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शनिवार, मई 14, 2011

धारावाहिक बांग्ला उपन्यास - 2

(प्रस्तुत है बाग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा के उपन्यास का हिन्दी रूपांतर गोधूलि गीत। बांग्ला  में उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से वे पहली बार हिन्दी पाठकों से रू-ब-रू हो रहे हैं।)
        अब तक आप पढ़ चुके हैं कि अरुण गांगुली शमीक के ऑफिस में तशरीफ लाते हैं और उसके गले से लग क्षमा याचना के दौरान बेहोश हो जाते हैं। शमीक उन्हें अपने घर ले आता है और अच्छे-अच्छे डॉक्टरों से उनका इलाज करवाता है। लाख कोशिशों के बावजूद वह उन्हें बचा नहीं पाता। एक अजनबी वृद्ध के प्रति शमीक की यह बेचैनी और व्याकुलता को देख उसकी पत्नी अभिरूपा भी हैरत में पड़ जाती है। पत्नी की उत्सुकता के निदान के लिए शमीक उसे पूरी कहानी फ्लैश बैक में सुनाता है। चलिए आप भी सुनिए शमीक की ज़बानी....
 गोधूलि गीत
0 समीरण गुहा
        नागपुर स्टेशन से बाहर आकर शमीक नामक असहाय लड़का एक दिन ठिठक कर रुक गया था। टैक्सी, ताँगा और स्कूटर चालकों ने मक्खियों की भाँति उसे घेर रखा था। कहाँ जाओगे साब ? आईए न मेरी गाड़ी में - बिलकुल पक्षीराज है। बहुत जल्दी पहुँचा दूंगा। शमीक चुपचाप  सुनता रहा। इधर-उधर देखते हुए वह खुद ही समझ नही पा रहा था कि अब उसे क्या करना चाहिए ? बहुत सी चिंताएं एक साथ उसके दिमाग में उलझ कर रह गई थीं। इसी बीच वे टैक्सी, ताँगे और स्कूटर वाले उससे कोई प्रतिक्रिया न पाकर उसे एक बेकार आगंतुक समझ मुसाफिरों की तलाश में आगे बढ़ गए।

      उस समय सुबह के साढ़े ग्यारह या पौने बारह बज रहे होंगें। जनवरी का महीना ख़त्म होने को था। सर्दी है लेकिन दोपहर की तीखी धूप पूरे बदन में अलग तरह की ही गर्माहट का आभास दे रही थी। उस उष्ण मौसम का लुत्फ उठाने का मन शमीक का नहीं था। शून्य निगाहों से वह चारों तरफ देखने लगा। दरअसल बटुया खो जाने के कारण विपत्तियों का पहाड़ उस पर टूट पड़ा था। बटुए में चार सौ रुपए थे और एक पता था। नागपुर में जिस व्यक्ति के यहाँ जाकर उसे ठहरना था, उनके घर का पता उसी बटुए में था। जबकि चार सौ रुपए के झटके को झेल जाना बहुत ही तकलीफदेह था। फिर भी इस वक्त शमीक के लिए वह पता ज्यादा ज़रूरी था।  नागपुर जैसे उतने बड़े शहर में सिर्फ अरुण गांगुली के नाम के सहारे उनका घर खोज पाना कैसे संभव था? जबकि कलकत्ते से रवाना होने से पहले नागपुर के इस पते पर कम से कम दो-तीन बार नज़र दौड़ा ली थी, अब कुछ भी याद नहीं आ रहा था? घर का नंबर जाए भाड़ में, इलाके का नाम भी याद नहीं आ रहा था। वह पता होता तो भी एक आख़िरी कोशिश करके देखी जा सकती थी। असहाय सा होकर शमीक ने एक बार फिर अपनी पैंट और शर्ट की जेबें अच्छी तरह टटोलीं। पर कहाँ मिलता? जेब में हो तब तो? पते वाला कागज़ कहीं खो न जाए इसीलिए बटुए में बड़े जतन से संभाल कर रखा था। वह बटुया ही नहीं है। 
      शमीक समझ पा रहा था, फिर भी वह क्या कर सकता था। हावड़ा से गाड़ी पकड़ी थी।  सफ़र में खाने-पीने की चीज़ें खरीदने के लिए पैसे बटुए से ही दिए थे। रात को सोने से पहले और आधी रात को एक-दो बार नींद खुलने पर चुप-चाप जेब टटोल कर देख लिया था कि बटुया जगह पर है भी या नहीं। हाँ है। इसी तरह चल रहा था। फिर सुबह हुई, दिन और चढ़ आया।   शमीक ने चाय-नाश्ता करके पैसे चुकाए। बंबई मेल ने फिर समय पर उसे नागपुर स्टेशन पर उतार दिया। एक हाथ में सूट केस और दूसरे हाथ में होल्ड ऑल उठाने से पहले अंतिम बार बटुए को छूकर देखा था। गड़बड़ हुई इस ओवरब्रीज की सीढ़ीयां उतरते समय। माल-असबाब उठाए हर कोई एक-दूसरे से आगे जाना चाहता था। इसी बीच ऊपर से भी कुछ लोग नीचे आ रहे थे.  जनसमुद्र का एक ज्वार सा था. इसी समय सीने की जेब पर शमीक ने कुछ दबाव सा महसूस किया था. दबाव धक्कम-पेल का नहीं वरन् कुछ और ही तरह का था यह भी शमीक समझ गया था। परंतु, शमीक के पास कोई चारा नहीं था दोनों हाथ रुके हुए थे. सूटकेस और होल्ड ऑल को पाँवों में ही फेंक तुरंत ही कमीज़ की जेब पर हाथ रख बोल उठा - मेरा बटुया अभी-अभी मेरा बटुया - - - - शमीक  का चेहरा मुरझा गया.  क़ातर निगाहों से वह सिर्फ़ लाल चेक वाली कमीज़ पहने व्यक्ति को ढूँढने लगा जिसने जान-बूझकर भीड़ का फ़ायदा उठाते हुए उसे धर दबोचा था। नहीं, वह भी कहीं भी नहीं है. पलक झपकते ही ये लोग पता नहीं कहाँ चले जाते हैं, इस विषय पर शोध भी किया जा सकता है।
      दो-चार आदमियों ने एक साथ हिन्दी में पूछा - भाईसाहब, कितने रुपए थे ? ये एक विरक्ति  वाली बात थी। जिसका बटुआ खो जाए उससे कोई सहानुभूति नहीं, इस समय उसकी मानसिक स्थिति को कोई समझने की कोशिश नहीं करता - हर कोई यही पूछता है, कितने रुपए थे? जवाब देने को जी नहीं चाहा शमीक का। अप्रसन्न नज़रों से उसने प्रश्नकर्ताओं के चेहरे देखे, वह समझ गया कि रुपए तो मिलने से रहे। जबकि ये लोग अब उसे लगातार भाषण देंगे, स्टेशन मास्टर को सूचित कर दीजिए। आर. पी.एफ. वालों को भी बता दीजिए। स्टेशन पर भी पुलिस बूथ है। लुटेरों, जेबक़तरों को वे ही अच्छी तरह जानते हैं। पुलिस अगर चाहे तो तुम्हारा बटुआ तलाश कर दिलवा सकती है. परंतु इन सब फिजूल बातों से शमीक को ज़रा भी भला होने वाला नहीं था। होल्ड-ऑल और सूटकेस दोनों हाथों मे उठाकर शमीक ने स्टेशन से बाहर की तरफ कदम बढ़ाए।
      शमीक को इस समय एक ही बात की फ़िक्र थी। अरुण गांगुली को कैसे तलाशा जाए?   दरअसल ग़लती उसी की है। अगर यहाँ आने से पहले उसने यह जानकारी ले ली होती कि अरुण गांगुली किस संस्थान में किस पद पर कार्यरत हैं। तो आज शमीक को इस परिस्थिति का सामना न करना पड़ता। कलकत्ते में शमीक का मन बिल्कुल भी शांत नहीं था। बल्कि कहा जा सकतै है कि वह दिनों-दिन मानसिक संतुलन खोता जा रहा था।
      न्युबैरकपुर के विज्ञान घोष बागान अंचल में उनके एक बहुत ही साधारण और छोटा सा एकमंज़िला मकान था। घर में माँ है। दो छोटी बहने हैं - नानू और सेवा। नानू दसवीं में पढ़ती है। सेवा आठवीं में। सेवा, नानू और शमीक से बड़ा एक भाई और है परंतु क्या उसे होना कहते हैं? जो साथ न रहे, उसके प्रति कोई मोह होना या उसे मान लेना शमीक के लिए बहुत ही कष्टदायक था। सबसे बड़ी बात है - भईया उन्हें किस हाल में छोड़ गया है?
      ऐसी हालत में कोई हृदयहीन व्यक्ति भी नहीं चला जाता। भाभी की बात मान भईया कैसे सबको छोड़ कर जा सके, ये शमीक के लिए हैरानी वाली बात थी। जबकि भईया ऐसे नहीं थे। गृहस्थी में प्रतिदिन पल-पल हज़ार तरह के परिवर्तन होते रहे हैं और एक-एक परिवर्तन के परिणामस्वरूप समस्याओं का जो मरुस्थल सर उठा रहा है वहाँ एक बूँद पानी के लिए अभ्यर्थना करने वाला भी कोई नहीं है।
      शमीक ने अभी मात्र उच्च माध्यमिक परीक्षा दी थी। खाना-पीना और दोस्तों के साथ तफ़रीह में ही समय गुज़र रहा था। परीक्षाफल के बारे में कभी-कभी दोस्त चिंता का इज़हार भी करते परंतु इस मामले में शमीक को कोई फिक्र नहीं थी। पढ़ाई-लिखाई में वह शुरू से ही अच्छा रहा है और वह निश्चिंत है कि प्रथम श्रेणी में ही पास होगा। जो भी हो, दोस्तों के साथ तफ़रीह से एक रात घर लौटते ही सुना कि पिता के सीने में भीषण दर्द हो रहा था। दीपंकर यानी भईया तब तक दफ्तर से नहीं लौटे थे। तुरंत शमीक दौड़कर डॉक्टर को बुलाने गया था और साथ लेकर आया भी था परंतु तब तक जो क्षति होनी थी वह हो चुकी थी। दीपंकर तब घर लौटा ही था। खुद हज़ार बार रोने पर भी छोटे भाई और छोटी बहनों को सीने से लगा कर सांत्वना दी थी। आश्वासन देते हुए कहा था - रोओ मत, मैं तो हूँ न!
      हाँ, भईया तो थे ही। दीपंकर ने अकेले ही उस समय पूरी गृहस्थी को संभाल रखा था।  छोटे-छोटे भाई-बहनों के प्रति उसके स्नेह, ममता का तो कोई जवाब ही नहीं। परंतु वह ममता और स्नेह पता नहीं कहाँ खोने सा लगा। इस दौरान सिर्फ़ एक घटना ही घटी। दीपंकर की शादी। दीपंकर जिस लड़की को पसंद करता था उससे शादी करते ही इस स्नेह और कर्तव्यों को हवा होते देर न लगी।
     शमीक तब मकैनिकल इंजीनियरिंग के तृतीय वर्ष में था। उसी समय दीपंकर अपनी पत्नी सहित अलग हो गया। बेगार खटना अब उसके लिए संभव नही था। माँ बेहद शांत और प्रखर महिला थीं। उन्होंने अपने बेटे से सिर्फ़ इतना कहा, जहां तुम्हें लगता हो कि तुम सुख-चैन से रह पाओगे, अनायास ही जा सकते हो। भईया ने माँ की वह बात मान ली।
     ये चार महीने पहले का वाक्या है। इन चार महीनों में शमीक एक दिन भी पढ़ने नहीं गया। पढ़ाई अब उसके लिए विलासता से बढ़कर कुछ नहीं थी। खाना ही नहीं जुट रहा था और पढ़ाई-लिखाई की बात तो विलासिता का पर्याय थी। अत: शमीक ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। इस समय उसे एक नौकरी की ज़रूरत है। उसी नौकरी की तलाश में वह परिचित-अपरिचित हरेक के पास जा रहा था। माँ, नानू और सेवा को बचाए रखने के लिए जितनी जल्दी हो सके महीने के आख़िर में घर पर कुछ तो कमाकर लाना ही होगा। भईया ने हर महीने सौ रुपए देकर अपना फर्ज़ निभाना चाहा था। माँ ने कह दिया - मेरे बच्चों के लिए तुम क्यों तकलीफ़ करते हो? इन सौ रुपयों से तुम और बेहतर ज़िंदगी जी सकते हो।
      पिता एक अर्द्घ सरकारी संस्था में कार्यरत थे। मकान बनाते समय वहाँ से और प्रॉविडेंट फंड से काफी रुपए लोन में लिए थे। अत: पिता के निधन के बाद कुछ भी नहीं मिला। जो भी हो शमीक उस दफ्तर में भी नौकरी की उम्मीद में चार-पाँच बार घूम आया है। मज़े की बात है कि सभी आश्वासन दे रहे हैं, काम हो रहा है, हो जाएगा। मुँह से कोई भी नहीं कहता - लेकिन हो भी नही रहा। शमीक ने दफ्तर की यूनियन के नेताओं से भी बात की थी। वे भी हाँ नहीं करते और इन्कार भी नहीं करते। सिर्फ़ तारीखें दे-दे कर समय गुज़ार रहे हैं। अच्छा अगले महीने की अमुक तारीख को एक बार आ जाईए। शमीक जानता है कि बात नहीं बनने वाली फिर भी गए बिना गुज़ारा भी तो नहीं। सचमुच यदि नौकरी मिल जाए। उम्मीद पर ही तो इन्सान इतनी दौड़-धूप करता है।
      नौकरी के लिए दौड़-भाग के दौरान ही एक दिन वी. सी. यानी विकास चौधरी से मुलाकात हुई थी। उसके प्रोफेसर थे। जितना अच्छा पढ़ाते हैं उतनी ही अच्छी तरह छात्रों के साथ घुल-मिल भी जाते हैं। पूरे कॉलेज के छात्रों की जो श्रद्धा और स्नेह उन्हें मिला है वैसा किसी अन्य को नहीं।  सैंतालीस-अड़तालीस वर्ष उम्र होगी उनकी। शादी नहीं की। छात्र ही उनकी संतानें है। अत: उन संतानों से बहुत स्नेह करते हैं। पढ़ाई-लिखाई में जो विद्यार्थी अच्छे होते हैं उनके प्रति विशेष स्नेह तो होता ही है।  शमीक को देखते ही उसी स्नेह से उन्होंने कहा - तुम भी अजीब हो, तुम्हारे बारे में थोड़ा-बहुत सुना है परंतु क्या इस तरह कोई बीच में पढ़ाई छोड़ता है भला? तुम तो मेरे पास भी एक बार आ सकते थे? मैं तुम्हारी पढ़ाई का खर्च चलाता।
      सर मैं........ 
