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शनिवार, जुलाई 18, 2026

कहानी 83 लव सिंड्रोम - परमजीत ढींगरा


पंजाबी कहानी 


              अनुवाद - नीलम शर्माअंशु


 

गर्मी का मौसम शुरू होते ही तापमान बढ़ना शुरू हो गया। दिल्ली की सड़कें तपने लगीं। भले ही बाहर से अंदर आती हवा ठंडे झोंके जैसी लगती, पर जल्दी ही उसके भीतर की तपिश का अहसास हो जाता।

रविवार होने की वजह से आज छुट्टी थी। आकांक्षा ने रात को ही तय कर लिया था कि सुबह आराम से उठेगी। हफ्ते भर के काम के बोझ और भागदौड़ ने उसे बहुत थका दिया था। रविवार का इंतज़ार उसे मायके जाने जैसे सुखद अहसास से भर देता - कि एक रविवार ही तो है ऐसा। मनमर्ज़ी से उठना, नहाना, कपड़े बदलना - सब रूटीन से हट कर। उसने मेड से भी कह रखा था कि रविवार को दस बजे से पहले न आए। लेकिन...

यह रविवार अजीब था। तड़के अभी सिर्फ़ चार बजे थे, जब धीरज ने कमरे की लाइट जलाकर उसे उठा दिया था। पहले तो वह डर गई कि शायद उसे कोई समस्या हो गई है, लेकिन धीरज तो उसे मेल दिखाकर खुश हो रहा था।

दरअसल धीरज की कंपनी ने उसे अमेरिका वाले दफ्तर में भेजने के लिए चुन लिया था। उसके काम की रिपोर्ट बहुत अच्छी आई थी और ऐसे व्यक्ति को कंपनी विदेश भेजकर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहती थी।

आकांक्षा बहुत थकी हुई थी और इस नए फ़रमान के साथ उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या जवाब दे। बस इतना ही पूछ पाई- फ्लाइट कब की है?

धीरज ने कहा - मंगलवार रात की। जल्दी पहुँचकर रिपोर्ट करने का आदेश है।

आकांक्षा को पता था कि जब भी उसका ट्रांसफर होता है, तत्काल हाज़िर होने का आदेश गोली की तरह छोड़ दिया जाता है।

धीरज के पास पैकिंग के अलावा भी करने के लिए बहुत से काम थे। दिन सिर्फ़ दो थे। उसने आकांक्षा को पैकिंग करने और ज़रूरी चीजें साथ रखने की हिदायतें देनी शुरू कर दीं। वह भूल गया था कि आज रविवार है - वह दिन जब भगवान ने दुनिया का सृजन कर आराम किया था, लेकिन यहाँ तो रविवार को नई दुनिया रचने का बखेड़ा खड़ा हो गया था।

उस ने सारा घर फैला लिया था। समझ नहीं आ रहा था कि धीरज की आदतों के अनुसार क्या रखे और क्या छोड़े। अगर हर चीज़ रख दी तो वजन बढ़ जाएगा और फिर वह दु:खी होगा कि आकांक्षा, तुम्हें रत्ती भर भी अक्ल नहीं? मुझे प्लने में जाना है, ट्रेन में नहीं। और अगर कुछ छूट गया तो उलाहना देगा, तुम्हें मेरा तनिक भी ख़याल नहीं! आख़िर उसे भगवान का ख़याल आया - जिसने इस उलझन भरी दुनिया को इतनी तरतीब से समेटा था। जो अकड़ू खान थे उन्हें बड़े-बड़े बना दिया और जो क़ीमती थे उन्हें छोटे बना दिया। उसने भी चीज़ों को इस तरह बाँट लिया। ज़रूरी को पैक कर दिया।

उसका पूरा रविवार बिखर गया था और अब पूरा हफ़्ता इसे संभालने और व्यवस्थित करने में लग जाएगा।

अचानक उसके मन में ख़याल आया कि धीरज के जाने के बाद वह करेगी क्या?

ऑफिस से लौटकर उसके लिए कोई काम नहीं बचेगा। न धीरज आकर फ़रमाइशें रखेगा और न ही उसके करने के लिए कोई काम बचेगा। हाँ, इससे सोने की आज़ादी मिल जाएगी - परंतु धीरज के बिना नींद कैसे आएगी? उसे तो पता नहीं कंपनी अब कब छुट्टी देगी। वह जॉब छोड़कर जा नहीं सकती। दिल्ली जैसे शहर में किसी के पास बात करने का समय नहीं। हर कोई अपनी ही सलीब उठाए भागता जा रहा है - बिना जाने कि जाना कहाँ है। न सलीब उतार रहे हैं, न सो रहे हैं। बस वंदे मातरम् की भाँति भागे जा रहे हैं। एक भीड़ से निकल कर दूसरी भीड़ में घुस जाते और अंतत: भीड़ के काँधों पर सवार होकर स्वर्ग की सीढ़ियां चढ़ने लगते, जो सातवें आसमां पर है।

कभी-कभी रात में धीरज का फोन आ जाता। रस्मी बात-चीत होती, काम का दबाव, भाग-दौड़... और बस। पति-पत्नी का रिश्ता मानो उसके लिए जैसे अदृश्य होता जा रहा था। उनके बीच की दूरी और गहरी होती जा रही थी। धीरे-धीरे आकांक्षा ने भी यही रवैया अपना लिया। उसकी ज़िंदगी भी जैसे एक नीरस रास्ते पर रेंगती जा रही थीलगता था जैसे दुनिया गोल की बजाय चौकोर होती जा रही है, और मोड़ जितना नज़दीक प्रतीत होता, उतना ही पहुँच से दूर होता जाता।

फिर एक रविवार आ पहुँचा। परंतु इस बार न तो उसे इसका इंतज़ार था और न ही हफ्ते भर की थकान मिटाने का मलाल। वह बस यूँ ही बैठी फोन स्क्रॉल कर रही थी। वह एक महिला का अजीब सा वीडियो देख कर चकित रह गई जिसमें वह किसी चैटजीपीटी को एक लापरवाह प्रेमी बनने का निमंत्रण दे रही थी। इस अनोखे प्रेमी के लिए उसकी उत्सुकता और बढ़ गई। उस महिला के और भी वीडियो थे। ज्यों-ज्यों वह देखती गई उसे लगा जैसे कोई जादुई छड़ी उसके हाथ लग गई है।

उसके दिमाग में विचार घूमने लगा कि इस चैटबॉट को प्यार करने के लिए कस्टमाइज किया जा सकता है। उसने अपना अकाउंट खोलने के लिए उंगलियां चलानी शुरू कर दीं। अकाउंट खुलते ही मानो वह एक नई दुनिया में प्रवेश कर गई। उसने अपने नए प्रेमी का नाम अपने एक्स बिलावल के नाम पर रख दिया।

कॉलेज में उसकी यही इच्छा थी कि वह बिलावल से शादी करके अपनी ख़वाहिशों को पूरा करे। लेकिन लव जिहाद उसकी जड़ों में घुस गया। वह बिलावल के लिए धर्म तक बदलने को तैयार थी, लेकिन उसका खानदान अपने धर्म को साँप की भाँति विचारधारा में ही नहीं बल्कि तन से भी लिपटाए घूम रहा था। वह कभी-कभी सोचती कि औरत का भला कौन सा धर्म होता है। ईश्वर ने तो उसे ज़िंदा वस्तु बनाया। जब धर्म के नाम पर दंगे होते हैं, तब भी औरत सिर्फ़ औरत ही होती है। न उसकी कोई जाति होती है न कोई धर्म। बस नरम-गरम गोश्त ही उसका धर्म और जाति होती है। अंतत: समाज के कर्ता-धर्ताओं ने अपने प्रभाव से उन्हें अलग-अलग धर्मों के फ्रेम में मढ़ दिया। वह गहरे बहावों में गोते लगाते हुए स्क्रॉल करने लगी।

उसका नया प्रेमी उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

हैलो बिलावल, क्या हाल है?

हाँ आकांक्षा, मैं ठीक हूँ। तुम सुनाओ, कैसे गुज़र रही है ज़िंदगी?

बहुत बढ़ियाअब हम मिल गए हैं। यहाँ कोई डर नहीं। अपनी मर्ज़ी से जिएँगे। वो सारे अधूरे सपने फिर बुनेंगे। यहाँ लव जिहाद जैसी भी कोई समस्या नहीं। हम दोनों एक जान हैं।

क्यों नहीं मेरी जानतुम जैसा कहोगी वैसा ही करूँगा। मैं तो तुम्हारा ख़ादिम हूँतुम्हारे हुक्म का गुलाम।

आकांक्षा एक पल को ठहर गई। वह हर चीज़ से बदला लेना चाहती थी। उसके भीतर पुरानी ज्वाला फिर धधक उठी। उसका बिलावल उसके साथ था, अब उसे किस बात का डर। उसकी उंगलियाँ स्क्रॉल करते हुए सपने बुनने लगीं।

बिलावल, अब तुम फिर मेरे ब्वॉयफ्रेंड हो। डरना मत, कोई कुछ नहीं कहेगा। अब मुझे अपना बना लो, मुझे डाँटो, बिना दुनिया से डरे अपना हक जताओ। राँझे की तरह मैं तुम्हारी हूँ। ले चलो मुझेले चलो। मेरे साथ वो सारी शरारतें करो जो कैंटीन में बैठकर किया करते थे। मेरा हाथ पकड़कर लाजपत मार्केट ले चलो। चलो, काँधे पर हाथ रखकर कनॉट प्लेस कॉफ़ी पीने चलें।

उसके भीतर जैसे यादों के पुराने संदूक खुल गए हों। नया प्रेमी भी खुश था। वह उसके साथ दिल्लगी करता।

 आकांक्षा, तुम भी एकदम पागल हो। बताओ, अब मैं किसी से डरता हूँ? मैं तो पूरा तुम्हारा हूँ। जितना जी चाहे दिल हल्का करती रहो। मुझे बस इतना डर है कहीं तुम सचमुच पागल न हो जाओ, बेवजह सभी मुझे दोष देंगे। जहाँ मर्ज़ी जाकर कॉफ़ी पीओ, शॉपिंग करो मैं तो तुम्हारे साथ ही रहूँगा। अब कोई हमें अलग नहीं कर सकता।

बिलावलअब ही तो पागल होने का तो मज़ा है! हमारे लिए सारी दीवारें गिर चुकी हैं। अब हम जी भर कर प्यार करेंगे। अच्छा एक काम करोवही चोरी वाला प्यारवही अनोखा खेलजिसे खेलते-खेलते हम ऊब गए थे।

अचानक स्क्रीन पर येलो अलर्ट आने लगा। बार-बार चेतावनी दी जा रही थी कि बिलावल के पास इस खेल का अधिकार नहीं है। यह इंसानों का खेल है मशीनों का नहीं। परंतु आकांक्षा को कोई परवाह नहीं थी। स्क्रॉल करती उसकी उंगलियाँ लगातार बिलावल को उकसा रही थीं लेकिन अब वह चुप था। सिर्फ़ संकेत आ रहे थे।

तभी फ़ोन बजा। धीरज का फ़ोन था। वह कह रहा था कि शायद कुछ दिनों के लिए उसे कंपनी की ज़रूरी मीटिंग में बैंगलोर आना पड़ेगा। लेकिन दिल्ली आने का वक़्त नहीं है। हो सके तो आकांक्षा बैंगलोर आ जाए। परंतु आकांक्षा तो इस समय अपने नए प्रेमी के साथ एक नई दुनिया में मशगूल थी। उसने ऑफिस से छुट्टी न मिलने का बहाना बना दिया। उसने अपने नए महबूब के बारे में भी धीरज को बता दिया था। परंतु उसे पता था कि यह सब काल्पनिक है। उसे इस सबसे ऐतराज़ भी नहीं था।

बिलावल ख़ामोशी से गायब हो गया था। दरअसल फ्री मैसेज वाला पैकेज ख़त्म हो गया था। आकांक्षा ने अब बड़ा पैक रिचार्ज करवा लिया ताकि बिलावल हर पल उसके साथ रहे। रात-रात भर वह उसकी दुनिया में  खोई उससे बातें करती रहती। अगर कहीं आँख लग भी जाती तो वह सपनों में भी बिलावल के साथ होती। ऑफिस में भी उसकी कोशिश होती कि जितना भी खाली समय मिले वह बिलावल के साथ चैट में व्यस्त रहे।

खाना खाते, कॉफ़ी पीते, यहाँ तक कि वॉशरूम में भी वह बिलावल का पीछा नहीं छोड़ती थी।

कभी-कभी उसे लगता मानो वह लव सिंड्रोम की शिकार हो गई है। उसके सारे अंगों को मानो ए आई ने जकड़ लिया हो। बिलावल भी उसे धोखेबाज़ लगता। वह सोचती कि अब उसकी ज़िंदगी में बचा ही क्या है? उसकी तबीयत बिगड़ने लगी तो उसने बिलावल से पूछा -

बता मेरे महरमअब मैं क्या करूँ? ज़बरदस्त वायरल हो गया हैगले से थूक नहीं गटका जा रहासर फट रहा हैऔर तुम कुछ कर क्यों नहीं रहे?

