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रविवार, सितंबर 26, 2010

कहानी श्रृंखला - 9
     हिरणी की आँख 
                         
    0 मोहन भंडारी


                                         अनुवाद - नीलम शर्मा "अंशु'

उस दिन शनिवार ही था, शायद! हाँ, शनिवार ही। छुट्टी थी न! अरे नहीं, छुट्टी दी गई थी। वर्ना यह हादसा क्यों होता? मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा हो जाएगा। मैं डरा नहीं, हाँ, घबरा ज़रूर गया था। और, घबराहट में इन्सान को दिन, वार याद ही कहाँ रहता है? हालात ही ऐसे थे। मेरे दिमाग में तनाव था। तनाव और धुंधलापन। मैं कुछ और ही सोच रहा था। क्या सोच रहा था? क्या बताऊं ?

चारों ओर दहशत छाई हुई थी। मन भटका हुआ था। उस वक्त जो भी मिलता, यही कहता, यह क्या हो गया? कब हो गया यह? कोई कहता कि इंसान मारा जाए तो सब्र कर लेना चाहिए। होश ठिकाने न हों तो कोई क्या करेउस वक्त यही हुआ। होश मारी गई! और, दिन तथा तारीख सब कुछ भूल गए मुझे।

अब चेतना लौट रही है धीरे-धीरे। घटनाएं याद आ रहीं हैं, एक के बाद एक। मन पूरी तरह ठीक नहीं है। अभी भी अशांत है। एक मिनट..... एक मिनट रुकिए। असली बात पर आ रहा हूं। असली बात। नवंबर का महीना था। शुरू ही हुआ था अभी। पहला सप्ताह। सप्ताह के पहले दिन........ दो या तीन तारीख....... दिन शनिवार ही था। शनिवार की रात, जब यह मनहूस घटना घटी थी।

इंदिरा गांधी के कत्ल के बाद शहर में दंगे भड़क उठे थे। उनका कत्ल क्या हुआ। कत्ल, कत्ल, कत्ल........ कत्ल होने लगे........बस कत्ल-ए-आम शुरू हो गया। आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी बेशक पुलिस की थी पर हमें अलर्ट रहने का आदेश हो गया। और, हम हो गए अलर्ट! क्या मालूम, कब क्या आदेश मिल जाए। दो दिन गुज़र गए। कोई आदेश नहीं। आदेश नहीं तो कोई एक्शन नही। एक्शन नहीं तो दंगे जारी। हम अनुशसन में बंधे हुए थे। अजीब बोरियत के दिन थे। साला! दिन-रात जगे रहना.

तीसरे दिन शाम को कॉल आई।  आदेश था - जवान लोग बैरक में रहेंगे। अफसर साहिबान, अब आराम करें। टिल फर्दर ऑर्डरस्....... यह टिल फर्दर ऑर्डरस्.... हमारे दिमागों में हथौंड़ों की तरह बज रहे थे। टिल फर्दर ऑर्डरस्।

मैं सचेत रहकर आराम करने के लिए कोठी में चला गया। डिफेंस कॉलोनी में। यह इलाका ख़तरे से बाहर था। यूं तो फौजियों के लिए ख़तरे से बाहर का कोई अर्थ नहीं होता। टिल फर्दर ऑर्डरस् में आराम के क्या मायने? ख़ैर! हम ऐसे आदेशों के आदी हो चुके हैं। अत: कैसी तकरार और कैसा गिला। साले! ये जो शब्द हैं न क्यों, कैसे किंतु, परंतु,… ये हमारे शब्द-कोश में हैं ही नहीं।

मेरी बीवी और बच्चे बाहर गए हुए थे। सब के सब। पूरे एक महीने से घर में मैं अकेला था। खाता, पीता, सो जाता। और क्या करता? परेड! बहुत हो गई। पहले तो...... ये पहले और बाद की बातें छोड़िए। बस विघ्न पड़ गया। पिछले दिनों। अच्छी मरी! कहीं भी चैन नहीं। दिन-रात अलर्ट। और तिस पर यह साला! टिल फर्दर ऑर्डरस्........

मैंने मेजर वी. के. मल्होत्रा को फोन किया - हलो! मेजर चङ्ढा, दिस साइड ...... हलो!.......हां....माईसेल्फ.....ओह नो! कम ऑन यार रात गुज़ारनी है..... दो घड़ी बैठेंगे.......हां, मेजर दुबे को भी लेते आना, बस आप लोग आ जाईए मैं अकेला बोर हो रहा हूं, यार!  येस टिल फर्दर ऑर्डरस्! हंसते हुए मैंने फोन का रिसीवर रख दिया।

थोड़ी देर बाद वे दोनों आ गए। मेजर वी. के. मल्होत्रा और पी. आर. दुबे। दोनों दोस्त हैं। दोनों ही अविवाहित। हम तीनों की जुंडली तिकड़ी के नाम से मशहूर है। दो और दोस्तों को मैंने अपने पड़ोस से बुला लिया।

शामें तो हमारी पहले भी एक साथ गुज़रती थीं। परंतु यह शाम कुछ भिन्न थी। घुटन भरी। हम पाँचों दो-दो पेग लेकर कोठी की छत पर चले गए। हम अभी खड़े ही थे कि मुझे धक्का सा लगा। गिरने ही लगा कि मुंडेर को थाम लिया। मल्होत्रा ने पूछा, क्या हुआ? मेरे मुंह से निकला, भूकंप! भूकंप आ गया। मुझे कोठी की छत अभी भी हिलती हुई प्रतीत हुई। मेजर दुबे रोनी सूरत बना कर हंसा। बोला, नो, नो..... दिस कांट हैपन! तुम्हारा वहम है.....शीयर इलियूज़न! बी स्टेडी मैन, डोंट लूज हार्ट!!
   दुबे उखड़ा-उखड़ा सा हमें देखता रहा। शहर से आग की लपटें उठ रहीं थीं।
   हम वहां ज़्यादा देर तक न रुक पाए। सीढ़ियां उतरे। और भीतर जाकर बैठ गए।
   जल्दी-जल्दी पीने लगे। हम पाँचों में से अगर कोई बात छेड़ता तो बाकी लोग हूं, हाँ कह कर ख़ामोश हो जाते। कोई ढंग की बात नहीं हो रही थी। बस खामोशी का पहरा था। मुझे लगा मानो हम व्हिस्की न पीकर ख़ामोशी को पी रहे थे। चुप-चाप। ऐसा पहली बार हो रहा था। साली दारू का नशा भी नहीं चढ़ रहा था।

उस वक्त, वक्त ने भी क्या शोर मचाना था? बस सुईयां सरकती रहीं.......दस......साढ़े दस.......ग्यारह...... अलार्म लगा देना चाहिए। मैं सोच रहा था। अचानक दरवाज़े की घंटी बज उठी। बहुत ही धीमे से। फिर पल भर का सन्नाटा। घंटी फिर बजी।
   मैं घबरा कर दरवाज़े की ओर बढ़ा। पूछा - कौन? बाहर से किसी का स्वर नहीं सुनाई दिया। मैंने फिर कहा, कौन है भई?
     जी मैं, मक्खन सिंह...... दरवाज़ा खोलिए साब जी! आवाज़ दबी सी थी। पर मैंने पहचान ली। हमारा पहले वाला नौकर था, मक्खन. इस वक्त! कहकर मैने दरवाज़ा खोल दिया वह बाहर खड़ा था। साथ में एक महिला। अधेड़ उम्र की जान पड़ी। मैंने इशारे से उन्हें भीतर बुला लिया। पहले मक्खन अंदर आया। पीछे-पीछे महिला। दोनों कांप रहे थे। शायद ठंड से। महिला दीवार से सट कर खड़ी हो गई। नज़रें झुकाए। मैंने ध्यान से देखा। भरपूर जवान थी। देखने में सुंदर। गोल चेहरा। ठुड्डी पर तिल। रंग पीला। उड़ा हुआ।
   मैंने भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया।
  
मक्खन सिंह ने मुझे एक तरफ ले जा कर धीरे से कहा, साब जी, इसके घर वाले को मार डाला...... और इसके बेटे को भी। दंगाईयों का हजूम आ गया साब जी। यह किसी तरह बचकर आ पहुंची मेरे पास। वहाँ ख़तरा है जी.....अभी मुझे यह देख कर छोड़ गए। उसने अपने मोने सर (कटे हुए बाल) पर हाथ फेर कर बताया। मैं इसे यहाँ इसलिए ले आया, ताकि बच जाएगी....आपके रहते किसी की हिम्मत नहीं होगी......’  कहते-कहते उसका गला रूंध गया और आँखों से खुद-ब-खुद आंसू बह निकले।
    
अच्छा किया, अच्छा किया। कहने को तो मैंने कह दिया, पर अंदर ही अंदर असमंजस में पड़ गया था। मुझे खुद पर गर्व भी हुआ कि मक्खन सिंह ने मुझे पर भरोसा किया है। उसके इस भरोसे को मैं कैसे तोड़ देता? अगर कोई इस तरह शरण में आ जाए तो ख़तरा मोल लेकर भी अपना फर्ज निभाना चाहिए।
   मेरे अंदर का फौजी जाग उठा।
     मुझे वापस जाना होगा, कहकर कुंडी खोलकर पता नहीं कब वह बाहर निकला और वापस भी चला गया।
   ऐसी स्थिति में मुझे उसे नहीं जाने देना चाहिए था। परंतु क्या करतामैं तो खुद सोच-विचार में उलझा हुआ था।
  
मैंने हिम्मत बटोर कर उस महिला को पुकारा, दिलासा दी। परंतु वह बोली तक नहीं। सर झुकाए खड़ी रही। ख़ामोश। ख़ामोशी तो मुझे पहले ही भारी पड़ रही थी। मैंने खुद को आफ़त में फंसा महसूस किया। कुछ नहीं सूझ रहा था। करूं तो क्या करूं?
  
मैं अपने साथियों के पास गया। नपे-तुले शब्दों में सारा किस्सा कह सुनाया। और कोने में खड़ी उस महिला की तरफ इशारा किया। वे तो पहले ही उसे घूर रहे थे। उनमें से दो, मेरी बात सुनकर मुस्कराए। उनका यूं मुस्कराना मुझे अच्छा नहीं लगा। फिर वे चारों चुपचाप उठे। दरवाज़े की तरफ बढ़े। कुंडी खोली और बाहर निकल गए।(यह सब कुछ इतनी तेजी से हुआ, मानो वे चल कर नहीं गए हों)।
  
तभी मैं जल्दी-जल्दी उनके पीछे गया। दोनों अविवाहित दोस्तों से मैंने अनुरोध भरे लहज़े में कहा, तुम लोग तो यहाँ रुको। तुम लोगों को किस बात की जल्दी है? यहां मैं अकेला....? बोल मेरे होठों पर लरज़ गए।
   वे दोनों ठहाका मार कर हँसे। दुबे बोला - ओह नो, मेजर चङ्ढा! सो.....गुड लक.....माई चैप!
   उसके शब्द मुझे ज़हर जैसे लगे। वे लोग चले गए।


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क्या नाम है आपका? मैंने उस महिला से पूछा।
   वह काँप उठी। कुछ न बोली।
     नाम बताने में क्या हर्ज़ है?
   वह हिली। उसके होंठ कांपे। फिर भी उससे कुछ न बोला गया।
     घबराइए मत.....बताइए! बताइए!!’  मैंने और भी नरमी से कहा।
     नसीब......नसीब कौर। उसने डरते, झिझकते हुए कहा।
    
कुछ खा लीजिए आप। भूख लगी होगी। मैं उसे सहज स्थिति में लाना चाहता था। उसने इन्कार में सर हिलाया। मेरे अगले प्रश्नों का भी उसने कोई जवाब नहीं दिया। इस वक्त उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। सदमे की मारी है। सुबह विस्तार से सारी बातें पूछूंगा। यह सोचकर मैंने उसे अपने शयन-कक्ष में भेज दिया। कुछ देर बाद देखा। वह सिकुड़ी पड़ी थी, गठरी की तरह।  घुटने पेट में सिकोड़े हुए। मैंने अलमारी से कंबल निकाल कर उस पर डाल दिया। खुद बाहर आ गया।
  