      सिर्फ़ दो ही तो साल हैं। इसके बाद तुम इंजीनियर बन जाओगे....
      सर, मैं आपको समझा नहीं सकता....पढ़ाई जारी रखना मेरे लिए संभव नहीं। मुझे नौकरी की ज़रूरत है। नौकरी न मिली तो हम चारों व्यक्ति.... शमीक कुछ देर तक असहाय नज़रों से वी. सी. की तरफ देखता रहा। फिर धीमे स्वर में बोला, जीवित रहने के लिए मुझे पढ़ाई छोड़नी ही होगी। सबसे पहले मेरी माँ, मेरी दो बहनें। थोड़ी देर चुप रहने के बाद शमीक ने विनीत स्वर में कहा था - सर, आप मुझे कहीं एक..........   शमीक के साथ धीमे-धीमे चलते हुए वी. सी ने पता नहीं क्या सोचा। आँखों से चश्मा उतार कर रूमाल से साफ कर फिर पहना। थोड़ी देर और सोच-विचार की दुनिया में विचरने के बाद कहा - शमीक तुम नागपुर जाओगे ?
      नौकरी के लिए ही तो पढ़ाई छोड़ी है, सर मैं भारतवर्ष की किसी भी जगह जाने के लिए तैयार हूँ।
      मेरे एक घनिष्ठ मित्र अरुण गांगुली वहाँ हैं। वे चाहें तो तुम्हें एक नौकरी दे सकते हैं।
      सर..... शमीक की दोनों आँखों में चमक सी दौड़ गई।
      तुम्हें ज़्यादा कहने की ज़रूरत है। वी. सी. ने बड़े स्नेह से शमीक के कंधे पर हाथ रख चलते हुए कहा, तुम्हारे बारे में मैं अरुण गांगुली को एक पत्र लिख देता हूँ। तुम एक हफ्ते बाद मेरे घर आना ज़रा।
      बी.सी. के घर जाने पर शमीक को वह शुभ समाचार मिला। नागपुर के अरुण गांगुली ने अपने प्रिय मित्र को सूचित किया था, शमीक नामक लड़के को तुम मेरे पास भेज देना।  तुम्हारे प्रिय छात्र के प्रति मैं भी कुछ कर्तव्य निभा दूं। शमीक की नौकरी मेरे पास सुरक्षित है और उसे कब तक यहाँ भेज रहे हो, किस गाड़ी से भेज रहे हो, एक तार कर देना।
      उसी बंदोबस्त के अनुसार शमीक अब नागपुर में है। कलकत्ते से रवाना होने से पूर्व सर ने उसे अरुण गांगुली का पता लिखकर दिया था। शमीक ने दो बार उस पते पर नज़र फिराई थी और बहुत संभाल कर उसे बटुए मे रख लिया था। नागपुर जाते ही एक नौकरी मिल जाएगी - इस निश्चयता ने उसे वास्तविक सोच-विचार से कहीं दूर पहुंचा दिया था।  उसने एक बार भी नहीं पूछा कि अरुण गांगुली नागपुर में बिजनेस करते हैं या नौकरी? अगर नौकरी करते हैं तो किस संस्था में किस पद पर हैंअरुण गांगुली का बुनियादी परिचय जाने बगैर ही शमीक यहाँ चला आया था।  उसे सिर्फ एक ही बात मालूम थी कि अरुण गांगुली उसे नौकरी देने की क्षमता रखते हैं। 
      नागपुर स्टेशन के बाहर खुले परिसर में खड़े शमीक को अचानक ध्यान आया, अच्छा  एक सरसरी नज़र से टेलीफोन डायरेक्टरी पर नज़र मार ली जाती तो कैसा रहताएक से ज्यादा अरुण गांगुली भी हों तो हरेक का पता तो एक नही होगा न। ऐसे में सही पते पर नज़र पड़ते ही वह जाना-पहचाना सा तो लगेगा। अब तो लाख कोशिशों के बावजूद याद नहीं आ रहा है। और ऐसा भी तो हो सकता है कि अरुण गांगुली काफी मशहूर और  प्रभावशाली व्यक्ति होते हुए भी टेलिफोन डायरेक्टरी में उनका नाम न हो। कई कारणों से ऐसा हो सकता है। तो शमीक क्या करेगा? कलकत्ते में सर को टेलिग्राम देकर या ट्रंककॉल करके अरुण गांगुली का पता अवश्य फिर से प्राप्त किया जा सकता है परंतु उसके लिए भी तो पैसे चाहिए। इस समय शमीक के पास एक भी पैसा नहीं है। नागपुर का पॉकेटमार उसकी ऐसी दुर्गति करेगा - यह वह पहले से कैसे समझ सकता था?
      पत्थरों से बने स्टेशन के उस विशाल परिसर में अचानक एक मेहरून रंग की फिएट लगभग शमीक के पास आकर ही रुकी। उसमें एक महिला बैठी हुई थीं। चालक की सीट पर चौबीस-पच्चीस बरस का एक युवक। उसने जल्दी से उतर कर सम्मान सहित पिछला दरवाज़ा खोला और वह महिला बाहर निकलीं। दिखने में जितनी खूबसूरत थीं, उनका  डील-डौल भी उतना ही अभिजात्यपूर्ण था। उम्र तिरतालीस से पैंतालीस के बीच होगी। फिर भी उनकी स्निग्धता और कमनीयता को देखकर उम्र उतनी भी ज्यादा प्रतीत नहीं होती। पीठ पर खुले बाल लहरा रहे थे।  दोनों भौहों के बीच थोड़ा ऊपर काफी बड़ी सिंदूर की बिंदी थी। चेहरे पर काफी तैलीयता थी।  मेजेंडा रंग की तांत की साड़ी और उसी रंग के ब्लाउज में वे अन्य संभ्रांत महिलाओं से भी विशिष्ट जान पड़ती थीं। दरअसल उनकी दृष्टि, चाल-ढाल सब कुछ मिलाकर उनका व्यक्त्वि आकर्षक लग रहा था।
      उस महिला को देख शमीक ने डूबते को तिनके का सहारा जैसे महसूस किया। माथे पर सिंदूर की बड़ी सी बिंदी और ताँत की साड़ी वगैरह देख कर उसने उन्हें बंगाली ही समझा था। यानी बंगाली होने पर मानो वे नागपुर से अरुण गांगुली का अता-पता बता सकेंगी - इसलिए शमीक उन्हें ज़्यादा बंगाली समझ रहा था। आशा की छोटी सी कोंपल भी फूटी थी, परंतु भद्र महिला को शुद्ध हिन्दी बोलते सुनने के बाद कलकत्ते के वी. सी. के साथ कैसे संपर्क करे यही फिक़्र फिर से सताने लगी।
      हजार तरह की चिंताओं से जब शमीक काफी थका महसूस कर रहा था ऐसे में एक और मुसीबत ने उसी समय उसे धराशायी कर दिया। अचानक ध्यान आते ही देखा कि पैरों के पास जो होल्डऑल और सूटकेस रखा था, वह भी नहीं रहे। शमीक के कपड़े, सर्टिफिकेट आदि सब कुछ उसी में था। नागपुर में नौकरी पाने की जो भारी उम्मीद लेकर वह आया था, शुरू में ही वह इस तरह खाली हो जाएगा यह  उस ने अवश्य पहले से नहीं सोचा था। शमीक को अब एक ही फिक़्र थी - कोलकाता यानी घर लौटेगा कैसे? परंतु जिसने या जिन्होंने ये काम किया, इतना बड़ा सामान वहाँ से उन्होंने कैसे सरकाया? ये तो बटुया नहीं था, लिया और छुपा डाला। तिस पर आस-पास इतने लोग, इतना सचेत रहने के बावजूद अगर यह हाल है तो और बाकी क्यों बचेउसे भी चुरा कर ले जाएं न।  शमीक को तनिक भी आपत्ति नहीं है लेकिन शर्त एक ही है, हर महीने उसकी माँ और दोनों छोटी बहनों के लिए इतने रुपए भेजने होंगे जिससे वे गुज़र कर सकें।
      अचानक माईक पर एक घोषणा हुई। पहले अंग्रेजी में फिर हिन्दी में - कलकत्ते के शमीक भट्टाचार्य से अनुरोध है कि वे इन्कवॉयरी ऑफिस के पास आकर बासंती गांगुली से मिलें। 
      हाँ, दो बार घोषणा हुई, दोनों बार शमीक ने सुनी। उसकी सिकुड़ी हुई भौंहे अब ज़रा सीधी हो गई। बासंती गांगुली! अवश्य वे अरुण गांगुली की पत्नी ही होंगी। अरुण गांगुली स्वयं नहीं आ पाए इसीलिए पत्नी को स्टेशन पर भेज दिया। इस सहज हिसाब-किताब ने उसकी अब तक की दुश्चिताओं से उसे मुक्त कर दिया था परंतु बटुया, होल्डऑल और सूटकेस के खो जाने की बात उसके सीने में आलपिन की तरह गड़ी हुई है।  ख़ैर, जो भी हो, नागपुर के अरुण गांगुली के पते पर शायद अब वह पहुँचने ही वाला है, इसी सोच-विचार में गोते लगाते हुए शमीक ने स्टेशन की तरफ कदम बढ़ाए।
      दो-चार लोगों से पूछकर जब शमीक इनक्वॉयरी ऑफिस की निर्दिष्ट जगह पर पहुँचा तो उसने देखा कि कार से उतरी वह भद्र महिला वहाँ खड़ी है। आँखों से बारीक सुनहरे फ्रेम वाला चश्मा उतार कर उसे सफेद दूधिया रूमाल से पोंछते हुए स्टेशन के चारों तरफ बिखरे लोगों की तरफ देखते हुए उन्होंने उसे फिर पहन लिया। इस वक्त शमीक याद नहीं कर पा रहा था कि कार  से उतरते वक्त उन्होंने चश्मा पहन रखा था या नहीं। चश्मा अब भाड़ में जाए। क्या वे ही बासंती गांगुली हैं? क्या शमीक पहले उनसे ही कुछ पूछ ले या इनक्वॉयरी में जाकर पूछ-ताछ करे। ये भद्र महिला अगर अकेली होतीं तो समझ लिया जाता कि वे ही बासंती गांगुली हैं, परंतु वहाँ तो और भी तीन-चार महिलाएं इंतज़ार कर रही हैं। इनमें से बासंती गांगुली कौन है, यह शमीक कैसे पता लगाएगा? उसने इनक्वॉयरी ऑफिस में जाकर कहा, मैं ही शमीक भट्टाचार्य हूँ। कलकत्ते से आया हूँ परंतु बासंती गांगुली को मैंने पहले कभी देखा नहीं। इसलिए मैं उन्हें ठीक पहचान ......
