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बुधवार, फ़रवरी 21, 2018

कहानी श्रृंखला - 21 / (बांग्ला कहानी)


वृहनल्ला

                                       

                                * तपन बंदोपाध्याय

                अनुवाद -  नीलम शर्मा अंशु




स्टेशन पर अभी पहुँची नहीं थी, दूर से ही हरा सिग्नल देख दौड़ लगाई मऊ ने। आज ट्रेन इतने राइट टाइम पर आ गई थी। तेज धावकों की तरह दौड़ कर अंतत: अंतिम क्षण में ट्रेन के पायदान पर दाहिना पाँव रख पाई। महिला बोगी होने के कारण ही शायद भीड़ ज़्यादा थी। इस बोगी में चढ़ने से कम से कम लोभी पुरुषों के तन से चिपके रहने की हीन प्रवणता से मुक्ति मिल जाती है नियमित यात्रा करने वाली महिलाओं को। भीड़ ठेल कर भीतर पहुँचने पर सीट मिलने की तो बात ही नहीं लेकिन नित्य यात्री अपनी सहयात्रियों को जैसे भी हो थोड़ी सी जगह दे देती हैं इसलिए अपनी तशरीफ रखने लायक तीन इंच के लगभग सीट उसे आज भी मिल गई। किसी तरह बैठ कर कांधे के भारी बैग को गोद में टिका कर भीड़-भाड़ वाली बोगी के भीतर देखने लगी कि उसकी किन-किन परिचितों को छह अड़तालीस की ट्रेन मिल पाई थी।गैलोपिंग ट्रेन होने के कारण सभी धक्का-मुक्की करके भी इसी ट्रेन को पकड़ने की कोशिश करती हैं ताकि वापसी का सफर तेजी से ख़त्म हो जाए।

बाद वाली लोकल सात बयालीस पर है, इस ट्रेन से जाने पर मऊ कम से कम सवा घंटा पहले घर पहुँच जाती है, इसलिए ऑफिस से निकल कर दौड़ते-भागते हावड़ा स्टेशन पहुँचती है। सीट पर किसी तरह आधी सी टिक कर वह बैठने की कोशिश करती है कि तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा, थोड़ा सा और सरक आओ, नहीं तो गिर जाओगी।

स्वर लगभग पुरुषों सा था, पल भर के लिए मऊ काँप उठी और ध्यान आया कि उसे जिसने बैठने की जगह दी उसे सभी अर्चना कह कर संबोधित करते हैं। उसी ने उसके कंधे पर हाथ रख उसे गिरने से संभाले रखा था। मऊ ने चौंक कर उसकी तरफ देखा तो उसने फिर से कहा, सरक आओ मेरी तरफ, इतनी सी जगह पर बैठा जाता है क्या?

चूड़ियों से भरी एक बाँह ने उसे अपनी तरफ खींच लेना चाहा। मऊ ने तब तक अर्चना का मुँह देख लिया था और तुरंत उसके भीतर एक प्रतिरोध सा उमड़ पड़ा क्योंकि चूड़ी वाली बाँह की पकड़ कितनी सख्त और मजबूत है इसे वह पहले भी अनुभव कर चुकी है। आज शिराओं से भरे उस काले हाथ की जकड़ और भी ज्यादा मजबूत प्रतीत हुई।

अर्चना से उसका परिचय बहुत पुराना है, अपना असली नाम उसने कभी बताया नहीं। रोज की सहयात्रियों ने ही उसे यह नाम दिया है और यह नाम सबको पसंद भी आया है। उसे अर्चना कह कर पुकारने से वह भी बहुत खुश होती है। मऊ अर्चना से हमेशा अनौपचारिक बात-चीत करती है। अर्चना की शारीरिक विकृति उसे पीड़ा पहुँचाती है इसलिए वह उससे और ज़्यादा बातें करके उसके भीतर आत्मविश्वास जगाने की कोशिश करती है।

परंतु भीड़ भरी ट्रेन की बोगी में आज उसके साथ सट कर बैठने और उसके मर्दाना स्पर्श के कारण सिकुड़ी सी रही मऊ। उसके इस तरह सिकुड़ कर बैठने पर तब तक सामने की सीट पर बैठी सुवर्णा की नज़र पड़ चुकी थी। उन दोनों के बीचो-बीच खड़ी दो महिलाओं के बीच के फासले में से मुँह बढ़ाकर सुवर्णा ने पूछा - मऊ दी, तुम मेरी सीट पर बैठोगी ?

सुवर्णा ने टी शर्ट और जींस पहन रखी थी। इस पोशाक में ही वह ज़्यादा सहज महसूस करती है। मऊ ने हँस कर गर्दन हिलाई – धत्त, ऐसा होता है क्या ? तुमने पहले आकर सीट ली है, अब मेरे लिए इतना रास्ता खड़े होकर जाओगी, ऐसा होता है क्या ?

