सुस्वागतम्

"संस्कृति सेतु" पर पधारने हेतु आपका आभार। आपकी उपस्थिति हमारा उत्साहवर्धन करती है, कृपया अपनी बहुमूल्य टिप्पणी अवश्य दर्ज़ करें। -- नीलम शर्मा 'अंशु'

रविवार, दिसंबर 18, 2022

कहानी श्रृंखला - 25 (पंजाबी कहानी) - लहरों का संगीत 0 मेजर मांगट अनुवाद – नीलम शर्मा ‘अंशु’

         पंजाबी कहानी                              


       लहरों का संगीत

                                                       

       0 मेजर मांगट



अनुवाद – नीलम शर्मा अंशु



दोनों तरफ पहाड़ थे, न तो बहुत ऊँचे और न ही नीचे। पहाड़ों से घिरा एक समुद्री तट। माइकल उसके साथ नहीं आया था। उसे तो बार में बैठ बीयर पीना ज़्यादा अच्छा लगा था। यह सोच कर वह उदास हो गई।

कहाँ गई उसकी प्रायॉरिटी ?  क्या उसका मुझसे दिल भर गया ?’ अनामिका ने खुद से पूछा।

वह तो कहा करता था, तुम सारी दुनिया से पहले हो ।

उसने अपनी आँखों की नमी को पोछा।

पानी की मीटर-मीटर भर ऊँची लहरें, उसके कदमों में आकर छुई-मुई सी हो जातीं।

अस्त होते सूर्य की सुनहरी आभा ने मानों सोना बिखेर दिया था। सूर्यास्त होते ही सन-बाथ ले रहे लोगों ने कपड़े समेटने शुरू कर दिए थे। नाममात्र वस्त्रों वाले चमचमाते तनों को अब अंधेरा अपने आवरण के आगोश में लेने वाला था। लोग भले ही सारे वस्त्र उतार देते, हल-चल तो भी नहीं होने वाली थी। हल-चल तो आज उसके दिल में थी, जहाँ सोच-विचार के सैंकड़ों ज्वार उठ रहे थे।

सैलानी अभी भी पानी पर सर्फिंग कर रहे थे। उनकी लाइफ जैकेटें सुरमई शाम में बीरवहुटी की भाँति चमक रही थीं।

नवयुवक और नवयुवतियां तेज़ कदमों से सर्फिंग बोर्ड की तख्तियां चलाते प्रतीत हो रहे थे। कई पानी पर कलाबाजियां खा रहे थे। लोग बहुत खुश थे परंतु आज वह खुश नहीं थी।

माइकल ने उसे रोक कर कहा क्यों नहीं कि ऐनी !  मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।

वह तो अपने किसी स्पेनिश दोस्त के साथ दारू पीने बैठ गया था। ऐनी भारतीय संस्कृति से होने के कारण हमेशा शराब नहीं पीती थी। हाँ कभी – कभार रस्मी तौर पर वाईन या शैंपेन ले लिया करती थी परंतु माइकल अक्सर कहता रहता, अब तुम अपने को बदलो।

जब उन्हें प्यार हुआ था, उसने तो तब ही अपने बारे में सब कुछ बता दिया था। तब तो माइकल को कोई ऐतराज़ नहीं था। तब तो वह भारतीय संस्कृति और व्यंजनों की तारीफें करता नहीं थकता था और अब वह उसे पिछड़े ख़यालों की समझ रहा था। आँखें पोंछती वह आकाश में गहरा रहे तारों को देखती रही।

सूर्यास्त के बाद तारे और भी गहरे हो गए थे। उसे अंतरिक्ष, संगीत, समंदर और प्रकृति में बेहद दिलचस्पी थी परंतु माइकल को यह सब अच्छा नहीं लगता था। उसकी दिलचस्पी तो आइस हॉकी में थी। आइस हॉकी से हटता तो बेसबॉल का जुनून सवार हो जाता। जब वह उसे बार में छोड़ कर आई थी, तब भी बेसबॉल का मैच चल रहा था, जिसमें टोरांटो और टैंपा बे खेल रहे थे। बार में यह बड़े टी वी पर दिखाया जा रहा था। लोगों से बातें करता वह मैच भी देखता रहा। यही वजह थी कि वह उसके साथ नहीं आया था।

वह तो जानता था, कि मुझे सूर्यास्त, लहरों का संगीत और सागर पर चमकते तारे कितने अच्छे लगते हैं। सोच-सोच कर अनामिका फिर उदास हो गई।

उसने तो सारे परिवार के विरुद्ध जाकर माइकल से शादी की थी। स्पेनिश गोरे के साथ पंजाबी युवती की यह शादी रिश्तेदारों को बहुत अखरी थी। माइकल का परिवार तीन पीढ़ियों से वैंजुएला से आकर कैनेडा में बस गया था परंतु अनामिका की यह दूसरी पीढ़ी थी। माइकल तो अपनी संस्कृति और रीति-रिवाजों को भूल चुका था परंतु वह अभी नहीं भूली थी।  अंग्रेजी तो दोनों बढ़िया बोल लेते थे, परंतु स्पेनिश सिर्फ़ माइकल ही बोल सकता था। अमेरिका में तो बहुत से लोग स्पेनिश बोल लेते थे, वह लोगों के साथ दोस्ती गाँठ लेता था। इस बीच पर भी स्पेनिश जानने वाले बहुत थे।

अनामिका को आज अपने परिवार की बहुत याद आई। उसके डैड उसे बहुत प्यार करते थे। माँ सारा दिन उसकी चिंता में डूबी रहती थी। अगर ज़रा सा भी लेट हो जाती, तो उसकी माँ सारा घर सर पर उठा लेती थी। परंतु अब माँ से मिले उसे दो बरस हो गए थे।

वह विक्टोरिया डे वाले दिन आपने डैड के साथ गार्डनिंग करती। उसके डैड को घर के पिछले आँगन में सब्ज़ी-भाजी उगाने का शौक था। वे पंजाब में भी खेती-बाड़ी किया करते थे। बेशक वे पढ़े-लिखे थे परंतु कैनेडा आकर भी उनका जट्टपुणा नहीं मरा था। बात-बात में कहा करते, हम जाट हुआ करते हैं, ऐसे ही कोई गोरा-वोरा मत ढूंढ लेना।

परंतु यह कौन सा किसी में वश में होता है, जब प्यार ही गोरे से हो गया तो मैं क्या करती ? वाटरलू यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस की डिग्री के दौरान, प्रथम वर्ष में ही माइकल उसके जीवन में आ गया था। वह भी साथ वाली बिल्डिंग में ही रहता था और कक्षाएं भी एक साथ ही लगतीं। रोज़ मिलते, इकट्ठे घूमते, छोटी-छोटी बातें प्यार में बदल गई थीं।

वह कभी माइकल और कभी पीछे छूट गए परिवार के बारे में सोचती रही। वह सबसे बड़ी थी। संदीप और विनीत तो अभी छोटे थे। यादें और गहराने लगीं।

अगर पिता को सब्ज़ियां उगाने का शौक था तो उसे फूलों का। वे दोनों पौधे लेने नर्सरी जाते। पिता मिर्च, टमाटर, कद्दू, करेले और बैंगन ढूंढते फिरते और वह अपने मनपसंद फूल, जिनमें उसे रेड फाउंटेन, लिली, स्पाइक्स, जरेनियम, औनोआसल और ट्युलिप बहुत अच्छे लगते। वह ये फूल लेने के लिए अपने डैड को मजबूर कर देती, परंतु जब उसके अपने दिल में प्यार का फूल खिला तो उसके डैड को क़तई अच्छा न लगा।

वह सुबह-शाम पौधों को पानी देती, घास काटती, डैंडीलाइन बूटी उखाड़ती और अपने डैड की अन्य कामों में मदद करती। पर डैड ने उसे अपने दिल से ही उखाड़ बाहर किया था।

क्या वह डैड की बगिया का फूल नहीं थी ? क्या वह भी डैंडीलाइन जैसी कोई बूटी ही थी जो पारिवारिक लॉन में उग आई थी।

सोच-सोच कर उसका सर चकराने लगा था।

किसी पौधे की टहनी टूट जाती तो डैड उदास हो जाते, कोई खरगोश या गिलहरी पौधे को तोड़ देते तो वे बेचैन हो जाते।

क्या उन्होंने माइकल को भी कोई जंगली रकून (एक कैनेडाई जानवर) या फूल-पौधे बर्बाद करने वाला जानवर ही समझा था ?’ उसके डैड हरकीरत सिंह इतने कमज़ोर कैसे हो गए? इतने निर्मोही कैसे हो गए ?

