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गुरुवार, मई 23, 2024

कहानी श्रृंखला - 52

 

पंजाबी कहानी          फूलों की फ़सल

 

                  0 सुखपाल सिंह थिंद

               - अनुवाद – नीलम शर्मा अंशु

दिल्ली एयरपोर्ट के डिपारचर लांउज में महकदीप ने अलविदा कहने के लिए अपना दायां हाथ हिलाया। तेज़ी से घूम रहे हाथ से यूं लगा मानो उसे भीतर जाने की बहुत जल्दी हो। अगले ही पल वह तेज़ी से मुड़ा। कुछ पलों के लिए उसकी पीठ नज़र आती रही परंतु जल्दी ही इधर-उधर आ-जा रहे यात्रियों की भीड़ में खो गई। हॉल के बाहर खड़े जरनैल और जसमीत के हाथ नीचे को यूं लुढ़क गए मानो किसी दैत्य ने उनके प्राण छीन लिए हों।  दोनों को ऐसा लगा मानो दानव कद शीशों वाला दैत्य उनके पुत्र को निगल गया हो। मन ढुलमुल न करने के किए गए वादे का पक्का बाँध पल भर में ही ढेर हो गया। जसमीत सुबकने लगी। जरनैल को भी भीतर ही भीतर कुछ पिघलता सा महसूस हुआ। अचानक आए इस बहाव में बह जाने से बचने के लिए उसने मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया। चारों आँखें फिर से शीशों के भीतर से कुछ तलाशने लगीं परंतु भीतर तो अब सिर्फ़ अजनबी लोगों के चेहरे थे। जसमीत ने गहरी आह भरी –

हमारा बेटा भी हो गया परदेसी !... हाय ओ रब्बा !  क्यों जाने दिया हमने... !”

जरनैल ने जसमीत को कंधे को हौले से सहलाया। जरनैल के सीने से लगते ही वह फिऱ से फूट-फूट कर रो पड़ी। जरनैल को अपने इर्द-गिर्द सब कुछ धुंधला-धुंधला सा प्रतीत हुआ। बोझिल कदमों से वे कार में आ बैठे। ड्राइवर ने ऐक्सीलेटर दबाया और गाड़ी जालंधर की ओर फर्राटे भरने लगी। गुम-सुम और शोकाकुल सी बैठी जसमीत से आँखें मिलाना भी जरनैल को कठिन लग रहा था। बाहर दूर टकटकी लगाए वह कुछ ढूँढ रही थी। कार के भीतर गहरी ख़ामोशी फैल गई।  जल्दी ही इस ख़ामोशी ने जरनैल को डसना शुरू कर दिया। इन दंशों से बचने के लिए उसने ठंडी सी साँस लेकर जसमीत से कहा –

ख़ैर! एक अच्छी बात हो गई। अपना भी कैनेडा वाला रास्ता खुल गया!”

जब जाएंगे तब देखा जाएगा। एक बार तो बिलकुल ज़मीन पर पटक गया है न हमें। जसमीत ने फिर से आह भरी।

बहुतों से तो अच्छे ही हैं। विदेश जाने के लिए मरे फिरते हैं बेचारे। अपनी तो न हींग लगी न फिटकरी। जरनैल ने धैर्य बंधाना चाहा।

आपकी न लगी होगी.... मेरी तो अंतड़ियां घसीट कर ले गया। जैसे वह गया, भला ऐसे भी जाता है कोई ?”

जसमीत ने भेदने वाली तीखी निगाहों से जरनैल की आँखों में देखा। माहौल भाँप कर जरनैल चुप हो गया। कुछ देर बाद जसमीत ने खुद से ही गिले-शिकवे के अंदाज़ में सर हिला कर कहा –

तिल-तिल कर बड़ा किया। कौन सा चाव मैंने नहीं किया!  इतना बड़ा फैसला और इतना पर्दा। किसी से कुछ पूछने कि ज़रूरत ही नहीं समझी !”

जिस ख़ामोशी को ख़त्म करने के लिए जरनैल ने बात शुरू की थी वह पहले से भी ज़्य़ादा गहरी हो गई। जसमीत ने सीट की पुश्त को पीछे की तरफ धकेला और शरीर को ढीला छोड़ लेट गई। ज़हनी और जिस्मानी थकावट के कारण वह जल्दी ही ऊँघने लगी। दूसरी तरफ नींद जरनैल से कोसों दूर थी। महकदीप के पर्दे वाली जसमीत द्वारा कही बात उसके भीतर हथौड़े के भाँति चलने लगी। हथौड़ा कुछ मध्यम पड़ा तो वह महकदीप के साथ अपने रिश्ते को भीतर ही भीतर तौलने लगा।  मासूम सा महकदीप उसे कितना प्यार करता था। पढ़ाई की ज़्यादातर बातें मम्मी से शेयर करता था परंतु बाहर के कामों और ख़ासकर बर्थडे मनाने के समय उसी के इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहता था। कितना शौक था उसे अपने जन्मदिन का। चीज़ों की लंबी लिस्ट उसके हाथों में थमा बार-बार ताकीदें करता। बिलकुल उसी तरह जैसे कभी कॉलेज के लिए जाते समय शहर में करने वाले कामों के बारे में उसका बाप करता था। उसके मन की कोरी स्लेट पर दो अक्षर ही तो सबसे गहरे उकरे थे, मॉम और डैड। मम्मी डैडी को महकदीप से भी पहले उसके दिल की बात पता चल जाती थी। वैसे भी उसने कभी कोई बात उनसे छुपा कर नहीं रखी थी। जसमीत के मुताबिक तो वह उसका भोला-भाला महक था।

उस ने तो वह बात भी नहीं छुपाई थी जिसे उस उम्र का बच्चा अक्सर छुपा लिया करता है। छठी कक्षा में पढ़ाई के दौरान उस दिन कितना डिस्टर्ब होकर स्कूल से घर आया था। अपनी मम्मी को पहेलियां सी बुझाता रहा। शाम को जरनैल सिंह घर आया तो लगा जैसे वह उन्हीं की इंतज़ार कर रहा हो।  गेट पर ही दौड़ कर जा मिला उनसे और मिलते ही टाँगों से लिपट गया। लॉबी में बैठते ही उसने कस कर जफ्फी डाली और रोने लगा। कुछ देर बहलाने और लाड करने के बाद वह छाती में सर घुसा कर बताने लगा - 

मैं जब ब्रेक में बाथरूम गया न.... बड़े भईया ने न..... मेरी पैंट पुल की

फिर वह सीधे खड़े होकर अपने दोनों गालों पर उंगलियां मार – मार कर बताने लगा –      उस ने न, उस ने न, मेरी चीक्स पे काटा.....।

सुनते ही जरनैल सिंह के भीतर मानो बारूद फट पड़ा हो। आग के गोले की भाँति एक गाली लॉबी की छत फाड़ कर बाहर निकली। मुट्ठियाँ भिंच गईं। गुस्से में ही प्रिंसीपल की उसी वक्त फोन पर क्लास ले ली। उसने कुछ हुमकी-तुमकी करने की कोशिश की तो जरनैल ने पुलिस केस करने की बात कह दी। इलाके में अपने सहपाठी डी. एस. पी. बराड़ की धौंस दिखाई तो वह वहीं दुबक गई। रात पता नहीं कैसे गुज़री। सुबह स्कूल खुलते ही प्रिंसीपल के कमरे में मजमा लग गया। लड़के के माता-पिता बार-बार माफ़ी माँगे जा रहे थे। जरनैल एक ही बात पर अड़ा रहा कि वह लड़के को पूरे स्कूल के सामने थप्पड़ लगाएगा। अंतत: बहुत देर की नोंक-झोंक के बाद फैसला हुआ कि लड़के का पिता सबके सामने पाँच थप्पड़ लगाएगा। लड़के को पड़ रहे हर एक थप्पड़ के साथ महकदीप के खिल रहे चेहरे को देख जरनैल सिंह को कुछ राहत महसूस हुई। परंतु फिर भी उस का गुस्सा शांत नहीं हुआ था। कमरे से बाहर निकलते समय उसके माथे पर त्योरी फिर से तन गई –

अगर फिर लड़के की तरफ देखा न, तो जहां से निकले हो, वहीं धकेल दूंगा....!”