यद्यपि अर्चना के स्पर्श से होने वाली विरक्ति से उस वक्त मऊ मुक्ति चाहती थी, फिर भी उसे यह मंजूर नहीं था कि वह सुवर्णा को उठाकर उसकी सीट पर बैठे। वह इंतज़ार कर रही थी कि उसकी अपनी सीट की तरफ से कोई अगर उतर जाए तो उसे अर्चना की जकड़ से निजात मिल जाएगी।

सुवर्णा के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिए जाने पर वह कुछ देर तक मुँह फुलाए बैठी रही, फिर एक बार नज़र बचाकर अर्चना की कारग़ुज़ारी देखी। फिर मऊ की आँखों में आँखें डाल समझाना चाहा कि तुमने जैसे उस सर पर चढ़ा रखा है, अब भुगतो।

सच्ची बात तो यह है कि मऊ ही अर्चना नाम की इस जीव को ज़रा अधिक स्नेह  की नज़र से देखती है।  इस महिला बोगी में चढ़ने पर उसे बहुत सी महिलाएं विरक्त नज़रों से देखती हैं।  उसके तन पर साड़ी-ब्लाउज, होठों पर लिपस्टिक, माथे पर बड़ी सी बिंदिया होने के बावजूद कोई उसे महिला मानने को तैयार नहीं।  विशेष रूप से उसकी मर्दाना आवाज़ और शारीरिक बनावट भी कुछ हद तक मर्दाना होने के कारण सभी उसकी उपेक्षा करती हैं। सुवर्णा ने एक दिन उससे कहा भी था, जानती हो मऊ दी, साड़ी-ब्लाउज पहन कर महिला वेष-भूषा एक बहाना है। असल में बदमाश है, महिलाओं के साथ बैठकर उनके कंधे पर हाथ रखना ही रखना है। एक दिन पता है क्या किया था, मेरे बगल में बैठ कर हाथ को जानबूझ कर......

उसके बाद की बात नहीं बताई सुवर्णा ने परंतु मऊ समझ गई थी अर्चना की कारगुज़ारी।
कुछ महिलाएं उसके साथ बात-चीत करके मज़ा लेती हैं, कुछ हँसी-मज़ाक करके भी एक तरह के आनंद का अनुभव करती हैं। कभी-कभी अर्चना की बातों में मामूली सी अश्लीलता भी होती है जिसे सुनकर कुछ लोट-पोट भी हो जाती हैं। और कुछ को उसकी ये बेकार की रसिकता नहीं भी सुहाती।  कोई कहती है महिला के रूप में सजने-संवरने के बावजूद वास्तव में वह किन्नर ही है।

सिर्फ़ मऊ ही उसके भीतर की तकलीफ़ को समझ पाती है, सब जब उसका मज़ाक उड़ाते हैं, जहाँ तक हो सके मऊ उससे बात-चीत करके अपनत्व दिखाती है। दरअसल पीछे छूट चुके दीर्घ बारह सालों के रोज़ाना रेल सफ़र की यादों को खंगालने पर मऊ उन दिनों की अर्चना को देखती है, दस वर्षीया किशोरी सदृश्य अर्चना दो अन्य बृहनल्लाओं रेशमी और चुमकी के साथ ट्रेन में चढ़ती। उसे सहृदय रेलयात्रियों को दिखाकर अच्छी-ख़ासी कमाई हो जाती थी उनकी। तब उसकी नाम मुन्नी था। लाल रिबन की दो चोटियां, फूली बाँहों वाली फ्रॉक, कजरारी आँखों में थी मासूमियत, विकृति का कोई लक्षण नहीं था। उसे मोहरा बना कर दोनों मौसियां जब कमाई में व्यस्त होतीं मुन्नी तब तल्लीन होकर अपनी हथेली पर गुलाब का चित्र बना रही होती। तभी से औरत होने की लड़ाई लड़ते-लड़ते बाज़ार के नज़रिए से वह अर्चना बन गई है।

अर्चना की जकड़ से रिहाई के लिए मऊ अपनी सीट पर परली तरफ बैठी महिलाओं की तरफ झुक गई, क्या आप लोग थोड़ा सा सरक कर बैठेंगी ?

बाकियों के थोड़ा सा सरकने पर दो इंच के लगभग और जगह मिलने पर मऊ ने राहत महसूस की परंतु बैठने की जगह बढ़ने के बावजूद अर्चना के स्वभावानुसार उसका हाथ मऊ के कांधे पर था। वह जकड़ थोड़ी सी शिथिल होने के बावजूद हाथ हटा नहीं, बल्कि अर्चना ने पूछा, तुम्हें आज इतनी देर क्यों हो गई ?  
                         