बाहर आकर अचानक मुझे ख़याल आया कि मेरा रिवॉल्वर अंदर रह गया है। ऐसी स्थिति में यह महिला कुछ भी कर सकती है। यह सोचकर मैं एक दम उठ खड़ा हुआ। अंदर गया। अलमारी खोली। रिवॉल्वर उठाकर ऊपर की तरफ उठाया।
  
मेरे हाथ में रिवॉल्वर देख वह काँप उठी। डरी-सहमी, मोटी-मोटी, फैली हुई आँखों से उसने मेरी तरफ ताका। और हाथ जोड़ कर होंठों ही होंठों में कुछ बड़बड़ाई मानो कह रही हो मुझे मत मारो।
  
बस इतने में ही मुझ पर कहर टूट पड़ा।  मेरी तरफ ताक रही उसकी बांई, मोटी तथा फैली हुई आँख में एक आँसू उभरा और धीरे से नीचे की ओर लुढ़क गया। कैसी आँख थी! बेबस! लाचार! हिरणी की आँख जैसी।
  
मैं दरवाज़ा बंद करके बाहर आ गया।
   हिरणी की आँख! अब सीधे मेरी तरफ ताक रही थी। बाहर बैठा मैं काफ़ी देर तक सोचता रहा। आँख मेरी तरफ ताकती रही। मेज से, छत में से। हर उस वस्तु में से जिसकी ओर मैं देखता था।
  
बचपन में बीता एक हादसा मुझे याद हो आया। तब दस-बारह बरस उम्र रही होगी मेरी। एक दिन कुछ लोग गाँव से बाहर शिकार खेलने गए। गर्मियों के दिन थे। मैं भी साथ हो लिया। दिन भर कोई शिकार न मिला। न खरगोश, न तीतर, न बटेर। कोई भी शिकार सामने नहीं आया। शाम गहरा रही थी। थके-हारे से हम टीले पर से होते हुए गांव को लौट रहे थे। अचानक टीले की आड़ से एक हिरणी कुलांचे भरती हुई सामने आ गई। शिकारियों की खुशी का ठिकाना न रहा। राईफल वाले ने घुटनों के बल बैठ कर निशाना साधा। हिरणी फिर छलांग लगाकर एक तरफ हो गई। जीवन और मृत्यु की यह आँख-मिचौनी कुछ देर तक जारी रही। अंतत: वह हमारे सामने आ खड़ी हुई। अनजान सी। और ठांय की आवाज़ से एक गोली चली। हमारे देखते ही देखते वह टीले पर गिरी और तड़पने लगी। शिकारी उछलते-कूदते उसकी तरफ बढ़े। मैं भी उसके समीप जा खड़ा हुआ। थोड़ा सा हटकर। वह अभी भी तड़प रही थी। मेरी तरफ देख रही थी। उसकी मोटी-मोटी आँखें और भी फैल गई थीं। फिर मेरी तरफ तकती उसकी बाईं, मोटी और फैली हुई आँख से आँसू निकला और उसके बांए कपोल पर लुढ़क गया।


          O          O              O


   आँख अब भी मुझे तक रही थी। मेरे कमरे की हर चीज़ में से। बाहर बैठा मैं काफ़ी कुछ सोचता रहा। मेरी हालत राईफल वाले उस शिकारी जैसी थी। मैं जो भी चाहता, कर सकता था। जो भी ! मेरी कोठी के शयन-कक्ष में एक महिला लेटी हुई थी। अबला, बेबस तथा लाचार। उस हिरणी जैसी।
  
ज़ेहन में कितने ही ख़याल आए उस रात। पाप के, पुण्य के। सोचते-सोचते कब मेरी आँख लग गई पता ही नहीं चला।

सुबह मेरी आंख देर से खुली। शयन-कक्ष का दरवाज़ा बंद था। मैं
नहाया-धोया। कमरे की वस्तुओं को इधर-उधर सहेजता रहा। दरवाज़ा अभी भी बंद था। पता नहीं कितनी रातों से वह सो नहीं पाई होगी। अब, अंदर गहरी नींद सो रही है। उठेगी तो साथ-साथ चाय पीयेंगें। बातें करेंगे। सुख-दु:ख आपस में बांटेंगे। बात कैसे शुरू करूंगा। मैं सोचता रहा। अंतत: चाय बना ली।

   धीरे से दस्तक दी मैंने दरवाज़े पर। फिर ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया। न ही उसने आवाज़ दी और न ही दरवाज़ा खुला। मैंने धीरे से धक्का देकर दरवाज़ा खोला।  अंदर झांका। वह लेटी हुई थी। सीधी। आँखें खुली हुईं थीं। मैं घबरा गया।

   बाहर आकर पागलों की तरह चक्कर काटने लगा। फिर हिम्मत जुटा कर मेजर मल्होत्रा को फोन किया। दुबे और वह दोनों आ गए। पड़ोसियों को भी बुला लिया। अंदर गए। मल्होत्रा ने आगे बढ़कर उसकी खुली तथा फैली हुई आँखों को बंद कर दिया।

   मृत्यु का समाचार उसी वक्त मुख्यालय को दिया गया।
   अब वे समझते हैं कि यह गुनाह मैंने किया है। मुझे इस बात की परवाह नहीं कि वे मुझे सज़ा देंगे या बरी कर देंगे। परंतु एक बात से मैं जीते जी कभी मुक्ति नहीं पा सकता। अपने अंतर्मन के गुनाह के अहसास से। और वह, यह कि उस रात मैं उसके पास ही क्यों नहीं लेटा। अगर ऐसा करता तो शायद वह बच जाती।




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शनिवार, सितंबर 18, 2010

आधी रोटी पूरा चाँद - इमरोज

शनिवार, सितंबर 18, 2010

आधी रोटी पूरा चाँद






दोस्तो, इमरोज़ साहब का एक प्यारा सा संस्मरण आपके साथ शेयर करना चाहती हूँ
          


   मैं अभी चौथी कक्षा में ही था कि माँ गुज़र गई। घर में चार चाचा थे, परंतु चाची एक भी नहीं थी। सब कुछ होते हुए भी हर शै में एक कमी सी महसूस होने लगी। ऑंखें हमेशा बाहर और भीतर कुछ तलाशती रहतीं। मुझ से छोटी मेरी आठ - नौ वर्षीया बहन को कच्ची उम्र में ही चौके-चूल्हे की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ गई। कच्ची पक्की रोटी बनती, एक-दो खाता और एक दो साथ बाँधकर स्कूल ले जाता। रोटी, रोटी ज़रूर होती थी परंतु उसमें माँ के हाथों का रस न होता। माँ के बिना हर रसीली चीज़ नीरस सी लगती मानो सभी ऋतुएं पतझड़ हो गई हों। मैं हर वक्त उठते-बैठते, सोते-जागते कुछ तलाशता सा रहता। कहीं भी कोई ममता से परिपूर्ण चेहरा नज़र आता तो मेरा खुद-ब-खुद उसे माँ कहने को जी चाहता। परंतु, माँ के बगैर किसी को माँ कैसे कहा जा सकता है।  फिर भी जहां कहीं भी किसी औरत में ममता नज़र आई या महसूस हुई तो दिल ज़रूर चाहा कि उसे माँ कहूँ। ऐसा कई बार हुआ है, गाड़ी में सफ़र करते हुए, बाज़ार में सामान खरीदते हुए, किसी के घर, अपनों के घर, दावत पर या किसी त्योहार पर बातचीत करते हुए ......।


इस तलाश से मैं प्राईमरी स्कूल में भी बैठा और हाई स्कूल के डेस्क पर भी और आर्ट स्कूल के ड्रॉइंग टेबल पर भी। मेरे गाँव का एक लड़का जो मेरा सहपाठी था मेरे साथ ही पड़ोस के गांव में मेरे साथ ही पढ़ने जाया करता था। हम आधी छुट्टी के समय मिलकर रोटी खाया करते थे। उसकी माँ क्या परांठे बनाया करती थी - सात पर्दों वाले परांठे। मेरा वह सहपाठी मुझे रोज़ आधा परांठा दे दिया करता था और वह परांठा खाते वक्त मुझे लगता था कि कहीं मेरी मां है। अमृता से मिला, उसकी किताब  ‘आख़िरी ख़त’ का कवर डिज़ाइन बनाने के सिलसिले में। क्या पता था कि ये आख़िरी ख़त हमारी दोस्ती की नींव बनेगा। पता नहीं अमृता में मैंने क्या देखा जो देखे हुए इतने  चेहरों में नहीं देखा था। हम अक्सर मिलने लगे और धीरे-धीरे वाकफ़ियत बढ़ने लगी - और फिर हम दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे घर बनती गई, हम दोनों का एक घर।  अब सुबहें भी अपनी हो गईं और शामें भी। दिन भी अपने हो गए और रातें भी।  वह पतझड़ का मौसम बहार बनने लगा।  दोस्ती के पेड़ पर पहले मुकुल आया और फिर फूल भी खिलने लगे। मैं फूलों को, घर को जीने में मस्त हो गया-मानो मुझे याद ही न रहा कि मेरी कोई तलाश भी है कभी की - अमृता के अस्तित्व में मानो सभी रिश्तों के दरिया आकर एक हो गए हों......।


       उन दिनों मैं साउथ पटेल नगर और अमृता वेस्ट पटेल नगर में रहती थी। उन दिनों मेरे पास एक स्कूटर था और मैं  ‘शमां’  में काम करता था। सुबह अमृता के दोनों बच्चों को स्कूटर पर बिठाकर मॉडर्न स्कूल छोड़कर  ‘शमां’  के दफ्तर चला जाता था। एक हफ्ते, मेरे दो चालान हो गए, स्कूटर के पीछे दो बच्चे बिठाने का इल्ज़ाम। कचहरी जाकर चालान भुगते और अमृता के साथ बैठकर सोचा कि कार ले ली जाए। पांच-पांच हज़ार बड़ी मुश्किल से जोड़ पाए, पर जोड़ लिए। दस हज़ार की फिएट कार ले ली। जब दोनों नामों की रजिस्ट्री करवाने गया तो आफ़िसर ने पूछा, ‘अमृता के साथ आपका क्या रिश्ता है ?’  ‘दोस्त है’  मैंने कहा। परंतु, दोस्ती उन्हें कोई रिश्ता नहीं लग रहा था।  खिड़की के बाहर काफ़ी देर खड़ा रखने के बाद अंतत: रजिस्ट्री कर ही दी पर बड़ी बेदिली से।
        
अजीब बात है -  हमारे समाज को और हमारे कानूनों को स्त्री-पुरुष में दोस्ती का रिश्ता ही नहीं लगता। हलांकि इस जैसा कोई ख़रा रिश्ता ही नहीं। एक बार अमृता ने साहित्य अकादमी के एक अधिकारी को देने के लिए एक ख़त मुझे दिया। मैंने उस अधिकारी को जब चिट्ठी दी तो उसने मुझे बैठने के लिए कहा और पूछा, ‘अमृता के साथ आपका क्या रिश्ता है?’  मैंने कहा, ‘दोस्त हूं।’  उसने फिर पूछा। मैंने कुर्सी से उठते हुए उससे कहा,  ‘जो रिश्ता है वह आपको समझ नहीं आएगा।’
        
एक बार मैंने इंश्योरेंस करवाई और फार्म में वारिस के कॉलम में मैंने अमृता का नाम लिख दिया। अधिकारी ने ऐतराज़ किया कि ‘घरवालों को छोड़कर दोस्त का नाम क्यों?’ ‘ये मेरे पैसे हैं जिसे जी चाहे मैं दूं। आप कैसे ऐतराज़ कर सकते हैं?’ मेरे ऐसा कहने पर उस अधिकारी ने इंश्योरेंस कर दिया।  परंतु ये बुलफाईट हर जगह हुई, मैदान चाहे समाज का हो या कानून का।
       