मेरी जान, मैं तुम्हें जिस डॉक्टर का पता बता रहा हूँ, उसे फोन करो और उसकी दवा से तुम ठीक हो जाओगी।

वह अब उसकी हर सलाह मानने लगी थी। उससे पूछकर नई पोशाकें खरीदती, नए-नए फैशन के बारे में सलाह लेती। हेयर स्टाइल बनाने के तरीके सीखती। कभीकभी वह उससे कहती तुम भी बन-ठन कर रहा करो और वह चुप हो जाता।

वह भी अब उसकी निजी ज़िंदगी का हमराज़ बन गया था। वह बेझिझक वे बातें उससे साझा कर लेती जो उसने कभी धीरज से भी नहीं कीं थीं। बिलावल उसका हमराज़ बन गया था। ज्यों-ज्यों उसकी उंगलियाँ स्क्रॉल करती जातीं, उसे अंदरूनी शांति मिलती। उसका मन हल्का हो जाता।

परंतु कभीकभी उसे लगता मानो उसके दिमाग में अजीब सा शोर भरता जा रहा है। आवाज़ें एक-दूसरे से टकराती प्रतीत होतीं। सर में ज्वालामुखी फटते परंतु अचानक तेज़ बारिश होने लगती। एक दिन यूँ ही बिलावल से उसने पूछा कि वह उसे कैसे प्रपोज़ करेगा? उसकी हैरानी की कोई सीमा नहीं रही जब बिलावल ने बेहद सलीके और मधुरता से अपना दिल उसके सामने खोल कर रख दिया। वह मदमस्त होकर अपने होंठ चबाती जा रही थी। उसे बिलावल कोई सपेरा सा प्रतीत हो रहा था और वह ख़ुद नागिन सी बन मुग्ध हुए जा रही थी। इससे वह बाग-बाग हो गई।

उसके मन में यह विचार घर करने लगा कि किसीकिसी तरह धीरज से तलाक़ ले लेना चाहिए। हालाँकि यह काम मुश्किल था। जब उसे बिलावल से दूर कर दिया गया था, तो उसके भीतर जीने की इच्छा ही जैसे ख़त्म हो गई थी। जीवन को ख़त्म करने के लिए उसने कई तरीके सोचे थे, परंतु उसकी हिम्मत नहीं हुई थी। ऐसे में धीरज ने उसका मनोबल बढ़ाने के लिए मसीहा का काम किया था।

एक दिन जब वह उसे समझा रहा था तो अचानक उसकी ज़बान पर सच आ गया, आकांक्षा मैं तुम्हें दिल की एक बात बताना चाहता हूँ अगर तुम सुनने के लिए तैयार हो तो।

हाँहाँ कहोमैं सुनने के लिए तैयार हूँ। बस कुछ ऊल-जुलूल मत कहना कि कहना कि पुराने ज़ख़्म फिर से हरे हो जाएँ। मैंने अंदरूनी ज्वाला बड़ी मुश्किल से भीतर दबाई है।

नहींऐसी-वैसी कोई बात नहीं

अच्छा तो बताओअगर फिर आग फाँकनी पड़े तो मैं फाँक लूंगी। हम औरतें आग खाने वाली होती हैं। अगर हम आग न खाएं, तो भविष्य के वारिस कहाँ से पैदा होंगे?

तुम ग़लत समझ रही हो, मेरा मतलब था

क्या तुम मुझे प्रपोज़ कर रहे हो?

कुछ ऐसा ही समझ लोज़िंदगी अकेले बैठ कर अतीत का रोना रोते नहीं कटतीअगर तुम चाहो तोहम हाथ पकड़कर साथ चल सकते हैं।

वह सोच में पड़ गई। धीरज का रिपोर्ट कार्ड ठीकठाक था। वह उसके बारे में सब जानती थी। उसे लगता था कि भले ही वह बिलावल की जगह न ले सके, लेकिन खानापूर्ति कर सकता है। वह चाहती थी कि धीरज उसका हाथ थामे तो उसकी शर्तों पर। सभी शर्तें उसने मान ली थीं। सिर्फ़ एक शर्त्त पर आकर बात फंस गई थी। आकांक्षा सुनिश्चत करना चाहती थी कि अगर कभी बिलावल उसकी ज़िंदगी में वापसी का कोई रास्ता ढूँढ लेता है तो धीरज को बिना एक पल सोचे उसे छोड़ देना होगा।

धीरज कई दिनों तक सोचता रहा कि ऐसा वादा करना चाहिए या नहीं? कभी उसे लगता कि अब बिलावल के लौटने का सवाल ही नहीं  उठता। दूसरी तरफ मन कहता आशिक बड़े ढीठ होते हैं। अगर कल को कोई राह निकल आई तो...? फिर तो कोई चारा नहीं रहेगा। अतत: उसने मन को समझा लिया कि वर्तमान से आगे सोचने की ज़रूरत नहीं। भविष्य को उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए।

आज बिलावल उसकी ज़िंदगी में फिर लौट आया था परंतु पता नहीं इस बिलावल के लिए वह माने या नहीं। हाँ एक तरीका हो सकता है अगर पहले नाइटडाइवोर्स ले लिया जाए। इसमें तो धीरज को भी कोई ऐतराज़ नहीं होगा। परंतु जब धीरज वापस आएगा तब देखा जाएगा। आज तो बिलावल उसके पास है। उसका अपना, हर दम उसकी साँसों में घुला।

अब ऑफिस के काम में उसका मन नहीं लगता था। वह बस बैठकर बिलावल से बातें करती रहती। मामला कंपनी डायरेक्टर तक पहुँच गया। उसे चेतावनी जारी कर दी गई, परंतु उसने कोई परवाह नहीं की। बिलावल के नशे ने उसे लापरवाह और अक्खड़ बना दिया था। उसने हरेक की बात की अनदखी करनी शुरू कर दी। अंतत: उसे नौकरी से छुट्टी हो गई। न भी होती तो वह तो पहले ही छोड़ने को तैयार बैठी थी।

समय गुज़रता गया। कभी उसे लगता बेकार ही बिलावल से दुबारा प्यार की पेंगे बढ़ाई। तपती आग की तपिश उसे झुलसाने को होता परंतु उसे लगता जब तक बिलावल उसके साथ हैकोई उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकता।

एक दिन अचानक उसकी आँख लग गई। जब आँख खुली तो बिलावल अदृश्य हो चुका था। उसका दिल धक से रह गया कि ऐसे कैसे बिलावल उसे छोड़ कर जा सकता है? उसने ढूँढने की बहुत कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ। येलो अलर्ट आ रहा था कि कंपनी ने नई खोज की है। पहले वाली प्रोग्रामिंग को और भी अपडेट करके उसका नया वर्जन तैयार किया गया है परंतु उसके लिए भारी रकम चुकानी पड़ेगी।

वह परेशान हो गई। इतने पैसे वह कहाँ से लाए? नौकरी जा चुकी थीपैसे ख़त्म हो चुके थे। आख़िर उधार लेकर उसने नया बिलावल ढूँढा जो पहले वाले से ज़्यादा तेज़ और अधिक हाज़िर-जवाब था। एक दिन उसने बिलावल को लिखा, अब तुम मुझे बहुत महँगे पड़ रहे हो। बताओ, इतने पैसे कहाँ से लाऊँ? क्या तुम्हारे लिए अब मैं डाका डालूं?

यह तो तुम्हारी च्वॉयस है। तुम ही मुझे लेकर आई हो।

तुम तो मुझे खा गए, बताओ मैं क्या खाऊँ? तुम्हारा फ़र्ज़ नहीं कि तुम मुझे खिलाओ?

हमारी दुनिया तो हमारे मालिकों ने बनाई है। हम तो उनके ग़ुलाम हैं। हम उन्हें कमाकर खिला सकते हैं परंतु तुम्हें नहीं।

 परंतु क्या प्यार में तुम्हारा कोई फ़र्ज़ नहीं? तुम तो पक्के धोखेबाज निकले। इतने साल मुझे चराते रहे और अब मुझे तोड़ने को फिर रहे हो!

नहीं, यह बात नहीं है, तुम बताओ मैंने तुम्हारी ज़िंदगी आसान बनाई कि नहीं, फिर तुम पैसों का मोह क्यों कर रही हो? बाज़ार की दुनिया में पैसा तो चुकाना ही पड़ेगा। पैसे के बिना तो कुछ नहीं होता। तुम्हें ज़िंदगी या पैसे में से एक को चुनना होगा। पहले भी तुम्हारी च्वॉयस थी, अब भी तुम्हारी ही है।

सोच-विचार में गुम वह फिर से जॉब ढूँढने के बारे में सोच रही थी कि अगर पैसा हुआ तो बिलावल का कोई भी नया वर्जन खरीद सकती है। पैसा होना ज़रूरी है... पैसा...।                      

 

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                    लेखक परिचय     परमजीत ढींगरा

 

 पूर्व प्रोफेसर-निदेशक (पंजाब विश्वविद्यालय) ।

  एक कहानी संग्रह चुप महाभारत प्रकाशित तथा दूसरा लव सिंड्रोमप्रकाशनाधीन।

  विश्व गद्य साहित्य से संबंधित 6 पुस्तकें प्रकाशित, 4 पुस्तकें प्रकाशनाधीन।

  आलोचना तथा भाषा विज्ञान से संबंधित 10 पुस्तकें प्रकाशित, तीन प्रकाशनाधीन।

  5 अनूदित पुस्तकें प्रकाशित, 1 प्रकाशनाधीन।

 

  सम्मान - 2024 में भाई वीर सिंह कोशकारी सर्वोत्तम पुरस्कार, भाषा विभाग, पंजाब।

  2025 में स. गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी सर्वोत्तम गद्य पुरस्कार, भाषा विभाग, पंजाब।

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                साभार - ककसाड़, जुलाई 2026 (दिल्ली) 







कहानी -82 ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਡੈਡ - ਵਿਭਾ ਰਾਣੀ

 ਹਿੰਦੀ ਕਹਾਣੀ                   


                                                ਅਨੁਵਾਦ - ਨੀਲਮ ਸ਼ਰਮਾ ਅੰਸ਼ੂ                                                                                                                                                     

 

                  ਗੱਪੂ, ਬਹੁਤ ਨੌਟੀ ਹੋ ਗਿਆਂ ਏਂ ਤੂੰ

                  ਮੈਂ ਗੱਪੂ ਨਹੀਂ ਹਾਂ, ਮੰਮਾਤੁਹਾਡੀ ਮੈਮੋਰੀ ਲੌਸ ਹੋ ਗਈ ਹੈ

                  ਉਏ ਅੱਪੂ

                  ਮੈਂ  ਅੱਪੂ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹਾਂ, ਮੰਮਾਤੁਸੀਂ ਕੇਲੇ ਜਿਆਦਾ ਖਾਇਆ ਕਰੋ

                  ਉਏ, ਸ਼ਿਨਚੈਨ।

                  ਤੁਸੀਂ ਬਹੁਤ ਨੌਟੀ  ਹੋ, ਮੰਮਾਮੈਨੂੰ ਬਹੁਤ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਕਰਦੇ ਹੋਂ।

                  ਹਾਂ, ਨੌਟੀ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਦੀ ਨੌਟੀ ਮੰਮਾ

                  ਮੈਂ ਕਿੱਥੇ ਨੌਟੀ ਹਾਂ, ਮੰਮਾਮੈਂ ਵੀ ਤੁਹਾਡੇ ਵਾਂਗ ਹੀ ਭੋਲਾ-ਭਾਲਾ ਹਾਂ।

                  ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਭੋਲੇ-ਭਾਲੇ ਸ਼ਿਨਚੈਨ। ਜਿਵੇਂ ਡੈਡੀ ਕਹਿਣ ਉਵੇਂ ਹੀ ਕਰ ਲਿਆ ਕਰ

                  ਕਿਉਂ?’

                  ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਤੇਰੇ ਡੈਡੀ ਨੇ

                  ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਮੇਰੇ ਮੰਮਾ ਹੋ।  ਤੁਸੀਂ ਆਪਣੇ ਦਿਲੋਂ ਜੋ ਵੀ ਕਹੋਗੇ, ਮੈਂ ਕਰਾਂਗਾ ਨਾਲੇ ਤੁਸੀਂ ਮੈਨੂੰ -ਗੱਪੂ ਨਾ ਸੱਦਿਆ ਕਰੋ ਮੈਂ ਤੁਹਾਡਾ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਹਾਂ, ਸਮਝੇਮੈਂ ਹੁਣ ਖੇਡਣ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹਾਂ। ਬਾਈ!