मऊ ने ज़रा गंभीर मुद्रा में कहा, अरे मत पूछो, अंतिम क्षणों में बॉस कुछ काम थमा देता है कि उसे निपटा कर निकलने में रोज़ ही देर हो जाती है, फिर दौड़ते रहो.....
कह कर फिर उसी क्षण अर्चना का हाल-चाल पूछना शुरू करती है, तो तुम्हारा पति कहाँ है, अर्चना ?  पुरुषों वाली बोगी में ?
- नहीं रे। मेरे पति को आज बुखार है, घर पर ही है।
     - अच्छा ?  मऊ बेचैन होकर पूछती है, तो डॉक्टर को दिखाया ?
     - नहीं, अभी तक नहीं दिखाया। उसने कहा दो-तीन दिन के बुखार में क्या डॉक्टर को दिखाना। जुकाम, बुखार ऐसे ही ठीक हो जाएगा। डॉक्टर भी तो चोर-उचक्के हैं, जाने पर ढेरों टेस्ट और दवाएं लिख देगा। इतने रुपए कहाँ से आएंगे, बल्कि उन रुपयों से पथ्य खाना ही बेहतर है।
      अर्चना की कर्कश आवाज़ में उस सुनना मऊ को पुलकित करता है।  फिर कहा, ज़रा ध्यान रखना, चारों तरफ मलेरिया-वलेरिया का प्रकोप है।
कहते-कहते कोशिश की अपने कंधे से अर्चना की बाँह को हटाने की, परंतु अर्चना ने मानो उसकी इस कोशिश पर ध्यान ही नहीं दिया।
उधर से सुवर्णा मऊ की दुर्दशा देख रही थी। बोली – ओ अर्चना, मऊ दी के कंधे को खरोंचे क्यों जा रही हो?  हाथ हटाओ न।
सुवर्णा की आवाज़ में ऐसा तेज़ था कि अर्चना ने बहुत अपमानित महसूस किया। मऊ के काँधे से बाँह हटा कर कहा, अपनी सहेली के कंधे पर बाँह रखी है, उससे तुम्हें क्यों तकलीफ हो रही है। मैं उसकी सहेली हूँ।
सुवर्णा ने और भी क्षुब्ध हो कर कहा, सहेली तो मेरी भी है। सहेली के बगल में बैठते ही क्या हम उसके कंधे को जकड़ लेती हैं।
अर्चना के सांवले चेहरे पर बोगी की ट्यूब की रौशनी झिलमिला रही थी। अब सुवर्णा के हमले से उसके मर्दाना चेहरे पर विषाद छा गया, कहा - महिला ने महिला के कंधे पर बाँह रख भी ली तो ऐसी कौन सा क़यामत आ गई, हूँह ? तुम्हारे जैसी औरतों के सीने में दिल नहीं होता क्या ?  
कोई जवाब न देकर सुवर्णा कुछ देर मन ही मन बड़बड़ा कर मानो अर्चना को कुछ समझाना चाहती हो।
अचानक सुवर्णा के साथ वाली सीट खाली हो जाने पर सुवर्णा ने हाथ के इशारे से पुकार कर कहा, मऊ दी, सुनो एक बात करनी है –
मऊ भी एक ऐसे ही मौक़े की तलाश में थी, इतनी देर बाद निश्चिंत होकर उसके बगल में जा बैठी और कहा, कौन सी बात ?
- पता है आज मेरा पर्स नहीं मिल रहा था।

- अच्छा ? तब तक सुवर्णा की गोद में पर्स रखा देख निश्चिंत होकर समझ गई कि दरअसल अर्चना के चंगुल से मुक्त करवाने के लिए यह कौशल रचा था। सचमुच उसके कंधे को अर्चना ने इतनी ज़ोर से जकड़ रखा था कि अभी भी भीतर से उसका शरीर काँप रहा था। अर्चना अपने नारीत्व के प्रमाणस्वरूप अपना एक उरोज़ हमेशा साड़ी के पल्लू से बाहर ही रखती है ताकि ब्लाउज से ढके उसके समृद्ध उरोज़ सबको दिखाई दें। ब्लाउज ज़रा सा लो कट होने के कारण उरोज़ों की विभाजक रेखा भी स्पष्ट दिखती है।  मऊ को कई बार लगता है कि अर्चना जान-बूझ कर लो कट वाले ब्लाउज पहनती है ताकि उसके नारीत्व के विषय में कोई संदेह न जगे महिला यात्रियों में। खर्चीली प्लास्टिक सर्जरी के माध्यम से अर्चना के इस नारीत्व अर्जित करने की घटना भी कितनी कष्टदायक है, मऊ उससे अन्जान नहीं है। फिर भी अर्चना का शरीर कुछ हद तक तो मर्दाना है यह समझने में किसी को असुविधा नहीं होती।

सुवर्णा के साथ गर्मागर्म बहस विनिमय और मऊ के उसके बगल से उठ जाने से अर्चना के चेहरे पर अपमान के बादल छा गए हैं। अचानक घटे इस घटनाक्रम की वजह से मऊ भी अच्छा महसूस नहीं कर रही थी। हफ्ते में एक या दो दिन इसी तरह अर्चना से उनकी मुलाक़ात हो जाती है, मऊ उससे ज़्यादा सहानूभूतिपूर्वक बात करती है, इसलिए पहले से मालूम घटना के साथ अर्चना के मुँह से सुने उसके जीवन प्रसंगो के कुछ टुकड़े उसके भंडार में जमा हो गए हैं। बचपन से ही क्लीवलिंगी होने के कारण स्वभाविक नियमानुसार दूसरे किन्नर एक दिन अर्चना को अपने डेरे में ले आए। शुरू-शुरू में असुविधा होती थी फिर धीरे-धीरे नए जीवन की अभ्यस्त हो गई। अब एक दूसरे किन्नर के साथ पति-पत्नी के तौर पर रहती है। दूसरों को अपना परिचय देती है तब्बू नामक उस किन्नर की पत्नी के रूप में।

काफ़ी देर तक स्तब्धता छाई रहने के बाद अचानक अर्चना ने ही सुवर्णा से मेल-मिलाप की कोशिश करते हुए कहा, गुस्सा किया क्या बहन जी ?

