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शनिवार, अप्रैल 18, 2026

कहानी -78 उनकी ट्रैजेडी (हिन्दी)

 (इस बार यह विशेष कहानी। विशेष इसलिए कि यह हमारे बाबूजी आदरणीय श्री रजनीकांत शुक्ल जी द्वारा लिखित है। इस कहानी का रचनाकाल संभवत: वर्ष 1941 और प्रकाशन समय मार्च, 1945 है। तब उनकी उम्र मात्र 21 वर्ष थी। बड़े भईया आदरणीय राजेन शुक्ल जी ने उनकी रचनाओं को बहुत जतन से सहेज रखा था। उस पिटारे में पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से प्राप्त पत्र भी शामिल हैं, जिनमें से कई पत्रिकाएं मेरे शहर कोलकाता से भी प्रकाशित होती रही हैं।कोलकाता हिन्दी साहित्यिक गतिविधियों का पुराना गढ़ रहा है। इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका सजनी के मार्च 1945 अंक में प्रकाशित इस कहानी को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का सुख-आनंद ले रही हूँ।)

                     उनकी ट्रेजेडी 

                                                                                                                                                            0  रजनीकांत शुक्ल

 

            रेखा को सदा से डायरी लिखने की आदत है। दिन भर की व्यस्तताओं से ऊब कर जब वह रात को कमरे में अकेली होती है, तब डायरी के उन पृष्ठों को खोलकर वह लिख लेती है वह याद जो उस समय तक एक विशेष सीमा लेकर उसके मन में घिरी होती है। सो आज भी वह डायरी लेकर बैठ गई है। पंखे के नीचे बैठी वह विद्युत के धवल प्रकाश पुंज में डायरी के सुनहरे कवर को देख रही है। गहरी नीलिमा में उसका आनन चमक रहा है। हाथों में मिडलिंग पेंसिल है। प्रथम पृष्ठ उसने खोला। आज सन् 41 की पहली जनवरी है - वर्ष का आरंभ। वह लिखने से पहले सोचने लगी भावुक सी।

            पीली सन्ध्या - समय पाँच बजे। पुल के ऊपर वह बैठी है। और सामने धवल वस्त्रों में भावेष्ठित एक गौरवर्ण सज्जन। आँखों में सुनहरी फ्रेम का चश्मा है, और पैरों में कानपुरी चप्पल। नीचे के बहते नीले जल में उनकी दृष्टि मग्न है। जिसमें अंबर के लाल पीले बादल विचित्र रेखा विस्तार कर रहे हैं। सामने का सूर्य पश्चिम के शयनागार में प्रविष्ट हो रहा है, और सज्जन की सम्पूर्ण आकृति भी अपने व्यक्तित्व को लेकर उसके मन में एक रेखा विस्तार कर रही है। उसके भीतर की रेखा और भी विस्तृत हो गई है। लीला ने कहा था - ये वही कलाकार हैं जिनकी इस मास वह कहानी छपी थी, जिस पर तूने कहा था कि लेखक के जीवन में मानों विषाद की गहरी छाया है। वह आगे बढ़ी, परिचय मात्र के लिए, और कहा - नमस्ते  प्रति स्वरूप कलाकार सज्जन ने भी दोनों हाथ जोड़ लिए।

            लेंसों के भीतर से उनकी आँखों की विस्मृत झांक पड़ी। और शब्दों के व्यंजन में - मैं आपको पहचान न सका। और शायद आप मुझे ... वह रुक गया और उसने कहा, कलाकार के व्यक्तित्व से कौन परिचित न होगा। नाम का संकेत तो केवल व्यक्ति विशेष के परिचय का आधार मात्र है।

            बस यहीं तक वह सोच सकी। डायरी का नया पृष्ठ जैसे जीवन का नया पृष्ठ खोल रही है वह। वर्ष के इस नूतन दिन में कलाकार का परिचय आया है। जिसने उसके भीतर की रेखा की और भी विस्तृत कर दिया है। क्या जाने वह कहाँ तक विस्तृत हो सकेगी।

