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रविवार, जुलाई 17, 2011

कहानी श्रृंखला -13 (पंजाबी)


समंदर की तरफ खुलती खिड़की  -  जसबीर भुल्लर



                                                                                                         

वे घरों को नहीं लौट सकेंगे। इंतज़ार करते-करते माएं बूढ़ी हो जाएंगी और मर जाएंगी। पता नहीं वे संख्या में कितने थे।मैं भी उन्हीं में से था। मेरी आँखों में भी सेल्युलॉयड के सपने थे। वे सपने भी फ़िल्म का रूप नहीं ले पाए थे, पिघल कर आँखों में जम गए थे।
एक साल !
दो साल !
और फिर तीन साल !

बंबई मुझे घूंट-घूंट कर पीती जा रही थी। समुंदरी हवा के फूलों में महक नहीं थी। मैं अपनी मुहब्बत के दिनों का भगौड़ा था, मुझे बंबई की गलबहियां चाहिए थीं परंतु बंबई के पास न बाँहें थीं और न ही कांधा। बंबई रूह रहित ताबूत थी। मेरी तीन वर्षों की लाश उसमें पड़ी तिड़क रही थी। मैं अब अपने वो तीन साल कहाँ से लाऊँ? छत से लटक रहा पुराना पंखा चीख रहा था। मेरे कमरे के दोनों साथी जा चुके थे।घोष और देसाई आज फिर जगह-जगह जाएंगे। निर्माता और निर्देशकों से मिलने की कोशिश करेंगे। कभी किसी दर से झाड़ खा कर लौट आएंगे और किसी अन्य दरवाज़े से भ्रम की उंगली थाम लेंगे। जब वे शाम को लौटेंगे, उनके जिस्म में दिन भर की थकावट होगी और हाथों में सपनों की किरचें।

मैं आज किसी स्टुडियो का चक्कर नहीं लगाना चाहता था। मैं अपनी ज़िल्लत को एक दिन का विराम देना चाहता था। मेरे जाने से वैसे भी कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला था। गर्म हवा उसी तरह ख़ामोश रहने वाली थी। मैं बड़ा अभिनेता नहीं था। मैं एक्सट्रा था, मिन्नतों की भीड़ में घिरा एक एकस्ट्रा।

    -                  -                    -


मैं अकेला नहीं था।
नमकीन टापू पर आदमियों का हजूम था।
वे किधर जा रहे थे?
वे क्या ढूंढ रहे थे?
मैं उनके पीछे-पीछे क्यों चल पड़ा था?
थकी सड़कों को भी मेरी आवारगी से कोई गिला न था।
दोपहर को मैंने कोलाबा के एक पारसी रेस्तरां में भरपेट भोजन किया, चाय पी और चल पड़ा।
मैं चाहता था कि मैं इतना चलूं, इतना थक जाऊं कि शाम तक अपनी तरफ लौटने का ख़याल ही न आए।
मेरे चारों तरफ परेशान समंदर था। अगली सुबह अभी दूर थी। अभी तो चिपचिपा दिन बाकी था। मेरे और अगली सुबह के बीच रात का आगमन शेष था।

मैंने लोकल बस पकड़ी और बंबई सेंट्रल जा उतरा। लैमिंगटन रोड होते हुए मैं कृष्णा सिनेमा जा पहुंचा। वहाँ खड़ा मैं फिल्मों के पोस्टर देखता रहा। अभी शाम नहीं ढली थी। मैं कृष्णा सिनेमा के पीछे कृष्णा पूरी हाउस में जा बैठा। मुझे चाय की तलब नहीं थी, परंतु मुझे अभी कुछ वक्त और गुज़ारना था। मैंने एक कप चाय मंगवाई और धीरे-धीरे घूंट भरने लगा। बाहर ठर्रे वाला खुदाबख्श दिखा तो मैं उठ खड़ा हुआ। चाय के पैसे दिए और बाहर निकल आया। मैंने उससे एक अधिया लिया और पुराने अख़बार के टुकड़े में लपेट कर बोतल को कंधे पर लटकते झोले में डाल लिया। मैंने घड़ी देखी, मेरे पास और दो घंटों का वक्त था। शाम के धुंधलके में मैं चौपाटी तट पर पहुंच गया। बीच पर रौनक बढ़ रही थी। भेल-पूरी और चाट वालों के गिर्द हजूम एकत्र हो गया था। लोग चटपटी चीज़ें खाने के लिए तड़प रहे थे। समंदर बिलकुल अकेला था।

‘बाबू, तफ़रीह के लिए साथ चाहिए क्या?’
एक अठारह-उन्नीस वर्षीया युवती ने बेझिझक मेरा हाथ पकड़ लिया।
मैंने उसका हाथ झटक दिया।
उसकी आवाज़ में मिन्नतें सी थीं, ‘बाबू कोई लफड़ा नहीं, कुछ नहीं, एक घंटे का सिर्फ़ दस टका। तुम से जास्ती नहीं मांगता।’
अचानक चौपाटी जगमगाने लगी परंतु पेड़ों की तरफ कोई प्रकाश नहीं था। जोड़े इधर-उधर झाड़ियों जैसे पेड़ों के नीचे बैठे थे। अंधेरा अभी इतना गहरा नहीं हुआ था कि उन्हें छुपा ले। ये पेड़ छाया देने के काम नहीं आते थे, इसी काम आते थे। उस युवती का भी कोई कसूर नहीं। मैं ही बेध्यान सा एक पेड़ के नीचे खड़ा था। पेड़े के नीच खड़े होने का अभिप्राय: यही था कि मुझे औरत का साथ चाहिए था। इन पेड़ों के नीचे लोग किराए के साथी के लिए देर रात तक बैठे रहते थे। उस युवती से पिंड छुड़ा कर मैं आगे बढ़ गया। कार पार्किंग वाले खंभे के पास से गुज़रते हुए मुझे पुराने दिन याद हो आए। खंभे के नीचे दो-तीन युवक खड़े थे।

शाम ढलते ही बंबई वेश्या क्यों बन जाती है?
ये युवक एक-एक करके कीमती कारों में बैठेंगे और चल देंगे। बूढ़ी और अधेड़ औरतें इन युवकों की ग्राहक थीं। इन औरतों के पति फाइव स्टार संस्कृति में डूबे हुए थे। उन्होंने अलग फ्लैटों में रखैलें ऱख छोड़ी थीं। कईयों के पति विदेशों में थे। वे देश में जरूर आया करते थे परंतु बीवियों के लिए नहीं। बीवियां अपने एकाकीपन की आग में सुलगते हुए ब्लयु फिल्मों का आनंद लेतीं और नशे में तारी होकर सो जातीं।

वेश्या का काम जब पुरुष करे तो उसे क्या कहते होंगे? ऐसे शब्दों की तो पुराने वक्तों में ज़रूरत ही नहीं पड़ी होगी। खंभे के पास से ग़ुज़रते हुए मैंने यूं ही सोचा और खंभे से आँख चुरा कर अपनी गति बढ़ा दी। मुझे डर था कि मेरी कोई पुरानी ग्राहक मुझे पहचान कर फिर पीछे न पड़ जाए। फाकामस्ती के दिनों में मुझे क्या-क्या नहीं करना पड़ा था। सड़क पार करके मैंने लोकल बस स्टैंड से फारस रोड की बस ले ली।
जब पहली बार मेरे पाँवों में बीमार गली की उलझनें पड़ीं तो मैं परेशान सा हो गया था। यह अचानक ही हो गया था कि मेरा एकाकीपन दोस्ती के चेहरे तलाशता उस बाज़ार में पहुँच गया था। वेश्याएं जगह-जगह खड़ी थीं, मोड़ पर, जंगलों के पीछे, छज्जों पर। वे गिद्ध की भाँति ग्राहकों को घेर लेती थीं। अश्लील वाक्यों में छुपी मिन्नत। मुझे लगा, वह मैं था, क़तार में खड़ा एक्सट्रा। वह मेरा अपना भाईचारा था। उस वक्त मैं किसी भी चौबारे की सीढ़ियां चढ़ सकता था और मैं अपने चौबारे की अंधेरी और सीलन भरी सीढ़ियां चढ़ गया था।

उस चकले के समूचे वातावरण में एक चिकना सा अंधेरा पसरा हुआ था। एक उदास सी ख़ामोशी ठहरी हुई थी। धंधे वाले कमरे में लकड़ी की खप्चियों के तीन छोटे-छोटे कैबिन बने हुए थे। बाकी जगह में एक मैला और पुराना सोफ़ा पड़ा था। सोफे के सामने एक बेंच था। सौदा तय होते वक्त वेश्याएं आकर बेंच पर बैठ जाती थीं। इतनी तंग जगह में ग्राहक को सहूलियत होती थी। सौदा तय होने के पश्चात् चुनी गई वेश्या बैठी रहती और शेष उठकर भीतर चली जाती थीं। वेश्याएं चार थीं और कैबिन तीन। कई बार ग्राहक को सोफे पर बैठ कर केबिन के खाली होने का इंतज़ार करना पड़ता था। लकड़ी के केबिन, बस नाम मात्र का ही पर्दा थे।

मुझे देख मैडम मुस्कराईं और पुन: ग्राहक के साथ मेल-तोल में जुट गईं। मैं मैडम के पास पड़े स्टूल पर बैठ गया।
कुलविंदर ग्राहक के सामने बेंच पर बैठी हुई थी। पंजाबी बाबू को कुलविंदर के पंजाबन होने पर शक था।
बेटी, सेठ से पंजाबी में बात करो।
कुलविंदर ने टूटी-फूटी पंजाबी बोलने की कोशिश की। कई ग्राहक भी अजीब थे। वे अपनी मान्यताओं, विश्वास और धर्म उठाकर कर चकले पर ले आते थे परंतु उन लड़कियों का धर्म जिस्म था। यह उनके लिए जीने का ज़रिया था। वे अपने ग्राहक के धर्म का सम्मान करती थीं। ग्राहक का धर्म बचाने की ख़ातिर वे अपना नाम भी बदल लेती थीं और धर्म भी। नाम कौन सा पहले भी असली होता था। पंजाबी बाबू ने मैडम की फीस चुकाई और कुलविंदर की बाँह पकड़ उठ खड़ा हुआ। केबिन खाली नहीं था। वह फिर बैठ गया।
केबिन से आती आवाज़ें उनकी ख़ामोशी में और भी ऊँची प्रतीत होती थीं।
‘बहुत दिनों बाद आए हो।’ भीतरी आवाज़ों को ढकने के लिए मैडम ने ऊँचे स्वर में कहा।
‘बस, आ ही नहीं पाया।’
मैडम उठ खड़ी हुई, ‘चलो, भीतर चलो।’

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दूसरे कमरे में नीचे दरी बिछी हुई थी। दीवार के साथ समेटे हुए विस्तर पड़े थे। लड़कियां इस कमरे में बैठती थीं, सोती थीं, रहती थीं। इस कमरे में लकड़ी के तख्तों की पार्टीशन से मैडम के लिए एक कमरा अलग बना हुआ था। कमरे की खिड़कियां समंदर की तरफ खुलती थीं। एक खिड़की मैडम के केबिन में थी और एक लड़कियों के कमरे में। शाम के वक्त समंदर की लहरें शोर मचाने लगती थी। क्रोधी लहरें पत्थरों से टकरा कर बिखर जाती थीं। समंदर की बेबसी साफ़ झलकती थी।

