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सोमवार, अगस्त 09, 2010


पंजाबी शायर शिव कुमार बटालवी के 75 वें जन्मदिन
( 23जुलाई) पर विशेष






पंजाबी लेखक बलवंत गार्गी ने अपने दोस्तों पर बहुत से रेखाचित्र लिखे हैं। प्रस्तुत है उनकी पुस्तक हसीन चेहरे से साभार, शिव बटालवी पर लिखा उनका रेखाचित्र।






शिव बटालवी


0 बलवंत गार्गी



शिव बटालवी के साथ मेरा करार था। जब मैं चंडीगढ से दिल्ली अपनी कार में जाता तो उसे अपने साथ चलने के लिए कहता। रास्ते में बीयर की दो बोतलें, भुना हुआ मुर्गा तथा तीस रुपए नकद।



शिव स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से छुट्टी लिए बिना ही कई बार मेरे साथ दिल्ली जाता। शिव को न तो शराब पिलाने वालों की कमी थी और न ही मुर्गा खिलाने वालों की। वास्तव में उसके बारे में यह बात गलत प्रचारित थी कि लोग उसे शराब पिलाते थे। उसके पास यदि जेब में एक हजार रुपया होता तो वह दिन में ही दोस्तों को शराब पिलाने तथा खिलाने पर खर्च कर देता। वह शाही आदमी था और शाही फ़कीर। उस में खुद को बर्बाद करने की शक्ति थी।



उसने मुझसे कहा, ‘ये साली औरतें सदा रोती रहती है कि कि फलां मर्द ने मेरी अस्मत लूट ली। आप अपने हुस्न को बैंक के लॉकर में रख दें। मैं बैंक में काम करता हूँ। बहुत से लॉकर हैं वहाँ। नोटों की गड्डियां, सोने के ज़ेवर, हीरे। परंतु कोई ऐसा लॉकर नहीं जहाँ औरत अपने हुस्न या जवानी को रखकर चाबी जेब में डाल ले ? इस साले हुस्न ने तो तबाह होना ही है------- तो तबाही किस बात की ? प्यार से हुस्न चमकता है। जवानी मचती है। अस्मत का पाखंड तो कुरुप औरतों ने रचा है......इन्सानी जिस्म को कोई चीज़ मैला नहीं कर सकती । हमेशा निखरा तथा ताज़ा रहता है हुस्न।’



शिव के साथ कार में सफ़र करने का कोई सौदा नहीं था, यह तो एक प्रकार का प्यार था। मैं कार में लोगों को ढोने के हक में नहीं। सफ़र मेरे लिए बड़ी सूक्ष्म तथा आध्यात्मिक चीज़ है। यदि कोई यार साथ हो तो सौ मील का सफ़र मिनटों में कट जाता है। यदि कोई बोर आदमी साथ हो तो दो मील का सफ़र भी दो हज़ार मील लगता है।
एक दिन सुबह-सुबह शिव मेरे घर आया और कहने लगा, ‘आज शाम को कपूरथले में मुशायरा है। तुम मेरे साथ चलो।’



मैंने कहा, ‘मैं नहीं जा सकता। किसी और को ले जाओ।’
शिव ने कहा, ‘टैक्सी ले कर आऊंगा। अकेला। किसी और कंजर को मत बताना। चंडीगढ़ भरा पड़ा है मुफ़्तखोरों से। यूं ही साथ चल देंगे उठकर। मैं टैक्सी में सूअर को लाद कर ले जा सकता हूँ, परंतु किसी बोगस राईटर को नहीं। तुझे चलना पड़ेगा। मैं तुझे बीयर की तीन बोतलें तथा भुना हुआ मुर्गा खिलाऊंगा रास्ते में, साथ में तीस रुपए।’
मैंने कहा, ‘मेरा रेट पचास रुपए है।’ वह मान गया।



शिव को मुशायरे से पाँच सौ रुपए मिलने थे। प्रबंधकों ने यह बात छुपा रखी थी और चाहते थे कि शिव इस बारे में किसी और से बात न करे वर्ना दूसरे कवि नाराज़ हो जाएंगे।



पाँच सौ रुपयों में से शिव ने ढाई सौ रुपए टैक्सी के देने थे और शेष खर्च के लिए। शाम पाँच बजे वह टैक्सी ले कर आ पहुँचा। मुझे साथ लिया और टैक्सी भागने लगी।
शिव ने टैक्सी चालक से कहा, ‘सरदार जी, ज़रा इस कॉलोनी की तरफ गाड़ी घुमा दें। मुझे एक दोस्त से मिलना है।’
मैंने कहा – ‘पहले ही देर हो चुकी है।’
‘चिंता मत कर, दो मिनट ही तो मिलना है एक लड़की से। वह मेरी दोस्त है।’
टैक्सी कॉलोनी की सड़कों पर घूमती रही। शिव घर भूल गया था। न तो नंबर याद था, न गली। तीन-चार जगह टैक्सी रोक कर पूछा परंतु पता न चला। टैक्सी घूमकर मुड़ी तो नीम का एक पेड़ दिखा। शिव ने कहा, ‘बस यहीं रुकिए। यही है।’



टैक्सी से उतर कर उसने घंटी बजाई। एक युवती ने दरवाज़ा खोला। लंबे काले बाल, सुंदर नक्श।
शिव बोला, ‘थोड़ी देर के लिए आया हूँ। कहाँ है तेरा मियाँ ? ’
‘ड्यूटी पर गए हैं। कल लौटेंगे।’
‘अच्छा तो चाय पिलाओ मेरे दोस्त को। जानती हो न इन्हें ? ’
उसने मेरा परिचय करवाया।
वह चाय बनाने लगी। शिव जूतों सहित दीवान पर लेट गया।
मैंने इर्द-गिर्द नज़र डाली। दीवार पर एक बंदूक तथा कारतूसों की पेटी लटक रही थी। शायद किसी फौजी का घर था या वन विभाग के अधिकारी का। एक तरफ ऊंचे चमकते बूट।
वह चाय तथा बिस्कुट ले आई।



शिव ने कहा, ‘मैं चाय नहीं पीयूंगा। यह सिर्फ़ बलवंत के लिए है।’
वह आंगन में खेल रहे अपने बच्चे को ले आई। शिव ने उसके गालों को गुदगुदाया। फिर कहा – ‘मुझे मुशायरे में जल्दी पहुँचना है। तुम भी साथ चलो।’
उसने कहा – ‘मैं कैसे जा सकती हूँ। वे कल सुबह लौटेंगे।’ शिव ने लापरवाही से कहा- ‘कह देना शिव के साथ गई थी। तुझे वह कुछ नहीं कहेगा। अरे, शायर के साथ जा रही हो, किसी व्यापारी के साथ नहीं। चलो, जल्दी करो।’



यह कह कर शिव उठा और उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘शिव.... बस मेरा नाम ले देना, यूं ही मत डरो। चलो, जल्दी करो।’
मैंने सोचा, यह क्या बकवास किए जा रहा है। यदि कहीं इसके पति को पता चल जाए तो इसी बंदूक से दोनों को उड़ा देगा। मैं भी बीच में मारा जाऊंगा।
परंतु मैंने देखा कि वह महिला बच्चे को पड़ोसन के पास संभाल आई और शिव के साथ चल पड़ी। मुझे यह दृश्य अब तक नहीं भूलता कि वह खुले बालों की चोटी करती हुई शिव के साथ बैठी थी और टैक्सी कपूरथले की ओर भागी जा रही थी।
वहाँ पहुंचे तो साढ़े नौ बज चुके थे और मुशायरा चल रहा था।



यह मुशायरा गुरु नानक देव जी के पाँच सौवे प्रकाश उत्सव के उपलक्ष्य में था। प्रिंसीपल ओ. पी. शर्मा ने धूमधाम से यह मुशायरा रचाया था। स्टेज के पीछे शराब की छबील लगी हुई थी। शिव तथा मुझे देखते ही दो-तीन कर्मचारी आगे बढ़े। स्वागती आलिंगन किए और व्हिस्की के गिलास पेश किए। शिव ने पाँच-सात घूंटों में गिलास ख़त्म किया।
हम भीतर स्टेज पर गए तो शिव को देख कर पूरे हॉल में खुशी की लहर दौड़ गई और तालियों से सारा वातावरण गूंज उठा। दो-चार लड़कों तथा लड़कियों की जोशीली आवाज़ें भी सुनाई दीं।



स्टेज पर पच्चीस-तीस शायर विराजमान थे। इन में प्रो. मोहन सिंह, मीशा, साधु सिंह हमदर्द तथा बलराम भी थे। पाँच-छह कवियों ने हमारी उपस्थिति में कविताएं पढ़ीं तो उनकी विषय-वस्तु कुछ इस प्रकार थी – ‘बाबा नानक अब तुम मत आना। यहाँ रिश्वतें, झगड़े, बंटवारे, रगड़े। तुम मत आना।’ या फिर – ‘बाबा तुम आकर देखो देश में कितना भ्रष्टाचार है। गरीबों पर जुल्म होता है। लोग नंगे, भूखे फिरते हैं। तू आकर देख।’



मोहन सिंह ने अपने महाकाव्य ‘ननकायण’ में से नज़्म पढ़ी जिसमें वह तलवंडी की शाम का वर्णन करता है। सारी नज़में शाम, नाम, काम, धाम आदि शब्दों से भरी पड़ी थीं। मुशायरे में थकावट थी, ख़यालों का बुढ़ापा।
शिव उठा तो सारे हॉल में बेचैनी दौड़ गई। उसने नज़्म पढ़ी, सफ़र।
आँखें बंद कर, तथा बाँह ऊंची कर उसने माइक्रोफोन के सामने गुनगुनाया। नशीले धीमे स्वर लरज़े और लोगों के दिल की धड़कन की तारों को किसी ने मिज़राब से छेड़ा।
अचानक उसकी आवाज़ ऊंचे स्वरों में गूंजी। वह नानक को चुनौती दे रहा था। एक शायर दूसरे शायर से मुख़ातिब था। वह नानक से कह रहा था, ‘देख तेरी कौम में कितना सफ़र किया है, तुझसे आगे। यह आज पहुंची है नाम से तलवार तक।’



नाम से तलवार तक के शब्द गूंजे तो जवानों के सीने में सचमुच समूची कौम के निमन-चेतन की लालसाएं जाग उठीं। पूरे हॉल में शिव गूंज रहा था। उसका कद बहुत ऊँचा लग रहा था और उसकी आवाज़ में पैगंबरों वाला ओज़ था। लोगों में सिहरन पैदा करने की शक्ति, उन्हें रुलाने, जगाने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा।



