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सोमवार, दिसंबर 19, 2022

 कहानी श्रृंखला -  31                                    पंजाबी कहानी


                                               

  जुत्ती कसूरी 




  ख़ालिद हुसैन   



 अनुवाद – नीलम शर्मा अंशु                                                 

            




        नम्रता और मैं नैनीताल के आर्मी स्कूल में एक साथ पढ़े। बाद में उसने दिल्ली यूनिवर्सिटी और मैंने कश्मीर यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में एम. ए. की। इस दौरान हमारा टेलिफोन के ज़रिए नियमित राबता बना रहा। फिर भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा के कोचिंग के लिए हम दोनों दिल्ली में मिल गए। हम दोनों ने पहली ही बार में आई. ए. एस. की परीक्षा पास कर ली। मुझे जम्मू-कश्मीर स्टेट कैडर मिला और नम्रता को महाराष्ट्र। नम्रता की शादी मुंबई में एक बड़े उद्योगपति खानदान में हुई परंतु उसने अपने ससुर जी के आग्रह पर भारतीय प्रशासनिक सेवा से त्यागपत्र दे कर अपनी टेलिकॉम कंपनी का चीफ़ ऐग्सीक्युटिव बनना स्वीकार कर लिया और बड़े सलीके से बिजनेस का प्रसार किया। अब हमारी बात-चीत कभी-कभार ही होती और वह भी हाय-हलो तक ही।

          तब मैं जम्मू प्रांत का डिवीजनल कमिश्नर था जब एक दिन मुझे नम्रता का फोन आया –

          इक़बाल ! मैं जम्मू आ रही हूँ, अपने दोनों बच्चों और पत्रकार सखी के साथ। मैं तुम्हारे घर पर ठहरूंगी। मेरे साथ कंपनी की सर्वे टीम भी आ रही है। तुम उनके ठहरने की व्यवस्था किसी बढ़िया से होटल में करवा दो। सारा खर्च कंपनी वहन करेगी। उस दृष्टि से तुम्हें बिलकुल भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं। हम जम्मू में टेलिकॉम यूनिट लगाना चाहते हैं।


                   तीन-चार दिनों बाद नम्रता अपनी टीम सहित जम्मू पहुंच गई। मैंने टीम सदस्यों के लिए एशिया होटल में व्यवस्था करवा दी थी और नम्रता अपने बच्चों तथा पत्रकार सखी के साथ मेरे सरकारी बंगले में पहुँची थी। उसका मेरे यहाँ ठहरना मुझे बहुत अच्छा लगा था। हम बहुत शौक से ज़िंदगी के पृष्ठ खंगालते रहे। बचपन, अबोध उम्र और युवावस्था के किस्से याद करते रहे और अपनी आज की जिम्मेदारियों का रोना भी रोते रहे। सर्वे टीम ने अपना काम ख़त्म कर लिया था और रिपोर्ट नम्रता को सौंप दी थी। टीम ने मीरां साहब के पास पुरानी बंजर ज़मीन का एक 20 एकड़ का प्लॉट पसंद किया था। मैंने डिप्टी कमिशनर और तहसीलदार को जल्द से जल्द काग़ज़ात तैयार करने की हिदायत दी ताकि ज़मीन की रजिस्ट्री की करवाई की जा सके।


          एक दिन हम सभी जब छत पर बैठ कर सियालकोट शहर में जल रही बत्तियों का नज़ारा  देख रहे थे तो नम्रता और उसकी पत्रकार सखी ने बॉर्डर देखने की इच्छा ज़ाहिर की। मैंने रणवीर सिंहपुरा के तहसीलदार को फोन करके बॉर्डर देखने की व्यवस्था करने के लिए कहा। अगले दिन हम सभी सुचेतगढ़ बॉर्डर पहुँचे। सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों द्वारा लंच की व्यवस्था की गई थी। तहसीलदार और उनका अमला तथा सुरक्षा बल के जवान सेवा के लिए हाज़िर थे। हम सभी ने उसी हॉल में लंच किया जहां 1973 में भारत-पाकिस्तान की मिलिट्री कमांड ने जंगबंदी को वास्तविक नियंत्रण रेखा में बदला था और इससे संबंधित नक्शों का आदान-प्रदान किया था।