            और उसने लिख लिया मात्र परिचय की उस बात को। जैसे लिखकर वह उसे और गाढ़ा कर रही है। सोचने लगी अनायास जो रेखा उसके भीतर उभर आई है। उसे क्यों न सृजन कर और आगे बढ़ाए। उसे गाढ़ा कर ले। मात्र परिचय की यह बात वह ऐसे कब तक निभा सकेगी, तभी सब ओर से उत्सुकता उभर कर उसके मानस तल में विभिन्न शब्द व्यंजना के रूप में अपना रेखा विस्तार करने लगी। मानती है वह कि अन्तर के रहस्य को बाह्य रेखाओं में व्यक्त न कर वह उन्हें अन्त:स्थल में लीन न रख सकेगी। इस रूप-रेखा के सृजन में उसका अपना जीवन चित्र ही वह खींच सकेगी। जहाँ काल के दूरन्त छोर में जब वह उन्हें पढ़ेगी, तब इसी रेखा आकलन में वह अपने अंकित चित्र को समझ लेगी और अप्रत्याशित रूप से सुख पा सकेगी। तब जैसे इसी सुख की कल्पना में वह डायरी बन्द कर अपने वर्तमान से उलझने लगी, इसी क्रम में वह न जाने कब रजनी के घोर अन्धियारे में वातायन के पार एक तारिका को निहार गंभीर निद्रा में मग्न हो गई। जहाँ उसका वर्तमान, भविष्य की रूप-रेखा को व्यक्त करने लगा।

                                                              o o o   

            सुबह की तेज धूप में जब रेखा उठी। तभी उसने अनुभव किया कि बाहर की प्रकाशमयी रेखा अब भी उसके भीतर अन्धकार में पूर्ववत् स्थिर है, और दिन भर की व्यस्तता में भी वह इसे न भूल सकेगी। तब उसी तरह संध्या की गहरी लालिमा में अपने को बिखेर वह चल पड़ी - उसी पुल की ओर - आशा, प्रतीक्षा, अर्चना सब कुछ लेकर। कलाकार के मुख पर आच्छन्न प्रशांत शून्यता के उस बिजड़ित आकार को भूल न सकी थी। तभी उसने अपने सब प्रतिबंधों को तोड़कर कलाकार के पास जा कहा - नमस्ते

            कुछ क्षण के विराम के बाद रेखा ने कहा - सचमुच आप बड़ी अच्छी कहानियां लिखते हैं। नारी जहाX विषाद की की काली छाया में डोलती है और पुरुष खेलता है उच्छृंखल सा, ट्रेजेडी को स्थान दे आप अपनी कहानियों में न मालूम एक कैसा अव्यक्त भाव दर्शा जाते हैं। जहाँ मैं सचमुच भूल जाती हूँ अपने आप को।

            और कलाकार अब संयत न रह सका।  कहा - पुरुष है जो अपनी अकिंचनताओं को नहीं भूला है और कामनाओं को लेकर भी उससे खेल सका है वह, तब भी उसने असंतोष ही पाया है। और नारी तुम जो कहती हो - सो उपेक्षिता है। जीवन की आवश्यकताओं का समझौता मात्र बन कर भी वह उपेक्षित ही रही है। और हाड़ - माँस के इन पुतलों में राग-द्वेष को लेकर जो अंतरद्वंद्व शेष है, उसे ही मैं व्यक्त कर पाता हूँ। तो देखता हूँ कि अंत में ट्रेजेडी ही शेष है। और आज के युग में अपनी भावनाओं को कब तक ट्रेजेडी से अलग एक अस्थिर सुख की कल्पना में प्रश्रय देता और तुम जो जानो मेरे स्वयं के जीवन के संतप्त बिखरे टुकड़ों में यह जो विषाद बिखरा है, सो भीतर की पीड़ा उभर आती है वैसी ही अरूप भावना में।

      रेखा सुनती रही - वैसी ही बैठी। कल्पनाओं में घिरी हुई। भावना उठती रही कि कलाकार के चरणों पर रख के अपना माथा, जहाँ वह सब भूल जाए कि मैं स्वयं भी अलग एक अस्तित्व हूँ। एक बार आँखें उठाकर देखा - कलाकार की बड़ी बड़ी आँखें लेंसों के पारदर्शक स्तर पर से विशेष ज्योति से झाँक रही हैं जहाँ व्यक्त हो रहा है उसका अस्फुट सा प्रतिबिंब।