लड़कियां समंदर से परेशान थीं। समंदर उनको उदास करता था। मैडम उठकर धंधे वाले कमरे में जा चुकी थी।
मैंने गिलास खाली कर दूसरा पेग बनाया। पानी लाने के लिए उठने लगा तो कमरे का मैला पर्दा उठाकर शीरीं ने भीतर झांका। वह अभी खाली हुई थी। उसने दौड़ कर आकर मेरे गले में बाँहें डाल दी। मैं शीरी को अच्छा लगता था। मैंने हैरान होकर सोचा, कहीं शीरी कोई ख्वाब तो नहीं पाल बैठी।

चकले की लड़कियां पगली थीं। कोई मलबे की ईंटों की तरफ इशारा करता था तो वे घर बनाने लगतीं। उनके ऐसा करने पर धंधा चौपट होने का संशय बढ़ जाता। उस वक्त ज़रूरी हो जाता था कि उन्हें वहां से बदल दिया जाए। नया चकला, नया नाम, नए ग्राहक, क्या पता ख्वाब फिर से बने या न बने। कोई सपनों की कौड़ियां बिखेरने वाला आए, न आए।शीरी ने पानी लाकर मेरा गिलास भर दिया और अपने लिए अलग पेग बना लिया। ‘कई ग्राहक तो बस सरदर्द ही होते हैं। अभी जो गया है वह तो रट लगाए बैठा रहा कि.....’ शीरी ने गिलास एक ही झटके में आधा खाली कर दिया और नीचे रख कर बोली, ‘सच अमर मैंने तो उसको साफ़ बोल दिया कि भई यह तो मेरा पेशा है परंतु मेरे होठों पर सिर्फ़ एक का ही हक है।’

मैंने हैरानी से शीरी की तरफ देखा। शीरी की आँखें भर आईं थीं। घुटने पर ठुड्डी टिकाए, नाखुन से दरी पर लकीरें खींचने लगी और फिर सर उठा कर धीरे से कहा, ‘अमर मैं वेश्या ही सही, पर.....। मैं अपनी कोई चीज़ तो किसी को पवित्रता के साथ दे सकूं।’ समूचे चकले पर हर वक्त बोझिल सा अंधेरा फैला रहती था। मुझे उस पल अंधेरे की बोझिलता की वजह समझ आई। मैंने जल्दी से शराब का गिलास खाली कर दिया। उस रात मैंने खूब शराब पी, उलटियां कीं और सो गया। तड़के मेरी नींद खुली। रात के जागरण के बाद थकी-टूटी लड़कियां बेसुध सोई पड़ी थीं। वे किसी उजड़े काफ़िले की भाँति इधर-उधर पसरी हुई थीं। वे दोपहर तक इसी तरह सोई रहेंगी। जब लोगों का दिन चढ़ता है तब चकले के बेटियों की रात होती है।

मेरा सर दुख रहा थी। मुँह का सवाद भी बकबका सा था। मैंने दीवार से तकिए की टेक लगा ली और अधलेटा सा पड़ा रहा। वह कमरा पंखविहीन चिड़ियों का घोंसला था। सोई हुई वे बहुत मासूम और भोली लग रही थीं जैसे कि बहनें हुआ करती हैं। वे सचमुच बहनें ही लग रही थीं। वे मेरे साथ शरारतें भी बहनों की भाँति ही करती थीं। कभी कोई मेरे कंधों से पकड़ कर मुझे पीछे की तरफ गिरा जाती। कोई पास से गुजरते वक्त मेरे बाल बिखेर जाती। कोई कंघी लेकर मेरे बालों में अलग तरह से कंघी करने लगती। कोई मेरे कंधे से झोला उतार कर टटोलने लग जाती। मैं भूखा नंगा ग्राहक इस चकले का इतना क़रीबी कैसे हो गया? मैं चकले के बिस्तर पर घर के सदस्य की भाँति पड़ा हुआ था और मुझे रिश्तों के चेहरे नज़र आ रहे थे।

मैंने सोचा जब मैं बड़ा ऐक्टर या डायरेक्टर बन जाऊंगा तो एक बहुत बड़ा बंगला खरीदूंगा। सभी को वहाँ ले जाऊंगा। वहाँ ये एक कमरे में इस तरह दरी बिछा कर नहीं सोएंगी। सभी वहाँ रहेंगी और मैं एक-एक करके अपने हाथों इनकी शादियां करूंगा। मै़डम शायद मुझसे भी पहले जग गई थी। उसने मुझे पानी पिलाया और फिर दो गिलासों में चाय ले आई। चाय पीते हुए मैंने उसे अपने मन की बात बताई। वह खिलखिला कर हंस पड़ी। लड़कियां नींद में ही सिहर उठीं। हंसते-हंसते फिर वह रोने लगी। मन कुछ हल्का हुआ तो उसने आँखें पोंछ डालीं। लंबी आह भरकर कहा, ‘अमर बहन बनने का नसीब किसी वेश्या के पास नहीं होता। बस बीवी बनने का छोटा सा सपना होता है, वह सपना भी कुछ बरसों तक आँखों में रहकर खुद ही मर जाता है।’

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मैं कल्याण स्टुडियो से बाहर आया तो पूरे पाँच सौ रुपए मेरी जेब में थे। ऐकस्ट्रा के काम के पाँच सौ रुपए। मैं चकित था। मेरी ड्राइवरी काम आ गई थी। ऐकस्ट्राज की उस भीड़ में मैं अकेला था जिसे ड्राइवरी आती थी। अत: मुझे चुन लिया गया। रोल कुछ ऐसा था, हीरोइन बदमाशों के चंगुल से निकल भागी थी। मैं ट्रक में स्मगलिंग का सामान ले रहा था। हीरोइन सामने से गिरती पड़ती आ रही थी। वह मेरे ट्रक के सामने गिर कर बेहोश हो गई। मैं उसे उठा कर अड्डे पर ले गया। हीरोइन को दोनों बाँहों में उठाए मैं बड़े हॉल में पहुँचा, ‘बॉस, आप के लिए तोहफा लाया हूँ।’
‘कट।’

मुझे पहली बार डायलॉग बोलने का मौका मिला था। मुझे उम्मीद जगी कि धीरे-धीरे बड़े रोल भी मिलने लगेंगे। मैं अपनी खुशी किसी के साथ बांटना चाहता था। कहाँ जाऊँ? मैंने दोस्तों के बारे सोचा तो मैडम का चकला याद आया। यह धंधे का वक्त नहीं था। मैं बेहिचक जा सकता था। मैंने मिठाई ख़रीदी। गरम-गरम समोसे पैक करवाए और फारस रोड पहुँच गया। सभी लड़कियां मेरे गिर्द झुरमुट डाल कर बैठ गईं। उनकी खुशी संभाली नहीं जा रही थी। वे शूटिंग की एक-एक बात जानना चाहती थीं।

‘हेमा मालिनी कैसी है ?’
‘तुमने तो हेमा से बातें भी की होंगी।’
‘इतनी भारी को तुमने उठाया कैसे ?’
मैं फ़िल्म में अपने रोल के बारे में उन्हें बढ़ा-चढ़ा कर बताता रहा।
चाय पीते वक्त मुझे ध्यान आया कि मैडम नहीं थी।
शीरी ने मेरे थैले से पत्रिकाएं निकाल कर दरी पर बिखेर दीं। माला और शीरी एक ही पत्रिका में कोई तस्वीर देख रहीं थीं। कुलविंदर और राधिका समोसे खाने में जुट गईँ।

‘मैडम कहाँ है ? ’ मैंने पूछा।
‘अस्पताल।’ शीरी ने पत्रिका बंद कर परे रख दी।
‘असपताल ? ’
‘उन्हें तो एक हफ्ता हो गया दाखिल हुए।
मुझे कैसे पता चलता। मैं इतने दिन आया जो नहीं था। मेरे पास पैसे नहीं थे न। मैंने पूछा, ‘अब क्या हाल है?’
‘पता नहीं।’
‘क्यों?’
‘हमें जाने की मनाही है न। दादा तो कुछ बताता ही नहीं। उसकी लाल-लाल आँखें देख कर वैसे भी बात करने की हिम्मत नहीं होती।’ शीरी ने मेरी बाँह पकड़ कर मिन्नत की, ‘प्लीज आप जाकर पता कर आएं न।’ मुझे और कोई काम नहीं था। मैं खाली ही था। रास्ते में मैंने फल वाले से केले और अंगूर खरीद कर अलग-अलग लिफाफों में डलवा लिए। उसे किसी के आने की उम्मीद नहीं थी। वह आँखें बंद किए पड़ी थी। उसके चेहरे पर सड़क किनारे लावारिस पड़े किसी अनाथ के चेहरे जैसे लाचारी थी। चेहरे के पीलेपन ने उसकी लाचारगी के रंग को और गहरा कर दिया था।

मैंने बिस्तर के पास पड़ी तिपाई पर दोनों लिफाफे रख दिए। उसने आँखें खोलीं और घबरा कर सजग सी हो गई। पलंग के साथ टेक लगा कर अधलेटी सी बैठ गई। कुछ पलों तक उसकी आँखें हैरानी से मुझे देखती रहीं। उसके होंठ मुस्कराए और आँखों से आँसू बहने लगे।
मैंने लोहे का स्टूल खींचा और उसके क़रीब हो कर बैठ गया। मैंने उसके हाथ को सहलाया, ‘प्लीज़ मैडम।’ उसने जल्दी से आँखें पोंछ डालीं और फिर दाएं-बाएं देखा। यह मरीज़ों से मुलाकात का वक्त था। दोनों तरफ की मरीज़ महिलाएं अपने-अपने रिश्तेदारों से बातें कर रही थीं। हमारी तरफ किसी का ध्यान नहीं था। उसने धीरे से कहा – ‘अमर, प्लीज़ यहां मुझे मैडम मत कहो।’