अब वही सब माइकल भी करने लगा था।

उसका सर फटने लगा। अगर माइग्रेन शुरू हो गया तो वापस जाना पड़ेगा। उसने खुद से कहा और छोटे पर्स से ऐडविल की गोली निकाल कर बोतल के पानी से निगल ली।

उसे पुरुषों की मानसिकता ही समझ नहीं आ रही थी, जो झट बदल जाते थे।

पानी की बड़ी लहर आई तो सारे कपड़ों को भिगो गई। लहर तो लौट गई परंतु अनेक शंख-सीपियां गीली रेत पर मोतियों की भाँति चमकने लगे।

अब चाँद भी पूरी शान से चमक रहा था। इतना बड़ा आकार देख कर वह सोच रही थी कि आज ज़रूर फुल मून होगा। माँ फुल मून को शायद पूरणमाशी कहा करती थी। ज्यों-ज्यों चाँद ऊपर आने लगा, तारे फीके पड़ने लगे और लहरें और भी ऊँची उठने लगीं। यही ज्वारभाटा देखने के लिए ही तो वे कोकोआ बीच पर पहुँचे थे।

एक बार वह अपने परिवार के साथ मियामी बीच पर ही गई थी, परंतु डैड के सामने बीच वाली पोशाक नहीं पहन सकी थी। अब जब वह पोशाक पहन सकती थी तो माइकल को पता नहीं क्या हो गया था। तब समुद्री तूफान की चेतावनी के कारण वे वकेशन बीच में ही छोड़ कर आ गए थे, परंतु आज उसके मन में जो तूफान उठ रहा था, उसका वह क्या करे ?

एक तूफान माइकल से शादी के फैसले के कारण घर में भी उठा था। तब माइकल उसे तूफान से निकाल ले गया था। पिता को यह बात अपने पुरखों के खिलाफ़ बगावत और कोई गहरी साज़िश प्रतीत हुई थी। इसके बाद उनकी फूल जैसी बिटिया किसी करौंडे (पंजाब में पाई जाने वाली एक कांटेदार झाड़ी) का काँटा बन उनकी एड़ी में धंस गई थी। वे मानसिक पीड़ा से बेहाल हो गए थे और बेटी से सदा के लिए किनारा कर लिया था।

अगर वश चलता तो पारिवारिक बगिया के इस फूल को भी वे मसल देते। स्वाभिमान के लिए क़त्ल करने वाले उन्हें भी शूरवीर प्रतीत होने लगे थे। कई बार बात मारने-पीटने तक भी पहुँची थी और कई बार माँ ने उसकी ख़ातिर अपनी चुटिया भी नुचवाई थी।

फिर धीरे-धीरे माँ भी पिता के गुट में शामिल हो गई थी। वह बेटी को तो छोड़ सकती थी परंतु पति को नहीं। छोटे भाई-बहन ख़ामोश ही रहते, हाँ इतना ज़रूर था कि छोटी बहन ने मार-कुटाई के दौरान 911 डायल कर पुलिस बुला ली थी और जिसने उसके पिता हरकीरत सिंह को चार्ज कर लिया था। तब ही पुलिस की हिदायत पर वह सुरक्षित जगह ढूँढती, स्थाई तौर पर माइकल के साथ आ रहने लगी थी और कोर्ट मैरिज कर ली थी। इस शादी का विरोध तो माइकल की स्पेनिश फैमिली ने भी किया था, जिनके श्वेत रंग में कालिमा घुल गई थी परंतु माइकल ने किसी की परवाह नहीं की थी।

साल भर दोनों ने बहुत कठिनाईयों का सामना किया। परिवारों की तरफ से वित्तीय सहायता बंद हो गई थी। उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ नौकरियां ढूँढ ली थी। जब अच्छे-ख़ासे पैसे जमा हो गए तो उन्होंने पारंपरिक शादी का एलान कर दिया। दोस्तों की खुशी के लिए डेस्टीनेशन मैरिज के लिए मैक्सिको का एक रिसॉर्ट चुन लिया। उन्होंने खुद ही सभी प्रबंध किए, बैंक से लोन भी मिल गया। और माता-पिता के बगैर सब कुछ उन्होंने खुद ही किया। हनीमून पर वे दो सप्ताह के लिए क्यूबा चले गए। उसके परिवार ने तो कभी बात नहीं पूछी।

पिता लोगों से कहता, मैं जानता हूँ इन गोरों को, एक दिन छोड़ कर भाग जाएगा और फिर आँखों में घूँसे मार-मार रोएगी।

क्या डैड सच कहते थे ?’ वह सोचने लगी।

पानी की एक और लहर आई और सब कुछ भिगो कर चली गई।

कोई ज़ोर से हँसा। जिधर से आवाज़ आई थी, उधर देखा तो माइकल बीच वाली पोशाक पहने चला आ रहा था।

कम ऑन डार्लिंग तुमने मेरा वेट भी नहीं किया, मैंने तुम्हें कहा भी था कि मैच छह बजे तक ख़त्म हो जाएगा। आते ही उसने कहा।

ऐनी चुप रही।

तुम्हें पता तो है डोनाल्डसन, कारनासियो, बटीटसा और कैवन सभी मेरे फेवरेट प्लेयर हैं। जो लास्ट होम रन मारा वह तो देखने वाला था। माइकल बोलता गया।

ऐनी फिर भी चुप रही।

अगर तुम पंद्रह मिनट मेरे पास बैठ जाती, दो घूंट सिप कर लेती या रुक ही जाती, तो मुझे कितना अच्छा लगता। तब तो तुमने कहा था तुम्हारे शौक मेरे, हर बात में साथ दूंगी। अब कहाँ गए वे वादे ?’ माइकल हँसा।

ऐनी बोली तो सही परंतु अपने गिले-शिकवे लेकर बैठ गई।

मैं इसी लिए कैमरा लेकर आई थी कि समुद्र में अस्त होते सूरज की तस्वीरें खींचेंगे। सूरज पर बिखरी सुनहरी परत की तस्वीरें खींचेंगें। तुमने मेरा वह सारा समय निकाल दिया। अब कैसे लौटा लाऊं मैं सूरज को ?  मेरा भी तो वह शौक था, वादे तो तुमने भी किए थे। वह बहुत गुस्से में थी।

माइकल ने सुबकती ऐनी को बाँहों में भर लिया और अंतत: वह ठीक हो गई।

चाँद, चाँदनी रात के अलावा बीच से हट कर लगे खंभों से भी बिजली के बल्वों की रोशनी आ रही थी। इस मध्यम सी रोशनी में वे नंगे पाँव धरती पर चलते हुए, कभी पानी में घुस जाते और कभी बातें करने लगते।

देखो ऐनी, हर व्यक्ति की अपनी मानसिकता और शौक होते हैं और हर व्यक्ति पर उसकी परवरिश का प्रभाव होता है। हमारे परिवारों में बीयर, वाइन या व्हिस्की पीना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। मुझे स्पोर्टस्, मेरे पिता से विरासत में मिली हैं। उसी तरह तुम्हारे शौक हैं और विरासत है। हमें अपने शौक एक दूसरे पर ज़बरदस्ती नहीं थोपने चाहिए। अगर एक ही वक्त दोनों के लिए महत्वपूर्ण है, तो अपने-अपने समय का आनंद उठाने में कोई हर्ज़ नहीं है। तुम प्रकृति का आनंद उठा लेती और मैं मैच देख लेता। अब मैच ख़त्म हो गया है, और मैं झट से आ गया हूँ, परंतु तुम अभी भी नाराज़ बैठी हो जैसे मानो सारा गुनाह मेरा ही हो। अगर हम एक दूसरे को स्पेस नहीं देंगे, तो दम घुटने लगेगा।