          लंच के बाद मैंने नम्रता, उसके बच्चों और पत्रकार सखी को लेकर गेट पार किया और नो मैन लैंड के बीचो-बीच लगे बैरियर तक गया जिसके दूसरी तरफ पाकिस्तानी ज़मीन थी। पोल के साथ ही कंकरीट की बनी सरहदी बुर्जी लगी हुई थी, जिसे पीपल के वृक्ष ने अपनी जड़ों में छुपा रखा था। अब पीपल का यह वृक्ष आधा भारत और आधा पाकिस्तान बन चुका है। इसे आप राजनीतिक सितमज़रीफ़ी नहीं कहेंगे तो फिर क्या कहेंगे।


          बैरियर के दूसरी तरफ पाकिस्तानी पंजाब से भी भारी गिनती में लोग बॉर्डर देखने आए थे। पाकिस्तानी बच्चे और युवा हम लोगों से हाथ मिला कर खुश हो रहे थे। ऐसी ही गर्मजोशी हमारी तरफ भी थी। फिर मैंने देखा कि एक अल्हड़ सी युवती अपने कुंवारे सपनों की ख़ुमारी में तन की भीगी माटी की खुशबुएं बिखेरती नम्रता के पास आई। उसने सलाम कह कर अभिवादन किया और फिर नम्रता का हाथ अपने हाथों में लेकर हाल-चाल पूछने लगी। उस मिलनसार युवती से नम्रता भी खुल कर बातें करने लगी। दोनों दिल बहलाने लगीं। अचानक नम्रता की नज़र उसकी तिल्ले (ज़री) वाली जूती पर पड़ी। नम्रता ने जूती की तारीफ़ करते हुए पूछा कि यह खूबसूरत जूती कहाँ की बनी हुई है ?


            कसूर की जूती है। आपने हमारी सुरिंदर कौर का गीत नहीं सुन रखा.... जुत्ती कसूरी पैरी न पूरी, हाए रब्बा वे सानू टुरना पिया और कसूर की जूतियां और खुस्से पूरी दुनिया में मशहूर हैं।

 

          उसने एक जूती निकाल कर नम्रता की तरफ बढ़ाई और कहा, बाजी ! आप पैरों में पहन


 कर देखें... आप पर कैसी लगती है।

 

          नम्रता ने जूती अपने पाँव में डाली जो कि पूरी फिट आ गई थी। उस युवती ने दूसरी जूती भी उतार कर नम्रता को दी। नम्रता ने दोनों पाँवों में कसूरी जूती डाली और ज़रा सा चल कर देखा।

          बाजी ! यह जूती आपके पाँवों में खूब जंच रही है। पाकिस्तानी युवती ने लाड से कहा।

          तुम्हारा नाम क्या है और तुम कहाँ से आई हो ?”

          मेरा नाम आलिया खोखर है और मैं डस्के से बॉर्डर देखने आई हूँ। डस्का सियालकोट के पास एक बड़ा शहर है परंतु आप कहाँ से आई हैं ?”

          मैं मुंबई से आई हूँ और हम भी सुचेतगढ़ बॉर्डर देखने आए हैं। नम्रता ने जवाब दिया।


    आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई। मेरा दिल तो गद-गद हो गया है। अब मेरी एक छोटी सी गुज़ारिश है। आप मेरी एक छोटी सी ख़्वाहिश पूरी कर दीजिए। देखिए इन्कार मत कीजिएगा। मेरी ख़्वाहिश को सम्मान दें और मेरा मान रखिएगा।


          हाँ हाँ ! बताओ क्या ख़्वाहिश है तुम्हारी ?”