मुझे उसका नाम नहीं मालूम था। अपना नाम तो उसे भी नहीं मालूम था। उसने पता नहीं अब तक कितने चकले देख लिए थे। हर नए चकले पर वह नए नाम से रही थी। अब वह सिर्फ़ ‘मैडम’ थी और चकले की मैड़म का कोई नाम नहीं होता। 
‘अमर जानते हो मैं बहुत अकेली थी। निराश से स्वर में उसने कहा।’ 
‘बंबई में हम सभी अकेले हैं।’
‘नहीं अमर। तुम नहीं समझते। शाम के वक्त सभी मरीज़ों के पास कोई न कोई मिलने वाला बैठा होता है। एक मैं ही थी....।’ उसने आँसू पोंछ लिए परंतु आँखें फिर भी नम ही रहीं। उसने कहा, ‘मुझे भय था कि कहीं मुझे अस्पताल से निकाल ही न दिया जाए। सब देखते होंगे कि मेरे पास कोई नहीं आता। अब तुम आ गए हो न, मुझे अस्पताल से अब कोई नहीं निकाल सकता।’
‘परंतु मैं तो यहाँ किसी डॉक्टर को नहीं जानता।’
‘इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अब वे लोग समझेंगे कि मैं भी इज़्ज़तदार महिला हूँ।’
उसका भय किसी मासूम बच्चे के भय समान था।
‘अगर ऐसी बात है, तो मैं रोज़ आया करूंगा।’
‘सच।’ पल भर के लिए तो मानो उसे यकीन ही नहीं आया। उसने बालसुलभता से कहा, ‘पहले तो मैं मुलाकात के टाईम पर आँखें बंद किए पड़ी रहती थी। अब मैं बैठ कर तुम्हारा इंतज़ार किया करूंगी।’
‘अगर दादा बारी-बारी से लड़कियों को भी आने की इजाज़त दे दे तो....।’
‘नहीं अमर। देखते ही उनके वेश्या होने का पता चल जाता है। फिर तो यहाँ कोई मेरा इलाज भी नहीं करेगा।’ दीवार की तरफ देख उसने ठंडी आह भर कर कहा, ‘वैसे भी यह धंधे का वक्त होता है न। लड़कियों को तैयार होकर बैठना होता है।’

जब मैंने उसे फल खा लेने की हिदायत दी तो एक बार फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने आँखें पोंछी और आवाज़ देकर साथ वाली मरीज़ को फल लेने के लिए कहा। मैंने उठ कर मैडम के हाथ से लिफाफा ले कर उस मरीज़ की तरफ बढ़ाया। मैडम ने ज़ोर देकर उसे फल दिए। दूसरी तरफ की मरीज़ को भी इसी तरह ज़ोर देकर फल दिए। उसकी कोशिश थी कि सभी देख सकें कि उसे भी कोई मिलने आया है।
मैडम की बीमारी भी अजीब थी। बैठे-बैठे उसका दिल डूबने सा लगता। बेहोश हो जाती। जब होश आता तो बेहद सर दर्द करता। लगता सर टुकड़ों में बंट जाएगा।

वे पहले से अच्छी थीं परंतु लगता था उसका असली इलाज डॉक्टर के पास भी नहीं था। कोई रिश्ता सर उठा रहा था यह मेरा जानलेवा एकांत था। मैं आए दिन उसे मिलने अस्पताल पहुँच जाता। उसके पास स्टूल खींच लेता और फिर बहुत देर तक हम लोग धीरे-धीरे बातें करते रहते।
‘माँ को यह नाम बहुत पसंद था। पिता जी को यह नाम पसंद नहीं था। साहिबा प्रेमिका का नाम जो ठहरा, इसलिए।’
‘साहिबा! ’
‘हाँ साहिबा!’ वह मानो खुद से ही बातें करने लगी। माँ कहा करती, ‘कोई राजकुमार घोड़े पर सवार हो आएगा और मेरी साहिबा को अपने साथ ले जाएगा। चली जाने के बाद मैं अपनी साहिबा को याद कर बहुत रोया करूंगी। माँ को रोना अच्छा लगता था। रोना मुझे भी अच्छा लगने लगा है।’ वह जो मृग-तृष्णा बन उसे चकले तक ले आया था, उसकी भला वह क्या बात करती। बोलना चाहा परंतु...

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मेरे लिए उन्हें कैमरे का ऐंगल बदलने की ज़रूरत नहीं थी। हीरो ने मेरे मुँह पर घूंसा मारा। घूंसा असली था। मेरी आँखों के समक्ष तारे नाचने उठे। मैं पीछे की तरफ गिरा और लकड़ी की रेलिंग तोड़ नीचे आ गिरा। शॉट ओ. के. हो गया। परंतु मेरा जबड़ा अभी भी दुख रहा था। मैं लकड़ी की रेलिंग समेत नीचे गिरा था। मेरी पीठ भी बुरी तरह दुख रही थी। एक्सट्रा के काम की पेमेंट उसी दिन हो जाती है परंतु मेरे अभी एक-दो सीन बाकी थे। यानी अभी और पिटाई खानी शेष थी। उसके बाद ही पैसों का भुगतान होना था। मैं वापिस पहुंचा तो गेस्ट हाउस के कांउटर पर घोष खड़ा था। उसने मुझे तार थमा दी। मेरे कंधे पर हाथ रख कर उसने एक-दो बार थपथपाया।

मैं हाथ में पकड़े क़ाग़ज़ के टुकड़ों से डर गया था। बिना कोई बात किए मैं कमरे में आ गया परंतु अक्षरों की ज़बान ख़ामोश नहीं थी। मेरे हाथ में पकड़ा क़ाग़ज़ कंपकपाया। माँ नहीं रही थी। पथराया सा मैं वही बैठ गया। मेरे सामने रखा तार पंखे की हवा से फड़फड़ा रहा था।
क्या आख़िरी वक्त में माँ ने मुझे याद किया होगा? मेरा नाम लेकर पुकार होगा? उम्मीद से दरवाज़े की तरफ देखा होगा?
काग़ज़ का टुकड़ा हवा से फड़फड़ाया और उड़ कर कमरे के कोने में जा लगा। आते वक्त मैं माँ को सपनों के सब्ज़ बाग दिखा आया था। माँ सपनों की तासीर जानती थी। मुझे रोकने के लिए उसने आख़िरी बार मिन्नत की। मेरी तरफ अपनी बाँह बढ़ाई। उसका हाथ मुझ तक नहीं पहुँचा परंतु मैं उसके हाथों की काँपती उंगलियों को देखता रहा था। उस दिन मेरे सपनों के कुहासे में माँ की मिन्नतें खो गई थीं। मैं चारपाई से उठकर नीचे फर्श पर बैठ गया था। घुटनों में सर दिए मैं पता नहीं कितनी देर यूं ही बैठा रहा।

कमरे में तीन चारपाईयों की जगह थी। तीन चारपाईयां लगाने के बाद चलने तक की जगह नहीं बचती थी। हरेक ने चारपाई की जगह किराए पर ले रखी थी, कमरा किराए पर नहीं लिया था। हम एक दूसरे के लिए अजनबी थे। बेशक अब थोड़ा-बहुत परिचित हो गए थे परंतु इतनी भी निकटता नहीं थी कि मेरी माँ की मृत्यु पर वे दरी बिछा कर बैठ जाते। दोनों बारी-बारी आए। अपने-अपने बिस्तर पर बैठ कर अफसोस जताया, कपड़े बदले और तौलिया लपेट बारी-बारी से बाथरूम में घुस गए। मैंने चारपाई की पाटी पर सर टिका दिया और बहुत देर तक यूं ही लेटा रहा। चारपाई की पाटी दोस्त का कांधा नहीं था। मैं उठा और चारपाई के नीचे से ट्रंक बाहर निकाला फिर खाली पड़े ट्रंक को देखा। ट्रंक बंद कर अपने बटुए को खंगाला। मेरे पास तिरेपन रुपए कुछ पैसे थे। गाँव जाने के लिए एक तरफ का किराया भी पूरा नहीं था।
एक बार सोचा देसाई या घोष से कुछ रुपए उधार ले लूं परंतु वे मेरे क्या लगते थे? वे भला मुझे क्यों रुपए देंगे, वे तो खुद भूख से संघर्ष कर रहे थे।

अब गाँव में भला जाना भी किसके पास था? माँ ही एक अंतिम कड़ी थी जो मुझे और गाँव को जोड़ती थी और अब वह भी टूट गई थी।
मैंने बटुआ फिर से जींस की जेब में डाल लिया और खाली ट्रंक को ताला लगा पैर से नीचे ठेल दिया। माँ गुज़र गई थी। मुझे रोना चाहिए था। मैं जी भर के रोना चाहता था परंतु मुझे रुलाई नहीं आ रही थी। गुबार सा मेरे ज़हन में जम गया था। मेरा दिमाग सुन्न सा हो गया था, मैं कुछ भी महसूस करने की शक्ति गंवा चुका था।

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मेरा मोक्ष द्वार फारस रोड तक आकर ख़त्म हो गया। मेरे सामने फिर वही उदास सीलन भरी सीढ़ियां थीं। मैडम मैले सोफ़े पर बैठी थी। उसने हैरान होकर मेरे बिखरे वजूद की तरफ देखा। उस वक्त एक ही ग्राहक था। माला के साथ उसका किराया तय कर वह उठ खड़ी हुई और मेरा हाथ पकड़ कर दूसरे कमरे में ले गई, ‘क्या बात है?’
‘मैडम ....माँ......माँ.....।’
मैडम मेरे साथ दरी पर बैठ गई। धीरे-धीरे माँ की मौत की ख़बर सारी लड़कियों को पता चल गई। बारी-बारी से सभी मेरे पास आकर बैठ गईं। नया ग्राहक आने पर वे उठ कर चली जातीं, जो खाली होती वह वापिस आकर मेरे पास बैठ जाती।
वे मेरे साथ माँ की बातें करती रहीं। मेरे पास बैठ वे खुद भी बहुत उदास हो गई थीं। मैं अपनी माँ की बातें कर रहा था। वे अपनी माँ की बातें सुन रही थीं।

ये चकला मेरा घर नहीं था। अब मुझे चलना चाहिए। इस वक्त मैं उनका वक्त खोटा कर रहा था।
‘मैं चलता हूँ। मैं उठ खड़ा हुआ।’
मैडम धंधे वाले कमरे में बैठी थी। उसने मेरी तरफ देखा।
‘मैं अब चलता हूँ।’मैंने अपनी बात दोहराई।
धंधे के वक्त कोई वेश्या अपने चकले की सीढियां नहीं उतरती परंतु चकले का उसूल भूल कर वह मेरे साथ चल पड़ी।
कुछ सीढ़ियां उतरने के बाद वह अंधेरे में ठिठक गई, ‘सुनो।’
मैं भी रुक गया।
‘इस वक्त कहां जाओगे?’
सीढ़ी के निचले सिरे पर सड़क की एक स्याह क़तार दिख रही थी।
उसने हाथ पकड़ कर मुझे रोक लिया और अधिकार से कहा, ‘आज मैं तुम्हें अकेले नहीं रहने दूंगी।’

मेरी नींद खुल गई। पता नहीं मैडम रात को कितनी देर तक जगती रही थीं। वह अभी भी गहरी नींद में थी। उसकी बाँई बाजू मेरे सर के नीचे थी। दाहिनी बाजू मुझे लपेटे हुए थी। मैं नन्हें की भाँति उसके परों में सर छुपाए बेहोशी की नींद में सोया रहा था।
मुझे कुछ घुटन सी महसूस हुई। हैरान हो कर देखा समंदर की तरफ की खिड़की बंद थी।
                                                                                                  
समंदर की तरफ की खिड़की हमेशा खुली रहती थी। दूर तक फैला गहरा नीला समंदर और शांत से दिखते उसके सीने में छुपे असंख्य ज्वार-भाटे तब मैडम की खामोश आँखों में समा जाते थे।वह समंदर से अपनी पहचान पूछा करती और उदास हो जाया करती थी।

