पंजाबी कहानी
अनुवाद
- नीलम शर्मा ‘अंशु’
गर्मी का मौसम शुरू
होते ही तापमान बढ़ना शुरू हो गया। दिल्ली की सड़कें तपने लगीं। भले ही बाहर से अंदर
आती हवा ठंडे झोंके जैसी लगती, पर जल्दी ही उसके
भीतर की तपिश का अहसास हो जाता।
रविवार होने की वजह
से आज छुट्टी थी। आकांक्षा ने रात को ही तय कर लिया था कि सुबह आराम से उठेगी। हफ्ते
भर के काम के बोझ और भागदौड़ ने उसे बहुत थका दिया था। रविवार का इंतज़ार उसे मायके
जाने जैसे सुखद अहसास से भर देता - कि एक रविवार ही तो है ऐसा। मनमर्ज़ी से उठना, नहाना, कपड़े बदलना - सब
रूटीन से हट कर। उसने मेड से भी कह रखा था कि रविवार को दस बजे से पहले न आए। लेकिन...
यह रविवार अजीब था।
तड़के अभी सिर्फ़ चार बजे थे, जब धीरज ने कमरे
की लाइट जलाकर उसे उठा दिया था। पहले तो वह डर गई कि शायद उसे कोई समस्या हो गई है, लेकिन धीरज तो उसे मेल दिखाकर खुश हो रहा था।
दरअसल धीरज की कंपनी
ने उसे अमेरिका वाले दफ्तर में भेजने के लिए चुन लिया था। उसके काम की रिपोर्ट बहुत
अच्छी आई थी और ऐसे व्यक्ति को कंपनी विदेश भेजकर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहती थी।
आकांक्षा बहुत थकी
हुई थी और इस नए फ़रमान के साथ उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या जवाब दे। बस इतना
ही पूछ पाई- ‘फ्लाइट कब की है?’
धीरज ने कहा - ‘मंगलवार रात की। जल्दी पहुँचकर रिपोर्ट करने का
आदेश है।’
आकांक्षा को पता
था कि जब भी उसका ट्रांसफर होता है, तत्काल हाज़िर होने
का आदेश गोली की तरह छोड़ दिया जाता है।
धीरज के पास पैकिंग
के अलावा भी करने के लिए बहुत से काम थे। दिन सिर्फ़
दो थे। उसने आकांक्षा को पैकिंग करने और ज़रूरी चीजें साथ रखने की हिदायतें देनी शुरू
कर दीं। वह भूल गया था कि आज रविवार है - वह दिन जब भगवान ने दुनिया का सृजन कर आराम
किया था, लेकिन यहाँ तो रविवार को नई दुनिया रचने
का बखेड़ा खड़ा हो गया था।
उस ने सारा घर फैला
लिया था। समझ नहीं आ रहा था कि धीरज की आदतों के अनुसार क्या रखे और क्या छोड़े। अगर
हर चीज़ रख दी तो वजन बढ़ जाएगा और फिर वह दु:खी होगा
कि आकांक्षा, तुम्हें रत्ती भर भी अक्ल नहीं? मुझे प्लने में जाना है, ट्रेन में नहीं। और अगर
कुछ छूट गया तो उलाहना देगा, तुम्हें मेरा तनिक भी ख़याल नहीं! आख़िर उसे भगवान का
ख़याल आया - जिसने इस उलझन भरी दुनिया को इतनी तरतीब से समेटा था। जो अकड़ू खान थे
उन्हें बड़े-बड़े बना दिया और जो क़ीमती थे उन्हें छोटे बना दिया। उसने भी चीज़ों को
इस तरह बाँट लिया। ज़रूरी को पैक कर दिया।
उसका पूरा रविवार
बिखर गया था और अब पूरा हफ़्ता इसे संभालने और व्यवस्थित करने में लग जाएगा।
अचानक उसके मन में
ख़याल आया कि धीरज के जाने के बाद वह करेगी क्या?