हॉल में सन्नाटा था। बीच-बीच में हल्की सी आह निकलती थी। फिर जादूभरी मुग्धता। नज़्म ख़त्म हुई तो लड़कियों ने आवाज़ें दीं – ‘की पुच्छदे ओ, हाल फकीरां दा।’ शिव मु्स्कराया तथा नया मूड बनाने के लिए फिर से गुनगुनाया। नज़्म गाने लगा जो उसने सैंकड़ों बार गई थी और हर बार लोगों के दिल को छू गई थी । जब उसने ऊंचे स्वर में कहा –




‘तकदीर तां साडी सौकण सी
तदबीरां साथों न होईयां
न झंग छुटेया, न कन्न पाटे
झुंड लंग गिया, इंझ हीरां दा।’






हॉल में बैठे सभी लोग तड़प उठे। कॉलेज की लड़कियों के सीने में हूक उठी। वे हीरों का ही रूप थी। युवकों के सीने में साँपों ने डंक मारे क्योंकि वे सभी ऐसे रांझे थे जो कान नहीं पड़वा सके थे।



एक दर्द भरा माहौल छा गया। शिव तीन नज़में पढ़कर हटा तो कोई और शायर खड़ा न हो सका। समां टूट गया तथा मेला उजड़ गया।
शिव बाहर निकला तो उसने एक कर्मचारी से कहा- ‘कुत्तो, व्हिस्की क्या सिर्फ़ आते वक्त ही पिलानी थी ? गिलास लाओ।’



एक आदमी ने व्हिस्की का एक गिलास भर कर शिव को पकड़ाया और दूसरा मुझे। वहाँ एक मुंशी बैठा था जो शायरों को रुपए देकर रसीदें ले रहा था। उसने शिव को एक लिफ़ाफ़ा थमाया और रसीदी टिकट पर उसके दस्तखत ले लिए। शिव ने नोट गिने बिना ही लिफ़ाफ़ा जेब में डाल लिया।
हम तीनों बाहर निकले तो ओ. पी. शर्मा ने कहा कि डिनर की व्यवस्था उसके घर पर थी। सभी वहाँ चले गए।
शिव ने हामी भरी। हम इकट्ठे चल पड़े।
थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि शिव अंधेरे में कहीं गुम हो गया था।



सुबह मैं गहरी नींद में सोया पड़ा था, जब शिव ने आकर मुझे जगाया, ‘उठो अब वापिस चलें चंडीगढ़। उसे भी रास्ते में छोड़ना है। हम टैक्सी में बैठे हैं जल्दी करो।’
मैं तैयार होकर बाहर आया तो शिव तथा वह महिला मेरा इंतज़ार कर रहे थे। टैक्सी वापिस दौड़ने लगी। उसी कॉलोनी में नीम के पेड़ के पास रुकी। शिव तथा उसकी दोस्त बाहर निकले। घर के सामने जीप खड़ी थी।
वह बोली, ‘वे आ गए हैं।’
शिव ने कहा, ‘चल अंदर चलें। बलवंत, तुम भी आ जाओ।’
मैंने अंदर जाने से इन्कार कर दिया। मुझे दीवार पर टंगी बंदूक याद आ रही थी, कारतूसों की पेटी तथा चमकते ऊँचे बूट। अभी ही कोई घटना घटने वाली थी।
शिव ने मुझे खींच कर कहा - ‘आ यार, दो मिनट लगेंगे।’
मैं दुविधा में था। इस पागल ने......
शिव की दोस्त आगे थी तथा हम दोनों पीछे। पता नहीं क्या होगा अब।
शिव ने अंदर घुसते ही मुस्करा कर कहा, ‘ले भाई संभाल अपनी बीवी। मैं ले गया था मुशायरे में।’
वह सुंदर सा युवक था। बोला - ‘आईए, बैठिए, चाय पीकर जाईएगा।’
शिव ने कहा, ‘हमें जल्दी में हैं। हम चलते हैं।’ उसने झूमते हुए उसका आलिंगन किया और फिर हम चंडीगढ़ के लिए रवाना हुए।
मैं शिव की बेबाक कशिश पर चकित था और महिला की दिलेरी पर।

शिव एक संकल्प था, सृजनात्मकता का प्रतीक, एक ऐसी शक्ति जो शारीरिक होते हुए भी आध्यात्मिक थी।



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मैंने गुरु नानक देव पर लाईट ऐंड साउंड ड्रामा लिखा। इस नाटक के प्रदर्शन की रुप-रेखा तैयार की। इसके गीत शिव ने लिखे। वह एक महीना मेरे घर रहा। हम दोनों जन्म साखियों को पढ़ते तथा नाटक की बाणी के एक-एक शब्द का रसपान करते। शिव सुबह चार बजे उठ बैठता। रोज़ दो-तीन गीत लिखकर मुझ जगाता – ‘ले सुन।’

नानक के जन्म पर लिखा गीत उसने गाकर सुनाया –


‘हरिया नी मांए, हरिया नी भैणे।
हरिया ते भागी भरिया।
मेरे हरे दे चंद सूरज हाण......।’


इस जन्म पर तारे मिठाईयां बाँट रहे हैं । धरती उसक दाई......।



वह गा रहा था और मेरी आँखों में आँसू थे। उसने नानक के घर से चले जाने का गीत लिखा। किस प्रकार माता तृप्ता तथा सुलखणी नानक के बिछोड़े का संताप झेलती हैं। शिव ने ऊँची आवाज़ में सहराई के स्वरों में गाया -



‘इक दे सिर दा साँई चल्लिया
इक दी अक्ख दा नूर।
इक दे थण विच विरहा रोवे
इक दी माँग संधूर।’


उसने कहा, तुम सो रहे थे। मैंने सोचा एक नज़्म और लिख लूं। एक ग्रामीण लड़की कहती है –



‘कोठे चढ़ के कत्त लग्गी
आ पूणी नूं आग्ग पई
पट्टां दे विच्च पींघां पईयां
हुस्न जवानी रज्ज गई
सावे टोभे दे शीशे दी
चिप्पर-चिप्पर भज्ज गई।’



शिव ने यह नज़्म मुझे दिखाई। इसमें दो-चार पंक्तियां काटी हुई थी। ये पंक्तियां भी उसने काट दी थी –



‘खेतां विच्चों सूरज-रंगी
टौरे वाली पग गई।’



वह कई बार खूबसूरत पंक्तियां तथा अलंकार काट देता। ऐसी पंक्तियां जो कोई दूसरा शायर नहीं लिख सकता, शिव आसानी से लिख डालता। उसके शब्दों की सजावट में चमत्कार था, नाटकीयता थी। दो अलग शब्दों को तथा चित्रों को अजीब तरह से जोड़ता था। उसने बिंबों तथा प्रतीकों का ऐसा प्रयोग किया कि वे उसके नाम साथ ही जुड़ गए। किसी की हिम्मत नहीं थी कि ‘भट्ठी वालीए’ या ‘कंडियाली थोर’ या ‘सप्पणी’ या ‘चंदरे रुख’ या ‘पुठड़े तवे’ जैसे शब्दों का प्रयोग करे।



यदि वह प्यार का गीत लिखता या खुशी का तो उसी वक्त कब्रों या मृत्यु के विषय में भी गीत लिखता था। नानक पर रहस्यवादी कविता के बाद उसी वक्त उसने ‘उधाले’ पर नज़्म लिखी। वह ‘अलख़ बछड़ी’ की बात करता है जो सौ खूंटे उखाड़ कर भागी जाती है। एक में कहानी, नशा तथा वैराग्य है, दूसरी में जिस्म का शूकता वेग तथा वर्जित प्यार। शिव बहुपक्षीय तथा बहुमुखी कवि था।


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लंदन में उसे बी.बी.सी वालों ने कहा, ‘तुम ग़म के शायर हो, इसे बारे में कुछ बताओ।’
शिव ने कहा, ‘काहे का ग़म ? मुझे कोई ग़म नहीं। मुझे कोई ग़म नहीं, मज़े से शराब पीता हूँ। महबूबाओं ने प्यार दिया। बेशुमार लड़कियों ने इश्क किया। काफ़ी रुपया है। यार, दोस्त हैं। नेक बीवी है। काहे का ग़म। मुझे कोई ग़म नहीं। मैं ग़म की कविता लिखता हूँ हँसकर। मुझे अपना कोई ग़म नहीं। दुनिया का ग़म अवश्य मेरे भीतर है। जो शायर निज़ी ग़म का रोना रोते हैं, उनकी कविता फीकी होती है।’



जब मैं लंदन गया तो लोग महफ़िलों में उसकी बातें करते थे। गलासगो गया तो उसकी बात। टोरांटो गया तो उसके बात तथा न्यूयॉर्क की पंजाबी महफ़िलों में भी उसी की चर्चा।
वह मृत्यु के बाद एक मिथक बन गया है – मंटो की भाँति, सहगल की भाँति। यदि किसी ने शिव के साथ खाना खाया, या बस में सफ़र किया या शराब पी या उसकी तिल्ले वाली चप्पल ठीक की या रेशमी कुर्ता सिला तो वह गर्व से शिव की बात करता है। ऐसी शोहरत तथा प्यार किसी विरले को ही नसीब होता है।



शिव ने अपनी मृत्यु अठाईस साल की उम्र ही निर्धारित कर ली थी। कोई शक्ति उसे मरने से नहीं रोक सकती थी। जब किसी का नाम ही शिव बटालवी हो तो उसकी मौत जवानी में ही लिखी होती थी। उसने अपनी कलम से अपना मरसिया खुद लिखा।



वह भरी जवानी में मरने का इच्छुक था। एक बार शराब पीकर नशीली आँखों से देखते हुए वह मुझसे कहने लगा – ‘मैं बूढ़ा होकर नहीं मरना चाहता। बुड्ढे की मौत बड़ी ज़लील चीज़ है। जापान के समूराई सूरमे अपने जिस्म को सुडौल तथा खूबसूरत बनाते हैं। जब जिस्म की खूबसूरती चरम पर होती है तब वे अपने पेट में तलवार घोंप कर हाराकेरी की रस्म अदा करते हैं और मौत की गोद में समा जाते हैं। चैरी का फूल पूरी तरह खिलता है और बड़ी शान से गिरता है। मरना कोई चैरी के फूल से सीखे।’



