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मंगलवार, फ़रवरी 26, 2019


बांग्ला कहानी

शिखंडी - स्थूनाकर्ण संवाद


                                         *  विश्वदीप दे
                           अनुवाद -  नीलम शर्मा अंशु

















       
   घना जंगल। सूर्य की रोशनी के लिए भी यह मार्ग दुष्कर है।  आकाश से आने वाली रोशनी भी घने पत्तों के अभेद आवरण को ठीक से भेद नहीं पाती। बस जगह-जगह पर मामूली सी रोशनी की आकृति बनती है।
   रोशनी और अंधेरे के इस मार्ग पर चले जा रहा हैं शिखंडी। हमारी कहानी के नायक या नायिका कह लें। इस जंगल ने इससे पहले उनका नारी रूप देखा है। आज उनके पुरुष रूप को देख रहा है। स्वर्णजड़ित कवच, मुकुट, बाजूबंद, तलवार, तीर-धनुष। सारे तन पर तीव्र पौरुष आलोकित है। सूखे पत्तों को पैरों से रौंदते हुए वे चलते जा रहे हैं। पत्तों के रौंदे जाने की ध्वनि बार-बार इस जंगल को चकित करती है। वे हैरान होकर सोचते हैं कि इस दुर्जय पुरुषाकार के पीछे उस दिन कहीं कोमल असहाय नारीत्व के आभास का इंगित भी था। इस आश्चर्यद्वन्द्व ने जंगल की निस्तब्ध प्रकृति में भी उत्तेजना सी भर दी है।
    चलते-चलते अचानक रुक जाते हैं शिखंडी। गंतव्य स्थल प्राय: निकट ही है। थोड़ी दूर ही स्थूनाकर्ण का भवन है। कुछ देर में ही उन्हें अपना नारीत्व वापिस मिल जाएगा। पर क्यों ?  एक प्रबल अभिमान हवा के तेज झोंके के भाँति चक्कर काट रहा है। क्या होगा नारीत्व से ? महायोद्धा भीष्म को परास्त करने की प्रबल इच्छा मानों और एक बार टूटे पात्र की भाँति चूर-चूर हो गई। कोशिश करके भी वे अपनी आँखों को शांत नहीं कर पाए। नमकीन आँसुओं से भर उठी आँखों रूपी नदी। बहुत कठिनाईयों से अर्जित यह पौरूष अस्थाई है यह पहले से मालूम था शिखंडी को। फिर ईश्वरीय कृपा की बात स्मरण कर हर क्षण आशान्वित हैं वे। शूलपाणी महादेव के वरदान के अनुसार उसका पुरुष तन ही भीष्म का मृत्युबाण साबित होगा। परंतु वह शायद असंभव ही रह गया। थोड़े समय का यह पौरुष केवल राजा हिरण्यवर्मा द्वारा प्रेषित रमणियों के संग संभोग में ही बीत गया।
    खुद को धिक्कारना चाहकर भी नहीं धिक्कार सके शिखंडी। उस यौनमिलन का भी तो प्रयोजन था। राजा हिरण्यवर्मा के दूत के समक्ष पिता द्रुपद के लज्जित, संकुचित होने की दृश्य ने उन्हें वनवासी बनने को बाध्य किया। अत: सबके समक्ष उस लज्जा से मुक्ति पाना आवश्यक था। क्या सिर्फ़ यही ? सिर्फ़ इस लज्जा का निवारणमात्र ? और कुछ नहीं किया जा सकता इस पौरुष से ? हाँ, यह सच है कि पिता द्रुपद के सम्मान की रक्षा के लिए अपना पुरुषत्व कुछ दिनों के लिए उन्हें दिया है यक्ष स्थूनाकर्ण ने। बदले में उनका नारीत्व स्वीकार कर लिया है। इस शर्त पर कि प्रयोजन समाप्त हो जाने पर लौटा देना होगा। उस वक्त वह पर्याप्त जान पड़ा था परंतु आज शिखंडी को समझ आया कि केवल इस जन्म की लाज और अपमान ही नहीं बल्कि उनके दूसरे जन्म के उस प्रतिशोध के पूरा न होने तक इस पौरुष का त्याग करना उचित नहीं होगा।
   शिखंडी के मन में पलायन की भावना जागृत होती है। इस जंगल से, स्थूनाकर्ण से दूर भाग जाने की प्रबल इच्छा। जिस नारीत्व को उन्होंने एक बार त्याग दिया उससे दूर जाकर, स्थूनाकर्ण से मिले इस पौरुष को लेकर वे भीष्म के समक्ष जाएंगे। महादेव के वरदान से फलीभूत हो उस अपराजेय महारथी को धूल में मिला देगें। फिर इस पौरुष को वे लौटा देगें। भीष्म को इस पृथ्वी से हटा देने के बाद सिर्फ पौरुष ही नहीं अपने प्राण भी त्याग सकते हैं शिखंडी।
   अगले ही क्षण उनकी आँखों के समक्ष उस महान यक्ष की दयाद्र दृष्टि घूम गई। याद आया, किस स्थिति में उनसे पहली मुलाक़ात हुई थी। बहुत पहले, माँ के गर्भ में रहने के दौरान। देवादिदेव महादेव ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा था, गर्भ में मौजूद संतान पुत्र ही होगी। इसलिए जन्म के बाद से ही उनका लालन-पालन पुत्र की तरह किया गया था। यह मानकर कि देवता की बात सत्य होगी ही। यहाँ तक कि उनकी शादी भी कर दी गई थी एक कन्या से। जबकि शिखंडी तब भी शिखंडी ही थे। उन्हें समझ में आ गया था कि उनका राज़ खुल जाएगा। सारी दुनिया के पास यह ख़बर पहुँच जाएगी कि राजपुत्र वास्तव में राजकन्या है। हुआ भी वही। उनके अनावृत तन को देख घृणा, विस्मय से चकित रह गई थी हिरण्यवर्मा की सौंदर्यमयी कन्या। तुरंत पिता के घर समाचार भिजवाया। क्रुद्ध हिरण्यवर्मा ने तुरंत दूत भेजा। बताया कि वे शीघ्र ही सेना सहित इस छल का प्रतिउत्तर देने पहुँच रहे हैं।
    उस दिन के बाद से शिखंडी अपने पिता के घर पर न रह पाए। इस जंगल में आने को बाध्य हुए, इस यक्ष के वासस्थान पर। शिखंडी को याद आता है एक असहाय रमणी की दिनोंदिन की तपसाधना, और क्रमश: क्षीण होते जाते तन को देख उसके समक्ष खड़े हो आश्चर्यमिश्रित हँसी हँसे थे स्थूनाकर्ण। कहा था – हे रमणी, आप मेरा पौरुष ग्रहण कर लें, अपने व अपने परिवार के अपमान को धूल में मिलाकर इस दुर्दशा के ग्रास से अपनी रक्षा करें। प्रमाणित करें कि महाराज द्रुपद ने कोई मिथ्याचार नहीं किया। आप वास्तव में पुरुष ही हैं। स्वप्न की भाँति आधारहीन प्रतीत हुआ था शिखंडी को। दयावान यक्ष इस प्रकार उनसे अपमान से मुक्ति की बात करेंगे, यह उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था।