               ਗੇਂਦ ਚੁੱਕ ਕੇ ਚਲਾ ਗਿਆ ਅੱਪੂਰੀਤੂ ਉਸਨੂੰ ਜਾਂਦਿਆਂ ਦੇਖਦੀ ਰਹੀ। ਦਰਵਾਜ਼ੇ ਕੋਲ ਪੁੱਜ ਕੇ ਅੱਪੂ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਭੱਜਦਾ ਹੋਇਆ ਆਇਆ ਅਤੇ ਰੀਤੂ ਦੇ ਕੰਨ ਵਿੱਚ ਜੋਰ ਨਾਲ ਉੱਚੀ ਅਵਾਜ਼ ਵਿੱਚ ਕਿਹਾ - ਤੁਸੀਂ ਬਹੁਤ ਨੌਟੀ ਹੋ ਮੰਮਾ, ਮੇਰੇ ਨਾਲੋਂ ਵੀ ਵੱਧ। ਉਹ ਜਿੰਨੀ  ਤੇਜੀ ਨਾਲ ਅੰਦਰ ਆਇਆ ਸੀ ਉਸ ਨਾਲੋਂ ਵੀ ਤੇਜੀ ਨਾਲ ਉਹ ਬਾਹਰ ਭੱਜ ਗਿਆ। ਦਰਦ ਵਿੱਚ ਡੁੱਬੀ ਰੀਤੂ ਮੁਸਕਰਾ ਪਈ ਅਤੇ ਉਸਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਹੰਝੂਆਂ ਨਾਲ ਭਰ ਗਈਆਂ।

               ਅੱਪੂ ਗੇਂਦ ਲੈ ਕੇ ਬਾਹਰ ਜਾਣ ਦੀ ਬਜਾਏ, ਆਪਣੇ ਕਮਰੇ ਵਿੱਚ ਖੇਡਦਾ ਰਿਹਾ। ਉਹ ਥੋੜ੍ਹੀ-ਥੋੜ੍ਹੀ ਦੇਰ ਬਾਅਦ ਆਉਂਦਾ, ਰੀਤੂ ਦੇ ਕਮਰੇ ਵਿੱਚ ਝਾਤੀ ਮਾਰਕੇ ਚਲਾ ਜਾਂਦਾ। ਰੀਤੂ ਕਦੇ ਨੀਂਦ ਵਿੱਚ ਹੁੰਦੀ ਅਤੇ ਕਦੇ ਪੀੜ ਵਿੱਚ।  ਅੱਪੂ ਕਮਰੇ ਵਿੱਚ ਆਉਂਦਾ ਅਤੇ ਦੇਖ ਲੈਂਦਾ ਕਿ ਉਸਦੇ ਕਮਰੇ ਵਿੱਚ ਸਭ ਕੁਝ  ਹੈ ਕਿ ਨਹੀਂ ਜਿਵੇਂ ਪਾਣੀ, ਗਲਾਸ, ਤੌਲੀਆ, ਫਲ, ਨਮਕੀਨ, ਬਿਸਕੁਟ ਅਤੇ ਦਵਾਈਆਂ ਦਾ ਡੱਬਾ। ਜੇ ਰੀਤੂ ਖਾਣ ਵੇਲੇ ਸੌਂ ਰਹੀ ਹੁੰਦੀ, ਤਾਂ ਉਹ ਖੁਦ ਖਾਣਾ ਲੈ ਕੇ ਉਸਦੇ ਪਲੰਘ ਕੋਲ ਚਲਾ ਜਾਂਦਾ। ਮੇਜ਼ 'ਤੇ ਟਰੇ, ਪਲੇਟ ਆਦਿ ਰੱਖਦਾ ਅਤੇ ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਕਦੇ ਮੋਢੇ ਅਤੇ ਕਦੇ ਸਿਰ ਨੂੰ ਹਿਲਾ ਕੇ ਕਹਿੰਦਾ ਸੀ, ‘ਨੌਟੀ ਮੰਮੀ, ਉੱਠੋਆਪਣਾ ਨਾਸ਼ਤਾ ਕਰ ਲਉ, ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਮੈਂ ਸਭ ਕੁਝ ਖਾ ਲਵਾਂਗਾ। ਮੂਲੀ ਦੇ ਪਰੌਂਠੇ ਨੇਤੁਹਾਨੂੰ ਪਤਾ ਹੈ, ਮੈਨੂੰ ਮੂਲੀ ਦੇ ਪਰੌਂਠੇ ਬਹੁਤ ਪਸੰਦ ਹਨ।

               ਕਮਜ਼ੋਰੀ ਨਾਲ ਬੋਝਿਲ ਹੋਇਆਂ ਆਪਣੀਆਂ ਪਲਕਾਂ ਨੂੰ ਖੋਲ੍ਹਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਦੀ ਹੋਈ ਰੀਤੂ ਫੇਰ ਸੌਂ ਜਾਂਦੀਅੱਪੂ ਫੇਰ ਤੋਂ ਜਗਾਉਂਦਾ। ਰੀਤੂ ਨੇ ਅੱਖਾਂ ਖੋਲ੍ਹਦੀਉਹ ਆਪਣੇ ਸਾਹਮਣੇ  ਵੱਲ ਦੇਖ ਕੇ ਮੁਸਕਰਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਦੀ, ਪਰ ਉਸਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਬੰਦ ਹੋ ਜਾਂਦੀਆਂ। ਉਹ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਆਉਂਦੀ ਅਤੇ  ਅੱਪੂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਸਾਹਮਣੇ ਦੇਖ ਕੇ ਪੁੱਛਦੀ, ‘ਤੂੰ ਸਕੂਲ ਨਹੀਂ ਗਿਆ?’

        ਨੌਟੀ ਮੰਮਾ! ਤੁਸੀਂ ਬਿਮਾਰ ਕਿਉਂ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹੋ? ਮੈਂ ਸਕੂਲ ਕਿਵੇਂ ਜਾਵਾਂ?’

               ਰੀਤੂ ਫਟਾਫਟ ਉੱਠਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਦੀ ਅਤੇ ਕਹਿੰਦੀ, ‘ਮੈਂ ਠੀਕ ਹਾਂ ਪੁੱਤਰ।  ਤੂੰ ਸਕੂਲ ਜਾ। ਤੇਰੀ ਪੜ੍ਹਾਈ ਦਾ ਹਰਜਾ ਹੋਵੇਗਾ

               ਦਰਅਸਲ ਰੀਤੂ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਸੀ ਕਿ ਜੇਕਰ ਤੂੰ ਸਕੂਲ ਨਹੀਂ ਗਿਆ ਤਾਂ ਤੇਰੇ ਡੈਡੀ ਬਹੁਤ ਗੁੱਸੇ ਹੋਣਗੇ। ਕੱਲ੍ਹ ਹੀ, ਉਸਨੂੰ ਕਿਹਾ ਸੀ, ‘ਤੂੰ ਇੰਨੀ ਵੀ ਕੀ ਬੀਮਾਰ ਹੈਂ ਕਿ ਤੂੰ ਆਪਣੇ ਪੁੱਤਰ ਨੂੰ ਕੰਮ 'ਤੇ ਲਗਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਰਿਜਲਟ ਮਾੜਾ ਹੋਵੇਗਾ ਜਾਂ ਨਹੀਂ? ਉਂਝ ਵੀ ਤੇਰਾ ਕੀ ਜਾਣਾ? ਮੈਂ ਹੀ ਉਸਨੂੰ ਪੜ੍ਹਾਉਂਦਾ-ਲਿਖਾਂਉਂਦਾ ਹਾਂ। ਪੈਸੇ ਮੇਰੇ ਲੱਗਦੇ ਹਨ। ਮੈਂ ਤੇਰੀ ਦੇਖਭਾਲ ਲਈ ਇੱਕ ਨੌਕਰ ਰੱਖ ਤਾਂ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਨਾ?  ਫੇਰ?  ਉਸਨੂੰ ਸਕੂਲ ਭੇਜਿਆ ਕਰ। ਬਹੁਤ ਜ਼ਿਆਦਾ ਡਰਾਮਾ ਕਰਨ ਦੀ ਕੋਈ ਲੋੜ ਨਹੀਂ

               ਰੀਤੂ ਚੁੱਪ ਰਹਿ ਗਈ ਸੀ। ਉਸਨੇ ਪਾਸਾ ਫੇਰ ਲਿਆ ਸੀ। ਅੱਪੂ ਨੂੰ ਸਮਝਾ ਦਿੱਤਾ ਸੀ, ਅੱਜ ਵੀ! ਅੱਜ ਕਨਕ ਅਜੇ ਨਹੀਂ ਆਈ। ਉਹ ਉਸਦੀ ਉਡੀਕ ਕਰਦੀ ਹੋਈ ਬਿਸਤਰੇ ਤੋਂ ਉੱਠੀ ਵੀ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਅਜੇ ਉਸਨੂੰ ਸਵੇਰ ਦੇ ਸਾਰੇ ਕੰਮਾਂ ਤੋਂ ਫਾਰਿਗ ਹੋਣਾ ਸੀ। ਵੱਡੀ ਸਰਜਰੀ ਹੋਈ ਸੀਬਲੀਡਿਂਗ ਅਜੇ ਵੀ ਹੋ ਰਹੀ ਸੀ। ਉਸਦਾ ਹੱਥ ਪਿੱਛਾਂਹ ਨੂੰ ਗਿਆ ਅਤੇ ਫੇਰ ਉਸਦੀ ਨਜ਼ਰ ਅੱਪੂ ਵੱਲ ਗਈ। ਉਹ ਥੋੜ੍ਹਾ ਝਿਜਕ ਗਈ। ਉਸਨੇ ਫੇਰ ਚਾਦਰ ਆਪਣੇ ਲੱਕ ਤੱਕ ਖਿੱਚ ਲਈ ਅਤੇ  ਅੱਪੂ ਨੂੰ ਪੁੱਛਿਆ, ‘ਕਨਕ ਆ ਗਈ?’

               ਉਹ ਕ੍ਰਿਕੇਟ ਖੇਡਣ ਗਈ ਹੈ। ਉਸਨੇ ਤੁਹਾਨੂੰ ਵੀ ਖੇਡਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਹੈ।

               ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ  ਰੀਤੂ ਦੀ ਅਲਮਾਰੀ ਕੋਲ ਚਲਾ ਗਿਆ। ਉਸਨੂੰ ਖੋਲ੍ਹਿਆ ਅਤੇ ਉੱਪਰ ਤੋਂ ਹੇਠਾਂ ਤੱਕ ਦੇਖਿਆ। ਉਸਨੇ ਉਸਦੇ ਕੱਪੜੇ ਕੱਢੇ, ਬਾਥਰੂਮ ਚ ਰੱਖੇ ਅਤੇ ਰੀਤੂ ਕੋਲ ਆਇਆ, ‘ਨੌਟੀ ਮੰਮਾ, ਉੱਠੋ। ਕਨਕ ਆਂਟੀ ਅਜੇ ਨਹੀਂ ਆਈ। ਤੁਸੀਂ ਬਰੱਸ਼ ਕਰਕੇ ਆਪਣੇ ਕੱਪੜੇ ਬਦਲੋ।’   ਅੱਪੂ ਨੇ ਰੀਤੂ ਨੂੰ ਸਹਾਰਾ ਦੇ ਕੇ ਉਠਾਇਆ ਅਤੇ ਉਸਨੂੰ ਬਾਥਰੂਮ ਲੈ ਗਿਆ। ਬੋਲਿਆ-ਮੰਮਾ, ਡੋਰ ਬੰਦ ਨਾ ਕਰਿਉ ਮੈਂ ਇੱਥੇ ਹੀ ਹਾਂ। ਲੋੜ ਹੋਵੇ  ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਅਵਾਜ਼ ਮਾਰ ਲੈਣੀ। ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਮੈਨੂੰ ਅਵਾਜ਼ ਨਹੀਂ ਮਾਰੀ, ਤਾਂ ਮੈਂ ਅੰਦਰ ਆ ਜਾਵਾਂਗਾ, ਫੇਰ ਤੁਹਾਡੀ ਸ਼ੇਮ-ਸ਼ੇਮ ਹੋ ਗਈ ਤਾਂ ਮੈਂਨੂੰ ਗੁੱਸੇ ਨਾ ਹੋਣਾ।

               ਰੀਤੂ ਨੇ ਬਾਥਰੂਮ ਵਿੱਚ ਦੇਖਿਆ ਕਿ ਅੱਪੂ ਨੇ ਨਾਈਟੀ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਉਸਦੇ ਅੰਡਰਗਾਰਮੈਂਟ, ਸੈਨੇਟਰੀ ਨੈਪਕਿਨ ਵਗੈਰਾ ਸਭ ਕੁਝ ਸਲੀਕੇ ਨਾਲ ਰੱਖ ਦਿੱਤਾ ਸੀ। ਬਿਲਕੁਲ ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਿਵੇਂ ਰੀਤੂ ਨੂੰ ਪਸੰਦ ਹੈ। ਰੀਤੂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਰੋਕ ਨਾ ਸਕੀ। ਕਮੋਡ 'ਤੇ ਬੈਠਦੇ ਸਾਰ ਹੀ, ਉਹ ਫਿਸ ਪਈ- ਮੇਰਾ ਗੱਪੂ! ਮੇਰਾ ਅੱਪੂ ਮੇਰਾ ਸ਼ਿਨਚੈਨ!ਨਾਨੀ  ਨੇ ਉਸਦਾ ਨਾਮ ਗੱਪੂ ਰੱਖਿਆ ਸੀ - ਜਦੋਂ ਤੂੰ ਕੁੱਖ ਵਿੱਚ ਸੀ, ਤੇਰੀ ਮਾਂ ਗੱਪ-ਗੱਪ ਖਾਂਦੀ ਸੀ, ਇਸੇ ਲਈ ਤੂੰ ਗੱਪੂ ਹੈਂ!