पहली बार मैं और अमृता दिल्ली से बाहर जा रहे थे, किसी भी पहाड़ पर या जहां भी जी चाहे। पठानकोट में गाड़ी से उतर कर देखा कि एक गाड़ी डलहौज़ी की तरफ जा रही है और दूसरी अंदरेटे की तरफ, सोभा सिंह जी की तरफ। सोभा सिंह अमृता के पिता के दोस्त थे और अमृता उन्हें चाचा जी कहा करती थी। हम चाचा जी की तरफ जा रही गाड़ी में बैठ गए। पालमपुर स्टेशन पर उतर कर पैदल चल पड़े। अमृता पहले भी अंदरेटे आ चुकी थी। उसे रास्ता मालूम था। हम धीरे-धीरे पहाड़ों की वादी में चलते-चलते अंदरेटे पहुंच गए। चाचा जी अमृता को देखकर बहुत खुश हुए, हमें बड़े प्यार और तपाक से बैठाया अपनी गैलरी में। हम तस्वीरें देख ही रहे थे कि टेबल पर चाय आ गई। हम टेबल के गिर्द बैठ गए, धीरे-धीरे बातें कर रहे थे कि ऐमरसन थोरे भी आ गए। थोड़ी देर बाद ख़लील जिब्रान भी आ गए। काफ़ी देर यह महफ़िल चलती रही। खाना खाने के लिए चाची जी की आवाज़ पर ही यह महफ़िल उठी। रसोई में लकड़ी वाले चूल्हे के पास बैठकर खाना खाया। खाते समय मैंने कई बार चाची जी की जगह रोटी बनाते हुए अमृता की कल्पना की। रात को जब चौबारे के कमरे में हम मिले तो मैंने अमृता से कहा कि कल तुम रोटी बनाना, चाची जी बुजुर्ग हैं। जितने दिन हम यहां हैं तुम ही रोटी बनाओ।  सुबह चाची जी को मना लिया गया, परंतु वे बड़ी मुश्किल से मानीं। और वह भी, एक वक्त की रोटी के लिए।  हम वहां दस दिन रहे। रोज़ शाम को अमृता रोटी बनाती। परंतु, उसने रोटी इस शर्त पर पकानी शुरु की कि आग मैं जलाउंगा और चूल्हे का ख़्याल भी मैं ही रखूंगा। दिल्ली में अमृता रोटी नहीं बनाती थी, नौकर बनाता था। मैं अमृता को रोटी बनाते पहली बार देख रहा था, रोटी पकाते हुए वह बड़ी सुंदर गृहिणी लग रही थी। इन दस दिनों में पता नहीं क्या हुआ, अमृता को रोटी बनाना अच्छा भी लगने लगा और ज़रूरी भी। दिल्ली लौटकर उसने रसोई संभाल ली, मैं सब्ज़ी लाने लगा और कुछ दिनों बाद मालकिन को रसोई में देख नौकर इस्तीफ़ा देकर चला गया। अब हम दोनों ही रसोई के मालिक हैं और हम ही हेल्पर। जैसे जीवन में एक दूसरे के पूरक।
        
ये तब की बात है जब मेरे पास वाहन नहीं था।  अमृता शाम के पंजाबी प्रोग्राम के लिए रोज़ बस से आती थी और जहां आकर वह उतरती, मैं वहां पहले से ही खड़ा उसका इंतज़ार कर रहा होता। प्रोग्राम के बाद रेडियो स्टेशन की तरफ से अमृता को गाड़ी मिल जाया करती थी। एक बार यूं हुआ कि दफ्तर की गाड़ी किसी को छोड़ने गई हुई थी और लेट हो गई।  मैंने अमृता से कहा, चलो आज पैदल घर चलते हैं। और हम चल पड़े -  पूर्णिमा की रात थी, हम सड़क के किनारे-किनारे चल रहे थे अपने में मस्त। हमारे पास से साईकिल, स्कूटर, कारें, बसें, ट्रक और लोग गुज़र रहे थे, परंतु  चलते-चलते हमें पता ही नहीं चला कि सड़क पर हमारे सिवा कोई और भी चल रहा है या चल रहे हैं।  सड़क पर आवागमन का, ट्रकों, बसों, कारों और स्कूटरों का शोर भी था - परंतु शायद हमारे लिए नहीं था, हम कभी-कभी एक-दूसरे को देखते या एक साथ पूर्ण चंद्रमा को देखते। चारों तरफ चाँदनी से सराबोर रात बेखुद सी हमारे साथ-साथ चलती प्रतीत हो रही थी। हमें पता ही नहीं चला कि हम कब रेडियो स्टेशन से घर पहुंच गए थे - वेस्ट पटेल नगर।  काफ़ी रात हो गई थी, सब खाना खा चुके थे, अमृता का खाना रखा हुआ था। अमृता ने मुझे भी खाने के लिए बिठा लिया।  नौकर खाना ले आया। अमृता ने एक थाली और मंगवाई। अमृता के लिए सिर्फ़ दो रोटियां रखी हुई थीं। अमृता ने एक रोटी खुद ले ली और एक मेरी थाली में रख दी। खाते-खाते अमृता ने धीरे से आधी रोटी मेरी थाली में और रख दी। ये आधी रोटी मुझे आज भी याद है, वो रोटी ही आधी थी परंतु उस रात चांद पूरा था।
       
फ़िल्म निर्देशक गुरुदत्त ने ‘शमां’ पत्रिका में मेरा काम देखकर मुझे अपनी फ़िल्म ‘प्यासा’ का काम दिया। मैंने वह काम इतना अच्छा किया कि गुरुदत्त ने मुझे अपने पास बंबई में अपनी फ़िल्मों का काम करने का प्रस्ताव दिया। मैं कब से बंबई जाना भी चाहता था। फ़िल्में मुझे बहुत खींचती थीं। बातचीत हुई, सब कुछ तय हो गया। सिर्फ़ तनख़्वाह पर आकर बात रुक गई। कई महीने गुज़र गए, मैं भी धीरे-धीरे उस बात को भूल-भाल गया कि एक दिन अचानक गुरुदत्त का ख़त आ गया - मेरी मर्ज़ी की तनख़्वाह का। मैं बड़ा खुश हुआ। सीधे अमृता के पास गया। मुझे इतना खुश देखकर वह भी बहुत खुश हुई, परंतु ख़त पढ़कर उदास हो गई। अपनी उदासी बताने के लिए उसने मुझे ये कहानी सुनाई, यह सोचकर कि मुझे कौन सा समझ आएगी। कहानी में दो दोस्त थे। एक लंबे कद का गोरा तीखे नैन-नक्श वाला और दूसरा नाटा सांवले रंग का मोटे नक्श वाला। परंतु, अच्छे दिल वाला था। एक हसीना उस खूबसूरत व्यक्ति पर मस्त हो गई। रोज़ शाम को अपनी बालकनी में खड़ी होकर इंतज़ार करती। खूबसूरत व्यक्ति अपने दोस्त को साथ ही रखता था। हसीना की बातों का जवाब उसका दोस्त दिया करता था, परंतु सामने आकर खूबसूरत व्यक्ति ही बोला करता था। दोस्त हमेशा बगीचे की झाड़ी के पीछे खड़ा रहता था।  मुलाकातों का ये सिलसिला अभी चल ही रहा था कि देश में जंग छिड़ गई। दोनों को लड़ाई के मोर्चे पर भेज दिया गया। मोर्चे से खूबसूरत व्यक्ति ने हसीना को बहुत ख़त लिखे, जो उसके दोस्त ने बोले थे। जंग में खूबसूरत व्यक्ति की मौत हो गई और उसका दोस्त भी ज़ख्मी हो कर अपने शहर के अस्पताल में आ गया।  ख़तों से हसीना को सब पता लगता रहता था। वह खूबसूरत व्यक्ति के ज़ख्मी दोस्त से मिलने अस्पताल गई। बड़ी देर तक खूबसूरत दोस्त की बातें करती रही। ज़ख्मी दोस्त के साथ उसके खूबसूरत ख़तों की बातें भी कीं और वे ख़त दोस्त को पढ़ने के लिए दिए ताकि वह पढ़कर देखे कि ख़त कितने खूबसूरत हैं। दोस्त ख़तों को पढ़ने लगा। पढ़ते- पढ़ते अंधेरा हो गया, परंतु वह पढ़ता जा रहा था। अंधेरे में भी ख़त पढ़ते रहने के कारण हसीना जान गई कि ये ख़त इसी के लिखे हुए हैं। वह और भी उदास हो गई तथा उसने सिर्फ़ यही वाक्य कहा, 'आई लव्ड वन मैन बट लास्ट हिम टवाइस् ( I loved one man but lost him twice ) यह कहानी सुनाकर अमृता  भीतर अपने कमरे में चली गई। मैं कुछ देर वहीं बैठा चुप-चाप अपने आप को सुनता रहा.......
             तूने कुछ भी न कहा हो जैसे
             मेरे ही दिल की सदा हो जैसे.....
        
मई का महीना था और साल 1958.  चढ़ती गर्मी परंतु पीले फूलों का मौसम। जगह-जगह सड़कों के किनारे, बागों में, बगीचों में और कई घर-आंगनों में अमलतास के पीले फूलों से वृक्ष लदे हुए, फ़र्श भी भरे हुए और हवा भी। ये तीन दिन पता नहीं अपने साथ क्या लेकर आए थे, अमृता भी कुछ और ही लग रही थी, हवा भी कुछ और, और पांवों तले धरती भी कुछ और ही।  हर चीज़ हर जगह पहले की भांति ही थी, परंतु उनके रंग मानो गहरे हो गए हों। हम चल रहे थे बिना किसी मंज़िल के रास्ते पर।  उन तीन दिनों की वैसे कोई तलाश भी नहीं थी। बस बहती नदी की भाँति अपने आप चलते चले जा रहे थे। कभी किसी बगीचे में पीले फूलों के वृक्षों के नीचे बिछे फूलों पर चुपचाप पड़े, कभी आसमान की ओर देखते, खुली आँखों से कभी बंद आँखों से एक दूसरे को। कभी किसी ऐतिहासिक इमारत की सीढ़ियां चढ़ते, कभी उतरते। एक इमारत की छत से दूर जमुना नदी दिख रही थी और नीचे इमारत का खूबसूरत बगीचा। मैं बहती नदी के साथ मस्त उसे देख रहा था कि अमृता ने पास आकर मुझे पूछा, तुम यहां पहले भी कभी आए हो किसी के साथ?  ‘’मुझे लगता है, मैं कभी भी किसी के साथ कहीं नहीं गया...’  मैंने कहा था। जहां जी चाहता सड़क के किनारे, चाय के ढाबों पर बैठ कर चाय पी लेते। हर जगह सुंदर लग रही थी। और सुंदर जगहों पर वह नहीं होता जो अपनी नज़र में होता है। तीन दिनों बाद मैं बंबई गया भी, गुरुदत्त से मिला भी, परंतु उनकी इजाज़त लेकर बिना कोई कारण बताए वापस लौट आया, जैसे स्वयं के पास। मेरे वापस आने पर अमृता हैरानी से काफ़ी देर तक मुझे देखती रही, परंतु कहा कुछ नहीं।
        
मेरी तबीयत में शुरु से ही फ़कीरी है। छुटपन से ही, जैन फ़कीरों को पढ़ने से बहुत पहले (कहा जाता है कि जैन फ़कीर अपनी रोटी खुद कमाते हैं) अपनी रोटी खुद कमाने के वक्त का इंतज़ार करता रहता था। आर्ट स्कूल के दूसरे वर्ष में था जब अपने घर से पैसे मंगवाने छोड़ दिए। ये 1944 लाहौर की बात है।  लगभग बीस रुपयों से रोटी-पानी चल जाता था। मैं छोटे-छोटे काम करके अपनी रोटी और तूलिकाओं का खुद ज़िम्मेदार बन जाता था।
        
मैं अब तक अपनी ही कमाई खर्च करता हूँ - इसी में मुझे सुख मिलता है। दूसरे की कमाई में नहीं, माता-पिता की जायदाद में भी नहीं। अमृता के स्वभाव और मेरे स्वभाव की यह बात बहुत मिलती है। सिर्फ़ रसोई और घर मिलकर चलाते हैं, अन्य ज़रूरतें अपनी मर्ज़ी से जैसा जी चाहे अपनी कमाई से पूरी करते हैं। हमारे स्वभाव में कई बातों में बड़ी समानता है पर कई बातों में बड़ी असमानता है।
       