   इन सब बातों को स्मरण कर पीछे लौटना रोक कर फिर से वे स्थूनाकर्ण के भवन की और बढ़ चले। पिता द्रुपद को जिसकी कृपा से छल के अभियोग से मुक्ति दिलाई अंतत: शिखंडी उसके साथ छल न कर सके। इतना बड़ा अन्याय उनसे संभव नहीं था। दरअसल वेशभूषा पुरुष की होते हुए भी वे पूर्णत: एक दयावान नारी थे।
   अंतत:  स्थूनाकर्ण के भवन पर आ पहुँचे शिखंडी। स्थूनाकर्ण के सेवक ने उनसे प्रतीक्षा करने को कह भीतर अंत:पुर में संदेस भिजवाया। थोड़ी ही देर में अंत:पुर से एक सेवक ने आकर कहा, आप भीतर जाएं राजन। वे प्रतीक्षा कर रहे हैं।
    अंत:पुर में प्रवेश करते हैं शिखंडी। खिड़की के पास खड़े दिखाई देते हैं स्थूनाकर्ण। चुपचाप उनके पास आ खड़े होते हैं। कहा, मैं लौट आया हूँ महामति।स्थूनाकर्ण हँस पड़े। उनकी शारीरिक मुद्रा से नारीमुद्रा बिंबित हो रही थी। उन्होंने कहा, मुझे पता था तुम आओगे। तुम्हें देख कर सचमुच प्रसन्नता हुई। 
   शिखंडी ने झुक कर कहा, आपके प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ। आपकी कृपा से मेरे माता-पिता के लज्जित, अपमानित चेहरों की कालिमा ख़त्म हुई। आपके पुरुष चिहनों द्वारा मैंने अपने पौरुष को प्रमाणित किया है। मेरी परीक्षा हेतु दशार्णराज हिरण्यवर्मा ने कुछ संदुर युवतियों को मेरे पास भेजा था। मैंने उन्हें तृप्त किया। संभोग के बाद उन्होंने हिरण्यवर्मा की कन्या यानी मेरी पत्नी की अक्षमता पर हँसी-मज़ाक तक किया। उनके अनुसार समस्या मेरी नहीं थी दशार्णराज की पुत्री की थी।  
   सौंदर्यबालाओं की यौन तृप्ति की बात सुन स्थूनाकर्ण क्रोध से लाल हो गए। शिखंडी मन ही मन लज्जित हो उठे। उन्हें याद आया, एक अंत:पुरवासी के समक्ष पुरूष के तौर पर यह कहना उचित नहीं हुआ। यद्यपि थोड़ी देर बाद परिस्थिति बदल जाएगी। तब गैर पुरुष के समक्ष दैहिक मिलन की बात के उल्लेख को स्मरण कर शिखंडी ही शर्मिंदा होंगे। कैसी आश्चर्यजनक थी यह परिस्थिति। ऐसी घटना क्या इससे पहले भी घटित हुई हैं। भविष्य में भी कभी घटित होगी क्या?
   प्रसंग बदलते हुए शिखंडी ने कहा, मेरे पिता द्रुपद का मान रख पाया। वे प्रमाणित करने में सफल रहे कि उन्होंने कोई मिथ्याचरण नहीं किया था। उनकी संतान नारी न होकर पुरुष ही है। हिरण्यवर्मा अपनी बेटी की भर्त्सना करके लौट गए। मेरा अभीष्ट पूर्ण हुआ। अब आप अपना पौरुष वापिस स्वीकार करें। 
    स्थूनाकर्ण शिखंडी की तरफ देखते रहे। उन्हें कुछ दिनों पहले की बात याद हो आई। जब उन्होंने पहली बार शिखंडी को देखा था। तब वे शिखंडिनी थीं। एक नारी। लंबे समय तक अनाहार रहने के कारण तन बहुत ही क्षीण और कृश्काय।  नारीसुलभ कोमलता तब नष्ट हो चुकी थी। पूरे चेहरे पर तीव्र हताशा नज़र आ रही थी। जीवन के प्रति भी निराशा। फिर भी उस उदास चेहरे पर विद्यमान अभिमान की हल्की सा आभा ने उन्हें मुग्ध किया था। सिर्फ़ मुग्ध? ऐसे मग्न पहले कब हुए थे स्थूनाकर्ण। शिखंडिनी के रूप ने उन्हें आनंदविभोर किया था। उन्हें महसूस हुआ था कि वे इस उदास मुखमंडल की प्रसन्नमुद्रा के लिए कुछ भी कर सकते हैं। क्यों लगा था ऐसा, यह बात वे कभी भी शिखंडी को नहीं बताएंगे। अपने मन की गुप्त कोठरी में छुपाए रखेंगे जो कि उनके शेष जीवन की पूंजी होगी। यह सब सोचकर कुछ देर ख़ामोश रहे स्थूनाकर्ण। फिर मृदु मुस्कान बिखेर कर कहा, तुम्हारी ईमानदारी से मैं बहुत ही प्रसन्न हूँ। तुम जो लौट कर आए हो देख कर ही समझ आता है कि तुम लालचरहित हो। उस दिन तुम्हारी असहायता देख सचमुच बहुत दु:खी हुआ था। आज तुम्हें विजयी देख बहुत अच्छा लग रहा है। प्रार्थना करता हूँ कि जीवन के और भी कठिनतम युद्धों में भी तुम विजयी बनो। 
    पर यह कैसे संभव है? आज इसी क्षण तो मेरे क्षणस्थाई पौरुष के समापन पर मैं एक सामान्य नारी में बदल जाऊंगा। फिर पिछले जन्म की भाँति एक बार फिर पराजित जीवन गुजारूंगा। मन ही मन विषाद-संलाप में संलिप्त शिखंडी को देख स्थूनाकर्ण ने कहा, राजकुमार तुम कुछ छुपा रहे हो। 
    आपने ठीक समझा, परंतु वह राज़ जानकर फिर आप मुझे निर्लोभ नहीं कहेंगे। हल्के से मुस्कुराकर शिखंडी ने कहा, पिता द्रुपद का सम्मान बचाकर मेरे इस जीवन का अभीष्ट पूर्ण हो तो गया है, परंतु आपको मैं अपना पूरा इतिहास बता दूं। भीष्म की पराजय ही मेरा सर्वोच्च लक्ष्य है। नारी बनकर मैं उनका विनाश कैसे करूंगा। पिछले जन्म में अंबा बनकर चाहा था कि कोई पुरुष मेरे पक्ष में युद्ध करके महारथी भीष्म का वध करे परंतु आपको पहले ही बताया है कि तेजस्वी योद्धा परशुराम किस प्रकार भीष्म को पराजित करने में असफल रहे थे। हाँ, भीष्म भी उन्हें पराजित नहीं कर पाए। दोनों ही परस्पर एक दूसरे के लिए अजेय थे, युद्ध के माध्यम से इस सत्य के प्रकट होते ही समझ आ गया था कि परशुराम जिसे पराजित न कर पाए, उसे पराजित करने की क्षमता और किसी की नहीं होगी। उसी दिन मुझे समझ आ गया कि खुद ही कोशिश करने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं। उस युद्ध में मेरी मृत्यु भी हो जाए तो हो परंतु मुझे एक बार उसके सम्मुख उपस्थित होना है। अब आप ही बताएं, पुन: नारीत्व प्राप्त करके अपेक्षित लक्ष्य तक कैसे पहुँचा जा सकता है ?  