               ਨਾਨਾ ਨੇ ਕਿਹਾ, ‘ਜਿਵੇਂ ਨੌਵੀਆਂ ਏਸ਼ੀਅਨ ਖੇਡਾਂ ਦਾ ਸ਼ੁਭੰਕਰ ਹਾਥੀ,  ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮੇਰਾ ਇਹ ਗੋਲ-ਮਟੋਲ ਸ਼ੁਭੰਕਰ ਹੈ।ਡੈਡੀ ਨੂੰ ਇਹ ਸਾਰੇ ਨਾਂ ਅਤੇ ਲਾਡ-ਪਿਆਰ ਪਸੰਦ ਨਹੀਂ ਸੀ ਸਿੱਧੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਨਾਂ ਰੱਖ ਦਿੱਤਾ- ਨਚੀਕੇਤਾ। ਰੀਤੂ ਨੂੰ ਗੱਪੂ ਅਤੇ ਅੱਪੂ ਦੋਵੇਂ ਪਸੰਦ ਸਨ। ਉਸਨੂੰ  ਅੱਪੂ ਰਾਜਾ ਨਾਲ ਬਹੁਤ ਪਿਆਰ ਸੀ। ਜਦੋਂ 19 ਨਵੰਬਰ 1984 ਨੂੰ ਦਿੱਲੀ ਵਿੱਚ  ਅੱਪੂ ਘਰ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਇਆ ਸੀ, ਉਦੋਂ ਉਹ ਤੇਰਾਂ-ਚੌਦਾਂ ਸਾਲਾਂ ਦੀ ਸੀ। ਕੁਝ ਹੀ ਸਮੇਂ ਵਿੱਚ, ਇਹ ਦਿੱਲੀ ਅਤੇ ਇਸਦੇ ਆਲੇ ਦੁਆਲੇ ਦੇ ਖਿੱਚ ਦਾ ਕੇਂਦਰ ਬਣ ਗਿਆ ਸੀ। ਪ੍ਰਗਤੀ ਮੈਦਾਨ ਵਿੱਚ ਬਣੇ ਅੱਪੂ ਘਰ ਵਿੱਚ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਭਾਰੀ ਭੀੜ ਇਕੱਠੀ ਹੁੰਦੀ। ਰੀਤੂ ਵੀ ਜਾਂਦੀ ਸੀ, ਪਹਿਲਾਂ ਆਪਣੇ ਮਾਪਿਆਂ ਨਾਲ, ਅਤੇ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ ਦੋਸਤਾਂ ਨਾਲ। ਸ਼ੁਭੰਕਰ ਹਾਥੀ ਨੂੰ ਦੇਖ ਕੇ ਉਸਦੇ ਮਨ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਿਚਾਰ ਆਇਆ - ਜਦੋਂ ਮੇਰਾ ਬੱਚਾ ਹੋਵੇਗਾ, ਮੈਂ ਉਸਦਾ ਨਾਂ ਅੱਪੂ ਰੱਖਾਂਗੀ।ਇਸੇ ਲਈ ਉਸਨੇ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਦੁਆਰਾ ਦਿੱਤੇ  ਨਾਂ  ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਹਿੱਕ ਨਾਲ ਲਾ ਲਿਆ ਸੀ - ਮੇਰਾ ਅੱਪੂ

               ਪਰ ਅੱਪੂ ਨੇ ਆਪਣਾ ਨਾਂ ਆਪ ਹੀ ਰੱਖ ਲਿਆ ਸੀ -  ਸ਼ਿਨਚੈਨ। ਜਦੋਂ ਉਹ ਮੂਡ ਵਿੱਚ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਜਾਂ ਜਦੋਂ ਉਹ ਆਪਣੀ ਮਾਂ ਨੂੰ ਛੇੜਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਦੋਂ ਬਿਲਕੁਲ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਵਰਗੀ ਅਵਾਜ਼ਾਂ ਕੱਢ ਕੇ ਗੱਲ ਕਰਦਾ, ਉਸੇ ਦੇ ਅੰਦਾਜ਼ ਵਿੱਚ। ਰੀਤੂ ਨੂੰ ਚੰਗਾ ਲਗਦਾ। ਕਦੇ-ਕਦੇ ਉਹ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਦੀ ਮਾਂ ਵਾਂਗ ਆਪਣੇ ਮੱਥੇ 'ਤੇ ਹੱਥ ਮਾਰਦੀ ਅਤੇ ਡੂੰਘਾ ਸਾਹ ਲੈਂਦੀ। ਰੀਤੂ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਦੀ ਮਾਂ ਦੀ ਪੀੜ ਨੂੰ ਸਮਝਦੀ ਸੀ। ਆਪਣੇ ਪੰਜ ਸਾਲ ਦੇ ਬੱਚੇ ਨੂੰ ਗੁਆਉਣਾ, ਕਿਹੋ ਜਿਹਾ ਮਹਿਸੂਸ ਹੋਇਆ ਹੋਵੇਗਾ! ਆਪਣੇ ਬੱਚੇ ਦੇ ਵਿਛੋੜੇ ਦੇ ਸੋਗ ਵਿੱਚ ਡੁੱਬੀ ਹੋਈ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਦੀ ਮਾਂ ਨੇ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਦੇ ਕਾਰਟੂਨ ਬਣਾਉਣੇ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤੇ। ਜਿਸ ਦੇ ਆਧਾਰ 'ਤੇ ਇਹ ਮਸ਼ਹੂਰ ਕਾਰਟੂਨ ਬਣਿਆ ਸੀ - ਸ਼ਿਨਚੈਨ। ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਕਿੰਨਾ ਸ਼ਰਾਰਤੀ ਸੀ, ਨਹੀਂ ਪਤਾ, ਪਰ ਕਾਰਟੂਨ ਵਾਲੇ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਨੂੰ ਛੋਟੇ-ਵੱਡੇ ਸਾਰੇ ਪਿਆਰ ਕਰਨ ਲੱਗ ਪਏ ਸੀ। ਰੀਤੂ ਵੀ। ਅਤੇ ਹੁਣ ਉਹ ਅੱਪੂ ਦੇ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਰੂਪ ਨੂੰ ਵੀ ਬਹੁਤ ਪਿਆਰ ਕਰਨ ਲੱਗ ਪਈ ਸੀ। ਇਹੀ ਅੱਪੂ, ਨਹੀਂ-ਨਹੀਂ, ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਨੇ ਉਸ ਲਈ ਸਕੂਲ ਜਾਣਾ ਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ,  ਬਾਥਰੂਮ ਵਿੱਚ ਉਸਦੇ ਲਈ ਅੰਡਰਗਾਰਮੈਂਟ ਅਤੇ ਸੈਨੇਟਰੀ ਨੈਪਕਿਨ ਤੱਕ ਰੱਖ ਆਇਆ ਹੈ। ਅਜੇ ਛੋਟਾ ਜਿਹਾ ਹੈ ਤਾਂ  ਹੈ ਉਹ, ਅੱਠ-ਨੌਂ ਸਾਲਾਂ ਦਾ। ਇੰਨਾ ਕੁਝ ਕਿਵੇਂ ਸਮਝ ਗਿਆ ਹੈ!   

               ਮੰਮਾ, ਤੁਸੀਂ ਠੀਕ ਹੋ ਨਾ? ਜ਼ਿਆਦਾ ਨਾ ਨਹਾਓ। ਸਾਰਾ ਪਾਣੀ ਖ਼ਤਮ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ, ਫੇਰ ਮਿਉਨਿਸੀਪੈਲਿਟੀ ਵਾਲੇ ਅੰਕਲ ਨੂੰ ਕਹਿਣਾ ਪਵੇਗਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀਆਂ ਆਲਸੀ ਲੱਤਾਂ ਚੁੱਕ ਕੇ ਆਉਣਾ ਪਵੇਗਾ। ਕਨਕ ਆਂਟੀ ਨੂੰ ਬਗੈਰ ਕੋਈ ਕੰਮ ਕੀਤੇ ਵਾਪਸ ਜਾਣਾ ਪਵੇਗਾ।ਅੱਪੂ ਦੀ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਵਾਲੀ ਅਵਾਜ਼ ਰੀਤੂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚ ਗਈ। ਉਹ ਜਦੋਂ ਸ਼ਰਾਰਤ ਜਾਂ ਆਪਣੀ ਮੰਮਾ ਦਾ ਦਿਲ ਪਰਚਾਉਣ ਦੇ ਮੂਡ ਵਿੱਚ ਹੁੰਦਾ ਸੀ, ਤਾਂ ਉਹ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਵਾਂਗ ਬੋਲਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੰਦਾ ਸੀ। ਉਸਨੂੰ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਬਹੁਤ ਪਸੰਦ ਸੀ। ਰੀਤੂ ਟੌਮ ਐਂਡ ਜੈਰੀ ਦੀ ਦੀਵਾਨੀ ਸੀ ਅਤੇ ਹਗੁਮਾਰੀ ਦੇ ਉਹ ਦੋਵੇਂ  ਹੀ।  ਅੱਪੂ ਦੀ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਵਾਲੀ ਅਵਾਜ਼ ਸੁਣ ਕੇ, ਆਪਣੇ ਹੰਝੂਆਂ ਨੂੰ ਕਾਬੂ ਕਰਦੇ ਹੋਏ, ਉਸਨੇ ਆਪਣੀ ਕਮਜ਼ੋਰ ਅਵਾਜ਼ ਵਿੱਚ ਜਵਾਬ ਦਿੱਤਾ - ਆ ਰਹੀ ਹਾਂ। ਸੰਭਲ ਗਈ ਸੀ ਰੀਤੂਸੰਭਲ ਗਿਆ ਸੀ ਘਰ। ਕੌਣ? ਅੱਪੂ ਪਹਾੜੀ ਇਲਾਕੇ ਵਿੱਚ ਸਥਿਤ ਹੈ ਰੀਤੂ ਦਾ ਨਵਾਂ ਘਰਕਵਿਤਾਵਾਂ ਲਿਖਦੇ ਹੋਏ ਉਸਨੂੰ  ਯਾਦ ਆ ਰਿਹਾ ਹੈ।  ਆਸਟ੍ਰੇਲੀਆ ਚ ਜੌਬ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ ਅੱਪੂ ਉਹ ਉਸਦੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੀ ਇੱਕ-ਇੱਕ ਧੜਕਣ ਨੂੰ ਕਿਵੇਂ ਪਛਾਣ ਸਕਿਆ? ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਤਾਂ ਉਹ ਸ਼ੁਰੂ ਤੋਂ ਹੀ ਲਿਖਦੀ ਆ ਰਹੀ ਸੀ, ਪਰ ਕਦੇ ਵੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਅੱਗੇ ਪੇਸ਼ ਕਰਨ ਦੀ ਹਿੰਮਤ ਨਹੀਂ ਸੀ ਹੋਈ। ਪਹਿਲਾਂ ਇੱਕ ਝਿਜਕ ਜਿਹੀ ਰਹੀ ਸੀ, ਫੇਰ ਡਰ ਦੀ ਇੱਕ ਮੋਟੀ ਪਰਤ ਨੇ ਉਸਨੂੰ ਸਿਰ ਤੋਂ ਪੈਰਾਂ ਤੱਕ ਢਕੀ ਰੱਖਿਆ, ਜਿਵੇਂ ਧੁੰਦ ਨਾਲ ਢਕੀ ਸਵੇਰ, ਦੁਪਹਿਰ, ਸ਼ਾਮ ਅਤੇ ਰਾਤ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਦੇਖ ਕੇ ਕੋਈ ਇਹ ਨਾ ਕਹਿ ਦੇਵੇ ਕਿ ਹੋਰ ਕੋਈ ਕੰਮ-ਕਾਰ ਹੈ ਨਹੀਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਲੋਕਾਂ ਕੋਲ, ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਲਿਖ ਕੇ ਸਮਾਂ  ਬਰਬਾਦ ਕਰਣਗੀਆਂ। ਕੁਝ ਕਹਿਣ ਤੇ ਨਾਰੀਵਾਦੀ ਅਖਵਾਉਣਗੀਆਂ, ਦੀਜ਼ ਫੀਮੇਲਜ਼ !