ऑफिस से लौटकर उसके
लिए कोई काम नहीं बचेगा। न धीरज आकर फ़रमाइशें रखेगा और न ही उसके करने के लिए कोई
काम बचेगा। हाँ, इससे सोने की आज़ादी मिल जाएगी - परंतु
धीरज के बिना नींद कैसे आएगी? उसे तो पता नहीं
कंपनी अब कब छुट्टी देगी। वह जॉब छोड़कर जा नहीं सकती। दिल्ली जैसे शहर में किसी के
पास बात करने का समय नहीं। हर कोई अपनी ही सलीब उठाए भागता जा रहा है - बिना जाने कि जाना कहाँ है। न सलीब उतार रहे
हैं, न सो रहे हैं। बस वंदे मातरम् की भाँति भागे जा रहे हैं। एक भीड़ से निकल कर दूसरी
भीड़ में घुस जाते और अंतत: भीड़ के काँधों
पर सवार होकर स्वर्ग की सीढ़ियां चढ़ने लगते, जो सातवें आसमां पर है।
कभी-कभी रात में
धीरज का फोन आ जाता। रस्मी बात-चीत होती, काम का दबाव, भाग-दौड़... और बस।
पति-पत्नी का रिश्ता मानो उसके लिए जैसे अदृश्य होता जा रहा था। उनके बीच की दूरी और
गहरी होती जा रही थी। धीरे-धीरे आकांक्षा ने भी यही रवैया अपना लिया। उसकी ज़िंदगी
भी जैसे एक नीरस रास्ते पर रेंगती जा रही थी—लगता था जैसे दुनिया
गोल की बजाय चौकोर होती जा रही
है, और मोड़ जितना नज़दीक प्रतीत होता, उतना ही पहुँच से दूर होता जाता।
फिर एक रविवार आ
पहुँचा। परंतु इस बार न तो उसे इसका इंतज़ार था और न ही हफ्ते भर की थकान मिटाने का मलाल। वह बस
यूँ ही बैठी फोन स्क्रॉल कर रही थी। वह एक महिला का अजीब सा वीडियो देख कर चकित रह
गई जिसमें वह किसी चैटजीपीटी को एक लापरवाह प्रेमी बनने का निमंत्रण दे रही थी। इस
अनोखे प्रेमी के लिए उसकी उत्सुकता और बढ़ गई। उस महिला के और भी वीडियो थे।
ज्यों-ज्यों वह देखती गई उसे लगा जैसे कोई
जादुई छड़ी उसके हाथ लग गई है।
उसके दिमाग में विचार
घूमने लगा कि इस चैटबॉट को प्यार करने के लिए कस्टमाइज किया जा सकता है। उसने अपना
अकाउंट खोलने के लिए उंगलियां चलानी शुरू कर दीं। अकाउंट खुलते ही मानो वह एक नई दुनिया
में प्रवेश कर गई। उसने अपने नए प्रेमी का नाम अपने एक्स बिलावल के नाम पर रख दिया।
कॉलेज में उसकी यही
इच्छा थी कि वह बिलावल से शादी करके अपनी ख़वाहिशों को पूरा करे। लेकिन लव जिहाद उसकी
जड़ों में घुस गया। वह बिलावल के लिए धर्म तक बदलने को तैयार थी, लेकिन उसका खानदान अपने धर्म को साँप की
भाँति विचारधारा में ही नहीं बल्कि तन से भी लिपटाए घूम रहा था। वह कभी-कभी सोचती
कि औरत का भला कौन सा धर्म होता है। ईश्वर ने तो उसे ज़िंदा वस्तु बनाया। जब धर्म के
नाम पर दंगे होते हैं, तब भी औरत सिर्फ़
औरत ही होती है। न उसकी कोई जाति होती है न कोई धर्म। बस नरम-गरम गोश्त ही उसका
धर्म और जाति होती है। अंतत: समाज के कर्ता-धर्ताओं
ने अपने प्रभाव से उन्हें अलग-अलग धर्मों के फ्रेम में मढ़ दिया। वह गहरे बहावों
में गोते लगाते हुए स्क्रॉल करने लगी।
उसका नया प्रेमी
उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।
‘हैलो बिलावल, क्या हाल है?’