    स्थूनाकर्ण ने मृदु मुस्कान से बिखेर कर कहा, मैं तुम्हारी सत्यनिष्ठा देख कर चकित हूँ। तुम इस प्रबल प्रतिशोध की स्पृहा को अस्वीकार कर मुझे मेरा पौरुष लौटाने आए हो, जिसे एक बार लौटा देने के बाद भीष्म के साथ युद्धस्थल में सामना करने का स्वप्न सदा के लिए शायद नष्ट हो जाएगा। तुम सचमुच सत्यनिष्ठ हो। और जो सचमुच ईमानदार हो, उसे एक बार अवश्य अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने का अवसर मिलता है। 
   शिखंडी ने चौँक कर स्थूनाकर्ण की ओर देखा। स्थूनाकर्ण मानो कोई सांत्वना न देकर भविष्यवाणी कर रहे हों। उनका दृष्टिकोण समझ कर स्थूनाकर्ण ने कहा, तुम ठीक ही सोच रहे हो राजकुमार। मैं जो कह रहा हूँ, वह सांत्वना नहीं है। विश्वास है। दैव निर्देश कभी व्यर्थ नहीं होता। महादेव की इच्छानुसार  भीष्म के वध के लिए युद्धस्थल में तुम्हारी उपस्थिति अपरिहार्य है। तुम लौट जाओ। अस्त्रविद्या ग्रहण करो। उस क्षण की तैयारी करो। 
    शिखंडी का पूरा शरीर सिहर उठा। स्थूनाकर्ण की ओर नज़रें टिकाए चुपचाप देखते रहे। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अस्त्रविद्या की बात क्यों कह रहे हैं? कैसे संभव है यह? उत्तेजित स्वर में कह उठे शिखंडी, किसी नारी को कोई अस्त्रविद्या देता है? हे स्थूनाकर्ण आपकी बात को मैं ठीक तरह से समझ नहीं पा रहा हूँ। कृपया बताएं कि यह कैसे संभव है? 
    अवश्य बताऊँगा, राजकुमार। तुम्हारे मन का अंधेरा मैं दूर करूंगा परंतु उससे पहले मैं तुमसे अपने एक प्रश्न का उत्तर जानना चाहता हूँ। इधर कुछ दिनों से इस एकाकी कक्ष में बैठे-बैठे बहुत बार यह प्रश्न मेरे मन में आया है। 
    कौन सा प्रश्न?  शिखंडी ने जानना चाहा।
    अपने पिछले जन्म की पूरी गाथा से तुमने मुझे कील कर रख दिया है। वह सुनकर मुझे लगा कि तुम्हारे पिछले जन्म की दुर्दशा के प्रधान खलनायक दो व्यक्ति हैं। एक हस्तिनापुर के महारथी भीष्म, दूसरा तुम्हारी प्रियतम शाल्वराज। पहले ने विचित्रवीर्य़ की पत्नी बनाने के लिए स्वयंवर से अंबिका और अंबालिका के साथ तुम्हारा हरण किया। शाल्वराज द्वारा रोके जाने पर उन्होंने प्रबल उपेक्षा के साथ उसे परास्त किया परंतु तब तक उन्हें यह नहीं मालूम था कि वह व्यक्ति तुम्हारा प्रियतम है। बाद में जब पता चला तो तुम्हें कुछ वृद्ध ब्राह्मणों और एक धात्री के साथ शाल्वराज के पास भेज दिया। और दूसरा, शाल्वराज ने अन्यपूर्वा कहकर तुम्हारा तिरस्कार किया। भीष्म के स्पर्श से तुम्हारे खुश होने का आरोप लगा कर तुम्हें त्याग दिया था। जबकि पूरी दुर्दशा के लिए तुम भीष्म को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हो। उसकी मृत्यु ही तुम्हार लक्ष्य है। इसकी वजह क्या है? बहुत सोचकर भी मैं यह समझ नहीं पाया। 
    स्थूनाकर्ण का प्रश्न सुन शिखंडी को हैरानी हुई। एक सामान्य नारी की जीवनगाथा ने इस यक्ष को इतना चिंतित किया। उन्होंने विस्मित होकर कहा, इतने कौतुहलपूर्वक मेरी बात कभी किसी ने नहीं सुननी चाही। शाल्वराज द्वारा अपमानित होकर नगर से बाहर तपस्वियों के आश्रम में जब मैंने रहना चाहा तब उन्हीं तपस्वियों ने मुझे मेरे पिता काशीराज के घर लौट जाने को कहा। तपस्वी तो ज्ञानी होते हैं, फिर भी वे मेरे कष्ट को सम्यक तौर पर समझ नहीं पाए। मेरे नाना राजर्षि होत्रवाहन अवश्य कुछ हद तक समझ पाए थे। परशुराम के प्रिय अनुचर अकृतव्रण भी समझ पाए थे। समझ पाए थे इसीलिए उन लोगों ने मुझे परशुराम की सहायता का आश्वासन दिया था। और परशुराम ने भी मेरे कष्ट के निवारण हेतु भीष्म के साथ भीषण युद्ध किया था। इन सभी ने चाहा था कि भीष्म मुझे स्वीकार कर लें, परंतु जब परशुराम-भीष्म युद्ध आमीमांसित रह गया तब उन्होंने असहाय की भाँति मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया। इसके बाद सही अर्थों में जब भीष्म के दंभ के समझ मैं अकेली पड़ गई थी, महेंद्र पर्वत पर जाने से पूर्व एक बार भी क्यों गंभीरता से नहीं सोचा परशुराम ने। यद्यपि समझ आ गया कि प्रिय शिष्य को परास्त न कर पाने के कारण अपने पौरुष को लेकर वे चिंतित थे। उस क्षण मानो मैं उतना महत्वपूर्ण नहीं थी। आपने जितना समय लेकर मेरी इस विपदा के विषय में सोचा है, उन लोगों में से किसी ने नहीं सोचा था। यहाँ तक कि आपने मेरे लिए अपना लिंग परिवर्तन तक कर लिया। शिखंडी का स्वर ज़रा सा काँप गया। आँखों के कोनों में आँसुओं की बूंदें झिलमिलाने लगीं। खुद को संभालते हुए कहा, जो भी हो आप जानना चाहते हैं कि शाल्वराज के प्रति मेरा क्षोभ कितना है। तो बता दूं कि उनके व मेरे पिता काशीराज दोनों के ही प्रति मेरा क्षोभ असीम है। मेरे पिता ने यदि स्वयंवर न रचा कर पहले ही शाल्वराज के साथ ब्याह दिया होता या खुद शाल्वराज ही ऐसा प्रस्ताव देते तो मुझे भीष्म के हाथों अपहृत न होना पड़ता। अंबिका और अंबालिका दोनों के लिए स्वयंवर सही फैसला था।  परंतु एक वाग्दत्ता कन्या के लिए यह फैसला बहुत बड़ी गलती थी और इसके लिए संपूर्णत: पूरी तरह से शाल्वराज और काशीराज दोनों ही उत्तरदायी हैं। जबकि मेरे दुर्दशा में दोनों ने ही पूर्णत: मुझे अस्वीकार किया। बाद में जब भी भीष्म के वाणों के सामने उसकी असमर्थता की पराकाष्ठा, पराजित चेहरा याद आया है, समझ गई कि वास्तव में उसका आहत पौरुष मेरा सामना नहीं कर पा रहा था। इसीलिए...... 