मैंने करवट बदली तो मैडम की भी नींद खुल गई। वह मेरी तरफ देख मुस्कराई। मेरे सर के नीचे से अपनी बाँह हटाई और उठ कर बैठ गई। रात को मैंने खिड़की बंद कर दी थी, सोचा समंदर का शोर तुम्हारी नींद खराब न करे।

केबिन के बाहर दरी पर लड़कियां बेहोशी की नींद सो रही थीं। मैं उठ कर तैयार हुआ और चलते समय दस के तीन नोट मैडम की तरफ बढ़ा दिए। उसने हैरानी मेरी तरफ देखा और पीछे मुड़कर समंदर की तरफ की खिड़की खोल दी। समुंदरी हवा के झोंके चकले की भड़ास को उड़ा ले गए। समंदर की तरफ मुंह किए ख़ामोशी से कुछ देर वह नीले पानी को देखती रही। उसकी आँखों में जमी बर्फ धीरे-धीरे पिघलने लगी। उस बर्फ के नीचे दबे सपने धीरे-धीरे नग्न हो गए थे। वे सपने बेशक उसकी आँखों के थे, परंतु वह उनकों नहीं देख रही थी।

उसने आँखें पोंछी और फिर माँ की भाँति मेरे बालों में हाथ फिराया। मुझे कंधे से लगा कर मेरा माथा चूमा। मेरा रुपयों वाला हाथ पीछे करते हुए भीगे स्वर में कहा, ‘सौदाई, तुझे इतना भी नहीं पता, इस रिश्ते की कोई क़ीमत नहीं अदा की जाती। चकले पर आकर भी नहीं।’

दस के तीन नोट झुलसे हुए काग़ज़ की भाँति मेरे हाथ में भुर-भुरा गए।
उसके  कंधे से लग कर मैं नन्हे बालक की भांति हिचकियां ले रोने लगा।


       पंजाबी से अनुवाद - नीलम  शर्मा 'अंशु'
(11-07-2011)

सोमवार, जुलाई 04, 2011

यादों के आईने में - अमृता प्रीतम ।


पंजाबी के जाने-माने लेखक बलवंत गार्गी ने अपने दोस्तों पर बहुत से खूबसूरत रेखा चित्र लिखे हैं। प्रस्तुत है अमृता प्रीतम पर लिखा उनका रेखा चित्र, पुस्तक निम्म दे पत्ते से साभार। आज ये दोनों ही लेखक हमारे बीच नहीं रहे।

       

 (मैंने कहा, ‘तुम्हें आप कह कर संबोधित करना बहुत पराया सा लगता है। मैं कौन सा कोई पब्लिशर हूँ जो आप-आपकह्कर पुकारूं। मेरा नाता तो एक साथी लेखक का है। और, यह् सांझेदारी बहुत गहरी और विशाल होती है। मैं इस दोस्ती में आपकी पराई दीवारें नहीं खड़ी करना चाह्ता। यदि मैं आपकहूँ तो ऐसा लगेगा जैसे मैं झूठ बोल रहा होऊं। लेखक के रिश्ते का अपना ही स्तर है, अपनी ही बिरादरी है, जो अलौकिक और आत्मिक है। मैं उसे आपशब्द से अपवित्र नहीं करना चाह्ता। मैं मुल्क़ राज आनंद, कृष्ण चंदर, मंटो, प्रोफेसर मोहन सिंह और बलराज साहनी को तुमकह्कर ही पुकारता हूँ। यदि कहो तो आगे से तुम्हें आपकहा करूं।
उसने कहा, ‘आप कहें तो अच्छा रहेगा। कम-से-कम लोगों के सामने ज़रूर कहें
मैंने बात मान ली। रास्ते में एक सज्जन मिल गए। मैं अमृता को आपकह कर संबोधित करता रहा। आप-आपकह्ते हुए मेरे दिमाग पर बोझ सा पड़ा था। जब वह लेखक चला गया तो मैंने कहा, ‘अब तो मैं तुम्हें तुमकह सकता हूँ?’
हाँ।उसने उत्तर दिया।
और उस दिन कॉफी पीते-पीते मैंने उसे लगभग सत्तर बार तुमकह कर उस आपकी कसर पूरी कर दी।)

.........आगे पढ़ें-




        उन दिनों अमृता प्रीतम अमृत कौर हुआ करती थीं।
        1943 में फाल्गुन के सालाना मेले के मौके पर मैं प्रीतनगर गया हुआ था। लंगर के बाहर नवतेज मिला तो उसने यह् ख़बर सुनाई :
              इस बार कवि दरबार अच्छा रहेगा, अमृत कौर भी आई हुई है।
              अमृत कौर कौन?  मैंने पूछा।
              हुत सुंदर लड़की है, और बहुत बढ़िया कविता लिखती है।  नवतेज ने मोटे शीशों वाले चशमे में से ऑंखें झपका कर कहा।
              सुंदर लड़कियां सुंदर कविताएं कम ही लिखती हैं। मैंने अपनी शंका व्यक्त की।
        नवतेज बोला, पर अमृता तो कमाल है। इस वक्त दार जी के पास बैठी है। अभी  इधर आएगी तो तुम से मिलवाउंगा। प्रीतलड़ी में उसकी कविताएं अक्सर छपती रह्ती  हैं। जज़्बों से भीगी, प्यार से सराबोर  कविताएं। खुद भी बहुत सुंदर है।
        अमृता मिली। उसने आँखों में काजल लगा रखा था, जिसके डोरे कानों तक जाते थे।  पतले होंठ। मंझोला कद। उसके चेहरे पर एक सजग नारी का नखरा था जिसे लोगों  ने सुंदर, सुंदर कह्कर सर चढ़ा रखा हो।
        मैंने कहा, भई नवतेज मुझे तो यह लड़की कोई ख़ास सुंदर नहीं लगी।
              क्यों ?
       बहुत आम सी है।

        शाम को कवि सम्मेलन था। बहुत से लोगों ने अपनी-अपनी कविताएं पढ़ीं। अमृता ने बंगाल के अकाल पर एक नज़्म पढ़ी, काफी कुछ फालतू सा।
        उसने बड़ी अदा से वह कविता जो छंदरहित थी, सुनाई।
        लोगों ने तालियां बजाईं। नवतेज मेरे पास ही बैठा था। मैंने उसकी तरफ देखा और  कहा, बड़ा बनावटीपन है इस कविता में। मुझे तो बिलकुल भी अच्छी नहीं लगी।
        नवतेज बोला, बंगाल के महा अकाल से संबंधित है।
        मैंने कहा, महा अकाल के विषय में लिखने से कोई कविता महा कविता नहीं हो जाती।
       ‘मुझे तो यह बहुत पराई-पराई और फालतू-फालतू सी लगी। दिल पर इसने कोई  खरोंच नहीं डाली।
        प्रीतनगर में  जिसे भी देखो, अमृता के ही गुण गा रहा था। जैसे चाय के प्याले में कोई गुड़ की भेली घोल दे, ऐसी ही तारीफ थी। बल्कि मुझे इससे कुछ चिढ़ सी हो गई।
        अगले दिन अमृता ने अपनी किताब बद्दलां दे पल्ले विच मुझे दिखाई।
        एक-एक पृष्ठ पर चार पंक्तियां। युद्ध का ज़माना था। क़ाग़ज़ का अभाव था। दो गुना, तीन गुना पैसे देकर भी नहीं मिलता था। मोटे एंटिक काग़ज़ का प्रयोग कर आगे-पीछे काफ़ी हाशिया छोड़कर उसकी कविताओं की यह किताब तैयार की गई थी।
        मैंने पृष्ठ पलटते हुए कहा, काफ़ी कुछ फालतू!
        उसके माथे पर त्योरी सी खिंच गई और काजल के डोरे और भी बहुत गहरे हो गए।
               कवर सुंदर है, काग़ज़ बढ़िया है, पर कविताएं - बहुत सी का वज़न ग़लत है।  मैंने   बेह्द शुष्क से लह्ज़े में कहा।
       ‘क्या आप कविताएं लिखते हैं? उसने ताना दिया।
               नहीं, परखता हूँ।
               प्रीतलड़ी में तो कभी किसी ने इनके वज़न की ख़ामी नहीं निकाली।
         मैंने उत्तर दिया - प्रीतलड़ी के कर्ता-धर्ताओं को कविता के पैमाने की कम ही    समझ है।
       ‘मैंने नवतेज से बात की है। उसे कविता के ख़याल की परख है, पर सौंदर्य की नहीं। और ख़याल अपने आप में कितना ही महान क्यों न हो, सौंदर्य के बिना साकार नहीं हो सकता। जिस कविता का वज़न ग़लत हो वह उस घड़ी की भांति है जो ग़लत वक्त देती हो। घड़ी है, सूईयां हैं, चाबी है, यह् टिक-टिक भी करती है, परंतु जब वक्त ही ग़लत बताए तो ऐसी घड़ी का क्या फ़ायदा?
               मैं अपनी कविता को परंपरागत वज़न और छंदों के अनुसार नहीं ढालती। मैं नए छंदों में प्रयोग कर रही हूँ।
               पहले आप पुराने अलंकारों और छंदों को ग्रहण करें। जो पुराने छंदों पर हावी नहीं, वह नए प्रयोग भी नहीं कर सकता।
               क्यों, मेरी कविता नए विचारों को, नए जोश को प्रकट करती हैं, इस लिए इनकी  चाल तथा नक्श अलग प्रकार के होंगे।
               आप बिलकुल अलग वज़न चुनती हैं, पर सिर्फ़ अलग वज़न चुनने से ही कविता में  वह बात नहीं आ सकती, जो आप सोचती हैं, आपके पैमाने में कच्चापन है, जैसा  कच्चे बर्तन में होता है। ज़रा सा टंकार कर देखने पर इसमें टंकार पैदा नहीं होती।  यदि मैं कुम्हारिन की यह् तुलना जारी रखूं तो इस प्रकार कहूंगा कि आपने चाक पर  बैठकर संयम नहीं रखा। इसी कारण आपकी झज्झरों, सुराहियों के किनारे टेढ़े-मेढ़े है।  इनमें एक निपुण कुम्हारिन की उंगलियों का स्पर्श नहीं है। आपकी कविता के शब्द  एक-दूसरे से टकरा कर घर्षण पैदा नहीं करते, उनमें से चिंगारियां नहीं निकलतीं।
       उसने गरूर से कहा, चिंगारियां तो निकलती हैं, परंतु मह्सूस करने की बात है।
       मैंने व्यंग्य से कहा, जी हां, मह्सूस करने की।
       उसने फिर सर उठाया, आप कभी कविता मत लिखिएगा, वर्ना आपकी कविता की चिंगारियां लोगों को जला देंगी।
       जब नवतेज आया तो हमारी बातों से चिंगारियां फूट रही थीं। वह अपनी कविता के विषय में जितनी सफाई देती, मैं उतना ही ज्यादा तेज वार करता।
        वे दोनों खाना खाने चले गए। मैं बाहर बाग में टहलता रहा।