फिर तो आप यह भी कहेंगे कि मुझे अपने माता-पिता को भी स्पेस देनी चाहिए थी। अनामिका ने कहा।

ऑफकोर्स तुम्हारे डैड जिस कल्चर में पले-बढ़े हैं, उस का यही चलन रहा होगा। आदमी वैसा ही बनता है जैसा उसके आस-पास का माहौल और हालात बनाते हैं।  हमारे दिमाग प्रोग्राम्ड होते हैं। हमें दूसरे व्यक्ति की साइकोलॉजी समझने की ज़रूरत होती है।

अनामिका सुनती रही और वे कितनी ही देर एक-दूसरे का हाथ पकड़े खड़े बातें करते रहे।

जब हर तरफ घना अंधेरा छा गया, तो चंद्रमा का अक्स पानी पर चाँदी बिखेरने लगा। कई मोटे-मोटे तारे अभी भी चमक रहे थे। उन्होंने अपने टेलिस्कोप से चाँद पर पड़े क्रेटर देखे और दूर के तारों को भी देखा। वे अंदाज़ा लगा रहे थे कि कौन सा मर्करी होगा और कौन सा वीनस। कभी वे जुपिटर, कभी मार्स और कभी सैटर्न ढूँढने लगते।

बहुत दूर समंदर और आकाश एक – दूसरे से मिल रहे थे । धरती के साथ-साथ मुड़ती समुद्री गोलाई देखी जा सकती थी। वे देर रात प्रकृति के इन नज़ारों का लुत्फ उठाते रहे थे।

जब वे वापस होटल के कमरे में लौटे, बीट फ्रंट पर बनी सभी इमारतें सतरंगी रोशनियों में सराबोर प्रतीत हो रही थीं, मानो होली खेल रही हों।  जगह-जगह पॉट लाइटें लगीं होने के कारण सतरंगी झूले जैसा नज़ारा पेश कर रही थीं।

उन्होंने डाइनिंग हॉल में आकर डिनर भी किया और डांस भी। ऐनी ने ड्रिंक भी ली। किसी ने नहीं पूछा कि गोरे माइकल के साथ यह भूरी युवती कौन है, और इसकी क्या लगती है। यह आदत तो भारतीय मूल के लोगों को ही थी। ऐनी ने सोचा।

दो ड्रिंक्स ने ही उसकी सोच और उदासी को और बढ़ा दिया।

क्या सिर्फ़ डैड का ही कसूर था ?  क्या डैड का कभी भी मुझसे मिलने को दिल नहीं चाहा होगा ?’ उसे अपनी माँ भी बहुत याद आ रही थी।

जब वे अपने कमरे में गए तो अनामिका ने फोन देखा, छोटी बहन और भाई दोनों के मैसेज आए हुए थे कि माँ बीमार है, तुम्हें बहुत याद करती है। पढ़ कर उसकी आँखें भर आईं, और फोन माइकल की तरफ बढ़ा दिया।

माइकल ने मैसेज पढ़ कर कहा, अब अपनी शादी तो हो चुकी है, तुम किस बात से डरती हो ? माँ-बाप फिर नहीं मिलते। तुम्हें तुरंत फोन कर लेना चाहिए। अगर किसी प्रकार का गुस्सा होगा भी तो निकल जाएगा, आखिर तुम उनकी बेटी हो।

ऐनी सोचने लगी कि अगर फोन डैड ने उठा लिया और भला-बुरा कहने लगे तो। माइकल का कहना था कि पहले फोन डैड के सेल पर ही कर लो। उसने मन कड़ा करके सोचा कि चलो जो होगा देखा जाएगा और सीधे अपने डैड को ही फोन लगाया। उधर से मध्यम सा स्वर सुनाई दिया,  हैलो।

मैं अनामिका बोल रही हूँ, डैड आप ठीक हैं ?’

कुछ देर चुप रहने के बाद, बेटा सौ गिले-शकवे होते हैं तुमने तो हमें बिलकुल ही भुला दिया। मुझे माफ कर दे बेटा। हरकीरत की रुलाई फूट पड़ी।

हम तुम्हें बहुत मिस करते हैं बेटा, मिलने को भी बहुत जी चाहता है।

अब अनामिका भी रो रही थी, मेरा कौन सा मिलने को जी नहीं चाहता।

बेटा गुस्से में इन्सान बहुत कुछ कह देता है, मैं माफी मांगता हूँ माइकल को लेकर कभी घर आओ मिलने। इन्सान तो सभी एक जैसे ही होते हैं। हमारे गुरुओं का भी यही संदेश है।

अनामिका को अपने डैड बहुत बदले-बदले से प्रतीत हुए, जो आज माइकल के साथ भी बात करना चाहते थे। देसी स्टाइल की अंग्रेजी में वे बातें करते रहे और सॉरी-सॉरी भी कहते रहे। अनामिका ने बीमार माँ से जी भर कर बातें कीं।  माँ ने कहा कि आज उनके कलेजे में ठंड पड़ गई है और अब वे बहुत जल्दी ही ठीक हो जाएंगी। फिर संदीप और विनीत भी बहुत देर तक बातें करते रहे।

माँ ने कहा कि फ्लोरिडा से लौटते ही वे ज़रूर मिलने आएं।  सभी बहुत खुश हुए। अनामिका की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। फिर वह देर रात तक माइकल के साथ अपने परिवार की बातें करती रही। कह रही थी,

डैड की सुगर बढ़ गई है और अब इन्सुलिन लेते हैं। माँ का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है और घबराहट होने लगती है। नज़र भी कमज़ोर हो गई है।

 

 

ज़िंदगी की पुस्तक का बंद पड़ा अध्याय फिर खुल गया था।

अनामिका को सारी रात ठीक तरह से नींद नहीं आई। वह अपने परिवार के बारे में ही सोचती रही।

सुबह हुई तो माइकल तौलिए उठाए खड़ा था, वह उसे हॉट वाटर टब और पूल पर जाने के लिए कह रहा था। वे ऐलीवेटर लेकर पूल फ्लोर पर चले गए। हॉट टब किसी छोटे तालाब जैसा था और भाप छोड़ता पानी चमक रहा था। इस में गोरे, काले, भूरे सभी नस्लों के लोग स्नान का आनंद ले रहे थे। स्त्रियां-पुरुष सभी इकट्ठे नहा रहे थे। कोई बदतमीज़ी, भेद-भाव या छेड़खानी नहीं हो रही थी और वे भी इस टब में उतर गए।

पूल के साथ ही सन-डक एरिया था, जहाँ गोरी, काली, भूरी औरतें नाम मात्र के वस्त्र पहन सन-बाथ ले रहीं थीं। एशियन कौमें अभी तन से पार जाकर, आदमी को देखने और समझने का जतन ही नहीं कर रहीं।

उसके डैड के लिए भी यह समस्या थी कि तन पूरा ढका होना चाहिए। बात तन की नहीं, मन की है। अगर मन ही काबू में नहीं तो कपड़े भी क्या करेंगे ?  इन लोगों ने अपने मन को काबू में करना सीख लिया है। अनामिका बिना किसी हिचकिचाहट के कपड़े उतार कर बाकी मर्द, औरतों के साथ सिर्फ़ बिकनी पहन कर नहा रही थी। उसके डैड तो उसे स्कर्ट पहनने से भी रोकते थे।

अश्लील तो इन्सान का मन होता है वह सोच रही थी।

खूब आनंद उठाने के बाद, वे होटल के डायनिंग लांउज में ब्रेकफास्ट के लिए चले गए। यहाँ भी अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिटी बहुत सलीके से बैठी सुबह का नाश्ता कर रही थी।  उन्होंने भी एग, बेकन, मफन, सीरीयल, सॉसेज, ब्रेड के साथ ऐपल और ऑरेंज जूस पीया। बाद में कॉफी भी ली। कितना अच्छा लग रहा था।