      घोर अंधियारी रजनी के भीतर का प्रकाश जब बाहर फूट पड़ा तब धुंधली सी छाया छा गई अंबर के इस छोर से उस छोर तक। जहाँ तारिकाओं के झिलमिल में वह सोचने लगी कि कलाकार से उसका मेल हो जाए तो? और अभिज्ञात्य-वर्गीय उसका समाज? वह पुनः सिहर उठी। उसका पिता रायबहादुर - बड़े से बंगले में जो विलास और ऐश्वर्य की सामग्रियों से सजा है - रहता है। कब उसका पिता चाहेगा कि जीवन के चलते रिश्तों में उसकी पुत्री - रायबहादुर की लड़की - एक सस्ता समझौता कर ले।

      और यह भी वह सोच सकी है कि कब तक यह कलाकार - जिसके भीतर महत्त्वकांक्षा है। ऊँचा व्यक्तित्व है - उसकी बाह्य आवश्यकताओं की पूति कर लेगा। और उहापोह के जाल में वैसी ही उलझती गई - उलझती गई जैसे जाल में फंसी हुई मकड़ी छुटकारा पाने के लिए।

      बंगले के लकदक प्रकाश में साड़ी के सुनहरे छोर को दबाती हुई वह वैसे ही टहलने लगी। जहाँ उसकी आकांक्षा खुलकर खेलती हो। वह सोचती है क्यों आई उसके भीतर यह अरूप भावना जो न चाहकर भी वह उसे प्रश्रय दे सकी है-

      और डायरी के सफेद पृष्ठ जो नित्य वैसे ही भरते चले जाते हैं - उसके व्यक्त क्षणों को अपने भीतर छिपाए। जानकर भी न जान सकी है वह कि यूंही वह परिचय और घनिष्टता से परे प्रेम को स्थान दे बैठी है। जहाँ से पीछे लौटना असंभव सा हो रहा है।

      धवल पृष्ठों की ये काली रेखाएं उसके जीवन के भीतर की परिधि को वैसे ही नापकर उसका परिचय दे जाती हैं। सोचती है कौन जाने कलाकार भी यही सोचता हो तो। और क्यों नहीं?  कलाकार ही तो जीवन के उस स्वरूप की छवि को भी अंकित करने की चेष्टा करता है; जो अंतर के रहस्य को बाह्य रेखाओं में न लाकर उन्हें अन्त:स्थल में ही लीन रखने को विवश रहता है। परिस्थिति और कारण को लेकर वह मर्यादा की अवमानना नही कर सकती। तब वर्तमान - की उपेक्षा वह कैसे कर सकेगी। तभी सब ओर से घुमड़कर - एक बात उसके मन में घर कर गई। नीले अंबर के बादलों - सी जो घुमड़कर टीस मारती है कि वैभव की इस गति में वह जो अब तक चल सकी है तो कब वह उससे भटककर उस पथरीले पथ पर चल सकेगी। जहाँ पद-पद पर आशंका और असुविधा के दुर्गम कंकर बिछे हैं। और यह कलाकार जो उन्हीं को शोभन मानकर चला आ रहा है। जहाँ उसकी गति प्रतिहत नहीं होने पाती हैं। माना कि जीवन के किंचित अवधानों से परे वह अगर कलाकार का साथ देना चाहे तो कलाकार क्या उसे स्वीकार कर लेगा। और ऐसे ही अस्त-व्यस्त रेखाओं के जाल बुनती जब वह पथ का निर्माण कर रही थी, तभी आई महराजिन, कहा - बिटिया, बाबूजी न जाने कब से तुम्हारी राह देख रहे हैं। खाना मेज पर धरा ठंडा हो रहा है। और वैसे ही धूमिल रेखाओं में अपने को बिखेरती वह आ गई आलोक भरे कमरे के बीच।

      पिता ने कहा - क्या हुआ बेटी। आज ऐसी उदास सी क्यों हो? और देखो मि० सिन्हा आए थे। अभी-अभी वापिस चले गए। न मालूम तुम कहाँ थी। और देखो इस तरह अंधेरे बाग में न बैठा करो।

      रेखा सिहर उठी। वहीं जहाँ वह बैठी थी - पेड़ की ठूह से लगा मिट्टी का ऊँचा घरौंदा था, जिसमें असंख्य छिद्रों के बीच उसके भीतर का अँधियारा मानों आलोक भरे कमरे के बीच उसके आँखों के सामने चित्र रूप में आ खड़ा हुआ। कहीं कुछ काट लेता तो?

