰ ਯਾਦ ਆਇਆ ਕਿ ਸ਼ਾਇਦ ਅੱਜ ਦਿਵਾਕਰ ਨੇ ਫਿਰ ਤੋਂ  ਟੂਰ ਤੇ ਜਾਣਾ ਹੈ। ਇਹੀ ਸੋਚ ਕੇ ਉਸਨੇ ਫ਼ੋਨ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਉਧਰੋਂ ਜਵਾਬ ਮਿਲਿਆ ਏਅਰ ਪੋਰਟ ਤੇ ਹਾਂ। ਸਵਾ ਨੌਂ ਦੀ ਫਲਾਈਟ ਹੈ। ਰਸ਼ਮੀ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਹੈਰਾਨੀ ਹੋਈ ਕਿ ਇਹ ਇਨਸਾਨ ਕਿੰਨਾ ਸਖ਼ਤ ਤੇ ਬੇਰਹਿਮ ਹੈ। ਤਿੰਨ ਦਿਨਾਂ ਦੀ ਸੰਵਾਦਹੀਨਤਾ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਤਿੰਨ ਦਿਨਾਂ ਲਈ ਸ਼ਹਿਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਬਗੈਰ ਗੱਲ ਕੀਤੇ। ਜੇਕਰ ਮੈਂ ਫ਼ੋਨ ਨਾ ਕੀਤਾ ਹੁੰਦਾ, ਤਾਂ ਦਿਵਾਕਰ ਦਾ ਫ਼ੋਨ ਕਿੱਥੋਂ ਆਉਣਾ ਸੀ?

          ਰਿਸ਼ਤੇ ਬਣਾਉਣੇ ਅਸਾਨ ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਨਿਭਾਉਣਾ ਅਤੇ ਲੰਮੇ ਸਮੇਂ ਤੱਕ ਜਿਉਂਦਾ ਰੱਖਣਾ ਮੁਸ਼ਕਲ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਹੁਣ ਹੋਰ ਨਹੀਂ ਬਸ ਬਹੁਤ ਹੋ ਗਿਆ। ਹੁਣ ਉਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕਮਜ਼ੋਰ ਨਹੀਂ ਹੋਣ ਦੇਵੇਗੀ। ਅਸੀਂ ਔਰਤਾਂ ਦਿਲੋਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਾਂਗ ਸਖ਼ਤ ਤੇ ਬੇਰਹਿਮ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਬਣ ਸਕਦੀਆਂ? ਦਰਅਸਲ, ਕਰੀਬੀ ਦੋਸਤ ਹੋਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ  ਦਿਵਾਕਰ ਰਸ਼ਮੀ ਦੇ ਗੱਲ ਕਰਨ ਦੇ ਲਹਿਜ਼ੇ ਨੂੰ ਸਮਝਦਾ ਨਹੀਂ। ਰਸ਼ਮੀ ਕਦੇ ਵੀ ਸਿੱਧੀ-ਸਾਫ਼ ਗੱਲ ਨਹੀਂ ਕਰਦੀ; ਉਸਨੂੰ ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਜਾਲ ਬੁਣਨ ਦੀ ਆਦਤ ਹੈ, ਅਤੇ ਇਸੇ ਕਰਕੇ ਲੋਕ ਗਲਤਫ਼ਹਿਮੀ ਦਾ ਸ਼ਿਕਾਰ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਬੁਰਾ ਮੰਨ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਉਸ ਦੀ ਸਹਿਜਤਾ  ਦਾ ਗਲਤ ਮਤਲਬ ਕੱਢ ਲੈਂਦੇ ਹਨ। ਹੁਣ ਇਹ ਵੀ ਕੀ ਗੱਲ ਹੋਈ ਕਿ ਆਪਣੇ ਹੀ ਲੋਕਾਂ ਨਾਲ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਗੰਭੀਰਤਾ ਦਾ ਮੁਲੰਮਾ ਪਾ ਕੇ ਗੱਲ ਕਰੋ ਅਤੇ ਸੋਚ-ਸੋਚ ਕੇ ਨਾਪ-ਤੋਲ ਕੇ ਬੋਲੋ।

          ਇਹ ਵੱਖਰੀ ਗੱਲ ਹੈ ਕਿ ਜਦੋਂ ਰਸ਼ਮੀ ਨੂੰ ਉਸ ਤੇ ਬਹੁਤ ਮੋਹ ਆਉਂਦਾ ਤਾਂ ਕਹਿ ਦਿੰਦੀ, ਤੈਨੂੰ ਸ਼ੂਟ ਕਰ ਦਿਆਂਗੀ। ਦਿਵਾਕਰ ਕਹਿੰਦਾ, ਮੈਨੂੰ ਕਦੇ ਗਲਤੀ ਨਾਲ ਕੁਝ ਹੋ ਗਿਆ ਨਾ, ਤਾਂ ਪੁਲਿਸ ਤੈਨੂੰ ਹੀ ਫੜ ਕੇ ਲੈ ਜਾਵੇਗੀ ਹਰ ਗੱਲ ਤੇ ਸ਼ੂਟ ਕਰਨ ਦੀ ਗੱਲ ਕਹਿਣ ਤੇ।