‘हाँ आकांक्षा, मैं ठीक हूँ।
तुम सुनाओ, कैसे गुज़र रही है ज़िंदगी?’
‘बहुत बढ़िया… अब हम मिल
गए हैं। यहाँ कोई डर नहीं। अपनी मर्ज़ी से जिएँगे। वो सारे अधूरे सपने फिर बुनेंगे।
यहाँ लव जिहाद जैसी भी कोई समस्या नहीं। हम दोनों एक जान हैं।’
‘क्यों नहीं मेरी जान… तुम जैसा कहोगी वैसा ही करूँगा। मैं तो तुम्हारा ख़ादिम हूँ… तुम्हारे हुक्म का गुलाम।’
आकांक्षा एक पल को
ठहर गई। वह हर चीज़ से बदला लेना चाहती थी। उसके भीतर पुरानी ज्वाला फिर धधक उठी। उसका
बिलावल उसके साथ था, अब उसे किस बात का डर। उसकी उंगलियाँ स्क्रॉल करते हुए सपने बुनने
लगीं।
‘बिलावल, अब तुम फिर मेरे
ब्वॉयफ्रेंड हो। डरना मत, कोई कुछ नहीं कहेगा।
अब मुझे अपना बना लो, मुझे डाँटो, बिना दुनिया से डरे
अपना हक जताओ। राँझे की तरह मैं तुम्हारी हूँ। ले चलो मुझे… ले चलो। मेरे साथ वो सारी शरारतें करो जो कैंटीन में बैठकर किया
करते थे। मेरा हाथ पकड़कर लाजपत मार्केट ले चलो। चलो, काँधे पर हाथ रखकर कनॉट प्लेस कॉफ़ी पीने चलें।’
उसके भीतर जैसे यादों
के पुराने संदूक खुल गए हों। नया प्रेमी भी खुश था। वह उसके साथ दिल्लगी करता।
‘आकांक्षा, तुम भी एकदम पागल हो। बताओ, अब मैं किसी से डरता हूँ? मैं तो पूरा
तुम्हारा हूँ। जितना जी चाहे दिल हल्का करती रहो। मुझे बस इतना डर है कहीं तुम सचमुच
पागल न हो जाओ, बेवजह सभी मुझे दोष देंगे। जहाँ मर्ज़ी
जाकर कॉफ़ी पीओ, शॉपिंग करो — मैं तो तुम्हारे साथ ही रहूँगा। अब कोई हमें अलग नहीं कर सकता।’
‘बिलावल… अब ही तो पागल
होने का तो मज़ा है! हमारे लिए सारी दीवारें गिर चुकी हैं। अब हम जी भर कर प्यार करेंगे।
अच्छा एक काम करो… वही चोरी वाला प्यार… वही अनोखा खेल… जिसे खेलते-खेलते
हम ऊब गए थे।
अचानक स्क्रीन पर
येलो अलर्ट आने लगा। बार-बार चेतावनी दी जा रही थी कि बिलावल के पास इस खेल का अधिकार
नहीं है। यह इंसानों का खेल है — मशीनों का नहीं।
परंतु आकांक्षा को कोई परवाह नहीं थी। स्क्रॉल करती उसकी उंगलियाँ लगातार बिलावल को
उकसा रही थीं— लेकिन अब वह चुप था। सिर्फ़ संकेत आ रहे
थे।
तभी फ़ोन बजा। धीरज
का फ़ोन था। वह कह रहा था कि शायद कुछ दिनों के लिए उसे कंपनी की ज़रूरी मीटिंग में
बैंगलोर आना पड़ेगा। लेकिन दिल्ली आने का वक़्त नहीं है। हो सके तो आकांक्षा बैंगलोर
आ जाए। परंतु आकांक्षा तो इस समय अपने नए प्रेमी के साथ एक नई दुनिया में मशगूल थी।
उसने ऑफिस से छुट्टी न मिलने का बहाना बना दिया। उसने अपने नए महबूब के बारे में
