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शुक्रवार, मार्च 13, 2015

बांगला कविता

डायन मात्र कविता नहीं।

- परितोष पुरकायस्थ

अनुवाद नीलम शर्मा अंशु



मुखिया के कहने पर अर्धनग्न युवती को जला कर मार डाला उन्होंने
उन्होंने यानी ग्रामवासियों ने।
युवती का अपराध वह डायन है।

सोच कर आश्चर्य होता है, मुखिया ने इस युवती से विवाह रचाना चाहा था
पर नहीं मानी लछ्मी।
लछ्मी बन गई डायन।
अभावों की मार से संथाली युवती के यौवन पर पड़ा डाका
सांवली सलोनी सी युवती की कजरारी आँखों में आँखें डाल
मुखिया ने उसके यौवन को ग्रस लिया था
पर नहीं ग्रस पाया उसके मन को
अत: वह डायन घोषित कर दी गई।
फिर.....

लछ्मी के तन की ज्वाला से उसका तन नहीं जल रहा था
जल रहे थे हमारे समाज के मुखियागण।
लछ्मी की जलती चिता के पास संथाल युवक खड़े हैं
परंतु प्रतिवाद नहीं किया।
वजह थी वही मुखिया।

अभागी लछ्मी के लिए एक बूंद आँसू भी नहीं टपका
विवेक, बुद्धिरहित मानव नामक प्राणियों की आँखों से।
परंतु लछ्मी का किस्सा सुनकर हम विवेक-बुद्धि संपन्न लोग
तनिक सा सर झुकाएंगे
और मुखिया का किस्सा सुन
कम से कम थोड़ा सा प्रतिवाद तो करेंगे।



                                          ---


साभार - छपते-छपते दीपावली विशेषांक - 2014






सोमवार, मई 05, 2014


आज 6 मई, पुण्यतिथि के अवसर पर पंजाबी विरह के बादशाह व शायर शिव बटालवी को याद करते हुए छोटी सी श्रद्धांजलि।




(1)
गुमशुदा मोहब्बत

ऐ शिव ! तूने कभी इश्तहार दिया था
एक गुमशुदा लड़की का
जो अभी भी गुमशुदा है....
किसी ने कोशिश ही नहीं की
उसे तलाशने की, तुम्हारे बाद
वर्ना वह भी फ़कीर हो जाता
तुम्हारी भांति....
तूने उस  लड़की का इश्तहार दिया था
जिसका नाम था मुहब्बत
जो कि दुनिया के हर रिश्ते से ख़त्म हो चुकी है
तूने उसकी बात की
जिसकी सूरत थी परियों जैसी
जो गुम हो चुकी है नकली मुखौटों की भीड़ में
तूने उसका ज़िक्र किया
जिसकी सीरत थी पाक और साफ़
मरियम जैसी
जो कि ओझल हो चुकी है
मंद विचारों के अंधियारे में
ऐ शिव ! ये कैसी लड़की थी
जिसकी ख़ातिर ज़माने ने तुझ पर तोहमतें लगाईं
खरी खोटी भी सुनाई
आज भी सुना रहा है
ये लोग भी एक लड़की की तलाश में हैं
परंतु ये तुम्हारी तरह फकीर नहीं होंगे
उसे तलाशते तलाशते
क्योंकि जिसे ये तलाश रहे हैं
उसका नाम मुहब्बत नहीं
दौलत है, शोहरत है
जो उन्हें एक दिन अवश्य मिल जाएगी
या शायद मिल चुकी होगी
परंतु ऐ शिव !
जिस लड़की का तूने इश्तहार दिया था
वह अभी भी गुमशुदा है.....

-         शम्मी जालंधरी
(शिव की कविता इश्तहारपर आधारित)
(पंजाबी से अनुवाद – नीलम शर्मा 'अंशु')




(2)






अब प्रस्तुत है पंजाबी  लेखक बलवंत गार्गी लिखित उनकी पुस्तक 'हसीन चेहरे' से साभार, शिव बटालवी पर लिखा उनका रेखाचित्र।



शिव बटालवी

0 बलवंत गार्गी



शिव बटालवी के साथ मेरा करार था। जब मैं चंडीगढ से दिल्ली अपनी कार में जाता तो उसे अपने साथ चलने के लिए कहता। रास्ते में बीयर की दो बोतलें, भुना हुआ मुर्गा तथा तीस रुपए नकद।


शिव स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से छुट्टी लिए बिना ही कई बार मेरे साथ दिल्ली जाता। शिव को न तो शराब पिलाने वालों की कमी थी और न ही मुर्गा खिलाने वालों की। वास्तव में उसके बारे में यह बात गलत प्रचारित थी कि लोग उसे शराब पिलाते थे। उसके पास यदि जेब में एक हजार रुपया होता तो वह दिन में ही दोस्तों को शराब पिलाने तथा खिलाने पर खर्च कर देता। वह शाही आदमी था और शाही फ़कीर। उस में खुद को बर्बाद करने की शक्ति थी।

उसने मुझसे कहा, ‘ये साली औरतें सदा रोती रहती है कि कि फलां मर्द ने मेरी अस्मत लूट ली। आप अपने हुस्न को बैंक के लॉकर में रख दें। मैं बैंक में काम करता हूँ। बहुत से लॉकर हैं वहाँ। नोटों की गड्डियां, सोने के ज़ेवर, हीरे। परंतु कोई ऐसा लॉकर नहीं जहाँ औरत अपने हुस्न या जवानी को रखकर चाबी जेब में डाल ले ? इस साले हुस्न ने तो तबाह होना ही है------- तो तबाही किस बात की ? प्यार से हुस्न चमकता है। जवानी मचती है। अस्मत का पाखंड तो कुरुप औरतों ने रचा है......इन्सानी जिस्म को कोई चीज़ मैला नहीं कर सकती । हमेशा निखरा तथा ताज़ा रहता है हुस्न।’


शिव के साथ कार में सफ़र करने का कोई सौदा नहीं था, यह तो एक प्रकार का प्यार था। मैं कार में लोगों को ढोने के हक में नहीं। सफ़र मेरे लिए बड़ी सूक्ष्म तथा आध्यात्मिक चीज़ है। यदि कोई यार साथ हो तो सौ मील का सफ़र मिनटों में कट जाता है। यदि कोई बोर आदमी साथ हो तो दो मील का सफ़र भी दो हज़ार मील लगता है।
एक दिन सुबह-सुबह शिव मेरे घर आया और कहने लगा, ‘आज शाम को कपूरथले में मुशायरा है। तुम मेरे साथ चलो।’

मैंने कहा, ‘मैं नहीं जा सकता। किसी और को ले जाओ।’
शिव ने कहा, ‘टैक्सी ले कर आऊंगा। अकेला। किसी और कंजर को मत बताना। चंडीगढ़ भरा पड़ा है मुफ़्तखोरों से। यूं ही साथ चल देंगे उठकर। मैं टैक्सी में सूअर को लाद कर ले जा सकता हूँ, परंतु किसी बोगस राईटर को नहीं। तुझे चलना पड़ेगा। मैं तुझे बीयर की तीन बोतलें तथा भुना हुआ मुर्गा खिलाऊंगा रास्ते में, साथ में तीस रुपए।’
मैंने कहा, ‘मेरा रेट पचास रुपए है।’ वह मान गया।

शिव को मुशायरे से पाँच सौ रुपए मिलने थे। प्रबंधकों ने यह बात छुपा रखी थी और चाहते थे कि शिव इस बारे में किसी और से बात न करे वर्ना दूसरे कवि नाराज़ हो जाएंगे।

पाँच सौ रुपयों में से शिव ने ढाई सौ रुपए टैक्सी के देने थे और शेष खर्च के लिए। शाम पाँच बजे वह टैक्सी ले कर आ पहुँचा। मुझे साथ लिया और टैक्सी भागने लगी।
शिव ने टैक्सी चालक से कहा, ‘सरदार जी, ज़रा इस कॉलोनी की तरफ गाड़ी घुमा दें। मुझे एक दोस्त से मिलना है।’
मैंने कहा – ‘पहले ही देर हो चुकी है।’
‘चिंता मत कर, दो मिनट ही तो मिलना है एक लड़की से। वह मेरी दोस्त है।’
टैक्सी कॉलोनी की सड़कों पर घूमती रही। शिव घर भूल गया था। न तो नंबर याद था, न गली। तीन-चार जगह टैक्सी रोक कर पूछा परंतु पता न चला। टैक्सी घूमकर मुड़ी तो नीम का एक पेड़ दिखा। शिव ने कहा, ‘बस यहीं रुकिए। यही है।’


टैक्सी से उतर कर उसने घंटी बजाई। एक युवती ने दरवाज़ा खोला। लंबे काले बाल, सुंदर नक्श।
शिव बोला, ‘थोड़ी देर के लिए आया हूँ। कहाँ है तेरा मियाँ ? ’
‘ड्यूटी पर गए हैं। कल लौटेंगे।’
‘अच्छा तो चाय पिलाओ मेरे दोस्त को। जानती हो न इन्हें ? ’
उसने मेरा परिचय करवाया।
वह चाय बनाने लगी। शिव जूतों सहित दीवान पर लेट गया।
मैंने इर्द-गिर्द नज़र डाली। दीवार पर एक बंदूक तथा कारतूसों की पेटी लटक रही थी। शायद किसी फौजी का घर था या वन विभाग के अधिकारी का। एक तरफ ऊंचे चमकते बूट।
वह चाय तथा बिस्कुट ले आई।