लड़के के पिता के साथ बस नाखून भर का फासला ही रह गया था। छोड़िए प्रोफेसर साहब छोड़िए, थूक दीजिए अब गुस्सा जैसी आवाज़ों वाले स्टाफ से घिरा वह महकदीप को उस दिन अपने साथ स्कूल से वापिस ले आया। जल्दी ही सब कुछ पटरी पर आ गया और महकदीप की स्लेट वाला डैड पहले से भी गहरा हो गया। परंतु दसवीं तक पहुँचते-पहुँचते ये रंग कब हल्के होने शुरू हो गए किसी को कुछ पता ही नहीं चला।

हर पीढ़ी में शायद ऐसा ही होता हो। नई पीढ़ी के सपनों को कौन पकड़ पाया है? जरनैल के साथ भी यह सब ऐसे ही घटा था। उसके माता-पिता को कौन सा उसके बदलते रंगों के बारे में पता चला था। दसवीं की परीक्षा देते ही उसके भीतर कैसे नए रंग चढ़ने शुरू हो गए थे। कई बार तो ये उसे भीतर ठुड्डे मारते प्रतीत हो रहे थे। उसका मन उछल-उछल पड़ता। कहीं दूर से उसे अपने सपनों की कस्तूरी की महक आती। यह महक धीरे-धीरे उसके गाँव की सीमा लाँघ आई। छोटा सा गाँव उसे और भी छोटा प्रतीत होने लगा। ऐसे जैसे सब कुछ अँधेरे में डूबा हो। दूरदर्शन पर गाँवों की तारीफों वाले गीत सुन कर कभी-कभी उसका सीना गर्व से तन  जाता।  छोटे-छोटे घुंघराले बालों वाले एक एंकर ने किसी गीत से पहले एक दिन जब शायरी स्टाइल में गाँवों में रब जी बसता है कहा था तो घर में खूब हँसी छिड़ी थी। घर के सदस्य इसके बाद एक-दूसरे के लिए रब जी हो गए थे। बापू कई बार माता को छेड़ता –

खाना वाना तो तैयार है न रब जी!” 

रब जी वाली को पड़ जाए न वट्टों पर चलना, अक्ल ठिकाने आ जाएगी। माता बात घुमा देती।

बापू माता की नोंक-झोंक जरनैल और बड़ी बहन रणजीत के लिए मनोरंजन मसाला बनी रहती। एक दिन उन्हें दूसरे कमरे में टी. वी. के साथ व्यस्त देख बापू ने माता को छेड़ा –

वैसे एक बात है, ढंग की सभी चीजें शहर में ही हैं!”

बापू ने मसखरी से माँ की बाईं गाल पर हल्का टहोका सा मारा।

अचानक जरनैल को भीतर आया देख माता का मुँह शर्म से टमाटर जैसा लाल हो गया।  फटाफट उसे आलिंगन में लेते हुए बोली - मेरा जैला जवान हो चला है। इसे हम कोई शहर वाली ही ढूँढ कर देंगें।

माँ ने जरनैल को काफी दिनों बाद आलिंगन में लेकर सीने से लगाया था। उसकी गालों और होठों पर हल्के-हल्के रोएं उभर आए थे। उसे माँ के आलिंगन में सिमटना आज कुछ अच्छा नहीं लगा। बाँहों की कसावट छुड़ाने के लिए ज़ोर मारा और बाहर की तरफ भाग गया।

अब वह सचमुच ही यहाँ से भाग जाना चाहता था। गाँव वाले स्कूली दोस्तों के साथ उसका मेल-जोल पहले से भी कम हो गया। इकलौता लाडला पुत्र होने के कारण माँ ने भी उसे कभी अपने से बहुत दूर नहीं किया था।  बहुत जतन से पाला था। खाता-पीता घर था। जब उसके यार दोस्तों को एक जोड़ी कपड़े के जूते बड़ी मुश्किल से मिलते थे, उसके पास स्कूल जाने के लिए खाकी और सफेद रंग के कपड़े के जूतों के अलावा बाहर जाने के लिए बाटा के चमचमाते जूतों का अलग जोड़ा था। छोटे से परिवार की पूरी गृहस्थी को बीस एकड़ के इकलौते वारिस वाले जादुई नशे की खुमारी ने सराबोर कर रखा था। इसी नशे की खुमारी में एक दिन बापू ने ऐलान कर दिया-

जैले की आगे की पढ़ाई जालंधर के किसी अच्छे कॉलेज से करवाएंगे। होस्टल में रहेगा, बड़ा अफ़सर बनेगा। यहाँ गाँव में भला कैसी ज़िंदगी ?

ऐसे तो बेटा बिलकुल दूर हो जाएगा। घर में तो पहले ही रौनक नहीं है। माँ ने चिंता जताई।

जवान बेटे को सारी ज़िंदगी भर सीने से लगा कर थोड़े ही रखा जाएगा। बड़ा अफ़सर बनाना है तो शहर तो भेजना ही पड़ेगा।    

कुछ देर बाद उन्होंने खुद ही अपनी बात की हामी भरी – शहर कौन सा दूर है। हफ्ते बाद आ जाया करेगा। बीच-बीच में फोन कर लिया करेगा। 

बापू के तर्क से माँ ख़ामोश हो गई परंतु उसकी आँखों में छलकता समंदर कुछ और ही कहता प्रतीत हो रहा था।

जरनैल कुछ पलों के लिए इस समंदर की लहरों में गोते लगाता रहा। परंतु उसके दूसरे किनारे पर पहुँच कर कब हवा के साथ मज़ाक करने लगा, यह उसे खुद भी पता नहीं चला था। जैसे-जैसे समय गुज़रता जा रहा था वह अपने मतवाले सपनों का पीछा करते हुए आगे ही आगे चलता जा रहा था और गाँव कहीं पीछे छूट गया। गाँव गया तो माँ की हर बार एक ही शिकायत होती –  

बेटा, मानती हूँ पढ़ाई का दबाव है, परंतु कम से कम घर पर फोन तो कर लिया करो। यह कंबख्त तुम्हारे लिए ही लगाया है। परछत्ती पर पड़े नए फोन के सेट की तरफ इशारा कर माँ अक्सर शिकायत करती।

वह हूँ हाँ कह देता परंतु कॉलेज आकर उसे गाँव भूल जाता। यहाँ का खुमार ही ऐसा था। कितनी मस्त ज़िंदगी थी यहाँ। और काम भी क्या था? सिर्फ़ पढ़ना और साथियों के साथ मौज-मस्ती। आस-पास मंडराती युवतियां किसी सुंदर फुलवारी सी प्रतीत होतीं।  वह भंवरे की भाँति

कभी किसी को तो कभी किसी को सूंघने की चाहत संजोए रहता।  उसकी यह चाहत बी. ए. तक तो अधूरी ही रही परंतु एम. ए. में प्रवेश लेते ही उसे अपनी मंज़िल मिल गई। सहपाठी रजनी झट ही तो उसके जीवन की सुबह और शाम बन गई थी। नोटस् के आदान-प्रदान के दौरान ही कहीं दिलों का भी आदान-प्रदान हो गया था। वैसे उनकी पढ़ाई में पूरी प्रतिद्वंविता चलती। खाली पीरियड में लाइब्रेरी में जा बैठते। लाइब्रेरी से ख़ास लगाव के राज़ की बात कुछ और थी। इसके दूर कोने वाले सेल्फों के पीछे जरनैल ने एक दिन रजनी को बाँहें फैलाकर पुकारा था और वह चुंबक की भाँति उसकी तरफ खिंची चली आई थी। अलग हुए तो दोनों पसीने से सराबोर और चेहरे तप कर लाल हो गए थे।

अब उन्हें दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह लाइब्रेरी का यही कोना लगता। परंतु यह कोना अचानक जरनैल के दिल की भाँति सूना और उदास हो गया। दस दिनों से रजनी की सूरत नहीं दिखी थी। फिर एक ख़बर कॉलेज में जंगल की आग की तरह फैल गई।  रजनी के बड़े भाई को दिन-दहाड़े शरेआम गाँव के चौंक में गोलियों से भून दिया गया था। वह उड़ कर रजनी के गाँव पहुँच जाना चाहता था। उसके हर दु:ख में शामिल होना चाहता था परंतु ऐसा कर न सका। दिल में मंडराते असंख्य सोच-विचार ने उसकी टाँगों को मानो ज़ंजीर बाँध दी हो।  रजनी को अचानक कॉलेज में देखा तो दौड़ कर उसके  पास जा पहुँचा। मिलते ही बोल उठा -