मनुष्य इस ग्रह पर एक परिवार की भाँति विचरण करे तो यह दुनिया जन्नत बन जाए। पता नहीं आदमी के भीतर का जानवर क्यों जाग जाता है, वह बैठी सोचती रही।

अभी उन्हें इस होटल में एक दिन और गुज़ारना था। ऐनी माइकल से कह रही थी,अब दो साल बहुत घूम लिया, अब हमें बेबी प्लान करना चाहिए। मुझे बहुत चाव है कि वह बच्चा देखूं जो भारतीय मूल की औरत और वैंजुएला के स्पेनिश मर्द के मिलन से जन्मेगा। इस मिश्रित नस्ल का बच्चा ग्लोबल सिटिजन होगा। धर्म, जाति, भाषा, नस्ल सब से ऊपर। इस में सभी रंग और चिहन् घुले-मिले होंगे। रंग पिता जैसा, नक्श माँ जैसे, बाल कोई भी हों, चलेगा।

और डी एन ए ?  माइकल हँसा।

मनुष्य सिर्फ़ मनुष्य है, धरती की संतान, ऐनी आँखें मूंदे बच्चे की कल्पना करती रही।

काफ़ी देर तक हँसी-मज़ाक करके, फिर शॉपिंग के लिए निकल गए। स्टोरों में रखे बच्चों के कपड़े वे स्नेह से देख-देख मुस्कुराते रहे। स्टोर भी ग्लोबल कम्युनिटी से भरे पड़े थे।

दिन भर घूमने-फिरने के बाद वे अपने होटल लौट आए। उन्हें दूसरे दिन लौटना था। वे सोच रहे थे कि सुबह नहा-धो कर आई होप रैस्टोरेंट पर खाना खाएंगे और फिर टैक्सी ले कर एयरपोर्ट चले जाएंगे।

ये उनकी अंतिम शाम थी। वे आज फिर डायनिंग लांउज में बैठे लुत्फ उठा रहे थे। सामने लगे टेलिवीज़न स्क्रीन पर वार्निंग आ रही थी कि मैथ्यु नामक समुद्री तूफान फ्लोरिडा की तरफ तेज़ी से बढ़ रहा है। लोगों को बीच और समुद्री किनारों से दूर रहने की हिदायत दी जा रही थी। लोग डर कर अपना-अपना सामान पैक करने लगे। अनामिका सोच रही थी कि डर, प्यार, नफ़रत इनकी कोई जाति, धर्म और नस्ल नहीं होती। ये हर व्यक्ति के मूल जज्बे हैं या यूं कह लें कि मानवता का किरदार हैं। उसने माइकल से कहा कि हमें भी यहाँ से निकल जाना चाहिए।

और वह हवा में हाथ लहराते हुए बोला,  तूफान तो आते ही रहते हैं, आते हैं और गुज़र जाते हैं। अब जीना छोड़ दें क्या ?  लोगों के घरों की छतें उड़ जाती हैं, घर ढह जाते हैं, कारें बह जाती हैं और पेड़ उखड़ जाते हैं और लोग फिर भी जीना नहीं छोड़ देते।  ज़िंदगी बर्बाद होती है और फिर धड़कने लगती है। बनना मिटना ही तो जीवन का दस्तूर है। वह लापरवाही से खिलखिला कर हंसा।

माइकिल किसी के साथ फिर बातों में लग गया, परंतु आज ऐनी को गुस्सा नहीं आया। वह उसे उसके हिस्से की स्पेस दे रही थी जिसके बारे में उसने खुद को तैयार कर रखा था। वह टैंपा बे और टोरांटो वाले मैच का पोस्टमार्टम कर रहा था। चुप बैठी ऐनी को देख उसने कहा, डार्लिंग चलो बीच पर चलते हैं, सूरज अभी अस्त हो रहा होगा, तारों को अभी चमकना है। मैं कमरे से अपनी बीच वाली पोशाक ले आऊं, आज मैं सर्फिंग बोर्ड भी लेकर जाऊंगा। ऐनी को पता था कि अब वह उसके शौक पूरे करेगा और उसके हिस्से की स्पेस देगा। न न करते हुए वह भी बीच के लिए पोशाक लेने चल दी।

कैमरे लेकर वे ढलती हुई शाम में बीच की तरफ चले जा रहे थे। माइकल का बदन चमक रहा था। ऐनी बिकनी में बहुत खूबसूरत लग रही थी। सैलानियों का अभी भी बहुत जमावड़ा था। कोई कह रहा था अभी तो तूफान बहुत दूर है, परसों तक फ्लोरिडा पहुँचेगा।

ऐटलांटिक सागर में तूफानी हलचल के कारण लहरें बहुत ऊँची हो गई थीं। पानी में में कदम रखते ही माइकल ने ऐनी को अपनी बाँह के आलिंगन में ले लिया, मानो वे एक दूसरे के लिए ही बने हों। उन्होंने आकाश की तरफ देखा सूर्यास्त का आखिरी क्षण था।

समुद्र पर सोना बिखर गया था। शाम का तारा मुस्कुराते हुए उदित हो चुका था। पानी को स्पर्श कर आई हवा कुछ कह रही थी। कभी – कभी प्रकृति भी अपनी भाषा बोलती है, उन्होंने महसूस किया।

पानी की एक ज़ोरदार लहर उनके बदन को तर कर गई। माइकल ने ऐनी को और गहरे पानी में खींच लिया। दूर तक फैला समुद्र। नदी, नाले, नहरें, सबका एक ही रूप। लगा मानो उनकी पहचान भी घुलती जा रही हो। दूर तक समुद्र ही समुद्र। फिर लहरें और भी ऊँची हो गईं, मानों मुहब्बत का गीत गा रही हों।

 

 

                        0           0           0


          साभार - छपते छपते, दीपावली विशेषांक - 2021




             लेखक परिचय         मेजर मांगट

    


   जन्म -  1 जनवरी, 1961 (पंजाब)। कैनेडा में निवास। 

      प्रवासी पंजाबी कहानी में एक शीर्षस्थ नाम।  

           अब तक 06 कहानी संग्रह, दो पूर्ण नाटक

           01 भेंटवार्ता पुस्तक01 उपन्यास, 

            01 काव्य संग्रह,

                 गद्य पुस्तक मिट्टी न फरोल जोगिया प्रकाशित। 


             सुलगदे रिश्ते (2005), पछतावा (2006) और 

             दौड़ (2007) आदि पंजाबी फिल्मों हेतु लेखन।


                

             भारत और विदेशों सहित अनेक सम्मानों से विभूषित।

             संपर्क - major.mangat@gmail.com





            अनुवादक परिचय  - नीलम शर्मा अंशु


अलीपुरद्वार जंक्शन, (पश्चिम बंगाल) में जन्म। 

पंजाबी - बांग्ला से हिन्दी और हिन्दी - बांग्ला से 

पंजाबी में अनेक  महत्वपूर्ण साहित्यिक अनुवाद। 

कुल 20 अनूदित पुस्तकें प्रकाशित।  

अनेक लेख, साक्षात्कार, अनूदित कहानियां-कविताएं 

स्थानीय तथा राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

 

विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाली कोलकाता 

शहर की ख्यातिप्राप्त महिलाओं पर 50 हफ्तों तक राष्ट्रीय दैनिक 

में साप्ताहिक कॉलम लेखन।

 

23 वर्षों से आकाशवाणी के एफ. एम. रेनबो पर रेडियो जॉकी। 

भारतीय सिनेमा की महत्वपूर्ण शख्सीयतों पर आज की शख्सीयत 

कार्यक्रम के तहत् 75 से अधिक लाइव एपिसोड प्रसारित।


 विशेष उल्लेखनीय -  

सुष्मिता बंद्योपाध्याय लिखित काबुलीवाले की बंगाली बीवी’ वर्ष 2002 के कोलकाता पुस्तक मेले में बेस्ट सेलर रही। कोलकाता के रेड लाईट इलाके पर आधाऱित पंजाबी उपन्यास लाल बत्तीका हिन्दी अनुवाद।