शिव ने कहा, ‘मैं चाय नहीं पीयूंगा। यह सिर्फ़ बलवंत के लिए है।’
वह आंगन में खेल रहे अपने बच्चे को ले आई। शिव ने उसके गालों को गुदगुदाया। फिर कहा – ‘मुझे मुशायरे में जल्दी पहुँचना है। तुम भी साथ चलो।’
उसने कहा – ‘मैं कैसे जा सकती हूँ। वे कल सुबह लौटेंगे।’ शिव ने लापरवाही से कहा- ‘कह देना शिव के साथ गई थी। तुझे वह कुछ नहीं कहेगा। अरे, शायर के साथ जा रही हो, किसी व्यापारी के साथ नहीं। चलो, जल्दी करो।’

यह कह कर शिव उठा और उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘शिव.... बस मेरा नाम ले देना, यूं ही मत डरो। चलो, जल्दी करो।’
मैंने सोचा, यह क्या बकवास किए जा रहा है। यदि कहीं इसके पति को पता चल जाए तो इसी बंदूक से दोनों को उड़ा देगा। मैं भी बीच में मारा जाऊंगा।
परंतु मैंने देखा कि वह महिला बच्चे को पड़ोसन के पास संभाल आई और शिव के साथ चल पड़ी। मुझे यह दृश्य अब तक नहीं भूलता कि वह खुले बालों की चोटी करती हुई शिव के साथ बैठी थी और टैक्सी कपूरथले की ओर भागी जा रही थी।
वहाँ पहुंचे तो साढ़े नौ बज चुके थे और मुशायरा चल रहा था।


यह मुशायरा गुरु नानक देव जी के पाँच सौवे प्रकाश उत्सव के उपलक्ष्य में था। प्रिंसीपल ओ. पी. शर्मा ने धूमधाम से यह मुशायरा रचाया था। स्टेज के पीछे शराब की छबील लगी हुई थी। शिव तथा मुझे देखते ही दो-तीन कर्मचारी आगे बढ़े। स्वागती आलिंगन किए और व्हिस्की के गिलास पेश किए। शिव ने पाँच-सात घूंटों में गिलास ख़त्म किया।
हम भीतर स्टेज पर गए तो शिव को देख कर पूरे हॉल में खुशी की लहर दौड़ गई और तालियों से सारा वातावरण गूंज उठा। दो-चार लड़कों तथा लड़कियों की जोशीली आवाज़ें भी सुनाई दीं।

स्टेज पर पच्चीस-तीस शायर विराजमान थे। इन में प्रो. मोहन सिंह, मीशा, साधु सिंह हमदर्द तथा बलराम भी थे। पाँच-छह कवियों ने हमारी उपस्थिति में कविताएं पढ़ीं तो उनकी विषय-वस्तु कुछ इस प्रकार थी – ‘बाबा नानक अब तुम मत आना। यहाँ रिश्वतें, झगड़े, बंटवारे, रगड़े। तुम मत आना।’ या फिर – ‘बाबा तुम आकर देखो देश में कितना भ्रष्टाचार है। गरीबों पर जुल्म होता है। लोग नंगे, भूखे फिरते हैं। तू आकर देख।’


मोहन सिंह ने अपने महाकाव्य ‘ननकायण’ में से नज़्म पढ़ी जिसमें वह तलवंडी की शाम का वर्णन करता है। सारी नज़में शाम, नाम, काम, धाम आदि शब्दों से भरी पड़ी थीं। मुशायरे में थकावट थी, ख़यालों का बुढ़ापा।
शिव उठा तो सारे हॉल में बेचैनी दौड़ गई। उसने नज़्म पढ़ी, सफ़र।
आँखें बंद कर, तथा बाँह ऊंची कर उसने माइक्रोफोन के सामने गुनगुनाया। नशीले धीमे स्वर लरज़े और लोगों के दिल की धड़कन की तारों को किसी ने मिज़राब से छेड़ा।
अचानक उसकी आवाज़ ऊंचे स्वरों में गूंजी। वह नानक को चुनौती दे रहा था। एक शायर दूसरे शायर से मुख़ातिब था। वह नानक से कह रहा था, ‘देख तेरी कौम में कितना सफ़र किया है, तुझसे आगे। यह आज पहुंची है नाम से तलवार तक।’


नाम से तलवार तक के शब्द गूंजे तो जवानों के सीने में सचमुच समूची कौम के निमन-चेतन की लालसाएं जाग उठीं। पूरे हॉल में शिव गूंज रहा था। उसका कद बहुत ऊँचा लग रहा था और उसकी आवाज़ में पैगंबरों वाला ओज़ था। लोगों में सिहरन पैदा करने की शक्ति, उन्हें रुलाने, जगाने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा।

हॉल में सन्नाटा था। बीच-बीच में हल्की सी आह निकलती थी। फिर जादूभरी मुग्धता। नज़्म ख़त्म हुई तो लड़कियों ने आवाज़ें दीं – ‘की पुच्छदे ओ, हाल फकीरां दा।’ शिव मु्स्कराया तथा नया मूड बनाने के लिए फिर से गुनगुनाया। नज़्म गाने लगा जो उसने सैंकड़ों बार गई थी और हर बार लोगों के दिल को छू गई थी । जब उसने ऊंचे स्वर में कहा –

‘तकदीर तां साडी सौकण सी
तदबीरां साथों न होईयां
न झंग छुटेया, न कन्न पाटे
झुंड लंग गिया, इंझ हीरां दा।’


हॉल में बैठे सभी लोग तड़प उठे। कॉलेज की लड़कियों के सीने में हूक उठी। वे हीरों का ही रूप थी। युवकों के सीने में साँपों ने डंक मारे क्योंकि वे सभी ऐसे रांझे थे जो कान नहीं पड़वा सके थे।


एक दर्द भरा माहौल छा गया। शिव तीन नज़में पढ़कर हटा तो कोई और शायर खड़ा न हो सका। समां टूट गया तथा मेला उजड़ गया।
शिव बाहर निकला तो उसने एक कर्मचारी से कहा- ‘कुत्तो, व्हिस्की क्या सिर्फ़ आते वक्त ही पिलानी थी ? गिलास लाओ।’


एक आदमी ने व्हिस्की का एक गिलास भर कर शिव को पकड़ाया और दूसरा मुझे। वहाँ एक मुंशी बैठा था जो शायरों को रुपए देकर रसीदें ले रहा था। उसने शिव को एक लिफ़ाफ़ा थमाया और रसीदी टिकट पर उसके दस्तखत ले लिए। शिव ने नोट गिने बिना ही लिफ़ाफ़ा जेब में डाल लिया।
हम तीनों बाहर निकले तो ओ. पी. शर्मा ने कहा कि डिनर की व्यवस्था उसके घर पर थी। सभी वहाँ चले गए।
शिव ने हामी भरी। हम इकट्ठे चल पड़े।
थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि शिव अंधेरे में कहीं गुम हो गया था।


सुबह मैं गहरी नींद में सोया पड़ा था, जब शिव ने आकर मुझे जगाया, ‘उठो अब वापिस चलें चंडीगढ़। उसे भी रास्ते में छोड़ना है। हम टैक्सी में बैठे हैं जल्दी करो।’
मैं तैयार होकर बाहर आया तो शिव तथा वह महिला मेरा इंतज़ार कर रहे थे। टैक्सी वापिस दौड़ने लगी। उसी कॉलोनी में नीम के पेड़ के पास रुकी। शिव तथा उसकी दोस्त बाहर निकले। घर के सामने जीप खड़ी थी।
वह बोली, ‘वे आ गए हैं।’
शिव ने कहा, ‘चल अंदर चलें। बलवंत, तुम भी आ जाओ।’
मैंने अंदर जाने से इन्कार कर दिया। मुझे दीवार पर टंगी बंदूक याद आ रही थी, कारतूसों की पेटी तथा चमकते ऊँचे बूट। अभी ही कोई घटना घटने वाली थी।
शिव ने मुझे खींच कर कहा - ‘आ यार, दो मिनट लगेंगे।’
मैं दुविधा में था। इस पागल ने......
शिव की दोस्त आगे थी तथा हम दोनों पीछे। पता नहीं क्या होगा अब।
शिव ने अंदर घुसते ही मुस्करा कर कहा, ‘ले भाई संभाल अपनी बीवी। मैं ले गया था मुशायरे में।’
वह सुंदर सा युवक था। बोला - ‘आईए, बैठिए, चाय पीकर जाईएगा।’
शिव ने कहा, ‘हमें जल्दी में हैं। हम चलते हैं।’ उसने झूमते हुए उसका आलिंगन किया और फिर हम चंडीगढ़ के लिए रवाना हुए।
मैं शिव की बेबाक कशिश पर चकित था और महिला की दिलेरी पर।