बहुत बुरा हुआ रजनी।

खामोश बुत बनी रजनी से उसने बात आगे बढ़ानी चाही।

उग्रवादियों को इस तरह निर्दोषों को नहीं मारना चाहिए।

ये आतंकवादी तुम्हें उग्रवादी दिखते हैं ? रजनी बम की भाँति फट पड़ी।

जरनैल को लगा मानो बम की आग ने उसकी पगड़ी और दाढ़ी को भी दग्ध कर दिया हो। ये उग्रवादी और आतंकवादी के अंतर की उलझन ने उनके दिलों में बहुत बड़े फासले वाली दीवार खड़ी कर दी। उस दिन के बाद फिर रजनी कॉलेज नहीं आई थी। वह इस तरह उसके जीवन से निकल जाएगी यह तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था। वह तो मन ही मन उसके साथ भविष्य के रंगीन रास्तों पर चल पड़ा था। कुछ दिनों बाद उड़ती-उड़ती ख़बर मिली कि उनका पूरा शरीका ही गाँव छोड़ कर पानीपत की तरफ कहीं चला गया है। हिंदुओं की हिज़रत वाली अख़बारी सुर्खियों ने दिनों में कॉलेज की खुली फिज़ाओं में अजीबो-गरीब चहारदीवारें खड़ी कर दीं। ये चहारदीवारें वैसे सिर्फ़ कॉलेज ही क्यों बल्कि सारे पंजाब में ही खड़ी हो गईं थीं।  सारी ज़िंदगी ही मानों थम गई हो।

तेज़ ब्रेक लगने से कार अचानक रुक गई। जरनैल अपने आप में लौटा। हरियाणवी पुलिस वाले ने कार के बोनट पर डंडा मार कर गाड़ी साइड वाली सड़क की तरफ घुमाने का हुक्म दिया। सामने हाईवे पर धरना प्रदर्शन हो रहा था। कुछ हाथों में ‘जाट आंदोलन’ वाली तख्तियां थीं परंतु भारी भीड़ के हाथों में लाठियां थीं। ख़ौफ़नाक सा दृश्य था। सारा मंज़र देख कर जरनैल ने हवा में सर मारा –

“जाट भी अब आरक्षण मांगने लगे.....!”

“अंकल जी, आरक्षण न माँगें तो और क्या करें ?....  मेरी भाँति इंजीनियरिंग करके टैक्सियां चलाएं ?”

ड्राइवर द्वारा अचानक कहे गए शब्दों से जरनैल को करंट सा लगा। नींद से जगने की भाँति उसके मुँह से सिर्फ़ अच्छा….’ शब्द ही निकल सका। कार दो-तीन गाँवों से घूमती हुई फिर से हाईवे पर आ गई। सामने पानीपत का बोर्ड चमका। बोर्ड के चमकते ही जरनैल को अपने भीतर खलबली सी महसूस हुई। कंधे सिकोड़ ठंडी आह भरते हुए उसने खुद से ही कहा –

“मजबूरियां मार देती है आदमी को। पता ही नहीं लगता कहाँ-कहाँ का दाना-पानी खिला देती हैं !”

अपने भीतर गहरे उतरे जरनैल के सोच-विचार की सुई तेज़ी से टिक-टिक करने लगी। कई विचार जुड़ने और उलझने लगे – “हर किसी को कहाँ खुश कर पाना संभव होता है। इन्सान की कई मजबूरियां होती हैं...।” इसी उलझन में उलझी उसके विचारों की डोर आगे अपने बापू से जा जुड़ी। उसके भीतर से आवाज़ आई कि वह कौन सा अपने बापू को खुश कर सका था। एम. ए. में मिली यूनिवर्सिटी पोज़ीशन उसे कितना खुश कर पाई थी ? वह तो बल्कि शुरू से ही पंजाबी एम. ए. में उसके प्रवेश लेने के ही विरुद्ध था। उसके अपने तर्क थे – कि एम. ए. ही करना है तो कम से कम अंग्रेज़ी की ही की जाए। गाँव जाने पर जब भी पढ़ाई की बात चलती तो भी वह यही बात कहता। हर बार सारी बात घुमा-फिरा कर इसी नुक्ते की तरफ मोड़ लेता –

“जैले, ढंग का कुछ कर। कोई अफ़सरी वाली पढ़ाई कर। हम भी किसी को गर्व से कह सकें।....कोई हमारे भी पास आ कर बैठे।

जरनैल अच्छी तरह जानता था कि बापू के लिए अफ़सरी का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ पुलिस अफ़सर से है। परंतु ये अफ़सर तो उसे कभी जंचे नहीं थे। कॉलेज के लड़कों के ‘पुलिस मुकाबले’ में मारे जाने के बाद तो उसे इस विभाग से एक तरह से नफ़रत ही हो गई थी। तिस पर पंजाबी साहित्य की पढ़ाई ने उसके भतर छुपे बैठे ‘विद्रोही’ को भी हवा देनी शुरू कर दी थी। उस तो अब कभी-कभी अपना बापू भी कोई रजवाड़ा पुरुष प्रतीत होने लगता। चूँकि सारा खर्चा-पानी इसी रजवाड़े पुरुष के सहारे ही चलता था, इसलिए चुप रहता। बापू को खुश करने के लिए वह एक-दो बार बेदिली से प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बैठा। परंतु यह सब दिखावे के लिए था। उसे पता था कि उसकी वास्तविक मंज़िल तो साहित्य का प्रोफेसर बनना ही है।  इस मंज़िल की नींव तक पक्की हो गई जब वह एम. फिल करके उसी कॉलेज के उसी विभाग में तैनात हुआ जहाँ अभी दो साल पहले वह खुद पढ़ता रहा था। बापू ने इस बात की खुशी तो मनाई परंतु बुझे दिल से। शहर में प्लॉट ले देने के लिए जब ज़ोर डाला तो उसका भीतरी गुबार होठों पर आ गया –

“नकारे विभाग में रह कर आदमी और कर भी क्या सकता है ?  ज़िंदगी भर ऐसे ही हाथ फैलाते रहना।”

इस मुसीबत में माँ जरनैल के पक्ष में खड़ी हुई – “सब कुछ इसी का तो है! हम कौन सा सीने पर रख कर ले जाएंगे ? कर दो जैसे बेटा कहता है।”

फिर बापू वैसे ही करता गया जैसे जरनैल माँ की मार्फत कहता गया। पंजाब के बिगड़े हुए हालातों में दनदनाते आतंक के दैत्य ने पहले ही गाँवों के मुँह शहरों की तरफ मोड़ रखे थे। बापू तो पहले ही शहर में प्लॉट खरीदने की योजना बनाए बैठा था। हालात का ज़ोर ही कुछ ऐसा था कि वह अपना सपना भूल जरनैल के सपने में खो गया। इस सपने के ताने-बाने बुनते ही जसमीत जरनैल के पतंग की डोर बन गई। जालंधर में पली बढ़ी जसमीत का गाँव वैसे तो जरनैल के गाँव से लगभग दसेक मील के फ़ासले पर था परंतु पिता की नौकरी के कारण वे बहुत पहले यहाँ आ बसे थे। जसमीत की खूबसूरती और बैंक की पक्की नौकरी ने अधिक कुछ सोचने का मौक़ा ही नहीं दिया था। सहमे-सहमे समय में भी पूरे बाजे-गाजे के साथ सारा कार्य संपन्न हुआ था। शादी के दो साल बाद कोठी की नींव रखते हुए बापू ने कहा था –

“लो बेटा आज से तो तुम पक्के शहरवाले बन गए। गाड़ दीं तुम्हारी जड़ें यहाँ !”

“रब की कृपा बनी रहे। जैले की वंश बेल भी इस बार हरी हो जाए ! बस, दाता की मेहर बनी रहे।”

जसमीत की हरी भरी कोख की तरफ देख माँ के दोनों हाथ शुक्राने में खुद-ब-खुद जुड़ गए। बापू तथा अन्य मेहमानों से झेंपते हुए जसमीत ने फटाफट दुपट्टे से अपनी कोख को ढकने की कोशिश की।

माँ की अरदासों अनुसार रब की रहमतों की बौछार लगातार होती रही।  दोनों प्राणियों की जालंधर जैसे शहर में पक्की नौकरी। दु:ख – तकलीफ में पहाड़ की भाँति ढाल बन जाने वाले माता-पिता। जब महकदीप का जन्म हुआ तो सब को लगा मानो उसकी खुशबू से आस-पास सब कुछ महक उठा हो। कोठी का गृह प्रवेश और महकदीप का पहला जन्मदिन एक साथ ही आए। चारों तरफ खुशियों की बौछार। गृह प्रवेश पर आई जसमीत की कलीग ने शुभकामनाएं दीं –

माई गॉड! इतनी बड़ी कोठी तो हम जैसों के लिए सपना है।.... यू आर वेरी लकी जसमीत....बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से आप लोगों ने जीवन शुरू किया है!”