संप्रति केंद्रीय सरकार के अंतर्गत दिल्ली में कार्यरत।
 ई मेल - rjneelamsharma@gmail.com

                 

               


मंगलवार, फ़रवरी 26, 2019

कहानी ऋंखला - 24 (बांग्ला कहानी) - शिखंडी - स्थूनाकर्ण संवाद * विश्वदीप दे अनुवाद - नीलम शर्मा ‘अंशु’


बांग्ला कहानी

शिखंडी - स्थूनाकर्ण संवाद

विश्वदीप दे
              अनुवाद -  नीलम शर्मा अंशु






















       
   घना जंगल। सूर्य की रोशनी के लिए भी यह मार्ग दुष्कर है।  आकाश से आने वाली रोशनी भी घने पत्तों के अभेद आवरण को ठीक से भेद नहीं पाती। बस जगह-जगह पर मामूली सी रोशनी की आकृति बनती है।
   रोशनी और अंधेरे के इस मार्ग पर चले जा रहा हैं शिखंडी। हमारी कहानी के नायक या नायिका कह लें। इस जंगल ने इससे पहले उनका नारी रूप देखा है। आज उनके पुरुष रूप को देख रहा है। स्वर्णजड़ित कवच, मुकुट, बाजूबंद, तलवार, तीर-धनुष। सारे तन पर तीव्र पौरुष आलोकित है। सूखे पत्तों को पैरों से रौंदते हुए वे चलते जा रहे हैं। पत्तों के रौंदे जाने की ध्वनि बार-बार इस जंगल को चकित करती है। वे हैरान होकर सोचते हैं कि इस दुर्जय पुरुषाकार के पीछे उस दिन कहीं कोमल असहाय नारीत्व के आभास का इंगित भी था। इस आश्चर्यद्वन्द्व ने जंगल की निस्तब्ध प्रकृति में भी उत्तेजना सी भर दी है।
    चलते-चलते अचानक रुक जाते हैं शिखंडी। गंतव्य स्थल प्राय: निकट ही है। थोड़ी दूर ही स्थूनाकर्ण का भवन है। कुछ देर में ही उन्हें अपना नारीत्व वापिस मिल जाएगा। पर क्यों ?  एक प्रबल अभिमान हवा के तेज झोंके के भाँति चक्कर काट रहा है। क्या होगा नारीत्व से ? महायोद्धा भीष्म को परास्त करने की प्रबल इच्छा मानों और एक बार टूटे पात्र की भाँति चूर-चूर हो गई। कोशिश करके भी वे अपनी आँखों को शांत नहीं कर पाए। नमकीन आँसुओं से भर उठी आँखों रूपी नदी। बहुत कठिनाईयों से अर्जित यह पौरूष अस्थाई है यह पहले से मालूम था शिखंडी को। फिर ईश्वरीय कृपा की बात स्मरण कर हर क्षण आशान्वित हैं वे। शूलपाणी महादेव के वरदान के अनुसार उसका पुरुष तन ही भीष्म का मृत्युबाण साबित होगा। परंतु वह शायद असंभव ही रह गया। थोड़े समय का यह पौरुष केवल राजा हिरण्यवर्मा द्वारा प्रेषित रमणियों के संग संभोग में ही बीत गया।
    खुद को धिक्कारना चाहकर भी नहीं धिक्कार सके शिखंडी। उस यौनमिलन का भी तो प्रयोजन था। राजा हिरण्यवर्मा के दूत के समक्ष पिता द्रुपद के लज्जित, संकुचित होने की दृश्य ने उन्हें वनवासी बनने को बाध्य किया। अत: सबके समक्ष उस लज्जा से मुक्ति पाना आवश्यक था। क्या सिर्फ़ यही ? सिर्फ़ इस लज्जा का निवारणमात्र ? और कुछ नहीं किया जा सकता इस पौरुष से ? हाँ, यह सच है कि पिता द्रुपद के सम्मान की रक्षा के लिए अपना पुरुषत्व कुछ दिनों के लिए उन्हें दिया है यक्ष स्थूनाकर्ण ने। बदले में उनका नारीत्व स्वीकार कर लिया है। इस शर्त पर कि प्रयोजन समाप्त हो जाने पर लौटा देना होगा। उस वक्त वह पर्याप्त जान पड़ा था परंतु आज शिखंडी को समझ आया कि केवल इस जन्म की लाज और अपमान ही नहीं बल्कि उनके दूसरे जन्म के उस प्रतिशोध के पूरा न होने तक इस पौरुष का त्याग करना उचित नहीं होगा।
   शिखंडी के मन में पलायन की भावना जागृत होती है। इस जंगल से, स्थूनाकर्ण से दूर भाग जाने की प्रबल इच्छा। जिस नारीत्व को उन्होंने एक बार त्याग दिया उससे दूर जाकर, स्थूनाकर्ण से मिले इस पौरुष को लेकर वे भीष्म के समक्ष जाएंगे। महादेव के वरदान से फलीभूत हो उस अपराजेय महारथी को धूल में मिला देगें। फिर इस पौरुष को वे लौटा देगें। भीष्म को इस पृथ्वी से हटा देने के बाद सिर्फ पौरुष ही नहीं अपने प्राण भी त्याग सकते हैं शिखंडी।
   अगले ही क्षण उनकी आँखों के समक्ष उस महान यक्ष की दयाद्र दृष्टि घूम गई। याद आया, किस स्थिति में उनसे पहली मुलाक़ात हुई थी। बहुत पहले, माँ के गर्भ में रहने के दौरान। देवादिदेव महादेव ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा था, गर्भ में मौजूद संतान पुत्र ही होगी। इसलिए जन्म के बाद से ही उनका लालन-पालन पुत्र की तरह किया गया था। यह मानकर कि देवता की बात सत्य होगी ही। यहाँ तक कि उनकी शादी भी कर दी गई थी एक कन्या से। जबकि शिखंडी तब भी शिखंडी ही थे। उन्हें समझ में आ गया था कि उनका राज़ खुल जाएगा। सारी दुनिया के पास यह ख़बर पहुँच जाएगी कि राजपुत्र वास्तव में राजकन्या है। हुआ भी वही। उनके अनावृत तन को देख घृणा, विस्मय से चकित रह गई थी हिरण्यवर्मा की सौंदर्यमयी कन्या। तुरंत पिता के घर समाचार भिजवाया। क्रुद्ध हिरण्यवर्मा ने तुरंत दूत भेजा। बताया कि वे शीघ्र ही सेना सहित इस छल का प्रतिउत्तर देने पहुँच रहे हैं।
    उस दिन के बाद से शिखंडी अपने पिता के घर पर न रह पाए। इस जंगल में आने को बाध्य हुए, इस यक्ष के वासस्थान पर। शिखंडी को याद आता है एक असहाय रमणी की दिनोंदिन की तपसाधना, और क्रमश: क्षीण होते जाते तन को देख उसके समक्ष खड़े हो आश्चर्यमिश्रित हँसी हँसे थे स्थूनाकर्ण। कहा था – हे रमणी, आप मेरा पौरुष ग्रहण कर लें, अपने व अपने परिवार के अपमान को धूल में मिलाकर इस दुर्दशा के ग्रास से अपनी रक्षा करें। प्रमाणित करें कि महाराज द्रुपद ने कोई मिथ्याचार नहीं किया। आप वास्तव में पुरुष ही हैं। स्वप्न की भाँति आधारहीन प्रतीत हुआ था शिखंडी को। दयावान यक्ष इस प्रकार उनसे अपमान से मुक्ति की बात करेंगे, यह उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था।
   इन सब बातों को स्मरण कर पीछे लौटना रोक कर फिर से वे स्थूनाकर्ण के भवन की और बढ़ चले। पिता द्रुपद को जिसकी कृपा से छल के अभियोग से मुक्ति दिलाई अंतत: शिखंडी उसके साथ छल न कर सके। इतना बड़ा अन्याय उनसे संभव नहीं था। दरअसल वेशभूषा पुरुष की होते हुए भी वे पूर्णत: एक दयावान नारी थे।