             बस बाजी ! अब पैरों से ये जूती मत उतारिएगा। इसे छोटी बहन का तोहफा समझ कर रख लीजिए और इस मुलाकात को यादगार बना दीजिए।

          तुम्हारा व्यवहार मेरे लिए माणिक मोती जैसा है परंतु मैं तुम्हारा तोहफा स्वीकार नहीं कर सकती, क्योंकि तुम जूती के बगैर नंगे पाँव कैसे जाओगी ?”

          बाजी ! कोई बात नहीं।  आप चिंता मत कीजिए। गेट के बाहर मेरी कार खड़ी है। उसमें मेरी जूतियों की एक जोड़ी और रखी है। मैं गेट तक आसानी से चली जाऊँगी।

          मैं चुपचाप खड़ा यह मनमोहक नज़ारा देख रहा था। नम्रता ने निगाहें घुमा कर मेरी तरफ देखा। मैंने इशारे से तोहफा कबूल करने के लिए कहा। नम्रता ने आलिया को आलिंगन में ले लिया और दुआएं देने लगी और कहा –

          रब करे कि हमारे साझे दरिया प्यार के सुर में सदा बहते रहें। इनमें कभी भी सैलाब न आएं।

          अल्लाह साईं आपकी दुआ कुबूल फरमाए और दोनों देशों पर अपनी रहमत की बारिश करता रहे।

            नम्रता बहुत खुश थी। वह बहुत जज़्बाती हो गई थी। कार में बैठी वह दोनों मुल्कों में अमन-चैन के लिए अरदास कर रही थी। फिर उसने मुझसे कहा –

          इकबाल ! मुंबई पहुंच कर मैं यह हृदयस्पर्शी घटना अपने फिल्मी प्रोड्यूसर दोस्त को सुनाऊँगी और उसे इस विषय पर फिल्म बनाने के लिए कहूंगी ताकि नफ़रत की दीवार गिराने में हम भी थोड़ा सा योगदान दे सकें।

             नम्रता की पत्रकार सखी भी चहक रही थी। उसने कहा –

          मैं भी अख़बार के लिए इस खूबसूरत मुलाक़ात पर आधारित एक कहानी लिखूंगी परंतु मेरी कहानी एक नए मोड़ पर ख़त्म होगी।

          नया मोड़...! वह क्या.....?”  

          मेरी कहानी में नम्रता आलिया को पटियाले की जूती का तोहफा देगी।

          दुर फिटे मुँह। तुम यहाँ भी डंडी मारोगी।   


       नम्रता ने अपनी सखी को चिकोटियां काटते हुए कहा..... और फिर दोनों हंसने लगीं

 

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        साभार - दैनिक ट्रिब्यून, 18 सितंबर, 2022  



 लेखक परिचय                         ख़ालिद हुसैन

 

01 अप्रैल, 1945 को उधमपुर (जम्मू-कश्मीर) में जन्म। स्नातक तथा पत्रकारिता में डिप्लोमा। 40 वर्षों से अधिक समय तक विविध प्रशासनिक पदों पर कार्य। उर्दू, हिन्दी, अंग्रेजी, पहाड़ी, गोजरी, डोगरी, कश्मीरी तथा पंजाबी आदि भाषाओं के जानकार। प्रमुख राष्ट्रीय अंतरार्ष्ट्रीय  साहित्यिक पत्रिकाओं में 150 के लगभग कहानियां प्रकाशित। 80 से अधिक कहानियां उर्दू, हिन्दी, अंग्रेजी तथा मलयालम में अनूदित।  पंजाबी में 13 और उर्दू में 8 पुस्तकें प्रकाशित। आत्मकथा माटी कुदम करेंदी यारतथा कुछ कहानी संग्रह विभिन्न विश्वविद्यालयों के पंजाबी एम. ए./एम. फिल. पाठ्यक्रमों में शामिल।