ऐसे कंपलीमेंटस् की मीठी-मीठी फुहार से खुली-डुली कोठी की चौगिर्दी और भी चौड़ी-चौड़ी और भरी-भरी लगने लगी।

शुरू-शुरू में तो जरनैल का हफ्ते या दस दिनों में गाँव का चक्कर लगता रहा परंतु जब से कोठी बनी थी धीरे-धीरे यह बात महीने-दो महीने पर चली गई। पिछले कुछ समय से तो यह चक्कर तभी लगता जब घर में किसी बड़ी चीज़ लाने की योजना बनती। मारुति से ज़ेन कार की सवारी करने से पहले भी कई चक्कर लगे थे। बापू अब जरनैल की चाल दूर से ही पहचान जाता। जरनैल को माँ से लाड लडाते देख मुँह पर भी कहने से गुरेज़ न करता –

ये शहर वाले बड़े मतलबी होते हैं। देखना कहीं ऐसे ही न फंस जाना!”

बात ख़त्म कर वह ज़ोर-ज़ोर से हँसता परंतु ऐसा लगता मानो उसकी हँसी के पीछे कोई गहन उदासी छुपी हुई हो। माँ और बापू अब सचमुच ही गाँव में उदास-उदास और अकेलापन महसूस करने लगे थे। ज़मीन तो पहले ही ठेके पर दे रखी थी। रणजीत अपने घर पर खुशहाल थी। गाँव का खुला-डुला घर उन्हें काट खाने को आता। वे आगे की सोचने लगे। इसी सोच-विचार में एक दिन वे जालंधर आ पहुँचे। बापू ने सबको सुनाकर बातों-बातों में ही अपना तीर चला दिया –

बेटा जैले, कोठी तो बहुत सुंदर बन गई है रब की कृपा से, डबल स्टोरी। अब यह बताओ भई, हम बुड्ढों के लिए कौन सा कमरा रखा है?”

जरनैल का जवाब अभी भीतर कहीं करवटें ले रहा था कि रसोई में नाश्ता तैयार कर रही जसमीत बोल उठी – पिता जी, पूरा घर आपका ही है। जहाँ मर्ज़ी रहें।

जसमीत के जवाब से दोनों के सर पर चढ़ा चिंता का बोझ पलक झपकते ही छू-मंतर हो गया। माँ को अपनी बहू पर बहुत प्यार आया। उसने उठकर बहुत स्नेह से उसका माथा सहलाया।

- तुम्हारा बापू ऐसे ही शहरिये-शहरिये करता रहता है। सब एक जैसे थोड़ा ही होते हैं। हमारी बहू तो बेटे से भी बढ़कर है! ”

माँ पाँव फैला कर नए लिए सोफ़े पर आराम से बैठ गई। बापू उठ कर डाइनिंग टेबल पर जा बैठा। बन रहे पराँठों की खुशबू ने दोनों की भूख और बढ़ा दी। माँ ने अपना नाश्ता वहीं मंगवा लिया।

माँ बापू को अपने नेक बहू-बेटे पर रश्क आता। उनका मन लगना शुरू हो गया। शहर इशारे कर करके बुलाने लगा। ऊपर की मंज़िल पर दिए कमरे से फैलते-फैलते उनकी गृहस्थी धीरे-धीरे पूरे घर में ही पसर गई। परंतु इस फैल रही गृहस्थी में घर के बाकी प्राणी अचानक सिकुड़ने लगे। जसमीत, जरनैल को एक दिन अपनी बाँहों में भर कर बोली –

माँ जी, ऐसे ही रोज़-रोज़ पड़ोसियों के यहाँ जाती रहती हैं। यहाँ ऐसे कोई किसी के घर आता-जाता है? घर के सौ राज़ होते हैं।

ऐसी बातें फिर हर रोज़ बेडरूम के किसी न किसी कोने में घात लगा कर बैठी रहने लगीं। कहीं माँ जी के ब्रश करते वक्त घृणा उत्पन्न करने वाली खखारने की आवाज़ और कहीं बापू जी के गंदी जूतियों सहित ताज़ा साफ़ किए फर्श को गंदा कर देने की व्यथा। धीरे-धीरे सारा बेडरूम ही ऐसी गाथाओं से भर गया। दिन-ब-दिन तंग होती जा रही स्पेस में जरनैल का भी धीरे-धीरे दम घुटने लगा। और तो और घर की नौकरानी भी बढ़े काम और देसी स्टाइल वाली रोक-टोक से तंग आकर काम छोड़ने का अलटीमेटम देने लगी तो पानी सर से गुज़रता महसूस हुआ। जरनैल को उपाय नहीं सूझ रहा था। वैसे घर के किसी भी सदस्य को समझ नहीं आ रहा

था कि खुशहाल घर में तनाव का पहरा किसने बिठा दिया था। खुली कोठी के सारे कोनों में हँसी-ठहाकों की बजाय ख़ामोशी की पदचाप सुनाई देने लगी। यह शायद माँ को सबसे पहले सुनाई दी। एक शाम जब सभी बैठे टी. वी. देख रहे थे तो उसने बात शुरू की –

बहुत दिन हो गए, गाँव का चक्कर नहीं लगा। घर तो बसने वालों के साथ ही होते हैं। बंद पड़ा तो वह ढह जाएगा।

बात करते उसका गला भर्रा गया। फिर दोनों गाँव वाले घर को ढहने से बचाने के लिए गाँव चल दिए। पता नहीं माता शहर से कौन सा बोझ लेकर गाँव लौटी थी कि वह नित्य इसके बोझ तले दबती चली गई। ऐसे ही एक दिन रसोई में काम करते हुए वहीं लुढ़क गई। गाँव में हर कोई यही कह रहा था –

घोड़े जैसी थी अभी तो नसीब कौर। दाता ने सब कुछ दिया बस साँसें बख्शने में कोताही कर गया।

सब रस्में निपटा कर जरनैल जब वापसी के लिए तैयार हुआ तो इतने में गुम-सुम फिरता बापू फिर सुबक उठा –

अभागिन, बेकार ही बोझ सा ले गई दिल पर....।

अब तक थम चुका जरनैल फिर फूट-फूट कर रो पड़ा बापू के कंधे से लग कर। संभला तो महकदीप को अपनी टाँगों से लिपटे पाया। थोड़ा-थोड़ा समझने वाली उम्र के पहले पायदान पर चढ़ रहे महकदीप को देखते ही वह अपने-आप में लौटा। कार उसके चलने का ही इंतज़ार कर रही थी।

ज़िंदगी फिर से अपनी रफ्तार से चलने लगी। बल्कि यह कहना बेहतर होगा कि दौड़ने लगी। धीरे-धीरे सभी अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए। इस दौड़ में किसी को यह सोचने का वक्त ही न मिला कि बापू गाँव में कितना एकाकी रह गया था। फोन पर हाल-चाल पूछना और उधर सेठीक हैकी आवाज़ से सभी फर्ज़ पूरे हो गए प्रतीत होते।  छह महीनों बाद कोठी की रेनोवेशन के सिलसिले में जरनैल का गाँव का चक्कर लगा तो प्रतीत हुआ कि बापू जैसे दस साल आगे की तरफ फलांग गया हो। वह तो बिलकुल ही कमज़ोर हो गया था। ऐसे जैसे किसी ने उसके भीतर का चार्जिंग यूनिट चुरा लिया हो। जरनैल को फिक्र हुई तो वह अपने साथ शहर ले आया। परंतु बापू वहाँ रह कर और भी उदास हो गया। थोड़े दिन रह कर, ज़िद करके फिर गाँव लौट गया। गाँव-शहर की खींच-तान में एक दिन अधरंग का दौरा पड़ा। दो दिन टेढ़े हुए चेहरे पर अटक गई आँखों से सब को घूरता रहा। फिर आई. सी. यू. से वह नहीं उसकी देह बाहर आई।

कार के टायर अचानक ज़ोर से लगी ब्रेक के कारण सड़क के साथ घिसट कर रुक गए। जरनैल की सोच-विचार की डोर टूट गई। जसमीत भी हडबड़ा कर उठी। बाहर का दृश्य बहुत भयानक था। सामने रेत वाले टिप्पर और कार की ताज़ा-ताज़ा टक्कर हुई थी। सड़क पर खून के

छींटे दूर-दूर तक फैले हुए थे। कार का तो बिलकुल ही कचूमर निकल गया था। स्टेयरिंग और सीट के बीच फँसी एक लाश बाहर की तरफ झुकी हुई थी। दृश्य इतना दर्दनाक था कि जसमीत ने देखते ही आँखें बंद कर लीं। गहरी ठंडी साँस ली। हाथ अरदास के लिए खुद-ब-खुद जुड़ गए –       मेहर करना दाता !” 