      पहचानने जैसी कोई बात नहीं। एकदम रेडीमेड जवाब मिला। सुनहरे फ्रेम वाला चश्मा और मेजेंडा रंग की साड़ी पहने जो महिला इंतज़ार कर रही हैं वे ही बासंती गांगुली हैं।
      कार से उतर कर शुद्ध हिन्दी में ड्राईवर को इंतज़ार करने को कह जो यहाँ सफेद रूमाल  से सुनहरी फ्रेम वाले चश्मे का शीशा साफ क़र रही थीं, हाँ, वे ही बासंती गांगुली हैं। बंगाली महिला है, देख कर ही पता चलता है। पहले उन्हें देखकर शमीक ने यही समझा था। सिर्फ हिन्दी में बात-चीत करते देख ज़रा झिझक गया था।
      धीरे-धीरे आगे बढ़कर जैसे ही शमीक सामने जाकर खड़ा हुआ बासंती ने उसे देखा।  साँवले रंग का इक हरे बदन का अत्यंत शर्मीला लड़का।  दिखने में अन्य बंगाली लड़कों की भाँति होने पर भी उसकी आँखों में एक चमक सी थी। हाँ, एक संकोच ने उसे अपने घेरे में ले रखा था।  वह स्पष्ट ही नज़र आ रहा था। एक नौकरी की ख़ातिर कलकते से इतनी दूर आया है। पढ़ाई में अच्छा होते हुए भी, वह पढ़ाई बीच में ही छोड़कर सिर्फ माँ-बहनों का पेट फरने की ख्वाहिश से।  क्या उम्र ही होगी भला? ज्यादा से ज़्यादा बीस-इक्कीस। उनकी लड़की चुमकी का हमउम्र ही होगा। बासंती ने स्पष्ट शब्दों में सिर्फ इतना ही कहा - तुम ही शमीक हो?
      जी।
      कलकत्ते के विकास चौधरी ने तुम्हें भेजा है ?
      शमीक ने पहले सिर हिलाकर हामी भरी, फिर कहा - सर ने मुझे अरुण गंगोपाध्याय...
      मैं उनकी पत्नी हूँ।
      बासंती का परिचय मिलते ही शमीक ने उनका चरण-स्पर्श किया। बासंती ने कल्पना भी नहीं की थी कि लड़का स्टेशन पर ही चरण-स्पर्श करेगा।  लेकिन उन्हें प्रसन्नता हुई। आज के युवक इस चीज़ को भूल ही चुके। चुमकी का एक दोस्त सुनील शिवलकर उनके घर आता है।  उसने कभी भी चरण-स्पर्श नहीं किया। इस मामले में वह बहुत कंजूस है। सिर्फ यही नहीं मासी माँ(मौसी), पिसी माँ(बुआ) कहकर संबोधन भी नही करता। संबोधन में वह कहता है सिर्फ मिसेज गांगुली। लेकिन लड़का अभद्र नहीं है।
      बासंती ने और एक बार शमीक को देखा। पूछा - तुम्हारा सामान कहाँ है ?
      शमीक को ख़ामोश देख उन्होंने कहा - नहीं है तो कोई बात नहीं। मैंने इसलिए पूछा था ताकि सामान ले लिया जाए। बाहर कार इंतज़ार कर रही है।
      मेरा सबकुछ खो गया है।
      सर झुकाकर बहुत लज्जित होकर जवाब दिया शमीक ने।
      सब कुछ..... मतलब ?
      चार सौ रुपए, सर्टीफिकेट, सूटकेस, होल्डॉल
      एक साथ सब कुछ खो कैसे गया? संदेह से नहीं काफी हैरानी से बासंती ने पूछा।          पहले रुपए। नज़रें झुकाए ही शमीक ने उत्तर दिया, नागपुर में उतरकर ओवरब्रीज की सीढ़ियां चढ़ते समय बटुया खो गया। होल्डॉल और सूटकेस सटेशन के बाहर इस स्टैंड से। सूटकेस में कपड़ों के साथ ही सर्टीफिकेट रखे हुए थे। थोड़ी देर चुप रहकर शमीक ने फिर कहा, सर ने जिस कागज़ पर आपका पता लिख कर दिया था वह तो बटुये के साथ ही खो गया। और मुझे भी पता याद नहीं आ रहा था।
     24 एफ को.....  बासंती ने  इतना ही कहा था कि तुरंत शमीक बोल उठा, अब मुझे याद आ गया, कोराडी होगा न ?
      हाँ।
      नागपुर शहर से कोराडी चौदह-पंद्रह किलोमीटर होगा। किसी समय वह एक गाँव हुआ करता था परंतु अब इस शहर का नया नामकरण हुआ है, बिजली शहर। दरअसल कोराडी में सुपर थर्मल पॉवर स्टेशन बनने के बाद से बिजली शहर कहा जाने लगा। सुपर थर्मल बनने के साथ-साथ ही हाट-बाजार, दुकानें, स्कूल, अस्पताल, हजारों क्वार्टरों, नए-नए रास्तों का निर्माण हुआ। कोराडी अब एक स्वयं-संपूर्ण शहर है। रौशनी का शहर।
      उसी कोराडी की तरफ गहरे मेहरून रंग की गाड़ी दौड़ी चली जा रही है। पाणीकर ड्राइव कर रहा है। पीछे की सीट पर बैठे हैं बासंती और शमीक। अरुण गांगुली किस संस्था में कार्यरत हैं ओर उसे कहाँ नौकरी दिलवाएंगे, बासंती से यह सब जानने की शमीक की इच्छा हो रही थी परंतु वे शून्य नज़रों से बाहर की तरफ देखते हुए पता नहीं गंभीरता से क्या सोच रही थीं। उस निस्तब्धता को भंग करने का शमीक साहस नहीं कर पाया। चलती हुई कार से बहुत दूर छोटे-छोटे टीलों, टीलों के पीछे जहाँ आकाश उनसे जा मिला है, उधर देखते-देखते वह सोचने लगा, अगर इसी महीने नौकरी मिल जाती है तो अगले महीने तनख्वाह मिलते ही माँ को पैसे भेज सकेगा। परंतु कितने रुपए? शमीक हजारों का सपना नही देखता। तीन सौ रुपए भेज पाएइसी में उसकी खुशी है। आते वक्त माँ बहुत रो रही थीं। अपने भीतर की रुलाई को रोके रख शमीक माँ को सांत्वना दे रहा था। उसके बाद ही मानो बाँध सा टूट पड़ा। अचानक नानू और सेवा भी उससे लिपट बुरी तरह रोने लगीं। वे सिर्फ़ एक ही बात कहे जा रही थी - भईया, तुम मत जाओ।  इतनी दूर जाकर तुम्हें नौकरी करने की कोई ज़रूरत नहीं। हम भूखे रह लेंगी लेकिन कभी तुम्हें तंग नहीं करेंगी..... तुम्हें बुरा भईया नहीं कहेंगी। तब शमीक भी खुद को नहीं संभाल पाया। नानू और सेवा के सरों पर ठुड्डी टिकाए उसने उन दोनों को नि:शब्द भिगो डाला।
रास्ते में एक लेवल क्रॉसिंग आई। लगभग चार मिनट रुके रहने के बाद कार फिर चल पड़ी। खाली सड़क थी। दोनों तरफ हरे-भरे खेतों की हरियाली नज़र आ रही थी और इस हरियाली का स्पर्श किसानों के चेहरों पर भी नज़र आ रहा था।  ख़ामोश दर्शक की भाँति  शमीक सब कुछ देख रहा था। थोड़ी देर बाद एक कतार में सजे सुपर थर्मल के ऊँचे सब बॉयलरों पर नज़र पड़ी।  उनकी चिमनियां और भी ऊँची थी. बाँई तरफ एक पेट्रोल पंप पार करके ज़रा सा आगे जाकर कार बाँई तरफ मुड़ी। एक ही डिज़ाइन के चमचमाते चार मंजिले मकान तस्वीरों जैसे लग रहे थे।  इतने घर मानों ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहे थे। अंतत: कार विशाल प्रांगण में बने बंगले के सामने आकर रुकी। दो दरवान स्टूल पर बैठ बातों में मशगूल थे। पहले उन्होंने ध्यान नहीं दिया, कार का हॉर्न सुनते ही दोनों ने गिरते-पड़ते खड़े होकर गेट खोला। 
      अपनी ख़ामी को छुपाने के लिए बासंती को देख ज़रूरत से ज़्यादा बड़ा सलाम ठोका। बासंती ने थोड़ा सा सिर हिलाया। यद्यपि गंभीरता ओढ़ रखी थी पर उसमें विरक्ति की कोई झलक नहीं थी। यह गंभीरता शायद उनकी सदा की साथी थी।
      उनके पहुँचने के बीस मिनटों में ही घीया रंग की एक एंबैसडर सीधे पोर्टिको के सामने आकर रुकी। दरबान के दरवाज़ा खोलते ही कार से एक भद्र पुरुष उतरे। कद छह फुट के लगभग होगा। रंग गोरा तो नहीं पर उसे काला भी नहीं कहा जा सकता। सिर के बाल ज़रा लंबे थे। सारे बाल काले तो थे परंतु दोनों तरफ की क़लमें सफेदी लिए हुई थी। यही बात उन्हें ख़ास बना रही थी। गोल-मटोल चेहरा, तिस पर दोनों आंखें और भी सुंदर। अच्छी तरह शेव किए होने के कारण इस उम्र में भी वे कम आकर्षक नहीं लग रहे थे। उनकी उम्र उनचास-पचास होगी। हाँ, यही अरुण गांगुली हैं। कोराडी सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट के जनरल मैनेजर।
      परिचय मिलते ही शमीक के चरण स्पर्श करते ही अरुण गांगुली ने स्नेह से उसका हाथ दबाते हुए उदास दृष्टि से लड़के के मुँह की तरफ देखा।
      अरुण गांगुली मानों खुद को ही देख रहे हों। हुबहू वैसा ही न होते हुए भी अठाईस-तीस वर्ष पूर्व दिखने में वे इस लड़के की भाँति ही थे। अरुण गांगुली खुद को खोकर मानो खुद को तलाश रहे थे।
      बीस-इक्कीस वर्षीय लड़के ने धीरे-धीरे कहा, मेरा नाम शमीक भट्टाचार्य है।
      गोल-मटोल चेहरे पर प्रसन्नता उतर आई, मुझे पता है। फिर पूछा, यहाँ आने में कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई ?
      नहीं तकलीफ़ तो नहीं हुई, लेकिन......
      क्या ?  थोड़ा सा झुककर अरुण गांगुली शमीक की ऑंखों में देखते रहे। बताते हुए बहुत ही शर्मिंदगी महसूस हो रही थी परंतु जो घटित हुआ था, वह तो बताना ही पड़ेगा वर्ना किसी की आर्थिक स्थिति कितनी ही खराब क्यों न हो कोई खाली हाथ नहीं चला आता। ऐसे में अरुण गांगुली सोच सकते हैं कि लड़का एक ही पोशाक में आया कैसेशमीक ने अपने सब कुछ खो जाने की कहानी काफ़ी संकोच से बताई। उसका संकोच ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अरुण गांगुली ने सिर्फ़ इतना ही कहा, विकास ने तुम्हें मेरे पास भेजा है। तुम्हारी सारी ज़िम्मेदारियां तो अब मेरी हैं।  जो खो गया, उसके लिए दु:खी मत होओ।
दोपहर के भोजन के बाद घंटा भर आराम कर अरुण गांगुली फ़िर पावर प्रोजेक्ट चले गए।  लौटने का कोई निश्चित समय नहीं है। जिस दिन काम का जितना दबाव हो, उसी अनुसार लौटना हो पाता है।  हाँ, फिर भी औसतन साढ़े सात-आठ बजे तक लौट आते हैं।   उस वक्त शाम के चार बजे होंगे। दो माली फूलों के पेड़-पौधों की देखभाल में व्यस्त थे। इस बंगले में यद्यपि दो दरवान हैं, इस वक्त एक दरवान गेट के पास स्टूल पर चुपचाप बैठा है। एक बावर्ची भी है। वह इस वक्त चाय तथा खाने-पीने की व्यवस्था में मशगूल है। ये सभी कर्मचारी एम. एस. ई. बी. यानी महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड से मिले हैं।  घीया रंग की एम्बैसडर और ड्राइवर भी बोर्ड द्वारा दिए गए हैं।  गहरे मेहरून रंग की फियेट अपनी है, इस का चालक है पाणीकर और इस घर के सारे काम-काज की ज़िम्मेदारी पिछले तेईस वर्षों से निभाता आ रहा शख़्स है हरिराम।
      बंगले के बड़े से बरामदे में बेंत की कुर्सी पर बैठ बासंती मन ही मन कुछ सोच रही थीं। दूर कहीं नीले आसमां और टीले को छूती हुई ठंडी हवा आ रही थी।  पक्षियों का एक झुंड सरल रेखा में जाते हुए अचानक पता नहीं कहाँ खो गया। आसमां से ज़मीं पर नज़र डालते ही बासंती ने देखा कि संतरों से लदी बैलगाड़ियां मंथर गति से एक के बाद एक चली जा रही हैं। अब हर दिन यह दृश्य देखने में आता है। संतरों से लदी बैलगाड़ियां बाग से निकलकर नागपुर रेलवे स्टेशन के पीछे जो संतरा बाज़ार है वहां जाकर जमा होती हैं।  शॉल को ठीक से ओढ़कर अपनी नज़र को दूर से और क़रीब ले आईं। दोनों माली फूलों के पौधों के चारों तरफ जमी हुई मिट्टी को खुर्पी से खोद रहे थे। बासंती ने सोचा कि उसके सीने में भी कुछ जमा सा हुआ है। उसे किस खुर्पी से हटाया जा  सकता है...
