(इस बार यह विशेष कहानी। विशेष इसलिए कि यह हमारे बाबूजी आदरणीय श्री रजनीकांत शुक्ल जी द्वारा लिखित है। इस कहानी का रचनाकाल संभवत: वर्ष 1941 और प्रकाशन समय मार्च, 1945 है। तब उनकी उम्र मात्र 21 वर्ष थी। बड़े भईया आदरणीय राजेन शुक्ल जी ने उनकी रचनाओं को बहुत जतन से सहेज रखा था। उस पिटारे में पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से प्राप्त पत्र भी शामिल हैं, जिनमें से कई पत्रिकाएं मेरे शहर कोलकाता से भी प्रकाशित होती रही हैं।कोलकाता हिन्दी साहित्यिक गतिविधियों का पुराना गढ़ रहा है। इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका सजनी के मार्च 1945 अंक में प्रकाशित इस कहानी को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का सुख-आनंद ले रही हूँ।)
उनकी ट्रेजेडी
0 रजनीकांत शुक्ल
रेखा को सदा से डायरी लिखने की आदत है। दिन भर
की व्यस्तताओं से ऊब कर जब वह रात को कमरे में अकेली होती है, तब डायरी के उन पृष्ठों
को खोलकर वह लिख लेती है वह याद जो उस समय तक एक विशेष सीमा लेकर उसके मन में घिरी
होती है। सो आज भी वह डायरी लेकर बैठ गई है। पंखे के नीचे बैठी वह विद्युत के धवल प्रकाश
पुंज में डायरी के सुनहरे कवर को देख रही है। गहरी नीलिमा में उसका आनन चमक रहा है।
हाथों में मिडलिंग पेंसिल है। प्रथम पृष्ठ उसने खोला। आज सन् 41 की पहली जनवरी है -
वर्ष का आरंभ। वह लिखने से पहले सोचने लगी भावुक सी।
पीली सन्ध्या - समय पाँच बजे। पुल के ऊपर वह बैठी है। और सामने धवल वस्त्रों में
भावेष्ठित एक गौरवर्ण सज्जन। आँखों
में सुनहरी फ्रेम का चश्मा है, और पैरों में कानपुरी चप्पल। नीचे के बहते नीले
जल में उनकी दृष्टि मग्न है। जिसमें अंबर के लाल पीले बादल विचित्र रेखा विस्तार कर
रहे हैं। सामने का सूर्य पश्चिम के शयनागार में प्रविष्ट हो रहा है, और सज्जन की सम्पूर्ण
आकृति भी अपने व्यक्तित्व को लेकर उसके मन में एक रेखा विस्तार कर रही है। उसके भीतर
की रेखा और भी विस्तृत हो गई है। लीला ने कहा था - ये वही कलाकार हैं जिनकी इस मास
वह कहानी छपी थी, जिस पर तूने कहा
था कि लेखक के जीवन में मानों विषाद की गहरी छाया है। वह आगे बढ़ी, परिचय मात्र के लिए, और कहा - ‘नमस्ते’। प्रति स्वरूप कलाकार
सज्जन ने भी दोनों हाथ जोड़ लिए।
लेंसों के भीतर से उनकी आँखों की विस्मृत झांक
पड़ी। और शब्दों के व्यंजन में - मैं आपको पहचान न सका। और शायद आप मुझे ... वह रुक
गया और उसने कहा, ‘कलाकार के व्यक्तित्व
से कौन परिचित न होगा। नाम का संकेत तो केवल व्यक्ति विशेष के परिचय का आधार मात्र
है।’
बस यहीं तक वह सोच सकी। डायरी का नया पृष्ठ जैसे
जीवन का नया पृष्ठ खोल रही है वह। वर्ष के इस नूतन दिन में कलाकार का परिचय आया है।
जिसने उसके भीतर की रेखा की और भी विस्तृत कर
दिया है। क्या जाने वह कहाँ तक विस्तृत हो सकेगी।