अपने ध्यान में आँखे बंद कर वह पाठ में मग्न हो गई।

मिनट भर रुक कर कार फिर चल पड़ी। जरनैल को भी बाहर के दृश्य ने झिंझोड़ दिया था। अपना मन दूसरी जगह लगाने के लिए उसने अपना निगाहें पाठ कर रही जसमीत की तरफ घुमाईं। घर में चकरी की भाँति घूमती-फिरती जसमीत आँखों के समझ उभर आई। धीरे-धीरे जसमीत का चेहरा सारे घर में ही तो फैल गया था।  उसका वजूद सब तरफ छा गया था। माता और बापू के आगे-पीछे चले जाने के बाद बहुत कुछ खाली-खाली सा हो गया था। इस खालीपन को भरने के लिए वैसे तो दोनों ही जुट गए थे परंतु जसमीत तो बिलकुल मशीन ही बन गई थी। नौकरी के साथ-साथ घर की देख-रेख। हर काम को परफैक्शन से करने का चौबीस घंटों छाया रहने वाला जुनून। अगर कोई कमी रह गई थी तो वह महकदीप की पढ़ाई ने पूरी कर दी थी। होम वर्क की गठरी ले कर लौटे महकदीप के काम को निपटाना प्रति दिन हिमालय पर चढ़ने वाली बात थी। ज़्यादातर जसमीत ही इस कठिन चढ़ाई को पार करती। जरनैल भी कभी-कभार सहायक वाली भूमिका निभाता परंतु वह थोड़ी चढ़ाई के बाद ही हाँफने लगता।  वैसे भी उसे यह सब कुछ अत्याचार वाला काम लगता। कोठी में इस बात पर बहस छिड़ती –

मार डालेगी ये अंग्रेजी!  बिना कुछ समझे, बिलकुल तोता रट्टू, बिलकुल अत्याचार है बच्चों पर।  

आपको बैठे-बिठाए बातें आती हैं। कभी होम वर्क की तरफ झाँक कर भी देखा है.... पंजाबी मीडियम में डाल दें क्या ?” जसमीत बेरुखी से उसकी बात काट देती।

जरनैल को किताबों में पढ़ी और पंजाबी के सेमिनारों में सुनी बातें झूठी प्रतीत होतीं। उसके भीतर कुछ गुत्थमगुत्था होता। हो भी क्यों न ? जो बातें वह खुद सेमिनारों और टी. वी. भेंटवार्ताओं में कहता, वही बातें घर में बिलकुल उलट प्रतीत होतीं।  उसे ऐसा लगता जैसे वह डूब रही कश्ती में सवार हो। इन सबका कोई तोड़ न मिलने पर उसने ऐसे प्रोग्रामों से मुँह मोड़ लिया।

परंतु जसमीत के लक्ष्य बिलकुल स्पष्ट थे। महकदीप के लिए उसने देश की चोटी की आई. आई. टी का मन ही मन चयन कर लिया।  वैसे उसने यह बात अभी किसी से सांझा नहीं की थी।  इस चोटी को फतेह करने के लिए वह महकदीप से भी ज़्यादा जोर-शोर से जुट गई। घर का सारा हिसाब-किताब महकदीप के लक्ष्यों की पूर्ति पर केंद्रित हो गया। जरनैल भी मौक़े के अनुसार हाथ बंटाता परंतु उसके भीतर वह शिद्दत नहीं थी जिसके वशीभूत हो कर जसमीत उड़ी फिरती थी। घर पहुँचे रिपोर्ट कार्डों को देख कर वह महकदीप की बारीकी से क्लास लेती, जरनैल तो उसकी तुलना में नगन्य सा था। दो-चार अंकों का हेर-फेर घर में भूचाल सी स्थिति उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त होता। भूचाल आता तो मजबूत कोठी की दीवारें काँपती प्रतीत होती।  खिड़कियों के शीशों में दरारों की नौबत आ जाती। परंतु जिस दिन किसी प्रतियोगिता में महकदीप कोई ईनाम जीतता या किसी विषय में फुल बटा फुल वाला लंबा सिक्सर मारता उस दिन घर खुशियों के दीयों से जगमगा उठता।

                सभी अपनी जगह सच्चे थे। अंजुरी भर कर दिए पैसों के बदले अगर मनचाही वस्तु न मिले तो इतने खर्च का क्या फ़ायदा ? तिस पर गला काटू प्रतियोगिता का युग। दो-चार अंकों के हेर-फेर से क्लास में पोजीशन कहाँ से कहाँ जा पहुँचती। प्रत्येक मॉम सुपर मॉम और प्रत्येक डैड सुपर डैड बनने की दौड़ में चाहे-अनचाहे शामिल थे। वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह में पोजीशन वाले बच्चों के माता-पिता का जलवा ही अलग होता। दौड़ में पीछे रह जाने वाले अपने विजयी परिचितों को बधाई तो देते परंतु मन में हसरत होती अगली बार लताड़ कर आगे निकल जाने की। महकदीप घर में ऐसी खुशियों और गमों की महक बिखेरते हुए क्रमश: अपनी सीढ़ियां चढ़ता गया। जिस दिन उसने दसवीं में परफेक्ट टेन स्कोर किया, उस दिन घर के सभी कोनों में खुशियों के चिराग़ जल उठे। बहुत दिनों के बाद जसमीत की पुरानी चहक लौटी –

      जैली! महक हमारे सभी सपने पूरे करेगा। आप बस देखते जाईए! आय एम प्राउड ऑफ माई सन!”

      मम्मी के सीने से लगे महकदीप का खिला-खिला चेहरा बिन बोले ही सब कुछ बयां कर गया। प्यार से सराबोर हो जरनैल ने दोनों को कस कर आलिंगन में ले लिया। अख़बार में विजय चिहन् बनाते परिवार की छपी फोटो ने पूरे घर को आच्छादित कर दिया। साँसों से फूटती मदमस्त खुशबू ने सारे घर को महका दिया।

      घर के सभी सदस्यों को मदमस्त हिलोर से सराबोर देख दूसरे दिन ही जसमीत ने फौज़ी जनरल की भाँति हुक्म दिया –

      असली पढ़ाई तो अब शुरू होगी महक। बस, डट जाओ अब दिल लगा कर।

      महकदीप सचमुच ही डट गया। वैसे वह अकेला नहीं डटा था, सारा घर अपने-अपने मोर्चों पर जुट गया था। जंग का बिगुल बज चुका था। हर समय पढ़ाई और ट्यूशनों का दौर। अब घर में कुछ और तो नज़र ही नहीं आता था। केबल कनेक्शन कटवा दिया गया। बाहर घूमने-फिरने पर दो साल की पाबंदी का स्व-घोषित इकरारनामा हो गया था। पंगा सिर्फ़ रिश्तेदारों का था। वे किसी भी वक्त टपक कर उड़ती जा रही बुलेट को ब्रेक लगाने के लिए मजबूर कर सकते थे। रिश्तेदारों को आने से कैसे रोका जाए?  परंतु इस समस्या का भी फॉर्मूला ढूँढ लिया गया – न कहीं जाओ, न कोई आए। राखी बाँधने आई रणजीत ने इस बात का गिला किया –

      वीरे!  मेरा तो मायका अब तुम से ही है। भाभी को लेकर जल्दी-जल्दी मिलने आया करो।

      जवाब में जरनैल ने नहीं नहीं, आएंगे अवश्य कह तो दिया परंतु उसके भीतर से आवाज़ आई, अब जाना कहाँ संभव होगा।

      घरेलू एमरजेंसी जैसे हालात में वह तो अपने दिल की ख्वाहिश को कहीं दिल में ही दबा गया। आर्टस् की पढ़ाई के बारे सलाह दे कर वह जसमीत की नज़रों में हल्का नहीं पड़ना चाहता था। उसे तो पता था कि ऐसा कह कर घर में मज़ाक का पात्र ही बनना था। वह खुद भी महसूस कर रहा था कि वक्त के साथ कदमताल के लिए जसमीत के फैसले ही सही थे। ऐसी विचार-धारा ने ही उसे धीरे-धीरे किताबों से दूर कर, प्लॉटों की खरीद-फ़रोख्त में लगा दिया। साइड बिजनेस मुख्य धंधा बन गया। एक-दो प्लॉटों की सौदेबाजी में हुए मुनाफ़े ने उस के भीतर नई तरंग छेड़ दी। परंतु क्लास में पढ़ाते समय, साहित्य और साहित्यकारों की बातें करते हुए उसे अपने भीतर पहले जैसी शिद्दत न महसूस होती। नौकरी का दूसरा अर्थ तनख्वाह बन कर रह गया। इस तनख्वाह के बोझ तले कहीं-कहीं पुराना जरनैल ज़रूर छटपटाता।