शिव एक संकल्प था, सृजनात्मकता का प्रतीक, एक ऐसी शक्ति जो शारीरिक होते हुए भी आध्यात्मिक थी।

० ० ०

मैंने गुरु नानक देव पर लाईट ऐंड साउंड ड्रामा लिखा। इस नाटक के प्रदर्शन की रुप-रेखा तैयार की। इसके गीत शिव ने लिखे। वह एक महीना मेरे घर रहा। हम दोनों जन्म साखियों को पढ़ते तथा नाटक की बाणी के एक-एक शब्द का रसपान करते। शिव सुबह चार बजे उठ बैठता। रोज़ दो-तीन गीत लिखकर मुझ जगाता – ‘ले सुन।’

नानक के जन्म पर लिखा गीत उसने गाकर सुनाया –

‘हरिया नी मांए, हरिया नी भैणे।
हरिया ते भागी भरिया।
मेरे हरे दे चंद सूरज हाण......।’


इस जन्म पर तारे मिठाईयां बाँट रहे हैं । धरती उसक दाई......।


वह गा रहा था और मेरी आँखों में आँसू थे। उसने नानक के घर से चले जाने का गीत लिखा। किस प्रकार माता तृप्ता तथा सुलखणी नानक के बिछोड़े का संताप झेलती हैं। शिव ने ऊँची आवाज़ में सहराई के स्वरों में गाया -


‘इक दे सिर दा साँई चल्लिया
इक दी अक्ख दा नूर।
इक दे थण विच विरहा रोवे
इक दी माँग संधूर।’


उसने कहा, तुम सो रहे थे। मैंने सोचा एक नज़्म और लिख लूं। एक ग्रामीण लड़की कहती है –


‘कोठे चढ़ के कत्त लग्गी
आ पूणी नूं आग्ग पई
पट्टां दे विच्च पींघां पईयां
हुस्न जवानी रज्ज गई
सावे टोभे दे शीशे दी
चिप्पर-चिप्पर भज्ज गई।’


शिव ने यह नज़्म मुझे दिखाई। इसमें दो-चार पंक्तियां काटी हुई थी। ये पंक्तियां भी उसने काट दी थी –

‘खेतां विच्चों सूरज-रंगी
टौरे वाली पग गई।’

वह कई बार खूबसूरत पंक्तियां तथा अलंकार काट देता। ऐसी पंक्तियां जो कोई दूसरा शायर नहीं लिख सकता, शिव आसानी से लिख डालता। उसके शब्दों की सजावट में चमत्कार था, नाटकीयता थी। दो अलग शब्दों को तथा चित्रों को अजीब तरह से जोड़ता था। उसने बिंबों तथा प्रतीकों का ऐसा प्रयोग किया कि वे उसके नाम साथ ही जुड़ गए। किसी की हिम्मत नहीं थी कि ‘भट्ठी वालीए’ या ‘कंडियाली थोर’ या ‘सप्पणी’ या ‘चंदरे रुख’ या ‘पुठड़े तवे’ जैसे शब्दों का प्रयोग करे।

यदि वह प्यार का गीत लिखता या खुशी का तो उसी वक्त कब्रों या मृत्यु के विषय में भी गीत लिखता था। नानक पर रहस्यवादी कविता के बाद उसी वक्त उसने ‘उधाले’ पर नज़्म लिखी। वह ‘अलख़ बछड़ी’ की बात करता है जो सौ खूंटे उखाड़ कर भागी जाती है। एक में कहानी, नशा तथा वैराग्य है, दूसरी में जिस्म का शूकता वेग तथा वर्जित प्यार। शिव बहुपक्षीय तथा बहुमुखी कवि था।

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लंदन में उसे बी.बी.सी वालों ने कहा, ‘तुम ग़म के शायर हो, इसे बारे में कुछ बताओ।’
शिव ने कहा, ‘काहे का ग़म ? मुझे कोई ग़म नहीं। मुझे कोई ग़म नहीं, मज़े से शराब पीता हूँ। महबूबाओं ने प्यार दिया। बेशुमार लड़कियों ने इश्क किया। काफ़ी रुपया है। यार, दोस्त हैं। नेक बीवी है। काहे का ग़म। मुझे कोई ग़म नहीं। मैं ग़म की कविता लिखता हूँ हँसकर। मुझे अपना कोई ग़म नहीं। दुनिया का ग़म अवश्य मेरे भीतर है। जो शायर निज़ी ग़म का रोना रोते हैं, उनकी कविता फीकी होती है।’

जब मैं लंदन गया तो लोग महफ़िलों में उसकी बातें करते थे। गलासगो गया तो उसकी बात। टोरांटो गया तो उसके बात तथा न्यूयॉर्क की पंजाबी महफ़िलों में भी उसी की चर्चा।
वह मृत्यु के बाद एक मिथक बन गया है – मंटो की भाँति, सहगल की भाँति। यदि किसी ने शिव के साथ खाना खाया, या बस में सफ़र किया या शराब पी या उसकी तिल्ले वाली चप्पल ठीक की या रेशमी कुर्ता सिला तो वह गर्व से शिव की बात करता है। ऐसी शोहरत तथा प्यार किसी विरले को ही नसीब होता है।

शिव ने अपनी मृत्यु अठाईस साल की उम्र ही निर्धारित कर ली थी। कोई शक्ति उसे मरने से नहीं रोक सकती थी। जब किसी का नाम ही शिव बटालवी हो तो उसकी मौत जवानी में ही लिखी होती थी। उसने अपनी कलम से अपना मरसिया खुद लिखा।

वह भरी जवानी में मरने का इच्छुक था। एक बार शराब पीकर नशीली आँखों से देखते हुए वह मुझसे कहने लगा – ‘मैं बूढ़ा होकर नहीं मरना चाहता। बुड्ढे की मौत बड़ी ज़लील चीज़ है। जापान के समूराई सूरमे अपने जिस्म को सुडौल तथा खूबसूरत बनाते हैं। जब जिस्म की खूबसूरती चरम पर होती है तब वे अपने पेट में तलवार घोंप कर हाराकेरी की रस्म अदा करते हैं और मौत की गोद में समा जाते हैं। चैरी का फूल पूरी तरह खिलता है और बड़ी शान से गिरता है। मरना कोई चैरी के फूल से सीखे।’

शिव ने अपनी मौत की फूलों से तुलना की है। उसने जवानी में मरने की खूबसूरती का वर्णन किया और इसकी रस्म भी पूरी की। चंडीगढ़ में हम अक्सर मिलते। वह सर्दियों में मलागीरी कोट तथा मफ़लर पहन कभी-कभी स्टेट बैंक आता। वहाँ से उठकर मेरे साथ। मेरे बहुत मजबूर करने पर भी वह कॉफी न पीता। उसके खून में शराब इस क़दर घर कर गई थी कि चाय या कॉफी उसे अच्छी नहीं लगती थी। सिर्फ़ शराब ही उसके शरीर को शीतलता दे सकती थी। कई बार वह बिना सोडे या पानी के शराब की शीशी में से सीधे तीन-चार घूंट भर लेता जिससे उसका मन शांत तथा एकाग्र हो जाता। उसमें रचना-शक्ति दौड़ने लगती। वह पहले से भी ज़्य़ादा नम्र हो जाता। उसमें बर्दाश्त करने की ग़ज़ब की शक्ति थी।

नए शायर, नौजबान इन्कलाबी शायर, प्रयोगवादी शायर उसके विरुद्ध बोलते। उसे सामाजिक चेतना से वंचित कहते। भला ऐसी कविता का क्या मतलब, जब कि मुल्क में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, भूख है, और शिव चाँद, सूरज और कच्ची कंध मले दंदासा की बातें करता है। वह समाज से कट गया है।

ऐसे कवि पत्रिकाओं में उसके विरुद्ध लिखते रहे तथा मंचों पर बोलते रहे परंतु कोई भी मुशायरा शिव के बगैर मुकम्मल नहीं होता था। कवि सम्मेलनों में लोग पहली बात यही पूछते कि इस मुशायरे में शिव आ रहा है या नहीं।

शिव अपनी बढ़िया कला तथा सृजन शक्ति के बारे सजग था। लोग उसे निराशावादी कवि कहकर बदनाम करते रहे। कुछ उसे वासना का कवि कहते। कई लोग उसके कविता में से तकनीक गलतियां निकालते रहे। कई उसकी नकल करके उससे बेहतर कवि होने का दावा करते रहे पर शिव शोल की भाँति जलता रहा और रौशनी बिखेरता रहा।

उसने कहा, ‘सारी प्रकृति एक दूसरे की निंदा तथा प्रशंसा है। हमारा जन्म ही निंदा तथा प्रशंसा के संभोग से होता है। मेरा सबसे बड़ा निंदक या प्रशंसक मैं खुद हूँ। अपनी पीड़ा की निंदा मैंने अपने गीतों से की और मेरे गीतों की निंदा लोगों ने की। इसकी वजह मेरी शोहरत के प्रति ईर्ष्या के सिवा कुछ नहीं। ईर्ष्या हमेशा घटिया को बढ़िया से होती है।’