      पिता ने कहा - और देख रेखा, अब तो मैं न रुकूँगा। मैंने साथ तय कर लिया है। मि० सिन्हा भी अब प्रैक्टिस करने लगे हैं। और मैंने कह दिया है कि विवाह के बाद यह बंगला तुम्हारे प्रैक्टिस के लिए उपयुक्त ही होगा। और मैं... मैं जा रहा हूँ भ्रमण के लिए। जीवन की कोई आकांक्षा मेरे लिए नहीं रह गई है। और तुम्हीं हो बेटी। शेष यही आकांक्षा है कि तुम्हें सुख संपन्न और विवाहित देख सकूं।

      लेकिन रेखा? वह सोचती रही गुमसुम सी। आलोक भरे कमरे के बीच भी बाग के अंधियारे का वृक्ष उसके सामने आ खड़ा हुआ और उसके तने से लगा मिट्टी का ठूह - जिसके भीतर अंसख्य छिद्र हैं, और घोर अंधियारा है। वहीं से कुछ निकलकर उसे कहीं काट ले!

      वह चिल्ला उठी। हाथ से कौर गिर पड़ा। बेहोश हुई जा रही हैं वह। और पिता - अरे क्या हुआ रेखा... ?’ और रेखा के अस्त-व्यस्त शरीर को उन्होंने लिटा दिया काउच के ऊपर और गुलाब जल के छीटे डालने लगे उसके मुख पर। स्वप्नों की भाँति वह बड़बड़ा रही थी - कलाकार! वह मेरा है। नही... नहीं... पिता क्षमा करो! विवाह... हाँ मैं नहीं कर सकती और वह साँप... अरे वह आ रहा है...। और उसके बाद संज्ञाहीन हो गई।

                                       o o o

         घंटे भर के उपचार के बाद उसकी चेतना लौटी। मानसिक आघात वह छिपा रही थी। और तभी वह उठकर चली गई अपने शयन कक्ष में। विद्युत के धवल प्रकाश में वह डायरी खोल बैठ गई। जिसके आलोक में काली-काली चींटियां सी रेंगने लगी। द्वन्द्व है मानसतल में। और उसने लिखना शुरू किया एक पत्र......  मेरे जीवन के कलाकार! प्रथम और अंतिम पत्र लिख रही हूँ तुम्हें। एक दिन तुम्हीं ने कहा था - जीवन की आवश्यकताओं का समझौता मात्र है यह नारी। और परवशता के बीच घुटकर उसकी आकांक्षा है, जो मिट-मिटकर उसे अंकिचन बना डालती है। तुम आश्चर्य न करना। मैं तुम्हें प्यार करने लग गई थी। मैं जानती हूँ कि तुम इसे न पूछोगे क्योंकि कलाकार होकर तुम्हीं इसे अच्छी तरह समझ सकते हो। और सोचा था कि ऐसे ही एक दिन हम तुम एक डोर में बंध जाएंगे। जहाँ हम तुम एक रहेंगे। और में जानती थी कि मेरा पिता जीवन में ऐसा सस्ता समझौता मुझे नहीं करने देगा। पर फिर भी विवश थी। जानकर भी न मालूम क्यों तुम्हारी भावनाओं में उलझकर मैं तुम्हारे प्रेम को अपने भीतर प्रश्रय दे सकी। तो सुनो मेरा विवाह होने जा रहा है, परसों पूर्णिमा के पहले पहर में। जब मैं हो जाउँगी मि० सिन्हा बैरिस्टर की पतिप्राणा नारी। लेकिन चौंकना नहीं कि मैं तुम्हें बुला रही हूँ। निमंत्रण दे रही हूँ। अपने बलिदान को देखने के लिए। मुझे विश्वास है कि तुम आओगे।

      एक दिन तुम्हें ही मैंने माना था अपने बिलकुल समीप। तब उसी विश्वास को लेकर मैं तुम्हें एक चीज़ भेज रही हूँ। मेरे जीवन की सबसे कीमती चीज़ - यही डायरी। इन्हीं पृष्ठों के भीतर तुम मुझे पा सकोगे। और मैं - अब मैं एक हिन्दू पति प्राणा नारी हूँ। इसके लिए स्थान नहीं है मेरे पास। पाप होगा वह मेरे लिए। इसीलिए भूल जाना चाहती हूँ तुम्हें।