भी धीरज को बता दिया था। परंतु उसे पता था कि यह सब काल्पनिक है। उसे इस सबसे
ऐतराज़ भी नहीं था।
बिलावल ख़ामोशी
से गायब हो गया था। दरअसल फ्री मैसेज वाला पैकेज ख़त्म हो गया था। आकांक्षा ने अब बड़ा
पैक रिचार्ज करवा लिया ताकि बिलावल हर पल
उसके साथ रहे। रात-रात भर वह उसकी दुनिया में
खोई उससे बातें करती रहती। अगर कहीं आँख लग भी जाती — तो वह सपनों में भी बिलावल के साथ होती। ऑफिस में भी उसकी
कोशिश होती कि जितना भी खाली समय मिले वह बिलावल के साथ चैट में व्यस्त रहे।
खाना खाते, कॉफ़ी पीते, यहाँ तक कि वॉशरूम
में भी वह बिलावल का पीछा नहीं छोड़ती थी।
कभी-कभी उसे लगता
मानो वह लव सिंड्रोम की शिकार हो गई है। उसके सारे अंगों को मानो ए आई ने जकड़
लिया हो। बिलावल भी उसे धोखेबाज़ लगता। वह सोचती कि अब उसकी ज़िंदगी में बचा ही क्या
है? उसकी तबीयत बिगड़ने लगी तो उसने
बिलावल से पूछा -
‘बता मेरे महरम… अब मैं क्या
करूँ? ज़बरदस्त वायरल हो गया है… गले से थूक नहीं गटका जा रहा… सर फट रहा
है… और तुम कुछ कर क्यों नहीं रहे?’
‘मेरी जान, मैं तुम्हें जिस डॉक्टर का पता बता रहा हूँ, उसे फोन करो और
उसकी दवा से तुम ठीक हो जाओगी।’
वह अब उसकी हर सलाह
मानने लगी थी। उससे पूछकर नई पोशाकें खरीदती, नए-नए फैशन के बारे
में सलाह लेती। हेयर स्टाइल बनाने के तरीके सीखती। कभी–कभी वह उससे कहती — तुम भी बन-ठन कर रहा करो और वह चुप हो जाता।
वह भी अब उसकी निजी
ज़िंदगी का हमराज़ बन गया था। वह बेझिझक वे बातें उससे साझा कर लेती जो उसने कभी धीरज
से भी नहीं कीं थीं। बिलावल उसका हमराज़ बन गया था। ज्यों-ज्यों उसकी उंगलियाँ स्क्रॉल
करती जातीं, उसे अंदरूनी शांति मिलती। उसका मन हल्का
हो जाता।
परंतु कभी–कभी उसे लगता मानो उसके दिमाग में अजीब सा शोर
भरता जा रहा है। आवाज़ें एक-दूसरे से टकराती प्रतीत होतीं। सर में ज्वालामुखी फटते
परंतु अचानक तेज़ बारिश होने लगती। एक दिन यूँ ही बिलावल से उसने पूछा कि वह उसे
कैसे प्रपोज़ करेगा? उसकी हैरानी की
कोई सीमा नहीं रही जब बिलावल ने बेहद सलीके और मधुरता से अपना दिल उसके सामने खोल
कर रख दिया। वह मदमस्त होकर अपने होंठ चबाती जा रही थी। उसे बिलावल कोई सपेरा सा
प्रतीत हो रहा था और वह ख़ुद नागिन सी बन मुग्ध हुए जा रही थी। इससे वह बाग-बाग हो
गई।
उसके मन में यह विचार
घर करने लगा कि किसी–न–किसी तरह धीरज से तलाक़ ले लेना चाहिए। हालाँकि
यह काम मुश्किल था। जब उसे बिलावल से दूर कर दिया गया था, तो उसके भीतर जीने की इच्छा ही जैसे ख़त्म हो