उसके जीवित रहते मैंने उस पर कई लेख लिखे, उसकी कई कविताओं का उसे साथ बिठाकर अंग्रेजी में अनुवाद किया परंतु उसकी मृत्यु के बाद पंजाबी में कोई लेख नहीं लिखा। प्रशंसात्मक लेख लिखने का काम मैंने उसके निंदकों के लिए छोड़ दिया था, जो बढ़-चढ़कर रोने तथा मातमी गीत गाने के लिए तत्पर थे।

शिव की मृ्त्यु एक निज़ी ग़म भी था और समूचा ग़म भी। ऐसी पीड़ा कई बार इन्सान के अंदर ही रह जाती है।अब शिव को गुज़रे बारह साल हो गए हैं। उस की कविता, उसकी याद, उसकी उदास हँसी, टिप्पणियां तथा झिंझोड़ डालने वाले गीत उसी तरह ताज़ा हैं। वह लंदन में पाँच-छह महीने रहकर वापस आया तो मैं उससे मिलने गया। 21 सेक्टर में उसने मकान बदल लिया था।

वहाँ पहुँचा ते देखा कि शिव के ड्रॉइंग रूम में गोल-मटोल रबड़ की फूली हुई कुर्सियां थी। कुछ विदेशी चीज़ें। उसका प्रशंसक तथा शिष्य दीपक मनमोहन भी वहीं बैठा था। एक लंबी लड़की किचन में रोटी बना रही थी, उसकी प्रशंसक। अरुण भी खुशी से काम कर रही थी। घर में खुशहाली थी।

शिव बातें करने लगा तो मैंने देखा कि वह उन छह महीनों में बदल गया था। उसके कपोल भर गए थे तथा उसके चेहरे पर धुएं जैसी एक छाया सी थी। मैं सोचता रहा कि क्या वह ज़्यादा सेहतमंद हो गया था या बीमार।

उसने कहा, ‘ये देख रबड़ की कुर्सियां। लंदन से लाया हूँ ये। इनमें हवा भरो और चाहे एक मन की औरत बैठ जाए, चाहे बारह मन की धोबिन....बड़ी देर हो गई बाईस्कोप देखे.... दिल्ली का कुतुबमीनार देखो, आगरे का ताज देखो, बारह मन की धोबिन देखो.....ये लोग कहाँ चले गए ?’

मैंने कहा, ‘लंदन की कोई बात सुना। क्या हाल है वहाँ के लोगों का ?’
‘सब पौंडों (पाउंड) के भूखे हैं । हर कोई शायर तथा लेखक। उन्होंने बर्तानिया को फ़तेह कर लिया है। वे पंजाब से आए लेखक की सेवा भी करते हैं और उससे नफ़रत भी। मुझे वहाँ पाकिस्तान की शायरा ... सर मुहम्मद इकबाल की पोती....बहुत खूबसूरत लड़की मुझ पर फिदा हो गई.....उसकी चिट्ठियां....और तीन चार और लड़कियों का....मैंने अचार डालना है इन लड़कियों का......शराब पिलाते मुझे तथा मेरे गीत सुनते...मैंने कह दिया था कि मैं पाँच सौ पाउंड लूंगा। एक शाम का.....और उन्होंन पैसे दिए.....घुटने टेककर। मैं तो शायर हूँ.....शिव......उनका बाप.... पर वह लड़की सायरा बानो....या नसीम बानो मुझ पर फिदा हो गई......पर मुझे क्या परवाह....मुझे घर याद आ रहा था...अरुण....बच्चे.....व्हिस्की .....मेरा बेटा......।’

इन टूटे-फूटे शब्दों नें शिव की सारी मानसिक स्थिति बयां कर दी। टुकड़े हुआ दिल...काँपते शब्द तथा बेढंगे वाक्य....इनमें अंदरूनी तर्क था। वह इस तरह बोल रहा था जैसे मुझे नहीं किसी और से कह रहा हो।

कई दिनों बाद पता चला कि शिव बीमार है। मैं उसे मिला तो उसकी बातें और भी उखड़ी हुई तथा बेतुकी थीं। मुझे अब तक याद है उसका धूंसर चेहरा तथा बुझी आँखें।

वह ज़िदगी से निराश हो गया था। निराशा के गहरे कुँए में डूब कर उसने कई ऐसी कविताएं लिखीं जो समूची परंपरा के विरुद्ध थीं। इनमें एक अजीब दिव्य-दृष्टि थी जो कई बार उस इन्सान में आ जाती है जो मृत्यु को देख रहा हो। जिसे किसी का डर न हो। जो अंधेरी कोठरी में छत फाड़ने वाली चीख़ मार सके ताकि सोए पड़े लोग जाग सकें। इसी मानसिक अवस्था में उसने कविताएं रचीं – कुत्ते, फाँसी, लुच्ची धरती। वह धरती को माता कहते-कहते थक गया था। इसके अलावा वह देख रहा था कि पाखंडी तथा हर प्रकार का साहित्यिक और राजनीतिक व्यक्ति धरती को माँ कह कर लूट रहा था। शिव ने धरती को ‘लुच्ची’ कह कर अपने इर्द-गिर्द को चौंकाया। परंपरागत नमस्कार को त्याग कर धरती गो क्रोध से लुच्ची कहा – जैसे कोई जवान बेटा अपनी माँ को गाली दे।

लोगों ने शिव को गालियां दी। शिव और क्रोधित हो गया तथा कहने लगा, ‘बेवकूफों ! कुत्तो मेरी बात सुनो। मैं सच कह रहा हूँ। मेरी बात सुनो।’
कई लोगों ने उसे ललकारा तथा कहा कि उसकी विचार-धारा उलटी है। शिव ने कहा – ‘हाँ, मैं उलटा हूँ – शीशे की भाँति आपका अक्स हूँ, जो आपको उलटा लगता है।’

धीरे-धीरे शिव अपने भीतर ही भीतर धंसता गया। लोगों ने जो कहा, उसी तरह का बन कर दिखाने की ज़िद में और भी बातें करने लगा, जिनमें हक़ीक़त की चिंगारियां थीं। कईयों ने कहा - शिव बतौर शायर मर गया है। वह बिलकुल मर गया है। शिव मरने के लिए तैयार हो गया।
मुझे पता चला कि शिव अस्पताल में है और मुझे याद कर रहा है। मैं अस्पताल गया तो वह प्राईवेट कमरे में चारपाई पर पड़ा था। दवा की शीशियां, अस्पताल की अजीब सी बू तथा घुटन। उसके पैरों की तरफ वही लंबी सुंदर युवती बैठी थी जो उसके घर रोटी बना रही थी।
एक रात वह अस्पताल से निकल कर चला गया। मैं अस्पताल में नहीं मरना चाहता। उसे फिर से अस्पताल में दाखिल किया गया। उसकी हालत बिगड़ती गई।

बिस्तर पर पड़ा वह कई बार ज़ोर-जो़र से रोता और आवाज़े लगाता – ‘मैं मर रहा हूँ। कहाँ है मेरे यार दोस्त ?  कुत्तो मैं जा रहा हूँ। ढूंढोंगे शिव को !’

उसके अधिकतर दोस्त व्यस्त थे। किसी के पास वक्त नहीं था। साहित्य समारोह हो रहे थे। भाषण चल रहे थे। कॉफी हाउस में लेखकों, अध्यापकों तथा अख़बार वालों का जमघट लगा रहता था। उनके पास वक्त नहीं था कि शिव से मिलने जाएं।

मुझे एक शाम संदेसा मिला कि शिव मुझे याद कर रहा है। उसने मुझे फौरन मिलने के लिए कहा क्योंकि वह चंडीगढ़ छोड़ कर अगली सुबह बटाला जा रहा था। चंडीगढ़ उसे रास नहीं आया था। वह सेक्टर 21 के मार्केट के पिछवाड़े एक दोस्त के घर ठहरा हुआ था, जिस का पता मैंने नोट कर लिया था।

रात हो चुकी थी। सोचा सुबह उसे मिलने जाऊंग। मुझे डर लगा कि वह कहीं मुझे बिना मिलो न चला जाए। एक अजीब ख़ौफ़ तथा बेचैनी मेरे भीतर थी कि यदि वह बटाला चला गया तो पता नहीं कब मुलाकात हो।

मैं सुबह साढ़े पाँच बजे उठा, कार स्टार्ट की और सेक्टर 21 के उस पते पर गया। लोग सोए हुए थे। तीन मंजिले मकान शांत थे। मुझे वह मकान ढूंढने में कुछ समय लग गया। घबराहट बढ़ती गई।

अंत में जब मकान मिला तो पता चला कि शिव आधा घंटा पहले वहाँ से चला गया था।
मैंने पूछा – ‘कहाँ ?’
‘बटाला।’
मैंने फौरन कार घुमाई और बस अड्डे पर गया। बटाला जाने वाली बस का पता किया। आधा घंटा बस अड्डे पर घूमता रहा। शिव जा चुका था।

फिर पता लगा कि शिव अपनी बीवी तथा बच्चों सहित टैक्सी में बटाला गया था। उसकी हालत बहुत ख़राब थी। उसने टैक्सी को सेक्टर 22 के बत्तियों वाल चौंक पर रोका, जहाँ शाम को दोस्तों के साथ लोहे के जंगले के पास खड़ा होता था। उसने टैक्सी का दरवाज़ा खोला। नफ़रत से थूका और कहा – ‘कभी नहीं आऊँगा मैं इस कुत्ते शहर में।’