      और देखो। डायरी का अन्तिम पृष्ठ अधूरा हैं पूर्ण नहीं कर सकी हूँ मैं। वह सन् 41 की इकतीस दिसंबर है। पढ़कर तुम समझ लोगे। और क्या लिखूं। शेष और अन्तिम चुंबन।  

                                            तुम्हारी स्वप्नमयी रेखा।

      और कलाकार को जब से डायरी मिली है तब से एकान्त रजनी में वह उसे पढ़ा करता है। जैसे रात एक नशा है, एकान्त एक मोह। और सब ओर से हटकर उसकी विस्मृति अतीत को भूलकर वर्तमान में निहत हो गई है। और रेखा। वह सोचता है हम दोनों के बीच केवल अतीत की स्मृतियों का संबंध रह गया है। एक दिन आ गई थी यही रेखा, प्रभात की पीली किरण सी। और दिन भर की व्यस्तता के बाद जब उसने चाहा था कि रजनी के अंधियारे में छिपकर वह पा सकेगा अपना अनौचित्य सुख। तभी संध्या की बढ़ती कालिमा में वह वैसी ही गायब हो गई। और कलाकार के पास क्या रह गया- निर्वोध, निगूढ़ एक स्मृति। सोचता है कि रेखा के अलावा और कुछ याद करने की इच्छा नहीं होती।

                                  00000

                      लेखक परिचय - रजनीकांत शुक्ल

जन्म : 27 अप्रैल, 1924 बिलासपुर। रेलवे विभाग में बतौर कार्यालय अधीक्षक सेवानिवृत्त। देश भर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। 28 जनवरी 1986 को निधन। 

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                              प्रस्तुति व संपादन - नीलम शर्मा 'अंशु'

 

साभार : सजनी, मार्च - 1945 हेमिल्टन रोड, इलाहाबाद (रचनाकाल - 1941)

 

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कहानी -77 জুত্তি কসূরী पंजाबी से बांग्ला


   পঞ্জাবি গল্প                                          জুত্তি  কসূরী                    

                                                                                                  0   খালিদ হুসেইন      

                                                                                  অনুবাদ নীলম শর্মা অংশু

 

 

     নম্রতা আর আমি নৈনিতালের আর্মি স্কুলে একসঙ্গে পড়তাম। পরে সে দিল্লি বিশ্ববিদ্যালয় থেকে আর আমি কাশ্মীর বিশ্ববিদ্যালয় থেকে ইংরেজিতে এম. এ. করেছি। এই সময় আমাদের মধ্যে টেলিফোনের মাধ্যমে নিয়মিত যোগাযোগ বজায় ছিল। তারপর ভারতীয় প্রশাসনিক পরিষেবার পরীক্ষার কোচিংয়ের জন্য আমরা দুজন আবার দিল্লিতে মিলিত হলাম। আমরা দুজনেই প্রথম চেষ্টাতেই আই.এ.এস. পরীক্ষা পাশ করে নিলাম। আমাকে জম্মু-কাশ্মীর স্টেট ক্যাডার দেওয়া হলো এবং নম্রতাকে মহারাষ্ট্র। নম্রতার বিয়ে হয়েছিল মুম্বাইয়ের এক বড় শিল্পপতি পরিবারে, কিন্তু শ্বশুরমশাইয়ের অনুরোধে সে ভারতীয় প্রশাসনিক পরিষেবা থেকে ইস্তফা দিয়ে তাদের টেলিকম কোম্পানির চিফ এক্সিকিউটিভ হওয়ার প্রস্তাব গ্রহণ করল এবং খুব দক্ষতার সঙ্গে ব্যবসার প্রসার ঘটাল। এখন আমাদের কথাবার্তা কদাচিৎই হয়, আর তাও শুধু হাই-হ্যালো পর্যন্ত সীমাবদ্ধ।

     তখন আমি জম্মু প্রদেশের ডিভিশনাল কমিশনার ছিলাম, যখন একদিন নম্রতার ফোন এল
ইকবাল! আমি জম্মু আসছি, আমার দুই সন্তান আর সাংবাদিক বান্ধবী কে নিয়ে। আমি তোমার বাড়িতেই উঠব। আমার সঙ্গে কোম্পানির সার্ভে টিমও আসছে। তুমি তাদের জন্য কোনো ভালো হোটেলে থাকার ব্যবস্থা করে দিও। সব খরচ কোম্পানি বহন করবে। সে দিক থেকে তোমাকে একদম চিন্তা করতে হবে না। আমরা জম্মুতে টেলিকম ইউনিট বসাতে চাই।