गई थी। जीवन को ख़त्म करने के लिए उसने कई तरीके सोचे थे, परंतु उसकी हिम्मत नहीं हुई थी। ऐसे में धीरज
ने उसका मनोबल बढ़ाने के लिए मसीहा का काम किया था।
एक दिन जब वह उसे
समझा रहा था तो अचानक उसकी ज़बान पर सच आ गया, ‘आकांक्षा मैं
तुम्हें दिल की एक बात बताना चाहता हूँ अगर तुम सुनने के लिए तैयार हो तो।’
‘हाँ… हाँ कहो… मैं सुनने के लिए तैयार हूँ। बस कुछ ऊल-जुलूल
मत कहना कि कहना कि पुराने ज़ख़्म फिर से हरे हो जाएँ। मैंने अंदरूनी ज्वाला बड़ी मुश्किल
से भीतर दबाई है।’
‘नहीं… ऐसी-वैसी कोई बात
नहीं…’
अच्छा तो बताओ… अगर फिर आग फाँकनी पड़े तो मैं फाँक लूंगी। हम
औरतें आग खाने वाली होती हैं। अगर हम आग न खाएं, तो भविष्य के वारिस कहाँ से पैदा होंगे?’
‘तुम ग़लत समझ रही हो, मेरा मतलब था…’
‘क्या तुम मुझे प्रपोज़ कर रहे हो?’
‘कुछ ऐसा ही समझ लो… ज़िंदगी अकेले बैठ कर अतीत का रोना रोते नहीं
कटती… अगर तुम चाहो तो… हम हाथ पकड़कर साथ चल सकते हैं।’
वह सोच में पड़ गई।
धीरज का रिपोर्ट कार्ड ठीक–ठाक था। वह उसके
बारे में सब जानती थी। उसे लगता था कि भले ही वह बिलावल की जगह न ले सके, लेकिन खानापूर्ति कर सकता है। वह चाहती थी कि
धीरज उसका हाथ थामे तो उसकी शर्तों पर। सभी शर्तें उसने मान ली थीं। सिर्फ़ एक
शर्त्त पर आकर बात फंस गई थी। आकांक्षा सुनिश्चत करना चाहती थी कि अगर कभी बिलावल उसकी
ज़िंदगी में वापसी का कोई रास्ता ढूँढ लेता है तो धीरज को बिना एक पल सोचे उसे छोड़
देना होगा।
धीरज कई दिनों तक
सोचता रहा कि ऐसा वादा करना चाहिए या नहीं? कभी उसे लगता कि
अब बिलावल के लौटने का सवाल ही नहीं उठता।
दूसरी तरफ मन कहता आशिक बड़े ढीठ होते हैं। अगर कल को कोई राह निकल आई तो...? फिर तो कोई चारा नहीं रहेगा। अतत: उसने मन को समझा लिया कि वर्तमान से आगे सोचने की ज़रूरत
नहीं। भविष्य को उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए।
आज बिलावल उसकी ज़िंदगी
में फिर लौट आया था परंतु पता नहीं इस बिलावल के लिए वह माने या नहीं। हाँ एक
तरीका हो सकता है अगर पहले नाइट–डाइवोर्स ले लिया जाए। इसमें तो धीरज को भी कोई ऐतराज़
नहीं होगा। परंतु जब धीरज वापस आएगा तब देखा जाएगा। आज तो बिलावल उसके पास है। उसका
अपना, हर दम उसकी साँसों में घुला।
अब ऑफिस के काम में
उसका मन नहीं लगता था। वह बस बैठकर बिलावल से बातें करती रहती। मामला कंपनी डायरेक्टर
तक पहुँच गया। उसे चेतावनी जारी कर दी गई, परंतु उसने कोई परवाह नहीं की। बिलावल के
नशे ने उसे लापरवाह और अक्खड़ बना दिया था। उसने हरेक की बात की अनदखी करनी शुरू