चंडीगढ़ पत्थरों का शहर था, बटाला लोहे का। दोनों शहरों ने उसे प्यार दिया, शिव ने इन शहरों को गीत दिए। दोनों शहरों को उसने प्यार भी किया और नफ़रत भी।
बटाला वह कुछ ही दिन रहा। फिर अरुण के साथ अपने ससुराल के गाँव चला गया जो पठानकोट से पंद्रह मील दूर पहाड़ के क़दमों में है।

यहाँ हरियाली थी, छोटे घर थे, खेत थे। शिव इस घर के चौबारे में रहा जहां अत्यंत गर्मी थी।
रात को उसे नींद न आती। कई बार वह आवाज़े देता और रोता। ‘मैं अकेला हूँ लोगों। मैं अकेला रह गया। कहाँ हैं मेरे यार ? ’

दूर खेतों में गीदड़ रोते और भांय-भांय करती रात में शिव की आवाज़ें खो जातीं। 6 मई, 1973 की रात को शिव की आत्मा सदा के लिए सो गई।





पंजाबी से अनुवाद – नीलम शर्मा 'अंशु'

गुरुवार, नवंबर 07, 2013

(पंजाबी के जाने-माने लेखक बलवंत गार्गी साहब ने अलग-अलग क्षेत्रों की शख्सीयतों पर रेखाचित्र लिखे हैं, यहाँ प्रस्तुत है रेशमा पर लिखा उनका बेहद प्यारा सा रेखाचित्र ।)

रेशमा

                                                                             0   बलवंत गार्गी

                       पंजाबी से अनुवाद    :         नीलम शर्मा अंशुÖ


          पिछले साल रेशमा अचानक पाकिस्तान से नई दिल्ली आई। किसी को इस विष्य में पता नहीं था। बस, राजकुमारी अनीता सिंह को बंबई से फोन आया कि पाँच बजे प्लेन पहुँच रहा है, वह रेशमा को एयरपोर्ट पर मिले
      कपूरथले के शाही घराने की राजकुमारी अनीता सिंह राजा पद्मजीत सिंह की लाडली बेटी है। मोटी स्याह आँखें, घने काले स्याह बाल, चंपई रंग, वह दिल्ली की सांस्कृतिक महफ़िलों की शान है। हर बड़ा संगीतकार तथा गायक – विलायत खां, रवि शंकर, किशोरी अमोनकर, परवीन सुल्ताना, मुनव्वर अली खां, पाकिस्तान से आए गुलाम अली तथा तुफैल नियाज़ी – अनीता सिंह के घर की महफ़िलों में विराजते रहे हैं। हर बड़ा गाय़क जो राजधानी में आता है, अनीता सिंह आवभगत  तथा संगीत महफ़िलों को सजाने में आगे रहती है।
      अब रेशमा आ रही थी।
     रेशमा का जब पहला रिकॉर्ड हाय ओ रब्बा, नहींओ लगदा दिल मेरा 1969 में लंदन की मार्फत हिंदुस्तान आया तो चारों तरफ आग सी फैल गई। ऐसी आवाज़ जिसमें जंगली कबीले का हुस्न तथा हृदय-स्पर्शी हूक थी, कभी किसी ने नहीं सुनी थी। इसमें पंजाब की आत्मा गूंजती थी। जो भी रेशमा के गीत को सुनता दिल थाम कर बैठ जाता। उन्हीं दिनों शिव कुमार बटालवी ने मुझसे पूछा – तूने सुना है रेशमा का गीत? नस्स गई सप्पणी रोवे सपेरा, हाय ओ रब्बा नहीं ओ लगदा दिल मेरा।” शिव ने यह गीत अपनी आवाज़ में सुनाया। इसमें अजीब विलाप तथा दर्द था।  
     उसके रिकॉर्ड के टेप बने तो टेप की नकल तथा टेप दर टेप की नकल द्वारा लाखों घरों में रेशमा का गीत पहुँच गया। रेशमा की आवाज़ में इतनी शक्ति तथा ओज़ था कि असली गीत की नकलों में भी जादू भरी कशिश नहीं टूटी थी। 
          अनीता सिंह से पता चला कि रेशमा अचानक ही करांची से बंबई आई। दिलीप कुमार को पता चला तो वह कार लेकर उसके छोटे होटल में मिलने गया तथा कहा – रेशमा मैं तो तुम्हारा फैन हूँ।
      दिलीप कुमार ने रेशमा तथा उसके दो रिश्तेदारों का होटल सी रॉक में ठहरने का प्रबंध कर दिया। उसके सारे खर्चों की जिम्मेदारी ली। रात को उसने पाली हिल के सामने अपने बंगले में रेशमा के लिए एक पार्टी दी, जिसमें बहुत से फ़िल्म स्टार तथा संगीत निर्देशक शामिल हुए। सायरा बानो बड़ा थाल लेकर लोगों को मिश्री बाँट रही थी। सायरा बानो की माँ नसीम बानो जो कभी अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर थी तथा जिसने फिल्म पुकार में हीरोईन का रोल किया था तथा जिसे परी चेहरा नसीम कहा जाता था, इस पार्टी में रेशमा को सुनने के लिए उतावली बैठी थी। नसीम बानो की माँ शमशाद बाई जो 1930-32 में मशहूर गायिका थी तथा शमियां के नाम से मशहूर थी, लाठी टेकती हुई बूढ़ी नानी के रूप में रेशमा की आवाज़ सुनने के लिए बैठी थी।    