हम शुरु से ही अपने-अपने कमरों में रहते हैं। अमृता के सोने का वक्त मेरे काम करने का वक्त होता है और अमृता के जगने का वक्त मेरे सोने का। जैसे मुझे बिस्तर की चादरें एक ही रंग की पसंद हैं, काले प्रिंटस् की और अमृता को हल्के मध्यम रंगों की। उसे छोटे-छोटे बुत इकट्ठे करने का बहुत शौक है, कांच के बने कृष्ण, कई तरह के पत्थरों से बने गणेष, कई धातुओं से निर्मित बुद्ध। परंतु वह किसी को पूजती नहीं, हां प्यार करती है,बड़े प्यार से।
        
मैं हर वक्त जो सोच में है उसे कर के, बना कर देखता रहता हूं या देखना चाहता हूं।  मेरे पास बहुत सी घड़ियां हैं जिनके डायल मैंने कई तरह के बनाए हैं। किसे में कोई अंक नहीं।  किसी में अंक एक कोने में बैठे वक्त देख रहे हैं। किसी में शायरा की एक नज़म है उसकी तस्वीर सहित। और कईयों में अपनी पसंद की कोई पंक्ति है......कोई शेर।
        
एक और भी शौक है मुझे, जो गीत ग़ज़ल मुझे पसंद आ जाए मैं उसे कैसेट की दोनों तरफ रिकार्ड कर लेता हूं और फिर सारा दिन सुनता रहता हूं..... एक बार मैं गालिब की एक ग़ज़ल इसी तरह सुन रहा था अपने कमरे में, अमृता दो-तीन बार कमरे में आई तो वही ग़ज़ल सुन कर पूछने लगी, आज ग़ालिब का कोई ख़ास दिन है?  मैंने हंसते-हंसते कहा, लाहौर वाले आज ग़ालिब का दिन मना रहे हैं.... मैंने तो मज़ाक में ये बात कही थी - काश ! किसी कलाकार को यूं याद किया जाए और ऐसे मनाया जाए...........कई लेखकों के बारे सुनते हैं कि वे नियम से सुबह नहा-धो कर लिखने बैठ जाते हैं। अमृता का कोई वक्त नहीं लिखने का। वह अक्सर आधी रात के बाद लिखती है। कई बार तो वह लिखती नहीं सिर्फ़ उतरी हुई नज़्म को काग़ज़ पर उतारती है।  कभी-कभी नज़्म दिन को भी आ जाती है। और कई बार नज़्म लिखते वक्त बच्चे आ जाते हैं खाना खाने, तो वह सहजता से काग़ज़ कलम रखकर, मैं अभी आई, नज़्म को होल्ड ऑन कहकर बच्चों के लिए रोटी बनाती है, पास बैठकर खिलाकर वापस नम के पास आकर उसे लिख लेती है। कई बार पेंटिग करते वक्त भी ऐसा ही महसूस होता है कि रंग हमारे साथ खेल रहे हों - ज़्यादातर तो हम ही रंगों से खेला करते हैं।
        
हम दोनों न तो दावतों पर जाना पसंद करते हैं, न दावतें देना। यूं हम चाय पी रहे हों, दोस्त घर आ जाएं तो हमारे साथ जी भरकर चाय पीएं। इसी तरह खाना खाते वक्त कोई आ जाए, तो जो कुछ बना है वह भी खा ले हमारे साथ। विशेष रूप से कुछ नहीं होता। विशेष यूं भी हमारी ज़िंदगी में कम ही दिखता है। हम दोनों को ही एकांत बहुत पसंद है। हम दिन भर घर पर ही रहते हैं, पर ज़्यादातर अपने-अपने कमरों में। हमारे कमरों के दरवाज़े खुले ही रहते हैं रात-दिन, गर्मियों-सर्दियों में। परंतु खुले दरवाजों वाले कमरों में एक-दूसरे के अस्तित्व की महक तो आती है, परंतु कोई दखल नहीं। अमृता जब लिखती है तो मैं उसके एकांत का, घर का सब ख़्याल रखता हूं। बीच-बीच में गर्म चाय की प्याली आहिस्ता से उसके पास रख आता हूं।
        
अमृता को मैं कई नामों से पुकारता हूं। उनमें से एक नाम ‘बरकते’ भी है। उस के हाथ मैं बरकत है, उसकी कलम में बरकत है और सब से ज़्यादा जो मैं जानता हूँ उस के अस्तित्व में भी एक बरकत है......  अमृता के मेहनती हाथों की रेखाएं, दिल की रेखाएं, श्रम की, दुख-सुख की, जिज्ञासा की, पैसे की, सब रेखाएं मानो बरकत की गंगोत्री में से निकलती हैं और उम्र के क्षितिज तक नज़र आती हैं। अमृता हीर भी है और फ़कीर भी।  उसका दीन तख़्त हज़ारा है. और प्यार उसका धर्म. जाति की वह फ़कीर है और स्वभाव की अमीर। वह जो एक हाथ से कमाती है उसे दो हाथों से बांट देती है। वह बहुत उन्मुक्त स्वभाव की, इन्सानियत को प्यार करने वाली, सारी क़ायनात को प्यार करने वाली, वह किसी वाद, किसी मज़हब से कंडीशनड् नहीं।  वह कहती है, कंडीशनिंग से विकास रुकता है, घर में भी और मुल्क़ में भी।  सही मायनों में विकास तब होगा जब व्यक्ति खुद अपना जिम्मेदार बनेगा। न फ्रॉयड की भाँति कोई कहेगा कि मां-बाप जिम्मेदार हैं और न मार्कस् की भाँति कहेगा कि समाज जिम्मेदार है। हैरानी की बात है कि फ्रॉयड और मार्कस् दोनों व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं मानते। और उधर बौद्ध के अतिरिक्त किसी मज़हब ने नहीं कहा, नहीं माना कि आदमी अपने अच्छे-बुरे का खुद ही जिम्मेदार है।  जिसे भी विकास करना है उसे अपनी जिम्मेदारी खुद लेनी होगी।  बेशक वह ऊंची जाति का हो या नीची जाति का।
   
जाति-पाति से मुक्त अमृता ने, जब वह राज्य सभा की सदस्य थी, संसद में बड़े गुस्से से कहा था कि आप इन लोगों के लिए आरक्षण रखकर, उनको शेडयूल कास्ट कह कर उनके माथे पर क्यों हमेशा के लिए लिख रहे हैं - ये हरिजन और शेडयूल कास्ट। सिर्फ़ उन्हें उपयुक्त अवसर की तलाश है - आरक्षण की नहीं। उन्हें अवसर दें पढ़ने का, काबिल बनने का और उन्हें मुख्य धारा में लाईए, फिर वे अपनी योग्यता से सदस्य बनें, सीटें लें....आरक्षित सीटें किसी के लिए नहीं चाहिए। सब सीटें योग्यता के लिए हों...सिर्फ़ योग्यता के लिए......अमृता शुरु से ही किसी तरह की कंडीशनिंग नहीं मानती थी, न घर की न समाज की। वह लाहौर रेडियो स्टेशन पर कई बार प्रोग्राम करने जाती थी, एक बार उसके घर के बुजुर्ग ने उसे बुला कर पूछा,
           ‘तुझे रेडियो से कितने पैसे मिलते हैं?’  
‘दस रुपए’ अमृता ने जवाब दिया।

‘मुझसे बीस रुपए ले लिया करो परंतु रेडियो पर मत जाया करो’..... पर अमृता खुद कमाकर खुद पर खर्च करने के बारे सोचती थी। उसने अपनी यह खुदमुख्तारी जारी रखी और लाहौर रेडियो से प्रोग्राम करती रही.....पुरुष को औरत की खुदमुख्तारी ख़ास तौर से घर की औरत की, समझ नहीं आती। वह औरत की कमाई तो सहजता से कबूल कर लेता है पर उसकी खुदमुख्तारी बिलकुल नही। माँ-बाप और मज़हब दोनों अपनी तरह से बच्चों की, समाज की कंडीशनिंग करते हैं। और दोनों कई तरह के डर पैदा करते हैं ताकि हुक्म में रहें - बच्चे भी और समाज भी। वे यह कभी नहीं सोचते कि कंडीशनस से डरे हुए बच्चे, कंडीशनड और डरे हुए समाज से रिश्ता नहीं बन सकता। रिश्ता सिर्फ़ सहजता में ही बनता है। जिससे भी आपको डर लगता हो, बेशक वह बाप हो या भगवान, उसके साथ सहजता नहीं होती, भला प्यार कहां से हो सकता है?  दिखाई दे रहे बाप का अदब और दिखाई दे रहे मज़हब की मान्यता सिर्फ़ दिखाई देती है, होती नहीं और हो भी नहीं सकती..

मैं कहीं भी गया होऊं अमृता मेरा इंतज़ार करके ही खाना खाएगी। मिल कर खाना खाने का अपना अलग ही स्वाद है, और वह भी अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ। और खाना खाने लायक होते हुए भी खाने का स्वाद सिर्फ़ मेहनतकशों के हिस्से ही आता है, हर एक के नहीं, मां-बाप की कंडिशनिंग और मज़हब की पाबंदियों में न कहीं औरत आज़ाद हुई है न पुरुष। आज़ादी आज भी बहुत से मुल्कों के झंडों में ही झूल रही है, यदि कैदो, कैदो न होते, अपने चाचा होते तो आज हीरें अपने रांझों के साथ-साथ उसके बच्चों को भी चूरी खिला रही होतीं।
        
जब तक सूरज आसमान पर रहता है, अमृता भी अपने आप की ऊंचाई पर रहती है। निडर, खुदमुख्तार और बेफिक्र। दिन के छोटे से छोटे और दुनिया के बड़े से बड़े धमाके से बिलकुल बेपरवाह। दिन का ज़्यादातर हिस्सा वह अपने साथ रहना चाहती है, रहती है, लिखती है, पढ़ती है या सोचती है। परंतु रात का अंधेरा उतरते ही वह मानो अपने आप में से उतर जाती है - एक आम औरत की भाँति, कमज़ोर, डरपोक, निराश और मुहताज। हर तरफ से फ़िक्रमंद। हल्की से हल्की आहट पर भी डर जाती है, सहम जाती है। सुबह उठते समय उसका मुंह बुझा-बुझा, थका-थका होता है। जैसे वह सारी रात अंधेरे की एक लंबी गुफ़ा को पैदल पार कर आई हो, और वह भी अकेले। परंतु दिन चढ़ते ही उसकी कायापलट हो जाती है। ज्यों-ज्यों सूरज चढ़ता है, त्यों-त्यों उसका मुंह चमकदार होता जाता है धूप रंगा। सुबह के उजाले में उसकी खुदमुख्तारी का यह हाल है कि सुबह की पहली घंटी बजाने वाला उसके क्रोध का शिकार हो जाता है। उसके मन के एकांत में यह दुनिया की पहली आहट होती है, पहली दखलअंदाज़ी। बेशक वह दखलअंदाज़ी उसके अपने आराम के लिए होती है - कमरों और बर्तनों की सफ़ाई, परंतु इस सफ़ाई के लिए कम से कम एक घंटा चाहिए होता है, और ये एक घंटा उसका बड़ा बेचैन घंटा होता है।  ऊपर से अगर धोबी भी आ जाए तो आई सभ्यता की शामत, जिसकी ख़ातिर कपड़े पहनने पड़ते हैं और फिर धुलवाने पड़ते हैं।  वह बर्तनों की आवाज़ से भी बेचैन होकर कहती है - ‘हम सिर्फ़ फल नहीं खा सकते?  न खाना खाएं और न बर्तन जूठे हों।’  उस वक्त उसे सर्विस देने वालों की सलाम एक लानत लगती है। (आजकल जो जमादार काम करता है उसे बार-बार हाथ जोड़ने की आदत है। वह कई बार उसे समझा चुकी है कि यूं हाथ न जोड़ा करे) शायद वह भी उसकी खुदमुख्तारी का तकाज़ा है कि वह न किसी के आगे हाथ जोड़ सकती है, न किसी द्वारा जोड़े हाथ स्वीकार कर सकती है।
        
सादगी का ये आलम है कि न नहाने की परवाह, न मेकअप की, न कपड़े बदलने की। और न नए खरीदने की चाह।  कोई एक कमीज़ उसे पसंद आ गई, तो समझो उस की ख़ैर नही - वह बार-बार उसी को पहनती रहेगी, मरम्मत कर-कर के पहनने की हद तक। कई बार वह किसी पार्टी में सिर्फ़ इसलिए नही जाती कि उठकर कपड़े बदलने पड़ेंगे।
        