   अंतत:  स्थूनाकर्ण के भवन पर आ पहुँचे शिखंडी। स्थूनाकर्ण के सेवक ने उनसे प्रतीक्षा करने को कह भीतर अंत:पुर में संदेस भिजवाया। थोड़ी ही देर में अंत:पुर से एक सेवक ने आकर कहा, आप भीतर जाएं राजन। वे प्रतीक्षा कर रहे हैं।
    अंत:पुर में प्रवेश करते हैं शिखंडी। खिड़की के पास खड़े दिखाई देते हैं स्थूनाकर्ण। चुपचाप उनके पास आ खड़े होते हैं। कहा, मैं लौट आया हूँ महामति।स्थूनाकर्ण हँस पड़े। उनकी शारीरिक मुद्रा से नारीमुद्रा बिंबित हो रही थी। उन्होंने कहा, मुझे पता था तुम आओगे। तुम्हें देख कर सचमुच प्रसन्नता हुई। 
   शिखंडी ने झुक कर कहा, आपके प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ। आपकी कृपा से मेरे माता-पिता के लज्जित, अपमानित चेहरों की कालिमा ख़त्म हुई। आपके पुरुष चिहनों द्वारा मैंने अपने पौरुष को प्रमाणित किया है। मेरी परीक्षा हेतु दशार्णराज हिरण्यवर्मा ने कुछ संदुर युवतियों को मेरे पास भेजा था। मैंने उन्हें तृप्त किया। संभोग के बाद उन्होंने हिरण्यवर्मा की कन्या यानी मेरी पत्नी की अक्षमता पर हँसी-मज़ाक तक किया। उनके अनुसार समस्या मेरी नहीं थी दशार्णराज की पुत्री की थी।  
   सौंदर्यबालाओं की यौन तृप्ति की बात सुन स्थूनाकर्ण क्रोध से लाल हो गए। शिखंडी मन ही मन लज्जित हो उठे। उन्हें याद आया, एक अंत:पुरवासी के समक्ष पुरूष के तौर पर यह कहना उचित नहीं हुआ। यद्यपि थोड़ी देर बाद परिस्थिति बदल जाएगी। तब गैर पुरुष के समक्ष दैहिक मिलन की बात के उल्लेख को स्मरण कर शिखंडी ही शर्मिंदा होंगे। कैसी आश्चर्यजनक थी यह परिस्थिति। ऐसी घटना क्या इससे पहले भी घटित हुई हैं। भविष्य में भी कभी घटित होगी क्या?
   प्रसंग बदलते हुए शिखंडी ने कहा, मेरे पिता द्रुपद का मान रख पाया। वे प्रमाणित करने में सफल रहे कि उन्होंने कोई मिथ्याचरण नहीं किया था। उनकी संतान नारी न होकर पुरुष ही है। हिरण्यवर्मा अपनी बेटी की भर्त्सना करके लौट गए। मेरा अभीष्ट पूर्ण हुआ। अब आप अपना पौरुष वापिस स्वीकार करें। 
    स्थूनाकर्ण शिखंडी की तरफ देखते रहे। उन्हें कुछ दिनों पहले की बात याद हो आई। जब उन्होंने पहली बार शिखंडी को देखा था। तब वे शिखंडिनी थीं। एक नारी। लंबे समय तक अनाहार रहने के कारण तन बहुत ही क्षीण और कृश्काय।  नारीसुलभ कोमलता तब नष्ट हो चुकी थी। पूरे चेहरे पर तीव्र हताशा नज़र आ रही थी। जीवन के प्रति भी निराशा। फिर भी उस उदास चेहरे पर विद्यमान अभिमान की हल्की सा आभा ने उन्हें मुग्ध किया था। सिर्फ़ मुग्ध? ऐसे मग्न पहले कब हुए थे स्थूनाकर्ण। शिखंडिनी के रूप ने उन्हें आनंदविभोर किया था। उन्हें महसूस हुआ था कि वे इस उदास मुखमंडल की प्रसन्नमुद्रा के लिए कुछ भी कर सकते हैं। क्यों लगा था ऐसा, यह बात वे कभी भी शिखंडी को नहीं बताएंगे। अपने मन की गुप्त कोठरी में छुपाए रखेंगे जो कि उनके शेष जीवन की पूंजी होगी। यह सब सोचकर कुछ देर ख़ामोश रहे स्थूनाकर्ण। फिर मृदु मुस्कान बिखेर कर कहा, तुम्हारी ईमानदारी से मैं बहुत ही प्रसन्न हूँ। तुम जो लौट कर आए हो देख कर ही समझ आता है कि तुम लालचरहित हो। उस दिन तुम्हारी असहायता देख सचमुच बहुत दु:खी हुआ था। आज तुम्हें विजयी देख बहुत अच्छा लग रहा है। प्रार्थना करता हूँ कि जीवन के और भी कठिनतम युद्धों में भी तुम विजयी बनो। 
    पर यह कैसे संभव है? आज इसी क्षण तो मेरे क्षणस्थाई पौरुष के समापन पर मैं एक सामान्य नारी में बदल जाऊंगा। फिर पिछले जन्म की भाँति एक बार फिर पराजित जीवन गुजारूंगा। मन ही मन विषाद-संलाप में संलिप्त शिखंडी को देख स्थूनाकर्ण ने कहा, राजकुमार तुम कुछ छुपा रहे हो। 
    आपने ठीक समझा, परंतु वह राज़ जानकर फिर आप मुझे निर्लोभ नहीं कहेंगे। हल्के से मुस्कुराकर शिखंडी ने कहा, पिता द्रुपद का सम्मान बचाकर मेरे इस जीवन का अभीष्ट पूर्ण हो तो गया है, परंतु आपको मैं अपना पूरा इतिहास बता दूं। भीष्म की पराजय ही मेरा सर्वोच्च लक्ष्य है। नारी बनकर मैं उनका विनाश कैसे करूंगा। पिछले जन्म में अंबा बनकर चाहा था कि कोई पुरुष मेरे पक्ष में युद्ध करके महारथी भीष्म का वध करे परंतु आपको पहले ही बताया है कि तेजस्वी योद्धा परशुराम किस प्रकार भीष्म को पराजित करने में असफल रहे थे। हाँ, भीष्म भी उन्हें पराजित नहीं कर पाए। दोनों ही परस्पर एक दूसरे के लिए अजेय थे, युद्ध के माध्यम से इस सत्य के प्रकट होते ही समझ आ गया था कि परशुराम जिसे पराजित न कर पाए, उसे पराजित करने की क्षमता और किसी की नहीं होगी। उसी दिन मुझे समझ आ गया कि खुद ही कोशिश करने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं। उस युद्ध में मेरी मृत्यु भी हो जाए तो हो परंतु मुझे एक बार उसके सम्मुख उपस्थित होना है। अब आप ही बताएं, पुन: नारीत्व प्राप्त करके अपेक्षित लक्ष्य तक कैसे पहुँचा जा सकता है ?  
    स्थूनाकर्ण ने मृदु मुस्कान से बिखेर कर कहा, मैं तुम्हारी सत्यनिष्ठा देख कर चकित हूँ। तुम इस प्रबल प्रतिशोध की स्पृहा को अस्वीकार कर मुझे मेरा पौरुष लौटाने आए हो, जिसे एक बार लौटा देने के बाद भीष्म के साथ युद्धस्थल में सामना करने का स्वप्न सदा के लिए शायद नष्ट हो जाएगा। तुम सचमुच सत्यनिष्ठ हो। और जो सचमुच ईमानदार हो, उसे एक बार अवश्य अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने का अवसर मिलता है। 