   शिखंडी की बात पूरी होने से पहले ही स्थूनाकर्ण ने पूछा, मैं तुम्हारे कष्ट को समझ रहा हूँ परंतु यह वृतांत सुनकर मुझे महसूस हुआ कि शाल्वराज के पराजित चेहरे के विपरीत क्या भीष्म के आत्मगरिमा से परिपूर्ण चेहरे की तस्वीर ने कोई प्रभाव नहीं डाला? ग़लती हो तो माफ करना राजकुमार, किंतु सचमुच तुम्हें नहीं लगा कि जिस व्यक्ति ने मेरे प्रियतम को अनायास ही ज़मीन पर लिटा कर, फिर उसका वध न करके जीवनदान दिया, क्या शौर्य और वीरता की दृष्टि से वह शाल्वराज से बहुत-बहुत अधिक योग्य नहीं? 
   शिखंडी को होठों पर करुण मुस्कान दौड़ गई, यही इंगित शाल्वराज ने भी किया था परंतु ऐसी कोई अनुभूति मुझे हुई थी या नहीं, मुझे नहीं मालूम। एक अजीब से उन्माद में थी मैं। मैं कोई दैवी नारी नहीं। मैं बहुत साधारण हूँ। इतना कह सकती हूँ कि बहुत प्रकांड पंडित भी अगले हज़ारों-हज़ारों सालों तक इसका समाधान नहीं कर पाएंगे। घृणा के कितने पास होता है प्रेम, यह हिसाब मुझे नहीं मालूम। फिर भी पिछले जन्म में सबसे ज्यादा असमर्थ महसूस किया था जब परशुराम के अनुरोध पर भी भीष्म ने मुझे स्वीकार  नहीं किया था। उसी क्षण से मेरा कोई गंतव्य नहीं रहा। बाद में कठोर तपस्या से मुझे महादेव का वरदान प्राप्त होने पर भी, परशुराम के प्रस्थान के बाद की अपनी उस असमर्थता को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी। तब लगा था कि ऐसी परिस्थिति में भी भीष्म ने मुझे स्वीकार नहीं किया? एक नारी का ऐसा सर्वनाश करके भी उसके मन में दया न आई। उस दिन से मेरी घृणा की अग्नि दिनोंदिन तीव्र होती गई। मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है उसका पतन।  
    स्थूनाकर्ण बहुत ध्यान से शिखंडी की बातें सुन रहे थे।  समझने की कोशिश कर रहे थे प्रेम और घृणा का इस परस्पर स्थिति को। समझ रहे थे अंबा, शिखंडिनी, शिखंडी जन्म से जन्मांतर, लिंग से लिंगांतर इस असहाय जीवन को सबसे अधिक आहत किया है देवलीला ने। जिस देवलीला ने उनके जीवन को भी बदल दिया है।
   थोड़ी देर चुप रहकर शिखंडी ने कहा, आशा है कि आपके प्रश्न का उत्तर आपको मिल गया होगा। अब यदि अनुग्रहपूर्वक मेरे प्रश्न का उत्तर दें। स्थूनाकर्ण ने गंभीरता से कहा, मैंने अब तक जान-बूझकर ही उत्तर नहीं दिया राजकुमार क्योंकि मुझे पता है कि उत्तर मिलने के बाद तुम मेरे इस भवन में एक क्षण भी रुकने के लिए राज़ी नहीं होगे। द्रुत गति से राजप्रासाद में लौट जाओगे। बाद के प्रत्येक क्षण में खुद को तीक्ष्ण से भी तीक्ष्ण कर लोगे.... और उस महामुहुर्त का इंतज़ार करोगे।
   स्थूनाकर्ण की बातें शिखंडी को पहेली सी लगती हैं। यद्यपि उस पहेली का उत्तर सार्थक है, यह क्रमश: स्पष्ट हो गया।
    स्थूनाकर्ण ने कहा,हाल ही में यक्षराज कुबेर यहाँ आए थे परंतु अब मैं एक नारी हूँ, स्वाभाविक तौर पर अंत:पुर में थी। उन्हें मेरे इस लिंग परिवर्तन की बात पता चल गई। यह जानकर उन्होंने प्रबल क्रोध में मेरे सामने आकर मुझे अभिशाप दिया।
   एक आड़ी-तिरछी तीव्र विद्युत रेखा मानों शिखंडी को भेद गई, अभिशाप? क्यों? हे स्थूनाकर्ण आपका अपराध क्या था? 