       उन दिनों अमृता ज़्यादातर प्यार, पीड़ा, बादल, चांद, रात, अंधेरे और पौ फटने के गीत गाया करती थी। अम्मड़ी दा वेहड़ा, त्रिंझण, धुआँ, बुत्तघाड़ा अच्छी कविताएं थीं। लोकगीतों के आधार पर लिखी हुईं। कुछ चीज़ों में आगे आने वाली कविता का आभास मिलता था। परंतु वह कविता के सौंदर्य तथा छंदों के नाजुक मिज़ाज से अनभिज्ञ थी।  इसी कारण कविता में झटके लगते थे। बहुत से दोस्तों, स्नेहियों का ध्यान इन त्रुटियों की तरफ नहीं था।  बुरी कविता में कोई सुंदर छंद आ जाए तो वह चमकता है, अच्छी कविता में ख़राब छंद चुभता है। मैंने अमृता के साथ इसी चुभन की कसक निकाली।
       यह मेरी पहली मुलाक़ात थी। इसके बाद काफ़ी मुद्दत तक मैं अमृता से नहीं मिला।
       मैंने लाहौर रेडियो स्टेशन पर नौकरी कर ली। वहाँ दुग्गल ने बताया, पहले कभी-कभी अमृता प्रोग्राम देने आती थी, पर अब उसने आने से इन्कार कर दिया है।
              क्यों?
              पता नहीं।
       एक दिन साह्त्यिकारों की बैठक थी। हमने अमृता को आमंत्रण भेजा। वह न आई। फिर एक बैठक मेरे घर पर हुई। उसने कहलवा भेजा, कोशिश करूंगी।
       शाम को टेनिस खेलकर लौटते हुए साईकिल पर वह मेरे घर बताने आई कि कल वह बैठक में शामिल नहीं हो सकेगी। उसे ज़रूरी काम है। मैंने उसे बैठने को कहा। वह अपरिचितों की तरह् बैठ गई। नौकर चाय लाया।
              चाय लेंगी?
              चाय तो कम ही पीती हूँ।
              आज एक घूंट पी लीजिए।
       मैंने केतली से प्याले में चाय उड़ेली। अच्छा बताईएआप बैठक में क्यों नहीं आ रही हैं?
              मैं बहुत सी बैठकों में जाना पसंद नहीं करती।
              सुना है, पहले आप रेडियो पर प्रोग्राम दिया करती थीं।
              हाँ, मैंने सितार वादन के कुछ प्रोग्राम किए हैं पर अब मुझे रे     डियो अच्छा नहीं लगता।
              रेडियो या रेडियो के लोग?
              दोनों। एक महिला के लिए घर और समाज में कुछ ऐसी मजबूरियां होती हैं कि वह ऐसे बेतहाशा खुले माहौल को पसंद नहीं कर सकती। लोग पान खा रहे हैं - सिगरेट के धुएं छोड़ रहे हैं। चाय की प्यालियां डकार रहे हैं हा-हा-हू-हू का शोर मच रहा है। मुझे इस तरह पुरुषों में बैठकर काम करना अच्छा नहीं लगता।  इसी लिए मैंने रेडियो स्टेशन जाना छोड़ दिया।
              यही वजह है या और भी?
              और भी होंगी। शायद कोई और ही कारण हो और मैंने आपको बहलाने के लिए ये कारण गढ़ लिए हों, क्या पता। पर रेडियो स्टेशन जाना पसंद नहीं करती।
       बात समाप्त हो गई।
              क्या लिख रहीं हैं आजकल ? कोई कविता सुनाईए।
       ‘किसी दिन हमारे घर आईए तो सुनाऊंगी। मैं कविता सुनाने लोगों के पास नहीं जाती।
              ठीक है आऊंगा किसी दिन।
       कुछ दिनों बाद मैं अमृता के घर गया। उसने गुमटी बाज़ार वाला मकान बदल कर अनारकली में एक फ्लैट ले लिया था। फ्लैट में चार-पांच कमरे थे, जालीदार पर्दे, तस्वीरें, सोफे। उसने तथा उस की ननद ने मेरा स्वागत किया। तकल्लुफ से कुर्सी पर बिठाया।
       हमने चाय पी। कविता कोई नहीं पढ़ी। कविता के बारे में बातें कीं। मैंने अपनी ज़द्दो-ज़ह्द की बात चलाई और अमृता ने अपनी जद्दो-ज़हद की बात छेड़ी।
              आप कैसी जद्दो-ज़ह्द कर रही हैं? मैंने हैरानी से पूछा।
       उन दिनों मेरे लिए जद्दो-ज़हद का अर्थ केवल आर्थिक जद्दो-ज़ह्द था। मैंने लाहौर में तीन साल बेकार रह कर जगह-जगह टयूशनें कर के आख़िर रेडियो स्टेशन पर सौ रुपए की नौकरी ढूंढ ली थी। अमृता कैसा संघर्ष कर रही थी?
       उसने कुछ सोचकर कहा, आर्थिक जद्दो-ज़हद।
              यदि आपको भी आर्थिक परेशानी है तो एक आम आदमी की परेशानी क्या है? मैंने परेशान होकर कहा।
        आर्थिक परेशानी, सामाजिक, आत्मिक सभी प्रकार की परेशानियां हैं मुझे। परेशानियों के अंबार उड़ते हैं मेरे इर्द-गिर्द। जितने मिलने वाले आते है, दो-चार के सिवा वे भी परेशानियों के पिटारे होते हैं।
       मैंने अपनी तरफ ताका।
              आप नहीं।  उसने कहा।
              मैं पास बैठा हूँ शायद इसलिए मेरा लिहाज़ कर रही हैं?
              नहीं, ऐसी बात नहीं है। मैंने यूं ही कह दिया। वास्तव में आजकल कुछ चिढ़ी-चिढ़ी सी रह्ती हूँ। इस लिए हर वह जो चीज़ सामने आती है, अक्सर उसे अपने गुस्से का निशाना बनाने को जी चाह्ता है। वास्तव में लक्ष्य से उकता जाने वाले का यही हाल होता है। मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं लक्ष्य से उकता गई हूँ। निशाना, मंज़िल, आरंभ, अंत- इनके बारे मैंने इतना कभी नहीं सोचा जितना आजकल सोच रही हूँ। ज़्यादा सोचने के कारण बीमार हूँ।
               आप बीमार रही हैं?
       ‘हाँ, अब भी बीमार हूँ। हर चीज़ खोखली सी लगती है। कई बार ऐसा लगता है कि कविता लिखना भी बस यूं ही मन बहलाने समान है। क्या रखा है इसमें। मैं अपनी पिछली कविता पर नज़र दौड़ाती हूँ - छह किताबें! ऊंह! मुझे इन पर कोई ख़ास गर्व नहीं। पता नहीं कैसे लिख डालीं इतनी कविताएं। अब एक भी कविता नहीं सूझती। मानो मैं थम कर सोच-विचार में डूब गई होऊँ। इसी तरह मेरी कविता भी थम गई है। जिंदगी कहीं रुकती नहीं, थमती नहीं, दौड़ती रह्ती है। मैं थम गई हूँ इसी लिए कुछ थकी-टूटी सी लगती हूँ - माफ कीजिएगा, मैं भी कैसी बातें ले बैठी।
       मैंने देखा, अमृता में थकान थी। उसके चेहरे पर पीलापन छाया हुआ था। उसका चेहरा खिंचा सा था जैसे तनावों से उसका सारा वजूद कस दिया गया हो। उसके चेहरे पर से फालतू माँस छंट गया था। चिंतन में से फिजूल बातें छंट गई थीं। फिजूल मुलाक़ातों और फिजूल सामाजिक फर्जों की परतें उतर गईं थीं। काफ़ी कुछ फिजूल सा झर गया था। मैं उसके मन को देख सकता था जो सोने की डली की भाँति सोनार की भट्ठी में आग के नीचे दहक रहा था।
       ज़िंदगी के बारे, समाज के बारे, कलाकार की होनी के विषय में बातें होती रहीं। बीच-बीच में इधर-उधर की बात भी टपक पड़ती। चाय बनाते हुए उसने पूछा, आपको प्याज के पकौड़े अच्छे लगते हैं या मिर्च के?
              मिर्च के।
              पुरुष तो मिर्चों से कतराते हैं। आप मिर्चें कैसे खा लेते हैं?
             छुटपन से मैंने मां की कड़वी गालियां खाईं हैं। ये मिर्चें उनसे ज़्यादा तीखी नहीं। भला आपको मिर्चें क्यों अच्छी लगती हैं?
              इसलिए कि मैंने इतनी मीठी चीज़ें खाई हैं कि अब कड़वी चीज़ अच्छी लगती है। यही हाल प्रशंसा का है। मुझे ज़्यादा प्रशंसा अच्छी नहीं लगती। एक-दूसरे की प्रशंसा से इन्सान की बात का स्तर एक ख़ास सतह से ऊपर नहीं उठता। मुहब्बत और नफरत जज़्बों के दो शिखर, दो गहराईयों - ज़िंदगी के सीधे तथा उल्टे दोनों पक्षों को दर्शाते हैं।
              आप मुहब्बत में यकीन करते हैं या नफ़रत में?
           नफ़रत भी इतनी नफ़रत योग्य चीज़ नहीं। मुहब्बत का उलटा पक्ष ही तो है। फुलकारी का सीधा पक्ष मुहब्बत और उलटा पक्ष जहाँ आपको टांके तथा सिलाई नज़र आए, नफ़रत है। कई लड़कियां फुलकारी को सीधी तरफ से काढ़ती हैं और कुछ उलटी तरफ से।
              आप कविता की फुलकारी को किस तरफ से काढ़ती हैं?
              आजकल मैं इस फुलकारी को उलटी तरफ से काढ़ रही हूँ, नफ़रत की सूई से।
       उसके चेहरे पर खिंचाव और भी पसर गया तथा उसकी नाक सूई की भांति तीखी-तीखी सी लगने लगी।
        हम दो घंटे बैठे रहे। चाय ठंडी हो गई। उसने दुऱारा चाय मंगवाई।
       मैं चाय के लिए कभी इन्कार नहीं करता। मेरे कारण उसे भी कई प्याले पीने पड़े।
       मैंने कहा, आज ऐबट रोड पर छुरेबाजी की दो वारदातें हुईं हैं। दो आदमी मारे गए। कई दोस्त लाहौर छोड़ने की बात सोच रहे हैं। फ़सादों में आप कहाँ जाएंगी?
              कहीं भी नही।
              कहाँ रहेंगी?
              लाहौर में ही। फ़साद तो कुछ लोगों का उन्माद है। नफ़रत का फोड़ा फूट गया है, गंदा खून बह रहा है। इसके बाद सब ठीक हो जाएगा। मैं लाहौर नही छोड़ूंगीं। लाहौर से मेरी यादें जुड़ी हुई हैं। यहाँ की गलियों के मोड़, अनारकली, रावी, लॉरेंस बाग हर चीज़ से मुझे प्यार है। लाहौर छोड़कर मैं नहीं जाऊंगी।
       शाम गहरी हो गई थी। अनारकली में बिजली के बल्ब जगमगा उठे। मैं चलने के लिए उठ खड़ा हुआ।
              अच्छा फिर कभी मिलेंगे तो कविता सुनाऊंगी, इस वक्त मेरे पास कोई अच्छी कविता नहीं है। उसने अलविदा कहा।
       दंगे-फ़साद बढ़ते गए। लोग लाहौर छोड़कर भागने लगे। 12 अगस्त को मैं भी लाहौर से चला आया। बठिंडा पहुंचा तो वहां भी दंगों की आग धधक रही थी। जब यह आग थोड़ी धीमी हुई तो मैं दिल्ली आ गया। रेडियो पर काम करने लगा।