   शिखंडी ने चौँक कर स्थूनाकर्ण की ओर देखा। स्थूनाकर्ण मानो कोई सांत्वना न देकर भविष्यवाणी कर रहे हों। उनका दृष्टिकोण समझ कर स्थूनाकर्ण ने कहा, तुम ठीक ही सोच रहे हो राजकुमार। मैं जो कह रहा हूँ, वह सांत्वना नहीं है। विश्वास है। दैव निर्देश कभी व्यर्थ नहीं होता। महादेव की इच्छानुसार  भीष्म के वध के लिए युद्धस्थल में तुम्हारी उपस्थिति अपरिहार्य है। तुम लौट जाओ। अस्त्रविद्या ग्रहण करो। उस क्षण की तैयारी करो। 
    शिखंडी का पूरा शरीर सिहर उठा। स्थूनाकर्ण की ओर नज़रें टिकाए चुपचाप देखते रहे। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अस्त्रविद्या की बात क्यों कह रहे हैं? कैसे संभव है यह? उत्तेजित स्वर में कह उठे शिखंडी, किसी नारी को कोई अस्त्रविद्या देता है? हे स्थूनाकर्ण आपकी बात को मैं ठीक तरह से समझ नहीं पा रहा हूँ। कृपया बताएं कि यह कैसे संभव है? 
    अवश्य बताऊँगा, राजकुमार। तुम्हारे मन का अंधेरा मैं दूर करूंगा परंतु उससे पहले मैं तुमसे अपने एक प्रश्न का उत्तर जानना चाहता हूँ। इधर कुछ दिनों से इस एकाकी कक्ष में बैठे-बैठे बहुत बार यह प्रश्न मेरे मन में आया है। 
    कौन सा प्रश्न?  शिखंडी ने जानना चाहा।
    अपने पिछले जन्म की पूरी गाथा से तुमने मुझे कील कर रख दिया है। वह सुनकर मुझे लगा कि तुम्हारे पिछले जन्म की दुर्दशा के प्रधान खलनायक दो व्यक्ति हैं। एक हस्तिनापुर के महारथी भीष्म, दूसरा तुम्हारी प्रियतम शाल्वराज। पहले ने विचित्रवीर्य़ की पत्नी बनाने के लिए स्वयंवर से अंबिका और अंबालिका के साथ तुम्हारा हरण किया। शाल्वराज द्वारा रोके जाने पर उन्होंने प्रबल उपेक्षा के साथ उसे परास्त किया परंतु तब तक उन्हें यह नहीं मालूम था कि वह व्यक्ति तुम्हारा प्रियतम है। बाद में जब पता चला तो तुम्हें कुछ वृद्ध ब्राह्मणों और एक धात्री के साथ शाल्वराज के पास भेज दिया। और दूसरा, शाल्वराज ने अन्यपूर्वा कहकर तुम्हारा तिरस्कार किया। भीष्म के स्पर्श से तुम्हारे खुश होने का आरोप लगा कर तुम्हें त्याग दिया था। जबकि पूरी दुर्दशा के लिए तुम भीष्म को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हो। उसकी मृत्यु ही तुम्हार लक्ष्य है। इसकी वजह क्या है? बहुत सोचकर भी मैं यह समझ नहीं पाया। 
    स्थूनाकर्ण का प्रश्न सुन शिखंडी को हैरानी हुई। एक सामान्य नारी की जीवनगाथा ने इस यक्ष को इतना चिंतित किया। उन्होंने विस्मित होकर कहा, इतने कौतुहलपूर्वक मेरी बात कभी किसी ने नहीं सुननी चाही। शाल्वराज द्वारा अपमानित होकर नगर से बाहर तपस्वियों के आश्रम में जब मैंने रहना चाहा तब उन्हीं तपस्वियों ने मुझे मेरे पिता काशीराज के घर लौट जाने को कहा। तपस्वी तो ज्ञानी होते हैं, फिर भी वे मेरे कष्ट को सम्यक तौर पर समझ नहीं पाए। मेरे नाना राजर्षि होत्रवाहन अवश्य कुछ हद तक समझ पाए थे। परशुराम के प्रिय अनुचर अकृतव्रण भी समझ पाए थे। समझ पाए थे इसीलिए उन लोगों ने मुझे परशुराम की सहायता का आश्वासन दिया था। और परशुराम ने भी मेरे कष्ट के निवारण हेतु भीष्म के साथ भीषण युद्ध किया था। इन सभी ने चाहा था कि भीष्म मुझे स्वीकार कर लें, परंतु जब परशुराम-भीष्म युद्ध आमीमांसित रह गया तब उन्होंने असहाय की भाँति मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया। इसके बाद सही अर्थों में जब भीष्म के दंभ के समझ मैं अकेली पड़ गई थी, महेंद्र पर्वत पर जाने से पूर्व एक बार भी क्यों गंभीरता से नहीं सोचा परशुराम ने। यद्यपि समझ आ गया कि प्रिय शिष्य को परास्त न कर पाने के कारण अपने पौरुष को लेकर वे चिंतित थे। उस क्षण मानो मैं उतना महत्वपूर्ण नहीं थी। आपने जितना समय लेकर मेरी इस विपदा के विषय में सोचा है, उन लोगों में से किसी ने नहीं सोचा था। यहाँ तक कि आपने मेरे लिए अपना लिंग परिवर्तन तक कर लिया। शिखंडी का स्वर ज़रा सा काँप गया। आँखों के कोनों में आँसुओं की बूंदें झिलमिलाने लगीं। खुद को संभालते हुए कहा, जो भी हो आप जानना चाहते हैं कि शाल्वराज के प्रति मेरा क्षोभ कितना है। तो बता दूं कि उनके व मेरे पिता काशीराज दोनों के ही प्रति मेरा क्षोभ असीम है। मेरे पिता ने यदि स्वयंवर न रचा कर पहले ही शाल्वराज के साथ ब्याह दिया होता या खुद शाल्वराज ही ऐसा प्रस्ताव देते तो मुझे भीष्म के हाथों अपहृत न होना पड़ता। अंबिका और अंबालिका दोनों के लिए स्वयंवर सही फैसला था।  परंतु एक वाग्दत्ता कन्या के लिए यह फैसला बहुत बड़ी गलती थी और इसके लिए संपूर्णत: पूरी तरह से शाल्वराज और काशीराज दोनों ही उत्तरदायी हैं। जबकि मेरे दुर्दशा में दोनों ने ही पूर्णत: मुझे अस्वीकार किया। बाद में जब भी भीष्म के वाणों के सामने उसकी असमर्थता की पराकाष्ठा, पराजित चेहरा याद आया है, समझ गई कि वास्तव में उसका आहत पौरुष मेरा सामना नहीं कर पा रहा था। इसीलिए...... 
   शिखंडी की बात पूरी होने से पहले ही स्थूनाकर्ण ने पूछा, मैं तुम्हारे कष्ट को समझ रहा हूँ परंतु यह वृतांत सुनकर मुझे महसूस हुआ कि शाल्वराज के पराजित चेहरे के विपरीत क्या भीष्म के आत्मगरिमा से परिपूर्ण चेहरे की तस्वीर ने कोई प्रभाव नहीं डाला? ग़लती हो तो माफ करना राजकुमार, किंतु सचमुच तुम्हें नहीं लगा कि जिस व्यक्ति ने मेरे प्रियतम को अनायास ही ज़मीन पर लिटा कर, फिर उसका वध न करके जीवनदान दिया, क्या शौर्य और वीरता की दृष्टि से वह शाल्वराज से बहुत-बहुत अधिक योग्य नहीं? 