शिव ने अपनी मौत की फूलों से तुलना की है। उसने जवानी में मरने की खूबसूरती का वर्णन किया और इसकी रस्म भी पूरी की। चंडीगढ़ में हम अक्सर मिलते। वह सर्दियों में मलागीरी कोट तथा मफ़लर पहन कभी-कभी स्टेट बैंक आता। वहाँ से उठकर मेरे साथ। मेरे बहुत मजबूर करने पर भी वह कॉफी न पीता। उसके खून में शराब इस क़दर घर कर गई थी कि चाय या कॉफी उसे अच्छी नहीं लगती थी। सिर्फ़ शराब ही उसके शरीर को शीतलता दे सकती थी। कई बार वह बिना सोडे या पानी के शराब की शीशी में से सीधे तीन-चार घूंट भर लेता जिससे उसका मन शांत तथा एकाग्र हो जाता। उसमें रचना-शक्ति दौड़ने लगती। वह पहले से भी ज़्य़ादा नम्र हो जाता। उसमें बर्दाश्त करने की ग़ज़ब की शक्ति थी।



नए शायर, नौजबान इन्कलाबी शायर, प्रयोगवादी शायर उसके विरुद्ध बोलते। उसे सामाजिक चेतना से वंचित कहते। भला ऐसी कविता का क्या मतलब, जब कि मुल्क में भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, भूख है, और शिव चाँद, सूरज और कच्ची कंध मले दंदासा की बातें करता है। वह समाज से कट गया है।



ऐसे कवि पत्रिकाओं में उसके विरुद्ध लिखते रहे तथा मंचों पर बोलते रहे परंतु कोई भी मुशायरा शिव के बगैर मुकम्मल नहीं होता था। कवि सम्मेलनों में लोग पहली बात यही पूछते कि इस मुशायरे में शिव आ रहा है या नहीं।



शिव अपनी बढ़िया कला तथा सृजन शक्ति के बारे सजग था। लोग उसे निराशावादी कवि कहकर बदनाम करते रहे। कुछ उसे वासना का कवि कहते। कई लोग उसके कविता में से तकनीक गलतियां निकालते रहे। कई उसकी नकल करके उससे बेहतर कवि होने का दावा करते रहे पर शिव शोल की भाँति जलता रहा और रौशनी बिखेरता रहा।



उसने कहा, ‘सारी प्रकृति एक दूसरे की निंदा तथा प्रशंसा है। हमारा जन्म ही निंदा तथा प्रशंसा के संभोग से होता है। मेरा सबसे बड़ा निंदक या प्रशंसक मैं खुद हूँ। अपनी पीड़ा की निंदा मैंने अपने गीतों से की और मेरे गीतों की निंदा लोगों ने की। इसकी वजह मेरी शोहरत के प्रति ईर्ष्या के सिवा कुछ नहीं। ईर्ष्या हमेशा घटिया को बढ़िया से होती है।’



उसके जीवित रहते मैंने उस पर कई लेख लिखे, उसकी कई कविताओं का उसे साथ बिठाकर अंग्रेजी में अनुवाद किया परंतु उसकी मृत्यु के बाद पंजाबी में कोई लेख नहीं लिखा। प्रशंसात्मक लेख लिखने का काम मैंने उसके निंदकों के लिए छोड़ दिया था, जो बढ़-चढ़कर रोने तथा मातमी गीत गाने के लिए तत्पर थे।



शिव की मृ्त्यु एक निज़ी ग़म भी था और समूचा ग़म भी। ऐसी पीड़ा कई बार इन्सान के अंदर ही रह जाती है।अब शिव को गुज़रे बारह साल हो गए हैं। उस की कविता, उसकी याद, उसकी उदास हँसी, टिप्पणियां तथा झिंझोड़ डालने वाले गीत उसी तरह ताज़ा हैं। वह लंदन में पाँच-छह महीने रहकर वापस आया तो मैं उससे मिलने गया। 21 सेक्टर में उसने मकान बदल लिया था।



वहाँ पहुँचा ते देखा कि शिव के ड्रॉइंग रूम में गोल-मटोल रबड़ की फूली हुई कुर्सियां थी। कुछ विदेशी चीज़ें। उसका प्रशंसक तथा शिष्य दीपक मनमोहन भी वहीं बैठा था। एक लंबी लड़की किचन में रोटी बना रही थी, उसकी प्रशंसक। अरुण भी खुशी से काम कर रही थी। घर में खुशहाली थी।



शिव बातें करने लगा तो मैंने देखा कि वह उन छह महीनों में बदल गया था। उसके कपोल भर गए थे तथा उसके चेहरे पर धुएं जैसी एक छाया सी थी। मैं सोचता रहा कि क्या वह ज़्यादा सेहतमंद हो गया था या बीमार।



उसने कहा, ‘ये देख रबड़ की कुर्सियां। लंदन से लाया हूँ ये। इनमें हवा भरो और चाहे एक मन की औरत बैठ जाए, चाहे बारह मन की धोबिन....बड़ी देर हो गई बाईस्कोप देखे.... दिल्ली का कुतुबमीनार देखो, आगरे का ताज देखो, बारह मन की धोबिन देखो.....ये लोग कहाँ चले गए ?’

मैंने कहा, ‘लंदन की कोई बात सुना। क्या हाल है वहाँ के लोगों का ?’
‘सब पौंडों (पाउंड) के भूखे हैं । हर कोई शायर तथा लेखक। उन्होंने बर्तानिया को फ़तेह कर लिया है। वे पंजाब से आए लेखक की सेवा भी करते हैं और उससे नफ़रत भी। मुझे वहाँ पाकिस्तान की शायरा ... सर मुहम्मद इकबाल की पोती....बहुत खूबसूरत लड़की मुझ पर फिदा हो गई.....उसकी चिट्ठियां....और तीन चार और लड़कियों का....मैंने अचार डालना है इन लड़कियों का......शराब पिलाते मुझे तथा मेरे गीत सुनते...मैंने कह दिया था कि मैं पाँच सौ पाउंड लूंगा। एक शाम का.....और उन्होंन पैसे दिए.....घुटने टेककर। मैं तो शायर हूँ.....शिव......उनका बाप.... पर वह लड़की सायरा बानो....या नसीम बानो मुझ पर फिदा हो गई......पर मुझे क्या परवाह....मुझे घर याद आ रहा था...अरुण....बच्चे.....व्हिस्की .....मेरा बेटा......।’



इन टूटे-फूटे शब्दों नें शिव की सारी मानसिक स्थिति बयां कर दी। टुकड़े हुआ दिल...काँपते शब्द तथा बेढंगे वाक्य....इनमें अंदरूनी तर्क था। वह इस तरह बोल रहा था जैसे मुझे नहीं किसी और से कह रहा हो।



कई दिनों बाद पता चला कि शिव बीमार है। मैं उसे मिला तो उसकी बातें और भी उखड़ी हुई तथा बेतुकी थीं। मुझे अब तक याद है उसका धूंसर चेहरा तथा बुझी आँखें।



वह ज़िदगी से निराश हो गया था। निराशा के गहरे कुँए में डूब कर उसने कई ऐसी कविताएं लिखीं जो समूची परंपरा के विरुद्ध थीं। इनमें एक अजीब दिव्य-दृष्टि थी जो कई बार उस इन्सान में आ जाती है जो मृत्यु को देख रहा हो। जिसे किसी का डर न हो। जो अंधेरी कोठरी में छत फाड़ने वाली चीख़ मार सके ताकि सोए पड़े लोग जाग सकें। इसी मानसिक अवस्था में उसने कविताएं रचीं – कुत्ते, फाँसी, लुच्ची धरती। वह धरती को माता कहते-कहते थक गया था। इसके अलावा वह देख रहा था कि पाखंडी तथा हर प्रकार का साहित्यिक और राजनीतिक व्यक्ति धरती को माँ कह कर लूट रहा था। शिव ने धरती को ‘लुच्ची’ कह कर अपने इर्द-गिर्द को चौंकाया। परंपरागत नमस्कार को त्याग कर धरती गो क्रोध से लुच्ची कहा – जैसे कोई जवान बेटा अपनी माँ को गाली दे।



लोगों ने शिव को गालियां दी। शिव और क्रोधित हो गया तथा कहने लगा, ‘बेवकूफों ! कुत्तो मेरी बात सुनो। मैं सच कह रहा हूँ। मेरी बात सुनो।’
कई लोगों ने उसे ललकारा तथा कहा कि उसकी विचार-धारा उलटी है। शिव ने कहा – ‘हाँ, मैं उलटा हूँ – शीशे की भाँति आपका अक्स हूँ, जो आपको उलटा लगता है।’
धीरे-धीरे शिव अपने भीतर ही भीतर धंसता गया। लोगों ने जो कहा, उसी तरह का बन कर दिखाने की ज़िद में और भी बातें करने लगा, जिनमें हक़ीक़त की चिंगारियां थीं। कईयों ने कहा - शिव बतौर शायर मर गया है। वह बिलकुल मर गया है। शिव मरने के लिए तैयार हो गया।
मुझे पता चला कि शिव अस्पताल में है और मुझे याद कर रहा है। मैं अस्पताल गया तो वह प्राईवेट कमरे में चारपाई पर पड़ा था। दवा की शीशियां, अस्पताल की अजीब सी बू तथा घुटन। उसके पैरों की तरफ वही लंबी सुंदर युवती बैठी थी जो उसके घर रोटी बना रही थी।
एक रात वह अस्पताल से निकल कर चला गया। मैं अस्पताल में नहीं मरना चाहता। उसे फिर से अस्पताल में दाखिल किया गया। उसकी हालत बिगड़ती गई।



बिस्तर पर पड़ा वह कई बार ज़ोर-जो़र से रोता और आवाज़े लगाता – ‘मैं मर रहा हूँ। कहाँ है मेरे यार दोस्त ? कुत्तो मैं जा रहा हूँ। ढूंढोंगे शिव को !’