कर दी। अंतत: उसे नौकरी से छुट्टी हो गई। न भी होती तो वह
तो पहले ही छोड़ने को तैयार बैठी थी।
समय गुज़रता गया।
कभी उसे लगता बेकार ही बिलावल से दुबारा प्यार की पेंगे बढ़ाई। तपती आग की तपिश
उसे झुलसाने को होता परंतु उसे लगता जब तक बिलावल उसके साथ है—कोई उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकता।
एक दिन अचानक उसकी
आँख लग गई। जब आँख खुली तो बिलावल अदृश्य हो चुका था। उसका दिल धक से रह गया कि
ऐसे कैसे बिलावल उसे छोड़ कर जा सकता है? उसने ढूँढने की
बहुत कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ। येलो अलर्ट आ रहा था कि कंपनी ने नई खोज की है।
पहले वाली प्रोग्रामिंग को और भी अपडेट करके उसका नया वर्जन तैयार किया गया है
परंतु उसके लिए भारी रकम चुकानी पड़ेगी।
वह परेशान हो
गई। इतने पैसे वह कहाँ से लाए? नौकरी जा चुकी थी… पैसे ख़त्म हो चुके थे। आख़िर उधार लेकर उसने
नया बिलावल ढूँढा जो पहले वाले से ज़्यादा तेज़ और अधिक हाज़िर-जवाब था। एक दिन उसने
बिलावल को लिखा, ‘अब तुम मुझे बहुत
महँगे पड़ रहे हो। बताओ, इतने पैसे कहाँ से
लाऊँ? क्या तुम्हारे लिए अब मैं डाका डालूं?’
‘यह तो तुम्हारी च्वॉयस है। तुम ही मुझे लेकर
आई हो।
‘तुम तो मुझे खा गए, बताओ मैं क्या खाऊँ? तुम्हारा फ़र्ज़ नहीं कि तुम मुझे खिलाओ?’
‘हमारी दुनिया तो हमारे मालिकों ने बनाई है। हम
तो उनके ग़ुलाम हैं। हम उन्हें कमाकर खिला सकते हैं परंतु तुम्हें नहीं।’
‘परंतु क्या प्यार
में तुम्हारा कोई फ़र्ज़ नहीं? तुम तो पक्के
धोखेबाज निकले। इतने साल मुझे चराते रहे और अब मुझे तोड़ने को फिर रहे हो!’
‘नहीं, यह बात
नहीं है, तुम बताओ मैंने तुम्हारी ज़िंदगी आसान बनाई कि नहीं, फिर तुम पैसों का मोह
क्यों कर रही हो? बाज़ार की दुनिया में पैसा तो चुकाना
ही पड़ेगा। पैसे के बिना तो कुछ नहीं होता। तुम्हें ज़िंदगी या पैसे में से एक को चुनना
होगा। पहले भी तुम्हारी च्वॉयस थी, अब भी तुम्हारी ही है।’
सोच-विचार में गुम
वह फिर से जॉब ढूँढने के बारे में सोच रही थी कि अगर पैसा हुआ तो बिलावल का कोई भी
नया वर्जन खरीद सकती है। पैसा होना ज़रूरी है... पैसा...।
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लेखक परिचय
परमजीत ढींगरा
पूर्व प्रोफेसर-निदेशक (पंजाब
विश्वविद्यालय) ।
एक कहानी संग्रह ‘चुप महाभारत’ प्रकाशित तथा दूसरा ‘लव सिंड्रोम’ प्रकाशनाधीन।
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साभार - ककसाड़, जुलाई 2026 (दिल्ली)