   उत्तेजित शिखंडी की ओर देख स्थूनाकर्ण हँस पड़े। क्षीण हँसी। तुम्हारे साथ लिंग विनिमय का अपराध। मैंने अपनी क्षमता का अपव्यवहार कर यक्षगणों को अपमानित किया है, यह कहकर मेरा तीव्र तिरस्कार किया यक्षराज कुबेर ने। अभिशाप दिया, तुम जब तक जीवित रहोगे, मैं स्त्री ही बना रहूंगा और मेरा पौरुष धारण कर तुम पुरुष ही बने रहोगे। 
   रुद्ध गले से शिखंडी क्या कहें कुछ समझ नहीं पा रहे थे। सिर्फ़ व्यथित मन से स्थूनाकर्ण की तरफ देखा । साथ ही एक गुप्त आनंदमय स्वरधारा भी उनके मन के भीतर लगातार झंकृत हो रही थी।
  अविचलित स्थूनाकर्ण ने कहा, हे राजकुमार, अब युद्धस्थल में भीष्म का सामना करने में कोई रुकावट नहीं। यह खुशी का समय है। बहुत दिनों की प्रतीक्षा अंतत: सार्थक हो रही है। अब देर मत करो। यथाशीघ्र लौट जाओ तुम। अस्त्रविद्या ग्रहण करो। 
   शिखंडी ने धीरे-धीरे कहा, किंतु.... मेरा भला करने के क्रम में आपका बहुत बड़ा सर्वनाश हो गया। इन्कार नहीं है कि शेष जीवन में मैं पुरुष ही बना रहूंगा, यह उपलब्धि मेरे लिए अमरत्व से भी बहुत बड़ी है परंतु आपकी इतनी बड़ी क्षति के बारे सोचकर..... 
    ‘क्षति?थोड़ा सा क्रोध का पुट शामिल हो गया स्थूनाकर्ण के कंठस्वर में। नारीत्व को सर्वनाश समझते हो तुम? 
   शिखंडी नहीं ऐसी बात नहीं है। मैं नारीत्व को सर्वनाश नहीं कह रहा। कभी भी नहीं। पर ये जो आप पुरुष से नारी बने.... यह अस्वभाविक घटना आपको सभी के कौतुहल का केंद्र बना देगी। उसी दुर्भाग्य की बात सोच कर मैं शंकित हूँ। मुझे अवश्य पता है, मेरे इस पौरुष प्राप्ति का रहस्य़ अगर लोगों के सामने आ गया तो बेवजह कौतुहल के विषैले तीर मेरी तरफ भी बढ़ेंगें। पर मुझे उससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता। अब अपने लक्ष्य के सिवाय किसी भी चीज़ से मुझे कोई शिकायत नहीं। पर आप... सिर्फ़ मेरी भलाई के चक्कर में इस तरह..... 
   स्थूनाकर्ण ठीक, यही एक विषय मेरे लिए भी विरक्तिकारक है। ये जो मैं पुरुष से नारी बना इस विषय में बेवजह कौतुहल और एक अद्भुत नज़र मैनें यक्षगणों में देखा है। मानो सभी जो आजीवन पुरुष या नारी हैं मैं उनसे एक अलग व्यक्ति हूँ। लिंगांतर मानों धर्मांतरण के समान हो गया। या फिर उससे भी भयावह घटना। मुझे लगता है युग-युगांतरों तक इस विषय में लोगों के मनोभाव नहीं बदलेंगे। परंतु तुम इस सबके विषय में तनिक भी चिंतित मत होना। मेरे मन में कोई अफसोस नहीं है। दैवों का अतिक्रमण क्या हमारे लिए संभव है। इसके अलावा एक ही जन्म में नारी और पुरुष होने का सौभाग्य कितनों को मिलता है? तुम निश्चिंत मन से प्रस्थान करो राजकुमार। परिकल्पना के अनुसार चतुष्पद धनुर्भेद शिक्षा ग्रहण करो।  प्रार्थना करता हूँ कि जिस दिन गंगापुत्र भीष्म से साक्षात होगा, उस युद्ध में विजय तुम्हारी ही हो। 

   स्थूनाकर्ण की बातों से आश्वस्त होकर कुछ समय बाद भवन से निकल आए शिखंडी। लौट चले राजप्रासाद की ओर। स्थूनाकर्ण खिड़की के पास खड़े रहे।  बाहर घने हरे वन की निस्तब्धता को देख क्रमश: उदास होने लगीं उनकी दोनों आँखें। सजल हो उठीं। कुछ बातें करने को रह गईं। जो फिर कभी कही ही नहीं जाएंगी। उनकी उन गुप्त अनुभूतियों और इच्छाओं को धारण कर गहरा घना जंगल और भी गंभीर स्तब्ध से भर उठा। सिर्फ पक्षियों की अनुपम सीटियों और पत्तों के गिरने की आवाज़ के अलावा और कहीं भी कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी।

साभार - छपते छपते (कोलकाता) उत्सव विशेष 2018

गुरुवार, फ़रवरी 22, 2018

कहानी श्रृंखला - 23 / ख़ामोश महाभारत - परमजीत धींगरा


पंजाबी कहानी
ख़ामोश महाभारत

                                         * परमजीत धींगरा

                                             अनुवाद -  नीलम शर्मा अंशु


      समराला चौंक में सुबह-सुबह वाहनों के बेतरतीब शोर के साथ-साथ गहमा-गहमी भी थी। हर चेहरे पर जल्दबाज़ी और तेज़ी थी, बस के रुकते ही यात्री तेज़ी से आगे बढ़ते और कुछ सामने बोर्ड पढ़कर वापिस उसी जगह जा खड़े होते। नारियल की गरी, मरूंडा और छोटी-मोटी चीज़ें बेचने वाले लपक-लपक कर बस में जा चढ़ते। कुछ कंडक्टर की फटकार के भय से दरवाज़े पर आधे लटकते से आवाज़ें देने लगते।
चंडीगढ़ जाने वाली वॉल्वो के रुकते ही निरंजना उचक कर बस में चढ़ गई और जोर से ताली बजाते हुए मर्दाना आवाज़ निकाली। उसकी आवाज़ सुन सुस्ता रहे मुसाफिर चौकन्ने हो गए। कंडक्टर ने बाहर निकलते वक्त उसे कोहनी मार दी।
वह भड़क गई – मेरे बाप के साले, अगर फिर कोहनी मारी तो तेरी बस तो क्या तू भी समराला चौंक नहीं लाँघ सकेगा। भुलावे में मत रहना। बहन का दीवा – घर जाकर माँ-बहन को कोहनी मारना। बहन चो..... कुत्ता। उसका गुस्सा उबल रहा था।  कंडक्टर खिसियाना सा हो नीचे उतर गया। मूँछों को ताव दे रहे मुस्कुराते ड्राइवर की शक्ल ऊपर लगे शीशे में काँप रही थी।
निरंजना ने मर्दाना स्वर में हक़ से अपनी वसूली माँगी। उसके हाथ में दस-दस, बीस-बीस नोटों की बनाई हुई गट्ठी थी।  ताली की कर्कश ध्वनि के साथ-साथ उसका मर्दाना भद्दा स्वर बस में गूँज रहा था।
यात्री उसकी तड़क-भड़क को घूर रहे थे।  उसकी चमकीली पोशाक, ज़री वाला दुपट्टा, कलाईयों में मैचिंग चूड़ियां, गले में मोटा हार, हाथ की उंगलियों में नगीनों वाली अंगूठियां, नाखूनों पर नेलपॉलिश, चेहरे पर गहरा मेकअप, बालों में लगाए रंग-बिरंगे क्लिप, सर पर काला चश्मा और दाहिने हाथ में मोबाइल – पहली नज़र में तो यात्रियों को उसके एक सुंदर आधुनिक स्त्री होने का भ्रम होता था परंतु, उसका मर्दाना स्वर और होठों पर छोटे-छोटे रोएं बता देते कि वह किन्नर है।
आजकल शादियों में नेग कम मिलने लगा था। जो मिलता था, उसके इतने हिस्से हो जाते कि गुज़र करना कठिन हो गया था। कोई अन्य वसूली का ज़रिया भी नहीं था। इसीलिए उसने समराला चौक पर अपना अधिकार जमा लिया था और हर बस से उसे अच्छी-ख़ासी वसूली मिलने लगी थी। उसकी सुंदर शक्ल देख कर कोई भी दस, बीस के नोट से कम न देता था। उसकी चोखी वसूली बेशक उसके साथियों को अखरने लगी थी परंतु उसकी दबंगता और झगड़ालूपन से वे डरते थे। महंत को उसका हिस्सा वह नियमित देती थी। इसलिए उसे कोई ख़तरा नहीं था परंतु आशा से कई बार उसे डर लगता था। डेरे के साथियों को वहम था कि आशा काला जादू जानती है जिससे वह कुछ भी कर सकती है। निरंजना को उसकी भद्दी आँखों से बहुत डर लगता था। एक दिन उसने आशा से पूछ ही लिया था –
- तुम यह चोला छोड़ क्यों नहीं देती ?