उसके अधिकतर दोस्त व्यस्त थे। किसी के पास वक्त नहीं था। साहित्य समारोह हो रहे थे। भाषण चल रहे थे। कॉफी हाउस में लेखकों, अध्यापकों तथा अख़बार वालों का जमघट लगा रहता था। उनके पास वक्त नहीं था कि शिव से मिलने जाएं।



मुझे एक शाम संदेसा मिला कि शिव मुझे याद कर रहा है। उसने मुझे फौरन मिलने के लिए कहा क्योंकि वह चंडीगढ़ छोड़ कर अगली सुबह बटाला जा रहा था। चंडीगढ़ उसे रास नहीं आया था। वह सेक्टर 21 के मार्केट के पिछवाड़े एक दोस्त के घर ठहरा हुआ था, जिस का पता मैंने नोट कर लिया था।



रात हो चुकी थी। सोचा सुबह उसे मिलने जाऊंग। मुझे डर लगा कि वह कहीं मुझे बिना मिलो न चला जाए। एक अजीब ख़ौफ़ तथा बेचैनी मेरे भीतर थी कि यदि वह बटाला चला गया तो पता नहीं कब मुलाकात हो।



मैं सुबह साढ़े पाँच बजे उठा, कार स्टार्ट की और सेक्टर 21 के उस पते पर गया। लोग सोए हुए थे। तीन मंजिले मकान शांत थे। मुझे वह मकान ढूंढने में कुछ समय लग गया। घबराहट बढ़ती गई।



अंत में जब मकान मिला तो पता चला कि शिव आधा घंटा पहले वहाँ से चला गया था।
मैंने पूछा – ‘कहाँ ?’
‘बटाला।’
मैंने फौरन कार घुमाई और बस अड्डे पर गया। बटाला जाने वाली बस का पता किया। आधा घंटा बस अड्डे पर घूमता रहा। शिव जा चुका था।



फिर पता लगा कि शिव अपनी बीवी तथा बच्चों सहित टैक्सी में बटाला गया था। उसकी हालत बहुत ख़राब थी। उसने टैक्सी को सेक्टर 22 के बत्तियों वाल चौंक पर रोका, जहाँ शाम को दोस्तों के साथ लोहे के जंगले के पास खड़ा होता था। उसने टैक्सी का दरवाज़ा खोला। नफ़रत से थूका और कहा – ‘कभी नहीं आऊँगा मैं इस कुत्ते शहर में।’



चंडीगढ़ पत्थरों का शहर था, बटाला लोहे का। दोनों शहरों ने उसे प्यार दिया, शिव ने इन शहरों को गीत दिए। दोनों शहरों को उसने प्यार भी किया और नफ़रत भी।
बटाला वह कुछ ही दिन रहा। फिर अरुण के साथ अपने ससुराल के गाँव चला गया जो पठानकोट से पंद्रह मील दूर पहाड़ के क़दमों में है।



यहाँ हरियाली थी, छोटे घर थे, खेत थे। शिव इस घर के चौबारे में रहा जहां अत्यंत गर्मी थी।
रात को उसे नींद न आती। कई बार वह आवाज़े देता और रोता। ‘मैं अकेला हूँ लोगों। मैं अकेला रह गया। कहाँ हैं मेरे यार ? ’



दूर खेतों में गीदड़ रोते और भांय-भांय करती रात में शिव की आवाज़ें खो जातीं। 6 मई, 1973 की रात को शिव की आत्मा सदा के लिए सो गई।


पंजाबी से अनुवाद – नीलम शर्मा अंशु’


शनिवार, जुलाई 31, 2010

कविता श्रृंखला - 3 / श्री शंकर पात्र ( बांग्ला )


श्री शंकर पात्र


अनुवाद - नीलम शर्मा 'अंशु'





1)


आज की सहस्त्र कुंतियां






आज की सहस्त्र कुंतियां
पुरुष का स्नेह चाहती हैं
मन की तृप्ति के लिए नहीं,
पेट की ज्वाला के लिए ।
पार्क के बगल में खड़ी है नमिता
सिनेमा हॉल के सामने कावेरी
इस शताब्दी की कोई वधु, कोई कुमारी।


तृप्ति नहीं
आशा नहीं
कावेरी के संग ज़िंदा हूँ
रात के अंधेरे में टटोल कर देखती हूँ
शबरी का तकिया भीग गया है
कुमारी जननी रो रही है
सांत्वना की भाषा नहीं आती
तभी तो आँखें मूंदे पड़ी हूँ
मैं उसकी वैध जननी।


कुंती एक बार रोई थी ज़िंदगी में
सूर्य के अवैध प्रणय को मिटा देने के लिए
आज की सहस्त्र कुंतियां बार-बार रोती हैं
फिर भी खड़ी रहती हैं
पुरुष का स्नेह चाहती हैं
मन की तृप्ति के लिए नहीं,
पेट की ज्वाला के लिए ।





2)


माँ बनना कठिन है.....


बहुत कुछ तो सुना था
वसंत के आगमन से पूर्व
वसंत में फूल खिलते हैं, पक्षी चहचहाते हैं
सपने हक़ीकत में बदलते हैं
बहुत दिनों के बाद जब वसंत आया
तब क्या हुआ.....

वसंत की रात को फूल डरता है
दाँत होठों को चबा जाना चाहते हैं
फाल्गुनी रातों में कालबैसाखी के तूफान में
पंखुड़ियां बिखर जाती हैं
बाईस वर्षीया विधवा युवती की भाँति
तन आज कुछ देना चाहता है, कुछ पाना चाहता है

सीधे रास्ते से कुछ नहीं होने वाला
इसलिए चोर रास्ते पर चलती जाती है
खाना न मिलने पर ज़हर खाती है
कभी-कभी विद्रोही मन
कह उठता है
ज़हर नहीं खाना मांगो
चुरा लो, छीन लो
लेकिन सोच कर क्या फ़ायदा
सपने कभी हक़ीकत नहीं बनते।


जो फूल अच्छा लगता है
क्या उसे पाना चाहते हो ?
तो उड़ते-उड़ते
फटाक से एक बार बैठ जाओ
फल लगेंगे, फूल सूख जाएंगे
पिता बनना क्या सहज़ नहीं है ?
लेकिन माँ बनना कठिन है
फिर भी माँ बनती हैं
माँ बनना पड़ता है।


शनिवार, जुलाई 24, 2010


कहानी श्रृंखला – 8पंजाबी कहानी
पठान की बेटी

सुजान सिंह


ग़फूर पठान जब भी शाम को अपनी झोपड़ी में आता तो उन झोंपड़ियों में रहने वाले बच्चे ‘काबुलीवाला’ - ‘काबुलीवाला’ कहते हुए अपनी झोंपड़ियों में जा छुपते। एक छोटा सा सिक्ख लड़का बेखौफ वहाँ खड़ा रहता और उसके थैले, ढीली-ढाली पोशाक, उसके सर के पटे और पगड़ी की तरफ देखता रहता। गफ़ूर को वह बच्चा बहुत प्यारा लगता था। एक दिन उसने लड़के से पठानी लहज़े वाली हिंदुस्तानी ज़बान में पूछा - ‘तुमको हमसे डर नहीं लगती बाबा ?’

बच्चे ने मुस्कराकर सिर हिला दिया। ग़फूर के सुर्ख चेहरे पर और भी लाली दौड़ गई। उसने बड़ी कोमलता और प्यार भरे जज़्बे से अपनी दोनों बाँहें बच्चे की तरफ बढ़ाई। बच्चा पठान की टाँगों से लिपट गया। ग़फूर ने उसे बाँहों से पकड़ कर अपने सर से ऊपर उठा लिया और इधर-उधर हिलाते हुए प्यार करने लगा। सामने वाली झोंपड़ी से बच्चे की बहन बाहर निकली, जो लगभग आठ साल की होगी। भाई से पठान को दुलार करते देख वह भी पास आ खड़ी हुई। पठान बड़ी ज़ोर-ज़ोर से खिल-खिलाकर हँस रहा था और वीरो का भाई अजमेर पाँवों की ठोकर से पठान की पगड़ी गिराना चाहता था। अंतत: एक ठोकर से उसकी पगड़ी नीचे जा गिरी। ग़फूर ज़ोर से हँसा और अजमेर को नीचे उतार कर बोला - ‘बाबा, तुम जीता!’
जब पठान ने वीरो को अपने पास खड़ी देखा तो उसने अजमेर से पूछा - ‘क्या ये तुम्हारा बहिन है ?’


अजमेर ने होंठ भींचकर मुस्कराते हुए कहा - ‘हूं...!’
काबुलीवाले ने एक हाथ से वीरो और दूसरे हाथ से अजमेर को कमर से पकड़ लिया और ज़ोर से चक्कर लगाने लगा। बच्चे खिल-खिलाकर हँसते थे और ग़फूर ज़ोर-ज़ोर से हूं.....ऊं.....हूं.....ऊं....... करता जाता था। इस हूं....ऊं...... को सुनकर छोटी बेटी को गोद में उठाए उनकी माँ तेज़ी से बाहर निकली और अपने बच्चों को ग़फूर से हिलोरें लेते देख डर सी गई पर पंजाबियों सा हौंसला करके बोली - ‘वे अजमेर ! अरी वीरो !’

ग़फूर वहीं का वहीं खड़ा हो गया और बच्चों की माँ की चढ़ी हुई त्यौरी और तनी हुई आँखें देख कर उसने दोनों को उतार दिया और खुद बड़ी मुश्किल से गिरते-गिरते बचा। तेजो ने बच्चों को डांटते हुए कहा - ‘आ लेने दो आज तुम्हारे बापू को।’

वीरो तो झट से भीतर जा घुसी परंतु अजमेर डटकर खड़ा हो गया और फौजियों की तरह कमर पर हाथ रखकर बोला - ‘आ लेने दो फिर।’

तेजो ने आगे बढ़कर अजमेर को बाँह से पकड़ लिया और उसे घसीटते-घसीटते अपनी झोंपड़ी में ले गई। ग़फूर काफी देर तक अजमेर का रोना-धोना सुनता रहा। अंतत: वह अपनी झोंपड़ी में गया और अपने झोले से शीशा निकालकर अपना मुँह देखने लगा। उस दिन उसने खाना भी नहीं बनाया और ऐसे ही सो गया।

किसी को पता नहीं था कि ग़फूर क्या काम करता है। कोई कहता कि हींग, जीरा और सालब बेचता है। कोई कहता कि इससे बचकर रहना, ये लोग बच्चों को उठाकर ले जाते हैं। झोंपड़ियों में ओड़िया, बंगाली, बिहारी मज़दूर रहते थे। किसी-किसी का ही परिवार साथ रहता था। उनके बच्चे तो बच्चे, वे खुद भी पठानों से डरते थे। झोंपड़ियों के आमने-सामने की कतारों के सिरे पर अजमेर और पठान के घर थे। अजमेर का पिता रिजर्व में आया हुआ फौजी था और पास की ही मिल में चौकीदार का काम करता था।

तेजो ने आते ही अपने पति के खूब कान भरे। दिन चढ़ते ही अजमेर के बापू ने ग़फूर की झोंपड़ी का टीन का दरवाज़ा खटखटाया। कुछ देर बाद ग़फूर नंगे सिर, आँखें मलता हुए बाहर निकला और उसे सामने देख कर कहने लगा -‘क्या बात है सरदार?’
वीरो के बापू ने टूटी-फूटी हिंदुस्तानी ज़बान में कहा - ‘देख भाई, तू मुसलमान है खान, और हम सिक्ख। तू हमारे बच्चों के साथ..... ’