      मॉम-डैड की कुर्बानियों को वैसे महकदीप ने भी व्यर्थ नहीं जाने दिया था। नब्बे प्रतिशत से ऊपर अंक वालों की सूची में उसके चमकते नाम और तस्वीर ने घर में अर्से से रूठी खिलखिलाहट को वापस ला दिया था।  परंतु पता नहीं क्यों जसमीत को वैसी खुशी नहीं हुई जैसी होनी चाहिए थी। -

      अब तो हर कोई, नांइटी पर्सेंट से ऊपर नंबर लिए जाता है।

      जसमीत के शब्दों से महकदीप का खिला चेहरा एकदम मुर्झा गया। घर के पास दबे पाँव आई खुशी बाहर मुंडेर से ही उड़नछू हो गई थी।

                ख़ैर, असली प्रतियोगिता की परीक्षा होनी तो अभी शेष थी। इस परीक्षा का परिणाम आया तो फिर पहले वाली हालत बन गई।  परीक्षा तो क्लीयर हो गई परंतु न तो संस्था और न ही पसंदीदा कंप्यूटर ट्रेड मिला। दो अंकों के कारण सारा खेल उलटा पड़ गया। आई. आई. टी वाला ड्रीम प्रॉजेक्ट न चाहते हुए भी बंद करना पड़ा और निट वाली दूसरी च्वॉयस पर ही गौर फ़रमाना पड़ा। जरनैल ने महकदीप को शाबाश देकर तनावपूर्ण माहौल को सुखद बनाना चाहा –

      बडी, गुड है!  लोकल इंस्टीट्यूट! मनपसंद ट्रेड!”           

      माँ-बेटे का ठंडा रवैया देख जरनैल की चली चाल उसके ही भीतर कहीं फुस्स हो गई। घर में अब बात चलती तो जसमीत अक्सर झुंझला कर बोलती –

      रिजर्वेशन ने बेड़ा गर्क कर दिया इस देश का। क्वालिटी का कोई मोल है?” 

      जसमीत को महकदीप की सभी अड़चनों की वजह सरकार की आरक्षण नीति ही लगती। रही-सही कमी बैंक में अपने कनिष्ठ सहकर्मी के मैनेजर बन जाने से पूरी हो गई। ताज़ा ज़ख्म झट से रिसता नासूर बन गया।

      कोर्स शुरू होने के हफ्ते बाद ही एक शाम घर लौट महकदीप ने हुक्म सा ऐलान कर दिया –

      डैड घर से ट्रैवल करके पढ़ाई का स्ट्रेस मेनटेन करना....ओ माई गॉड.... वेरी डिफीकल्ट... इंपॉसिबल !”

                इस इंपॉसिबल को पॉसिबल करने के लिए बहुत सिफारिशें लगानी पड़ीं। परंतु यह क्या ? जसमीत जरनैल को प्यार से आलिंगन के बाद, गुड नाईट के मीठे स्वर से अपने कमरे में सोने जाने के अभ्यस्त महकदीप को तो कुछ महीनों में ही हॉस्टल ने मोह लिया था। विशेष रूप से खरीद कर दिए गए मोबाइल फोन से खुद कॉल करना तो दूर की बात, जसमीत या जरनैल भी करते तो आगे से कमोवेश ही जवाब मिलता। वह बंद होता या बिजी। कई बार रिंग बजती रहती तो बस बजती ही रहती।  वीकेंड पर मिलने जाने पर जसमीत ने मिलते ही गिला किया –

      महक तेरे बहुत पर निकल आए हैं। अब भला हमें क्यों याद करोगे !”

      मॉम यह बात नहीं है। बस स्ट्रेस ही इतना है कि...... झुंझलाहट सी में उसने सिर हिलाया।

      वापसी में जसमीत ने जरनैल से पूछ बैठी –

      आपने कुछ नोटिस किया महक में कुछ मिसिंग है। चलते समय हग करना भी भूल गया।

      अखरा तो जरनैल को भी था परंतु जसमीत का दिल बहलाने के लिए उसने कहा –

      भूल जाओ अब तुम हग हुग को! हग की पोजीशन बदलने का मौका आ गया।

      बात समाप्त कर जरनैल ठहाका मार हँसा। जरनैल की हँसी में अक्सर रंग भरने वाली जसमीत की हँसी आज पता नहीं किस कोने में छुपी बैठी थी। कैंपस से खुशियां लेने गई वह पहले से भी ज़्यादा उदास हो कर घर लौटी थी।

      डिग्री समाप्त होने से पहले ही महकदीप की प्लेसमेंट एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में हो गई। इस कंपनी से ही उसने इंटर्नशिप की थी। नौकरी के लिए बंगलुरू जाना था। जरनैल तो क़तई इसके पक्ष में न था। वह चाहता था कि महकदीप एम. टेक. करके उसी संस्थान में नौकरी करे जहाँ से उसने डिग्री की थी पर महकदीप भला क्यों किसी की बात सुनता ? उसके अपने तर्क थे –

      डैड! टीचिंग में ग्रोथ कहाँ है ? ओ माय गॉड ! जालंधर ! टोटली सफोकेटिंग!

      अपना पंजाब.....। जरनैल ने कुछ कहना चाहा परंतु महकदीप ने बात पूरी नहीं होने दी।  

पंजाब में जॉब कहाँ है ? ओ डैड! आप भी.....।

      महकदीप के सामने ख़ामोश खड़े जरनैल को ऐसा लगा मानो उसका छात्र बन गया हो।

      महकदीप अब अपनी मर्ज़ी का खुद खुदा था।

      जरनैल जसमीत वक्त की चाल को समझते थे। इस चाल के साथ कदमताल करने के लिए वे खूब तैयारियां करते पर होता ये कि नई चुनौतियों के समक्ष बौने हो जाते। इस बौनेपन

में घर का खालीपन घुल कर घर के कोनों में बैठ गया था। महकदीप के बंगलुरू जा बसने से यह और भी हावी हो गया। जसमीत-जरनैल इसका तोड़ ढूँढने लगे। इस तोड़ की कुछ किरणें उन्हें उस दिन दिखाई दीं जिस दिन महकदीप ने अपनी फेसबुक वॉल पर एक लड़की को माई लव कह कर बर्थडे विश करते देखा। युवती शक्ल से तो पंजाब से बाहर की प्रतीत हुई। जसमीत ने फटाफट व्हॉटस ऐप खोला –

      महक फेकबुक वाली शारदा सक्सेना कौन है ?”    

      ओ ममा! यू स्क्रॉल माई अकांउट् ? ओह न मॉम !   शी..... जस्ट ए फ्रेंड! 

      बात सुन लो महक ! कोई भईया रानी लाकर हमारे माथे मत मढ़ देना। जसमीत में से गंवई जस्सी ने फुफकार मारी।

      यू जस्ट टॉक क्रैप मॉम!”   

      महकदीप ने फोन काटने के साथ तुरंत ही स्विच ऑफ कर दिया। जसमीत के लिए यह असह्य था। वह बार-बार ट्राई करती रही परंतु आगे से स्विच ऑफ की मीठी आवाज़ सर में भारी हथौड़े की भाँति बजती रही।  

       दो साल हो गए हैं महकदीप को बंगलुरू गए हुए। एक साल पहले कंपनी के काम से दिल्ली आया तो एक दिन के लिए जालंधर भी फेरा मार गया था। आया क्या, बस जैसे फ्लाइट में सवार हो आया, वैसे ही जल्दी-जल्दी चलता बना। पिछले छह माह से तो फोन पर बहुत कम बात हुई थी। अगर हुई भी तो रस्मी बात-चीत। हाय-हलो की घेरेबंदी में ही सीमित। जसमीत-जरनैल खुद बंगलुरू जाकर मिलने की योजना बना ही रहे थे कि एक दिन महकदीप का ही फोन आ गया। आज वह पहली बार वीडियो कॉल पर था। इससे पहले कि वह कुछ कहे जसमीत बोली – अरे कुछ खाता-पीता भी है कि काम ही करता रहता है। ये देखो तो सही गाल कैसे पिचके हुए हैं।    

      माँ की बात पर ध्यान दिए बिना ही महकदीप बोला – मॉम! मैं यह जॉब क्विट कर रहा हूँ। आई जसट फीलिंग बोर्ड हेयर।.... ब्लड सक्कर कॉर्पोरेट। 