उसकी बात का कोई जवाब न देकर सुवर्णा बाहर प्रकृति की ओर देखती रही, यद्यपि घने काले अंधेरे के अलावा बाहर देखने योग्य कुछ न था।

- बहन, तुम्हारी शर्ट का रंग बहुत ही सुंदर है।
सुवर्णा ने किसी दिन कुर्ता, किसी दिन टी शर्ट पहनी होती है परंतु हमेशा ही गहरे रंगों की पोशाक पहनना ही पसंद है उसे। आज उसने गहरे बैंगनी रंग की टी शर्ट पहनी है जो कि उसके गोरे रंग पर बहुत जंच रही है। तब भी सुवर्णा चुप रहती है। मऊ को सुवर्णा ने एक दिन बताया भी था कि एक दिन उसके कंधे पर भी इसी तरह अशोभनीय तरीके से बाँह रखी थी, उस दिन का गुस्सा तो था ही, तिस पर आज उसके साथ कुछ देर पहले तर्क-वितर्क हो चुका है, बात तो करेगी ही नहीं।

मऊ ने देखा कि सुवर्णा की निरुत्तर भाव-भंगिमा देख कैसी विषादग्रस्त सी हो गई अर्चना। ट्रेन की बोगी में बेकार में हुए इस मनोमालिन्य से मऊ को दुख हो रहा था। महिला की वेश-भूषा धारण करने के बावजूद अपने क्लीवत्व के विषय में वह सजग है। कर्कश स्वर में कई मज़ेदार बातें करती तो है, पर बहुत ही हीनभावना से ग्रस्त रहती है। उसके साथ एकांत में बात-चीत द्वरा यही महसूस किया है मऊ ने।

एक दीर्घ साँस छोड़ कर वह भी अंधेरे में डूबे पेड़-पौधों को निहारती रहती है। ऑफिस से लौटते समय एक-आध घंटे का सफ़र है, सभी थके होते हैं उसी में एक-दूसरे से परिचय बढ़ाने या कभी मज़ेदार बातों के ज़रिए थकान को मिटाने की कोशिश होती है। मऊ कभी ऑफिस में या रास्ते में घटे मज़ेदार किस्से सुनाकर बोगी में समां बांध देती है। आत्रेय दी बहुत सुंदर गाती हैं, बोगी ज़रा सा खाली होते ही वे उनसे मनुहार करती हैं, ओ आत्रेय दी, वो वाला गाना एक बार फिर सुनाईए न।
कभी सीट को लेकर या किसी और कारणवश नित्ययात्रियों में वाद-विवाद न होता हो, ऐसा भी नहीं है परंतु अक्सर मऊ ही मेल-मिलाप का काम करती है। आज भी कोशिश करते हुए कहा, क्यों री सुवर्णा, जानू के साथ उदासीनता चल रही है क्या आजकल?

पल भर में ही सुवर्णा का चेहरा चमक उठा, हँस कर कहा, इश्श, क्यों उसके अनुराग की चंचलता के कारण मैं हमेशा बेचैन रहती हूँ, उसके संग की काव्यात्मकता से मुझे पलायन का भी मौका नहीं मिलता, और तुम उदासीनता की बात कहती हो।

- यह तो अच्छी बात है। मऊ ने हँसते-हँसते कहा, ट्रेन की बोगी में जिस तरह अग्निमूर्ति बनी बैठी हो, मैंने सोचा महोदय ने किसी और गरीबनी के साथ हँस-बोल लिया होगा और तूने देख लिया होगा, वही हताशा की ज्वाला अभी भी तुम्हारे हृदय में धधक रही है।

सुवर्णा तुरंत बोल उठी, इश्श मेरी जैसी सुंदरी उसे कहाँ मिलेगी? कहकर खिलखिलाते हुए कह बैठी, बल्कि हमेशा उसे ही फिक्र लगी रहती है कि कौन कब मेरे पीछे लाईन लगा बैठे।

सुवर्णा का खिलखिलाता चेहरा देख अर्चना ने भी राहत महसूस की कि उसके साथ वाद-विवाद के बाद सुवर्णा अब तक उदास सी थी। मऊ की प्रगल्भता का अनुसरण करते हुए अचानक सुवर्णा से कहा, तुम्हारा प्रिय बहुत ही रसिक है न बहन। तुम्हारा शौहर बहुत ही दिलदार है, है न?

सुवर्णा की हँसी अभी भी क़ायम थी, अर्चना को फिर से मुँह खोलते देख उसकी भौंहों के बीच ज़रा सी सिकुड़न फैल गई, परंतु पहले की ही तरह वह ख़ामोश रही।

अर्चना ने उसके साथ फिर से सहजता लाने के लिए जिस वाक्य का प्रयोग किया उससे सुवर्णा के साथ-साथ मऊ भी हैरान रह गई। अर्चना तब कह रही थी, बहनजी, तुम्हारे तो अब दिन पूरे हैं। कहकर उसके पेट की तरफ इशारा कर कहा, कौन सा महीना चल रहा है अभी?