और उसने लिख लिया मात्र परिचय की उस बात को। जैसे लिखकर वह उसे और गाढ़ा कर रही है। सोचने लगी अनायास जो रेखा उसके भीतर उभर आई है। उसे क्यों न सृजन कर और आगे बढ़ाए। उसे गाढ़ा कर ले। मात्र परिचय की यह बात वह ऐसे कब तक निभा सकेगी, तभी सब ओर से उत्सुकता उभर कर उसके मानस तल में विभिन्न शब्द व्यंजना के रूप में अपना रेखा विस्तार करने लगी। मानती है वह कि अन्तर के रहस्य को बाह्य रेखाओं में व्यक्त न कर वह उन्हें अन्त:स्थल में लीन न रख सकेगी। इस रूप-रेखा के सृजन में उसका अपना जीवन चित्र ही वह खींच सकेगी। जहाँ काल के दूरन्त छोर में जब वह उन्हें पढ़ेगी, तब इसी रेखा आकलन में वह अपने अंकित चित्र को समझ लेगी और अप्रत्याशित रूप से सुख पा सकेगी। तब जैसे इसी सुख की कल्पना में वह डायरी बन्द कर अपने वर्तमान से उलझने लगी, इसी क्रम में वह न जाने कब रजनी के घोर अन्धियारे में वातायन के पार एक तारिका को निहार गंभीर निद्रा में मग्न हो गई। जहाँ उसका वर्तमान, भविष्य की रूप-रेखा को व्यक्त करने लगा।
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सुबह की तेज धूप में जब रेखा उठी। तभी उसने अनुभव
किया कि बाहर की प्रकाशमयी रेखा अब भी उसके भीतर अन्धकार में पूर्ववत् स्थिर है, और दिन भर की व्यस्तता
में भी वह इसे न भूल सकेगी। तब उसी तरह संध्या की गहरी लालिमा में अपने को बिखेर वह
चल पड़ी - उसी पुल की ओर - आशा, प्रतीक्षा, अर्चना सब कुछ लेकर। कलाकार के मुख पर आच्छन्न
प्रशांत शून्यता के उस बिजड़ित आकार को भूल न सकी थी। तभी उसने अपने सब प्रतिबंधों को तोड़कर
कलाकार के पास जा कहा - ‘नमस्ते’।
कुछ क्षण के विराम के बाद रेखा ने कहा - ‘सचमुच आप बड़ी अच्छी
कहानियां लिखते हैं। नारी जहाX विषाद की की काली
छाया में डोलती है और पुरुष खेलता है उच्छृंखल सा,
ट्रेजेडी को स्थान दे आप अपनी कहानियों में न
मालूम एक कैसा अव्यक्त भाव दर्शा जाते हैं। जहाँ मैं सचमुच भूल जाती हूँ अपने आप को।’
और कलाकार अब संयत न रह सका। कहा - ‘पुरुष है जो अपनी अकिंचनताओं को नहीं भूला है और कामनाओं
को लेकर भी उससे खेल सका है वह, तब भी उसने असंतोष ही पाया है। और नारी तुम जो
कहती हो - सो उपेक्षिता है। जीवन की आवश्यकताओं का समझौता मात्र बन कर भी वह उपेक्षित
ही रही है। और हाड़ - माँस के इन पुतलों में राग-द्वेष को लेकर जो अंतरद्वंद्व शेष
है, उसे ही मैं व्यक्त
कर पाता हूँ। तो देखता हूँ कि अंत में ट्रेजेडी ही शेष है। और आज के युग में अपनी भावनाओं
को कब तक ट्रेजेडी से अलग एक अस्थिर सुख की कल्पना में प्रश्रय देता और तुम जो जानो
मेरे स्वयं के जीवन के संतप्त बिखरे टुकड़ों में यह जो विषाद बिखरा है, सो भीतर की पीड़ा
उभर आती है वैसी ही अरूप
भावना में।’
रेखा सुनती रही - वैसी ही बैठी। कल्पनाओं में
घिरी हुई। भावना उठती रही कि कलाकार के चरणों पर रख के अपना माथा, जहाँ वह सब भूल जाए
कि मैं स्वयं भी अलग एक अस्तित्व हूँ। एक बार आँखें उठाकर देखा - कलाकार की बड़ी बड़ी
आँखें लेंसों के पारदर्शक स्तर पर से विशेष ज्योति से झाँक रही हैं जहाँ व्यक्त हो
रहा है उसका अस्फुट सा प्रतिबिंब।
घोर अंधियारी रजनी के भीतर का प्रकाश जब बाहर