     তিনচার দিন পর নম্রতা তার দলের সদস্যদের নিয়ে জম্মু পৌঁছে গেল। টিমের জন্য আমি এশিয়া হোটেলে ব্যবস্থা করে রেখেছিলাম, আর নম্রতা তার বাচ্চাদের ও সাংবাদিক বান্ধবী কে নিয়ে আমার সরকারি বাংলোয় এসে উঠল। ওর আমার বাড়িতে থাকা আমাকে খুবই আনন্দ দিয়েছিল। আমরা বড় আগ্রহ নিয়ে জীবনের পাতা উল্টেপাল্টে দেখছিলামশৈশব, কচি বয়স আর তরুণ বয়সের গল্পের স্মৃতিচারণ করেছিলাম, আর বর্তমান দায়িত্বের আক্ষেপ করে বলেছিলাম।

     সার্ভে টিম তাদের কাজ শেষ করে রিপোর্ট নম্রতার হাতে তুলে দিয়েছিল। তারা মীরাঁ সাহেবের নিকটবর্তী পুরনো অনাবাদি জমির ২০ একর মতো একটি প্লটকে উপযুক্ত বলে চিহ্নিত করেছিল। আমি ডেপুটি কমিশনার ও তহশিলদারকে তাড়াতাড়ি নথিপত্র প্রস্তুত করার নির্দেশ দিয়েছিলাম, যাতে জমির রেজিস্ট্রির প্রক্রিয়া শুরু করা যায়।

     একদিন আমরা সবাই ছাদে বসে সিয়ালকোট শহরের জ্বলজ্বলে আলো দেখছিলাম, তখন নম্রতা ও তার সাংবাদিক বান্ধবী সীমান্ত দেখার ইচ্ছা প্রকাশ করল। আমি রণবীর সিংহপুরার তহশিলদার কে ফোন করে সীমান্ত পরিদর্শনের ব্যবস্থা করতে বললাম। পরের দিন আমরা সবাই সুচেতগড় সীমান্তে পৌঁছালাম। সীমান্ত নিরাপত্তা বাহিনীর কর্মকর্তারা লাঞ্চের ব্যবস্থা করেছিলেন। তহশিলদার ও তার কর্মচারীরা, আর নিরাপত্তা বাহিনীর জওয়ানরা সেবার জন্য উপস্থিত ছিলেন। আমরা সবাই সেই হলেই লাঞ্চ করেছিলাম যেখানে ১৯৭৩ সালে ভারতপাকিস্তানের মিলিটারি কমান্ড যুদ্ধবিরতি কে বাস্তব নিয়ন্ত্রণরেখায় রূপান্তর করেছিল এবং এ-সংক্রান্ত মানচিত্রের আদানপ্রদান করেছিল।

     লাঞ্চের পরে আমি নম্রতা, তার বাচ্চাদের এবং সাংবাদিক বান্ধবী কে নিয়ে গেট পেরিয়ে নো ম্যানস ল্যান্ড’-এর মাঝখানে থাকা ব্যারিয়ার পর্যন্ত গেলাম, যার ওপারেই ছিল পাকিস্তানের জমি। খুঁটির পাশে কংক্রিটের তৈরি সীমান্ত স্তম্ভ দাঁড়িয়ে ছিল, যেটিকে এক পিপল গাছ তার শিকড়ে ঢেকে ফেলেছে। এখন এই পিপল গাছটি অর্ধেক ভারত আর অর্ধেক পাকিস্তান হয়ে গেছে। একে যদি রাজনৈতিক নির্যাতন না বলা যায়, তবে আর কী-ই বা বলবেন?