एक अजीब फक्कड़ तबीयत - रोटी चाहे ताज़ी हो या बासी, साथ में सिर्फ़ आम का अचार, और एक प्याली चाय की।  लगता है फ़कीरी उसकी रगों में हैं परंतु कभी-कभी उसकी तबीयत की बादशाहत मचल उठती है। एक दिन हम सड़क के किनारे एक ढाबे में बैठे चाय पी रहे थे, चाय पीते- पीते एक खूबसूरत मकान पर उसकी नज़र पड़ी- तुरंत मुझे कहा, लगभग आदेश की मुद्रा में- जाकर इस मकान की कीमत पता करके आओ। मैं ‘बहुत अच्छा मल्लिका मुअज्जमा अभी दरियाफ्त करके लाया’ कहकर मकान की कीमत पता करने चल दिया.... ऐसा उसने कई बार किया है, करती है, करती रहेगी। जब तक वह है तब तक खूबसूरत मकान है। वह कभी सोने की एक अंगूठी तक भी नही पहनती, (सोने की पतली-पतली बालियां भी कानों में पहने, तो मुश्किल से आधा घंट सहन कर सकती है, उसे सचमुच सर दर्द होने लगता है) मैंने इस शाहनी-फ़कीरन का रहस्य समझ लिया है। हीरे, मोती, नीलम, पुखराज उसका जुनून हैं। जब कभी भी कनाट प्लेस में हीरों की दुकान सामने पड़ती है, उसकी ये बादशाही तबीयत उसे ज़बरदस्ती भीतर ले जाती है। हीरे, मोती, नीलम, पुखराज और हर तरह के कीमती नगीनों को देखती है और देखती जाती है। उस वक्त कोई उसका हीरों से भी जगमगाता चेहरा देखे। यूं उसने कभी खरीदा कुछ नहीं। उसे पता है कि ये ज़ेवर, ये जवाहरात उसके लिए नहीं बने, न वह इन ज़ेवरों, इन जवाहरातों के लिए बनी है। यदि कभी कोई ज़ेवर पहन भी ले तो शीशे में खुद को देखकर गुस्सा हो जाती है- ‘ये तो मैं मैं ही नहीं रही’ और वह उसी वक्त सब कुछ उतार देती है। अपनी शक्ल उसे खुद ही अपरिचित लगती है।  कभी घड़ी पहना करती थी, वक्त देखना होता था। अब मैं साथ होता हूं, वह घड़ी भी नहीं पहनती, वक्त मुझसे ही पूछ लेती है।
        
तसव्वुर से मालामाल इस शायरा के पास यदि सचमुच पैसा होता, तो पता नहीं अब तक कितने खूबसूरत मकान और कितने हीरे-जवाहरात उसकी मल्क़ीयत होते।
        
खूबसूरती देखकर वह यूं मचलती है जैसे भूख, गरीबी, बेबसी, अन्याय, ज़बर और जहालत देखकर वह बेचैन हो उठती है, उदास हो जाती है। ये फ़कीरनी नाज़ुक मिजाज़ भी है और पोजेसिव भी। इस के मकान में कोई, कहीं कील भी नहीं गाड़ सकता। यदि कहीं कोई कील गाड़ रहा हो तो ये सहन नहीं कर सकती, ज़ख़्मी शेरनी की भाँति उसे खाने दौड़ती है मानो वह कील उसके अपने ज़िस्म पर लग रहा हो। कील लगाने वाला भला मैं होऊं या किराएदार। इस मालकिन से सबसे ज़्यादा तंग मैं हूँ क्योंकि मुझे अपने कमरे में तजुर्बे करते रहने का क्रेज़ है, दीवार तोड़ने से लेकर खिड़की बदलने तक। और मुझे अक्सर बड़ा सब्र और इंतज़ार करना पड़ता है, इस मालकिन के दिल्ली से कहीं बाहर जाने का। इस मालकिन, इस शेरनी की ऐसथैटिक्स ही मेरा बचाव है। वापसआकर नया तज़ुर्बा देखकर, चेंज देखकर, वह खुश होती है, तारीफ़ करती है, तोड़-फोड़ को भूल जाती है, बीत गई बात की भांति, गुज़रे कल की भांति।

        
अमृता की आधी से ज़्यादा उम्र बिस्तर पर गुज़री है परंतु बिस्तर पर वह सोई कम है, जगी ज़्यादा है। बेशक उसके उपन्यास और कहानियों के सभी पात्रों से पूछ लीजिए, क्योंकि उन्हें भी उनके साथ जगना पड़ा। जब अमृता की कलम लिख नही रही होती तब उसके दाएं हाथ की उंगली खुद-ब-खुद अक्सर लिखने लगती है - एक अक्षर, एक नाम। शायद किसी का नाम-शायद अपना ही नाम। और उसकी उंगली ये अक्षर, ये नाम बार-बार लिखती चली जाती है, हर चीज़ पर जो भी सामने हो, पहुंच के भीतर-पहुंच के बाहर। अपने घुटने से लेकर मेरे कंधे तक, अपनी चार दीवारी से लेकर हर दीवार तक.  यहां तक कि हवाएं, पानी, फूलों सुगंधों तक, वह हर चीज़ पर लिख रही महसूस होती है।  उसने खुद बताया था कि छुटपन में उसे चाँद में दिखाई देने वाली काली परछाईयां अक्षरों जैसी लगती थीं। शायद तब भी वह  परछाईयों को अपनी उंगली से अक्षर, एक नाम बना लेती थी - ज़रूर बना लेती होगी।  पर पता नहीं यह एक अक्षर - ये एक नाम, अपने आप में कैसी इबारत है या इबादत है, जो अब तक लिखते हुए भी मुकम्मल नहीं हुई। मैं बरसों से अमृता को ये लिखते देख रहा हूं। अमृता पता नहीं कब से लिख रही है?  ज़रूर तब से लिख रही है जब से उसका अस्तित्व है वर्ना उसके हाथ की उंगलियां इतनी छोटी और इतनी घिसी हुई न होतीं।

        
उसकी तबीयत अपने आप में एक कंट्रास्ट है। एक तरफ वह इतनी किफ़ायत करेगी कि रात की बासी रोटी भी ज़ाया न जाए, वह दूसरों को ताज़ी रोटी देकर खुद बासी रोटी खा लेगी, परंतु दूसरी तरफ ये तबीयत कि उसके बेटे ने जब आर्किटेक्ट की डिग्री ले ली तो इनामस्वरूप उसने यूरोप का टुअर मांगा। उसने उसी वक्त फोन करके एयर इंडिया वालों से कहा कि यूरोप का एक वापसी टिकट बना कर भेज दे। बिना किसी संकोच वह अपनी इस तबीयत से जीती जागती है - बिलकुल दिन और रात की भांति, एक दूसरे के विपरीत, परंतु सदा साथ-साथ। अमृता का चेहरा बहुत से रंग बदलता है- आसमां की भांति बल्कि आसमां से भी ज़्यादा और जल्दी। कभी दमकता-दमकता सा लगता है और कभी बुझा-बुझा सा। कभी नरम-नरम पिघला-पिघला सा और कभी पत्थर की भांति सख़्त और बेरहम। कभी हरेक के साथ हंसता-मुस्कराता और कभी सब के साथ ग़ैर और अजनबी। एक पल भरा-भरा छलकता जाम लगेगा और दूसरे पल खाली-खाली, वीरान-वीरान।  यहाँ तक कि अभी उसका चेहरा बहार का भरपूर नज़ारा होता है, रंगों- सुगंधों का दुमेल और अभी पतझड़ की भाँति बेरंग, बेमहक हो जाएगा। एक अजीब-ओ-गरीब मुँह हो जैसे एक सिक्के के कई पहलू, जैसे एक चेहरे में कितने ही चेहरे अपने आठों पहरों में कितने ही दिन और कितनी ही रातें लिए।

         
अमृता का चेहरा जितना हसीन है, खूबसूरत है, उतना ही मुश्किल, बल्कि मुश्किल ज़्यादा है। उसके चेहरे के भाव इतनी जल्दी बदलते हैं कि इस चेहरे को किसी रूप में रिकॉर्ड करना और वह भी मुकम्मल रिकॉर्ड करना बड़ा ही कठिन काम है। उस की तस्वीरें, स्केच और फोटोज़ अक्सर बहुत ही हार्ड और बहुत ही गैर अमृता होते हैं। अमृता खुद भी उन्हें देख कर दहल जाती है और उसके मुँह से निकल जाता है, ‘इट इज़ होरेबल - इट इज़ नॉट मी.....’

        
मैंने बहुत से चेहरे देखे हैं, चित्रित किए हैं।  मुझे कभी किसी का चेहरा इतना दिलचस्प और इतना कठिन कभी नहीं लगा। मुझे कभी किसी का चेहरा चित्रित करते समय खुद से संघर्ष नहीं करना पड़ा। परंतु अमृता का चेहरा तौब-तौबा !  पता नही किस होनी ने इस चेहरे की कल्पना की और गढ़ा है। इसके नैन नक्श जितने तराशे हुए हैं उतने ही कठिन भी हैं बल्कि चैलेजिंग भी। मैं बरसों से इस चेहरे को हैरत से देखता आ रहा हूँ कभी दूर खड़े रहकर, कभी क़रीब से।

        
एक दिन हम पालम से आ रहे थे। रास्ते में एयर फोर्स की एक नई बिल्डिंग आई तो मैंने अमृता से कहा, ‘तुम्हें याद है, शायरा, यहां एक खाली मैदान था, जहाँ तुमने तब कार सीखनी शुरू की थी...’  (परंतु एक साईकिल को टक्कर मारने के बाद उसने कार सीखनी छोड़ दी थी) कुछ देर अमृता सोचती रही और जब याद आया तो उसने गुस्से से मेरी तरफ देखकर कहा, ‘तुमने मुझे यूँ ही कार चलानी सीखने नहीं दी।’  मैंने कहा, ‘शायरा! तुमने साहित्य में बैलगाड़ियों, साईकलों, सकूटरों और छकड़े-ट्रकों की भीड़ से अपनी गाड़ी को सही सलामत रखा है - सही सलामत रखो। यही अपने आप में बहुत है। ये सड़कों के साईकिल, बैलगाड़ियां, ट्रक तुम मेरे जिम्मे रहने दो.....’

   
अमृता को किसी पर ऐतबार नही, न किसी वाद पर, न किसी इन्सान पर। मैं जब भी किसी आदमी के लफ्ज़ों पर ऐतबार करने लगता हूं, वह ख़तरे की लाल बत्ती की भाँति मेरी तरफ देखती है। मैं हरी झंडी को हाथ से नही छोड़ता, एक आदमी पर एक बार ऐतबार ज़रूर करता हूं।(वैसे अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि हर बार उसकी बात सच निकलती है और मेरा ऐतबार तिड़कता है) परंतु मैं स्वभावत: और कुछ ज़िद से फिर ऐतबार कर लेता हूं। मैं कहता हूं - ‘मैं एक आदमी को एक ऐतबार का मौका ज़रूर दूंगा।’  वह कहती है, ‘हिंदुस्तान की आबादी पचास करोड़ है, अत: तुम्हें पचास करोड़ बार ऐतबार करना पड़ेगा, लगे रहो दिन भर... ’

        
अमृता को सिर्फ़ खुद पर और अपने पात्रों पर ऐतबार है। कोई पात्र जब कहानी से बाहर हो वह ऐतबार योग्य नही होता। (बर्तन मंजवाने के बाद वह कटोरियां और चम्मचें गिनने लग जाती है) परंतु जब वह पात्र कहानी में आ जाए तो अपने पेशे के प्रति ईमानदार बन जाता है।
         ‘बस तुम मेरे इकलौते दोस्त हो’  वह कहती है।
         ‘पर तुम्हें मुझ पर ऐतबार कैसे आ गया ?’  मैं पूछता हूँ।
    ‘तुमने खुद ही तो कहा था कि तुम मेरे डॉक्टर देव उपन्यास के डॉक्टर देव हो।  वैसे कहानी मैंने पहले लिखी, तुम्हें देखा बाद में...ऐतबार शिकन की भीड़ में से तुम्हें छीन लिया, यह कम है ?’   ..... और वह फैज़ का शेर पढ़ने लगती है :
        ‘किसी का दर्द हो करते हैं तेरे नाम रकम
         गिला है जो भी किसी को तेरे सबब से है....’
        