       कुछ महीनों बाद मुझे इत्तेफाक से देहरादून जाने का मौक़ा मिला। मिलिटरी में मेरे एक मित्र थे, जिन्हें पंजाबी साह्त्यि से प्यार था। मैं उनके यहाँ ठहरा हुआ था। देहरादून के इर्द-गिर्द बागों तथा खेतों का विशाल झुरमुट है, साथ लगी हुई पहाड़ियां। उन्होंने कहा, आज पिकनिक पर चलेंगें।
       मुझे यह प्रस्ताव पसंद आया।
       उन्होंने कहा, अमृता प्रीतम यहीं रह रही हैं। यदि उन्हें बुला लिया जाए तो कविता का मज़ा ही आ जाए।
              वे यहाँ हैं?
              हाँ।
              आप उनका घर जानते हैं?
              हाँ
              पहले वहीं चलिए। मैं उनसे मिलना चाह्ता हूँ।
       उन्होंने जीप अमृता के घर की तरफ मोड़ दी। दूर एक गैर-आबाद इलाके में एक छोटा सा पक्का दो मंज़िला मकान था। नीचे कोई दुकानदार रह्ता था।
       मैंने उससे पूछा, यहाँ अमृता प्रीतम रह्ती है?
              आप किसे पूछते हैं साहब?  उसने कहा।
              अमृता प्रीतम - वे लेखिका हैं, कवि.....
              यहाँ तो एक सरदार साहब रह्ते हैं,उसने शुष्क से लह्ज़े में बात समाप्त की।
       मैंने कहा - ठीक!
       ऊपर सीढ़ीयां चढ़कर दरवाज़ा खटखटाया।
       अमृता ने दरवाज़ा खोला। सर पर दुपट्टा नहीं था। हाथ दाल से सने थे।
       शायद वह उड़द की दाल धो रही थी।
       मुझे देख वह अवाक हो गई, आईए।
       मैंने कहा - कल ही आया था। पता चला आप यहाँ हैं, अत: मिलने चला आया। आज यहाँ एक पिकनिक का प्रोग्राम है। शायद कविता का प्रोग्राम भी हो। चल सकेंगी?
       इतने में एक नन्हा सा बच्चा आकर उसकी टांगों से लिपट गया। अमृता ने हाथ झाड़े, जिन पर अब तक धुली दाल के दाने जमे हेए थे और बच्चे को गोद में लेते हुए कहा, मेरी कविता तो यही है। यहाँ घर पर कवि दरबार लगा रह्ता है। मैं नहीं जा सकूंगी, बेशक जी तो बहुत चाह्ता है कि चलूं और दिल्ली वासी दोस्तों के बारे में पूछूं तथा लाहौर की कुछ बातें करूं।
              आप लाहौर से कब आईं?
              जब आप।
       मुझे बैठने के लिए पीढ़ी देकर उसने बच्चे को गोद में लिटाया और दाल धोने लगी।
             ‘मेरे दोस्त मेरा इंतज़ार कर रहे हैं। मैं चलता हूँ।
              यदि फुर्सत मिले तो आईएगा।
              अच्छा।
              कब आएंगे?
              कल। और मैं चला आया।
       अगले दिन मैं उससे मिलने गया। उसने लाहौर के सभी दोस्तों के बारे पूछा।  कौन कहाँ है? अचला सचदेव रेडियो स्टेशन पर काम करती है। सरदार गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी मेहरौली आ गए हैं। हरचरण सिंह ने पंजाब कॉलेज खोलकर लड़कों को ज्ञानी पढ़ाने का काम शुरू कर दिया है। सभी दिल्ली में बस गए हैं या समझिए कि दिल्ली इनसे बस गई है। प्रिंसीपल तेजा सिंह बंबई में हैं। सुरेन्द्र कौर की शादी हो गई है। जीवन सिंह जौली, लाहौर बुक शॉप को लुधियाना ले आया है।
       वह हंसी, लाहौर ऱुक शॉप! यानी पहले तो उसने लाहौर को बुक शॉप में बंद किया। फिर इसे चौंक घंटा घर में ले आया। शहर कौन से पेड़-पौधे हैं जिन्हें इस धरती से उखाड़कर वहाँ लगा दिया जाए। शहर और दरिया उखाड़े नहीं जा सकते। बस हम इन शहरों की समृतियों को उठाए फिरते हैं। यहाँ भी दो रिफ्यूजियों ने रावलपिंडी टेलरिंग हाउस तथा पेशावर होटल खोल लिए हैं। अच्छा, आप आजकल दिल्ली में हैं ?
              हाँ। आप यहाँ एक अलग सी जगह् पर आकर क्यों रह रही हैं, दिल्ली क्यों नहीं आ जाती ?
       उसके होठों पर एक उदास सी मुस्कान खेल गई - क्यों नहीं आते! हा हा !
              क्यों नहीं?
              कौन सा पक्षियों की भांति उड़कर आ सकते हैं। इसके लिए एक वस्तु जिसे घर कह्ते हैं, उसकी ज़रूरत है। घर और फिर रोज़गार। आप अपना घर हमें दे दीजिए, हम आ जाएंगे। साथ ही कोई नौकरी भी।
              आपको नौकरी की क्या ज़रूरत है?
              क्यों नहीं?
              कहाँ?
              मुझे तो रेडियो का ही र्तजुबा है या कविता लिखने का। कविता को कोई पूछता नहीं। यहाँ देहरादून में लीची बिकती है या टींडे - कविता नहीं बिकती।
              आजकल क्या लिख रही हैं?
              ढेर सारी कविताएं। अकेली रह्ती हूँ। सरदार जी काम पर चले जाते हैं। बाद में घर का सारा काम-काज करती हूँ जब बच्चे सो जाते हैं तो मैं उनके चेहरों की तरफ निहारती रह्ती हूँ, सपने बुनती रह्ती हूँ और कविता लिखती हूँ - जैसे कोई फुलकारी काढ़ रहा हो। मेरे ख्याल से हमारे गांवों की लड़कियां फुलकारियां काढ़ती हुई इसी तरह सपने देखती होंगी और गीत गाया करती होंगी।
              आजकल किस सूई से फुलकारी काढ़ रही हैं?
              नफ़रत से नहीं।  नफ़रत मुझे अन्य चीज़ों से है।
              मसलन?
              एक तो मुझे नफ़रत से नफ़रत है, दूसरे -
              दूसरे?
              फ़सादों से। फ़सादों ने मेरे दिल पर गहरा प्रभाव डाला है - जैसे किसी तीखे चाकू से मेरे दिल पर लकीर खींच दी हो, लहू भरी लकीर।
              कुछ सुनाएंगी?
        उसने चूल्हे पर पानी की केतली रख दी और ट्रंक से काग़जों का पुलिंदा निकाला।
              ये सब कविताएं हैं?
              हाँ।वह पृष्ठ पलटने लगी और पृष्ठों को जोड़कर पढ़ना शुरू कर दिया :
                 अज्ज आखां वारिस शाह नूं                     
कितों कबरां विच्चों बोल
    ते अज्ज किताब-ए इश्क दा
   कोई अगला वरका फोल।

       कविता मिर्ज़े क़ी तर्ज़ पर थी। लंबी तान थी जैसे कोई ज़ोर-ज़ोर से ललकार भरी मिन्नतें कर रहा हो :
           गलियों टुट्टे गीत फिर ......2
     तक्कलियों टुट्टी तंद
        त्रिंझणों टुटियां सहेलियां
     चरखड़े घूकर बंद।

       वह कविता पढ़ रही थी, उसके चेहरे पर कविता में उतरते चित्रों की परछाईयां थीं। एक कविता के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी। उसने नफ़रत का गीत सुनाया। प्रीत के कोमल चेहरे पर नफ़रत के दाग थे। मज़हब के माथे से कौन धोएगा खून?

       इससे पहले मैंने बदलां दे पल्ले विच्च तथा संझ दी लाली विच्च की कुछ कविताओं को सराहा था। अम्मड़ी दा वेह्ड़ा, त्रिंझण, हरीयां गोलां, धुआं में नई आ रही शायरी की  चिंगारियां फूट रही थीं। पहले की कविताओं का स्तर यह नहीं था, उनमें उसके मन की झांकियां मिलती हैं।
       उसने कविता की कॉपी एक तरफ रखी। चाय की केतली उबल-उबल कर परेशान हो गई थी।
              इसमें कुछ पानी बचा भी है?  मैंने पूछा।
       उसने ढक्कन उतारा। भाप उड़ रही थी। केतली का आधे से अधिक पानी सूख गया था।
              फिर?
              अब चाय की क्या ज़रूरत है? मैंने कहा।
              मसखरी कर रहे हैं? मैं चाय बनाती हूँ। और उसने फिर केतली चढ़ा दी।
              आप दिल्ली क्यों नहीं आती? मैंने पूछा।
              कहा तो यदि वहाँ कोई जगह हो तो ज़रूर आ जाऊंगी।

       कुछ महीनों बाद अमृता दिल्ली आ गई। मुझे पता चला कि उसके पति सरदार प्रीतम सिंह को सदर बाज़ार में दुकान मिल गई थी। अमृता ने रेडियो में पंजाबी प्रोग्राम ले लिया।उसने पंजाबी प्रोग्राम में गीतों, टप्पे, फीचर कविता और अन्य चीजों को सुंदर बनाया। उसने ढेर सारे गीत लिखे हैं। कविताएं, कहानियां, उपन्यास।

        फ़सादों के दौरान लाहौर में उसका घर लूटा गया। उसकी किताबें, ह्स्तलेख, मसौदे तथा अन्य कई बहुमूल्य वस्तुएं। वहीं छूट गईं, पर वह लाहौर से ढेर सारा प्यार और दर्द ले आई। बड़े-बड़े ठेकेदारों, दुकानदारों ने दिल्ली आकर मकान और प्लॉट अपने नाम अलॉट करवाए। अमृता ने केवल प्यार और दर्द को अपने नाम अलॉट किया।
              कणकां दा गीत मैंने पंजाब के कल्चरल स्कवॉयड को मंचित करते देखा है। आखां वारिस शाह नूं सीमा लांघकर लाहौर पहुंचा और आज चेकस्लोवेकिया, रूस और अन्य देशों में जा पहुंचा है। यह गीत बिना पासपोर्ट, वीसे के बगैर जगह-जगह घूमा-फिरा है और पंजाब की आवाज़ बन गया है।