      महकदीप के नौकरी छोड़ने की बात पर किसी को भला अफ़सोस क्या होना था बल्कि जंग से लौट रहे जरनैल की भाँति उसका इंतज़ार होने लगा। वह सचमुच ही लौट आया था। पर लौट क्या आया था, बस अपने कमरे का ही होकर कर रह गया था। लैपटॉप या मोबाइल ही उसके असली माता-पिता जान पड़ते थे। बिजी और बस बिजी।  कंप्यूटर पर काम करते वक्त किसी का झाँकना उसे पसंद नहीं था। हूँ, हाँ से वह घर में होते हुए भी एक तरह से गैरहाज़िर था। इसी दौरान उसे दिल्ली से केंद्र सरकार के विभाग में इंटरव्यु के लिए बुलावा आया।  पूरे उत्साह से वह दिल्ली गया। लौटा तो थोड़ी देर बाद उसकी चाल में पुरानी चहक नज़र आई। कुछ दिन इस चहक में घर में दीवाली जैसी खुशियां छाई रही। पाँचवे दिन कंप्यूटर पर व्यस्त महकदीप अपने कमरे में बम की भाँति फट पड़ा – टोटली बुल शिट!  ऑल रबिश फक माई कंट्री....।

      आगे के शब्द कमरे की दीवारों से टकरा कर घना शोर बिखेर गए। जसमीत और जरनैल दौड़ कर कमरे में पहुँचे। महकदीप की मुट्ठियां भिंची हुई थीं और चेहरा तप रहा था। यूं लगा मानो वह मुक्का मार कर अगले ही पल लैपटॉप की स्क्रीन की किरचें बिखेर देगा।  जसमीत ने उसके बालों में हाथ फेर कर दुलारा तो वह नन्हें बच्चे की भाँति उसकी गोद में सिर रख फूट-फूट कर रोने लगा। कुछ पलों के लिए जरनैल को भी समझ न आई कि वह क्या करे। फिर वह पास ही बेड पर बैठ, चुपचाप, माँ-बेटे की गंगा-जमुना में देर तक डूबता-उतराता रहा।

      इस नदी को जब भी देखो बस रेत ही पड़ी दिखती है, अंकल जी.... पानी तो पता नहीं कब आता होगा। ड्राइवर के शब्दों ने जरनैल को अतीत से बाहर खींच निकाला। कार मारकंडा नदी के पुल के ऊपर से तेज़ी से गुज़र रही थी। जरनैल का ध्यान नदी में दूर तक पसरी रेत में गड़ गया। कहीं-कहीं हरे सरकंडों की जड़ों के अवशेष अपना अस्तित्व दर्शाते प्रतीत हो रहे थे। वह अपने आप में लौटा –

      बेटा, अगर नदी है न, तो पानी भी ज़रूर आता होगा !    

      अगले ही पल जरनैल कुछ याद आ जाने की भाँति मन ही मन मुस्कुराया। उसकी तंद्रा फिर से महकदीप की ओर लौट गई। ... हमारे हाथों में पला हमें ही उल्लु बना गया।  अगर मैं कुछ नहीं समझ सका तो माँ होकर जसमीत भी कौन सा कुछ समझ सकी थी ? वह तो इसी भुलावे में ही रही कि धीरे-धीरे सब ठीक हो रहा है। उसके मरहम असर दिखा रहे हैं। ऐसे मरहमों का कोई भी मौका वह चूकती भी तो नहीं थी। पहले से भी ज़्यादा ख़ामोशी में उतर गए महकदीप के बालों में हाथ फेरते हुए अक्सर कितने प्यार से बाहर निकालने का प्रयास करती-   बेटा, जनरल के लिए नौकरी कहाँ रखी हैं !  

      फिर वह अन्य द्वार खोलने की कोशिश करती – तुम ऐसे ही दिल छोटा मत किया करो! तुम बताओ, हमें किस चीज़ की कमी है? बेटा ट्राई योर लक इन ट्रेडिंग।

      धीरे-धीरे महकदीप में पुरानी चहक लौटती दिखी तो घर में एक फिर हिलोर सी छा गई। वह जरनैल के साथ हँसने-खेलने लगा। पुराने दोस्तों के संग भी गिटर-पिटर अनलॉक हो गई। कुछ दिनों के बाद उन कामों के सुझाव देने लगा, जिनसे कभी नफ़रत की बात कहा करता था। जरनैल तो उस दिन हैरान हो कर काफ़ी देर तक उसका मुँह देखता रह गया जिस दिन उसने कहा था –

      डैड घर में लॉन रखने का क्या फायदा, अगर फूलों के पेड़-पौधे न लगाए तो !

      महकदीप ने तो इस से पहले कभी ढंग से फूलों की तरफ झाँक कर भी नहीं देखा था। इस द़ृष्टि से वह ज़रा जसमीत जैसा था। बात सुन कर जरनैल सचमुच ही खिल उठा। अगले ही पल बाप-बेटा नर्सरी जा पहुँचे। महकदीप ऩर्सरी के भाँति-भाँति के फूलों का ज़ायज़ा लेने लगा। जरनैल पनीरी (पौधे) उखाड़ते माली को गौर से देखने लगा। कितने प्यार और करीने से उसने थोड़ी सी जगह पर बहार खिला रखी थी। खिलने की कगार पर खड़ी पनीरी को वह कितने प्यार से उखाड़-उखाड़ कर हौले-हौले कागज़ पर रख रहा था माली को पूरी तन्मयता से काम में लगा देख जरनैल के भीतर से हिलोर सी उठी।

      वाह रे इन्सान तेरी किस्मत! पौधे तू तैयार करता है और जब फूल खिलने का मौसम आता है तो उखाड़ कर दूसरों को दे देता है!

      ..... करे भी क्या बेचारा! उखाड़ कर न दे तो फिर गुज़र कैसै हो? इतनी सी जगह में वैसे भी कितने फूल खिल सकते हैं ?”

      घर लाए गए पौधों को माली के साथ मिल कर महकदीप ने पूरे जोश से जरनैल से भी आगे होकर लगाया। पूरी तरह से अपनी योजना के अनुसार। जरनैल को बदला-बदला महकदीप प्यारा-प्यारा सा लगा।

      महकदीप ने फूल क्या लगाए, जरनैल पर तो मानों पागलपन छा गया हो। हर आने-जाने वाले को फूलों की बातें ऐसे सुनाता मानो वे पहली बार यह सब देख रहे हों। और तो और वह गाँव से ठेका देने आए चचेरे भाई नछत्तर के सामने भी यही बातें करता गया। लंबी-चौड़ी पुष्प-गाथा से ऊब कर नछत्तर ने कहा –

      प्रोफेसर साहब! गाँव में हमने भी दो एकड़ में फूलों की फसल उगाई है। कभी चक्कर लगाएं !    

      परंतु जरनैल तो कहीं और ही मंडरा रहा था –

      शौक से लगाए फूलों और बिक्री के लिए लगाए फूलों में अंतर होता है।

      कहा तो जरनैल ने नछत्तर से था परंतु उसे लगा मानो वह खुद से ही बात कर रहा हो।     बात सुन कर नछत्तर चुप सा हो गया। जरनैल ने ही ख़ामोशी तोड़ी –

      और सुनाओं गाँव का हाल-चाल?”

      अगली पीढ़ी खेती नहीं करने वाली, ऐसा लगता है। यह बस हम तक ही है। सभी बाहर जाना चहते हैं। गाँव खाली हो गया है। लड़के तो लड़के, लड़कियां उनसे भी जल्दबाजी में हैं।     नछत्तर की बातें सुन कर पता नहीं क्यों जरनैल को अपने भीतर कुछ उखड़ता-उखड़ता सा महसूस हुआ।

      वैसे घर में अब सब ठीक-ठाक था। इधर जरनैल अपने फूल खिला रहा था और उधर जसमीत अपनी योजना में जुट गई। बिना किसी को बताए सभी अख़बारों में मैट्रीमोनियल दे आई।

      हर तरफ से भरपूर रिसपाँस मिला। कुछ एक रिश्ते उसने टिक कर लिए। बस अब यह सीक्रेट सबके साथ सांझा होना बाकी था। वह भीतर ही भीतर एक नशे की हिलोर में घर में उड़ी फिरती। परंतु एक पीले से लिफ़ाफे ने उसे अचानक धरती पर पटक मारा। लिफ़ाफ़े को कॉफ़ी टेबल पर पटकते हुए महकदीप ने किसी विजेता की भाँति दाहिना हाथ हवा में लहराया -

      मॉम! डैड! कैनेडीयन एंबेसी अप्रूव्ड माई पी. आर. ऐप्लीकेशन!

      क्या या...... ?”  जसमीत के मुँह से यही निकला और ड्रॉइंगरूम में एक गहरी ख़ामोशी पसर गई। ख़ामोशी असह्य हो गई और जरनैल ने हैरानी में आँखें फैलाकर बात आगे बढ़ाई –

      इतना बड़ा फैसला और इतना बड़ा सीक्रेट !