‘सिक्ख है कि मुसलमान, बच्चा तो सबका एक है, सरदार! खुदा तो सबका एक है।’
जमादार ने गर्म होते हुए कहा - ‘एक-वेक कोई नहीं। तू हमारे बच्चों के साथ मत खेला कर। अगर तू पठान है तो मैं सिक्ख हूं।’

पठान ने अपने क़ौमी स्वभाव के विपरीत और भी नरमी से कहा - ‘सब बच्चा हमसे डरती है, तेरा बच्चा हमसे नहीं डरती। हमको वो अच्छा लगी थी। तुम अपना बच्चों को मना कर दो हमारा पास आने को। हम किसी को नहीं बुलाती। हम तो इधर अकेला रहती।’

‘बस-बस, फैसला हो गया।’ जमादार ने कहा।

बच्चे अक्सर नज़र बचाकर ग़फूर के सामने आते थे, पर ग़फूर उन्हें त्योरियां दिखाते हुए यह कह कर भगा देता कि तुम्हारा बापू मारेगा। फिर भी कई बार ग़फूर का दिल पसीज जाता था और वह उन्हें चोरी-छिपे काबुल का सरधा या कंधार का अनार दे देता था और कहता कि चोरी-चोरी खाकर घर जाना। बच्चे भी ऐसा ही करते।

वीरो तथा अजमेर से छोटी और गोद वाली लड़की से बड़ी एक बेटी और थी तेजो की। वह घर से बहुत कम निकलती थी। छोटी बेटी के पैदा होने से पहले वह बड़ी दुलारी थी। अब मां का ध्यान नई बच्ची की तरफ होने के कारण वह अनजाने ही प्यार की कमी महसूस करती थी। अक्सर मामूली सी बात पर ही रो पड़ती और ज़िद किया करती थी। तेजो उसे डांटा करती थी। वह रोती तो उसे और ज़्यादा मार पड़ती। बच्ची के प्रति तेजो की उपेक्षा देख वीरो और अजमेर भी उसे पीट लिया करते थे और जब वह रोती तो ‘ऐसे ही रोये जाती है’ कहकर वे उसे तेजो से और पिटवा दिया करते। लड़की उपेक्षित सी हो गई और अपने बचाव के लिए उसने झोंपड़ी से बाहर घूमना-फिरना शुरू कर दिया। बड़े भाई-बहन फिर भी उसका पीछा न छोड़ते। ग़फूर रोज़ यह सब देखता था, पर कुछ कह नहीं पाता था। बड़े बच्चों के लिए उसके दिल से प्यार घटता गया और ज़ालिमों को छोड़ मजलूम के प्रति उसके मन में हमदर्दी बढ़ने लगी। बहुत दिनों तक पंजाबियों के बीच रहने के कारण वह काफी हद तक उनकी भाषा भी समझ लेता था और छोटी लड़की को तेजो द्वारा दी जाने वाली गालियां सुन कर दुखी भी होता था। इन्हीं दिनों किसी कारण दो महीनों के लिए जमादार की नौकरी भी छूट गई थी। फिर तो लड़की की शामत ही आ गई। जो भी आए, उसे ही पीटे। तेजो कहा करती - ‘ये कंबख्त रोती रहती थी इसलिए हमारी नौकरी भी गई।’ महीने की तनख्वाह से बमुश्किल रोटी की गुज़र होती थी। बड़ी मुसीबत आन पड़ी। मजलूम की रहम ने ग़फूर के दिल में रहम का जज़्बा पैदा किया। उसने एक दिन जमादार को बुलाया और कहा - ‘सरदार, तू मेरा भाई है। मैं जानती तुम तंगी में है। मैं तेरा मदद करना चाहती, तुम न नहीं बोलती।’ सरदार खामोश था और ग़फूर ने पंद्रह रुपए उसकी हथेली पर रख दिए। घर में ज़रूरत थी, पठान से मदद नहीं लेना चाहता था दिल, परंतु फिर भी उसने पंद्रह रुपए रख लिए। सोचा, नौकरी लग जाएगी तो सूद समेत लौटा देगा। जाते वक्त जमादार को फिर बुलाकर अपनों की तरह कंधे पर हाथ रखकर ग़फूर ने कहा - ‘सरदार, तुम्हारी घरवाली और दोनों बड़ा बच्चा छोटा लड़की को मिल कर मारता रहता है, नादान बेकसूर है। उसको मत मारो। हमको बड़ा तकलीफ होता है। देखो, वह बहुत कमज़ोर है, मर जाएगा।’ काफी देर तक पठान की विनती भरी आँखें जमादार को याद रहीं। उसने तेजो से कहा कि वह लड़की को न मारा करे परंतु तेजो और बच्चों की तो आदत बन चुकी थी। जब सरदार को नई जगह से पहली तनख्वाह मिली तो पहले वह ग़फूर की कोठरी में आया। पंद्रह रुपए के साथ-साथ पठान का सूद भी गिनकर उसने पांच रुपए का नोट और थमा दिया। ग़फूर नोट देख कर हैरान हुआ और बोला - ‘सरदार, ये क्या ?’

सरदार ने कहा - ‘तुम्हारा रुपया और सूद।’
‘हम मुसलमान पठान है सरदार!’ पठान ने रोष से कहा। ‘हम सूद को हराम समझता।’
ग़फूर का तमतमाया चेहरा देखकर जमादार ने कहा - ‘मुझे पता नहीं था कि कोई पठान सूद भी नहीं लेता, अच्छा हुआ पता चल गया। पर यह लो अपने रुपए।’
यह तो मदद था। ग़फूर ने चेहरे पर मुस्कान बिखेर कर कहा - ‘बच्चा सबका एक है सरदार।’

जमादार ने उसकी एक न सुनी और रुपए ज़बरदस्ती उसे देकर घर आया। दरवाज़े पर छोटी बेटी रो रही थी। वीरो और अजमेर उसे तंग कर रहे थे। और तेजो बिना देखे रसोई से उसे गालियां दे रही थी। जमादार ने अजमेर को डपट लगाई, वीरो को एक तमाचा जड़ा और लड़की को गोद में उठाए मुँह पोछता हुआ रसोई के पास पहुंचा। कुछ कहना ही चाहता था कि तेजो की नज़र उस पर पड़ी और बोली - ‘आई बड़ी लाडली! खसम नूं खाणी को गोद उठा लिया। सारा-सारा दिन रोती रहती है मनहूस।’

जमादार ने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई और वह मुँह फुलाकर एक कोने में जा बैठी।
तेजो ज़िद से लड़की को और मारने लगी। लड़की ज़िद्दी और ढीठ बन गई। ग़फूर लड़की की शामत आते रोज़ देखता था। उसे अकेली धूप में गिरती-पड़ती देख उसका दिल दहल जाता था।

पठान की आँखों में आँसू आ गए। वह दबे पाँव बाहर निकल कर फल की दुकान की ओर बढ़ा। उसने वहाँ से तीन किस्म के फल खरीद कर बच्ची को थमाए। लड़की हड़बड़ाई हुई कभी एक को दाँत से काटती तो कभी दूसरे को। ग़फूर की आह निकल गई। उसने सोचा, इसकी माँ, बड़े भाई-बहन और सरदार इसे मार कर दम लेंगे। इसे बचाना चाहिए। उसने झोले वाली थैली टटोली, दो की चिल्लर थी। सोचा भागकर कोठरी से पैसे ले आऊं। वहां तो मेरे पास हज़ार से ज़्यादा रुपए हैं। पर फिर सोचा, लड़की को बचाने का मौका छिन जाएगा। उसकी माँ शोर मचा देगी, हो सकता है सरदार के साथ झमेला हो जाए। वह घर न लौटा। उसने एक मुसलमान का तांगा पकड़ा और स्टेशन पहुँचकर कहीं की टिकट कटाई।

उधर शोर मच गया, ‘काबुलीवाला लड़की को उठा ले गया।’
कोई बोला, ‘देखा, सरदार डरता नहीं था।’ किसी ने कहा, ‘पठान मौका तलाश रहा था, ले उड़ा।’ तरह-तरह की बातों से सरदार के मन में ग़फूर के प्रति कड़वाहट भर गई। थाने रपट लिखवाई गई। तेजो रो-रो कर बेहाल हो रही थी और पठान के बच्चों को बददुआएं दे रही थी। पुलिस हैरान थी कि पठान इतना रुपया और कोठरी का दरवाज़ा खुला छोड़कर क्यों भागा ?

पूरे एक महीने के बाद जमादार को शिनाख्त के लिए थाने बुलाया गया। लड़की हथकड़ियों में जकड़े ग़फूर की गोद में थी। पिता की आवाज़ सुनकर लड़की ने एक बार पिता की तरफ देख मुँह मोड़ लिया। तेजो की भी एक न चली। लड़की बेहद सेहतमंद लग रही थी और पठान कमज़ोर। जमादार, तेजो और अन्य पड़ोसियों ने शिनाख्त की। पठान टुकुर-टुकुर उनकी तरफ ताक रहा था। आख़िर जब पुलिस पठान से लडकी लेकर जमादार को देने लगी तो लड़की की चीखें और पठान के विलाप से कमरा गूंज उठा।

पठान कह रहा था - ‘ज़ालिम को बच्ची नहीं देने का। बचाओ! बचाओ! ये लोग मार डालेगा। मेरा बेटी को, ये जालिम.....कसाई।’

थानेदार कड़क कर बोला, ‘तो तू इसको बचाने के लिए उठा कर ले गया था?’ चारों तरफ हंसी का ठहाका गूंज उठा। कोई कह रहा था, ‘शैदाई है।’ कोई कह रहा था, ‘बनता है।’ परंतु ग़फूर रोए जा रहा था।



अनुवाद – नीलम शर्मा ‘अंशु’