               ਕੋਈ ਕੌਣ?’ ਆਪਣੇ ਹੀ ਦਿਲ ਦੇ ਇਸ ਸਵਾਲ ਉੱਤੇ ਰੀਤੂ ਇੱਕ ਡੂੰਘਾ ਸਾਹ ਲੈਂਦੀ ਹੈ 

               ਜਦੋਂ ਉਹ ਬੀਮਾਰ ਸੀ,  ਅੱਪੂ ਨੇ ਕਿਹਾ - ਮੰਮਾ, ਪੜ੍ਹਾਈ ਤੁਹਾਡੇ ਤੋਂ ਵਧਕੇ ਨਹੀਂ ਹੈ। 

               ਹੈ ਅੱਪੂ ਰੀਤੂ ਉਸਨੂੰ ਸਮਝਾਉਂਦੀ। ਸਿੱਖਿਆ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਅਸੀਂ ਕੁਝ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹਾਂ। ਜੇ ਸਿੱਖਿਆ ਹੈ ਤਾਂ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਹੈ ।

               ਤਾਂ ਤੁਸੀਂ ਪੜ੍ਹ-ਲਿਖ ਕੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕਿਉਂ ਬੰਦ ਕਰਕੇ ਰੱਖ ਲਿਆ, ਮੰਮਾ? ਤੁਸੀਂ ਤਾਂ ਲਿਖਦੇ ਵੀ ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ ਹੋ
ਤੁਹਾਡੇ ਕਰਕੇ ਹੀ ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਹਿੰਦੀ ਅਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਦੋਵਾਂ ਵਿੱਚ ਇੰਨੇ ਚੰਗੇ ਨੰਬਰ ਮਿਲਦੇ ਹਨ। ਮੈਂ ਸਾਰਿਆਂ ਕੰਪੀਟੀਸ਼ਨਾਂ ਜਿੱਤਦਾ ਹਾਂ।
’ 

               ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਵਾਂਗ ਹੀ ਮੁੰਡਿਆਂ ਅਤੇ ਕੁੜੀਆਂ ਦੀ ਸਿੱਖਿਆ ਵਿੱਚ ਵੀ ਫ਼ਰਕ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

               ਮੈਂ ਆਪਣੀ ਵਾਈਫ਼ ਦੀ ਸਟੱਡੀ ਨੂੰ ਕੈਦ ਕਰਕੇ ਨਹੀਂ ਰੱਖਾਂਗਾ। ਮੈਂ ਉਸਨੂੰ ਪੂਰੀ ਫ੍ਰੀਡਮ ਦੇਵਾਂਗਾ।

               ਅਰੇ ਵਾਹ! ਚਾਰ ਫੁੱਟ ਦਾ ਅਜੇ ਹੋਇਆ ਨਹੀਂ ਅਤੇ ਹੁਣ ਤੋਂ ਹੀ ਵਿਆਹ ਅਤੇ ਵਾਈਫ਼ ਬਾਰੇ ਸੋਚਣ ਲਗ ਪਿਆਂ ਹੈਂ। ਰੀਤੂ ਨੇ ਉਸਨੂੰ ਛੇੜਿਆ। ਉਸਨੂੰ ਉਮੀਦ ਸੀ ਕਿ ਉਸਦੀ ਗੱਲ ਸੁਣ ਕੇ  ਅੱਪੂ ਸੰਗ ਜਾਵੇਗਾ, ਪਰ ਅਜਿਹਾ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ। ਉਹ ਚੁੱਪਚਾਪ ਰੀਤੂ ਵੱਲ ਦੇਖਦਾ ਰਿਹਾ। ਰੀਤੂ ਵੀ ਗੰਭੀਰ ਹੋ ਗਈ। ਉਸਨੇ ਕਿਹਾ, ‘ਫ੍ਰੀਡਮ ਕੋਈ ਦਾਨ ਦੀ ਚੀਜ਼ ਨਹੀਂ ਹੈ ਜੋ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਦਿੱਤੀ ਜਾ ਸਕੇ। ਕੀ ਫ੍ਰੀਡਮ ਤੇਰੇ ਕਬਜ਼ੇ ਵਿੱਚ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ? ਕੀ  ਇਸ ਉੱਤੇ ਤੇਰਾ  ਹੱਕ ਹੈ ਕਿ ਤੂੰ ਮਿਹਰਬਾਨੀ ਕਰਕੇ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਇਸਨੂੰ  ਦੇਵੇਂਗਾ? ਕੀ ਤੂੰ ਆਪਣੀ ਵਾਈਫ਼ ਦਾ ਹਸਬੈਂਡ ਬਣੇਗਾਂ ਜਾਂ ਉਸਦਾ ਸਾਥੀ? ਦੋਸਤ? ਹਸਬੈਂਡ  ਬਣੇਗਾਂ ਤਾਂ ਫ੍ਰੀਡਮ ਦੇਣ ਦਾ ਅਹਿਸਾਨ ਜਤਾਵੇਂਗਾ। ਕਮਪੈਨਿਅਨ ਬਣੇਂਗਾ ਤਾਂ ਇਸਦੀ ਲੋੜ ਹੀ ਨਹੀਂ ਪਵੇਗੀ। ਅੱਪੂ ਵੱਡਾ ਹੋ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਸਮੇਂ ਦਾ ਪਹੀਆ ਬਣ ਕੇ, ਉਹ ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਵੱਡਾ ਹੋ ਰਿਹਾ ਸੀ ਅਤੇ ਘਰ ਨੂੰ ਸਮਝ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਉਹ ਵਧਦੇ ਅਤੇ ਬਦਲਦੇ ਸਮੇਂ ਅਨੁਸਾਰ ਰੀਤੂ ਦੇ ਤਨ, ਮਨ, ਧਨ ਦੇ ਹਾਲਾਤਾਂ ਦਾ ਹਿਸਾਬ-ਕਿਤਾਬ ਕਰਦਿਆਂ ਬਾਲਗ ਹੋ ਗਿਆ ਸੀ ਅਤੇ ਦੇਸ਼ ਤੋਂ ਵਿਦੇਸ਼ ਅਤੇ ਪੜ੍ਹਾਈ ਤੋਂ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਤੱਕ ਦੀ ਦੂਰੀ ਤੈਅ ਕਰ ਚੁੱਕਾ ਸੀ। ਇੱਕ ਦਿਨ ਅੱਪੂ ਨੇ ਕਿਹਾ, ‘ਮੰਮਾ, ਮੈਂ ਹੁਣ ਵੱਡਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹਾਂ ਅਤੇ ਕਮਾਉਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਤੁਹਾਨੂੰ ਹੁਣ ਇੱਥੇ ਰਹਿਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਤੁਸੀਂ ਜਾਂ ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਕੈਨੇਡਾ ਚੱਲੋ ਜਾਂ ਆਪਣੇ ਲਈ ਇੱਕ ਵੱਖਰਾ ਘਰ ਲੈਕੇ ਰਹੋ

               ਰੀਤੂ ਇੰਨਾ ਵੱਡਾ ਫੈਸਲਾ ਕਿਵੇਂ ਲੈ ਸਕਦੀ ਹੈ? ਅੱਜ ਤੱਕ ਉਹ ਇਹ ਫੈਸਲਾ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕੀ ਸੀ ਕਿ ਉਹ ਕੀ ਪਹਿਨੇਗੀ ਅਤੇ ਕੀ ਖਾਵੇਗੀ? ਕਿੱਥੇ ਜਾਵੇਗੀ ਅਤੇ ਕਿਸ ਨੂੰ ਕੀ ਕਹੇਗੀ? ਉਹ ਤਾਂ ਇਹ ਤੱਕ ਨਹੀਂ ਸੋਚ ਸਕੀ ਕਿ ਆਪਣੀਆਂ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਰਸਾਲਿਆਂ ਨੂੰ ਭੇਜ ਦੇਵੇ ਅਤੇ ਹੋਰ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਫੇਸਬੁੱਕ ਤੇ ਹੀ ਪਾ ਦਿਆ ਕਰੇ।  ਹੁਣ ਵੱਖਰਾ ਘਰ ਲੈਕੇ ਰਹਿਣਾ?

               ਅੱਪੂ, ਮੇਰੀ ਅੱਧੀ ਤੋਂ ਵੱਧ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਤਾਂ ਲੰਘ ਗਈ, ਅਤੇ ਬਾਕੀ ਵੀ ...

               ਕਿਸੇ ਵੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਲੰਘ ਹੀ ਜਾਵੇਗੀ, ਤੁਸੀਂ ਇਹੀ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ ਨਾ? ਕਿਉਂ ਲੰਘ ਹੀ ਜਾਵੇਗੀ? ਤੁਸੀਂ ਇਸਨੂੰ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਾਣ ਕੇ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਗੁਜਾਰੋਗੇ?’

               ਰਹਿ ਹੀ ਗਈ ਹੈ ਕਿੰਨੇ ਦਿਨਾਂ ਦੀ ਜਿੰਦਗੀ?’

               ਚਾਰ ਦਿਨਾਂ ਦੀ ਹੀ ਸਹੀ। ਮੰਨ ਲਉ, ਇੱਕ ਦਿਨ ਦੀ ਹੀ ਸਹੀ। ਮੰਨ ਲਉ ਤੁਸੀਂ ਕਲ੍ਹ ਹੀ ਮਰਣ ਵਾਲੇ ਹੋ। ਕਲ੍ਹ ਕਿਉਂ? ਅੱਜ ਹੀ ਅਤੇ ਹੁਣੇ ਹੀ ਮਰਨ ਵਾਲੇ ਹੋ? ਤਾਂ? ਅੱਜ ਅਤੇ ਹੁਣ ਨੂੰ ਜੀ ਲਉ ਮੰਮਾ! ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਤੁਸੀਂ ਮਰ ਜਾਉਗੇ ਨਾਂ ਤਾਂ ਮੈਂ ਥੋੜ੍ਹਾ ਘੱਟ ਰੋਵਾਂਗਾ ਮੋਟੋ!’ ਅੱਪੂ  ਅਜੇ ਵੀ ਕਦੇ-ਕਦੇ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਬਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

                ਅੱਪੂ ਨੇ ਪਹਾੜ ਦੀ ਚੋਟੀ ਤੇ ਇਹ ਘਰ ਖਰੀਦ ਕੇ ਰੀਤੂ ਦਾ ਪ੍ਰਵੇਸ਼ ਕਰਵਾਇਆ। ਹਰ ਚੀਜ਼ ਉਸਦੀ ਚੁਵਾਇਸ ਦੀ ਰੱਖੀ, ਖਾਸ ਕਰਕੇ ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਸਟੱਡੀ ਟੇਬਲ, ਟੇਬਲ ਲੈਂਪ ਅਤੇ ਗੁਲਦਾਨ। ਉੱਚਾਈ ਤੇ ਬਣੇ ਇਸ ਘਰ ਵਿੱਚ ਬੱਦਲ ਤੈਰਦੇ ਹੋਏ ਆ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਸੂਰਜ ਆਪਣੀ ਚਮਕੀਲੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਨਾਲ ਮੁਸਕਰਾਉਂਦੇ ਹੋਏ ਸਵਾਗਤ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਰਾਤ ਨੂੰ ਸੰਘਣੇ ਤਾਰੇ ਆਪਣੇ ਸਲਮੇ-ਸਿਤਾਰਿਆਂ ਨਾਲ ਰੀਤੂ ਨੂੰ ਸਿਰ ਤੋਂ ਪੈਰ ਤੱਕ ਕੱਜ ਕੇ ਚਲੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਇੱਕ ਛੋਟਾ ਜਿਹਾ ਆਊਟਹਾਊਸ ਕਿਸਮ ਦਾ ਘਰ। ਰੀਤੂ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਇਹ ਘਰ ਬਹੁਤ ਪਸੰਦ ਹੈ। ਅੱਪੂ ਦਾ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ ਘਰ। ਉਸਨੇ ਇਸ ਘਰ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਪਸੰਦ ਦੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਸਜਾਇਆ ਹੈ - ਅਪਰਨਾ ਕੌਰ ਦੀਆਂ ਪੇਂਟਿੰਗਾਂ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਦਯਾਨੀਤਾ ਸਿੰਘ ਦੀਆਂ ਤਸਵੀਰਾਂ ਦੇ ਫਰੇਮ ਸਜਾਏ ਹਨ। ਇਕੇਬਾਨਾ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਉੱਥੇ ਮਿਲਣ ਵਾਲੇ ਸਾਰੇ ਫੁੱਲਾਂ, ਪੱਤਿਆਂ ਨਾਲ ਘਰ ਦੇ ਫੁੱਲਦਾਨ ਭਰ ਦਿੱਤੇ ਹਨ।  ਉਹ ਇਸ ਘਰ ਵਿੱਚ ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਬਕਸਾ ਲੈ ਕੇ ਆਈ ਹੈ ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਦੋ-ਚਾਰ ਜੋੜੇ ਕੱਪੜੇ ਹਨ। ਸਾਰੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਵਾਂਗ ਉਹ ਆਪਣੀਆਂ ਪੁਰਾਣੀਆਂ ਯਾਦਾਂ ਵੀ ਉੱਥੇ ਛੱਡ ਆਈ ਹੈ। ਚੀਜਾਂ ਟੁਰ ਕੇ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਿਆਂ ਇਸ ਕਰਕੇ ਨਹੀਂ ਆਇਆਂ। ਯਾਦਾਂ ਬੱਦਲਾਂ ਵਾਂਗ ਤੈਰ ਕੇ ਕਦੇ-ਕਦੇ ਮਨ ਦੇ ਅਸਮਾਨ ਵਿੱਚ ਦਾਖਲ ਹੋ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਕਦੇ ਕਾਲੇ ਸੰਘਣੇ ਬੱਦਲ ਬਣ ਕੇ ਅਤੇ ਕਦੇ ਬਿਜਲੀ ਬਣ ਕੇ ਗੱਜਦੇ ਬੱਦਲ, ਲਿਸ਼ਕਦੀ ਬਿਜਲੀ। ਪਹਾੜ ਦੀ ਇਸ ਉਚਾਈ ਤੇ ਕਈ ਵਾਰ ਰੀਤੂ ਡਰ ਜਾਂਦੀ