     रेशमा गा रही थी तथा फ़िल्म जगत के सुपर स्टार बार-बार वाह-वाह करके उसके सदके जा रहे थे। इसके बाद अमज़द खान ने रेशमा के लिए बहुत बड़ी पार्टी दी। उसके पश्चात् राज कपूर ने अपनी मशहूर कॉटेज में दावत दी जिसमें कपूर खानदान तथा अन्य फ़िल्मी सितारे मौजूद थे। रेशमा इन सुपर स्टारों की स्टार थी।
          रात तीन बजे तक रेशमा गाती रही। राजकूपर बार-बार अपने सीने पर मुक्के मार रहा था और कह रहा था  - हाय ओ रब्बा, कुर्बान जाऊँ.....हाय ओ रब्बा  उसकी आँखों में खुशी तथा दर्द की झलक थी।  
          क्या ऐसी आवाज़ सचमुच ज़िंदा थी ? क्या कोई रेश्मा सचमुच ही मौजूद थी ?  क्या यह हक़ीकत थी?
      मैं सब बातें सोच रहा था।
      एक दिन तीन बजे अनीता सिंह का फोन आया कि फौरन चले आओ। रेशमा को साढ़े चार बजे कहीं जाना था। यही वक्त था उससे मिलने का।
        मैं दस मिनट में ज़ोर बाग के गेस्ट हाउस पहुँचा। कैमरा, टेप रिकॉर्डर साथ ले गया था क्योंकि शायद मुझे  दोबारा ऐसा मौका नसीब न हो कि मैं इस जादूभरी खानाबदोश से मिल सकूं।
      दरबान ने मेरा नाम पूछा तथा कमरे की तरफ इशारा किया कि मैं भीतर चला जाऊँ।
      मैं कैमरा बाहर ही छोड़ गया। कैमरा हाथ में हो तो ऐसा लगता है मानो कोई बंदूक उठाकर किसी जोगन के दर्शनों के लिए जाए। मुझे बताया गया था कि रेशमा कैमरे तथा टेप रिकॉर्डर से घबराती है।
          दस्तक देकर भीतर प्रवेश किया तो देखा वह पलंग पर बैठी पान खा रही थी। उसकी नाक में हीरा जड़ा लौंग था, कलाई पर सोने का मोटा कड़ा तथा पाँवों में पाजेब। सिर पर सितारों जड़ा हरा दुपट्टा, खुली कमीज़ और चौड़े पहुँचों वाली सलवार।
          एक तरफ दो आदमी बैठे थे, सलेटी रंग की सलवार तथा कुर्ता पहने उसके रिश्तेदार, जो कि पाकिस्तान से उसके साथ आए थे। अनीता सिंह साथ वाली चारपाई पर बैठी थी।       
      मेरे बारे में अनीता सिंह ने पह्ले ही रेशमा को बता दिया था। रेशमा मुझे देखकर खड़ी हो गई तथा उसने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए। मैंने आदर से उसके हाथों को पकड़ा तथा झुक कर कहा,  बहुत खुशी हुई आपसे मिलकर।
       'तशरीफ़ रखिए,' उसने कहा।
      उसके पहले शब्द ही गूंजमय थे। हम बातें करने लगे।
      रेशमा का बदन गठीलानैन-नक्श तीखेआँखें भूरी थीं जो रेगिस्तान में रहने वालों की होती है।
      उसके होठों पर खानाबदोशों का खुला अंदाज़ थाखुला-डुला स्वभाव जिस पर आधुनिक संस्कृति का कोई मुलम्मा नहीं था।
    उसे देखकर तथा मिलकर अहसास हुआ जैसे मैंने इस महिला को कई बार देखा है। उसकी शोहरत का शाही रोआब फ़ौरन ही मिट गया तथा वह हृष्ट-पुष्ट शरीर वाली सिकलीगरनी प्रतीत होने लगी।
     कुछ रस्मी बातों के पश्चात् उसने पूछा - क्या पीएंगे ठंडा या गर्म ?
      मैंने कहा -  ठंडा।
    उसने पलंग पर बैठे-बैठे ही नौकर से कहाबलवंत जी के लिए विमटो लाओ।
      अनीता सिंह ने कहा - विमटो नहीं लिमका।
      रेशमा ने शायद बचपन में किसी मेले में विमटो पीया होगा या सुना होगा। उसे कोका कोलालिमकाफैंटा आदि सब विमटो ही प्रतीत हो रहे थे।
      मैंने पूछा -  आपने गाना कहाँ से सीखा?
       अल्लाह ने दिया है।
     मेरा मतलब है आपकी आवाज़ इतनी मंजी हुई हैयह बिना सीखे या रियाज़ के संभव नहीं।
       ‘अल्लाह जानता है मैंने कहीं से नहीं सीखा। हम बीकानेर के रहने वाले हैं.... राजस्थान केरेगिस्तान के। रतनगढ़ का नाम सुना होगा आपनेउससे तीन मील दूर हमारा गाँव था। मेरा बाप घोड़ों तथा ऊँटों का व्यापार करता था। हम बंजारे हैं। आज यहाँकल वहाँ जब हमारा काफ़िला चलता तो जहाँ रात हो जाती हम वहीं डेरा डाल लेते तथा तारों के नीचे सो जाते। हमारे कबीले के पंद्रह बीस परिवार थे तथा डेढ़-दो सौ प्राणी। सभी इकट्ठे ही चलते रहते तथा आपस में शगुनों और त्योहारों को मनाते। एक ही साथ चार-चार मील का लंबा सफ़र। पैदल। रेत में। बीकानेर से बहावलपुरमुलतानसिंधहैदराबाद। ऊँटों की घंटियां बजतीं तथा मैं ऊँची आवाज़ में गाते हुए मीलों तक चलती जाती। खुली फ़िज़ा में गाने का अपना ही मज़ा है। अल्लाह आपके साथ होता है।
      ‘ मैं बीयावान तथा एकांत में गाने की अभ्यस्त थी। मैं बंद कमरे में बैठकर गाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। मैंने कोई रियाज़ नहीं किया। रियाज़ करने से क्या होता है। यदि आपके भीतर सुर न हों तो सारी उम्र रियाज़ करते रहने से भी कुछ नहीं बनता। यह अल्लाह की देन है। जिसे चाहे बख्श दे।
      थोड़ी देर रुक कर कहाअल्लाह जानता है मुझे नहीं मालूम कि मैंने कब गाना शुरू किया। बचपन से ही शौक था।  मेलों में हम ऊँट तथा घोड़े बेचने जाते तो वहाँ मैं कव्वालियां सुनती या कोई खेल या तमाशा हो रहा होता तो उसके गीत सुनती। मैं सोचा करतीरेशमा ये लोग कितना अच्छा गाते हैं। भगवान करे रेशमा तू भी इस तरह गा सके। तेरा भी कभी नाम हो। मैंने सुन-सुन कर गाना सीखा। चलते-फिरते रेगिस्तानों की धूल छानती मैं ऊँची आवाज़ में गाती थी। क्या पता था किसी दिन एक बंजारन लंदन के बड़े स्टुडियो में गाएगी तथा न्युयॉर्क में प्रोग्राम करेगी। मैं अल्लाह की शुक्रगुज़ार हूँ। मेरे गले में अल्लाह का वास है। मेरी साँसों में उसकी साँस हैं उसका करम तथा उसी का फज़ल।
    रेशमा की कहानी अब सबको मालूम है। उसके पूर्वज राजस्थान के रहने वाले हैं। एक बार उनका काफ़िला पेशावर उतरा तो वहाँ ही रेशमा का जन्म हुआ।  देश के विभाजन के समय उसकी उम्र दो साल थी। वह खेमों तथा काफ़िलों में जवान हुई। वह इक्कीस साल की थी जब उसने अपने भाई की मन्नत माँगी। उनका काफ़िला हैदराबाद सिंध गया तो वह सेवन गाँव में शाह कलंदर की मज़ार पर गई। वहाँ उसने कव्वाली गाई। कव्वाली के बोल तथा धुन उसने खुद ही बनाई थी और बोल थे - दमा दम मस्त क्लंदर। इस  अवसर पर श्रद्धालुओं में पाकिस्तान रेडियो के डायरेक्टर सलीम गिलानी भी मौज़ूद  थे। सलीम गिलानी यह आवाज़ सुनकर हैरान रह गए तथा उन्होंने कहा - तुम बहुत अच्छा गाती हो। क्या नाम है तुम्हारा ?  रेशमा ने अपना नाम बताया तो सलीम गिलानी ने पूछा, रेडियो पर गाओगी ?  रेशमा ने कहामुझे नहीं पता। गिलानी ने अपना कार्ड तथा पता दिया और कहा कि उसके परिवार के सभी सदस्यों का खर्च पाकिस्तान रेडियो देगा यदि वह करांची जाकर रेडियो पर गाए। रेशमा ने अच्छा कहकर कार्ड अपने कुर्ते की जेब में  डाला।
      इसके बाद उनका काफ़िला चल पड़ा।  दो वर्षों के पश्चात् घूमता-घुमाता काफ़िला मुल्तान पहुँचा। रेशमा के अब्बा तथा माँ के परिवार के लोगों ने सोचासुना है करांची शहर बहुत सुंदर तथा बड़ा है। वहाँ चलें तथा चल कर शहर देखें।
      वे करांची आए तो रेशमा ने सलीम गिलानी का पुराना कार्ड निकाल कर रेडियो का पता किया। पूछते-पूछते वे लोग रेडियो देखने आ गए।  वहाँ दरवान ने भीतर नहीं जाने दिया।  बहुत मिन्नतें कीं तथा कहा कि उसे सलीम गिलानी ने बुलाया है। एक कर्मचारी ने पूछा – कब ?  दो साल हो गए रेशमा ने कहा। वह कर्मचारी बोला - बहुत जल्दी आ गए आप लोग।  कुछ लोग हँस पड़े।  आख़िर रेशमा तथा उसका परिवार सलीम गिलानी से मिला तो वे रेशमा को देखकर बहुत खुश हुए।  रेशमा को स्टुडियो में ले जाकर गाने के लिए कहा तो रेशमा बोलींमैं तो मज़ार पर ही गा सकती हूँ तथा उसी तरह गाऊंगी।
      रेशमा के कई गीत रेडियो डायरेक्टर ने रिकॉर्ड कर लिए। एक फोटोग्राफर ने रेशमा की फोटो भी ले ली। इस पर वह नाराज़ हो गई तथा अपने काफ़िले के साथ चली गई।
      रेशमा के गीत ब्रॉडकास्ट हुए तो सारे पाकिस्तान में उसकी आवाज़ की शोहरत फैल गई। इस आवाज़ में अजीब दर्द थाएक पीड़ाफिज़ा में गूंजती जादुई कशिश।
      पर रेशमा का पता न चला कि वह कहाँ है। उसका न कोई घर थान पतान पक्का ठिकाना। काफ़िला चलता गया तथा रेशमा अपनी शोहरत से बेख़बर थी।
      फिर सलीम गिलानी की तरफ से एक इश्तहार छपा जिसमें रेशमा की तस्वीर थी कि जो कोई इस लड़की की ख़बर देगा उसे दो हज़ार रुपए इनाम मिलेगा। रेशमा की तस्वीर बहुत सी पत्रिकाओं में छपी।
      जब रेशमा का काफ़िला चलते-फिरते फिर मुल्तान आया तो वहाँ उसने एक पत्रिका में अपनी तस्वीर देखी। वही दुपट्टावही झुमके। रेशमा ने पूछताछ कीक्योंकि वह खुद पढ़ना नहीं जानती थी। लोगों के कहने पर रेशमा ने उर्दू में एक चिट्ठी सलीम गिलानी को लिखवाई। कबीले के लोग रेशमा की फोटो देखकर नाराज़ हुए कि उनकी बेटी की तस्वीर क्यों बाज़ारों में बिक रही थी। थोड़े दिनों के पश्चात् सलीम गिलानी का जवाब आया तथा उसने फिर रेशमा से रेडियो पर गाने के लिए अनुरोध कियारेशमा मान गई।