उस क्षण सुवर्णा तो क्या मऊ के भी मुँह से शब्द नहीं निकले।  परंतु अर्चना की उंगली के संकेत का अनुसरण कर मऊ ने देखा कि ट्रेन की खिड़की से प्रवेश करने वाली जो हवा सुवर्णा के केशों को उड़ाए ले जा रही थी, वही हवा उसकी टी-शर्ट में प्रवेश कर इस तरह फूल उठी थी कि अचानक देखने पर लग ही सकता है कि सुवर्णा के अब..... जबकि सुवर्णा तो अभी भी अपने प्रेमी के संग प्रेम किए जा रही थी, उसकी किसी पारिवारिक समस्या के चलते शादी की अभी कोई योजना ही नहीं थी।

एक तो पहले ही सुवर्णा अर्चना से चिढ़ी हुई थी, तिस पर ऐसे अश्लील संकेत पर जल-भुन गई बुरी तरह से। तब तक उसका स्टेशन भी आने वाला था। फट से बाहर झाँक कर अगले स्टेशन का संकेत देख लिया। कंधे का बैग ठीक से लटका कर खड़े होकर कहा, बदतमीज कहीं की, ऐसी गंदी बात करते हुए शर्म नहीं आती क्या ?  तुम लोग गंदे प्राणी हो, औरतों की बस एक उसी जगह पर तुम लोगों की नज़र घूमती रहती है। सारी गंदगी महिला बोगी में चढ़ती है, और अशोभनीय बातें करके सफ़र ही ख़राब कर देते हैं। क्यों चढ़ती हो तुम महिला बोगी में। फिर कभी मत चढ़ना। आ जाते हैं कहाँ-कहाँ से।

कहते-कहते सुवर्णा गुस्से से दरवाज़े की तरफ बढ़ती गई। ट्रेन स्टेशन में प्रवेश कर रही थी। प्लैटफ़ॉर्म पर उतर कर भी जलती हुई निगाहों से उसने भस्म कर देना चाहा अर्चना नामक क्लीव को। अर्चना की डबडबाती आँखों में अस्फुट प्रश्न था, औरत होने के लिए प्यार और हमदर्दी के सिवा और किस चीज़ की ज़रूरत होती है?

सुवर्णा क्रमश: निगाहों से ओझल होती गई। अचानक घटित हुई दूसरी घटना से मऊ और भी स्तब्ध रह गई, शायद बिना समझे ही एक घटिया मज़ाक कर बैठी जी-जान से नारी बनने की चाह में यह क्लीव, परंतु सुवर्णा के हमले से उसका चेहरा और भी रक्तहीन हो गया, शरीर और भी क्लीवरहित।

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साभार - पुस्तक "हम भी इन्सान हैं" संपादन - डॉ. एम. फ़ीरोज़ खान






लेखक परिचय

 तपन बंद्योपाध्याय

चार दशकों से नियमित लेखन।   अब तक 9 काव्य संकलन, 350 कहानियां, 70 उपन्यास प्रकाशित।
तीन खंडों में प्रकाशित उपन्यास नोदी माटी अरौण्यो के लिए राज्य सरकार के सर्वोच्च बंकिम स्मृति पुरस्कार से सम्मानित। मेहुलबोनीर सेरेंग उपन्यास पर बनी बांगला फिल्म को श्रेष्ठ कथा हेतु बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट अवॉर्ड। इस फिल्म के सभी गीत भी लिखे।
इसके अलावा ताराशंकर पुरस्कार, रूपसी बांगला पुरस्कार, शैलजानंद पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कार।
शिशु साहित्य के लिए दिनेशचंद्र स्मृति पुरस्कार। जासूसी कहानी ईषा पर ऋतुपर्ण घोष के निर्देशन में ए. बी. सी. एल. के बैनर तले कलकत्ता दूरदर्शन हेतु धारावाहिक का निर्माण। धारावाहिक स्तंभ आमलागाछी ( दफ्तरशाही) बहुत ही लोकप्रिय रहा। कृतियां अन्य भाषाओं में भी अनूदित।
                   संपर्क – 16 E, कालीचरण दत्ता रोड, कोलकाता – 700 061


कहानी श्रृंखला - 20 / (पंजाबी) खौदा चाचा - चंदन नेगी

                                                     
                             

 पंजाबी कहानी                 खौदा चाचा       
                            
                                                              
                                                          चंदन नेगी                                           
                              अनुवाद -  नीलम शर्मा अंशु