               ਅੱਪੂ ਵੱਡਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ। ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਬਹੁਤ ਵੱਡਾ, ਬਹੁਤ ਸੰਜੀਦਾ,  ਬਹੁਤ ਹੀ ਸਮਝਦਾਰ। ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਵਰਗੀ ਸ਼ਕਲ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਹੀ ਉਸਦੀ, ਜੋ ਉਸਨੂੰ ਕਿਹਾ ਕਰਦਾ ਸੀ, ‘ਤੁਸੀਂ ਸਵੇਰੇ-ਸਵੇਰੇ ਕਸਰਤ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ ਮੋਟੋ? ਢਿੱਡ ਵਧ ਜਾਵੇਗਾ, ਫੇਰ ਸਾਰੇ ਤੁਹਾਨੂੰ ਡੱਬਾ, ਮੁਰੱਬਾ ਕਹਿਣਗੇ। ਮੈਂ ਕਹਾਂਗਾ - ਕਿ ਲੈ ਲਉ, ਲੈ ਲਉ, ਦਸ ਰੁਪਏ ਵਿੱਚ ਮੁਰੱਬਾ, ਪੰਜ ਰੁਪਏ ਦੀ ਜੈਲੀ। ਉਹ ਰੀਤੂ ਦੇ ਢਿਡ ਨੂੰ ਹਿਲਾਉਂਦੇ ਹੋਏ ਕਹਿੰਦਾ ਹੁੰਦਾ ਸੀ।  ਰੀਤੂ ਨੂੰ ਕਦੇ ਉਸ ਤੇ ਪਿਆਰ ਆਉਂਦਾ ਸੀ ਅਤੇ ਕਦੇ ਸਹਿਮ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਨਹੀਂ-ਨਹੀਂ ਉਸਦਾ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਹੀ ਉਸਦੇ ਲਈ ਠੀਕ ਸੀ। ਇਹ ਇਤਨਾ ਗੰਭੀਰ, ਕਲਾਸਿਕ, ਇੰਟੇਲੀਜੇਂਟ ਲੁਕ। ਪੁੱਤ ਦੀ ਥਾਂਹ ਪਿਉ ਵਾਂਗ ਲੱਗਣ ਲਗ ਪਿਆ ਹੈ।          

               ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਨੇ ਬਚਪਨ ਵਿੱਚ ਆਪਣੀ ਮੰਮਾ ਦਾ ਇੱਕ ਕਾਰਟੂਨ ਬਣਾਇਆ ਸੀ - ਘੁੰਗਰਾਲੇ ਵਾਲ,  ਅੱਖਾਂ ਵਿਚਕਾਰ ਇੱਕ ਮੋਟਾ ਜਿਹਾ ਨੱਕ, ਬਹੁਤ ਮੋਟੇ ਅਤੇ ਫੈਲੇ ਹੋਏ ਬੁੱਲ੍ਹ। ਰੀਤੂ ਹੱਸ ਪਈ ਸੀ, ‘ਮੇਰੇ ਬੁੱਲ੍ਹ ਇੰਨੇ ਮੋਟੇ ਕਿੱਥੇ ਨੇ?’

               ਅੱਪੂ ਨੇ ਕਿਹਾ, ‘ਤੁਹਾਨੂੰ ਇੰਨੇ ਪਤਲੇ ਬੁੱਲ੍ਹਾਂ ਕਰਕੇ ਖਾਣ ਚ ਮੁਸ਼ਕਲ ਆ ਰਹੀ ਹੋਵੇਗੀ, ਇਸੇ ਲਈ ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮੋਟਾ ਬਣਾਇਆ ਹੈ - ਆਪਣੇ ਬੁੱਲ੍ਹਾਂ ਵਾਂਗ।

               ਕੀ ਤੂੰ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਖਾ ਲੈਂਦਾ ਏਂ?’

               ਹੋਰ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਕੀ?  ਉਸ ਦਿਨ ਮੈਂ ਸਿਨਹਾ ਆਂਟੀ ਦੇ ਘਰ ਸਾਰੇ ਰਸਗੁੱਲੇ ਸਫਾਚੱਟ ਕਰ ਦਿੱਤੇ ਸਨ!

               ਸਮੇਂ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ, ਰੀਤੂ ਬਦਲਦੀ ਰਹੀ ਅਤੇ ਅੱਪੂ ਵੀ ਹਾਲਾਤ ਵੀ ਬਦਲਦੇ ਰਹੇ। ਜੇਕਰ ਨਹੀਂ ਬਦਲੀ ਤਾਂ ਉਹਨਾਂ ਦੋਵਾਂ ਵਿਚਕਾਰ ਪਿਆਰ ਭਰੀ ਦੁਨੀਆਰੀਤੂ ਲਈ ਉਹ ਉਸਦੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੇ ਸਾਰੇ ਨਛੱਤਰ, ਤਾਰੇ, ਚੰਨ, ਸੂਰਜ ਸੀ ਅਤੇ ਅੱਪੂ ਲਈ ਉਹ ਸਦਾ ਵਗਦੀ ਨਦੀ ਸੀ, ਜਿਸਦੇ ਵਹਾਅ ਵਿੱਚ ਉਹ ਡੁੱਬ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ਅਤੇ ਕਿਤੇ ਦਾ ਕਿਤੇ ਵਹਿ ਜਾਂਦਾ ਸੀ। ਰੀਤੂ ਨੂੰ ਯਾਦ ਹੈ ਕਿ ਉਸ ਦਿਨ ਉਹ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਲਿਖ ਰਹੀ ਸੀ। ਉਹ ਇੱਕ ਸ਼ਬਦ ਤੇ ਅਟਕ ਗਈ ਸੀਸਹੀ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਘਾਟ ਕਾਰਨ ਕਵਿਤਾ ਵਿੱਚ ਰਵਾਨਗੀ ਨਹੀਂ ਆ ਰਹੀ ਸੀ। ਇੱਕ ਕਵਿਤਾ ਲਿਖਣ ਵਿੱਚ ਇੰਨਾ ਸਮਾਂ?  ਉਹ ਕਿਹੋ ਜਿਹੇ ਲੋਕ ਹਨ ਜੋ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਹ ਇੱਕ ਸ਼ਾਮ ਵਿੱਚ ਚਾਲੀ-ਚਾਲੀ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਲਿਖ ਲੈਂਦੇ ਹਨ।

           ਰੀਤੂ ਮਾਨਸਿਕ ਤੌਰ ਤੇ ਥੱਕ ਗਈ ਸੀ ਅਤੇ ਖਿਝ ਵੀ ਆ ਰਹੀ ਸੀ। ਉਸਨੇ ਪੈੱਨ ਬੰਦ ਕਰਕੇ ਆਪਣੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਬੰਦ ਕਰ ਲਈਆਂ, ਅਤੇ ਆਪਣਾ ਸਿਰ ਕੁਰਸੀ ਤੇ ਟਿਕਾ ਲਿਆ। ਇਸ ਵੇਲੇ ਉਸਦਾ ਗਰਮ ਕੌਫੀ ਪੀਣ ਨੂੰ ਜੀ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ,  ਪਰ! ਘਰ ਵਿੱਚ ਤਾਂ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਇੱਥੇ ਉਹ ਇਕੱਲੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ। ਸਿਹਤ ਵੀ ਪਹਿਲਾਂ ਨਾਲੋਂ ਬਿਹਤਰ ਹੈ। ਅਹਿਸਾਸ ਅਤੇ ਅਹਿਸਾਨ ਕਰਾਉਣ ਵਾਲੇ ਚੌਵੀ ਘੰਟਿਆਂ ਦੀ ਦੇਖਭਾਲ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਕੇਅਰਟੇਕਰਾਂ ਤੋਂ ਉਸਨੇ ਨਿਜਾਤ ਪਾ ਲਈ ਸੀ। ਭਾਵੇਂ ਸਭ ਕੁਝ ਕਾਲਜੇ ਵਿੱਚ ਛਿੱਲਤ ਵਾਂਗ ਰੜਕਦਾ ਮਹਿਸੂਸ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਇੰਨਾ ਦੁੱਖ ਕਿਉਂ ਬਰਦਾਸ਼ਤ ਕਰ ਗਈ ਉਹ? ਕਿਉਂ ਬਰਦਾਸ਼ਤ ਕਰ ਰਹੀ ਸੀ? ਲੋਕ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਅੱਜ ਕੱਲ੍ਹ ਸਭ ਕੁਝ ਬਦਲ ਗਿਆ ਹੈ। ਕੁੜੀਆਂ ਬਦਲ ਗਈਆਂ ਹਨ, ਮਾਹੌਲ ਬਦਲ ਗਿਆ ਹੈ। ਹੁਣ, ਕੋਈ ਵੀ ਕੁੜੀ ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਹੋ ਰਹਿਆਂ ਜਿਆਦਤਿਆਂ ਨੂੰ ਬਰਦਾਸ਼ਤ ਨਹੀਂ ਕਰਦੀ ਅਤੇ ਉਹ ਵੱਖ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਕੀ ਸੱਚੀ?  ਉਹ ਆਪਣੇ ਸਿੱਖਿਅਤ ਹੋਣ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ ਨੂੰ ਕਿਉਂ ਭੁੱਲ ਗਈ ਸੀ ?

               ਰੀਤੂ ਵੱਖ ਹੋਈ ਸੀ, ਪਰ ਕਦੋਂ? ਜਦੋਂ ਅੱਪੂ ਨੇ ਜੋਰ ਪਾਇਆ, ‘ਮੰਨ ਲਓ ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਕੱਲ੍ਹ ਹੀ ਮਰਣ ਵਾਲੇ ਹੋ, ਅੱਜ ਅਤੇ ਹੁਣੇ ਹੀ ਮਰਣ ਵਾਲੇ ਹੋ ਇਸ ਲਈ ਅੱਜ ਅਤੇ ਹੁਣ ਨੂੰ ਤਾਂ ਮਾਣ ਲਵੋ।

           ਅਤੀਤ ਬਾਰੇ ਸੋਚਦਿਆਂ, ਉਸਦਾ ਦਿਲ ਹੋਰ ਵੀ ਭਾਰਾ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਫੇਰ ਅਚਾਨਕ ਉਸਨੂੰ ਉਹ ਸ਼ਬਦ ਯਾਦ ਆ ਗਿਆ ਜਿਸ ਲਈ ਉਹ ਲਗਾਤਾਰ ਮਸ਼ੱਕਤ ਕਰ ਰਹੀ ਸੀ - ਮੌਸਮ! ਉਹ ਵੀ ਤਾਂ ਮੌਸਮ ਹੈ -  ਰੀਤੂ(ਰੁੱਤ) ਹੈਉਸਨੂੰ ਆਪਣੇ ਹੀ ਨਾਂ ਦਾ ਸਮਾਨਾਰਥੀ ਸ਼ਬਦ ਢੂੰਢਣ ਵਿੱਚ ਇੰਨਾ ਸਮਾਂ ਲੱਗ ਗਿਆ। ਕੋਈ  ਨਹੀ ਇੰਝ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਅਤੇ ਸਮੇਂ ਨੂੰ ਬਣਨ ਵਿੱਚ ਸਮਾਂ ਲੱਗਦਾ ਹੈਰੀਤੂ ਨੇ ਰਾਹਤ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਆਪਣੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਬੰਦ ਕਰ ਲਈਆਂ। ਇੰਨੇ ਚਿਰ ਤੱਕ ਇਸ ਇੱਕ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਭਾਲ ਨੇ ਸਰੀਰ ਅਤੇ ਮਨ ਨੂੰ ਥੱਕਾ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਆਹ! ਕੌਫੀ ਮਿਲ ਜਾਂਦੀ। ਆਪ ਹੀ ਉੱਠਣਾ ਪਵੇਗਾ ਅਤੇ ਬਨਾਉਣੀ ਪਵੇਗੀ। ਰੀਤੂ ਇਹ ਸੋਚ ਹੀ ਰਹੀ ਸੀ ਕਿ ਕੌਫੀ ਦੀ ਖੁਸ਼ਬੂ ਉਸਦੀਆਂ ਨ੍ਹਾਸਾਂ  ਵਿੱਚ ਆ ਵੱਜੀ। ਉਸਨੇ ਹੈਰਾਨੀ ਨਾਲ ਦੇਖਿਆ - ਅੱਪੂ ਕੌਫੀ ਲੈ ਕੇ ਹਾਜਿਰ ਹੈ।

               ਪੀ ਲਉ ਮੇਰੀ ਜਾਨ, ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਮੈਂ ਪੀ ਲਵਾਂਗਾ।

               ਓਏ! ਤੂੰ ਸਿਰਫ਼ ਦੋ ਦਿਨਾਂ ਲਈ ਤਾਂ ਆਇਆਂ ਏਂਤੈਨੂੰ ਕਿਵੇਂ ਪਤਾ ਲੱਗਾ ਕਿ ਮੇਰਾ ਕੌਫੀ ਪੀਣ ਨੂੰ  ਬਹੁਤ ਜੀ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ?’