   शिखंडी को होठों पर करुण मुस्कान दौड़ गई, यही इंगित शाल्वराज ने भी किया था परंतु ऐसी कोई अनुभूति मुझे हुई थी या नहीं, मुझे नहीं मालूम। एक अजीब से उन्माद में थी मैं। मैं कोई दैवी नारी नहीं। मैं बहुत साधारण हूँ। इतना कह सकती हूँ कि बहुत प्रकांड पंडित भी अगले हज़ारों-हज़ारों सालों तक इसका समाधान नहीं कर पाएंगे। घृणा के कितने पास होता है प्रेम, यह हिसाब मुझे नहीं मालूम। फिर भी पिछले जन्म में सबसे ज्यादा असमर्थ महसूस किया था जब परशुराम के अनुरोध पर भी भीष्म ने मुझे स्वीकार  नहीं किया था। उसी क्षण से मेरा कोई गंतव्य नहीं रहा। बाद में कठोर तपस्या से मुझे महादेव का वरदान प्राप्त होने पर भी, परशुराम के प्रस्थान के बाद की अपनी उस असमर्थता को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी। तब लगा था कि ऐसी परिस्थिति में भी भीष्म ने मुझे स्वीकार नहीं किया? एक नारी का ऐसा सर्वनाश करके भी उसके मन में दया न आई। उस दिन से मेरी घृणा की अग्नि दिनोंदिन तीव्र होती गई। मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है उसका पतन।  
    स्थूनाकर्ण बहुत ध्यान से शिखंडी की बातें सुन रहे थे।  समझने की कोशिश कर रहे थे प्रेम और घृणा का इस परस्पर स्थिति को। समझ रहे थे अंबा, शिखंडिनी, शिखंडी जन्म से जन्मांतर, लिंग से लिंगांतर इस असहाय जीवन को सबसे अधिक आहत किया है देवलीला ने। जिस देवलीला ने उनके जीवन को भी बदल दिया है।
   थोड़ी देर चुप रहकर शिखंडी ने कहा, आशा है कि आपके प्रश्न का उत्तर आपको मिल गया होगा। अब यदि अनुग्रहपूर्वक मेरे प्रश्न का उत्तर दें। स्थूनाकर्ण ने गंभीरता से कहा, मैंने अब तक जान-बूझकर ही उत्तर नहीं दिया राजकुमार क्योंकि मुझे पता है कि उत्तर मिलने के बाद तुम मेरे इस भवन में एक क्षण भी रुकने के लिए राज़ी नहीं होगे। द्रुत गति से राजप्रासाद में लौट जाओगे। बाद के प्रत्येक क्षण में खुद को तीक्ष्ण से भी तीक्ष्ण कर लोगे.... और उस महामुहुर्त का इंतज़ार करोगे।
   स्थूनाकर्ण की बातें शिखंडी को पहेली सी लगती हैं। यद्यपि उस पहेली का उत्तर सार्थक है, यह क्रमश: स्पष्ट हो गया।
    स्थूनाकर्ण ने कहा,हाल ही में यक्षराज कुबेर यहाँ आए थे परंतु अब मैं एक नारी हूँ, स्वाभाविक तौर पर अंत:पुर में थी। उन्हें मेरे इस लिंग परिवर्तन की बात पता चल गई। यह जानकर उन्होंने प्रबल क्रोध में मेरे सामने आकर मुझे अभिशाप दिया।
   एक आड़ी-तिरछी तीव्र विद्युत रेखा मानों शिखंडी को भेद गई, अभिशाप? क्यों? हे स्थूनाकर्ण आपका अपराध क्या था? 
   उत्तेजित शिखंडी की ओर देख स्थूनाकर्ण हँस पड़े। क्षीण हँसी। तुम्हारे साथ लिंग विनिमय का अपराध। मैंने अपनी क्षमता का अपव्यवहार कर यक्षगणों को अपमानित किया है, यह कहकर मेरा तीव्र तिरस्कार किया यक्षराज कुबेर ने। अभिशाप दिया, तुम जब तक जीवित रहोगे, मैं स्त्री ही बना रहूंगा और मेरा पौरुष धारण कर तुम पुरुष ही बने रहोगे। 
   रुद्ध गले से शिखंडी क्या कहें कुछ समझ नहीं पा रहे थे। सिर्फ़ व्यथित मन से स्थूनाकर्ण की तरफ देखा । साथ ही एक गुप्त आनंदमय स्वरधारा भी उनके मन के भीतर लगातार झंकृत हो रही थी।
  अविचलित स्थूनाकर्ण ने कहा, हे राजकुमार, अब युद्धस्थल में भीष्म का सामना करने में कोई रुकावट नहीं। यह खुशी का समय है। बहुत दिनों की प्रतीक्षा अंतत: सार्थक हो रही है। अब देर मत करो। यथाशीघ्र लौट जाओ तुम। अस्त्रविद्या ग्रहण करो। 
   शिखंडी ने धीरे-धीरे कहा, किंतु.... मेरा भला करने के क्रम में आपका बहुत बड़ा सर्वनाश हो गया। इन्कार नहीं है कि शेष जीवन में मैं पुरुष ही बना रहूंगा, यह उपलब्धि मेरे लिए अमरत्व से भी बहुत बड़ी है परंतु आपकी इतनी बड़ी क्षति के बारे सोचकर..... 
    ‘क्षति?थोड़ा सा क्रोध का पुट शामिल हो गया स्थूनाकर्ण के कंठस्वर में। नारीत्व को सर्वनाश समझते हो तुम? 
   शिखंडी नहीं ऐसी बात नहीं है। मैं नारीत्व को सर्वनाश नहीं कह रहा। कभी भी नहीं। पर ये जो आप पुरुष से नारी बने.... यह अस्वभाविक घटना आपको सभी के कौतुहल का केंद्र बना देगी। उसी दुर्भाग्य की बात सोच कर मैं शंकित हूँ। मुझे अवश्य पता है, मेरे इस पौरुष प्राप्ति का रहस्य़ अगर लोगों के सामने आ गया तो बेवजह कौतुहल के विषैले तीर मेरी तरफ भी बढ़ेंगें। पर मुझे उससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता। अब अपने लक्ष्य के सिवाय किसी भी चीज़ से मुझे कोई शिकायत नहीं। पर आप... सिर्फ़ मेरी भलाई के चक्कर में इस तरह..... 
   स्थूनाकर्ण ठीक, यही एक विषय मेरे लिए भी विरक्तिकारक है। ये जो मैं पुरुष से नारी बना इस विषय में बेवजह कौतुहल और एक अद्भुत नज़र मैनें यक्षगणों में देखा है। मानो सभी जो आजीवन पुरुष या नारी हैं मैं उनसे एक अलग व्यक्ति हूँ। लिंगांतर मानों धर्मांतरण के समान हो गया। या फिर उससे भी भयावह घटना। मुझे लगता है युग-युगांतरों तक इस विषय में लोगों के मनोभाव नहीं बदलेंगे। परंतु तुम इस सबके विषय में तनिक भी चिंतित मत होना। मेरे मन में कोई अफसोस नहीं है। दैवों का अतिक्रमण क्या हमारे लिए संभव है। इसके अलावा एक ही जन्म में नारी और पुरुष होने का सौभाग्य कितनों को मिलता है? तुम निश्चिंत मन से प्रस्थान करो राजकुमार। परिकल्पना के अनुसार चतुष्पद धनुर्भेद शिक्षा ग्रहण करो।  प्रार्थना करता हूँ कि जिस दिन गंगापुत्र भीष्म से साक्षात होगा, उस युद्ध में विजय तुम्हारी ही हो। 

   स्थूनाकर्ण की बातों से आश्वस्त होकर कुछ समय बाद भवन से निकल आए शिखंडी। लौट चले राजप्रासाद की ओर। स्थूनाकर्ण खिड़की के पास खड़े रहे।  बाहर घने हरे वन की निस्तब्धता को देख क्रमश: उदास होने लगीं उनकी दोनों आँखें। सजल हो उठीं। कुछ बातें करने को रह गईं। जो फिर कभी कही ही नहीं जाएंगी। उनकी उन गुप्त अनुभूतियों और इच्छाओं को धारण कर गहरा घना जंगल और भी गंभीर स्तब्ध से भर उठा। सिर्फ पक्षियों की अनुपम सीटियों और पत्तों के गिरने की आवाज़ के अलावा और कहीं भी कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी।

साभार - छपते छपते (कोलकाता) उत्सव विशेष 2018

योगदान देने वाला व्यक्ति