     ব্যারিয়ারের ওপারে পাকিস্তানি পাঞ্জাব থেকেও বিপুল সংখ্যক মানুষ সীমান্ত দেখার জন্য এসেছিল। পাকিস্তানি শিশু আর তরুণ-তরুণীরা আমাদের সঙ্গে হ্যান্ডশেক করে খুশি হচ্ছিল। আমাদের দিক থেকেও একই উষ্ণতা ছিল। তখন আমি দেখলাম, এক চঞ্চল তরুণীতার নিজের কুমারী স্বপ্নের মাদকতায় ভরা, দেহমাটি থেকে বৃষ্টিভেজা গন্ধ ছড়াতে ছড়াতেনম্রতার কাছে এসে দাঁড়াল। সে সালাম জানিয়ে নম্রতার খোঁজখবর নিতে লাগল। নম্রতাও তার সঙ্গে সহজভাবেই কথা বলতে লাগল। দুইজনেই গল্পে মেতে উঠল। হঠাৎ নম্রতার নজর পড়ল তার জরি-ওয়ালা পাঞ্জাবি জুতোর দিকে। নম্রতা জুতোর প্রশংসা করে জিজ্ঞেস করলএই সুন্দর জুতোটি কোথায় তৈরি?

    কসুরের জুতো। আপনি আমাদের সুরিন্দর কৌরের গান শোনেননি নাকিজুত্তি কসুরি, প্যারি ন্‌ পুরী, হায় রাব্বা ওয়ে সানু তুরণা পেয়াআর কসূরের জুত্তি আর খুস্‌সা (পুরূষদের জুতো) সারা দুনিয়ায় বিখ্যাত,” তরুণীটি বলল।

     সে একটি পায়ের জুতো খুলে নম্রতার দিকে বাড়িয়ে দিয়ে বলল, বাজি! আপনি পায়ে দিয়ে দেখে নিনকেমন মানায়।

     নম্রতা জুতোটি পায়ে দিল, আর সেটি পুরোপুরি ফিট হয়ে গেল। তখন তরুণীটি আরেক পায়ের জুতো টিও খুলে নম্রতার দিক এগিয়ে দিল। নম্রতা দুপায়ে জুতো পরে একটু হেঁটে দেখল।

    বাজি! এই জুত্তি আপনার পায়ে দারুণ মানিয়েছে,” পাকিস্তানি তরুণীটি স্নেহভরে বলল।

    তোমার নাম কী? তুমি কোথা থেকে এসেছ?”        

    আমার নাম আলিয়া খোখর। আমি দাস্কা থেকে সীমান্ত দেখতে এসেছি। দাস্কা সিয়ালকোটের কাছে একটি বড় শহর। আর আপনি কোথা থেকে এসেছেন?”


     নম্রতা জবাব দিল, “আমি মুম্বাই থেকে এসেছি, আর আমরাও সুচেতগড় সীমান্ত দেখতেই এখানে এসেছি।

    আপনার সঙ্গে দেখা হয়ে খুব আনন্দ পেলাম। আমার তো মন ভরে গেল। এখন আমার একটি ছোট্ট অনুরোধ আছে। দয়া করে না বলবেন না। আমার এই ছোট্ট ইচ্ছে পূরণ করে আমাকে সম্মান দেবেন আর আমার মান রাখবেন।

    হ্যাঁ হ্যাঁ, বলোতোমার ইচ্ছে কী?”

    বাজি,পা থেকে এই জুত্তি আর খুলবেন না। এটিকে ছোট বোনের উপহার মনে করে রাখুনএই দেখা-সাক্ষাৎকে স্মরণীয় করে দিন।

     নম্রতা বলল, তোমার ব্যবহার তো সত্যিই মানিক-মুক্তর মতো, কিন্তু আমি তোমার উপহার গ্রহণ করতে পারছি না। তুমি জুতো ছাড়া খালি পায়ে কীভাবে যাবে?” 

    আলিয়া হেসে বলল, বাজি, কোনো সমস্যা নেই। আপনি চিন্তা করবেন না। গেটের বাইরে আমার গাড়ি দাঁড়ানো আছে। তাতে আমার আরেক জোড়া জুতো রাখা আছে। আমি সহজেই গেট পর্যন্ত হেঁটে যেতে পারব।

     আমি নীরবে দাঁড়িয়ে এই মনোরম দৃশ্য দেখছিলাম। নম্রতা চোখ ফিরিয়ে আমার দিকে তাকাল। আমি ইশারায় তাকে উপহার গ্রহণ করতে বললাম। নম্রতা আলিয়াকে বুকে জড়িয়ে ধরল, তাকে দোয়া দিতে লাগল এবং বলল—“ঈশ্বর করুক আমাদের ভাগাভাগি করা নদীগুলো চিরদিন ভালোবাসার সুরে বয়ে যাক। কোনোদিন যেন এদের বুকে বন্যা না আসে।