      शाबाश बेटा! अब तू इतना बड़ा हो गया है!  इतने बड़े-बड़े फैसले करो और हमसे पूछने तक की भी ज़रूरत न समझो ?” जसमीत चीखने की भाँति बोली।

      महकदीप तेज़ी से उठ कर अपने कमरे में चला गया। धड़ाम से बंद हुए दरवाज़े ने घर में भूचाल ला दिया। दोनों की मिन्नतों के बाद कमरा तो आधे घंटे में खुल गया परंत यह आधा घंटा दोनों के लिए आधी सदी सूली पर टंगने समान गुज़रा।

      कुछ दिनों के बाद उखड़ी ज़िंदगी फिर से ढर्रे पर आने लगी। जरनैल ने खुद घर की ख़ामोश उदासी की गहरी परत में छेद करने के लिए तरकीबें भिड़ानी शुरू कर दीं। कैनेडा के कैलगरी में रह रहे अपने एम. फिल. के समय के शायर दोस्त देवेंद्र दीवाना से फेसबुक पर राबता क़ायम किया। महकदीप भी तो वहीं जाने वाला था। पिता होने के नाते बेटे के रहने की ठौर की चिंता ने सताया। दीवाना से वहां के सिस्टम के बारे में जानकारी लेने के लिए बात चलाई तो लगा जैसे वह जरनैल का ही लंबे समय से इंतज़ार कर रहा हो। उस ने कैनेडा में पच्चीस सालों में कमाई बुद्धिमता की पोटली खोलनी शुरू की -

      सरमायेदारी तो हर जगह आदमी को चट्ट कर जाने के लिए मुँह फाड़े खड़ी है। आपके वाली ने मुझे धक्के देकर वहाँ से निकाला और इधर वाली ने ऐसा जाल बुना कि होश तब आया जब जवानी बीत गई।

      फिर क्या निर्णय लिया जाए?” जरनैल को अभी भी बात का सूत्र नहीं मिला था।

      बच्चों का अपना जीवन है, अपने सपने। जिस बात में उनकी खुशी, उसी में हमारी।

      कुछ देर बाद उसने फिर कहा – बाकी दोस्त, धरती वही, जहाँ भर पेट भोजन मिले और रूह का परिंदा चहचहाए। दीवाना के भीतर का शायर सुलग उठा।

      दीवाना से बातें करके जरनैल को ऐसा लगा मानों उलझे धागों के कुछ सिरे उसकी मुट्ठी में आ गए हों। ऐसे सिरों को पकड़ते हुए एक रात वह जसमीत के सामने खड़ा था। बी. पी. की गोली जसमीत को पकड़ाते हुए उसके हाथ को अपने दोनों हाथों में कस लिया –

      जस्सी हमें महक की खुशी में ही खुश होना चाहिए!

      पता नहीं यह जरनैल की बातों का जादू था या जसमीत भी ऐसा ही सोचती थी। फिर सब तैयारियों में वह जरनैल से भी आगे हो गई। एक-एक चीज़ उसने अपने हाथों से बैग में टिकाई। अंतिम बैग का जिपर बंद करते समय महकदीप ने अचानक स्टॉप मॉम कर कर रोक दिया। दीवार पर लगी अपनी ताज़ा फोटो को फुर्ती से उसने उतार कर मॉम की तरफ बढ़ाया। जसमीत चीख कर बोली –

      ऊँठ समान हो गए हो, अक्ल अभी धेले भर की भी नहीं आई ?”   

      फोटो को सीने से लगाते हुए, दुपट्टे से साफ़ करने लगी।

      देर रात जरनैल की आँख खुली तो जसमीत को महकदीप की फोटो को गोदी में रखे झिलमिल झील बने देखा। जरनैल ने फोटो को परे रखते हुए उसे आलिंगन में ले लिया। सीने से सर लगाए वह फिर फफक उठी -  

      भला महक को हमारी फोटो चूज करनी चाहिए थी न ?”

      जरनैल का दिल रुआँसा सा हो आया। दूसरे ही पल संभलते हुए उसने कहा – हमें महक को खुशी-खुशी सी-ऑफ करना है... प्रॉमिस.. !  

कुछ अंतराल के बाद सीने पर सर की धीमी सी हरकत हुई।

धूल उड़ाती जाती कार की ज़ोरदार ब्रेक लगी। जरनैल ने ज़बरदस्त झटका महसूस किया। उसकी तंद्रा बिखर गई। जसमीत का सिर अगली सीट से टकराते-टकराते बचा। दोनों ने घबरा कर आस-पास देखा। कार के सामने हाईवे पर अचानक आवारा घूमती गाय पता नहीं कहाँ से आ गई थी। ड्राइवर ने हवा में गाली दागी। माथे पर त्योरियाँ पड़ गईं। जरनैल के लिए यह सब आश्चर्यचकित कर देने वाला था कि कुछ ही मिनटों में वह फिर से पहले की भाँति ही गाड़ी चलाने लगा। कार जल्दी ही राजपुरा के ईगल मोटल में जा रुकी। दोनों खाने से अधिक घर पहुँचने के इच्छुक थे। जालंधर के पी. ए. पी. चौक की लाइटें देखते ही जसमीत ने सब कुछ समेटना शुरू कर दिया। वापसी के लिए कार को घुमाते समय ड्राइवर ने कहा –

बधाई हो अंकल जी, आंटी जी! ..... मैंने दो बार ट्राई किया.... किस्मत वालों के ही बनते हैं कैनेडा के काम।

दोनों ने ड्राइवर की तरफ देखा। भीतर प्रवेश करते ही जसमीत सीधे बेडरूम में गई। महकदीप के पलंग की पुश्त पर रखी तस्वीर को उठाया और दीवार पर बिलकुल सामने टाँग दिया। फ्रेश हो कर लॉबी में चाय पीने लगे तो दोनों काफ़ी देर तक ख़ामोश एक-दूसरे को इस प्रकार तकते रहे मानों खो गए महकदीप को एक-दूसरे की आँखों में तलाश रहे हों। कुछ ढूँढने की भाँति महकदीप के कमरे में आ गए स्टडी टेबल के ऊपर किताबों के रैक में लगाए पोस्टर ने दोनों का ध्यान खींच लिया – सक्सेस डजनट कम टू यू, यू गो टू इट... शब्द चमकने लगे। जसमीत ने खुद ही तो यह पोस्टर महकदीप की ग्यारहवीं कक्षा के शुरू होते इसे यहाँ चिपकाया था।

दुबारा लॉबी में आ कर बैठ गए। शादी की बीसवीं वर्षगाँठ के अवसर पर महकदीप की तरफ से विशेष रूप से तैयार करवाई गई फोटो के नीचे अंकित लव यू मॉम, लव यू डैड!” पर दोनों की निगाहें अटक गईं। निकट ही मधुमक्खियों के छत्ते वाली कलाकृति टंगी थी। छत्ते पर मोटे अक्षरों में अंकित होम सवीट होम की तरफ देखते ही दोनों के चेहरों पर हल्की मुस्कान उभर आई।

ताज़ा दम होने के लिए बाहर लॉन में आ कर बैठ गए। आम के पौधे पर हुई हलचल ने दोनों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। चिड़िया दाना चुग कर घोंसले में लौटी थी। उसके बच्चों की चहचहाचट से इर्द-गिर्द का माहौल खुशनुमा हो उठा था। जसमीत एकदम कुर्सी से उठ कर क्यारी के पास जा पहुँची। फूलों को गौर से देखते हुए गहरी साँस भर कर बोली – ये देखिए हमारे महक के फूल! पानी की किसी को फिक्र ही नहीं रहती। कैसे मुर्झा से गए हैं सारे!

फुर्ती से उसने पास पड़े पाइप को खींचा और पानी की फुहार बना कर डालने लगी। जरनैल चुप-चाप मुड़े-तुड़े पाइप को करीने से सीधा करने में जुट गया।

 

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                                                             लेखक परिचय

                        

                                                            

                              सुखपाल सिंह थिंद

 

देश-विदेश की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित पंजाबी के चिर-परिचित लेखक। प्रोफेसर - पंजाबी सरकारी कॉलेज,कपूरथला (पंजाब)। कथाकार, आलोचक और यात्रा वृतांत लेखन। लंडन नूं मिलदियां (2003) और कैनेडा इक बाग बहुरंगी (2005) नामक दो यात्रा वृतांत प्रकाशित। आलोचना की तीन पुस्तकें प्रकाशित। स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित।

प्रस्तुत कहानी फूलों की फसल वर्ष 2018 में प्रकाशित पंजाबी की प्रतिनिधि कहानियों में शामिल।


                                                                                              साभार - निकट पत्रिका, मई-जुलाई 2024

                   

                                                                                                                                                                       

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