      ज्यों ही हरिराम ने चाय की ट्रे मेज़ पर रखी, बासंती ने धीमे स्वर में पूछा। शमीक का कमरा ठीक कर दिया न?
      जी हाँ।
      क्या कर रहा है वहसो रहा है क्या?
      जी नहीं, रो रहा है।
      रो रहा है!
      चाय के लिए बुलाने जाने पर यही तो देखा।
      तुम जाकर कहो कि मैंने बुलाया है। बासंती ने दो कपों में चीनी और दूध डालते हुए फिर कहा, देखो उसे डांट मत देना।  बच्चा है, माँ-बहनों को छोड़कर आया हैअत: मन उदास           होना स्वभाविक ही है।
      हरिराम से ऐसा कहने की वजह है। उसकी उम्र साठ के लगभग होगी। मेदिनीपुर के नवघाट का हरिराम कुईसा ग्यारह-बारह वर्ष की उम्र में माता-पिता को खोने के बाद छह महीनों तक चाचा-चाची के पास रहकर हर तरह के अपमान, उपेक्षा और घृणा को समेट अंतत: एक दिन भाग आया था। भारत के विभिन्न प्रांतों में घूम-घूम कर विभन्न काम किए। कभी हॉकरी तो कभी सिर्फ़ भिक्षावृत्ति। हां, ज्यादा समय गुज़रा है लोगों के घर काम करके। पढ़ाई-लिखाई आती ही नही थी। बचपन से स्वभाविक जीवन से परिचित न होने के कारण गुस्सा सदा सातवें आसमान पर रहता है, फिर भी उसकी आंतरिक सूक्ष्म अनुभूति अभी शेष है। दूसरों से ज़रा सा स्नेह, अपनापन मिलने पर हरिराम उनके लिए शायद अपनी जान देने को भी तैयार हो जाए।  ख़ैर, जो भी हो विभिन्न जगहों की ठोकरें खा काम करते हुए ज़िंदगी के पैंतीस बरस गुज़ार कर हरिराम जिस दिन अरुण गांगुली के पास आ पहुँचा, उस के बाद से थोड़ा-थोड़ा स्नेह पाकर वह खुद को घर का ही एक सदस्य समझने लगा। चूँकि हरिराम उम्र में बड़ा था अत: उसकी हुकुमत भी बढ़ने लगी। एक सौ डिग्री बुखार में भला अरुण गांगुली ऑफिस क्यों जाएंगे? ऐसा राजकाज न किया तो कौन सी आफ़त आ जाएगी? दोपहर के भोजन में अगर चार  व्यंजन परोसे गए हैं और अरुण गांगुली ने तीन ही खाए तो हरिराम के गुस्से का ठिकाना नहीं रहता। जो व्यक्ति सतरह-अठारह घंटे ऑफिस में काम करता हो इतनी सी खुराक पर ज़िंदा कैसे रहेगा? अत: हरिराम जी भरकर डांट-डपट करता। घर के हर व्यक्ति की ऐसी त्रुटि देख अब तो हर वक्त हरिराम का मिज़ाज चढ़ा रहता है।  अच्छी बात भी वह धौंस दे कर कहता है। लगेगा कि वह धमका रहा है जबकि बात भले के लिए ही कह रहा है। ऊपरी तौर पर शुरू-शुरू में यह समझ नहीं आता।  कुछ दिन गुज़र जाने के बाद ही उसके भीतर के उस व्यक्ति को पहचाना जा सकता है।  तभी तो बासंती को डर है कि कहीं हरिराम गंभीर स्वर में शमीक पर फट ही न पड़े - शाम के वक्त चाय न पीकर इस तरह रोने-धोने का क्या मतलब हैमाँ-बहनों को छोड़ नौकरी करने निकलने वाले क्या तुम ही  दुनिया के पहले आदमी हो?   
      धीमे-धीमे क़दमों से शमीक के बरामदे मे आ खड़े होते ही बासंती ने मुँह उठाकर उसकी तरफ देखा।  स्टेशन पर उसे देख जैसा महसूस हुआ था, वैसा अब महसूस नहीं हुआ। पति की इस उम्र की शक्ल-सूरत से शमीक की शक्ल - सूरत आश्चर्यजनक रूप से मिलती-जुलती प्रतीत होती है। ख़ास तौर से नाक और ऑंखें।
      अस्फुट से स्वर में शमीक ने पूछा - आपने मुझे बुलाया ?
      चाय नहीं पीओगे? बासंती के सामने पाँच-छह कुर्सियां और पड़ी थीं। सामने की एक कुर्सी की तरफ इशारा कर कहा - बैठो। फिर चाय का प्याला उसकी तरफ बढ़ाते हुए धीमी आवाज़ में कहा - सुना, तुम रो रहे थे ?
      सुनकर बहुत शर्मिंदा हुआ शमीक। चाय का प्याला हाथ में लेकर उसने अपनी दोनों ऑंखे फ़र्श पर गड़ा दीं। दरअसल वह कैसे कहे कि उसे जो कमरा रहने के लिए दिया गया है, उस कमरे के ठाठ-बाठ और दोपहर को उसने जो राजसी भोजन किया उससे उसकी माँ और दोनों छोटी बहनें किस हद तक वंचित हैं। न्यु बैरकपुर के विज्ञान घोष बगान अंचल के छोटे से मकान में बैठ माँ, सेवा और नानू ने दाल और कलमी साग की तरकारी के साथ किसी तरह से थोड़ा सा भाता खाया है। दाल! वह भी रोज़ नसीब नहीं होती। जहाँ ऐसी स्थिति हो, वहाँ शमीक ऑंसू बहाने के सिवा और क्या कर सकता है? क्या जी खोलकर रो पाया है? यहाँ जिनके घर पर आकर ठहरा है उन्हें असंमजस की स्थिति में न डालने के लिए कितना घुट-घुट कर तथा छुप-छुप कर रोना पड़ा है।  यह उसका दुर्भाग्य ही था कि फिर भी उन्हें पता चल गया। शमीक कुछ जवाब देने जा रहा था कि उसके पहले ही हॉर्न बजाते हुए पोर्टिको में आकर फिएट रुकी। गाड़ी से उन्नीस-बीस वर्षीया एक सुंदर डील-डौल वाली लड़की उतरी। हल्के नीले रंग की जींस और सफेद शर्ट पर फ़िरोज़ी रंग के हाफ स्वेटर में वह बहुत चकमक लग रही थी। कंधे पर लटक रहे बैग को बाँए हाथ से दबाए दो छलाँगों में पाँच सीढ़ियां फाँद बरामदे में पहुँचते ही बासंती ने बड़े ही शांत स्वर में आवाज़ दी, चुमकी इधर आओ।
      कहो  - एक क़दम भी बिना आगे बढ़े चुमकी ने वहीं से जवाब दिया।
कलकत्ते से शमीक आया है, उससे परिचय नहीं करोगी?
      चुमकी ने अब एक नज़र शमीक को देखा। उसका हमउम्र ही होगा। लड़के को एक नौकरी की ज़रूरत है। कलकत्ते से पिता के दोस्त विकास चौधरी ने उसे भेजा है। पिता भी उसे अवश्य एक नौकरी दे देंगे। ऐसे में आनन-फ़नन में परिचय करने की ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी? तिस पर आज क्लास में एक लड़की से तकरार हो गई।  इसलिए भी चुमकी का मूड ख़राब है। इस समय शमीक नामक इस लड़के से परिचय करने की उसकी तनिक भी इच्छा नहीं है। अगर कोई ऐसे में उसे अभद्र समझता है तो समझता रहे। वह कुछ नहीं कर सकती। चुमकी ने साफ़-साफ़ कहा, इस वक्त मैं थकी हुई हूँ, बाद में परिचय कर लूंगी।
      बेटी की बात सुन बासंती रुक गईं। ज़रा शर्मिंदगी भी हुई। उनकी बेटी बड़ी मनमौजी है। कब वह किस पर संतुष्ट और असंतुष्ट होगी, यह तो वही जानती है।  इस हद तक मूडी लड़की को न छेड़ना ही बेहतर होता। बासंती जब अपनी बेटी के स्वभाव को अच्छी तरह जानती हैं तो ज़रा सा इंतज़ार कर सकती थीं। शरमिंदगी छुपाने के लिए उन्होंने कहा,चुमकी ज़रा सी हठी या ज़िद्दी है, पता नहीं किस शब्द का इस्तेमाल बासंती ने किया यह तो शमीक को ध्यान नहीं लेकिन उसने उन्हें शर्मिंदगी से उबारने के लिए कहा, मैंने बुरा नहीं माना।
      यद्यपि शमीक ने यह जवाब तो दे दिया लेकिन वास्तव में उसके आत्मसम्मान को थोड़ी सी ठेस तो पहुंची ही थी। यह तो सही था कि वह कृपाप्रार्थी है, लेकिन क्या कृपाप्रार्थी मान-सम्मान का पात्र नहीं होताशिक्षित और भद्र परिवार की लड़की को क्या ऐसा आचरण शोभा देता है? बात तो दूसरी तरह भी कही जा सकती थी। तूफान के वेग को थमने में ज़्यादा वक्त नहीं लगा। अपने मान-सम्मान की परवाह करने का वक्त अभी नहीं है।  नानू, सेवा और माँ ही उसकी पहली प्राथमिकता हैं। इन तीनों के लिए थोड़े से आहार की व्यवस्था कर पाने के समक्ष उसका सम्मान क़तई बड़ी चीज़ नहीं है। चुमकी अगर उसे दोनों वक्त हजार बातें भी सुना कर अगर महीने के आख़िर में कुछ रुपए उसके हाथ पर रख दे तो शमीक उसे उपहार के सिवा कुछ नहीं सोच सकता। निर्धनता किसे कहते हैं, शमीक अपनी बीस वर्ष की छोटी सी उम्र में ही भली-भाँति जान गया है। 
      इसी बीच लगभग बीस दिन गुज़र गए।  शमीक बंबई जाकर महाराष्ट्र इलेक्ट्रीसिटी बोर्ड में इंटरव्यू दे आया है। सारी व्यवस्था अरुण गांगुली ने ही कर दी है। सिर्फ़ यही नहीं, नियुक्ति पत्र मिलने पर इसी कोराडी सुपर थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट में ही ज्वॉयन कर सके, इसका भी पक्का बंदोबस्त कर दिया है। सिफ़ारिश तो तगड़ी थी ही फिर भी उसने इंटरव्यु बहुत अच्छा दिया है।  बतौर ट्रेनी इंजीनियर उसे दो साल गुज़ारने होंगे। उसके बाद सहायक इंजीनियर बन पाएगा।   तब सभी सुविधाएं मिल पाएंगी। बातों-बातों में अरूण गांगुली ने यह सब बताया था। जैसे दो वर्ष बाद ही शमीक को स्वतंत्र रूप से पूरा फ्लैट मिलेगा। अब यानी प्रशिक्षण अवधि में उसे हॉस्टल में एक छोटा सा कमरा मिलेगा। अरुण गांगुली ने बेहद स्नेह से गंभीरतापूर्वक कहा था, जो भी हो प्रशिक्षण अवधि तक तुम मेरे पास ही रहोगे।
      शमीक ने संक्षिप्त जवाब दिया था, हॉस्टल में रहने में मुझे कोई तकलीफ़ नहीं होगी।
      सो जानता हूँ। फिर ज़रा सा हँसकर कहा था - तुम्हारे, यहाँ रहने पर भी मुझे कोई तकलीफ़ नहीं होगी।
      परंतु नौकरी मिलने के बाद भी......
      हाँ, तुम्हारे सम्मान की बात भी सोचनी होगी। महीने के आखिर में तुम मुझे दस रुपए
दे दिया करना। अरुण गांगुली ने प्यार से शमीक के सिर को हिलाते हुए यह भी कहा था, तुम्हें इतना संकोच किस बात का? तुम मेरे बच्चे समान हो, अब मैं तुम्हें बड़े होने में थोड़ी सी सहायता कर रहा हूँ। जब बूढ़ा हो जाऊंगा तब तुम मेरी देखभाल करना। इतना ही नहीं, बड़े आवेग से उन्होंने कहा, विकास मेरा बचपन का दोस्त है। पिता बाहर-बाहर नौकरी करते थेउन्हीं के घर पर मेरी परवरिश हुई है। विकास के माता-पिता को कभी पराया नहीं समझा। और विकासलोग यही सोचते थे कि हम दो भाई हैं। उसी विकास ने तुम्हें मेरे पास भेजा है। यह तो मेरा कर्तव्य है।
      उस कर्तव्य को अरुण गांगुली उदार मन से निभा रहे हैं यह तो शमीक बहुत अच्छी तरह ही समझ रहा है। कोराडी सुपर थर्मल के टॉप मैन होते हुए भी अरुण गांगुली ने एक स्नेहिल पिता की भाँति उसे साथ ले जाकर सुपर मार्केट से क्या-क्या नहीं खरीद कर दिया। स्टेशन पर उसका सब कुछ खो गया है, यह पता लगने पर जूते, मोजे यहाँ तक कि टुथ ब्रश से लेकर सूट तक। पर्याप्त शर्ट - पैंट के बावजूद इतने मंहगे सूट का ऑर्डर देते समय अरुण गांगुली के प्रसन्नचित चेहरे की तरफ देखते हुए शमीक ने ज़रा सा विरोध किया था, इतने सब की क्या ज़रूरत है? अरुण गांगुली ने ज़रा सा हँसते हुए कहा था, वह तो मैं समझूंगा। इसके अतरिक्त अभी ठंड का मौसम है, यह क्यों भूल रहे हो?