और मैं दुनिया में जहां कहीं जो भी गलत होता है, उसका जवाबदेह बन जाता हूं।  वह बेशक अख़बार की यह ख़बर हो कि रात को बस में महिला यात्री अकेली रह गई, कंडक्टर और ड्राईवर ने ज़बरदस्ती करनी चाही, और उसने चलती बस से छलांग लगा दी, और भले ही चीन की कोई चालाकी हो, रूस की कोई धोखाधड़ी हो, अमरीका की कोई तानाशाही हो और पाकिस्तान का कोई झूठ हो - उसे मुझ पर गुस्सा आ जाता है....

        
एक फिलॉस्फर का कहना है, ‘इट इज़ चीटिंग टु बी कांइड यू मस्ट बी बोर्न कांइड आर नेवर मैडल विद इट...... ’
        
वह बौर्न आईडिलिस्ट है। बिटर कर मुंह से कुछ भी कहे, परंतु उसकी रग-रग में आईडिलिज्म है। कोई भी ऐतबार शिकन उसके भीतरी ऐतबार को नहीं तोड़ सका। वह बाहर से लाल बत्ती की भाँति जल  उठती  है, पर भीतर से हरे रंग की भाँति हरी और शांत रहती है। और जब वक्त आए वह फिर ज़िंदगी पर ऐतबार कर लेती है। बेशक बाद में उसे अपने ऐतबार का मर्सिया लिखना पड़ता है (जैसे उसकी कहानियों मोनालिज़ा नंबर दो, दो औरतां, नंबर पंज, कर्मा वाली, केले दा छिलका, चानण दा हौका ते टोस्ट, जनमजली, साल मुबारक और अन्य नज़्में). परंतु दुनिया के साथ उसके अपनत्व का आलम ये है कि उसके किसी समकालीन ने या किसी नए शायर ने कोई अच्छी नज़्म लिखी हो, वह उस नज़्म की पंक्तियां गुनगुनाती रहती है, मिलने आए हर व्यक्ति को सुनाती है, यूं जैसे उसके किसी बहुत अज़ीज़ की अदबी दुनिया में कोई उपलब्धि हो उस वक्त वह भूल जाती है कि उसके यही समकालीन उसके लिए कितने संगदिल - तंगदिल हैं परंतु उनकी जो कृति उसे अच्छी लगती है तो उसके लिए धूप चढ़ आती है - और उसकी तारीफ़ करते-करते वह खुद भी धूपरंगी हो जाती है।

पंजाबी से अनुवाद - नीलम शर्मा 'अंशु'
साभार - कथाक्रम, अक्तूबर-दिसंबर, 2010

सोमवार, अगस्त 09, 2010


पंजाबी शायर शिव कुमार बटालवी के 75 वें जन्मदिन
( 23जुलाई) पर विशेष






पंजाबी लेखक बलवंत गार्गी ने अपने दोस्तों पर बहुत से रेखाचित्र लिखे हैं। प्रस्तुत है उनकी पुस्तक हसीन चेहरे से साभार, शिव बटालवी पर लिखा उनका रेखाचित्र।






शिव बटालवी


0 बलवंत गार्गी



शिव बटालवी के साथ मेरा करार था। जब मैं चंडीगढ से दिल्ली अपनी कार में जाता तो उसे अपने साथ चलने के लिए कहता। रास्ते में बीयर की दो बोतलें, भुना हुआ मुर्गा तथा तीस रुपए नकद।



शिव स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से छुट्टी लिए बिना ही कई बार मेरे साथ दिल्ली जाता। शिव को न तो शराब पिलाने वालों की कमी थी और न ही मुर्गा खिलाने वालों की। वास्तव में उसके बारे में यह बात गलत प्रचारित थी कि लोग उसे शराब पिलाते थे। उसके पास यदि जेब में एक हजार रुपया होता तो वह दिन में ही दोस्तों को शराब पिलाने तथा खिलाने पर खर्च कर देता। वह शाही आदमी था और शाही फ़कीर। उस में खुद को बर्बाद करने की शक्ति थी।



उसने मुझसे कहा, ‘ये साली औरतें सदा रोती रहती है कि कि फलां मर्द ने मेरी अस्मत लूट ली। आप अपने हुस्न को बैंक के लॉकर में रख दें। मैं बैंक में काम करता हूँ। बहुत से लॉकर हैं वहाँ। नोटों की गड्डियां, सोने के ज़ेवर, हीरे। परंतु कोई ऐसा लॉकर नहीं जहाँ औरत अपने हुस्न या जवानी को रखकर चाबी जेब में डाल ले ? इस साले हुस्न ने तो तबाह होना ही है------- तो तबाही किस बात की ? प्यार से हुस्न चमकता है। जवानी मचती है। अस्मत का पाखंड तो कुरुप औरतों ने रचा है......इन्सानी जिस्म को कोई चीज़ मैला नहीं कर सकती । हमेशा निखरा तथा ताज़ा रहता है हुस्न।’



शिव के साथ कार में सफ़र करने का कोई सौदा नहीं था, यह तो एक प्रकार का प्यार था। मैं कार में लोगों को ढोने के हक में नहीं। सफ़र मेरे लिए बड़ी सूक्ष्म तथा आध्यात्मिक चीज़ है। यदि कोई यार साथ हो तो सौ मील का सफ़र मिनटों में कट जाता है। यदि कोई बोर आदमी साथ हो तो दो मील का सफ़र भी दो हज़ार मील लगता है।
एक दिन सुबह-सुबह शिव मेरे घर आया और कहने लगा, ‘आज शाम को कपूरथले में मुशायरा है। तुम मेरे साथ चलो।’



मैंने कहा, ‘मैं नहीं जा सकता। किसी और को ले जाओ।’
शिव ने कहा, ‘टैक्सी ले कर आऊंगा। अकेला। किसी और कंजर को मत बताना। चंडीगढ़ भरा पड़ा है मुफ़्तखोरों से। यूं ही साथ चल देंगे उठकर। मैं टैक्सी में सूअर को लाद कर ले जा सकता हूँ, परंतु किसी बोगस राईटर को नहीं। तुझे चलना पड़ेगा। मैं तुझे बीयर की तीन बोतलें तथा भुना हुआ मुर्गा खिलाऊंगा रास्ते में, साथ में तीस रुपए।’
मैंने कहा, ‘मेरा रेट पचास रुपए है।’ वह मान गया।



शिव को मुशायरे से पाँच सौ रुपए मिलने थे। प्रबंधकों ने यह बात छुपा रखी थी और चाहते थे कि शिव इस बारे में किसी और से बात न करे वर्ना दूसरे कवि नाराज़ हो जाएंगे।



पाँच सौ रुपयों में से शिव ने ढाई सौ रुपए टैक्सी के देने थे और शेष खर्च के लिए। शाम पाँच बजे वह टैक्सी ले कर आ पहुँचा। मुझे साथ लिया और टैक्सी भागने लगी।
शिव ने टैक्सी चालक से कहा, ‘सरदार जी, ज़रा इस कॉलोनी की तरफ गाड़ी घुमा दें। मुझे एक दोस्त से मिलना है।’
मैंने कहा – ‘पहले ही देर हो चुकी है।’
‘चिंता मत कर, दो मिनट ही तो मिलना है एक लड़की से। वह मेरी दोस्त है।’
टैक्सी कॉलोनी की सड़कों पर घूमती रही। शिव घर भूल गया था। न तो नंबर याद था, न गली। तीन-चार जगह टैक्सी रोक कर पूछा परंतु पता न चला। टैक्सी घूमकर मुड़ी तो नीम का एक पेड़ दिखा। शिव ने कहा, ‘बस यहीं रुकिए। यही है।’



टैक्सी से उतर कर उसने घंटी बजाई। एक युवती ने दरवाज़ा खोला। लंबे काले बाल, सुंदर नक्श।
शिव बोला, ‘थोड़ी देर के लिए आया हूँ। कहाँ है तेरा मियाँ ? ’
‘ड्यूटी पर गए हैं। कल लौटेंगे।’
‘अच्छा तो चाय पिलाओ मेरे दोस्त को। जानती हो न इन्हें ? ’
उसने मेरा परिचय करवाया।
वह चाय बनाने लगी। शिव जूतों सहित दीवान पर लेट गया।
मैंने इर्द-गिर्द नज़र डाली। दीवार पर एक बंदूक तथा कारतूसों की पेटी लटक रही थी। शायद किसी फौजी का घर था या वन विभाग के अधिकारी का। एक तरफ ऊंचे चमकते बूट।
वह चाय तथा बिस्कुट ले आई।



शिव ने कहा, ‘मैं चाय नहीं पीयूंगा। यह सिर्फ़ बलवंत के लिए है।’
वह आंगन में खेल रहे अपने बच्चे को ले आई। शिव ने उसके गालों को गुदगुदाया। फिर कहा – ‘मुझे मुशायरे में जल्दी पहुँचना है। तुम भी साथ चलो।’
उसने कहा – ‘मैं कैसे जा सकती हूँ। वे कल सुबह लौटेंगे।’ शिव ने लापरवाही से कहा- ‘कह देना शिव के साथ गई थी। तुझे वह कुछ नहीं कहेगा। अरे, शायर के साथ जा रही हो, किसी व्यापारी के साथ नहीं। चलो, जल्दी करो।’



यह कह कर शिव उठा और उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘शिव.... बस मेरा नाम ले देना, यूं ही मत डरो। चलो, जल्दी करो।’
मैंने सोचा, यह क्या बकवास किए जा रहा है। यदि कहीं इसके पति को पता चल जाए तो इसी बंदूक से दोनों को उड़ा देगा। मैं भी बीच में मारा जाऊंगा।
परंतु मैंने देखा कि वह महिला बच्चे को पड़ोसन के पास संभाल आई और शिव के साथ चल पड़ी। मुझे यह दृश्य अब तक नहीं भूलता कि वह खुले बालों की चोटी करती हुई शिव के साथ बैठी थी और टैक्सी कपूरथले की ओर भागी जा रही थी।
वहाँ पहुंचे तो साढ़े नौ बज चुके थे और मुशायरा चल रहा था।



यह मुशायरा गुरु नानक देव जी के पाँच सौवे प्रकाश उत्सव के उपलक्ष्य में था। प्रिंसीपल ओ. पी. शर्मा ने धूमधाम से यह मुशायरा रचाया था। स्टेज के पीछे शराब की छबील लगी हुई थी। शिव तथा मुझे देखते ही दो-तीन कर्मचारी आगे बढ़े। स्वागती आलिंगन किए और व्हिस्की के गिलास पेश किए। शिव ने पाँच-सात घूंटों में गिलास ख़त्म किया।
हम भीतर स्टेज पर गए तो शिव को देख कर पूरे हॉल में खुशी की लहर दौड़ गई और तालियों से सारा वातावरण गूंज उठा। दो-चार लड़कों तथा लड़कियों की जोशीली आवाज़ें भी सुनाई दीं।



स्टेज पर पच्चीस-तीस शायर विराजमान थे। इन में प्रो. मोहन सिंह, मीशा, साधु सिंह हमदर्द तथा बलराम भी थे। पाँच-छह कवियों ने हमारी उपस्थिति में कविताएं पढ़ीं तो उनकी विषय-वस्तु कुछ इस प्रकार थी – ‘बाबा नानक अब तुम मत आना। यहाँ रिश्वतें, झगड़े, बंटवारे, रगड़े। तुम मत आना।’ या फिर – ‘बाबा तुम आकर देखो देश में कितना भ्रष्टाचार है। गरीबों पर जुल्म होता है। लोग नंगे, भूखे फिरते हैं। तू आकर देख।’



मोहन सिंह ने अपने महाकाव्य ‘ननकायण’ में से नज़्म पढ़ी जिसमें वह तलवंडी की शाम का वर्णन करता है। सारी नज़में शाम, नाम, काम, धाम आदि शब्दों से भरी पड़ी थीं। मुशायरे में थकावट थी, ख़यालों का बुढ़ापा।
शिव उठा तो सारे हॉल में बेचैनी दौड़ गई। उसने नज़्म पढ़ी, सफ़र।
आँखें बंद कर, तथा बाँह ऊंची कर उसने माइक्रोफोन के सामने गुनगुनाया। नशीले धीमे स्वर लरज़े और लोगों के दिल की धड़कन की तारों को किसी ने मिज़राब से छेड़ा।
अचानक उसकी आवाज़ ऊंचे स्वरों में गूंजी। वह नानक को चुनौती दे रहा था। एक शायर दूसरे शायर से मुख़ातिब था। वह नानक से कह रहा था, ‘देख तेरी कौम में कितना सफ़र किया है, तुझसे आगे। यह आज पहुंची है नाम से तलवार तक।’