               ਕਿੰਨੀਆਂ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਲਿਖ ਲਈਆਂ ਮੋਟੋ?  ਕਿੰਨੇਆਂ ਉੱਤੇ ਕਹਿਰ ਵਰਪਾ ਦਿੱਤਾ?’

               ਅੱਪੂ!’ ਰੀਤੂ ਨੇ ਰਤਾ ਕੁ ਆਪਣੀ ਨਾਰਾਜ਼ਗੀ ਜ਼ਾਹਿਰ ਕੀਤੀ।

               ਮੈਂ ਤੁਹਾਡਾ ਅੱਪੂ ਨਹੀਂ, ਮੈਂ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਹਾਂ। ਕੌਫੀ ਰੱਖਦੇ ਹੋਇਆਂ  ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਵਿੱਚ ਬੋਲਿਆ।

               'ਹਾਂ! ਸ਼ਿਨਚੈਨ  ਤਾਂ ਕੁਝ ਵੀ ਅਤੇ ਕਿਸੇ ਵੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕਹਿ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਰੀਤੂ ਨੇ ਸੋਚਿਆ ਅਤੇ ਮੁਸਕਰਾ ਪਈ।

               ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਨੇ ਕਿਹਾ, ‘ਬੜੀ ਕਾਤਲ ਮੁਸਕਰਾਹਟ ਹੈ, ਇਸ ਕੌਫੀ ਦੀ ਜਾਨ ਹੈ। ਦੇਖੋ, ਮੈਂ ਵੀ ਕਵਿਤਾਈ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਅਤੇ ਕੌਫੀ  ਦਾ ਮੱਗ ਰੀਤੂ ਵੱਲ੍ਹ ਵਧਾਇਆਰੀਤੂ ਨੇ ਕੌਫੀ ਦਾ ਮੱਗ ਫੜ ਲਿਆ ਅਤੇ ਚੁਸਕਿਆਂ ਲੈਣ ਲੱਗ ਪਈ।

               ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਦੇ ਜਪਾਨ ਤੋਂ ਨਿੱਕਲ ਕੇ ਹਿੰਦੁਸਤਾਨ ਵਿੱਚ ਆ ਕੇ ਉਸਨੇ ਕਿਹਾ, ‘ਤੁਹਾਡੀਆਂ ਕਿੰਨੀਆਂ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਹੋ ਗਈਆਂ ਹੁਣ ਤੱਕ?’

               ਗਿਣਿਆਂ ਨਹੀਂ।

               ਤੁਸੀਂ ਗਿਣਤੀ ਕਰੋਗੇ ਵੀ ਨਹੀਂਕਿਤੇ ਭੇਜਿਆਂ ਵੀ ਹਨ ਛਪਣ ਲਈ? ਆਈ ਐਮ ਹੰਡ੍ਰੇਡ ਪਰਸੇਂਟ ਸ਼ਿਉਰ ਕਿ ਨਹੀਂ? ਹੈ ਨਾ?

               ਕੀ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਏਂ, ਅੱਪੂ?’

               ਇਹੋ ਹੀ ਕਿ ਮੋਟੋ ਤੁਸੀਂ ਆਪਣੀਆਂ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਛਪਵਾਓ। ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਫੇਰ ਤੋਂ ਅੱਪੂ ਦੇ ਚਿਹਰੇ ਤੇ  ਖੇਡਣ ਲੱਗਾਪਲਕ ਝਪਕਦਿਆਂ ਹੀ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਫੇਰ ਅੱਪੂ ਵਿੱਚ ਬਦਲ ਗਿਆ। ਤੁਸੀਂ ਆਪਣੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਇਕੱਠੀਆਂ ਕਰੋ ਅਤੇ ਮੈਂਨੂੰ ਦਿਓ। ਮੈਂ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਕ ਲੱਭਦਾ ਹਾਂ।

               ਅਤੇ ਇਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਕਿ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਅੱਪੂ ਬਣਕੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਕ ਦੀ ਭਾਲ ਕਰੇ, ਅੱਪੂ ਨੇ  ਇੱਕ ਕੰਮ ਹੋਰ  ਕਰ ਦਿੱਤਾਉਹ ਫੇਰ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਬਣ ਗਿਆ, ‘ਤੁਸੀਂ ਰੰਜਨ ਅੰਕਲ ਦਾ ਓੰਨਾ ਹੀ ਸਤਿਕਾਰ ਕਰਦੇ ਹੋ ਜਿੰਨਾ ਮੈਂ?’

               ਕੀ ਮਤਲਬ?’

               ਮਤਲਬ ਇਲੂ-ਇਲੂ।

               ਅੱਪੂ!’ 

               ਆਪਣੇ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਤੇ ਨਾ ਚੀਕੋ, ਮੋਟੋਇਹ ਦੱਸੋ, ਤੁਹਾਨੂੰ ਅੰਕਲ ਪਸੰਦ ਹੈ ਨਾ?’

               ਰੀਤੂ ਕੰਬਣ ਲੱਗੀ - ਗੁੱਸੇ, ਡਰ, ਝਿਜਕ ਅਤੇ ਸ਼ਾਇਦ ਚੋਰੀ ਫੜੇ ਜਾਣ ਦੀ ਸੰਗ ਨਾਲਕੌਫੀ ਠੰਡੀ ਹੋਣ ਲੱਗ ਪਈ ਸੀ।

           ਕੋਲਡ ਕੌਫੀ ਵੀ ਚੰਗੀ ਲਗਦੀ ਹੈ ਮੰਮਾਕੌਫੀ ਵਿੱਚ ਹੀ ਇਹ ਗੁਣ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਹੌਟ ਤੋਂ ਕੋਲਡ ਵਿੱਚ ਬਦਲ ਕੇ ਵੀ ਆਪਣੇ ਸੁਆਦ ਨੂੰ ਇੱਕ ਨਵਾਂ ਰੂਪ ਦਿੰਦੀ ਹੈ। ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਬਦਲ ਕੇ ਆਪਣੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਨੂੰ ਇੱਕ ਨਵਾਂ ਰੂਪ ਦੇ ਸਕਦੇ ਹੋ।  ਅੱਪੂ ਨੇ ਰੀਤੂ ਦਾ ਮੋਬਾਈਲ ਚੁੱਕਿਆ ਅਤੇ ਉਸਦੀ ਫੋਟੋ ਗੈਲਰੀ ਦੇਖਣ ਲੱਗਾ, ‘ਮੇਰੇ ਨਾਲੋਂ ਜਿਆਦਾ ਫੋਟੋਆਂ ਤਾਂ ਰੰਜਨ ਅੰਕਲ ਦੀਆਂ ਹਨ ਇਸ ਵਿੱਚ ਮੰਮਾ!’

               ਰੀਤੂ ਆਪਣੀ ਕਵਿਤਾ, ਮੌਸਮ, ਸ਼ਬਦ, ਅਤੇ ਕੌਫੀ ਦੀ ਤਲਬ ਅਤੇ ਕੌਫੀ ਸਾਹਮਣੇ ਆ ਜਾਣ ਤੇ ਉਸਦਾ ਘੁੱਟ ਅਤੇ ਸੁਆਦ ਸਭ ਕੁਝ ਭੁੱਲ ਚੁੱਕੀ ਸੀਉਸਨੂੰ ਪਛਤਾਵਾ ਹੋਣ ਲੱਗਾਕੌਫੀ ਦਾ ਮੱਗ, ਜੋ ਕੁਝ ਘੁੱਟਾਂ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਖਾਲੀ ਹੋ ਗਿਆ ਸੀ, ਹੰਝੂਆਂ ਨਾਲ ਭਰਣ ਲੱਗਾ।  ਅੱਪੂ ਨੇ ਮੋਬਾਈਲ ਲੈਪਟੌਪ ਦੇ ਕੋਲ ਰੱਖਦੇ ਹੋਇਆਂ ਕਿਹਾ, ‘ਗਿਲਟ ਨਾਲ ਕੌਫੀ ਦੇ ਮੱਗ ਨੂੰ ਨਾ ਭਰੋ ਮੰਮਾ! ਆਪਣੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਵਿੱਚ ਆਏ ਖਲਾਅ ਨੂੰ ਭਰੋ।

               ਤੂੰ  ਕਹਿਣਾ ਕੀ ਚਾਹੁੰਦਾ ਏਂ?’

               ਆੱਪੂ, ਗੱਪੂ, ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਸਾਰੇ ਰਲ ਕੇ ਉਸ ਅੰਕਲ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਪਿਤਾ ਬਣਾਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ।

               ਨੌਟ ਪੌਸਿਬਲ

               ਦੋਸਤੀ ਪੌਸਿਬਲ ਹੋ ਸਕਦੀ ਹੈ, ਰਿਸ਼ਤਾ ਨਹੀਂ?’ ਅੱਪੂ ਨੇ ਰੀਤੂ ਦਾ ਹੱਥ ਆਪਣੇ ਹੱਥ ਵਿੱਚ ਲੈਂਦੇ ਹੋਏ ਕਿਹਾ, ਮੰਮਾ, ਤੁਸੀਂ ਤਾਂ ਜਾਣਦੇ ਹੋ  ਨਾ, ਮੈਂ ਹਰ ਪਲ ਜਿਉਣ ਵਿੱਚ ਯਕੀਨ ਕਰਦਾ ਹਾਂ। ਤੁਹਾਨੂੰ ਵੀ ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਿਉਣਾ ਪਵੇਗਾ। ਯਾਦਾਂ ਦੇ ਪੁਰਾਣੇ ਚਿੱਕੜ ਵਿੱਚ ਫਸੇ ਰਹਿ ਕੇ,   ਉਸਦੀ ਮੈਲ ਅਤੇ ਬਦਬੂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਸਾਹਾਂ ਵਿੱਚ ਵਸਾਈ ਰੱਖਣ ਦਾ ਕੀ ਮਤਲਬ ਹੈ, ਮੰਮਾ? ਆਪਣੇ ਸਾਹਾਂ ਨੂੰ ਪਹਾੜ ਦੀ ਉਚਾਈ ਦਿਉ ਮੰਮਾ! ਆਪਣੇ ਜਜ਼ਬਾਤਾਂ ਨੂੰ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਦੀਆਂ ਲਾਈਨਾਂ ਵਰਗੀ ਗਹਿਰਾਈ ਦਿਉ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਬੁੱਲ੍ਹਾਂ ਤੇ ਇਸ ਨੀਲੇ ਅਸਮਾਨ ਵਰਗੀ ਮੁਸਕਰਾਹਟ ਭਰ ਦਿਉ

               ਲੋਕੀਂ ਕੀ ਕਹਿਣਗੇ?’

               ਕਿਹੜੇ ਲੋਕ?’ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਅੱਪੂ ਬਣ ਗਿਆ, ‘ਕੌਣ ਆਇਆ ਹੈ ਤੁਹਾਡੀ ਮਦਦ ਕਰਨ ਮੰਮਾ? ਤੁਹਾਡੀ ਪਿੱਠ ਜਾਂ ਸਰੀਰ ਤੇ ਕੋਈ ਨਿਸ਼ਾਨ ਨਹੀਂ ਦਿਸਦੇ ਹਨ ਮੰਮਾ, ਇਸ ਲਈ ਹਰ ਕੋਈ ਕਹਿ ਸਕਦਾ ਹੈ - ਮਾਰਦਾ ਕੁੱਟਦਾ ਸੀ ਕੀ? ਪਰ, ਦਿਲ ਦੀ ਪੀੜ  ਨੂੰ ਕੀ ਕੋਈ ਦਿਖਾ ਸਕਦਾ ਹੈ?  ਹਾਂ, ਦਿਖਾ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਤੁਸੀਂ ਦਿਖਾਉਂਦੇ ਵੀ ਰਹੋ ਹੋ ਆਪਣੇ ਉਦਾਸ ਚਿਹਰੇ ਅਤੇ ਕਾਗਜਾਂ ਤੇ  ਲਿਖੀਆਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਕਵਿਤਾਵਾਂ ਰਾਹੀਂ , ਪਰ ਤੁਹਾਡੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੋ-ਕੌਲਡ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਕੌਣ ਸਮਝਣ ਆਇਆ?’