- क्या मतलब है तुम्हारा ?
- सभी कहते हैं कि तुम्हारे पास तो बला का जादू है। मार कोई जादू, क्या रखा है इस दोहरे तन में, न पुरुष न औरत।
- चुप कर, बकवास मत कर। इस बार मैंने एक सन्यासी योगी को पटा लिया है। बंगाली है वह। अमावस की रात को काले बकरे की बलि मांगता है, और इस के बाद शायद काला जादू सिखा दे। मैंने उसके पास काले साँपों का पिटारा देखा है।
पर सभी जानते थे कि उसने न तो बलि दी थी और न ही काला जादू सीखा था। वैसे वह कभी-कभी इस देह से मुक्ति चाहती थी। उसने एक दिन निरंजना से कहा था –
      तू कोई उपाय कर। बलि तो हम रोज़ ही देती हैं अपने स्व की। ढूँढ तू भी कोई काले जादू वाला जोगी मांदरी। हम उसे सब कुछ देंगे पुरुष और स्त्री भी।
और दोनों उदास सी हँस पड़ी, परंतु उनको काला जादू बताने वाला कोई नहीं था।
यह योनी चौरासी लाख योनियों से बाहर है। शायद हम चौरासी लाख योनियों से निकाले हुए हैं। इसी कारण हमारी मुक्ति नहीं होती। न अपना कोई धर्म है न, न जाति, न कौम, न कोई रब। हम तो ब्राह्मांड में टूट कर भटकते नक्षत्रों की भाँति हैँ। यह भटकन साली मुक्ति नहीं होनी देती।
उसकी आँखों के समक्ष बचपन के धुंधले साये लहराने लगे। काले रंग का बाप, सावले रंग की माँ। दोनों के चेहरों पर चिंता की रेखाएं। उसके पैदा होने के कुछ सालों के बाद शरीर में ऐसे नक्श उभरने लगे कि माँ-बाप चिंतातुर हो गए कि इस बच्चे का क्या किया जाए। बाकी भाई-बहनों को अभी उतनी समझ नहीं थी।  माँ उसे छुपा-छुपा कर रखती। साये की भाँति उसका पीछा करती। उसे बाहर न जाने देती। अकेली को नित्य क्रियाएं भी न करने देती, नहाने न देती, आस-पड़ोस वालों से मिलने न देती। पिता ने एक दिन फैसला कर लिया कि वह उसका गला घोटकर मार डालेगा परंतु माँ इतनी बेरहम नहीं थी। उसकी कोख तड़प उठी। उसने पिता को ख़बरदार किया कि अगर इसे एक ज़रा सी खरोंच भी आई तो वह खुद पुलिस के पास जाएगी।
फिक्र के मारे पिता की दिहाड़ी में नागे होने लगे। माँ बीमार रहने लगी। वह ज्यों-ज्यों बड़ी हो रही थी घर में चिंता के प्रेत मंडराने लगे। उसके गुरदासपुर वाले मामा ने ही समाधान निकाला था। उसने बॉर्डर के दूर-दराज़ इलाके के एक महंत से बात कर ली थी और उसे रात के अँधेरे में चुप-चाप छोड़ने की तैयार कर ली।
अंतिम बार माँ फूट-फूट कर रोई थी परंतु वह डरी-डरी सी खड़ी थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कि क्या हो गया है। मामा देसा उसे कहाँ ले जाने की बात कर रहा है – उसे कुछ पता नहीं था। देसा चुपचाप बिना आवाज़ किए उसे रात के अँधेरे में लेकर अदृश्य हो गया। माँ ने आस-पड़ोस वालों से ननिहाल भेजने का बहाना बना दिया था।
इसके बाद महंत भोली ही उसकी माई-बाप और उसके जीवन की पालनहार थी। यहाँ रहकर उसने वे तौर-तरीके सीख लिए थे, जिनके सहारे ज़िंदगी का सफ़र चलना था। शुरु-शुरु में माँगते हुए और ताली बजाते हुए उसे शर्म आती थी, परंतु एक दिन महंत ने कस कर तमाचा मारा और सबक दिया था कि – यह ताली ही तुम्हारा रब और अन्नदाता है। यदि तूने इससे मुँह मोड़ा तो सारी उम्र कीड़े पड़ेंगे और नरक भोगना पड़ेगा, आगे फिर पता नहीं ऐसी ही योनी फिर से मुँह फाड़े खड़ी हो।
उसने कानों को हाथ लगाए और इस ताली को इबादत बना लिया। शब्दों में कर्कशता और नफ़रत मिला कर उन्हें कड़कदार बना लिया परंतु उसकी भद्दी आँखों से उसे खुद ही कई बार डर लगता कि ये कैसी हैं ? कई बार उसे लगता कि यह उसकी घिस चुकी और बेआबाद योनी जैसी ही दो योनियां हैं जो उसके चेहरे पर उग आई हैं। इसीलिए उसे लगता कि कोई काले जादू जैसी चीज़ हो तो वह अपने इस भद्देपन पर काबू पा ले और सबकी महंत बन जाए।  इसलिए उसने काले जादू का भ्रम पाल लिया था। उसने एक तोता भी पाल रखा था, जिसका रंग हरे के बजाये पीला और काला था। देखने में वह किसी जंगली पक्षी जैसा लगता था। डेरे में ज़्यादातर लोग तो यही कहते थे कि उसके इस तोते में काला जादू है।
निरंजना कई बार उसकी थोड़ी बहुत मदद कर देती। उसे आशा पर तरस भी आता और हँसी भी। एक दिन उसने आशा से कहा था –
- चलो हम दोनों शादी कर लें। अरी, मेरा बहुत दिल करता है कि कोई मेरा भी हाथ मरोड़े।
- चुप कर शादी की बच्ची, तेरे पास है ही क्या। तुम्हारे घर में तो माँगने पर नेग भी न मिलेगा।
- चिंता मत कर मैं सब कर लूंगी। बस, तू एक बार हाँ कर दे। क्या पता इसी तरह इस योनी से मुक्त हो जाएं।
वे दोनों उदासी में डूब गई थीं।
निरंजना को किसी साथी ने बताया था कि अगर शादी कर ली जाए तो इस इस योनी की बला गले से टल जाती है। उसने कई साथियों को टटोला परंतु किसी ने हामी नहीं भरी थी। कोई भी शादी के लिए तैयार नहीं था।