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      जोर बाग के गेस्ट हाउस में बैठ बातें करते हुए रेशमा ने मुझसे कहा : बलवंत जीमैं तो बंजारन थी। खद्दर थीलोगों ने रेशमा बना दिया। आप जैसे भाईयों तथा बहनों की शुक्रगुज़ार हूँ। मैं पाकिस्तान की शुक्रगुज़ार हूँ जिसने मुझे रेगिस्तान में से ढूँढ कर रेशमा बना दिया। आप सुनेंगे कुछ मेरे पास बाजा नहीं है। मैं यहाँ गाने नहीं आई।  अपने रिश्तेदारों से मिलने आई हूँ। कुछ बंबई में हैं, कुछ दिल्ली में और बाकी मेरे गाँव रतनगढ़ के  नज़दीक हैं। मेरे अब्बा ने कहा था कि मैं अपने गाँव ज़रूर जाऊं। जी चाहता है उस जगह को देखूं जहाँ मेरे दादे तथा परदादों की कब्रें हैं.....उस रेत को छूने को जी चाहता है जहाँ वे सोये पड़े हैं.....उसी सहरा में साँस लेने के लिए मैं पैंतीस सालों बाद पहली बार हिंदुस्तान आई हूँ तथा यहाँ आकर मुझे बहुत प्यार मिला है। बंबई में दिलीप कुमार साहब को मिलने को जी चाहता था और वे मेरे छोटे से होटल में आए तथा मुझे साथ ले गए। राज कपूर साहब का जवाब नहीं। उनके बेटे ने मुझे अपनी नई फ़िल्म दिखाई। क्या नाम है उनके बेटे का और अमज़द खान, कल्याण जी आनंद जी तथा और बहुत सारे लोग। किस-किस का नाम लूँ तथा राजकुमारी अनीता मेरी देखभाल कर रहीं हैं यहाँ    दिल्ली में। यह मेरी बहन है...मैं यहाँ रिश्तेदारों से मिलने आई हूँगाने नहीं आई। मैं हज़रत निज़ाम-उ-द्दीन औलीया की दरग़ाह पर गई। उनके हजूर में हाज़िरी भरी। न्याज़ बाँटी। चादर चढ़ाई। हज़रत अमीर खुसरो के दरबार में भी गई। कल मैं ग़ालिब से मिलने गई थी। बड़ा सकुन मिला। बड़ा प्यार मिला। बस, तीन-चार दिनों में मैं अजमेर शरीफ़ जाऊंगीग़रीबनवाज़ के दरबार में हाज़िरी भरने तथा न्याज़ बाँटने। मुझे पीरों-फकीरों तथा औलवियों में श्रद्धा है। जब मैं गाती हूँ तो उनका साया मेरे सर पर होता है।
      मैंने कहा, ‘रेशमा जब तुम हीर गाती हो तो शुद्ध भैरवी होती है।
      उसने कहा,  ‘आपको भैरवी पसंद है न यहाँ मेरे पास बाजा नहीं है। हम कोई साज़ भी तो नहीं लेकर आए। चलो बिना बाजे के ही सही। 
      उसने सुर लगाया तथा वारिस शाह की हीर के ये बोल गाने लगी :-
     
 हीर आखिया जोगिया झूठ आखें
 कौन रुठड़े यार मनांवदा ई।
हीर ने कहाजोगी तुम झूठ बोलते होकौन रूठे यार मनाता है।)

      कमरा उसकी आवाज़ से गूँज उठा।  दो बार फोन की घंटी बजीएयरकंडीशनर की आवाज़ भी थीपर रेशमा की आवाज़ इनसे ऊपर की फ़िज़ा में ऊँचे गुंबद तथा मीनार बना रही थी। उसकी आवाज़ में सहरा की अज़ान थीएक चुंबकीय शक्ति। उसका चेहरा पिघल गया तथा हसीन हो गया। उसकी आवाज़ को सिर्फ मेरे कान ही नहीं सुन रहे थे बलकि मेरे जिस्म का हर रोम छिद्र इसे मह्सूस कर रहा था।
    इस आवाज़ में क्या था इसमें काले नाग थे - एक अजीब ज़हरीली कशिश जो मुझे डस रही थी। कभी सर से पाँवों तक झुनझुनी सी दौड़ जाती। एक तपिश आ रही थी आवाज़ में से।
    यह गीत भैरवी में था। वह कह रही थीकौन रुठड़े यार मनांवदा ई। उस ने हृदय-स्पर्शी सुर लगा कर कहा :-           
देवां चूरीयां घिओ दे बाल दीवे
वारसशाह  जे सुणा मैं आंवदा ई।
(यदि सुनूं कि वह आ रहा है तो मैं घी के दीये जलाकर चूरीयां चढ़ाऊँ।)

    इसमें पंजाब के रूठे मित्रों को मिलाने तथा झूठे सपनों की पुकार थी। हिंदुस्तान तथा पाकिस्तान के पंजाबी दोस्तोंरिश्तेदारों तथा महबूब साथियों से बिछुड़ने के ग़म में डूबी हुई आवाज़। ये मात्र शब्द नहीं थेउसकी आवाज़ ने शब्दों को प्राभौतिक अर्थ दे दिए थे तथा नई भाषा के मंत्र फूंक दिए थे।
    रेशमा के गाने का अंदाज़ बहुत विचित्र तथा एकाकी है। वह सुर की पूरी शक्ति को निचोड़ कर इसका रस पिलाती है।  वह लता मंगेशकरबेगम अख्तर या सुरिंदर कौर से नहीं मिलाई जा सकती क्योंकि ये महफ़िलों में गाने वाली हैं। रेशमा की आवाज़ से लपटें निकलती हैं।
    गीत समाप्त हुआ तो रेशमा कहने लगीइस बार मैं शायद पंजाब न जा सकूं पर चंडीगढ़ तथा जालंधर जाने को बेहद जी चाहता है। अपने पंजाबी भाईयों को गाकर सुनाने की तमन्ना है। इंशा अल्लाह मैं कभी ज़रूर जाऊंगी।

    रेशमा की गायकी में तीन महान गायिकाओं की समानता है जिन्हें मैंनें अपनी ज़िंदगी में सुना : जॉन बाइज़ जो कैलिफोर्निया के खुले जलसों में जंग के खिलाफ़ गीत गाती है तथा लोगों का दिल मोहती है (उसकी रगों में भी स्पेन के बंजारों का खून है)मिस्र की मशहूर गायिका कुलसुम जिसकी आवाज़ में कुरान की आयतें लरज़ती हैंराया जिसे मैंने मॉस्को के जिप्सी थियेटर में नाचते और गाते सुना है तथा जिसने मेरे नाटक सोहणी महीवाल में सोहणी की सहेली रेशमा का रोल किया था।
    रेशमा को यह नहीं पता कि एम. एफ. हुसैन कौन हैयामिनिकृष्णमूर्ति कौन हैअलकाज़ी कौन हैंखुशवंत सिंह कौन है परंतु ये सभी जानते हैं कि रेशमा कौन है।
    रेशमा को पाकिस्तान सरकार ने लंदन भेजा जहाँ उसने हज़ारों की भीड़ के समक्ष  दमा दम मस्त कलंदर गाया। इस गीत की नकल करके कईयों ने शोहरत हासिल की - बांग्ला देश की रूना लैला ने इसी गीत को गाकर बंबई तथा दिल्ली को मोहाजालंधर की बीबी नूरां ने भी रेशमा के अंदाज़ को अपनाकर इस गीत को पंजाब में चलाया। पर रेशमा जब गाती है तो उसका मन तथा ध्यान अपने पीर की तरफ होता है तथा जज्बे का सिदक हद से गहरा।  पीरों-फ़कीरों के प्रति  उसकी लगन तथा उनके दरबार में हाज़िरी देने का जज़्बा पवित्र है। वह इसी तर्ज क़ा जीवन जीती है। उसकी साँसों में पीरों-फकीरों की धड़कन है।
      वह दुनिया के बड़े शहरों में जाकर महोत्सवों तथा मेलों में गा चुकी है। यूरोपअमरीकामिडल ईस्ट। तुर्की में उसे अंतर्राष्ट्रीय मेले में गाने के लिए सोने का मेडल मिला। पाकिस्तान ने उसे 1980 में फ़ख्र-ए-पाकिस्तान के ख़िताब से नवाज़ा तथा पचास हज़ार रुपए एवं ज़मीन दी।
      जब मैंने पूछा कि पंजाब के गायकों में उसे कौन पसंद है तो उसने जवाब दियाबड़े गुलाम अली खां तथा सुरिंदर कौर मुझे बहुत  पसंद है।