साभार – राष्ट्रीय महानगर(दीपावली विशेषांक), कोलकाता, 2004

रविवार, जुलाई 18, 2010

कहानी श्रृंखला – 7

पंजाबी कहानी

रक्तपात
     

 कुलदीप सिंह बेदी



वह उस दिन जब मिली तो बहुत उदास थी। अभी कुछ दिन पहले ही उसकी सगाई हुई थी। सगाई तो मेरी भी हो चुकी थी। यह उसे भली-भाँति मालूम था। जब कभी भी मैं उसके घर जाता तो उसकी माँ मुझे कहती- ‘कोई लड़का ढूंढ़ों इसके लिए भी।’ मैं पूछ बैठता, ‘लड़का कैसा होना चाहिए?’ तो माँ के बोलने से पहले ही वह बोल उठती, ‘कोई प्रोफेसर, डॉक्टर या वकील।’ कई बार ऐसी बातें होती रहतीं। मैं जब उसके घर से निकलता तो मुझे लगता कि न तो मैं प्रोफेसर हूँ, न डाक्टर, न ही वकील। मुझे याद है जब वह चंडीगढ़ में कोई कोर्स कर रही थी, तो मैं उसके बहुत कहने पर एक बार वहाँ उससे मिलने गया था। उसकी सहेलियों ने उसकी तरफ शरारत भरी निगाहों से देखा था और उसने मेरी तरफ देख कहा था, ‘नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं।’
‘क्या कह रही थीं लड़कियां ?’
‘लड़कियां तो कुछ न कुछ कहती रहती हैं।’
‘फिर भी ?’
‘कह रही थीं- तूने अच्छा मोर्चा मारा है। जैसी खुद ऊंची-लंबी हो, वैसा ही....।’
‘हां, तो फिर तुमने कहा नहीं कि तुम्हें तो किसी प्रोफेसर, डाक्टर या वकील की ज़रूरत है।’
‘आपको बातें बनानी तो बहुत आ गई हैं। मुझे तो आप बहुत पंसद हैं परंतु क्या करूं। मेरे पिता और चाचा नहीं मानेंगे। मम्मी को सब मालूम है कि मैं आपको कितना चाहती हूँ, लेकिन वे अकेली भला क्या कर सकती हैं?’
और फिर उस दिन शाम को जब रॉक गार्डन घूमने जाने के लिए तैयार हुए तो उसकी रूम मेट ने उसे आलिंगन में लेकर कहा था - ‘ला काला टीका लगा दूं। इतनी सुंदर जोड़ी को मेरी ही नज़र लग जाएगी।’ उस वक्त पता नहीं क्यों उसकी आँखें भर आईं थीं। बाहर निकले तो उसने कहा, ‘ओह हो, आपने हील वाले जूते क्यों पहन रखें हैं? रुकिए, मैं भी हील वाले सैंडिल पहन कर आती हूँ।’ और वह दौड़ कर कमरे में चली गई।

शायद उसकी इसी आदत ने उसे कैरियरिस्ट बना दिया था। हील वाले सैंडिल पहन कर जब वह मेरे साथ रॉक गार्डेन में घूम रही थी तो बहुत खुश नज़र आ रही थी। उसने बताया, ‘अब कोर्स ख़त्म होने में लगभग तीन महीने रह गए हैं, फिर लुधियाना लौट जाना है। फिर जल्दी-जल्दी मिला करेंगे।’

अगले दिन सुबह मुझे लौटना था। मैंने जब उससे साथ चलने का आग्रह किया तो वह बिना हील हुज्जत के राजी हो गई। रूम मेट को एक दिन की अर्ज़ी थमाई। उस दिन शनिवार था और अगले दिन छुट्टी थी। बड़े चाव से वह तैयार हो रही थी। रूम मेट कहने लगी, ‘बड़ा चाव है, मानो मुकलावे जा रही हो।’
‘चुप! इस तरह शोर नहीं करते। रवि के साथ कौन सा रोज़-रोज़ इस तरह जाने का मौका मिलता है।’

हम बस स्टैंड की ओर जा रहे थे। ‘कभी मैं तुम्हें इसी तरह ले जाऊँगा।’ रिक्शा में बैठे हुए उसने मेरे कंधे पर हाथ रख लिया, ‘अब भी तो ले ही जा रहे हैं।’
‘नहीं, इस तरह जाने और उस तरह जाने में बहुत फ़र्क है, उस वक्त तुमने गुलाबी पोशाक पहन रखी होगी। बाँहों में लाल चूड़ा, सजा-संवरा चेहरा और आँखों में एक अजीब सी प्यास।’
‘बस कीजिए! काफ़ी प्यारी कविता है यह।

वह ख़ामोश हो गई और फिर कहीं दूर देखते हुए कहा, ‘सिर्फ़ दिखावे वाली वस्तुओं की ही कमी है। मेरा दिल तो आपका हो चुका है। मुझे तो अब भी यही महसूस होता है कि हम शादी-शुदा हैं। सामाजिक मान्यता नहीं मिली तो न सही।’ फिर उसके बाद मेरा तबादला पठानकोट हो गया।

एक दिन मेरे दरवाज़े पर दस्तक हुई। नीली जीन्स पहने और काला चश्मा। मुस्कान बिखेरते हुए बोली, ‘उड़ गए न होश! यदि आज्ञा हो तो अंदर आ जाऊं!’
मैं चुपचाप उसे देखता रहा, वह झट-पट अंदर चली आई। पीछे-पीछे मैं। ‘एक गिलास पानी तो पिला दीजिए।’ चश्मा उतारते हुए उसने कहा।
‘तुम कैसे.....?’
‘क्यों? मैं नहीं आ सकती?’ सैंडिल उतार कर वह चारपाई पर सिकुड़ गई। उसने बताया कि वह यहां एक कैंप पर आई है। मैंने चाय बनाई। हमने मिलकर चाय पी। वह जाने के लिए उठते हुए बोली चलती हूं, ‘कैंप में सात बजे से पहले पहुंचना चाहिए। हाज़िरी लगती है।’
और उसका यह कैंप सात दिनों तक चला। दोपहर या शाम को कुछ समय के लिए वह मेरे पास आ जाती। अंतिम दिन वह कैंप से विदा होकर सुबह नौ बजे ही घर आ गई। कंधे पर उसका एयर-बैग था।
‘आज दफ्तर न जाएं, कोई फिल्म देखते हैं।’
उसने मुझसे आग्रह किया। जब भी वह ऐसा कुछ कहती तो मैं आज्ञाकारी की भाँति चुपचाप तैयार हो जाता। किनारा फिल्म देखते हुए वह सुबक-सुबक कर रो रही थी। शायद मेरा भी अंत ऐसा ही होगा।

फ़िल्म देखने के पश्चात् हमने ढाबे में खाना खाया। शाम को हम दोनो शापिंग करते रहे। वह छोटी-मोटी चीज़ें खरीदती रही। मैं उसके साथ चलता रहा। अचानक मोहन मिल गया। ‘भाभी है?’ उसने सवाल दागा। वह सर झुकाए आगे निकल गई।
घर लौटते वक्त वह फिर सुबक रही थी। मुझे समझ नहीं आता कि मैं आपके साथ क्यों घूमती हूँ। आपके यार दोस्त भी भला क्या सोचते होंगे। उसने कहा।
‘सोचना क्या है। मोहन अभी ही कह रहा था, माल तो अच्छा है, काबू कर ले।’
‘मुझे पुरुषों की यही बात पसंद नहीं। लड़की देखी नहीं कि उस पर कब्जा कर लेना चाहते हैं।’
रात को हम एक ही कमरे में थे। मेरे पास एक ही चारपाई थी। एक बिस्तर नीचे लगा दिया। वह नीचे वाले बिस्तर पर लेट गई। मैंने उसे चारपाई पर लेटने को कहा। पर उसने कहा, ‘यह कैसे हो सकता है?’ अंतत: मैंने कहा, ‘इस तरह हम दोनों ही नहीं सो पाएंगे। आ जाओ, चारपाई पर लेट जाओ।’
‘तुम्हारा क्या ख़याल है, मेरे दिल में खोट हो तो क्या मैं नीचे नहीं आ सकता?’
‘मुझे मालूम है, आप इतने बुरे नहीं।’
‘आ जाओ यहां।’ वह धीरे से उठकर मेरे साथ लेट गई।
‘अब क्यों आई हो?’
‘मेरे दिल ने कहा है कि आप ऐसा-वैसा कुछ नहीं कर सकते। आप एक वफादार दोस्त हैं।’

अब फिर उसने करवट बदल ली थी। मुझे याद है कि उस रात न तो वह सोई थी, न मैं। बस हम दानों की चिताएं अलग-अलग जल रही थीं। एक दीवार ऐसी थी जिसे हम चाहते हुए भी न लाँघ सके थे। जब सुबह उसने विदा ली तो उसकी आँखें अंगारों की भाँति सुलग रही थीं। फिर काफ़ी अरसे तक वह मुझसे नहीं मिल सकी। इस दौरान मुझे ख़बरें मिलती रही कि उसकी माँ उसके लिए कोई लड़का तलाश रही है। इस बार तीन साल बाद वह फिर कैंप पर पठानकोट आई थी। दफ्तर से मैं लौट रहा था कि उसने रिक्शा रोक कर आवाज़ दी। रिक्शा वाले को पैसे देकर उसने छोड़ दिया। मैंने उसे मुबारकबाद दी और उसने मुझे। उस वक्त मुझे अहसास हुआ कि ऐसे मौकों पर मुखौटे कितने ज़रूरी हो जाते हैं। फिर भी उसकी मुस्कराहट का जवाब मैंने मुस्कान से ही दिया। उसकी इस, मुस्कराहट ने मेरे शरीर में पल भर के लिए सिहरन सी पैदा कर दी थी। उसका एयर-बैग उसके कंधे पर था।
‘तुम बेहद खुश हो न। बड़े अच्छे लड़के से तुम्हारी सगाई हुई है! ’
‘सुना है आपको भी अच्छी लड़की मिल गई है।’ उसने मुस्करा कर कहा।
‘यह अंगूठी सगाई की है?’ अब हम कमरे में बैठे थे। अंगूठी देखने के बहाने उसने मेरा हाथ थाम लिया।
‘हाँ।’ मैंने उसके गंदुमी चेहरे को निहारते हुए कहा।
‘मुझे भी उन्होंने सगाई की अंगूठी भेजी है।’ मुझे सर से पाँव तक देखते हुए उसने कहा। ‘पर अंगूठी पहनने से मेरी अंगुली पर छाले पड़ गए हैं।’
‘सच्ची?’ छाले देखने के बहाने मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी पतली-पतली उंगलियों को मैं चूमना चाहता था। पर मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो अंगूठी मुझे अंगूठा दिखा रही हो। फिर मैं उसकी अंगुलियों को अपने हाथों से सहलाने लगा। वह कितनी ही देर तक शून्य दृष्टि से मुझे देखती रही।
‘आपकी मंगेतर कैसी है?’ कुछ देर बाद वातावरण की ख़ामोशी तोड़ते करते हुए उसने कहा।
‘सांवली सी है, परंतु उसका कद मुझसे बहुत छोटा है।’ उसकी तरफ देखते हुए मैंने कहा।
‘तुम्हारा मंगेतर कैसा है?’
‘उसका कद भी छोटा है।’