      उसके लिए तो स्वेटर और शाल तो खरीद ही दिया है।
      उस दिन शमीक की इस बात का कोई जवाब न देकर सिर्फ़ हँसे थे अरुण गांगुली।  हाँ, बंबई इंटरव्यू के लिए जाते समय उनका छुपा हुआ मनोभाव स्पष्ट हो गया था। उन्होंने शमीक को अपनत्व से कहा था, नया सूट पहन कर ही जाना।
      ऐसी सजगता से शमीक की देखभाल कर रहे थे अरुण गांगुली। हज़ार तरह के कामों और व्यस्तताओं के बीच वे पल भर के लिए भी उदासीन नहीं हैं। जबकि...... इसी एक जगह आकर शमीक को बड़ी ठोकर लगती है। कोई भी सूत्र पकड़कर वह इस सबका मिलान नहीं कर पाता।  इसी कारण वह कभी-कभी उदास तथा दिशाहीन हो जाता है।  शमीक को यहाँ आए बीस दिन हो गए हैं।  जितनी बात-चीत के बिना गुज़ारा न हो, उसे छोड़ शमीक को अरुण गांगुली और बासंती का एक-दूसरे के प्रति अलगाव सा सहज ही नज़र आता है।  शमीक बहुत ही बुद्धिमान लड़का है।  उसे तो पहले ही दिन यह पता चल गया था।  चार-पाँच दिनों बाद वह यह भी जान गया था कि वे लोग अलग-अलग कमरों में रहते हैं।
      शमीक में वैसे भी कोई उत्सुकता नहीं है। अरुण गांगुली और बासंती के इन रिश्तों के बारे में जानने की उसे कोई उत्कंठा भी नहीं है, लेकिन अरुण गांगुली के प्रति उसमें एक कमज़ोरी सी आ गई है। उसी कमज़ोरीवश लगाव उत्पन्न हो गया है। शमीक को उन्होंने इतना कुछ खरीद दिया है, अपने घर पर रखा है और एक नौकरी भी देने वाले हैं। गहरी कृतज्ञता इस लगाव का कारण नहीं है। इस छोटी सी गृहस्थी में भी अरुण गांगुली कितने असहाय से हैं। इतने पास होते हुए भी पत्नी और बेटी के उत्ताप और ममता मिश्रित घेरे से बाहर हैं। शमीक के दु:ख का एक कारण यह भी है। अरुण गांगुली जितनी देर भी घर पर रहते हैं क़िताबें पढ़ने में ही अपना समय गुज़ार देते हैं। ऑफिस की कुछ फाइलें भी देखते हैं। इसके अलावा उनकी भूमिका न के बराबर ही है। वे एक असहाय मूक द्रष्टा हैं। जबकि पॉवर प्लांट में उनका दूसरा रूप ही देखने को मिलता है।  अड़तालीस साल की उम्र में व अठारह साल के तरोताज़ा युवक की भाँति सारे प्लांट में घूमते-फिरते है। पचास-बावन संस्थाएं सुपर थर्मल में ठेके पर काम करती होंगी। हर संस्था ने कितना-कितना काम किया, पिछले हफ्ते किस-किस कंपनी का काम कहाँ ख़त्म हुआ था और उसके बाद कितना काम आगे बढ़ा है, आगे नहीं बढ़ा है तो क्यों नहीं बढ़ पाया और यदि आगे बढ़ा भी है तो और कितना आगे बढ़ाया जा सकता था आदि सब बातें बड़े ध्यान से देखते हैं। इसके लिए जितना परिश्रम करना पड़ता है उसमें वे तनिक भी पीछे नहीं रहते। इसके अलावा ऑफिशियल काम-काज भी है और सारे दिन में बार-बार मीटिंग। सभी श्रेणियों के कर्मचारियों के साथ जब बात करते हैं तब उन जैसे ही बन जाते हैं। तब जनरल मैनेजर का मुकुट उनके सिर पर शोभायमान नहीं होता। वे इतने सहज और सरल व्यक्तित्व के मालिक हैं। चार-पाँच दिन प्लांट में जाकर खुद अपनी ऑंखों से यह सब देखा है शमीक ने।
      कुछ दिन पहले सुबह दस बजे ही प्लांट का काम देखने निकल पड़े थे अरुण गांगुली। चार डिवीज़नल इंजीनियर, चीफ इंजीनियर, मेंबर जेनरेशन आदि उच्च स्तरीय अफसर वाहिनी रोज़ की भाँति उनके साथ थी। एक फिटर गहन मनोयोग से एलाइनमेंट का एक सूक्ष्म काम कर रहा था.  होठों में सिगरेट दबी हुई थी। जनरन मैनेजर अरुण गांगुली की तरफ पहले उसने ध्यान नहीं दिया। पास के एक सहकर्मी द्वारा धक्का देकर सतर्क किए जाने पर उस फिटर ने सिगरेट फेंक सलाम करते हुए कहा, नमस्ते साब। अरुण गांगुली ने नमस्ते का जवाब देकर उस सिगरेट की तरफ देख कहा, उसे क्यों फेंक दिया?
      आप बड़े साहब हैं।
      तो क्या हुआ? देश का सम्मान करें, काम का सम्मान करें - मेरे सम्मान से दोनों बहुत-बहुत बड़े हैं। कहकर हँसते हुए फिटर की पीठ पर स्नेहिल हाथ फिराकर अरुण गांगुली आगे बढ़ गए।
      शमीक का दु:ख इसलिए भी बहुत गहरा है कि एक व्यक्ति की दो जगहों पर दो तरह की भूमिका है। प्लांट में हंसने-खिलखिलाने वाला दमकता चेहरा अपने घर पर ख़ामोश रहता है।  अपनी ही गृहस्थी में वे पराए है। उदास नज़रों से अरुण गांगुली जब घर पर पत्थर की भाँति सर्द से रहते हैं तो शमीक गहन वेदना की अनुभूति में जकड़ा सोच रहा होता है कि यह व्यक्ति कब प्लांट पर जाएगा? जबकि उनमें विरोध किस बात पर है, बीस दिनों में भी शमीक इसका तनिक भी अनुमान नहीं लगा पाया। लगाता भी कैसे? इस दौरान उसने एक दिन भी अरुण गांगुली और बासंती को लड़ते-झगड़ते नहीं देखा। बेहद ज़रूरी जो दो-चार बातें होती हैं, उसमें भी एक-दूसरे को भेदने वाले ज़हरीले बाण नहीं होते। जबकि यह साफ़ समझ में आता है कि घर में अरुण गांगुली ही मानो एकाकी हों। निर्जन द्वीप के वे एक एकाकी ही बाशिंदे हैं। ग़ृहस्थी के हर काम, हर मामले में शामिल होते हुए भी वे नहीं होते। उनका चेहरा देखकर ही इस पीड़ा को सहज ही समझा जा सकता है। अब मानो अरुण गांगुली से शमीक की तकलीफ ही ज़्यादा हो। जिसने शमीक के लिए इतना कुछ किया वह खुद इतनी तकलीफ़ में है, यही बात रह-रहकर शमीक को कचोटती रहती है, जबकि वह कुछ कर भी नहीं सकता। सच्चाई जाने बिना कुछ भी कर पाना उसके लिए मुश्किल है। समस्या की जटिलता को जाने बिना समाधान के किस पथ पर वह अग्रसर हो?
      फिर भी एक बात शमीक को बहुत ही ख़राब लगती है। अरुण गांगुली और बासंती के बीच जो भी क्यों न हो, उनकी बेटी चुमकी का घमंड और हमेशा दूसरों की अवज्ञा करन की प्रवणता शमीक को बहुत बुरी लगती है। सबसे बड़ी बात है कि चुमकी सिर्फ़ उसकी ही उपेक्षा करती हो ऐसी बात नहीं है, पिता के रूप में अरुण गांगुली की भी कोई ख़ास परवाह नहीं करती। हाँ बासंती की भी बहुत परवाह करती हो, ऐसी बात भी नहीं है। हाँ, पिता की तुलना में माँ के साथ दो-चार बातें ज़्यादा होती हैं। दरअसल चुमकी किसी का भी सम्मान नहीं करती। वह अपनी मन-मर्ज़ी करना पसंद करती है। टोकने पर हंगामा कर बैठती है। बीते कल ही तो ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गई थी। 
      बासंती देवी निजी कार से काली मंदिर पूजा करने गई थीं। दोपहर का भोजन कर अरुण गांगुली विश्राम कर रहे थे। और आधे घंटे बाद ही वे प्लांट जाने के लिए रवाना होंगे। कंपनी की एंबेसडर नीचे पोर्टिको में इंतज़ार कर रही थी। दो-चार बार अंदर-बाहर निकलते हुए अनिच्छा से चुमकी ने अरुण गांगुली से कह ही डाला - आपकी गाड़ी ज़रा मुझे कॉलेज छोड़ आएगी?
      तुम तो जानती हो वह मेरी नहीं, कंपनी की है।
      फिर भी वह आपकी ही है।
      वह कंपनी के काम के लिए है।
      मतलब, नहीं छोड़ेगी ?  चुमकी का मानो दिमाग गरम हो गया हो। उसने तिरस्कार के स्वर में पिता से कहा - ईमानदारी अच्छी बात है। तो उस दिन आपकी ईमानदारी कहाँ थी?
      साथ वाले कमरे में शमीक हर बात सुन पा रहा था। उस दिन से मतलब?
      चुमकी ने किस बात की तरफ इशारा किया, यह तो शमीक नहीं जानता लेकिन यह समझ गया कि चुमकी ने अवश्य पिता पर बड़ा आघात किया है क्योंकि उसकी इस बात के जवाब में अरुण गांगुली कुछ भी नही कह पाए। सहसा मानो उन्होंने खुद को सिकोड़ लिया। यह सही है कि शमीक उनका चेहरा नहीं देख पा रहा था लेकिन अनुभव कर पा रहा था कि अरुण गांगुली मानो ज़मीन में गड़े चले जा रहे हों। उनकी कोई आवाज़ ही नहीं सुनाई दे रही थी। जबकि चुमकी ने किसी बालक को धमकाने की भाँति पूरे घर को सर पर उठा रखा था।
      ये है चुमकी। इसी बात पर शमीक को आपत्ति है। क्या वह अपने पिता को और थोड़ा सा सम्मान, और थोड़ा सा स्नेह नहीं दे सकतीहमेशा त्योरियां चढ़ाए रखने की क्या ज़रूरत हो सकती है? हाँ, बिना वजह कुछ भी नही होता, हर बात के पीछे कोई न कोई वजह होती है। यहाँ भी चुमकी की कोई वजह हो सकती है वर्ना वह हमेशा ऐसी चिड़चिड़ी क्यों बनी रहेगी? और चुमकी की बात सुनकर अरुण गांगुली ही भली क्यों ठंडे पड़ गए? शमीक सब कुछ मानने के लिए तैयार है। फिर भी एक बात रह ही जाती है। बतौर बेटी पिता के प्रति नर्मी का रुख होना चाहिए। वे क्रमश: निस्तब्ध दुनिया के प्राणी बनते जा रहे हैं, यह तो सबको समझना चाहिए।
      इसी प्रसंग में शमीक को एक बात और याद आ गई। अरुण गांगुली द्वारा उसे पैंट-शर्ट, सूट इत्यादि वस्तुएं खरीद कर दिए जाने पर चुमकी ने अपनी माँ के पास टिप्पणी की थी, पिता हद से बाहर जा रहे हैं। हाँ, बासंती ने बेटी का बात का समर्थन नहीं किया था बल्कि विरोध ही किया था। हाँ, यह भी सही है कि वे शमीक को काफी स्नेह करती है। उसे अपनी संतान से तनिक भी भिन्न नहीं समझतीं। शमीक के मन में प्रश्न उठता है कि  माँ के समक्ष पिता के विरुद्ध बात कहने की चुमकी की हिम्मत कैसे हुई? पिता के प्रति उसके मन में यह द्वेष क्यों?  हाँ, माँ के प्रति भी एक सी प्रतिक्रिया है। मामूली सा अंतर है। बासंती भी बेटी से ज्यादा उलझना नहीं चाहतीं। गृहस्थी का संपूर्ण ज़हर खुद पीकर वे एक विषाद प्रतिमा बनी हुई है। कोई एक आंतरिक रहस्य तीनों को परस्पर अलग किए हुए है, यही शमीक के लिए आश्चर्य की बात है।
                                                                             ......जारी।
बांग्ला से अनुवाद  नीलम अंशु
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,
राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन,
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ से प्रकाशित। (2009)


शुक्रवार, मई 13, 2011

धारावाहिक बांग्ला उपन्यास - 1

(कहते हैं पुस्तकों से बढ़कर कोई साथी नहीं। आज हिन्दी और अन्य प्रादेशिक भाषाओं में ढेर सारा साहित्य रचा जा रहा है। पहले की तुलना में प्रकाशन बहुत आसान भी हो गया है। फिर भी लोग पाठकों की कमी की दुहाई देते हैं कि पुस्तकें बिकती नहीं। पहले तो प्रकाशन के लिए इतनी मशख्कत, फिर क्रेता यानी पाठक नदारद। लेकिन, बंगाल में आज भी पुस्तक संस्कृति कायम है। लोग उपहार में पुस्तकें देते हैं और खरीदते भी हैं। कोलकाता का पुस्तक मेला तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात है। यहाँ के जनमानस के हृदय में  पुस्तक मेला तीज-त्योहारों सा महत्व रखता है। पुस्तकों की खरीददारी के लिए लोग बकायदा साल भर बजट बना कर पैसा जमा करते हैं। साल भर बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं इस आयोजन का।      
       यहां प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम से उनका लेखन जन-जन तक पहुंचे।     
     गोधूलि गीत का शमीक उस युवा पीढ़ी के लिए उदाहरण हैं, जो आज अंधेरे के गर्त की ओर अग्रसर होती जा रही है और पैसे कमाने के लिए कोई भी हथकंडा अपनाने से नहीं चूकती और अपनी जिम्मेदारियों से मुंह फेर लेती है लेकिन इसी समाज में शमीक जैसे अपवाद भी मौजूद हैं। आगे आप खुद ही पढ़िए विस्तार से.....)