        सावन का महीना था। बादलों के सुरमई आँचल नीचे-नीचे झूल रहे थे मानो किसी बूढ़े आकाश की पगड़ी बिखर गई हो। ऐसा लग रहा था मानों अभी ही बारिश शुरू हो जाएगी। मैं अमृता के घर बैठा था। उसने कहा- कालीदास ने ठीक ही बादल को दूत बनाकर भेजा था। मुहब्बत का पैगाम सरकारी डाकिए नहीं ले जा सकते। पहले के समय में यह काम कबूतर करते थे, और उससे भी पहले बादल। बादल अब भी पैगाम लेकर जा सकते हैं। यदि कोई उन्हें अपना पैगाम दे सके। मैं अपना पैगाम इन बादलों को ही देना चाह्ती हूँ। चोर की मां की भांति इनका हृदय बहुत विशाल होता है। ये महबूब का सारा भेद छुपा कर ले आते हैं तथा ले जाते हैं।
        झट से मैंने उससे सवाल किया, तुम किससे मुहब्बत करती हो?
              खुद से।
              झूठ।
       वह कुछ देर ख़ामोश रही। फ़र्श पर अपने पैर का अंगूठा खुरचती रही। कुछ देर बाद सर उठाया और हंसने लगी। फिर एक दम गंभीर हो गई और उसकी बड़ी चमकदार आँखें गहरी हो गईं।
              मेरा प्यार दिल से उफनकर बाहर नहीं गिरता। यह स्थिर है शांत, खामोश, पहाड़ियों से ढकी हुई किसी गहरी झील की भांति। मर्दों का प्यार मधुमक्खियों की हांडी के उछाल की भांति उफन पड़ता है। मैं ऐसी मुहब्बत को बहुत अच्छा नहीं समझती। मर्द अपनी मुहब्बत की शेखी बघारता है। स्त्री उसे छुपाती है। मर्द इसे चौराहे पर रखकर लोगों को दिखाकर खुश होता है, स्त्री अपने ऑंचल में संभाल कर रखती है और रात के अंधेरे में जब कोई नहीं होता तब वह इसे निहारती है। इसके साथ खेलती है, जैसे सांप आधी रात को मणि के साथ खेलता है - इसकी रोशनी में मस्त होकर।  यदि कोई आ जाए तो झट से इसे मुंह में डालकर खामोश हो जाती है’।
        और वह खामोश हो गई।

       अमृता ने मुहब्बत की कविता लिखी है, गोर्की की उस लड़की की भांति जिसे एक अलौकिक अद्भुत प्रेमी की ज़रूरत थी। और जो दोनों पक्षों की तरफ से खुद ही ख़त  लिखा करती थी, खुद ही पोस्ट करके खुद ही पढ़ लेती और खुश हो जाती थी। अमृता की यह मुहब्बत मुझे उसकी तरह की प्रतीत हुई। परंतु नहीं। अमृता की मुहब्बत में गोर्की की उस मुहब्बत की भूखी लड़की की भां ति अनादिकाल की लालसा थी, साथ ही चतुर्मास में भरे हुए सरोवर की मस्ती और परिपूर्णता। इस मुहब्बती जज़्बे का इष्टदेव एक व्यक्ति था, कोई ख़याली देवता नहीं। एक इन्सान।

       एक दिन जब मैं उसे मिलने गया तो एक और सज्जन भी बैठे थे। पाकिस्तान की शायरी के विषय में बातें होती रहीं। एक पंजाबी कवि सम्मेलन ऐसा भी होना चाहिए जो सही अर्थों में पंजाबी हो। सीमा का कोई बंधन न हो। दोनों तरफ के कवि एक मंच से मुखातिब हों। अमृता ने कहा, लाहौर देखे मुद्दत हो गई है।
              मैंने पूछा, अमृता तुम लाहौर क्यों नहीं जाती?
              कोई हीला-वसीला हो तो जाएं भी, कोई मुशायरा हो तो ज़रूर जाऊं।
        मुझे भूख लगी थी, मैंने पूछा, अमृता तुमने खाना खा लिया?
              खा तो लिया है, परंतु आपके लिए बना देती हूँ।
       उसने परांठे और चाय बना दी। हम चार बजे तक बातें करते रहे। फिर उसे रेडियो  स्टेशन जाना था। इकट्ठे ही हमने बस पकड़ी और नई दिल्ली आ गए।
        अलग होते वक्त उसने कहा, आपका हुत-बहुत धन्यवाद।
              किस बात का?
              आने के लिए शुक्रिया।
              शुक्रिया?
       पांच-छह दिनों के पश्चात् वह सिख पब्लिशिंग हाउस पर मिल गई। हम दोनों ने कुछ किताबें लीं और बाहर निकल आए। बेशक गुलमोहर के वृक्षों पर शोलों जैसे फूल चमक रहे थे परंतु हवा में शाम की थकी-हारी सांस थी। हम दोनों चलते गए।
        मैंने पूछा, कॉफी चलेगी?
              कॉफी, अच्छा यदि पिला दें।
              आप क्या पियेंगे?
       थोड़ी सी बात-चीत के पश्चात् मैंने मह्सूस किया कि वह मुझे आप-आप कह रही है और मैं उसे तुम-तुम।
              क्या बात है अमृता? क्या तुम इस तुम शब्द को बुरा मानती हो?
       उसने कहा, शायद मैं यही बात किसी दिन आपसे कह्ती। अच्छा हुआ आपने खुद ही बात छेड़ दी। उस दिन आपने मुझे लोगों के सामने कई बार तुम कहा। इससे लोगों के दिलों में भ्रम से पैदा हो जाते हैं। आप तो सहज स्वभाव से ही तुम कह्ते हैंकुछ लोग इसे पता नहीं क्या समझ बैठें?
        मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा।
            हाँ, किसी को क्यों मौका दूं कि वे मेरे बारे में बातें बनाएं। उसने दृढ़ता से कहा।  पहले भी लोग मेरे बारे में तरह-तरह की बातें गढ़ते रह्ते हैं। बहुत बुरा लगता है।
        मैंने कहा, तुम्हें आप कह कर संबोधित करना बहुत पराया सा लगता है। मैं कौन सा कोई पब्लिशर हूँ जो आप-आप कह्कर पुकारूं। मेरा नाता तो एक साथी लेखक का है। और, यह् सांझेदारी बहुत गहरी और विशाल होती है। मैं इस दोस्ती में आप की पराई दीवारें नहीं खड़ी करना चाह्ता। यदि मैं आप कहूँ तो ऐसा लगेगा जैसे मैं झूठ ऱोल रहा होऊं। लेखक के रिश्ते का अपना ही स्तर है, अपनी ही बिरादरी है, जो अलौकिक और आत्मिक है। मैं उसे आप शब्द से अपवित्र नहीं करना चाह्ता। मैं मुल्क़ राज आनंद, कृष्ण चंदर, मंटो, प्रोफेसर मोहन सिंह और बलराज साहनी को तुम कह्कर ही पुकारता हूँ। यदि कहो तो आगे से तुम्हें आप कहा करूं।
        उसने कहा, आप कहें तो अच्छा रहेगा। कम-से-कम लोगों के सामने ज़रूर कहें
     मैंने बात मान ली। रास्ते में एक सज्जन मिल गए। मैं अमृता को आप कह
    कर संबोधित करता रहा। आप-आप कह्ते हुए मेरे दिमाग पर बोझ सा पड़ा था।
    जब वह लेखक चला गया तो मैंने कहा, अब तो मैं तुम्हें तुम कह सकता हूँ?
       हाँ। उसने उत्तर दिया।
       और उस दिन कॉफी पीते-पीते मैंने उसे लगभग सत्तर बार तुम कह कर उस आप की कसर पूरी कर दी।
      
      मेरी पंद्रह सालों की अच्छी मित्रता में एक बार अमृता प्रीतम बहुत नाराज़ हुई -
     उस पर लिखे मेरे एक आलेख को लेकर।  यह आलेख साहित्य समाचार के विशेष
      अमृता प्रीतम अंक में छपा था। जीवन सिंह जौली ने छह अंक अमृता प्रीतम पर
      प्रकाशित किए। यह इस बात का प्रमाण है कि अमृता एक मशहूऱ शायरा है। यह
      अंक जिसमें ढेर सारे घटिया विषय छपे थे, उसके नाम की बदौलत बिक गए।
      इनमें कई लेखकों ने जी की बेह्द तारीफ की और साहित्यिक नाते से बढ़कर    
      रिश्तेदारी जोड़ने का बहुत प्रयास किया। मेरे आलेख पर इन कुछ सज्जनों ने
      इतना शोर मचाया कि अच्छा-खासा फ़साद खड़ा कर दिया। पंजाबी में शुद्ध
      साहित्यिक लेख या कलमी चित्रों का अभी चलन नहीं हुआ। वोट लेने की भाँति
      ही मतदाता की राजनीतिक दयानतदारी को प्रेरित करते बल्कि नाते-रिश्तेदारी
      का हवाला देकर उससे वोट प्राप्त करते हैं। मेरे लेख ने मेरे और अमृता के बीच
      कुछ समय के लिए फ़िज़ा में धूल बिखेर दी। फिर यह धूल खुद ही बैठ गई         और हम एक दूसरे का सामना फिर उसी अपनत्व भाव से करने लगे।

      दिल्ली में रह्ते हुए हम कम ही मिलते थे - कभी दूसरे महीने या कभी पूरे साल बाद। पर जब भी मिलते, वह मुलाकात बड़ी आत्मीय होती। एक ही मुलाकात हम साहित्य, मौसम, पैरिस, कॉनफ्रेंस, नई टिकटों, नई कहानियों, नई कविताओं, नई सैंडिलों और आसमान के तारों से लेकर हरनाम सिंह शान तक की कर डालते। एक दिन उसने मुझे अपनी ताज़ी कविता सुनाई :

                जिंद चरखड़ा कित्थे डाहिए
                  रात कुड़ी अज्ज कत्तण आई
                  ओह सुपने जो कल असां
                  पच्छी विच्च रक्खे।
                  अंबर रुख नरेल दा
                  चिट्टा चन्न गरी दा टोटा
                  किस ने खोपा तोड़ेया
                  अज्ज पाणी चक्खे।
      
       कविता सुनकर मैंने पूछा, तुम्हें नारीयल का ख़याल कहाँ से आया?
              नारीयल का ख़याल.....  वह सोचने लगी।
              भला तुम क्या सोच रही थी जब यह गीत लिखा?
              मैं उस वक्त बंबई के बारे में सोच रही थी। बंबई याद आ रहा था..... मुझे बंबई अच्छा लगता है।  
              क्यों?
              वहाँ मेरे दोस्त हैं....शायद मैंने बंबई के समुद्र के रेतीले तट पर उगे नारीयल के वृक्ष देखे थे और उनमें से झांकता चांद का टुकड़ा। इस प्रकार के अक्स मेरे मन पर चित्रित हो गए थे - उनका ख़याल आ रहा था....
       मैंने कहा - ठीक, परंतु मुझे इस गीत में एक पुरुष और स्त्री के गहरे प्यार की झलक दिखाई देती है। अंबर पुरुष का प्रतीक है, और धरती स्त्री का। तुमने अंबर को ललकारा है और इसे नारीयल का वृक्ष कहा है। नारीयल का ऊँचा वृक्ष पुरुष का प्रतीक है। तुमने चांदनी और सफेद गरी का उल्लेख किया है जो स्त्री का प्रतीक है। हर त्योहार पर शुभ काम करते वक्त पहले नारीयल तोड़ते हैं और इसकी गरी तथा पानी को चखते हैं - नारीयल का टूटना पुरुष और स्त्री के प्रथम मिलन का प्रतीक है। तुम्हारा गीत स्त्री-पुरुष के गहरे मानसिक, आत्मिक और शारीरिक आनंद का वर्णन करता है।
       वह सोचने लगी....
       उसने यह सब नहीं सोचा था। उसने सिर्फ जज़्बे को मह्सूस किया था। उसने चेतन मन में बेशक सिर्फ़ बंबई के समुद्र का तट, नारीयल का वृक्ष और चांद था, परंतु उसके अवचेतन मन में एक भरपूर स्त्री और पुरुष के उफनते हुए आवेग थे।
       हम दोनों ख़ामोश हो गए।
              अगली कविता पढ़ो। मैंने कहा।
              इसका भावार्थ भी इसी तरह करेंगे?
              पता नहीं सुनूंगा तो मेरे मन में जो विचार आएगा, कह दूंगा।
       उसने दूसरी कविता पढ़ी। यह किसी प्रिय के ख़त के ज्वाब में लिखी गई थी।
      