     আলিয়া বলল, "আল্লাহ আপনার দোয়া কবুল করুন এবং দুই দেশের ওপর তাঁর রহমতের বৃষ্টি বর্ষণ করে যাক।


    নম্রতা খুব খুশিসে বেশ আবেগপ্রবণ হয়ে পড়েছিল। গাড়িতে বসে সে দুই দেশের শান্তিসম্প্রীতির জন্য প্রার্থনা করছিল। তারপর সে আমাকে বলল - ইকবাল!মুম্বাই পৌঁছে আমি এই হৃদয়স্পর্শী ঘটনাটি আমার চলচ্চিত্র প্রযোজক বন্ধুকে বলব এবং তাকে এই বিষয়টি নিয়ে একটি চলচ্চিত্র তৈরি করতে বলব, যাতে ঘৃণার দেয়াল ভাঙতে আমরাও একটু অবদান রাখতে পারি।

     নম্রতার সাংবাদিক বান্ধবীও চনমনে হয়ে উঠছিলসে বলল, আমিও সংবাদপত্রের জন্য এই সুন্দর সাক্ষাতের ওপর ভিত্তি করে একটি গল্প লিখব, তবে আমার গল্পটি এক নতুন মোড়ে গিয়ে শেষ হবে

    নতুন মোড়…!  সেটা আবার কী?”

    আমার গল্পে নম্রতা আলিয়াকে পাটিয়ালার জুত্তি উপহার দেবে।

    ধুর! তুমি এখানেও ফাঁকি  দেবে নাকি!
     নম্রতা হেসে তার বান্ধবী কে খোঁচা দিতে লাগলআর দুজনে হো হো করে হেসে উঠল।

 

                                               

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                                      লেখক পরিচিতি খালিদ হুসেইন

০১ এপ্রিল ১৯৪৫ সালে জম্মুকাশ্মীরের উধমপুরে জন্ম। স্নাতক ডিগ্রি এবং সাংবাদিকতায় ডিপ্লোমা। চল্লিশ বছরেরও বেশি সময় বিভিন্ন প্রশাসনিক পদে কর্মরত ছিলেন। উর্দু, হিন্দি, ইংরেজি, পাহাড়ি, গুজরি, ডোগরি, কাশ্মীরি এবং পাঞ্জাবি প্রভৃতি ভাষায় দক্ষ।

প্রখ্যাত জাতীয় ও আন্তর্জাতিক সাহিত্যিক পত্রিকায় প্রায় ১৫০টি গল্প প্রকাশিত। ৮০টির বেশি গল্প উর্দু, হিন্দি, ইংরেজি ও মালয়ালম ভাষায় অনূদিত। পাঞ্জাবিতে ১৩টি এবং উর্দুতে ৮টি গ্রন্থ প্রকাশিত। আত্মজীবনী মাট্টি কুদম করুন্দি ইয়ার এবং কিছু গল্প-সংকলন বিভিন্ন বিশ্ববিদ্যালয়ের পাঞ্জাবি এম.এ./এম.ফিল. পাঠ্যক্রমে অন্তর্ভুক্ত।

পুরস্কার
২০২১ সালে পাঞ্জাবি গল্প-সংকলন সূলাঁ দা স্যালন-এর জন্য সাহিত্য অকাদেমি পুরস্কার।
২০১৪ সালে পাঞ্জাব সরকারের ভাষা বিভাগ কর্তৃক শিরোমণি পাঞ্জাবি সাহিত্যকার সম্মান।
জম্মু ও কাশ্মীরের শিল্প, সংস্কৃতি ও ভাষা অকাদেমি কর্তৃক তে জেলম বাগদা রেহা এবং গোরি ফসল দে সৌদাগর গল্প-সংকলনের জন্য প্রথম পুরস্কার প্রাপ্ত।

   কৃতজ্ঞতা জ্ঞাপন - নির্বাচিত পঞ্জাবি গল্প সংকলন, জানুয়ারি ২০২৬ (ভাষা সংসদ, কলকাতা)

योगदान देने वाला व्यक्ति