 गोधूलि गीत  
0 समीरण गुहा 
बंबई के नरीमन प्वाइंट की गगनचुंबी इमारतों में से एक बहुमंज़िली इमारत की पंद्रहवीं मंज़िल में मुलायम कार्पेट बिछे सुंदर से एक कमरे में काम में मग्न है शमीक। वह जिस रिवॉल्विंग चेयर पर बैठा है, उसके ठीक पीछे दीवार पर शीशे की खिड़की है। फिर समंदर इतने क़रीब है कि किसी भी क्षण उछल पड़ेगा। यहाँ से भी कभी-कभी लहरों की गर्जना सुनाई देती है। चौपाटी बीच के उस तरफ मालाबार हिल की रंग-बिरंगी गगनचुंबी इमारतें फ्रेम में जड़ी शानदार तस्वीर जैसी प्रतीत होती हैं। हवा के झोंके आकर शमीक के शैंपू किए बालों से अठखेलियां कर रहे हैं फिर भी वह अभी फाइल देखने में व्यस्त है। बहुत बड़े सुंदर से इस कमरे में मीठी-मीठी सी सुगंध फैली हुई है। काँच के बड़े से टेबल पर एक तरफ दो रंगीन फोन रखे हैं दूसरी तरफ चपरासी कॉफी का जो कप रख गया है, वह ज्यों का त्यों पड़ा है। शमीक ने एक भी चुस्की नहीं ली। नहीं ली, मतलब शायद भूल गया है। वेस्टर्न कन्सट्रक्शन कंपनी का वह चीफ इंजीनियर है। एक साथ उनकी चार साइटों पर काम शुरू होने वाला है।
      फाइलें इन चारों साइटों से संबंधित हैं। किस साईट पर कौन जाएगा, कितने लोग जाएंगे, मशीनें वगैरह आगे-पीछे कहाँ-कहाँ भेजनी होंगी, नहीं होंगी और निर्धारित समय से कितना पहले काम ख़त्म होने पर कितने पर्सेंट नफा होगा, ऐसी बहुत सी चिंताएं शमीक के दिमाग में घुमड़ रहीं हैं। पिछले दस दिनों से क्लायंटों से मीटिंगों के साथ-साथ इन चारों साइटों पर कई बार घूम आया है। अब काम शुरू कर देना होगा। अत: लंच से पहले ही ये फाइलें......
      सर! दरवाज़े के बाहर चपरासी शिवरामकृष्ण दिखा। धीमे-धीमे क़दमों से कमरे में आकर वह विनीत स्वर में बोला सर, कोई सज्जन आपसे मिलना चाहते हैं
      अब कैसे संभव है? लंच के बाद मिलने के लिए कहो।
      सर, मैंने कई बार कहा, लेकिन वह आदमी मानता ही नहीं। मैंने उनका नाम भी पूछा था, नहीं बताया।
      कमाल है ! नाम-धाम नहीं बताना चाहता, उसे समय कैसे दूं? तुम जाकर कहो मैं डेढ़ बजे के बाद मिलूंगा।
      शिवरामकृष्ण चला गया और कुछ मिनटों बाद लौट भी आया। सर, वे कुछ नहीं सुनना चाहते। आपसे अभी मिलना चाहते हैं। मैंने कई बार पूछा है, परंतु नाम क्या है, कहां से आए हैं, क्यों मिलना चाहते हैं, किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया।
      शमीक के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उसे बड़ा आश्चर्य हो रहा था। या मिलने की यह नवीनतम तकनीक है परंतु ऐसा लहज़ा तो ठीक नहीं। नियमानुसार भी पर्याप्त नहीं है।  कुछ भी नहीं कहना, कुछ नहीं बताना, पर मुलाक़ात करनी है। शमीक यदि अब न मिलना चाहे तो? यही तो स्वभाविक है। पहले से अप्वांयटमेंट न हो तो मुलाक़ात के लिए समय दे पाना मुश्किल हो जाता है। जो भी हो, भद्रपुरूष जब कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं तो क्या किया जा सकता है ? न चाहते हुए भी शमीक ने धीमे स्वर में कहा - भेज दो।
      एक मिनट भी नहीं गुज़रा होगा कि धीमे-धीमे क़दमों से कमरे में एक वृद्ध सज्जन आ खड़े हुए। सत्तर के लगभग उम्र होगी। पहले काफी खूबसूरत रहे होंगे, यह तो समझ आ ही रहा था। अब शायद गरीबी से जूझ रहे थे क्योंकि उनकी पोशाक काफ़ी गंदी सी लग रही थी। सर के लंबे बालों के साथ-साथ बढ़ी हुई दाढ़ी उन्हें और भी उपेक्षित बना रही थी। ऐसे व्यक्ति के साथ भला कोई कैसे सम्मानपूर्वक बात कर सकता है। कई लोग भद्रता दिखाने में भी कंजूसी करेंगे। पर शमीक की बात अलग है। उसकी परवरिश ही दूसरी तरह की है। काम में व्यस्त होते हुए वह असहज नहीं हुआ और पर्याप्त सम्मानपूर्वक कहा - आप खड़े क्यों हैं, बैठिए !
       वृद्ध सज्जन काफ़ी ज़्यादा समय लगाकर धीरे-धीरे शमीक के सामने वाली कुर्सी पर आ बैठे। टेबल के ज़रूरी क़ागज़ातों को समेटते हुए शांत स्वर में शमीक ने पूछा, आपने अपना नाम नहीं बताया और मुझसे मिलना चाहा। किस काम से आएं हैं ज़रा बता देते तो....
      क्या तुम मुझे पहचान नहीं पा रहे हो? उपेक्षित व्यक्ति नहीं एक बड़े व्यक्तित्व का उलाहनाभरा स्वर! पता था तुम नहीं पहचान पाओगे, परंतु तुम्हें दोष देकर फायदा भी तो नहीं। असली गुनाहगार तो मैं हूँ।
      शमीक के सीने में एक ख़ामोश सा भूचाल आ गया। कमरे में प्रवेश करते वक्त वृद्ध पर उचटती सी नज़र डाली थी। बातें सुनकर गहरी दृष्टि से उनकी ऑंखों में देखते ही उस भूचाल ने उसे बिलकुल ही तहस-नहस कर डाला। बीस-इक्कीस वर्षों के लंबे अंतराल पर हर तरफ से छुपाए रखने के बावजूद उनकी तीखी नाक और ऑंखें इस वक्त बड़ी जानी-पहचानी सी लग रही थीं।  दरअसल पहचान पाने के लिए शमीक मानसिक रूप से तैयार नहीं था। 
      अपने-अपने कामों से कितने ही लोग उससे मिलने के लिए आते ही रहते हैं। उस वृद्ध व्यक्ति को शमीक ने ऐसे ही लोगों में से समझा था परंतु बीस-इक्कीस सालों बाद अरुण गांगुली इस तरह उसके सामने आ हाज़िर होंगे, यह तो उसने सोचा ही नहीं था।
      शमीक अपनी कुर्सी छोड़ उठ खड़ा हुआ। इस समय उसके मन में कम रोष नहीं जो समय के साथ दब गया था, अब फिर तीव्र हो उठा। लेकिन शमीक तो मूर्ख नहीं है। मान-अभिमान  की बात सोचना इस वक्त ठीक नहीं होगा। ऐसे में सब कुछ गड़बड़ हो जाएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि इतने सालों बाद भी अरुण गांगुली असहाय की भांति, विभ्रांत से उसके पास आए हैं। इसकी सार्थकता और महत्व असीम है। इन्हीं अरुण गांगुली ने एक दिन कहा था - तुम मेरी औलाद की तरह हो, अब तुम्हारे बड़ा होने में मैं तुम्हारी ज़रा सी सहायता कर रहा हूँ, जब मैं बूढ़ा हो जाऊंगा तब तुम मेरी देखभाल करना।
      ये बातें जब उन्होंने कही थीं तब वे सैंतालीस-अड़तालीस वर्षीय मध्य वय: के थे और शमीक सिर्फ़ उन्नीस-बीस वर्षीय एक किशोर। ये सिर्फ़ कहने की बातें नहीं थीं। सचमुच ही उन्होंने शमीक के लिए बहुत कुछ किया था। शमीक भी उनके प्रति कृतज्ञ था।  सिर्फ़ एक दिन के फैसले पर ग़लतफ़हमी पाल कर वह इन्हें छोटा नहीं दिखाएगा। इतने वर्षों बाद भी अरुण गांगुली अपराधबोध की गठरी लिए घूम रहे हैं, यह उनके चेहरे से ही स्पष्ट है. शमीक के पास लौटना  इसी बात का तो प्रमाण है।
      कमरे में चारों तरफ नज़र दौड़ा कर अरुण गांगुली कोमल दृष्टि से शमीक को देखने लगे।  शमीक भी उनकी ऑंखों में ऑंखें डाल निहारता रहा। उम्र के मुकाबले अरुण गांगुली ज़्यादा वृद्ध हो गए हैं। बीस-इक्कीस वर्ष पूर्व आज की भांति साधारण पोशाक में उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। सब कुछ में एक खालीपन सा रह जा रहा है जिसे शमीक सोच-विचार और युक्ति से भर नहीं पा रहा है। अरुण गांगुली स्थिर नज़रों से देखे जा रहे हैं। असंगति की भावना को मन से निकाल कर शमीक धीरे-धीरे आगे बढ़ा। दोनों हाथ बढ़ाकर चरणस्पर्श करते ही अरुण गांगुली ने उसे सीने से लगा लिया। लगातार लंबी सांस छोड़ते हुए स्नेह से उसका माथा चूमते हुए कहा, तुझे मैंने उस दिन बहुत मारा था न? पहली बार अरुण गांगुली ने शमीक को तू कहकर संबोधित किया। वे बोले, जानते हो, तुमसे भी ज़्यादा तकलीफ़ मुझे हुई थी। बहुत ज़्यादा।  अरुण गांगुली चुपचाप रोने लगे। हाँ, सत्तर वर्षीय एक वृद्ध की ऑंखों से एक शिशु की भाँति ऑंसू निकल रहे थे।
      अरुण गांगुली के सीने से लगे रहकर उतनी ही देर में शमीक ने महसूस किया कि उन्हें तो बुखार है और उनके ऑंसू भी उसे भिगो रहे थे। शमीक ने जल्दी से कहा, आपका बदन तप रहा है। उन्होंने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। रुक-रुक कर वे काँपने लगे। दोनों बाँहे क्रमश: ढीली पड़ गई थीं। ऑंखें भी कैसे धुंधली सी होकर मुंदने लगी थीं। ऐसी स्थिति में भी अरुण गांगुली बोले - इस उम्र में आत्मत्याग कर गृहस्थी के लिए कुछ करने की तुम्हारी सोच ने मुझे उद्वेलित किया था।  पर जिनके लिए किया वे...
      आपके आशीर्वाद से दोनों छोटी बहनों की अपनी क्षमतानुसार अच्छी परवरिश की है।
      मैं तुम्हें भगा न देता तो शायद तुम उन्हें और अच्छी तरह....