उसके बहुत से गीत दिल का रह्स्य हैं - कभी आह, कभी हंसी, कभी रंज की टीसें और कभी खुशी की किरणें। कभी वह शिकायत करती है, कभी वह गर्व करती है, कभी वह याद करती है, कभी वह सपने लेती ही। ये सब गीत आपबीती है। इसलिए इनमें दर्द भी है और असर भी।
        मैंने कुछ देर रुक कर पूछा, अमृता तुम्हें मुहब्बत ने बहुत दु:ख दिया है?
               बहुत।
               बहुत?
               हां - दु:ख और सुख भी। मुहब्बत का विरह दु:ख है, परंतु इसकी जड़ों में सुख है। इसी तरह सुख की कोख से दु:ख जन्म लेता है। मैं दोनों का मिश्रण कर देती हूँ।  ऐसा लगता है मानों दुपट्टे के दो छोर हों - एक दु:ख और एक सुख - मैंने यह दुपट्टा सर पर ओढ़ लिया है और इसके दोनों छोर अपने दांतों तले दबा लिए हैं।

      उन दिनों मैंने उसकी एक और कविता उसकी डायरी से पढ़ी।  एक छंद मेरे दिमाग में फंस कर रह गया। यह गीत उसने किसी दोस्त के साथ इंडिया गेट की सैर करते हुए लिखा था और डायरी में नोट कर लिया था। उसके पहले के गीतों में ओस से धुले फूलों, बादलों के आंचल से सांझ की लालिमा का वर्णन था। जऱे की झाग का बयान था, आग का नहीं। उस वक्त वह विह्वल थी और किसी अनजाने प्यार के अनजाने तथा आस्वादित रस का ज़िक्र कर रही थी। लम्मीयां बाटां में उसने थकी-टूटी स्त्री का ज़िक्र, मांस की गुड़िया तथा घरेलू ज़िंदगी के चक्र-व्यूह को चित्रित किया - मुहब्बत और जिस्मानी रिश्तों के बारे बताया - परंतु पर्दे की ओट में।

       उसे धीरे-धीरे ढोंग, झूठी शाम, सामीजिक पैगंबरों से चिढ़ होने लगी। समाज क्या है? बहुत से लोगों का बनाया हुआ कानून जिसे वे खुद नहीं मानते, पर अंधाधुंध दूसरों पर लागू करना अपना धर्म समझते हैं सबसे बड़ी वस्तु इन्सानियत है, मुहब्बत है, सच्चाई है।
       उसने अपने दिल की गहराईयों में दृष्टिपात किया। मुलम्मे जैसी झूठी शान उतर गई। एक दम आकाश ऊंचा-ऊंचा प्रतीत होने लगा, धरती चौड़ी-चौड़ी और वृक्षों, पानी तथा सूरज और तारों का नया रूप दृष्टिगोचर होने लगा....
       इसके बाद वह बंबई चली गई और महीनों मुझसे मुलाक़ात न हुई।

       जब दुबारा दिल्ली आई तो वह खोयी-खोयी और उदास थी। मानों कोई चीज़ कहीं छूट गई हो।
       कुछ दिनों पश्चात् वह मुझे मिली। मैंने कहा, आकाश कितना उन्मुक्त है।
              होगा।उसने कहा।
              धूप कितनी गर्म है।
              होगी।
              घास कितना हरा है।
              होगा।
       कुछ दिन हुए मैं उससे मिलने गया। जब मैं पहुंचा तो वह बिस्तर पर लेटी थी, बाल खुले, चेहरे पर उदास हंसी। आँखों के गिर्द काले स्याह घेरे। फीकी-फीकी छाया ने सारे चेहरे को ढक  रखा था।
              बहुत तकलीफ़ है बलवंत! उसने कहा। गर्दन में, पीठ में, सारे वजूद में। सुना है कल बेगम ज़ैदी हंसती-खेलती चल बसी। उसे हृदय रोग नहीं था। मेरे दिल में कसक सी उठती है, मुझे क्यों कुछ नहीं होता।
       उसके सामने कुछ काग़ज़ पड़े थे।
              तुम लिखती रही हो? क्या लिखा है? मैंने पूछा।
              दो दिनों से इसी तरह पड़ी हूँ। लेटे-लेटे सपने आते हैं। उलझी-उलझी सी झाड़ियां सी और फिर ये खुद-ब-खुद चित्र बन जाते हैं। सपनों में जबान कम होती है, और चित्र ज़्यादा। मैं इन चित्रों को एकत्र कर लेती हूँ... उड़ती हुई तितलियों को जैसे कोई लड़की पकड़ कर आंचल में डाल ले और फिर उनके रंग-बिरंगे पंखों को अपनी कताऱ में सूई से सी ले। कई बार मुझे अपनी ये कविताएं मृत तितलियों की तरह प्रतीत होती है....  कितना कठिन है जीते-जागते विचारों को मृत समझना। मुझे तो यह जुल्म सा प्रतीत होता है।
              तुम बीमारी की हालत में लिखती रही हो?
              एक नज़्म लिखी है।
             मैं तो इस तरह कभी न लिख पाऊं। मुसीबत में मैं नहीं लिख सकता और न ही ज़्यादा सुख में। मैं तब लिखता हूँ जब रुपयों की कमी हो या किसी का इंतज़ार कर रहा होऊं।
              इंतज़ार में तुम कैसे लिख सकते हो?
             इंतज़ार में - एक बार मैं एक लड़की का इंतज़ार कर रहा था। उसे छह बजे आना था, आठ बजे आई। दो घंटे मैं कहानी लिखता रहा।
              उस के विषय में?
              नहीं, एक निहंग सिंह के बारे में। तुम अच्छी बीमार होती हो, कहानियां लिखती हो, कविताएं लिखती हो।
              पर कोई इस लिए थोड़े ही बीमार होता है ताकि उसमें से कविता का सृजन कर सके। ज़िंदगी में तकलीफ़ें और बीमारी तो यूं ही बहुत हैं। इसे घेर कर, बहलाकर अपने पास लाने की ज़रूरत नहीं।
       मैंने काग़ज़ उठा लिए। ह कविता किसके बारे लिखी है?
              नए साल के बारे में। नया साल मुबारक हो... मुबारक हो उसे नया साल।
              किसे?
              उसे।
       मैंने उसकी आंखों में देखा। उनमें एक ठंडा शोला भड़का।
              तुम अब भी उसके बारे में सोचती हो?
              हाँ, पता नहीं क्यो, हलांकि मैं समझती हूँ कि अब उसके साथ मेरा कोई रिश्ता नहीं रहा। पर मेरी रगों में रह-रहकर खून में उसकी सांसें हैं। पता नहीं, किस तरह ज़हर सा वह मेरे लहू में घुल गया है.....उससे मुझे कोई लगाव नहीं, कोई प्यार नहीं। बल्कि नफ़रत है.......या शायद नफ़रत भी नहीं। फिर ये कैसा जज़्बा है? एक बेबस सा, कड़वा जज़्बा.....  जैसे अधपका आम तोड़कर खा लिया हो, और फिर उस आम की कोंपल का कसैला सा रस मुंह में रह जाए। कुछ अजीब सा स्वाद है जीभ पर।
              तुम उसे इतना याद क्यों करती हो?
              बिलकुल नहीं। मुझे वह याद नहीं आता। मैं सोचती हूँ। अच्छा हुआ जो यह अध्याय मेरी ज़िंदगी से ख़त्म हो गया।
              जब भी मैं तुम्हें मिलता हूँ, तुम उस की बातें क्यों करती हो? यदि तुम्हें कोई लगाव नहीं तो क्यों उसे याद करती होतुम्हारी नई कहानी मल्लाह् दा फेरा उसी से संबंधित है। पर नाम भी शायद उसी से संबंधित हो।
              हां। मैंने फ़सादों के बारे भी लिखा है, और उस लाहौर के बारे में भी जो मुझसे छीना गया, और नफ़रत के बारे, गरीबों के बारे, इच्छाओं के बारे जिनका गला घोंटा गया। मैं फ़साद, नफ़रत, गरीबी से प्यार नहीं करती, फिर भी इनके बारे लिखती हूँ।
        यह कह कर उसने मुझे कविता सुनाई।
              इसका शीर्षक क्या रखा है?
        वह सोचने लगी।
              साल मुबारक। यह शीर्षक ठीक रहेगा। इसमें जो बात मैं कहना चाह्ती हूँ, आ जाती है।
              तुम माज़ी के फटे चोले को उतार क्यों नहीं फेंकती?
              मैं इसे उतार कैसे फेकूं, मैं तो खुद एक फटा हुआ चोला हूँ। वह फिर ख़ामोश हो गई और कुछ सोचने लगी। छत की तरफ देखती रही।
        ज़रा सा रुक कर कहा - मैं विचारों से स्वतंत्र होना चाह्ती हूँ। न अच्छे विचार, न बुरे।  मेरे विचार स्वतंत्र नहीं। एक शाखा से मेरे विचारों के पांव बंधे हुए हैं। तुम आज़ाद हो।
              कहाँ?
              नहीं, बलवंत तुम आज़ाद हो।
              मैं उस पंछी की भांति हूँ जो खुले आकाश में उड़ रहा है। थक कर कभी मेरे जैसा आज़ाद पंछी धरती पर ही आ गिरता है। लोग कह्ते हैं, अरे मर गया, अभी तो यह हंस रहा था।

मुझे इस यायावर पंछी का भी पता है। जिंदगी में कितनी मजबूरियां हैं। कई बार ऐसा लगता है कि इन मजबूरियों की सख्त धरती को फाड़ कर ही ज्वालामुखी निकलता है। ज़्यादातर कविता इसी तरह सीने से निकलती है।

अ      अमृता आज जो कविता लिख रही है,वह सुंदर है, गंभीर है, दिल को छूती है अमृता की कविता भी खूबसूरत है और अमृता खुद भी खूबसूरत है।

-       बलवंत गार्गी
पंजाबी से अनुवाद नीलम शर्मा 'अंशु'
साभार निम्म दे पत्ते।
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