नाम से तलवार तक के शब्द गूंजे तो जवानों के सीने में सचमुच समूची कौम के निमन-चेतन की लालसाएं जाग उठीं। पूरे हॉल में शिव गूंज रहा था। उसका कद बहुत ऊँचा लग रहा था और उसकी आवाज़ में पैगंबरों वाला ओज़ था। लोगों में सिहरन पैदा करने की शक्ति, उन्हें रुलाने, जगाने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा।



हॉल में सन्नाटा था। बीच-बीच में हल्की सी आह निकलती थी। फिर जादूभरी मुग्धता। नज़्म ख़त्म हुई तो लड़कियों ने आवाज़ें दीं – ‘की पुच्छदे ओ, हाल फकीरां दा।’ शिव मु्स्कराया तथा नया मूड बनाने के लिए फिर से गुनगुनाया। नज़्म गाने लगा जो उसने सैंकड़ों बार गई थी और हर बार लोगों के दिल को छू गई थी । जब उसने ऊंचे स्वर में कहा –




‘तकदीर तां साडी सौकण सी
तदबीरां साथों न होईयां
न झंग छुटेया, न कन्न पाटे
झुंड लंग गिया, इंझ हीरां दा।’






हॉल में बैठे सभी लोग तड़प उठे। कॉलेज की लड़कियों के सीने में हूक उठी। वे हीरों का ही रूप थी। युवकों के सीने में साँपों ने डंक मारे क्योंकि वे सभी ऐसे रांझे थे जो कान नहीं पड़वा सके थे।



एक दर्द भरा माहौल छा गया। शिव तीन नज़में पढ़कर हटा तो कोई और शायर खड़ा न हो सका। समां टूट गया तथा मेला उजड़ गया।
शिव बाहर निकला तो उसने एक कर्मचारी से कहा- ‘कुत्तो, व्हिस्की क्या सिर्फ़ आते वक्त ही पिलानी थी ? गिलास लाओ।’



एक आदमी ने व्हिस्की का एक गिलास भर कर शिव को पकड़ाया और दूसरा मुझे। वहाँ एक मुंशी बैठा था जो शायरों को रुपए देकर रसीदें ले रहा था। उसने शिव को एक लिफ़ाफ़ा थमाया और रसीदी टिकट पर उसके दस्तखत ले लिए। शिव ने नोट गिने बिना ही लिफ़ाफ़ा जेब में डाल लिया।
हम तीनों बाहर निकले तो ओ. पी. शर्मा ने कहा कि डिनर की व्यवस्था उसके घर पर थी। सभी वहाँ चले गए।
शिव ने हामी भरी। हम इकट्ठे चल पड़े।
थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि शिव अंधेरे में कहीं गुम हो गया था।



सुबह मैं गहरी नींद में सोया पड़ा था, जब शिव ने आकर मुझे जगाया, ‘उठो अब वापिस चलें चंडीगढ़। उसे भी रास्ते में छोड़ना है। हम टैक्सी में बैठे हैं जल्दी करो।’
मैं तैयार होकर बाहर आया तो शिव तथा वह महिला मेरा इंतज़ार कर रहे थे। टैक्सी वापिस दौड़ने लगी। उसी कॉलोनी में नीम के पेड़ के पास रुकी। शिव तथा उसकी दोस्त बाहर निकले। घर के सामने जीप खड़ी थी।
वह बोली, ‘वे आ गए हैं।’
शिव ने कहा, ‘चल अंदर चलें। बलवंत, तुम भी आ जाओ।’
मैंने अंदर जाने से इन्कार कर दिया। मुझे दीवार पर टंगी बंदूक याद आ रही थी, कारतूसों की पेटी तथा चमकते ऊँचे बूट। अभी ही कोई घटना घटने वाली थी।
शिव ने मुझे खींच कर कहा - ‘आ यार, दो मिनट लगेंगे।’
मैं दुविधा में था। इस पागल ने......
शिव की दोस्त आगे थी तथा हम दोनों पीछे। पता नहीं क्या होगा अब।
शिव ने अंदर घुसते ही मुस्करा कर कहा, ‘ले भाई संभाल अपनी बीवी। मैं ले गया था मुशायरे में।’
वह सुंदर सा युवक था। बोला - ‘आईए, बैठिए, चाय पीकर जाईएगा।’
शिव ने कहा, ‘हमें जल्दी में हैं। हम चलते हैं।’ उसने झूमते हुए उसका आलिंगन किया और फिर हम चंडीगढ़ के लिए रवाना हुए।
मैं शिव की बेबाक कशिश पर चकित था और महिला की दिलेरी पर।

शिव एक संकल्प था, सृजनात्मकता का प्रतीक, एक ऐसी शक्ति जो शारीरिक होते हुए भी आध्यात्मिक थी।



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मैंने गुरु नानक देव पर लाईट ऐंड साउंड ड्रामा लिखा। इस नाटक के प्रदर्शन की रुप-रेखा तैयार की। इसके गीत शिव ने लिखे। वह एक महीना मेरे घर रहा। हम दोनों जन्म साखियों को पढ़ते तथा नाटक की बाणी के एक-एक शब्द का रसपान करते। शिव सुबह चार बजे उठ बैठता। रोज़ दो-तीन गीत लिखकर मुझ जगाता – ‘ले सुन।’

नानक के जन्म पर लिखा गीत उसने गाकर सुनाया –


‘हरिया नी मांए, हरिया नी भैणे।
हरिया ते भागी भरिया।
मेरे हरे दे चंद सूरज हाण......।’


इस जन्म पर तारे मिठाईयां बाँट रहे हैं । धरती उसक दाई......।



वह गा रहा था और मेरी आँखों में आँसू थे। उसने नानक के घर से चले जाने का गीत लिखा। किस प्रकार माता तृप्ता तथा सुलखणी नानक के बिछोड़े का संताप झेलती हैं। शिव ने ऊँची आवाज़ में सहराई के स्वरों में गाया -



‘इक दे सिर दा साँई चल्लिया
इक दी अक्ख दा नूर।
इक दे थण विच विरहा रोवे
इक दी माँग संधूर।’


उसने कहा, तुम सो रहे थे। मैंने सोचा एक नज़्म और लिख लूं। एक ग्रामीण लड़की कहती है –



‘कोठे चढ़ के कत्त लग्गी
आ पूणी नूं आग्ग पई
पट्टां दे विच्च पींघां पईयां
हुस्न जवानी रज्ज गई
सावे टोभे दे शीशे दी
चिप्पर-चिप्पर भज्ज गई।’



शिव ने यह नज़्म मुझे दिखाई। इसमें दो-चार पंक्तियां काटी हुई थी। ये पंक्तियां भी उसने काट दी थी –



‘खेतां विच्चों सूरज-रंगी
टौरे वाली पग गई।’



वह कई बार खूबसूरत पंक्तियां तथा अलंकार काट देता। ऐसी पंक्तियां जो कोई दूसरा शायर नहीं लिख सकता, शिव आसानी से लिख डालता। उसके शब्दों की सजावट में चमत्कार था, नाटकीयता थी। दो अलग शब्दों को तथा चित्रों को अजीब तरह से जोड़ता था। उसने बिंबों तथा प्रतीकों का ऐसा प्रयोग किया कि वे उसके नाम साथ ही जुड़ गए। किसी की हिम्मत नहीं थी कि ‘भट्ठी वालीए’ या ‘कंडियाली थोर’ या ‘सप्पणी’ या ‘चंदरे रुख’ या ‘पुठड़े तवे’ जैसे शब्दों का प्रयोग करे।



यदि वह प्यार का गीत लिखता या खुशी का तो उसी वक्त कब्रों या मृत्यु के विषय में भी गीत लिखता था। नानक पर रहस्यवादी कविता के बाद उसी वक्त उसने ‘उधाले’ पर नज़्म लिखी। वह ‘अलख़ बछड़ी’ की बात करता है जो सौ खूंटे उखाड़ कर भागी जाती है। एक में कहानी, नशा तथा वैराग्य है, दूसरी में जिस्म का शूकता वेग तथा वर्जित प्यार। शिव बहुपक्षीय तथा बहुमुखी कवि था।


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लंदन में उसे बी.बी.सी वालों ने कहा, ‘तुम ग़म के शायर हो, इसे बारे में कुछ बताओ।’
शिव ने कहा, ‘काहे का ग़म ? मुझे कोई ग़म नहीं। मुझे कोई ग़म नहीं, मज़े से शराब पीता हूँ। महबूबाओं ने प्यार दिया। बेशुमार लड़कियों ने इश्क किया। काफ़ी रुपया है। यार, दोस्त हैं। नेक बीवी है। काहे का ग़म। मुझे कोई ग़म नहीं। मैं ग़म की कविता लिखता हूँ हँसकर। मुझे अपना कोई ग़म नहीं। दुनिया का ग़म अवश्य मेरे भीतर है। जो शायर निज़ी ग़म का रोना रोते हैं, उनकी कविता फीकी होती है।’



जब मैं लंदन गया तो लोग महफ़िलों में उसकी बातें करते थे। गलासगो गया तो उसकी बात। टोरांटो गया तो उसके बात तथा न्यूयॉर्क की पंजाबी महफ़िलों में भी उसी की चर्चा।
वह मृत्यु के बाद एक मिथक बन गया है – मंटो की भाँति, सहगल की भाँति। यदि किसी ने शिव के साथ खाना खाया, या बस में सफ़र किया या शराब पी या उसकी तिल्ले वाली चप्पल ठीक की या रेशमी कुर्ता सिला तो वह गर्व से शिव की बात करता है। ऐसी शोहरत तथा प्यार किसी विरले को ही नसीब होता है।



शिव ने अपनी मृत्यु अठाईस साल की उम्र ही निर्धारित कर ली थी। कोई शक्ति उसे मरने से नहीं रोक सकती थी। जब किसी का नाम ही शिव बटालवी हो तो उसकी मौत जवानी में ही लिखी होती थी। उसने अपनी कलम से अपना मरसिया खुद लिखा।



वह भरी जवानी में मरने का इच्छुक था। एक बार शराब पीकर नशीली आँखों से देखते हुए वह मुझसे कहने लगा – ‘मैं बूढ़ा होकर नहीं मरना चाहता। बुड्ढे की मौत बड़ी ज़लील चीज़ है। जापान के समूराई सूरमे अपने जिस्म को सुडौल तथा खूबसूरत बनाते हैं। जब जिस्म की खूबसूरती चरम पर होती है तब वे अपने पेट में तलवार घोंप कर हाराकेरी की रस्म अदा करते हैं और मौत की गोद में समा जाते हैं। चैरी का फूल पूरी तरह खिलता है और बड़ी शान से गिरता है। मरना कोई चैरी के फूल से सीखे।’



शिव ने अपनी मौत की फूलों से तुलना की है। उसने जवानी में मरने की खूबसूरती का वर्णन किया और इसकी रस्म भी पूरी की। चंडीगढ़ में हम अक्सर मिलते। वह सर्दियों में मलागीरी कोट तथा मफ़लर पहन कभी-कभी स्टेट बैंक आता। वहाँ से उठकर मेरे साथ। मेरे बहुत मजबूर करने पर भी वह कॉफी न पीता। उसके खून में शराब इस क़दर घर कर गई थी कि चाय या कॉफी उसे अच्छी नहीं लगती थी। सिर्फ़ शराब ही उसके शरीर को शीतलता दे सकती थी। कई बार वह बिना सोडे या पानी के शराब की शीशी में से सीधे तीन-चार घूंट भर लेता जिससे उसका मन शांत तथा एकाग्र हो जाता। उसमें रचना-शक्ति दौड़ने लगती। वह पहले से भी ज़्य़ादा नम्र हो जाता। उसमें बर्दाश्त करने की ग़ज़ब की शक्ति थी।