      पाकिस्तान से लोग विस्थापित होकर काफ़िलों में आए थे। कुछ पैदल, कुछ बैलगाड़ियों पर, कुछ गाड़ियों में।  हर शहर में हर जगह लोग ही लोग नज़र आते थे। स्कूलों-कॉलेजों, गुरुद्वारों, खाली मैदानों में सरों के झुरमुट, लोगों का रोना-धोना, बच्चों-बुजुर्गों का भूखे तड़पना, कैसे जिंदगी थी यह ? कैसे दिन और कैसी रातें ?  लहू से लथ-पथ समय साँप की भाँति रेंगते हुए, घिसट कर गुज़र रहा था। समय को मानो पक्षाघात हो गया था। समय तो सरक भी नहीं सकता था, समय के गुज़रने की बात तो दूर थी। कैंप में हर तरफ एक जैसी बातें। किसका कौन, कैसे मारा गया, कौन बच गया, कौन कुछ थोड़ा बहुत पैसा-धेला लेकर आया है?  कौन तन पर पहने कपड़ों सहित खाली हाथ, नंगे पाँव।
      धीरे-धीरे लोग कैंपों से तितर-बितर होना शुरू हो गए। स्वाभिमानी लोगों ने तो लंगर खाने की बजाय अपने टैंटों के बाहर चूल्हा बनाया, छाबड़ियां लगाईं और रोज़ी-रोटी कमा कर खाने लगे। शहरों में लोगों ने कमरे किराए पर ले लिए।  कईयों ने मुसलमानों के घरों के ताले तोड़े और घुस गए। ज़िंदगी धीरे-धीरे सरकते हुए आगे बढ़ने लगी।  लोगों को एक दूसरे से, रेडियो और अखबारों की ज़रिए अपने रिश्तेदारों की खोज-ख़बर मिलने लगी। एक-दूसरे से मिल-मिलाकर बिछड़ों के लिए आँसू बहा कर शाँत हो गए थे। और बचे-खुचों की ख़ैर मनाते हुए पेट पालने लगे थे।
       बस में बैठे मरदान मामा जी को किसी तरह मेरे पापा जी को भी गर्दन में गोली लगने का पता चला था और भापा जी मुझे साथ लेकर जम्मू से पटियाला की ओर रवाना हो गए थे।
        मामाजी के घर पर एक बहुत बड़ा आदमी आया था, साढ़े छह फुट की उसकी कद-काठी, गोल बड़ा सा चेहरा, चेहरे का रंग सिंदूरी, माथे और गर्दन पर ढेर सारा माँस, बड़ी चौड़ी सी छाती, मिचमिची सी छोटी-छोटी आँखें, मोटे होंठ, हाथ में चाँदी के शेर की गर्दन वाली लंबी सी लाठी।
      मेहर साईं की, चाचा पैरीपैणा ”, मामी जी ने थोड़ी सी गर्दन झुका कर लंबे से घूँघट में से कहा। मैं हैरान थी, इस चाचा को तो कभी देखा नहीं था। दूधो नहाओ, पूतो फलो, सदा सुखी रहो उसने मामी जी की तरफ हाथ उठा कर आशीष दी थी। 
      मैं मामी जी के पीछे छुप गई थी। मौसी जी के दुपट्टे के छोर दोनों हाथों में कसकर पकड़ लिए थे। डर गई थी कि यह कैसा मर्द है ?  न चेहरे पर मूँछ और दाढ़ी, न बाँहों पर मर्दों जैसे बाल, गले की चमड़ी भी नरम-नरम मुलायम सी दिख रही थी।
      यह लड़की कौन है”? उसने मेरी तरफ देख कर पूछा। मेरी तो जान ही सूख गई।  मुझे लगा राजकुमारी और दानव की कहानी वाला दानव है। रात को सोते समय मामा जी कहानी सुनाते थे तो मैं अपने आप को राजकुमारी या परी मान लेती थी। मुझे लगता था कि  वह दानव मुझे भगा कर पहाड़ियों, गुफाओं में कैद कर देगा और जो राजकुमार मुझे छुड़ाने आएगा उसे भी वह मार डालेगा।
      मैं कनखियों से उसे सर से लेकर पाँव तक बार-बार देखती रही थी और डर से काँपती रही थी। मामा जी ने उसके चेहरे की तरफ देखते हुए कहा, हमारी बहन संत कौर जो पेशावर में ब्याही हुई थी और जो छोटे-छोटे बच्चे छोड़ गुज़र गई है उसी की बेटी है यह।
            उस आदमी ने मेरे सर पर हाथ फेरा, सत्गुरु रक्षा करे।  सर पर उसके हाथ के स्पर्श से मैं पूरी की पूरी सिकुड़ गई थी। उसकी घुटनों तक लंबी खुले घेर वाली बोस्की की कमीज़, उलटे प्लेटों वाली खुली सलवार, रेशमी मुशद्दी पगड़ी, काली पठानी चप्पलें, मुझे वह बहुत ही अजीब सा लगा।
      चाचा कहवा पीसे (पीओगे ) ?”  मामा जी ने पूछा।
      लै लैसां ( ले लूंगा)......  सुनकर मेरी तो हालत ख़राब। उस आदमी ने दोनों बाँहें उठाकर ज़ोर से अंगड़ाई ली। मुझे लगा इस आदमी की बाँहें आसमान के पेट में घुस जाएंगी।
       बहू भला हो तुम्हारा, तुम्हारे बच्चे जिएं, सदा सुखी रहो। मुझे इतने दिन अपने घर रखा। बहुत ही ख़याल रखा मेरा।
            अब बात यह है कि मैंने यहीं गली में एक अलग कमरा ले लिया है। तंदूर से दोनों वक्त की रोटी का इंतज़ाम भी कर लिया है। दु:-सुख के वक्त आप लोग तो पास हैं ही। बहुत सेवा की है आप लोगों ने मेरी। नहीं तो आजकल इस मुसीबत में कौन किसी को पूछता है? ”