      ऐसा न कहें उस दिन की बात छोड़ दीजिए। वर्ना आपने मेरे लिए जो किया आजीवन मैं आपके प्रति सिर्फ़ कृतज्ञ ही नहीं, ऋणी रहूंगा। थोड़ी देर बाद शमीक ने फिर कहा, नानू और सेवा दोनों ने ही बांग्ला में एम. ए. की।  दोनों बहनों की अच्छे घरों और अच्छे वरों से शादियां की। नानू अब अपनी ससुराल में सिलीगुड़ी में है और सेवा चंडीगढ़ में। न्युबैरकपुर वाला घर भईया के पास ही है।
      और तुम्हारी माँ?
      माँ मेरे ही पास हैं। दो हफ्ते पहले सिलीगुड़ी गई हैं।
      बहुत खुशी हुई शमीक। मेरे कारण तुम थम नहीं गए। तुमने अपनी गृहस्थी संवारी, खुद इतने बड़े बने। मुझे कितनी खुशी हो रही है, तुम्हें समझा नहीं सकता परंतु तुम्हारे प्रति मैंने जो अपराध किया है, उसकी क्षमा कैसे मिलेगी?
      कृपया ऐसा मत कहें !   ‘’
      शमीक तुम मुझसे छोटे होकर भी बहुत बड़े बन गए हो।  मेरा इतना महत्व नहीं है..... मेरा.....  अचानक बोलना रुक गया. अरुण गांगुली बेहोश होकर गिर ही पड़ते, किसी तरह उन्हें संभाल कर शमीक सहायता के लिए चिल्ला उठा - शिवराम ! शिवराम!
       नहीं, शमीक अरुण गांगुली को लेकर बंबई के किसी नर्सिंग होम या अस्पताल नहीं गया। अपनी गाड़ी में बिठाकर सीधे पहुंचा कंपनी द्वारा मिले खार के फोरटिंथ एवेन्यू के सुसज्जित फ्लैट में। तुरंत डॉ. जौहरी को फोन किया पर पता नहीं क्यों निश्चिंत नहीं हो पा रहा था। बंबई के एक और डॉक्टर कारेंजकर से भी घर आने का अनुरोध किया।
      अरुण गांगुली अब शमीक के कमरे में लेटे हुए हैं। सिर्फ़ शमीक का कहना ग़लत होगा। यह कमरा अभिरूपा का भी है। अभिरूपा कलकत्ते की है और नौ साल हुए शमीक से शादी को। शादी के बाद बंबई आई और तब से इसी घर में है. बड़े सलीके से सजाए -संवारे कमरे के मंहगे पलंग और चमचमाते बिस्तर पर लगभग मैली-कुचैली पोशाक में एक वृद्ध पड़ा हुआ है। शुरु से ही मामला इतना बुरा लग रहा है कि क्या कहा जाए। यद्यपि अभी अभिरूपा ने पति से कुछ कहा नहीं है। हाँ, कहने का मौक़ा भी तो नहीं मिला परंतु मन ही मन वह काफ़ी असंतुष्ट हुई। किसी बाहरी व्यक्ति को इस तरह अपने कमरे में रखने का क्या मतलब है? घर में तो और भी कमरे थे। और, शमीक ने उससे एक बार पूछने की भी ज़रूरत महसूस नहीं की। लेकिन, वृद्ध फुटपाथी आदमी है ऐसा लगने जैसी कोई बात नहीं है। पहली बात तो उसे बेडरूम में लिटा रखा है, उससे भी बड़ी बात शमीक की व्यग्रता। एक भयावह फ़िक्र ने उसे घर रखा है। बंबई के दो मशहूर डॉक्टरों को एक साथ बुलाना यही तो साबित करता है। सिर्फ़ इतना ही? तिस पर भी शमीक की सजगता। इस वृद्ध का सिर मामूली सा एक तरफ को लुढ़क गया था, तुरंत शमीक ने काफी सतर्कता और अपनेपन से तकिए पर उनका सिर टिक दिया। इस छोटे से काम में ही शमीक की ममता या स्नेह जिस तरह परिलक्षित हो रहा है, ठीक उसी तरह इस व्यक्ति की अदृश्य शक्ति कितनी विशाल है, इस बात को महसूस किया जा सकता है। 
      सोच-विचार छोड़ अभिरूपा पति की ओर बढ़ी. शमीक की ऑंखों में देख धीमे स्वर में पूछा, यह आदमी कौन है?
      आदमी ! किसे आदमी कह रही हो? 
      जिसे हमारे बिस्तर पर लिटा रखा है।
      तुमने इसे ही बड़ी बात समझा। वो बीमार हैं, किसी भी पल...
      सो तो समझ रही हूँ। अभिरूपा ने अपनी बात में संशोधन किया और कहा,
      वे कौन हैं?
      इसी वक्त यह जानना ज़रूरी है क्या? शमीक ने करुण हँसी हँसते हुए कहातुम बड़ी नासमझ बनती जा रही हो रूपाइस वक्त जो करना चाहिए....शमीक अपनी बात पूरी नहीं कर पाया। डॉ. जौहरी और डॉ. कारेंजकर दोनों को एक साथ आते देख कर चिंतित सा उनकी अगवानी मे बढ़ते हुए बोला - आईए, आईए।
      दोनों डॉक्टरों ने अरुण गांगुली को देखा। इलाज की सुविधा के लिए शमीक ने पहले से ही बता दिया था कि यद्यपि उन्हें बुखार है परंतु यह अस्वस्थता सिर्फ़ बुखार की वजह से हो, ऐसा नहीं लगता। वे बार-बार सीने में दर्द की शिकायत करे रहे थे। डॉ. जौहरी और डॉ कारेंजकर शमीक की बातें सुनते-सुनते ही अपना काम करने लगे। डॉ. जौहरी ने अरुण गांगुली का ब्लड प्रेशर देखा, ई. सी. जी. किया। आधे घंटे तक जांच करने के बाद डॉ. जौहरी ने कहा, इट इज़ ए केस ऑफ माइल्ड स्ट्रोक। लेकिन रोगी को ज़्यादा हिलाए-डुलाए नहीं. जिस स्थिति में हैं उसी स्थिति में और दस-बारह घंटे पड़ा रहने दें।
      सात-आठ दिन गुज़र गए। अरुण गांगुली की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। बल्कि इन दिनों में स्वास्थ्य और ख़राब हो गया था। यही शमीक के फ़िक्र का कारण था. इतनी अच्छी चिकित्सा और बंदोबस्त के होते हुए भी अरुण गांगुली स्वस्थ्य क्यों नहीं हो पा रहे?
      रात और दिन के लिए अलग-अलग दो नर्सें रखी हुई हैं। कितनी तरह की मंहगी-मंहगी दवाएं लाई गईं। इसका तो कोई लेखा-जोखा ही नहीं है. और, डॉ. जौहरी तथा डॉ. कारेंजकर दोनों ही दोनों वक्त आ रहे हैं. वे तो बार-बार देख ही रहे हैं, नई-नई दवाएं लिख रहे हैं और घड़ी देखकर वे दवाएं खिलाई भी जा रही हैं परंतु बात नहीं बन रहीं. अत: शमीक का दुखी होना स्वभाविक है. अरुण गांगुली को स्वस्थ्य करने के लिए उसने क्या नहीं किया? प्रथम तीन दिन तो वह दफ्तर ही नहीं गया। चौथे दिन से सिर्फ़ दफ्तर ही जा रहा है, बाकी पूरा समय अरुण गांगुली को ही लेकर बीत रहा है। दो नर्सों के होते हुए भी वह रात को निश्चित होकर सो नहीं पाया। हरदम साये की भाँति लगा रहा।  कब कौन सी दवा और पथ्य दिया जा रहा है, तकलीफ़ घट रही है या बढ़ रही है, हर तरफ वह सजगता से ग़ौर कर रहा है।
      इसी विषय में उस दिन अभिरूपा से उसकी तक़रार भी हो गई। उनकी एक मात्र बिटिया अभी साढ़े छह साल की है। कुछ दिनों से उसकी तबीयत भी ठीक नहीं चल रही।  इसी बात की शिकायत है अभिरुपा को। अत: उसने क्रोध से ही कहा, एक पराए व्यक्ति की चिकित्सा में दिन-रात लगे हुए हो, अपनी बेटी की कोई फ़िक्र है तुम्हें?
      क्यों, क्या हुआ तितिल को?
      स्कूल में सिर चकराकर गिर पड़ी थी. उसके अलावा रोज़ ही रात को थोड़ा बुख़ार हो जाता है।
      तुम तो हो ही।  डॉक्टर भी सुबह-शाम दोनों वक्त घर पर आ ही रहे हैं।
      मेरा होना ही सब कुछ है? अभिरूपा ने सीधे-सीधे ताना दिया  - तुम नहीं हो? अपनी बेटी के लिए जो कुछ भी नहीं करता, पराए के लिए इतना करने की क्या ज़रूरत है?
      अभिरूपा ! तुम ज़्यादती कर रही हो। शमीक वैसे पत्नी को संक्षेप में रूपा कहकर ही बुलाता है परंतु गुस्से में हो तो पूरा नाम ही लेता है और ये पूरा नाम सुनना अभिरूपा के लिए कोई बड़ी बात नहीं है।  दफ्तर के काम से बाहर जाते समय सब कुछ समय पर ठीक-ठाक न मिलने पर भी शमीक यही पद्धति अपनाता है। दरअसल वह जितना नाराज़ नहीं होता उससे भी ज़्यादा उस मुद्दे को महत्व देना चाहता है। जो भी हो अभिरूपा पर लेशमात्र  भी असर नहीं हुआ। उल्टे उसने भी कहा - ज़्यादती तो तुम ही कर रहे हो, राह चलते एक आदमी को...
      प्लीज़ अभिरूपा, प्लीज़!  वे राह चलते आदमी नहीं हैं।
       तो कौन हैं?
       मैं तुम्हें बताऊंगा - ज़रूर बताऊंगा, परंतु बताने का समय चला तो नहीं गया ? बिना वजह  तुम उतावली क्यों हो रही हो?
      बिना वजहजो व्यक्ति मेरे लिए पूर्णत: अपरिचित है, उसके लिए तुम क्या-क्या  नहीं कर रहे हो? किसी अस्वस्थ्य व्यक्ति के लिए कुछ करना अवश्य अच्छी बात है परंतु जिसकी फ़िक्र में तुम्हारा ऑफ़िस जाना छूट गया, नहाना-धोना, खाने-पीने की सुध नहीं, अपनी बेटी की सुध लेने का भी समय नहीं। ऐसे में उस व्यक्ति के बारे जानने की इच्छा क्या अकारण है? मामला मेरी समझ में नहीं आ रहा। लगता है तुम कुछ छुपा रहे हो।     
      सवाल ही नहीं उठता। शमीक ज़रा सा उत्तेजित हो गया। अगर ऐसी बात होती तो मैं उन्हें घर पर क्यों लेकर आता? अपना बेडरूम ही क्यों दे देता? और, इलाज का यह इतना बड़ा आयोजन भला किस लिए? इससे क्या साबित होता है कि मैं कुछ छुपा रहा हूँ? दरअसल रूपा तुम नहीं जानती कि वे कौन हैं? जब जान जाओगी, उस दिन तुम भी उनके लिए अवश्य ही ऑंसू बहाओगी।  मैंने तो सोच ही रखा है कि तुम्हें सब कुछ बताऊंगा। बस ज़रा सी मोहलत चाहता हूँ, क्योंकि टुकड़ों-टुकड़ों में बताने से बहुत कुछ अनकहा रह जाएगा। यह मैं नहीं चाहता।  प्रत्येक दिन की प्रत्येक घटना चित्र की भाँति तुम्हारे समक्ष पेश करूंगा ताकि तुम सब कुछ महसूस कर सको। उसी तरह तुमसे कहना चाहता हूँ रूपा - सिर्फ़ इन दिनों तुम मुझे ज़रा समझने की कोशिश करो।
      उस दिन ऑफिस से लौटने में शमीक को काफ़ी रात हो गई। घर लौटकर वह उसी पोशाक में ही सीधे अरुण गांगुली के सिरहाने जा खड़ा हुआ। ऑफिस के काम में भी उसका मन नहीं लग रहा था। मन घर की तरफ ही लगा हुआ था। अरुण गांगुली की स्थिति क्रमश: बिगड़ती जा रही थी। सुधार के लेशमात्र भी लक्षण नज़र नहीं आ रहे थे। हाँ, डॉक्टर जौहरी और कारंजीकर लगातार आश्वासन दे रहे थे।  उन बातों से शमीक के मन को राहत नहीं मिल रही थी, परंतु यकीन किए बिना कोई चारा भी तो नहीं। रात-दिन उसे एक ही फ़िक्र है कि वे जल्दी से जल्दी ठीक हो जाएं। इस वक्त शमीक इससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहता। आज घर लौटने में उसे काफ़ी रात हो जाएगी। महत्वपूर्ण बोर्ड मीटिंग होनी है। वह सब निपटाए बगैर तो घर लौटना मुमकिन नहीं। शमीक ने लगभग चार बार घर फोन किया।  चारों बार नर्स ने बताया कि मरीज़ की स्थिति ज्यों की त्यों ही है।
      सिरहाने खड़े होकर शमीक ने एक टक अरुण गांगुली के चेहरे की तरफ देखा।  इतना निर्जीव लग रहा है कि साँस चल रही है या नहीं, यह भी पता नहीं चल रहा।  धीमे स्वर में नर्स से बात कर शमीक ने दिन भर का समाचार पूछा।  अचानक अरुण गांगुली ने ऑंखे खोलकर देखा। काफ़ी देर बाद अस्फुट स्वर में कहा, कौन शमीक?