नए शायर, नौजबान इन्कलाबी शायर, प्रयोगवादी शायर उसके विरुद्ध बोलते। उसे सामाजिक चेतना से वंचित कहते। भला ऐसी कविता का क्या मतलब, जब कि मुल्क में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, भूख है, और शिव चाँद, सूरज और कच्ची कंध मले दंदासा की बातें करता है। वह समाज से कट गया है।



ऐसे कवि पत्रिकाओं में उसके विरुद्ध लिखते रहे तथा मंचों पर बोलते रहे परंतु कोई भी मुशायरा शिव के बगैर मुकम्मल नहीं होता था। कवि सम्मेलनों में लोग पहली बात यही पूछते कि इस मुशायरे में शिव आ रहा है या नहीं।



शिव अपनी बढ़िया कला तथा सृजन शक्ति के बारे सजग था। लोग उसे निराशावादी कवि कहकर बदनाम करते रहे। कुछ उसे वासना का कवि कहते। कई लोग उसके कविता में से तकनीक गलतियां निकालते रहे। कई उसकी नकल करके उससे बेहतर कवि होने का दावा करते रहे पर शिव शोल की भाँति जलता रहा और रौशनी बिखेरता रहा।



उसने कहा, ‘सारी प्रकृति एक दूसरे की निंदा तथा प्रशंसा है। हमारा जन्म ही निंदा तथा प्रशंसा के संभोग से होता है। मेरा सबसे बड़ा निंदक या प्रशंसक मैं खुद हूँ। अपनी पीड़ा की निंदा मैंने अपने गीतों से की और मेरे गीतों की निंदा लोगों ने की। इसकी वजह मेरी शोहरत के प्रति ईर्ष्या के सिवा कुछ नहीं। ईर्ष्या हमेशा घटिया को बढ़िया से होती है।’



उसके जीवित रहते मैंने उस पर कई लेख लिखे, उसकी कई कविताओं का उसे साथ बिठाकर अंग्रेजी में अनुवाद किया परंतु उसकी मृत्यु के बाद पंजाबी में कोई लेख नहीं लिखा। प्रशंसात्मक लेख लिखने का काम मैंने उसके निंदकों के लिए छोड़ दिया था, जो बढ़-चढ़कर रोने तथा मातमी गीत गाने के लिए तत्पर थे।



शिव की मृ्त्यु एक निज़ी ग़म भी था और समूचा ग़म भी। ऐसी पीड़ा कई बार इन्सान के अंदर ही रह जाती है।अब शिव को गुज़रे बारह साल हो गए हैं। उस की कविता, उसकी याद, उसकी उदास हँसी, टिप्पणियां तथा झिंझोड़ डालने वाले गीत उसी तरह ताज़ा हैं। वह लंदन में पाँच-छह महीने रहकर वापस आया तो मैं उससे मिलने गया। 21 सेक्टर में उसने मकान बदल लिया था।



वहाँ पहुँचा ते देखा कि शिव के ड्रॉइंग रूम में गोल-मटोल रबड़ की फूली हुई कुर्सियां थी। कुछ विदेशी चीज़ें। उसका प्रशंसक तथा शिष्य दीपक मनमोहन भी वहीं बैठा था। एक लंबी लड़की किचन में रोटी बना रही थी, उसकी प्रशंसक। अरुण भी खुशी से काम कर रही थी। घर में खुशहाली थी।



शिव बातें करने लगा तो मैंने देखा कि वह उन छह महीनों में बदल गया था। उसके कपोल भर गए थे तथा उसके चेहरे पर धुएं जैसी एक छाया सी थी। मैं सोचता रहा कि क्या वह ज़्यादा सेहतमंद हो गया था या बीमार।



उसने कहा, ‘ये देख रबड़ की कुर्सियां। लंदन से लाया हूँ ये। इनमें हवा भरो और चाहे एक मन की औरत बैठ जाए, चाहे बारह मन की धोबिन....बड़ी देर हो गई बाईस्कोप देखे.... दिल्ली का कुतुबमीनार देखो, आगरे का ताज देखो, बारह मन की धोबिन देखो.....ये लोग कहाँ चले गए ?’

मैंने कहा, ‘लंदन की कोई बात सुना। क्या हाल है वहाँ के लोगों का ?’
‘सब पौंडों (पाउंड) के भूखे हैं । हर कोई शायर तथा लेखक। उन्होंने बर्तानिया को फ़तेह कर लिया है। वे पंजाब से आए लेखक की सेवा भी करते हैं और उससे नफ़रत भी। मुझे वहाँ पाकिस्तान की शायरा ... सर मुहम्मद इकबाल की पोती....बहुत खूबसूरत लड़की मुझ पर फिदा हो गई.....उसकी चिट्ठियां....और तीन चार और लड़कियों का....मैंने अचार डालना है इन लड़कियों का......शराब पिलाते मुझे तथा मेरे गीत सुनते...मैंने कह दिया था कि मैं पाँच सौ पाउंड लूंगा। एक शाम का.....और उन्होंन पैसे दिए.....घुटने टेककर। मैं तो शायर हूँ.....शिव......उनका बाप.... पर वह लड़की सायरा बानो....या नसीम बानो मुझ पर फिदा हो गई......पर मुझे क्या परवाह....मुझे घर याद आ रहा था...अरुण....बच्चे.....व्हिस्की .....मेरा बेटा......।’



इन टूटे-फूटे शब्दों नें शिव की सारी मानसिक स्थिति बयां कर दी। टुकड़े हुआ दिल...काँपते शब्द तथा बेढंगे वाक्य....इनमें अंदरूनी तर्क था। वह इस तरह बोल रहा था जैसे मुझे नहीं किसी और से कह रहा हो।



कई दिनों बाद पता चला कि शिव बीमार है। मैं उसे मिला तो उसकी बातें और भी उखड़ी हुई तथा बेतुकी थीं। मुझे अब तक याद है उसका धूंसर चेहरा तथा बुझी आँखें।



वह ज़िदगी से निराश हो गया था। निराशा के गहरे कुँए में डूब कर उसने कई ऐसी कविताएं लिखीं जो समूची परंपरा के विरुद्ध थीं। इनमें एक अजीब दिव्य-दृष्टि थी जो कई बार उस इन्सान में आ जाती है जो मृत्यु को देख रहा हो। जिसे किसी का डर न हो। जो अंधेरी कोठरी में छत फाड़ने वाली चीख़ मार सके ताकि सोए पड़े लोग जाग सकें। इसी मानसिक अवस्था में उसने कविताएं रचीं – कुत्ते, फाँसी, लुच्ची धरती। वह धरती को माता कहते-कहते थक गया था। इसके अलावा वह देख रहा था कि पाखंडी तथा हर प्रकार का साहित्यिक और राजनीतिक व्यक्ति धरती को माँ कह कर लूट रहा था। शिव ने धरती को ‘लुच्ची’ कह कर अपने इर्द-गिर्द को चौंकाया। परंपरागत नमस्कार को त्याग कर धरती गो क्रोध से लुच्ची कहा – जैसे कोई जवान बेटा अपनी माँ को गाली दे।



लोगों ने शिव को गालियां दी। शिव और क्रोधित हो गया तथा कहने लगा, ‘बेवकूफों ! कुत्तो मेरी बात सुनो। मैं सच कह रहा हूँ। मेरी बात सुनो।’
कई लोगों ने उसे ललकारा तथा कहा कि उसकी विचार-धारा उलटी है। शिव ने कहा – ‘हाँ, मैं उलटा हूँ – शीशे की भाँति आपका अक्स हूँ, जो आपको उलटा लगता है।’
धीरे-धीरे शिव अपने भीतर ही भीतर धंसता गया। लोगों ने जो कहा, उसी तरह का बन कर दिखाने की ज़िद में और भी बातें करने लगा, जिनमें हक़ीक़त की चिंगारियां थीं। कईयों ने कहा - शिव बतौर शायर मर गया है। वह बिलकुल मर गया है। शिव मरने के लिए तैयार हो गया।
मुझे पता चला कि शिव अस्पताल में है और मुझे याद कर रहा है। मैं अस्पताल गया तो वह प्राईवेट कमरे में चारपाई पर पड़ा था। दवा की शीशियां, अस्पताल की अजीब सी बू तथा घुटन। उसके पैरों की तरफ वही लंबी सुंदर युवती बैठी थी जो उसके घर रोटी बना रही थी।
एक रात वह अस्पताल से निकल कर चला गया। मैं अस्पताल में नहीं मरना चाहता। उसे फिर से अस्पताल में दाखिल किया गया। उसकी हालत बिगड़ती गई।



बिस्तर पर पड़ा वह कई बार ज़ोर-जो़र से रोता और आवाज़े लगाता – ‘मैं मर रहा हूँ। कहाँ है मेरे यार दोस्त ? कुत्तो मैं जा रहा हूँ। ढूंढोंगे शिव को !’



उसके अधिकतर दोस्त व्यस्त थे। किसी के पास वक्त नहीं था। साहित्य समारोह हो रहे थे। भाषण चल रहे थे। कॉफी हाउस में लेखकों, अध्यापकों तथा अख़बार वालों का जमघट लगा रहता था। उनके पास वक्त नहीं था कि शिव से मिलने जाएं।



मुझे एक शाम संदेसा मिला कि शिव मुझे याद कर रहा है। उसने मुझे फौरन मिलने के लिए कहा क्योंकि वह चंडीगढ़ छोड़ कर अगली सुबह बटाला जा रहा था। चंडीगढ़ उसे रास नहीं आया था। वह सेक्टर 21 के मार्केट के पिछवाड़े एक दोस्त के घर ठहरा हुआ था, जिस का पता मैंने नोट कर लिया था।



रात हो चुकी थी। सोचा सुबह उसे मिलने जाऊंग। मुझे डर लगा कि वह कहीं मुझे बिना मिलो न चला जाए। एक अजीब ख़ौफ़ तथा बेचैनी मेरे भीतर थी कि यदि वह बटाला चला गया तो पता नहीं कब मुलाकात हो।



मैं सुबह साढ़े पाँच बजे उठा, कार स्टार्ट की और सेक्टर 21 के उस पते पर गया। लोग सोए हुए थे। तीन मंजिले मकान शांत थे। मुझे वह मकान ढूंढने में कुछ समय लग गया। घबराहट बढ़ती गई।



अंत में जब मकान मिला तो पता चला कि शिव आधा घंटा पहले वहाँ से चला गया था।
मैंने पूछा – ‘कहाँ ?’
‘बटाला।’
मैंने फौरन कार घुमाई और बस अड्डे पर गया। बटाला जाने वाली बस का पता किया। आधा घंटा बस अड्डे पर घूमता रहा। शिव जा चुका था।



फिर पता लगा कि शिव अपनी बीवी तथा बच्चों सहित टैक्सी में बटाला गया था। उसकी हालत बहुत ख़राब थी। उसने टैक्सी को सेक्टर 22 के बत्तियों वाल चौंक पर रोका, जहाँ शाम को दोस्तों के साथ लोहे के जंगले के पास खड़ा होता था। उसने टैक्सी का दरवाज़ा खोला। नफ़रत से थूका और कहा – ‘कभी नहीं आऊँगा मैं इस कुत्ते शहर में।’



चंडीगढ़ पत्थरों का शहर था, बटाला लोहे का। दोनों शहरों ने उसे प्यार दिया, शिव ने इन शहरों को गीत दिए। दोनों शहरों को उसने प्यार भी किया और नफ़रत भी।
बटाला वह कुछ ही दिन रहा। फिर अरुण के साथ अपने ससुराल के गाँव चला गया जो पठानकोट से पंद्रह मील दूर पहाड़ के क़दमों में है।



यहाँ हरियाली थी, छोटे घर थे, खेत थे। शिव इस घर के चौबारे में रहा जहां अत्यंत गर्मी थी।
रात को उसे नींद न आती। कई बार वह आवाज़े देता और रोता। ‘मैं अकेला हूँ लोगों। मैं अकेला रह गया। कहाँ हैं मेरे यार ? ’



दूर खेतों में गीदड़ रोते और भांय-भांय करती रात में शिव की आवाज़ें खो जातीं। 6 मई, 1973 की रात को शिव की आत्मा सदा के लिए सो गई।


पंजाबी से अनुवाद – नीलम शर्मा अंशु’


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