फूट पड़ा तब धुंधली सी छाया छा गई अंबर के इस छोर से उस छोर तक। जहाँ तारिकाओं के झिलमिल में वह सोचने
लगी कि कलाकार से उसका मेल हो जाए तो? और अभिज्ञात्य-वर्गीय उसका समाज? वह पुनः सिहर उठी।
उसका पिता रायबहादुर - बड़े से बंगले में जो विलास और ऐश्वर्य की सामग्रियों से सजा
है - रहता है। कब उसका पिता चाहेगा कि जीवन के चलते रिश्तों में उसकी पुत्री - रायबहादुर
की लड़की - एक सस्ता समझौता कर ले।
और यह भी वह सोच सकी है कि कब तक यह कलाकार
- जिसके भीतर महत्त्वकांक्षा है। ऊँचा व्यक्तित्व
है - उसकी बाह्य आवश्यकताओं की पूति कर लेगा। और उहापोह के जाल में वैसी ही उलझती गई - उलझती गई जैसे जाल में फंसी हुई मकड़ी छुटकारा पाने के
लिए।
बंगले के लकदक प्रकाश में साड़ी के सुनहरे छोर
को दबाती हुई वह वैसे ही टहलने लगी। जहाँ उसकी आकांक्षा खुलकर खेलती हो। वह सोचती है
क्यों आई उसके भीतर यह अरूप
भावना जो न चाहकर भी वह उसे प्रश्रय दे सकी है-
और डायरी के सफेद पृष्ठ जो नित्य वैसे ही भरते
चले जाते हैं - उसके व्यक्त क्षणों को अपने भीतर छिपाए। जानकर भी न जान सकी है वह कि
यूंही वह परिचय और घनिष्टता से परे प्रेम को स्थान दे बैठी है। जहाँ से पीछे लौटना
असंभव सा हो रहा है।
धवल पृष्ठों की ये काली रेखाएं उसके जीवन के
भीतर की परिधि को वैसे ही नापकर उसका परिचय दे जाती हैं। सोचती है कौन जाने कलाकार
भी यही सोचता हो तो। और क्यों नहीं? कलाकार
ही तो जीवन के उस स्वरूप की छवि को भी अंकित करने की चेष्टा करता है; जो अंतर के रहस्य
को बाह्य रेखाओं में न लाकर उन्हें अन्त:स्थल में ही लीन
रखने को विवश रहता है। परिस्थिति और कारण को लेकर वह मर्यादा की अवमानना नही कर सकती।
तब वर्तमान - की उपेक्षा वह कैसे कर सकेगी। तभी सब ओर से घुमड़कर - एक बात उसके मन
में घर कर गई। नीले अंबर के बादलों - सी जो घुमड़कर टीस मारती है कि वैभव की इस गति
में वह जो अब तक चल सकी है तो कब वह उससे भटककर उस पथरीले पथ पर चल सकेगी। जहाँ पद-पद
पर आशंका और असुविधा के दुर्गम कंकर बिछे हैं। और यह कलाकार जो
उन्हीं को शोभन मानकर चला आ रहा है। जहाँ उसकी गति प्रतिहत नहीं होने पाती हैं। माना कि जीवन के किंचित अवधानों से परे वह अगर कलाकार का साथ देना चाहे तो कलाकार क्या उसे
स्वीकार कर लेगा। और ऐसे ही अस्त-व्यस्त रेखाओं के जाल बुनती जब वह पथ का निर्माण कर
रही थी, तभी आई महराजिन, कहा - ‘बिटिया, बाबूजी न जाने कब
से तुम्हारी राह देख रहे हैं। खाना मेज पर धरा ठंडा हो रहा है।’ और वैसे ही धूमिल रेखाओं में अपने को बिखेरती
वह आ गई आलोक भरे कमरे के बीच।
पिता ने कहा - ‘क्या हुआ बेटी। आज ऐसी उदास सी क्यों हो? और देखो मि० सिन्हा
आए थे। अभी-अभी वापिस चले गए। न मालूम तुम कहाँ थी। और देखो इस तरह अंधेरे बाग में
न बैठा करो।’
रेखा सिहर उठी। वहीं जहाँ वह बैठी थी - पेड़
की ठूह से लगा मिट्टी का ऊँचा घरौंदा था, जिसमें असंख्य छिद्रों के बीच उसके भीतर का
अँधियारा मानों आलोक भरे कमरे के बीच उसके आँखों के सामने चित्र रूप में आ खड़ा हुआ।
कहीं कुछ काट लेता तो?