पुरस्कार – 2021 में पंजाबी कहानी संग्रह सूलां दा सालन के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार।  2014  में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा शिरोमणि पंजाबी साहित्यकार सम्मान। कला, संस्कृति और भाषा अकादमी, जम्मू तथा कश्मीर द्वारा ते जेहलम वगदा रेहा और गोरी फसल दे सौदागर कहानी संग्रहों के लिए प्रथम पुरस्कार प्राप्त।

संपर्क -   ईमेल : hussain.khalid47@gmail.com


  



                      

                                   

 


 कहानी श्रृंखला - 30


बांग्ला कहानी


                भूगोल का गणित

 

 

                                                           

                            0      विश्वदीप दे 


            अनुवाद -  नीलम शर्मा अंशु

 

                                                             


 

   जीने से ऊपर चढ़ते ही आदित्य को टी. वी. पर समाचार चलने की आवाज़ सुनाई दी। यानी आज शिंजिनी के पिता घर पर ही हैं। ऑफिस से लौट कर वे अक्सर ही अपने दोस्त के घर ताश खेलने जाते  हैं या लाइब्रेरी जाकर मुहल्ले के अन्य बुजुर्गों के साथ अड्डा मारते हैं। उस वक्त शिंजिनी की माँ टी. वी. देखा करती हैं। मेगा सीरियल। लेकिन पिता घर पर हों ता सारा दिन न्यूज चैनेल ही लगाए रखते हैं। सीढियां चढ़ते-चढ़ते ही आदित्य समझ जाता है कि ड्रॉइंग रूम में कौन टी. वी. देख रहा है।

ड्रॉइंगरूम के बाद शिंजिनी के माता-पिता का कमरा है, उसके बाद शिंजिनी का कमरा। शिंजिनी कुर्सी पर बैठी मेज पर झुक कर डायरी में कुछ लिख रही थी। कमरे में प्रवेश कर जैसे ही आदित्य ने डायरी की तरफ झाँका, उसने फटाफट डायरी बंद कर दराज में रख दी आदित्य हँस पड़ा, क्या लिख रही थी, कविता वगैरह ?’ शिंजिनी ने दोनों तरफ गर्दन हिलाते हुए कहा, आज कुछ भी पढ़ाई नहीं हो पाई।

आदित्य के साथ इस तरह सिर्फ़ वही बात कर सकती है। उसके अन्य छात्र अपने आदित्य दा से सपने में भी इस लहज़े में बात करने के बारे में नहीं सोच सकते।

क्यों?’

टास्क करने के बाद भी अगर यही सुनना पड़े कि मैं नहीं पढ़ती, तो न पढ़ना ही बेहतर है।

क्या कह रही हो? किसने कहा कि तुम नहीं पढ़ती?’

शिंजिनी ने गुस्से से देखा, कहना चाहते हैं कि कल आपने पिता जी से कुछ नहीं कहा। कहा नहीं कि मुझे भूगोल का गणित नहीं आता ?’

आदित्य को याद आया, कल जब वह पढ़ाकर निकल रहा था तो शिंजिनी के पिता के साथ मुलाकात हुई थी। उन्होंने पूछा था -जा रहे हो? वो तुम्हारी स्टुडेंट की पढ़ाई कैसी चल रही है ?

जी ठीक-ठाक आदित्य को लगा कि जवाब निहायत ही गैर-ज़िम्मेदाराना सा लग रहा है। अत: ज़रा मास्टरी रंग-ढंग दिखाने के इरादे से ही शायद उसके मुँह से निकल गया था, भूगोल के सवालों में ज़रा.... लेकिन मैं कोशिश कर रहा हूँ। आदित्य ने पूछा – पिताजी ने डाँटा क्या ?’