          ਰਸ਼ਮੀ ਨੇ ਕਈ ਵਾਰ ਉਸਨੂੰ ਕਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਇੰਝ ਨਾ ਕਰਿਆ ਕਰੋ। ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ ਤੁਹਾਨੂੰ ਕੋਈ ਫ਼ਰਕ ਨਾ ਪੈਂਦਾ ਹੋਵੇ, ਪਰ ਮੈਨੂੰ ਬਹੁਤ ਫ਼ਰਕ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਮੇਰਾ ਕੰਮ ਤੋਂ ਜੀ ਉਚਾਟ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮੇਰੇ ਕੰਮ ਤੇ ਬਹੁਤ ਅਸਰ ਪੈਂਦਾ ਹੈਚਾਹੇ ਉਹ ਦਫ਼ਤਰੀ ਕੰਮ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਹੋਰ ਲਿਖਣ - ਪੜ੍ਹਂਣ ਦਾ। ਪਰ ਹਰ ਵਾਰ ਓਹੀ ਕਹਾਣੀ.... ਦਿਵਾਕਰ ਸ਼ਾਇਦ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸਾੰਭ ਲੈਂਦਾ ਹੋਵੇ, ਪਰ ਰਸ਼ਮੀ ਨੂੰ ਲੱਗਦਾ ਸੀ ਕਿ ਅੱਜ ਦੇ ਜ਼ਮਾਨੇ ਵਿੱਚ ਇਨਸਾਨ ਨੂੰ ਇੰਨਾ ਭਾਵੁਕ ਨਹੀਂ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ। ਇਮੋਸ਼ਨਲ ਹੋਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਪ੍ਰੈਕਟੀਕਲ ਬਣਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਜੋ ਬੀਤ ਗਿਆ, ਸੋ ਬਾਤ ਗਈ। ਇਹੀ ਤਾਂ ਉਸਤੋਂ ਹੁੰਦਾ ਨਹੀਂ। ਉਹ ਸੋਚਦੀ ਸੀ ਕਿ ਜਿਹੜਾ ਬੰਦਾ ਘੰਟਿਆਂ- ਘੰਟਿਆਂ ਤਾਈਂ ਗੱਲ ਕਰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੋਵੇ, ਉਹ ਸੰਵਾਦਹੀਨਤਾ ਦੀ ਹਾਲਤ ਵਿੱਚ ਇੰਨਾ ਖਾਮੋਸ਼ ਕਿਵੇਂ ਰਹਿ ਲੈਂਦਾ ਹੈ। ਠੀਕ ਹੈ, ਜੇ ਦਿਵਾਕਰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਇੰਝ ਕਾਬੂ ਵਿੱਚ ਰੱਖ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਉਹ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ? ਉਂਝ ਤਾਂ ਉਹ ਖੁਦ ਵੀ ਉਸੂਲਾਂ ਦੀ ਬਹੁਤ ਪੱਕੀ ਹੈ, ਪਰ ਦਿਵਾਕਰ ਦੇ ਮਾਮਲੇ ਵਿੱਚ ਉਸਤੋਂ ਅਜਿਹਾ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਕਰ ਹੁੰਦਾ, ਕਿਉਂ ਉਸਦੇ ਸਾਰੇ ਉਸੂਲ ਧਰੇ ਦੇ ਧਰੇ ਰਹਿ ਜਾਂਦੇ ਹਨ? ਆਖ਼ਿਰ  ਕਿਉਂ?

          ਬੱਸ, ਹੁਣ ਸੋਚ ਲਿਆ ਤਾਂ ਸੋਚ ਲਿਆ। ਦਿਵਾਕਰ ਕਿਤੇ ਦਿਸ ਪਿਆ ਤਾਂ ਚੁੱਪਚਾਪ ਕੋਲੋਂ ਲੰਘ ਜਾਵੇਗੀ ਬਗੈਰ ਗੱਲ ਕੀਤੇ। ਜਾਂ ਅਗਰ ਫ਼ੋਨ ਆਇਆ ਤਾਂ ਕਹਿ ਦੇਵੇਗੀ, ਸੌਰੀ, ਰੌਂਗ ਨੰਬਰ। ਸੋਚ ਤਾਂ ਲਿਆ, ਪਰ ਕੀ ਉਹ ਆਪਣੇ ਫ਼ੈਸਲੇ ਤੇ ਟਿਕ ਸਕੇਗੀ? ਉਹ ਖੁਦ ਵੀ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਾਣਦੀ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਕਤਈ ਅਜਿਹਾ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕੇਗੀ। ਸਭ ਕੁਝ ਭੁਲਾ ਕੇ ਫਿਰ ਤੋਂ ਜਿਵੇਂ ਦਾ ਤਿਵੇਂ, ਸਹਿਜਤਾ ਨਾਲ ਬੱਸ ਇਹੀ ਕਹੇਗੀ, ਬਹੁਤ ਦੁਖੀ ਕਰਦੇ ਹੋ। ਇਹੀ ਤਾਂ ਫ਼ਰਕ ਹੈ ਰਸ਼ਮੀ ਅਤੇ ਦਿਵਾਕਰ ਵਿੱਚ। ਫਿਰ ਉਹ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇੱਕ-ਮਿੱਕ ਹੋ ਜਾਣਗੇ, ਜਿਵੇਂ ਕੁਝ ਹੋਇਆ ਹੀ ਨਾ ਹੋਵੇ।