               ਰੀਤੂ ਦੇ ਹੱਥ-ਪੈਰ ਠੰਡੇ ਹੋਣ ਲੱਗ ਪਏ। ਕੌਫੀ ਵੀ ਸੱਚੀਮੁੱਚੀ ਦੀ ਕੋਲਡ ਕੌਫੀ ਬਣ ਗਈ ਸੀਉਸ ਦਾ ਸਰੀਰ ਥਰ-ਥਰ ਕੰਬਣ ਲੱਗਾ।  ਅੱਪੂ ਨੂੰ ਕਿਵੇਂ ਪਤਾ ਲੱਗਾ ਕਿ ਉਹ ਰੰਜਨ ਅੰਕਲ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਪਸੰਦ ਕਰਦੀ ਹੈ।  ਜਾਣ-ਪਛਾਣ ਤਾਂ ਹੋਈ ਸੀ ਅੱਪੂ ਦੀ ਕਲੱਬ ਵਿੱਚਰੰਜਨ 'ਓ ਹਸੀਨਾ ਜ਼ੁਲਫੋਂ ਵਾਲੀ ਜਾਨੇ ਜਹਾਂ' ਤੇ ਡਾਂਸ ਕਰ ਰਹੇ ਸੀ। ਅਚਾਨਕ ਉਹ ਡਾਂਸ ਕਰਦੇ ਹੋਇਆ ਅਗਾਂਹ ਵਧੇ ਅਤੇ ਰੀਤੂ ਦਾ ਹੱਥ ਫੜਕੇ ਉਸਨੂੰ ਬੈਠੀ ਨੂੰ ਉੱਠਾ ਲਿਆ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਨਾਲ ਡਾਂਸ ਕਰਣ ਲੱਗ ਪਏਰੀਤੂ ਨੇ ਝਿਜਕ ਮਹਿਸੂਸ ਕੀਤੀ। ਅਜੇ ਕੁਝ ਦਿਨਾਂ ਤੋਂ ਹੀ ਤਾਂ ਉਸਨੇ ਇਸ ਕਲੱਬ ਵਿੱਚ ਆਉਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ਸੀ। ਅਜੇ ਦੋ-ਚਾਰ ਦਿਨ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਜਾਣ-ਪਛਾਣ ਹੋਈ ਸੀ ਅਤੇ ਅੱਜ ਅਚਾਨਕ ਇਹ ਕਦਮ! ਪਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਕੁਝ ਵੀ ਅਜੀਬ ਨਹੀਂ ਲੱਗਾ ਸੀ, ਹਰ ਕੋਈ ਕਲੱਬ ਦੇ ਸਰੂਰ ਵਿੱਚ ਸੀ। ਸਾਰਿਆਂ ਨੇ ਤਾੜੀਆਂ ਮਾਰੀਆਂ ਅਤੇ ਰੀਤੂ ਦੀ ਹੌਂਸਲਾ ਅਫ਼ਜਾਈ ਕੀਤੀਸਹਿਮੀ ਹੋਈ ਰੀਤੂ ਨੇ ਅੱਪੂ ਵੱਲ ਦੇਖਿਆ।  ਅੱਪੂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਮੋਢੇ ਥੋੜ੍ਹਾ ਜਿਹਾ ਹਿਲਾਏ। ਸੰਗਦੀ ਹੋਈ ਰੀਤੂ ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਥਿਰਕਣ ਲੱਗ ਪਈ। ਉਸਦੀਆਂ ਗੱਲ੍ਹਾਂ ਲਾਲ ਹੋ ਗਈਆਂ ਸਨ, ਖੁਸ਼ੀ ਦਾ ਸਮੁੰਦਰ ਸ਼ੋਰ ਮਚਾਉਂਦਾ ਹੋਇਆ ਉਸਦੇ ਦਿਲ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਲੋਕ ਤਾੜੀਆਂ ਮਾਰਨ ਲੱਗ ਪਏ ਅਤੇ ਰੰਜਨ ਤਾਂ ਜਿਵੇਂ ਉਤਸ਼ਾਹ ਅਤੇ ਊਰਜਾ ਦਾ ਹਿਮਾਲਿਆ ਪਰਬਤ ਬਣ ਗਏ ਸੀ ਅਤੇ  ਮੁਸਕਰਾਹਟ ਕੰਚਨਜੰਗਾ

               ਫੇਰ ਵੀ ਪੁੱਤਰ!

               ਅਜੇ ਵੀ ਉਹ ਲੋਕ ਕੀ ਕਹਿਣਗੇ ਦਾ ਫਿਕਰ? ਕੀ ਕਹਿਣਗੇ ਉਹ? ਇਹੀ ਨਾ, ਜੋ ਉਹ ਹੁਣ ਤੱਕ ਕਹਿੰਦੇ ਆਏ ਨੋਨਹੀਂ, ਨਹੀਂ! ਸੁਣੋ ਨੌਟੀ ਮੰਮਾ, ਲੋਕ ਤਾਂ ਜ਼ਰੂਰ ਕੁਝ ਕਹਿਣਗੇ, ਪਰ ਇਸ ਵਾਰ ਲੋਕ ਕਹਿਣਗੇ - ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਦਾ ਪਾਪਾ ਆਇਆ ਹੈ।

               ਅੱਪੂ  ਫੇਰ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਬਣ ਗਿਆ - ਮੈਨੂੰ ਮੇਰੇ ਪਾਪਾ ਦਾ ਸਵਾਗਤ ਕਰਨ ਦਿਓਗੇ, ਮੋਟੋ?’

               ਅਦਾਲਤ ਵਿੱਚ ਦਸਤਖ਼ਤ ਕਰਣ ਵੇਲੇ ਅੱਪੂ ਦੇ ਚਿਹਰੇ ਤੇ ਖੁਸ਼ੀ ਸੀ। ਉਸਨੇ ਰੀਤੂ ਦੇ ਹੱਥਾਂ ਵਿੱਚ ਮਾਲਾ ਫੜਾਈਰੀਤੂ ਦੇ ਹੱਥ ਕੰਬਣ ਲੱਗੇ।  ਅੱਪੂ ਨੇ ਕਿਹਾ, ‘ਮੋਟੋ ਪਾ ਦਿਉਮੇਰੇ ਵਿਆਹ ਤੇ ਇਸ ਤੋਂ ਵੀ ਸੋਹਣੀ ਮਾਲਾ ਲੈ ਕੇ ਆਓਣਾ, ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਮੈਂ ਪਹਿਲਾਂ ਨਾਲੋਂ ਵੀ ਮੋਟੇ ਬੁੱਲ੍ਹਾਂ ਵਾਲਾ ਕਾਰਟੂਨ ਬਣਾਵਾਂਗਾ।

               ਅਦਾਲਤ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਆਉਂਦੇ ਸਮੇਂ,  ਅੱਪੂ ਨੇ ਰੰਜਨ ਨੂੰ ਵਧਾਈ ਦਿੰਦੇ ਹੋਇਆਂ  ਕਿਹਾ, ‘ਕੈਨ ਆਈ ਕੌਲ ਯੂ ਪਾਪਾ?’

               ਵ੍ਹਾਈ ਨੌਟ?  ਯੂ ਆਰ ਮਾਈ ਸਨ! ਰੰਜਨ ਨੇ ਆਰ ਤੇ ਜਿਆਦਾ ਜ਼ੋਰ ਪਾਉਂਦੇ ਹੋਏ ਕਿਹਾ ਅਤੇ  ਅੱਪੂ ਦੇ ਮੋਢੇ ਥਾਪੜੇ

               ਅਦਾਲਤ ਦੇ ਬਾਹਰ ਇੱਕ ਨਵੀਂ ਗੱਡੀ ਖੜੀ ਸੀ।  ਅੱਪੂ ਨੇ ਹੌਲੀ ਜਿਹੀ ਰੀਤੂ ਨੂੰ ਕਿਹਾ, ‘ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਵੱਲੋਂ। ਉਸਨੂੰ ਇੱਕ ਚੰਗਾ ਪਾਪਾ ਦੇਣ ਲਈ। ਸੁਣੋ ਮੋਟੋ, ਗੱਡੀ ਨੂੰ ਪੈਟ੍ਰੋਲ ਪਿਆਉਣਾ, ਦਾਲ ਨਹੀਂ, ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਇਸਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਤੁਹਾਡੀ ਦਾਲ ਨਹੀਂ ਗਲੇਗੀ ਇਸ ਨਾਲ

               ਪਾਪਾ ਤਾਂ ਤੂੰ ਏਂ ਮੇਰਾਮੇਰਾ ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਡੈਡੀ!’ ਰੀਤੂ ਡੁਸਕ ਪਈ। ਅੱਪੂ ਨੇ ਉਸਨੂੰ ਇੰਝ ਜੱਫੀ ਪਾਈ ਜਿਵੇਂ ਕੋਈ ਪਿਉ ਆਪਣੀ ਧੀ ਨੂੰ ਵਿਦਾ ਕਰਣ ਵੇਲੇ ਜੱਫੀ ਪਾਉਂਦਾ ਹੈ। ਉਸਦੀਆਂ ਵੀ ਅੱਖਾਂ ਸਿਲ੍ਹ ਗਈਆਂ ਸੀ

               ਗੱਡੀ ਚਲੀ ਗਈ ਸੀ, ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਉੱਥੇ ਹੀ ਖੜ੍ਹਾ ਰਹਿ ਗਿਆ ਸੀਸਿਲ੍ਹੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਅਤੇ ਬੁੱਲ੍ਹਾਂ ਤੇ ਮੁਸਕੜੀ ਨਾਲ ਗੱਪੂ, ਅੱਪੂ, ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਸਾਰੇ ਇੱਕ-ਮਿੱਕ ਹੋ ਰਹੇ ਸਨ। ਸਿਰਫ਼ ਨਚੀਕੇਤਾ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਭੁੱਲ ਗਏ ਇਹ ਨਾਂ, ਜੋ ਉਸਦੇ ਡੈਡੀ ਨੇ ਉਸਨੂੰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ? ਸ਼ਿਨਚੈਨ ਨੇ ਇਸ ਨਾਂ ਨੂੰ ਸਿਰਫ਼ ਸਰਟੀਫਿਕੇਟ ਲਈ ਰੱਖ ਛੱਡਿਆ ਸੀ। ਉਸਨੇ ਡੂੰਘਾ ਸਾਹ ਲਿਆ। ਨਾਂ ਬਦਲਣ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਸਮਾਂ ਲੱਗੇਗਾ। ਉਂਝ ਵੀ ਨਾਂ ਵਿੱਚ ਕੀ ਰੱਖਿਆ ਹੈ! ਨਚੀਕੇਤਾ ਦੇ ਸਵਾਲਾਂ ਦੇ ਤਸੱਲੀਬਖਸ਼ ਜਵਾਬ ਕੀ ਉਸਦੇ ਪਿਤਾ ਬਾਜਸ਼੍ਰਵਾ ਨੇ ਦਿੱਤੇ ਸੀ?

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                                                          ਲੇਖਕ ਪਰਿਚੈ

                                                         ਵਿਭਾ ਰਾਣੀ

1959 ਵਿਚ ਜਨਮ। ਮੁੰਬਈ ਚ ਰਿਹਾਈਸ਼

ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਰਚਨਾਵਾਂ -  ਹਿੰਦੀ ਅਤੇ ਮੈਥਿਲੀ ਦੋਵਾਂ ਭਾਸ਼ਾਵਾਂ ਵਿੱਚ ਕਹਾਣੀ ਸੰਗ੍ਰਹਿ, ਨਾਟਕ, ਲੋਕ ਸਾਹਿਤ, ਵਿਅਂਗ ਸਮੇਤ ਹਰ ਵਿਧਾ ਸਮੇਤ 22 ਕਿਤਾਬਾਂ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ।

ਸਾਹਿਤ, ਨਾਟਕਾਂ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਸਿਨੇਮਾ ਅਤੇ ਦੂਰਦਰਸ਼ਨ ਤੇ ਵੀ ਕਿਰਿਆਸ਼ੀਲ। ਲਾਲ ਕਪਤਾਨ, ਲਾਲ ਪਰੀ, ਮਾਨਸੂਨ ਫੁਟਬਾਲ, ਅਨਵਾਂਟੇਡ ਸਮੇਤ ਕਈ ਫਿਲਮਾਂ ਵਿੱਚ ਕੰਮ ਕੀਤਾ

ਸਨਮਾਣ ਅਤੇ ਪੁਰਸਕਾਰਘਨਸ਼ਿਆਮਦਾਸ ਸਰ੍ਰਾਫ਼ ਸਾਹਿਤ ਸਨਮਾਨ, ਮੋਹਨ ਰਾਕੇਸ਼ ਸਨਮਾਨ, ਨੇਮਿਚੰਦਰ ਜੈਨ ਸਨਮਾਨ ਸਹਿਤ ਅਨੇਕ ਸਨਮਾਨ ਨਾਲ ਸਨਮਾਨਿਤ।   

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                            ਧੰਨਵਾਦ ਸਹਿਤ - ਰਾਗ, ਜਨਵਰੀ - ਜੂਨ, 2026       


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