शिंजिनी ने आँखें फैलाकर देखा, बहुत खुशी हो रही है न?’ आदित्य ज़रा सा मुस्कुराया, तो कल जो दो सवाल ग़लत किए थे, यह भी तो सच है। शिंजिनी ने बात और न बढ़ा कर इतिहास की किताब खोली, मात्र सोलह साल की उम्र में ही वह अपने आत्म-सम्मान के प्रति बहुत सजग है।

इसी बीच मेड आकर कॉफ़ी-सनैक्स रख गई थी। आदित्य चाय नहीं पीता इसलिए इस घर में कॉफ़ी उसका पेटेंट पेय है। आदित्य ने आराम से कॉफी की चुस्की ली लेकिन स्नैक्स मुँह में डालते ही रोज़ की तरह मुसीबत। चबाते ही कड़मड़ की आवाज़ होने लगती है। चूँकि पूरे घर में नीरवता सी छाई हुई है, इसलिए यह आवाज़ बहुत ही तेज़ महसूस होती है। मध्यवर्गीय परिवार का आदित्य वैसे ही शिंजिनी के चिप्स वाले फर्श, प्लास्टर ऑफ पेरिस वाली दीवारों, दीवारों पर लगी कलाकृतियों, क़ीमती चीज़ों के बीच कैसा असहज सा महसूस करता है। तिस पर कड़मड़ की इस आवाज़ से उसे परेशानी होती है। सिर्फ़ कॉफी की चुस्कियां लेने लगा। इसी तरह चार-पाँच मिनट गुज़र जाने के बाद शिंजिनी ने कहा – क्या हुआ, नहीं पढ़ाएंगे क्या?’ खाली प्याला प्लेट में रखते हुए आदित्य ने मुस्कुरा कर कहा - पढ़ोगी ? मूड ठीक हो गया ?’ शिंजिनी के गुलाबी होठों पर मुस्कान तैर गई, लेकिन टास्क मत दीजिएगा।

आदित्य समझ गया कि शिंजिनी के पिता ने उसे उतनी डाँट-फटकार नहीं लगाई है वर्ना इतनी जल्दी उसका मूड ठीक नहीं होता।

टास्क नहीं किया तो पिताजी के पास इसकी कड़ी रिपोर्ट करूंगा।

हिम्मत है ?’ गर्दन तिरछी करके अपने ही अंदाज़ में कहा शिंजिनी ने।

बहुत हो गया, अब ज़रा टिगनोमेट्री का टास्क दिखाओ। कहकर हँस पड़ा आदित्य।


सुबह जो छात्र उसके घर पर पढ़ने आते हैं, वे अगर देखें कि उनका गुस्सैल टीचर आदित्य घोषाल इस घर की लड़की को कैसे हैंडल करता है। वे अपनी आँखों पर कभी यकीन नहीं कर सकते। पता नहीं क्यों आदित्य उसे डाँट-फटकार नहीं कर पाता। संभवत:  इसका मुख्य कारण है कि दूसरे उसके घर पढ़ने आते हैं और शिंजिनी को उसी के घर पढ़ाने आना पड़ता है। उनके छोटे से किराए के घर और चारदिवारी में घिरे इस दो मंज़िले मकान में बहुत फ़र्क है। वह मानो इस विशाल मकान में मिसफिट है। सेल में खरीदी उसकी सस्ती जींस की टी शर्ट यहाँ बिलकुल बेमेल है। यहाँ सभी बहुत फिट-फाट हैं। शिंजिनी के पिता सदा दूध सा सफेद कुर्ता-पायज़ामा पहने रहते हैं। माँ मंहगी साड़ियां पहनती हैं। और शिंजिनी बढ़िया-बढ़िया सलवार-कुर्ते। यहाँ तक कि शिंजिनी की दादी भी दूध सी चमचमाती सफेद साड़ी पहने रहती हैं और मंहगे फ्रेम वाला चश्मा। यहाँ आकर आदित्य हीन भाव से ग्रस्त हो जाता है। वह हमेशा यही सोचता रहता है कहीं बेमेल सा कुछ न कर बैठे। इसी लिए वह शिंजिनी को डाँट-फटकार करना भी नहीं चाहता। उसे सिर्फ़ यही लगता रहता है कि इस घर में असंगत चीज़ें नहीं जंचती। सब कुछ मार्जित होना चाहिए।