 चाचापैसे खर्चा ? कहाँ से करोगे ? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है।
      “”अब फिक्र की कोई बात नहीं। मुझे सभी कह रहे हैं कि मैं दिल्ली जाकर नेहरू से मिलूं। तुमने नेहरू की जान बचाई है – नेहरू अब आज़ाद हिंदुस्तान का बादशाह हैचाचा तू जाकर नेहरू से मिल। हुआ यूँ कि आज़ादी की लड़ाई में हम सवात (नो मैन लैंडस् के एक शहर का नाम) में रहते थे। मेरा पिता नवाब साहब का पक्का दोस्त था। और मैं अपने पिता की इकलौती औलाद।  पैसा भी बहुत आया। पठान दोस्तों की बड़ी पलटन से दो-चार बार किन्नर भी मुझे लेने आए। उन्होंने बहुत शोर-शराबा भी किया। सरकारी दरबार में जाकर शिकायतें कीं। मुझे सवात के नवाब ने उनसे बचा लिया। उन दिनों हिंदुस्तान में आज़ादी का बड़ा शोर मचा हुआ था। बहुत से लोगों को फाँसी दी गईज़िंदा जलाया गयाकाले पानी की सज़ा दी अंग्रेज सरकार ने।
      मामी जी ने पीछे की तरफ मुँह फेरकर कहा,  खौदा चाचा किन्नरजो बेटे की पैदाईश और ब्याह के वक्त नाचने-गाने आते हैंवे गाते हैं रिमझिम बरसे बदरवा मस्त बहारें।
      मैंने खौदा चाचा को सिर से पैर तक एक बार फिर देखा और लगा यदि यह औरतों वाले कपड़े पहनकर हार-श्रृंगार कर के गहने पहनकर नाचे तो कैसा लगेगा ? इतना बड़ा किन्नर और खुद-ब-खुद  मुझे हँसी आ गई।
      खौदा चाचा बहुत ही रसूख वाला और दबंग था। सरकारी दरबार में उसकी पहुँच थी। अजीब सी उसकी पतली सी आवाज़ थी। सभी को उसके किन्नर होने के बारे में पता था परंतु किसी की भी उसके मुँह पर किन्नर कहने की हिम्मत नहीं हुई थी। वह लोगों के अनेक काम संवार देता। किसी लड़ाई- झगड़े के वक्त उसका फैसला पत्थर की लकीर होता। वह जहां से गुज़रता लोग असलाम-ए-लेकुम कह कर खड़े हो जाते थे।  हर दु:ख-तकलीफ़ में लोगों की मदद करता था। गरीब परिवार की लड़कियों के निक़ाह और आनंद कारज की जिम्मेदारी सदा खौदा चाचा की होती थी। बिरादरी की बहुएं बित्ते भर लंबा घूँघट निकालकर दु:ख-सुख चाचा के साथ सांझा कर लेती थीं। जड़ी-बूटियों के पुराने नुस्खों से वह बीमारियों का इलाज करता था। अपने सवात में वह एक केंद्र बिंदु थाजिसे हर छोटे-बड़े का फिक्र थी। उसके काफ़िले को पठान पेशावर के बॉर्डर तक छोड़ कर गए थे।
      चाचाफिर वापस आना।
      तब जवाहरलाल नेहरू आज़ादी की लड़ाई का बड़ा लीडर था। आज़ादी की लड़ाई और अंग्रेजो यहाँ से निकल जाओ हमें आज़ादी चाहिए। हर शहरहर सूबे में लेक्चर देता था। बहुत बार अंग्रेजों ने उसे गिरफ्तार भी किया और नाभा जेल में भी रखा था।  नेहरू पेशावर से दीरसवात शबजौड़ भी आया था। मैं भी नेहरू का भाषण सुनने आया। जवाहर लाल नेहरू जब जलसे में आया तो कई पठानों ने उस पर हमला कर दिया और उसे मारने लगे। नेहरू ज़मीन पर गिर पड़ा। मैं इतना ऊंचा लंबा सीधा शहतीर की भाँति नेहरू के ऊपर लेट गया। भीड़ ने मारा। मेरी पूरी पीठ पर नीले निशान पड़ गए। माथे से लहू बहा परंतु मैंने नेहरू को बचा लिया। आज़ादी के लिए लड़ रहे लोगों ने हमें बचाया।
       पाकिस्तान बना। मर्दाना पहुंचा। वहाँ कैंपों में पैसा न धेलाकई दिन भूखा रहा पर अमृतसर गुरु की नगरी में आप लोग मिल गए। मुझे लोगों ने सलाह दी कि मैं दिल्ली जाकर जवाहरलाल नेहरू से मिलूं। बहुत झिझकता रहा कि क्या कहूं उसे जाकर ? बड़ा आदमी बन गया हैप्राइम मिनिस्टर। कोई मिलने भी देगा ? एक तो लोग मुझे देख कर चलते बनते हैंमैं किसी को क्या कहता हूँ ? मैं तो खुद ही किसी के साथ बात नहीं करतालोग मेरी कद-काठी से डरते हैं।