एक दिन उसने नगीना को भी टटोला था परंतु उसने हँसीं में बात टाल दी। उसने आगे उससे कहा था – क्या फर्क पड़ता है नगीना, अगर तू मान जाए तो हम यहाँ से भाग जाएंगी। नगीना ने उसे कहा था कि ऐसी ग़लती मत करना, मौत के मुँह में जा गिरोगी। अगर शादी का इतना ही शौक है तो कुमागम चली जा। वहाँ देवता के साथ शादी हो जाती है और अगर अच्छा न लगे तो सुबह होते ही टूट भी जाती है। मैंने भी यह स्वाद चख रखा है।
उसे समझ नहीं आया था, उसने नगीना को विस्तार से बताने के लिए कहा। 
तुमने कभी महाभारत की कथा सुनी है ?  जब कौरवों-पांडवों का युद्ध हुआ तो सहदेव से पूछा गया कि इस युद्ध में जीत किसकी होगी ?  उसने आकाश की तरफ देख कर भविष्यवाणी की और कहा कि जीतेंगे तो पांडू परंतु इसके लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में पूर्ण पुरुष की बलि देनी होगी। उस समय धरती पर तीन ही पूर्ण पुरुष थे – श्रीकृष्ण, अर्जुन और उसका पुत्र इरावन। इनमें से पहले दो की बलि दी ही नहीं जा सकती थी। अंततः इरावन को बलि के लिए मनाया गया। वह तैयार तो हो गया परंतु उसने एक शर्त रख दी कि बलि से पहले उसकी शादी करवाई जाए। यह शर्त बड़ी कठिन थी क्योंकि बलि चढ़ते ही दुल्हिन ने विधवा हो जाना था। कोई औरत इस के लिए तैयार नहीं हुई। अंततः कृष्ण ने लीला रची और एक सुंदर युवती का रूप धारण कर इरावन से ब्याह रचाया। दूसरे दिन इरावन की बलि दे दी गई। नारी रुपी कृष्ण ने अपने पति की मृत्यु का विलाप किया और अपना पुराना रूप धारण कर लिया। तब से ही अपने जैसे लोग कुमागम जाकर इरावन की मूर्ति के साथ ब्याह रचाते हैं। दूसरे दिन शोभा यात्रा के बाद मूर्ति के सिर को उतारकर बलि दे दी जाती है। हम सभी वहां रोना-धोना, स्यापा करते हैं। सफेद कपड़े पहनकर इरावन की विधवाएं बन जाती हैं। जा वहां तेरे जैसे हजारों यही करने आते हैं। मैं भी एक बार स्यापा कर आई हूँ
वह चुप हो गई। घोर उदासी खोई उसकी आँखें मानों आसमान में इरावन का सर ढूँढ रही थी। निरंजना के मन में यह बात गहरे तक घर कर गई थी।
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 डेरे में शोर सुनाई देने लगा। शायद शमला और उसके साथी साज़ बजा कर मन बहला रहे थे। परंतु, निरंजना को यह शोर  परेशान कर रहा था। उसका ध्यान तो कुमागम के इरावन मंदिर के आँगन में भटक रहा था।
उसने चुपचाप पैसे जमा करने शुरू किए। उस का एकमात्र मकसद रह गया था कि वह कुमागम जाए और इरावण की पत्नी बने। उसे विधवा हो जाने का इतना डर नहीं था जितना ब्याह का शौक था। वह बस ड्राइवरों, कंडक्टरों से कुमागम का रास्ता पूछती परंतु किसी को नहीं पता था। वह तो हज़ारों मील दूर चेन्नई में था। कई बार उसे लगता कि यह उसका पागलपन है। इतनी दूर तो वह कभी गई ही नहीं थी। न रास्ते का पता, न मंदिर का पता। कहाँ ढूंढेगी वह, कहीं भटक ही न जाए। एक दिन उसने शमला से मिन्नत  की कि वह उसे इस बारे में पता करके बताए। शमला रेलवे स्टेशन से सारी खोज-ख़बर ले आया था। निरंजना के अब हौंसले बुलंद थे। उसके जाने का वक्त आ गया था। नगीना और आशा के सिवाय डेरे में किसी को नहीं पता था। शमला उसका राज़दार बन गया था।
.......और एक दिन वह लुधियाना रेलवे स्टेशन से चलकर चेन्नई से दो सौ किलोमीटर दूर कुमागम पहुँच गई थी। उसे लग रहा था जैसे वह मंज़िल पर पहुँच गई हो। वहाँ पहुँचकर मानो उसकी रुह को सुकून मिल गया था। क्या माहौल था वहां। जश्नों और खुशियों से भरा पूरा मेला था और मेले में सभी उसके बिरादरी के भाई-बंधु। किसी से कोई पर्दा नहीं, कोई छुपाव नहीं। बेशक उन्हें एक दूसरे की भाषा नहीं आती थी परंतु अंदरूनी दुख-दर्द की भाँति अंदरूनी भाषा को भी समझते थे। हर किसी ने चमकीले वस्त्र पहन रखे थे। गहरा मेकअप, कानों में झुमके, बालों में क्लिप, एक परिचित से परफ्यूम की खुशबू, कलियों के गज़रे बालों और हाथों में लटकते हुए। उसकी पोशाक पंजाबी होने के कारण उसे कुछ अजीब सा लगता था परंतु पास से गुज़रता हर साथी उससे बड़े अपनत्व से पेश आता।
रात उसने कर्नाटक के एक साथी शिंटम के साथ गुज़ारी।
अगले दिन चालन समागम था। शिंटम ही उसे मंदिर के आंगन में ले गई। उसने मंदिर के बाहर से कलियों का गज़रे खरीद कर सजा लिए थे। ब्याह रचाने वाले सभी किन्नर हार-श्रृंगार करके दुल्हन के रूप में आँगन में बैठे थे। पूरा आँगन कलियों की भीनी-भीनी खुशबू से भरा पड़ा था। मंदिर की काली और धुंआई छत उसे बड़ी अजीब लग रही थी। पुजारी ने हर एक की कलाई पर हल्दी का एक टुकड़ा बाँध दिया। पुजारी ने कई अन्य रस्में भी कीं। फेरों के बाद सभी खूब नाचे। एक दिन के लिए इरावन उनका पति था और वे सभी उसकी सुहागिनें थीं।