पिता ने कहा - ‘और देख रेखा,
अब तो मैं न रुकूँगा। मैंने साथ तय कर लिया है।
मि० सिन्हा भी अब प्रैक्टिस करने लगे हैं। और मैंने कह दिया है कि विवाह के बाद यह
बंगला तुम्हारे प्रैक्टिस के लिए उपयुक्त ही होगा। और मैं... मैं जा रहा हूँ भ्रमण
के लिए। जीवन की कोई आकांक्षा मेरे लिए नहीं रह गई है। और तुम्हीं हो बेटी। शेष यही
आकांक्षा है कि तुम्हें सुख संपन्न और विवाहित देख सकूं।’
लेकिन रेखा?
वह सोचती रही गुमसुम सी। आलोक भरे कमरे के बीच
भी बाग के अंधियारे का वृक्ष उसके सामने आ खड़ा हुआ और उसके तने से लगा मिट्टी का ठूह
- जिसके भीतर अंसख्य छिद्र हैं, और घोर अंधियारा है। वहीं से कुछ निकलकर उसे कहीं
काट ले!
वह चिल्ला उठी। हाथ से कौर गिर पड़ा। बेहोश हुई जा रही हैं वह। और पिता - ‘अरे क्या हुआ रेखा... ?’ और रेखा के अस्त-व्यस्त शरीर को उन्होंने लिटा दिया काउच के ऊपर और गुलाब जल के छीटे डालने लगे उसके मुख पर। स्वप्नों की भाँति वह बड़बड़ा रही थी - ‘कलाकार! वह मेरा है। नही... नहीं... पिता क्षमा करो! विवाह... हाँ मैं नहीं कर सकती और वह साँप... अरे वह आ रहा है...।’ और उसके बाद संज्ञाहीन हो गई।
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एक दिन तुम्हें ही मैंने माना था अपने बिलकुल
समीप। तब उसी विश्वास को लेकर मैं तुम्हें एक चीज़ भेज रही हूँ। मेरे जीवन की सबसे
कीमती चीज़ - यही डायरी। इन्हीं पृष्ठों के भीतर तुम मुझे पा सकोगे। और मैं - अब मैं
एक हिन्दू पति प्राणा नारी हूँ। इसके लिए स्थान नहीं है मेरे पास। पाप होगा वह मेरे
लिए। इसीलिए भूल जाना चाहती हूँ तुम्हें।
और देखो। डायरी का अन्तिम पृष्ठ अधूरा हैं पूर्ण नहीं कर सकी हूँ मैं। वह सन् 41 की इकतीस दिसंबर है। पढ़कर तुम समझ लोगे। और क्या लिखूं। शेष और अन्तिम चुंबन।’
तुम्हारी स्वप्नमयी रेखा।
और कलाकार को जब से डायरी मिली है तब से एकान्त
रजनी में वह उसे पढ़ा करता है। जैसे रात एक नशा है,
एकान्त एक मोह। और सब ओर से हटकर उसकी विस्मृति
अतीत को भूलकर वर्तमान में निहत हो गई है। और रेखा। वह सोचता है हम दोनों के बीच केवल
अतीत की स्मृतियों का संबंध रह गया है। एक दिन आ गई थी यही रेखा, प्रभात की पीली किरण
सी। और दिन भर की व्यस्तता के बाद जब उसने चाहा था कि रजनी के अंधियारे में छिपकर वह
पा सकेगा अपना अनौचित्य सुख। तभी संध्या की बढ़ती कालिमा में वह वैसी ही गायब हो गई।
और कलाकार के पास क्या रह गया- निर्वोध, निगूढ़ एक स्मृति।
सोचता है कि रेखा के अलावा और कुछ याद करने की इच्छा नहीं होती।
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लेखक परिचय - रजनीकांत शुक्ल
जन्म : 27 अप्रैल, 1924 बिलासपुर। रेलवे विभाग में बतौर कार्यालय अधीक्षक सेवानिवृत्त। देश भर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। 28 जनवरी 1986 को निधन।
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प्रस्तुति व संपादन - नीलम शर्मा 'अंशु'
साभार : सजनी, मार्च - 1945 हेमिल्टन रोड, इलाहाबाद। (रचनाकाल - 1941)
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