      करम सिंह माल लेने दिल्ली गया तो मैं भी साथ चल दियायह सोच कर कि क्या पता जवाहर लाल नेहरु को सब याद हो और मुझे पहचान ले। मुझे देख कर लोग दूर-दूर क्यों हो जाते हैं ?  मैं क्या किसी को कुछ कहता हूँ ?”
      रब ने इतना बड़ा बनाया इसमें मेरा क्या कसूर है ? जहाँ जाता हूँ लोग दूर भागते हैं।“”
      अच्छा पूछते-पुछाते हम जवाहर लाल नेहरू के घर के पास पहुँचे। हाय रब्बाजितना बड़ा घर उतनी ही बड़ी पुलिस मानो चोरों के बड़े गिरोह को पकड़ना हो। मैं करम सिंह के साथ बड़े गेट के बाहर खड़ा हो गया। बहुत से और लोग भी खड़े थे। दूर से एक जीप दिखी तो लोगों में शोर-गुल शुरू हो गया। लोग जीप की तरफ दौड़े।  मैंने गेट से बाहर खड़े-खड़े ही ज़ोर से नेहरू जिंदाबाद कहा।  जीप मेरे पास आकर रुकी।  नेहरू ने मुझ मुझे देख कर हाथ हिलाया और जीप से उतर आया। मेरे पास खड़ा छोटा सा नेहरू सिर उठाकर मेरी तरफ बढ़ता रहा। उसने दो बार पठान सवात सवात कहा।
      पठान नहीं,  मैं सिक्ख हूँ गुरु गोविंद सिंह जी का। जवाहर लाल ने किसी आदमी से कुछ कहा। उस आदमी ने पुलिस ऑफिसर के साथ मुझे नेहरू के घर भेज दिया। दो घंटे वहाँ बैठा रहा। बहुत ख़ातिरदारी हुई। नेहरू पर लेट कर उसे पठानों की मार से बचाने वाली कहानी कई बार सुनानी पड़ी।
      दो घंटों बाद नेहरू बड़े लोगों से घिरा आयाबड़े तपाक से मिला। इस पठान ने सवात में मेरी जान बचाई थी। उसने सारा हालचाल पूछा और मेरी पाँच सौ रुपए महीना पेंशन लगा दी। बहुत पैसे हैं मेरे पास। अब गुज़ारा भी हो जाता है और आज़ादी भी मिल गई है। नेहरू ने यही पूछाओ पठान तुम ठीक तो हो ? कुछ चाहिए तो मुझे बताना इतना बड़ा जवाहर लाल नेहरु और मुझे पहचान लियाभला होअब मैं आप लोगों पर और बोझ नहीं बनूंगा। कुछ ज़रूरत हो तो मुझसे मांग लेने में शर्माना मत अच्छा ?”   
       और खौदा चाचा ने अपनी छोटी सी गठरी मामा जी के कमरे से उठा ली 500 रुपए महीना।  खौदा चाचा बहुत अमीर हो गया था। अपने शहर सवात में उसने मस्ज़िद में मौलवी जी से उर्दू लिखनी-पढ़नी सीखी थी और  गुरबाणी का शुद्ध पाठ उसने गुरुद्वारे के भाई जी से सीखा था। नितनेम की गुरबाणी उसने अपने बड़े बुजुर्गों से कंठस्थ की थी।
      खौदा चाचा का शाह-गुमाश्ती का काम तो सवात में ही रह गया था। अब वह खाली थाअपना घर थापैसे थे। किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। उसने गली में खाली घूमते बच्चों को इकट्ठा किया और नितनेम की बाणी का पाठ सिखाने लगा।  प्रसाद आदि के लालच में बच्चे इकट्ठे हो जाते। कई तरह की टॉफियांगोलियांसौंफ के पैकेट बांटता। मंगलवार बर्फी बांटी जातीइतवार को लड्डू। कई बच्चों के हाथों में खर्च के लिए टका-टका भी थमा देता और बच्चे खुशी से नाचते उछलते।
      खौदा चाचा काम में लग गया।  लोगों के पक्के ठिकाने बने हुए थे। स्कूलों का पता-ठिकाना नहीं था।  खाने के लालच में ही सही अब खौदा चाचा का कमरा बच्चों से भरा रहता। बच्चे उसका छोटा मोटा काम भी कर देते। एक दूसरे को जपुजी साहब का पाठ सुनातेपौड़ियां रटते-रटते याद करते तो खौदा चाचा की रुंड-मुंड ठुड्डी मंद-मंद मुस्कुराती। उसकी छोटी-छोटी आँखों में अजीब सा सरूर भर जाताउसका बड़ा सा सर अजीब से ख़ुमार में हिलने लगता। खौदा चाचा बेहद खुश हो जाता वह एक नई पौध तैयार कर रहा था।
                          

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             साभार  - 2018 में प्रकाशित पुस्तक 
 "हम भी इन्सान हैं " (किन्नरों पर केंद्रित)।









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