उधर के सभी एक दूसरे को अम्मा कहकर बधाइयां दे रहे थे परंतु निरंजना को सभी मम्मी कह रहे थे। उसे बड़ा अजीब लग रहा था। शिंटम अम्मा ने निरंजना को बताया कि उत्तर भारतीयों को हम अम्मा नहीं मम्मी कहते हैं। आधी रात तक ढोल-बाजे के साथ नाच-गाना हुआ। खूब खाया-पिया।
 ....और धीरे-धीरे उत्सव रात ढलने की भाँति ख़त्म होने लगा।  नाच-गाना मध्यम होता गया। थकावट और उदासी से आँखें बोझिल होने लगी। निरंजना का भी सोने का मन था परंतु शिंटम अम्मा ने कहा कि अब सोने का वक्त नहीं है। जल्दी ही सुबह होने वाली है। वह कुछ नहीं समझी थी
सुबह होते ही मंदिर के आँगन में प्रकाश फैलने लगा। रात के नाच-गाने का शोर मानो अभी भी कहीं आस-पास बैठा सुस्ता रहा था। रात को ब्याही साथिनें आँगन में एकत्र होने लगीं। शोभा यात्रा की तैयारी की जा रही थी। एक खुली जीप के मंडप में इरावण की मूर्ति सजा दी गई। उसकी सारी दुल्हिनें पीछे-पीछे हल्का हल्का सा नृत्य करती हुई जा रही थीं। ढोल-मंजीरे, चिमटे बज रहे थे, पुष्प वर्षा हो रही थी।
शोभा यात्रा जल्दी ही मंदिर तक वापस आ गई। निरंजना बड़ी उत्सुकता से सब कुछ देख रही थी। शिंटम अम्मा ने ही उसे बताया था कि –
 अब बलि की रस्म होगी। यह हमारी ज़िंदगी का दुखद पल है, जब हम ब्याहताएं होकर एक ही झटके में विधवाएं हो जाएंगी।
पुजारी ने बलि-बेदी पर इरावन की मूर्ति सजा दी। उसके तिलक गया। पुष्प वर्षा की गई। कच्ची लस्सी के छींटे मारे गए। उसके साथ ब्याही गई सभी की माँग में आख्ररी बार सिंदूर भरा गया। सभी इरावन के अंतिम दर्शनों के लिए बारी-बारी से सामने आकर हाथ जोड़ कर नमस्कार करतीं, पुष्प वर्षा करके पीछे लौट जातीं।
पुजारी ने अंतिम मंत्रोच्चार किया। सभी के प्राण सूख गए, उन्होंने ने हाथ जोड़ लिए। हरेक की नज़रें एक टक इरावन के सर पर टिकी हुई थीं मानो सब के भीतर एक ख़ामोश महाभारत छिड़ा हुआ हो जैसे कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव-पांडव आमने–सामने डटे हों।  पुजारी के दो साथियों ने शंखनाद किया और एक दर्दनाक काँपती सी आवाज़ मंदिर के आँगन और दीवारों में गूंज गई।  पूर्ण पुरुष की बलि दे दी गई थी। मूर्ति का सर उतर चुका था। बलि की रस्म संपन्न होते ही शोर-शराबा और स्यापा शुरू हो गया था।  विभिन्न भाषाओं के शोकालाप हवा में गूंजने लगे। निरंजना और उसकी सखियों ने बाँहों में पहनी रंग-बिरंगी चूड़ियां तोड़ डालीं। गज़रे तोड़ दिए, माँग से सिंदूर पोछ दिया। चेहरों पर से गहरा मेकअप उतार दिया। चमकते चेहरे उदासी में डूब गए। धीरे-धीरे सभी ने श्वेत वस्त्र पहनकर विधवाओं का रूप धारण कर लिया। इरावण की मृत्यु का मातम चारों तरफ था। निरंजना के लिए यह बड़ा ही विलक्षण तजुर्बा था। ब्याहताएं विधवाओं के रूप में एक-एक करके बलि वेदी से उतारी गईं इरावण की मूर्ति को प्रणाम करके जा रही थीं। हर एक के मन में यही इच्छा थी कि इरावण की पत्नी बनने के बाद वे इस योनी से मुक्त हो जाएं।
शिंटम अम्मा उसे झोपड़ी में लेकर आ गई। सभी साथी बिछड़ रहे थे। जो एक दूसरे से परिचित थे वे अगली बार मिलने के वादे कर रहे थे। अम्मा ने उसे इरावन की एक छोटी सी मूर्ति और मोतियों की माला भेंट स्वरूप दी, परंतु उसके पास तो देने के लिए कुछ नहीं था। उसने वादा किया कि अगली बार वह कोई सौगात उसके लिए ज़रूर लेकर आएगी।
अम्मा उसे चेन्नई स्टेशन तक छोड़ कर गई। गाड़ी में बैठे काले, उँचे, लंबे, बनियानें-लूंगी पहने और पैरों में हवाई चप्पल पहने लोग उसे बड़े अजीब लग रहे थे। वह पटर-पटर बोलते तो लगता मानो पीपे बज रहे हों। एक शब्द उसे बार-बार सुनाई देता अई अई ओ। सुनकर उसे हंसी आ जाती है।    गाड़ी चल पड़ी, सफर बहुत लंबा था। उसे लग रहा था मानो सचमुच वह अपने किसी बड़े परिवार से विधवा हो कर बिछुड़ रही हो, मेले की रौनक, मंदिर का आँगन, रंग-बिरंगे लोग और इरावण की सर कटी मूर्ति सब कुछ उसके साथ साथ चल रहे थे। इरावन का कटा हुआ सर याद आते ही वह काँप उठी।   
वह सोच रही थी जब यह सब कुछ वह अपनी सहेलियों को जाकर बताएगी तो कौन उसका यकीन करेगा कि वह एक शादीशुदा विधवा थी। उसके बदन में झुनझुनी सी दौड़ गई। धीरे-धीरे सरकती ट्रेन की गति बढ़ रही थी। पहियों के घर्षण की आवाज़ कानों में गूंजने लगी। बाहर सब कुछ घूमता नज़र आ रहा था। अचानक उसका ध्यान बंट गया था। अचानक टिकट चैकर ने उससे झिंझोड़ते हुए पूछा - अम्मा किधर को ? टिकट ?
 उसके मुँह से इतना ही निकला -  मैं अम्मा नहीं मम्मी हूँ और वह टिकट ढूँढने लगी जो उसके पास था ही नहीं।



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