फिर अचानक मुझे गुज़रे पलों की याद हो आई। जब वह कहा करती थी, ‘रवि जब हम साथ-साथ चलते हैं तो लोग हमें बड़ी हसरत भरी निगाहों से देखते हैं।’
कई बार तो वह कहा करती थी, ‘आपके साथ चलने का तो मज़ा ही आ जाता है। लोग कहते तो हैं कि कितनी सुंदर जोड़ी है।’
अचानक पता नहीं उसे क्या सूझा कि कहने लगी, ‘हम क्यों न ऐसा करें, आप अपनी मंगेतर की शादी मेरे मंगेतर से.....।’
‘तो?’
‘हां फिर,फिर....!’ मोती जैसे चमकीले दाँतों से वह अपना निचला होंठ काटती रही और एक दीर्घ निश्वास लेकर ख़ामोश हो गई।
‘इन्सान की हर ख़्वहिश पूरी नहीं होती!’
‘आईए। कहीं बाहर चलें यहां तो आज दम घुट रहा है।’

हम दोनों कॉफी हाउस में जा बैठे। मद्धम रोशनियां मानो किसी का मातम कर रही थीं। ‘शादी पर आएंगे न?’ वह मानो मुझे घर आने का निमंत्रण दे रही थी।
‘देखूंगा।’
‘क्या देखूंगा ?’
‘यही कि मैं गया तो लोग क्या कहेंगे?’
‘यदि आप नहीं गए तो लोग क्या चुप रहेंगे?’
‘तुम्हारी डोली विदा होते मुझसे नहीं देखी जाएगी।’
‘कोई मुश्किल नहीं देखने में। आप डोली को अर्थी समझ लीजिएगा बस!’ जब उसने यह बात कही तो उसकी आंखें छलछला आईं थीं।
‘आज मेरे साथ बाजार चलिए।’ वह अचानक उठ खड़ी हुई।
‘अब हम कब तक यूं एक दूसरे से मिलते रहेंगे?’
‘शायद आज अंतिम बार।’ उसने बुझे स्वर में कहा।
‘अंतिम बार, पर ऐसा तो तुम कई बार कह चुकी हो।’
‘आपको पता नहीं, आज क्या है?’
‘करवाचौथ!’
‘तो?’
‘मैंने आज व्रत रखा है। इसलिए इतनी दूर से चलकर आपके पास आई हूँ।’

हम बाज़ार की तरफ चल पड़े। बाज़ार में करवाचौथ क़ी काफी गहमा- गहमी थी।
‘मुझे चूड़ियां खरीद दीजिए।’ अचानक वह एक दुकान के सामने रुक गई।
‘चूड़ियां?’
हां, चूड़ियां!’
‘ये सुहाग का प्रतीक होती हैं।’
‘परंतु मैं... मैं कैसे खरीद दूं? यह मेरा हक नहीं।’ मैंने उसकी दुबली पतली कलाइयों को देखा।
‘क्यों? आज तो आप ही को लेकर देंगे। अगली बार पता नहीं...।’ उसका स्वर भर्रा गया था। शायद इसलिए वह आगे कुछ न बोल पाई।
‘देखिए तो कौन सी फबेगी मुझ पर?’
‘तुम खुद ही देख लो।’
‘नहीं, ये चूड़ियां तो आपकी पसंद की ही पहनूंगी।’ मैंने हरे रंग की चूड़ियों की तरफ इशारा किया। उसने वही पहन लीं।
‘पैसे दे दीजिए।’ उसने बीवी की भाँति आदेश दिया और मैंने एक आज्ञाकारी पति की भाँति पैसे निकाल कर पकड़ा दिए।
‘आज ऐसा महसूस हो रहा है, मानो मेरी शादी हो चुकी हो। यदि मैं आने वाले दिनों को याद न करूं तो मैं आज कितनी खुश हूँ।’
एक बाग में प्रेवश करते हुए उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। बीती यादों के प्रतीक मेरी आँखों के समक्ष उजागर हो गए। फिर हम बाग में एक बेंच पर बैठ गए। उसने अपना सिर मेरी गोद में रख दिया और लेट गई। मानो आज वह बीती बातों को दफ़न कर देना चाहती हो। ‘काश! ज़िंदगी आज की रात में ही ख़त्म हो जाती।’
‘परंतु ऐसा तो कभी नहीं होता।’
‘यह भटकन... अब और कितने जन्मों तक चलेगी?’ वह अजंता-अलोरा की टूटी मूर्तियों की भाँति पड़ी-पड़ी बुदबुदा रही थी। और मैं अंधेरे में से कुछ तलाशने की कोशिश कर रहा था। अचानक वृक्षों की ओट से चाँद दिखाई दिया। वह उठ बैठी।
‘चाँद निकल आया है। अब मुझे अर्घ्य देना है।’
फिर हम बाज़ार की रोशनियों से गुज़र रहे थे। उसने हलवाई की दुकान से कच्चा दूध लिया और चाँद को अर्घ्य दिया। शांत वातावरण में हम भी ख़ामोश चल रहे थे। माल रोड भी सुनसान थी। फिर एक ऐसा दोराहा आया, जहां हमें एक दूसरे से अलग होना था। वह मेरे गले से लिपट गई और सुबक-सुबक कर रोने लगी। मिट्टी बना मेरा हाथ उसकी पीठ सहला रहा था। कुछ क्षणों के पश्चात् मैंने खुद को उसके आलिंगन से मुक्त किया और चुपचाप पुल की तरफ बढ़ गया। पुल पर पहुंच कर मैंने पीछे मुड़कर देखा। वह बिजली के खंभे से लगकर अभी भी सिसक रही थी। अगले ही पल उसने चूड़ियों वाली कलाइयां बिजली के खंभे पर दे मारी। चूड़ियों के टूटने की आवाज़ मेरे कानों से टकराई। टूटी चूड़ियां मानो मेरे दिल को लहूलुहान कर गईं। अब मैं पुल की ढलान से उतर रहा था और वह अपनी टांगे घसीटते हुए दूसरे पुल पर चढ़ रही थी।


अनुवाद – नीलम शर्मा ‘अंशु’
साभारअक्षर भारत, नई दिल्ली, 18 नवंबर, 1996

शनिवार, जुलाई 10, 2010

कहानी श्रृंखला - 6


पाकिस्तानी पंजाबी कहानी
बलात्कार

० तौकीर चुगताई


भोर की नमाज़ के वक्त सारे नमाज़ी हैरान रह गए, जब मसज़िद में लगभग तीस वर्षीया एक औरत को देखा। वह मौलवी साहब के समक्ष एक मसला रखना चाहती थी। पहले तो सबने उससे कहा कि अब वह घर जाए और सुबह आकर आराम से अपना मसला बयां करे, परंतु वह नहीं मानी और कहने लगी, ‘मैं तो अभी पूछ कर जाऊंगी।’


छोटे से गाँव की इस पुरानी मसज़िद में उस दिन बड़ी भीड़ थी, क्योंकि दो दिन बाद ईद की छुट्टियां होने वाली थीं और शहर में काम करने वाले बाबू, फौजी, मज़दूर तथा दूसरे छोटे-मोटे काम करने वाले लोग छुट्टी पर गाँव आए हुए थे।

एक साठ वर्षीय व्यक्ति ने उसे डाँट कर कहा - ‘बीबी, तुझे कहा न, सुबह आना। और आधी रात को घर से निकल कर मसज़िदों में जा घुसना औरतों के लिए अच्छा नहीं होता। तुम जाकर गाय, भैंस दुहो और लस्सी रिड़को। इस वक्त घरों से मथनियों की घूं-घूं की आवाज़ें आती अच्छी लगती हैं।’

‘मथनियों की घूं-घूं और लस्सी तभी अच्छी लगती है जब मन खुश हो, चाचा। जब दिल ही अपने ठिकाने पर न हो तो ताजा दूध भी फिटा हुआ लगता है। और मटके में झाग ही झाग रह जाती है, मक्खन नहीं बनता।’

‘ये नहीं मानेगी, चलो भाईयो। हम नमाज़ पढें, समय गुजरता जा रहा है। पता नहीं कौन है। हमारी इबादत खराब करने आ पहुँची है।’

‘फकीरे की घर वाली है जी।’ किसी एक ने कहा।
‘कौन फकीरा ?’
‘सुल्तान तांगे वाले का पुत्तर।’
‘वह तो शहर में रहता है न ?’
‘किसी दफ्तर में मुलाजिम है जी। पूरी बारह जमातें पढ़ा है। उसके पिता ने तांगा चला-चला कर उसे पढ़ाया था।’
‘और ये काकी, मेरा मतलब है कि उसकी घरवाली कौन है? अपने गाँव की तो लगती नहीं।’
‘हाँजी, लाहौर की है, और उसकी मौसी की लड़की है। वहीं लाहौर में पली-बढ़ी है, पढ़ी-लिखी है।’
‘हाँ, वह तो दिखता ही है, तभी तो नंगे सिर मसज़िद में आ घुसी है।’
‘परंतु फकीरे को तो कभी नहीं देखा मसज़िद में।’
‘नहीं जी, वह तो नमाज़ ही नहीं पढ़ता। कभी-कभार साल भर बाद ईद की नमाज़ पढ़ लेता है।’
‘सुअर का बच्चा।’ बुजुर्ग के मुँह से निकला।
‘नहीं चाचा, ऐसा मत कहो। मुसलमान सूअर का नाम नहीं लेते। सूअर का नाम लेने पर जीभ नष्ट हो जाती है।’

‘फकीरे का नाम लेना और सूअर का नाम लेना एक बराबर है। जो नमाज़ ही न पढ़े वह सूअर से कम तो नहीं।’
‘पता नहीं जी, मैं क्या कह सकता हूँ कभी-कभी तो मुझसे भी नमाज़ चूक जाती है।’
नमाज़ खत्म होने के बाद सभी परवीन के इर्द-गिर्द जमा हो गए। हर तरफ से सवालों की बौछार होने लगी।
‘मुझे मौलवी साहब से बात करनी है, आप सभी अपने-अपने घर जाएं। क्यों मुझे मामला बनाने पर तुले हुए हैं? मुझे उनसे एक सवाल करना है। पढ़े-लिखे इन्सान हैं, कुछ न कुछ तो ज़रूर बताएंगे।’ सभी व्यक्ति एक-एक कर खिसक गए और रास्ते में एक दूसरे से अटकलें लगाते रहे।

थोड़ी देर बाद मौलवी साहब भी बाहर आ गए और बोले - ‘हाँ बेटी, तुम किसी मसले के बारे में बात करना चाहती थी? क्या मसला है तुम्हारा?’