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       दिल्ली में रेशमा बारह दिन रही। उस ने कई महफिलों में रात के तीन - तीन बजे तक गाया। उसके प्रशंसक उसके दर्शनों को तरसते रहे।
      प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर से मुझे फोन आया कि रेशमा कहाँ है। प्रधानमंत्री के कर्मचारी रेशमा का पता कर रहे थे। इंदिरा गांधी ने रेशमा से मिलने तथा उसका गायन सुनने की इच्छा व्यक्त की थी। 
      पिछली रात रेशमा ने मुझे बताया था कि अगली सुबह वह अजमेर शरीफ़ चली जाएगी तथा वहाँ जाकर ख्वाज़ा चिश्ती की दरगाह पर न्याज़ चढ़ाएगी। शायद चली ही न गई हो।
      मैंने तुरंत अनीता को फोन किया तथा उसके बाद जोर बाग के गेस्ट हाउस। तीन-चार जगहों पर फोन करके आख़िर मैंने उसे ढूँढ लिया। वह अभी अजमेर नहीं गई थी।
      मैंने उससे बात की तो वह बहुत खुश हुई। प्रधानमंत्री के घर से उसे फोन गया और बात पक्की हो गई कि वह पाँच बजे इंदिरा गांधी की कोठी पर पहुँच जाएगी। 
      मैं रेशमा के पास चार बजे ही पहुँच गया ताकि वह तैयार हो जाए।
      वह बोलीअल्लाह का फ़ज़ल है कि मेरी आवाज़ इंदिरा गांधी के कानों तक पहुँचेगी। वह आपकी बादशाह है.... तथा मेरी भी... यह हमारा फ़र्ज है कि बादशाह के हज़ूर में गाएं। अल्लाह की क़रामात है। वह किसी को भी चाहे फ़कीर बना देचाहे बादशाह।  
      उसने गले में सोने का मोटा कंठा पहन लियानाक में नथ जिसमें हीरे जड़े हुए थेतथा सर पर हरे सितारों वाला दुपट्टा। पाँवों में चाँदी की पाजेबें।
      मेरी छोटी कार में रेशमा तथा उसके साथी बैठे और हम पौने पाँच बजे, 1, सफदरजंग रोड पहुंच गए। जब कोठी के भीतर प्रवेश करने लगे तो दो सुरक्षा गार्डों ने हमारी कार रोकी तथा हमारा नाम पूछा। मैंने रेशमा का नाम बताया तथा कहा कि पाँच बजे प्रधानमंत्री से मुलाक़ात है। बिना कोई और सवाल किए उन्होंने  हमें भीतर जाने दिया।
      आगे विशेष सचिव उषा भगत खड़ी थीं। वे हमें भीतर ले गईं।
      साधारण बड़े कमरे में कालीन बिछा हुआ था। खिड़की के पास दो सोफे पड़े हुए थे तथा दूसरे सिरे पर सफेद चादर बिछी हुई थीजिस पर रेशमा तथा उसके साथी बैठ गए।
      थोड़ी देर के पश्चात् इंदिरा गांधी दाखिल हुईं तो सभी उठ खड़े हुए। उनके साथ सोनिया गाँधी थीमुहम्मद युनुस तथा दस और क़रीबी महिलाएं।
      इंदिरा गांधी रेशमा के पास गईं तथा उसका स्वागत किया। फिर वे सामने सोफे पर बैठ गईं तथा उनके साथ कई अन्य महिलाएं। सोनिया कालीन पर अन्य लोगों के साथ बैठी थी।
      रेशमा ने अपनी बंजारन वाली विशाल मुस्कान बिखेरते हुए कहा,  इजाज़त है गाऊं ?
      उषा भगत ने रेशमा के लिए चाय का ऑर्डर दिया था तथा बैरा चाय ले आया था।
      श्रीमती गांधी ने कहाआप पहले चाय पी लें।
      रेशमा बोलीचाय नहींअब तो गाने को जी करता है।
      श्रीमती गांधी के होठों पर मोतिया मुस्कान खेल गई, ‘हमारे पास बहुत वक्त है......बहुत वक्त है.....आप पहले चाय पी लें।
      रेशमा ने हाथ जोड़कर कहा, ‘अब तो सिर्फ़ ग़ाने को ही जी चाहता है।
      कमरे का एयर कंडीशनर तथा पंखे बंद कर दिए गए। सन्नाटा छा गया।
      रेशमा की आवाज़ गूंजीहा ओ रब्बा.....
      सुनने वालों के बदन में एक कंपकंपी सी दौड़ गई।
      क़रीब बैठी सोनिया से मैंने पूछा, ‘आपको यह गीत समझ में आता है ?’
      वे बोलीं, ‘हमारे पास रेशमा के टेप हैं। हमने इन टेपों को बार-बार सुना है। मुझे रेशमा की आवाज़ बहुत अच्छी लगती है।
      रेशमा एक घंटे तक गाती रही। सभी को उसकी आवाज़ ने कील दिया था।
      श्रीमती गांधी ने उठकर रेशमा को जफ्फी पाई। उसे तोहफे के तौर पर एक सुनहरी घड़ी पेश की तथा दरवाज़े तक छोड़ने आई।
      रेशमा ने मुझसे कहा, ‘यकीन ही नहीं हो रहा था कि मेरे सामने श्रीमती गांधी बैठीं मेरा गीत सुन रहीं हैं। वे बादशाह हैंपर मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी बड़ी बहन हो। यह सिर्फ़ ख्वाब लगता है।
      तीन दिनों के पश्चात् अनीता सिंह का फोन आया कि वे शाम को रेशमा के साथ मेरे घर खाने पर आएंगी। मैंने आठ-दस दोस्तों को अपने घर एक छोटी सी महफ़िल में बुला लिया।  इनमें ज़्यादातर वे लोग थे जो कलाथियेटर तथा संगीत में रुचि रखते थे।
      मेरे छोटे से आँगन में चंदा की चाँदनी में रेशमा रात के दो बजे तक गाती रही।
   
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    मैं उसे जोर बाग के गैस्ट हाउस में दोबारा मिलने गया। दरबान ने अन्दर जाने का इशारा किया।
      रेशमा बड़े पलंग पर पालथी मारे बैठी थी तथा उसके सामने मीट की हांडीसरसों के साग का बड़ा सा कटोरा और मकई की रोटियां रखी हुई थीं। यह पलंग ही उसका दस्तारखान था।  उसने एक निवाला तोड़ा ही था कि मैंने भीतर प्रवेश किया।
      वह बोलीआईएआईए बलवंत जीयहीं आ जाईए तथा हमारे साथ खाना खाईए।
      मैंने टेप रिकॉर्डर तथा कैमरा एक तरफ रख दिया और उसके साथ खाना खाने बैठ गया।
      उसके बाल खुले थेखुला कुर्ता।
      वह बोलीमुझे होटल का खाना पसंद नहीं। हिंदुओं के घर में सब कुछ है पर गोश्त पकाना नहीं आता। मेरा भाई जामा मस्ज़िद जाकर गोश्त लेकर आया। यहाँ खुद पकाया। हांडी के गोश्त की बात ही और है....मुझे बाजरे की रोटी बहुत अच्छी लगती हैपर यहाँ मिलती ही नहीं। मेरी माँ बाजरे की रोटी बनाती थी....साथ में पतली लस्सी का छन्ना...... हम बीकानेर के हैं न.....सहरा में बाजरा ही होता है।
      मुझे बठिंडे के टीले याद हो आएजहाँ बाजरे के खेत थे तथा बाजरे की लंबी बालियां।
      रेशमा खाते वक्त घर की बातें करती रहीमैं अपना गाँव देखने आई हूँ जहां मेरे पूर्वजों की कब्रें हैं....रतनगढ़ से तीन मील दूर.....वहाँ कोई पक्की सड़क नहीं जाती.....वहाँ अब भी लोगों के लिए पीने का पानी नही। मैं दुबारा आपकी बादशाह गांधी से मिलकर अर्ज करूंगी कि वहाँ सड़कें तो बनवा दें...मैं अगली बार आई तो बड़ी महफ़िलों में गाकर रुपए इकट्ठे करूंगी अपने गाँव के लिए।  पर अब मैं सिर्फ रिश्तेदारों से मिलने आई हूँगाने के लिए नहीं आई हूँ.....आप गोश्त तथा साग तो और लीजिए। यदि लाहौर आएं तो मुझे ज़रूर मिलें.....मेरा पता लिख लें.....मेरे नाम के साथ रेडियो सिंगर लिखें तथा यह भी लिखना नज़दीक शमा सिनेमा तथा सड़क का नाम भी नोट कर लें।
      वह इस बात पर बहुत ज़ोर दे रही थीं कि उसका पूरा पता लिखा जाए मानो चिट्ठी गुम हो जाएगी। उसे नहीं पता था कि पाकिस्तान में रेशमा नाम ही क़ाफ़ी है। सभी डाकिये उसका शहरगली तथा मुहल्ला जानते हैं। दरअसल यदि कोई शमा सिनेमा का पता पूछे तो उसे यही बताना पड़ेगा - रेशमा के घर के पास।
      मैंने पूछा - रेशमातुम बीकानेरी घाघरा तथा बाँकें नहीं पहनती ?
      हले मैं घाघरा ही पहनती थीपाँच सेर पक्की चाँदी की बाँकें तथा कड़े। हम बंजारने जवानी में जो बाँके पहनती हैंवे हमारे साथ ही दफन होती हैं....मेरी चाचियांताईयां मेरे कबीले में अब भी घाघरा पहनती हैं। तीस गज का घाघरा.....चलती है तो घाघरा झकोले खाता है....मैं भी घाघरा ही पहनती थीपर शहर में आई तो पढ़े-लिखे लोगों को यह लिबास पसंद नहीं था.... पाकिस्तान का क़ौमी लिबास सलवार-क़मीज़ हैइसलिए अब मैं वही लिबास पह्नती हूँ।
      रेशमा का लिबास बेशक बदल गया परंतु उसकी आवाज़ में वही रेगिस्तानी गूंज तथा दिल हिला देने वाले ऊँचे स्वर हैं। स्वभाव में वही खुलापन है। वही लापरवाही, वही बादशाहत।


       साभार - पुस्तक 'हसीन चेहरे' ।

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