      जी ! शमीक बिस्तर के पास बैठ कर काफ़ी झुककर अरुण गांगुली के क्लांत चेहरे को देखने लगा।
      कब लौटे ?
      अभी-अभी।
      अरुण गांगुली ने अपना कमज़ोर हाथ बढ़ाकर शमीक के दाहिने हाथ का स्पर्श किया। उनकी दोनों ऑंखों में कृतज्ञता झलक रही थी। बहुत ही धीरे-धीरे कहने लगे -तुमने मेरे लिए जो किया..... अरुण गांगुली ने अपना कमज़ोर हाथ बढ़ाकर शमीक के दाहिने हाथ का स्पर्श किया। उनकी दोनों ऑंखों में कृतज्ञता झलक रही थी। बहुत ही धीरे-धीरे कहने लगे - तुमने मेरे लिए जो किया....
      फ़िर आपने वही बातें शुरू कर दीं?
      न कहूँ?
      नहीं, मैंने ऐसा कुछ नहीं किया जो आप बार-बार दोहराते रहें। जो किया है, वह मुझे करना चाहिए था।
      अरुण गांगुली स्थिर नज़रों से शमीक की तरफ देखते रहे। दोनों ऑंखों में पानी झिलमिला रहा था। बहुत कोशिश करने के बावजूद वे उसे रोक नहीं पाए। शमीक ने जेब से रूमाल निकाल कर अरुण गांगुली की गीली ऑंखें पोंछ दीं। किसी तरह इतना ही कह पाया, आप यदि ऐसा करेंगे तो मैं खुद पर कैसे काबू पाऊंगा? 
      तुम्हारी तरह दृढ़ संयमी तो कभी मैं भी था। अब जाने का समय हो आया और कितना दृढ़ रहने को कहते हो? शमीक तुमसे एक बात कहनी थी बेटा!
      नर्स ने तुरंत रोकते हुए कहा, कृपया आप और नहीं बोलेंगे।  आपका दिल बहुत कमज़ोर है।  बोलना मना है।
      अरुण गांगुली ने उसकी बात नहीं सुनी, बल्कि नर्स से ही अनुरोध कर कहा, शमीक से मुझे दो बातें करनी हैं। ये उसे बतानी ही पड़ेंगी। यदि आप बुरा न मानें तो ज़रा बाहर से घूम आईए। 
       कमरे से नर्स के बाहर निकलते ही अरुण गांगुली ने एक लंबी साँस छोड़ते हुए कहा, जिस कारण तुम्हें उस दिन निर्दयी की भाँति पीटा था, उस ग़लतफ़हमी को दूर होने में मुझे एक हफ्ता भी नहीं लगा, और उसके बाद से ही मुझे तुम्हारी ये बात कचोटने लगी, आपने मुझे बेवजह ही मारा है। तुम्हारा ये छोटा सा वाक्य अभी भी नश्तर की भाँति मेरे सीने में गड़ा हुआ है शमीक। और उस सज़ा का बोझ अब भी मैं लादे घूम रहा हूँ। यह कितनी बड़ी सज़ा है, किसी को कहकर समझाया नहीं जा सकता। मैं उसे रोज महसूस कर रहा हूँ।
      कृपया अब आप ज़रा चुप हो जाईए।  आपकी तबीयत और ख़राब हो सकती है।
      मुझे अब अच्छा होने की क्या ज़रूरत है शमीक? परंतु तुम्हारे पास अगर इतनी भी स्वीकारोक्ति न करूं तो और कितना हीन बनकर रहूँ? 
      जानते हो शमीक, आज मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। अब तक मुझे मृत्यु का भय था - अब वह मृत्यु भी अच्छी लग रही है।
      शमीक ने संक्षेप में पूछा - अब वे कहाँ हैं?
      बासंती की बात कह रहे हो - वह तो नागपुर में है।
      और आपकी बेटी ?
      चुमकी फिनलैंड में है। उसका पति वहीं नौकरी करता है।
      सुनील शिवलकर?
      नहीं, करुण स्वर में अरुण गांगुली ने कहा। चुमकी के साथ अंतत: सुनील की शादी नहीं हुई। चुमकी ने ही आपत्ति की थी लेकिन, वह तुमसे शादी करना चाहती थी, परंतु तब तक बहुत देर हो गई थी। बहुत देर। दरअसल चुमकी ने तुम्हें ढूँढ निकालने की बात की थी। शर्मसार होकर नहीं कर पाया। शर्म छुपाने के लिए सिर्फ़ इतना ही कहा था, बेटी बहुत देर हो गई है, बहुत देर।

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      इसके बाद दो दिन भी नहीं गुज़रे। अरुण गांगुली गुज़र गए। तब शाम के साढ़े पाँच बजे होंगे. शमीक कंपनी की एक मीटिंग में था. वहीं घर से फोन मिला। अभिरूपा का स्वर - तुम जल्दी ही घर आ जाओ।
      क्या बात है, रूपा ? कोई बुरी ख़बर तो नहीं है?
      तुम आओ तो सही।
      मैं सब कुछ सुनने के लिए तैयार हूँ. तुम मुझे खुल कर कह सकती हो।
अभिरूपा का निस्तेज स्वर सुनाई दिया, अरूण गांगुली..... गुज़र गए हैं।
      शमीक के लौटते ही नर्स ने सबसे पहले बताया - रोज़ की भाँति भोजन करने के पश्चात् वे सो रहे थे। शाम को जगाने के वक्त समझ में आया.... तुरंत डॉ. जौहरी को सूचना दी। वे आ भी गए, परंतु तब तक कुछ भी करना बाकी नहीं रहा. डॉ. जौहरी अब तक थे, आपके आने से पाँच मिनट पहले चले गए।
      यह समझ नहीं आ रहा था कि शमीक ध्यान से बातें सुन रहा था या नहीं क्योंकि वह पागलों की भाँति चारों तरफ नज़रें दौड़ा रहा था। शून्य निगाहों से बार-बार अरूण गांगुली के चेहरे की ओर देखते रहने के बावजूद मन ही मन वह कुछ और सोच रहा था। और यही सोच-विचार उसे अन्यमनस्क करने के लिए पर्याप्त था. शमीक की उम्र जब उन्नीस-बीस वर्ष थी। तब वह इस व्यक्ति के पास एक नौकरी के लिए गया था। सिर्फ़ नौकरी ही नहीं इसके साथ-साथ उसे उनका स्नेह भी मिला था। परंतु उस झंझावात ने आकर सब कुछ तहस-नहस करके रिश्ते को ही शमशान बना दिया था. फिर भी बीस-इक्कीस वर्ष बाद अरुण गांगुली उसी के पास लौट आए थे। वही व्यक्ति थोड़ी देरी पहले चलता बना।
      सबसे पहले जो विचार शमीक के दिमाग में कौंधा, वह था बासंती गांगुली को सूचित करे या नहीं। उनके विरुद्ध शमीक के चाहे कितने ही अभियोग क्यों न हों - अंतिम समय में पति के पास आने का मौका तो शमीक को देना ही चाहिए। बासंती गांगुली ने जो अन्याय किया उसे कोई समर्थन नहीं देगा परंतु सूक्ष्मता से यदि सोचा जाए तो उन्हें भी दोषी नहीं माना जा सकता। हाँ, अपमान और अपवाद का भारी बोझ शमीक के सिर थोप देने के बावजूद वह ऐसा ही सोच रहा है।
      किसने क्या किया, क्या नहीं किया, यह हिसाब-क़िताब करने का समय नहीं है। जो कर्तव्य निभाने चाहिएं शमीक उन्हीं के बारे में सोच रहा है। नागपुर में बासंती गांगुली को इसी वक्त सूचित करना होगा। वे यदि सुबह की पहली या दूसरी फ्लाइट भी पकड़ें तो दोपहर से पहले ही यहाँ पहुँच जाएंगीं। इस समय तक शमीक को इंतज़ार करना होगा। इसके बाद भी अगर बासंती गांगुली न आएं तभी शमीक दाह-संस्कार का सारा बंदोबस्त करेगा। अब सिर्फ़ एक दिन इंतज़ार करने की बारी है।
      रात के दस या पौने दस बजे होंगे। एक इन्सान का जीवन कितना भयानक एकाकी हो सकता है, शव के पास बैठा शमीक यही सोच रहा था। ऐसी स्थिति से दो-चार होने के बारे वह सोच भी नहीं सकता था। जबकि वास्तव में क्या नहीं होता। अरुण गांगुली के शव को संभाले रखकर सारी रात जगे रहना होगा - ऐसा उसने कभी सोचा भी नहीं था। शमीक को अब उसी कर्तव्य का निर्वहन करना पड़ रहा है। हाँ, इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण काम करने बाकी हैं। अत: शमीक ज़रा भी विचलित नहीं है। बल्कि एक महान व्यक्ति के काम आकर वह खुद को भाग्यशाली ही समझ रहा है।
      कमरे में प्रवेश कर अभिरूपा ने प्यार से पति की ओर देखा।  कोमल स्वर में कहा, तुम कुछ खाओगे नहीं? ऑफिस से आकर अब तक कुछ भी मुँह में नहीं डाला। इस तरह बैठे मत रहो - चलो उठो।
      खाने को जी नहीं चाह रहा रूपा।
      ऐसे समय किसी का जी नहीं करता, फिर भी थोड़ा सा खाना ही पड़ता है।
      तुमने खाया?
      नहीं। अभिरूपा ने खुद को संयत करने की कोशिश की। उसकी ऑंखें छलछला रही थीं।  गला भी रूंधता जा रहा था। ऐसे में ही उसने करुण आवाज़ में कहा, पता है इसी बीच उन्होंने एक दिन मुझसे कहा था, मैं अच्छा हो जाऊँ, फिर जी भर कर तुम्हारे हाथों का बना खाना खाऊंगा। मुझे ठीक समझ नहीं आ रहा कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा। इसी कारण बिलकुल भी खाने को जी नहीं चाहता। उनकी वही बात बार -बार याद आ रही है।
      तुम्हें तो यही एक बात बार -बार याद आ रही है और मुझे? शांत से स्वर में शमीक कहने लगा - कितने दिनों की कितनी बातों ने हमें घेर  रखा है - क्या वे भूली जा सकती हैंएक भी बात मैं नहीं भूला रूपा। सारी घटनाएं, सारी बातें तस्वीर की भाँति मेरे मन पर चित्रित हैं। समय का इतना लंबा अंतराल चाहकर भी उन्हें पोंछ नहीं पाया। इतनी अच्छी तरह याद है मानो अभी दो दिन पहले की ही बात हो। जबकि ये सब आज की बातें नहीं हैं। बात ख़त्म करके शमीक कुछ देर ख़ामोश रहा। फिर कुछ सोचते-सोचते अचानक बेटी के बारे पूछा - तितिल सो गई ?
      हाँ, उसे खिला-पिला कर सुला दिया है।
      शमीक ने कहा, तुम तब से खड़ी-ख़ड़ी ही बातें कर रही हो। मेरे पास आकर बैठो। मृत व्यक्ति को सामने रखकर उसकी ज़िदगी की बातें करूंगा। तुमने तो बार-बार उनके बारे में जानना चाहा था। सब कुछ बताने के लिए मैं भी तैयार था, सिर्फ मौका नहीं मिल रहा था। अब तो समय ही समय है।
      अभी न सुनने से भी चलेगा।
      नहीं रूपा, मैंने तो तुमसे कहा ही था कि सब बताऊंगा। डायरी की भाँति रोज़ की हर बात तुम्हें बताऊंगा। मुझे तो लगता है आज ही वह समय है। उससे पहले तुम्हें एक बात बता दूं - सब कुछ जानने के बावजूद तुम अरुण गांगुली की पत्नी बासंती को अंतत: क्षमा कर देना।  वर्ना मृतक की आत्मा को चैन नहीं मिलेगी। यही माफी ही तो अरुण गांगुली ने मुझसे बार-बार माँगी थी। जो भी हो रूपा, शुरू की उस कहानी तक पहुँचने के लिए तुम्हें काफी पीछे लौटना होगा।  काफी पीछे.........
                                                                          .....जारी। 

बांग्ला से अनुवाद नीलम अंशु

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,
राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन,
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ से प्रकाशित (2009)।


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