‘बात ये है मौलवी साहब कि...... ’
‘नहीं-नहीं। ऐसे नहीं ठहरो, मैं हुजरे (मसज़िद के साथ वाली कोठरी) का दरवाजा़ खोलता हूँ। आराम से बैठकर बात करते हैं।’ मौलवी ने कहा।

‘जी नहीं। मुझे हुजरे से डर लगता है।’
‘अरे मूर्ख कहीं की, डर किस बात का? वहाँ कोई जिन्न-भूत है क्या ... चलो, आओ।’
मौलवी साहब ने हुजरे का दरवाज़ा खोला और वह भीतर आ गई। हुजरे में नारीयल की रस्सी से बुनी चारपाई पड़ी थी। एक आले में सरसों के तेल का दीया जल रहा था। सामने वाली दीवार पर लकड़ी की चार कीलियां गड़ी हुई थीं, जिन पर मौलवी साहब के मैले कपड़े टंगे थे, दूसरे आले में सुरमा, शीशा और कंघी पड़े थे। मौलवी साहब ने सिर से पगड़ी उतारी और कीली पर टांग दी। और दोनों हाथों से सिर खुजलाते हुए चारपाई पर बैठ गए, फिर बोले - ‘हाँ, अब बताओ।’

दरवाज़े के साथ लगी चौकी पर बैठ कर उसने कहा - ‘जाना तो मुझे थाने चाहिए था, परंतु थाना बहुत दूर है। और जो केस मुझे थाने में ले जाना था, वह ख़त्म नहीं होता बल्कि दुगना हो जाता। मुझे कानून पर ऐतबार नहीं रहा। थाने वाले रिश्वत खा-खा कर कानून की ऐसी-तैसी कर रहे हैं.....’

‘मसला क्या है, तुम बताओ तो सही। मैं तुम्हें ठीक-ठाक हल बताऊंगा तुम्हारे मसले का।’
‘मेरे साथ बलात्कार हुआ है....’
‘क्या.....?’
मौलवी साहब मशीन की तरह चारपाई से उठ खड़े हुए और थूक गटकते हुए कहा - ‘किसने किया?’
‘फकीरे ने मौलवी साहब!’
‘पर वह तो तेरा शौहर है।’

‘हाँ, मौलवी साहब। इसी बात का तो रोना है। उसने आज रात मुझसे बलात्कार किया है और पिछले कई सालों से कर रहा है।’
मौलवी साहब ने इधर-उधर देखा और काँपती आवाज़ में कहा - ‘शायद तेरा दिमाग काम नहीं कर रहा या तू बीमार है।’
‘मेरा दिमाग भी ठीक है और मैं भी ठीक हूँ परंतु मेरे साथ शायद ठीक नहीं हो रहा।’
‘बीबी ! जब कानून और मज़हब मिल कर दूसरों की किस्मत का फैसला करते हैं तो उन्हें मिल-जुल कर रहना चाहिए। वे जो भी काम करते हैं, रब्ब और कानून की मर्जी़ से करते हैं. और तू जिसे बलात्कार कह रही है, वह बलात्कार नही। औरत तो मर्द की खेती होती है...’
‘और खेत में नमी हो या न हो उसमें हल चलाते जाओ.....’

‘हाँ, इसलिए कि वह मर्द की मल्की़यत होती है, किसी दूसरे की जायदाद नहीं होती। और आदमी जब अपनी जायदाद पर हल चलाता है तो वह गलत नहीं करता। फकीरे ने भी कोई बुरा नहीं किया। और जब तुम्हारा ब्याह हुआ था उस वक्त तुम दोनों के माता-पिता की मर्जी़ के साथ-साथ तुम दोनों की मर्जी़ भी शामिल थी।’

‘इसी बात का तो रोना है मौलवी साहब ! मेरी मर्जी़ नहीं थी.....’
‘तौबा-तौबा। अगर नहीं थी तो अब जब इतने साल गुज़र गए तो और भी गुज़र जाएंगे। माता-पिता की इज्ज़त भी कोई चीज़ होती है....’

‘मौलवी साहब! मैं आपकी तक़रीर और मशवरे सुनने नहीं आई। वह तो मैं रोज़ ही लाउड स्पीकर पर सुनती हूँ। मुझे मसले का हल बताएं।’
‘इस वक्त तो मसले का हल यही है कि तू यहाँ से निकल जा। तू तो सारे गाँव को खराब करेगी।’

परवीन चुपचाप उठ कर मसज़िद से बाहर आ गई। पौ फट रही थी और चिड़ियां चहचहाने लगी थीं। वह जब घर पहुँची तो फकीरा तब तक सो रहा था।

इतने में उसके कानों में मौलवी चरागदीन की आवाज़ आई। यूं लगता था कि बैटरी चालित लाउड स्पीकर की आवाज़ आज पहले से मानो काफी़ बढ़ गई हो।

‘मैं मौलवी चरागदीन वल्द मौलवी बागदीन खुदा का नाम लेकर सब लोगों से विनती करता हूं कि वे फकीरे सुल्ताने तांगे वाले के घर पास इकट्ठे हों और उसकी घरवाली परवीन लाहौरन को अपने गाँव से बाहर निकाल दे। मेरे भाईयो, परवीन एक गुनाहगार और बदकार बल्कि बदचलन औरत है और अगर वह कुछ दिन और हमारे गाँव में रह गई तो सबकी मां-बहनें भी ठीक नहीं रहेंगी।’

देखते ही देखते पूरा गाँव फकीरे के दरवाज़े पर इकट्ठा हो गया। लड़कियां, लड़के, बूढ़े और जवान। फकीरा शोर सुनकर एक दम से जग गया और आँखें मलते-मलते बाहर आकर लोगों से पूछने लगा - ‘क्या हुआ?’



मौलवी साहब जो अभी-अभी मसज़िद से दौड़े-दौड़े आकर भीड़ में आ शामिल हुए थे, बोले - ‘मैं बताता हूँ कि क्या हुआ। तेरी घर वाली कहती है कि तूने उसके साथ बलात्कार किया है और पिछले कई सालों से करता आ रहा है।’


‘उसका तो दिमाग खराब है मौलवी साहब। यह बात तो वह मुझे कई बार कह चुकी है। इसमें भला बिगड़ने की क्या बात है?’


‘वाह भई, वाह फकीरे ! हम कानून और मज़हब के साथ मज़ाक होता देखते रहें और कुछ न कहें। हम परवीन को गाँव से निकाल कर ही छोड़ेंगे।’


इससे पहले कि फकीरा कोई जवाब देता, भीड़ आगे बढ़कर परवीन को आँगन से बाहर खींच लाई और घर का सामान भी उठा-उठा कर बाहर फेंकना शुरू कर दिया।


एक आदमी बीच में ही बोल उठा - ‘फकीरे को भी गाँव से बाहर निकालो। ये अपनी घर वाली की तरफदारी कर रहा है।’ और पगलाई भीड़ ने फकीरे को धक्के मारने शुरू कर दिए। परवीन रो रही थी - ‘ हाँ, मैं अब भी यही कहूंगी मौलवी साहब! मेरे साथ बलात्कार हुआ, और होता रहा। जब कोई मन को न भाए, तो उसका स्पर्श करना भी बलात्कार ही होता है। फकीरा पिछले काफी समय से मेरे साथ बलात्कार रह रहा है। आँखों से, हाथों से, मुँह से, साँसों से और बातों से .......बलात्कार....’


भीड़ आगे बढ़ी और दोनों को धक्के मारते हुए गाँव से बाहर ले आई। पक्की सड़क पर आकर सभी रुक गए। फकीरा और परवीन मुजरिमों की तरह खड़े थे। दूसरी तरफ गाँव की औरतें भी इकट्ठी हो गई थीं। मर्दों में से किसी ने कहा - ‘अब जाते क्यों नहीं हो। दफा हो जाओ न।’

परवीन
ने मौलवी की ओर देखा, फिर औरतों की ओर और अंत में फकीरे की ओर। फकीरे ने नज़रें झुका लीं।

परवीन आगे बढ़ी और सड़क के पास जा कर उस तरफ खड़ी हो गई जिधर लाहौर की बसें जाती थीं और फकीरा उस तरफ चल दिया जिधर शहर था।


मौलवी साहब ने कहा - ‘चलो भाई, सब अपने-अपने घरों को चलें। और सभी गाँव की और चल दिए। औरतों के समूह में से एक बुजुर्ग औरत ने धीरे-धीरे रोते हुए कहा - ‘मौलवी बेचारा क्या जाने, हममें से कितनी ऐसी हैं, जिनके साथ रोज बलात्कार होता है, परंतु वे कहें किससे ...... ?’


अनुवाद - नीलम शर्मा 'अंशु'

साभार - जनसत्ता, दीपावली विशेषांक, 2005

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रविवार, जुलाई 04, 2010

कविता श्रृंखला – 2 /सुभाष शर्मा, (चंडीगढ़) ( पंजाबी )


शिखंडी

 

० सुभाष शर्मा, (चंडीगढ़)


तूने तो यह रूप धरा था
अपने साथ हुए
तिरस्कार का बदला लेने के लिए
और पूर्ण पुरुष न होते हुए भी
इतिहास में
अपना नाम
अंकित कर दिया था।
और वह कर गुज़रे थे
जो कि पूर्ण पुरुष भी
न कर सकते थे।



इतिहास के
उस महान योद्धा की
मौत का कारण
बने थे
जिसे शायद
इतिहास के तथाकथित योद्धा
नहीं मार सकते थे।
अगर तुम न होते
तो शायद –
इतिहास के पन्ने
कुछ और ही होते।
इतिहास भी कुछ और
तथा युद्ध का परिणाम भी।
सब्र की भी इंतेहा थी
बदला लेने के लिए।
जन्म जन्मांतर तक भी
नहीं थे भूले
अपने साथ हुई उस नाइंसाफ़ी को।
आज भी इतिहास
याद करता है तुझे
और तेरे कारनामे को।


परंतु आज -
तुम्हारे हमनस्ल बहुसंख्या में हैं।
यहां तक कि
पूर्ण पुरुष भी
तुम्हारी शक्ल धारण कर
अधूरे बन गए हैं।


परंतु,
न ही वे
हो सकते हैं तुम्हारे वंशज
और न ही तुम्हारे जांनशीं
क्योंकि
उन में
न तो है तुम्हारे जैसा साहस।
न ही सब्र
और न ही जन्म जन्मांतर तक
लड़ सकने का हौंसला -
अपने साथ हुई नाइंसाफ़ी के विरुद्ध
लड़ने के लिए।


अगर उनके पास कुछ है
तो वह है –
एक नपुंसकता।
एक बुजदिली।
अपने साथ हो रही
ज़्यादतियों को सहने की
नाइंसाफ़ी को बर्दाश्त करने की
ख़ामोश रह कर सब कुछ सहने की
और घुट कर मर जाने की भी।


अनुवाद - नीलम शर्मा ‘अंशु’

योगदान देने वाला व्यक्ति