 

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                                                             ਨੀਲਮ ਸ਼ਰਮਾ ਅੰਸ਼ੁ

 

          ਲੀਪੁਰ ਦੁਆਰ ਜੰਕਸ਼ਨ (ਬੰਗਾਲ) ਵਿੱਖੇ ਜਨਮ। ਲੰਬੇ ਅਰਸੇ ਤੱਕ ਕੋਲਕਾਤਾ ਕਰਮਭੂਮੀ। ਪੰਜਾਬੀ-ਬੰਗਲਾ ਤੋਂ ਹਿੰਦੀ ਅਤੇ ਹਿੰਦੀ-ਬੰਗਲਾ ਤੋਂ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਕਈ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸਾਹਿਤਕ ਕਿਤਾਬਾਂ ਦਾ ਅਨੁਵਾਦ। ਵੱਖ-ਵੱਖ ਲੇਖ, ਇੰਟਰਵਿਊ, ਅਨੁਵਾਦਿਤ ਕਹਾਣੀਆਂ ਅਤੇ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਸਥਾਨਕ ਅਤੇ ਕੌਮੀ ਪੱਤਰਪਤ੍ਰਕਾਵਾਂ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ। ਕੋਲਕਾਤਾ ਦੀਆਂ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਖੇਤਰਾਂ ਦੀਆਂ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਔਰਤਾਂ ਬਾਰੇ 50 ਹਫ਼ਤਿਆਂ ਤੱਕ ਇੱਕ ਕੌਮੀ ਅਖ਼ਬਾਰ ਵਿੱਚ ਹਫ਼ਤਾਵਾਰ ਕਾਲਮ ਲਿਖਿਆ। ਫ੍ਰੀਲਾਂਸਿੰਗ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ, 1998 ਤੋਂ 25 ਸਾਲਾਂ ਤੱਕ ਅਕਾਸ਼ਵਾਣੀ ਕੋਲਕਾਤਾ ਅਤੇ ਦਿੱਲੀ ਐਫ. ਐੱਮ. ਰੇਨਬੋਤੋਂ ਫਿਲਮੀ ਪ੍ਰੋਗ੍ਰਾਮਾਂ ਦੀ ਐਂਕਰਿਂਗਭਾਰਤੀ ਸਿਨੇਮੇ ਦੀਆਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸ਼ਖਸੀਅਤਾਂ ਬਾਰੇ ਅੱਜ ਕੀ ਸ਼ਖਸੀਅਤਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਦੇ ਤਹਿਤ ਲਗਭਗ 75 ਲਾਈਵ ਐਪੀਸੋਡਾਂ ਦੀ ਪੇਸ਼ਕਾਰੀ।

          ਸੁਸ਼ਮੀਤਾ ਬੰਦਯੋਪਾਧਿਆਏ ਦੀ ਕਿਤਾਬ ਦਾ ਹਿੰਦੀ ਅਨੁਵਾਦ ਕਾਬੁਲੀਵਾਲੇ ਕੀ ਬੰਗਾਲੀ ਬੀਵੀ’ 2002 ਦੇ ਕੋਲਕਾਤਾ ਬੁੱਕ ਫੇਅਰ ਵਿੱਚ ਬੈਸਟ ਸੈਲਰ ਰਿਹਾ। ਕੋਲਕਾਤਾ ਦੇ ਰੈਡ ਲਾਈਟ ਖੇਤਰ ਤੇ ਅਧਾਰਿਤ ਲਿਖੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬੀ ਨਾਵਲ ਲਾਲ ਬੱਤੀਦਾ ਹਿੰਦੀ ਅਨੁਵਾਦ। ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਇਨਾਮ ਜੇਤੂ ਲੇਖਕ ਦੇਵੇਸ਼ ਰਾਏ ਦੇ ਬੰਗਾਲੀ ਨਾਵਲ ਤਿਸਤਾ ਪਾਰੇਰ ਬ੍ਰਿਤਾਂਤਦਾ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਲਈ ਅਨੁਵਾਦ ਗਾਥਾ ਤਿਸਤਾ ਪਾਰ ਦੀਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਅਤੇ ਭਾਰਤੀ ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਇਨਾਮ ਜੇਤੂ ਲੇਖਕ ਤਪਨ ਬੰਦਯੋਪਾਧਿਆਏ ਦੀ ਕਿਤਾਬ ਬੀਰਬਲ ਦਾ  ਭਾਰਤੀ ਸਾਹਿਤ ਅਕਾਦਮੀ ਵਾਸਤੇ ਹਿੰਦੀ ਅਨੁਵਾਦ।

          ਅੱਜਕੱਲ  ਭਾਰਤ ਸਰਕਾਰ ਅਧੀਨ ਦਿੱਲੀ ਵਿੱਖੇ ਤੈਨਾਤ।

                                       



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