शिंजिनी के सारे सवाल सही हुए हैं। कॉपी में हस्ताक्षर कर आदित्य ने कहा, यह तो एकदम वेरीगुड है, बस भूगोल के सवाल पता नहीं कैसे ग़लत हो जाते हैं।


शिंजिनी अपनी स्वभाविक भंगिमा में कहती है, यूं ही ताना देना अच्छी बात नहीं। कहा न अब गलत नहीं होगा। आदित्य हँसता है – देखेंगे। शिंजिनी के ऐसे बर्ताव पर वह बिल्कुल भी दु:खी नहीं होता। बड़े घर की छोटी बेटी का इस तरह का डोंट केयर वाला रवैया अस्वाभाविक नहीं है। पूरे घर में शिंजिनी पिता के सिवाय किसी से नहीं डरती। चाचा, चाची, चचेरी दादी, माँ, दादी माँ किसी से भी नहीं। अत: आदित्य जैसे निरीह युवक को भला वह क्यों पत्ता देगी ? हाँ, यह भी सही है कि वह आदित्य को डाँट-फटकार लगाने का मौक़ा भी नहीं देती। पढ़ाई में वह बहुत अव्वल है। सब कुछ उसे आता है। हर विषय पर उसकी अच्छी पकड़ है। सिवाय भूगोल के सवालों के।

 

                           2

 

माँ सुबह-सुबह क्यों पुकार रही है ? आदित्य का दिमाग गर्म हो गया। आज मंगलवार है। इस दिन कोई ट्यूशन नहीं होती। आदित्य साढ़े आठ बजे तक सोता है। माँ सुबह-सुबह जगकर सिलाई करने बैठ जाती है। माँ के लिए कोई भी दिन छुट्टी का दिन नहीं है। आदित्य ने बहुत बार मना किया है। ट्यूशन के पैसों से ही तो किसी तरह गुज़र हो सकती है। क्या ज़रूरत है ऐसी हाड़तोड़ मेहनत की। लेकिन कौन किसकी सुनता है ? पिता के गुज़र जाने के बाद किराए के घर में रहकर भी माँ ने सिलाई के काम के बल पर उसकी परवरिश की है।


आदित्य को खूब शौक है कि माँ को पलकों पर बिठा कर रखेगा। कुछ काम नहीं करने देगा। शायद उसका यह सपना कभी भी पूरा नहीं हो पाएगा। ग्रेजुएशन किए उसे लगभग एक साल होने को आया है। एक भी नौकरी जुगाड़ नहीं कर पाया। सिर्फ़ ट्यूशन पढ़ाता है पूरे सप्ताह। दोनों वक्त। सिर्फ़ मंगलवार की सुबह छोड़कर। उस दिन वह देर तक सोता है। आज भी सो रहा था। माँ की आवाज़ से नींद टूट गई। आदिय ने विरक्ति से आँखें खोली - हुआ क्या ?


    माँ को तो कह ही रखा है कि साढ़े आठ से पहले न जगाए। उसने फिर आँखें बंद कर लीं। सुबह-सुबह उठने की उसे आदत है ही नहीं। फर्स्ट ईयर में जब पढ़ता था तब अवश्य रविवार को जल्दी उठ जाया करता था। छह बजे तक नींद खुल जाया करती थी। बिस्तर पर लेटा आदित्य छटपटाता रहता। पौने सात तक वह आया करती थी। पीली सलवार, सफेद दुपट्टा। बस से उतर के उत्तम दा के कोचिंग सेंटर की तरफ बढ़ जाया करती थी। आदित्य को ऐसा लगता मानो उसके सामने कोई नदी गुज़र रही हो। मानो भीगी-भीगी सी हवा तन को स्पर्श कर रही हो। मंत्र-मुग्ध सा हो वह उस लड़की के पीछे-पीछे चल पड़ता।


लड़की के कोचिंग सेंटर में घुस जाने के बाद वह पागलों की भाँति घर लौटता। डेढ़ घंटे बाद फिर आ खड़ा होता रास्ते के मोड़ पर। लड़की बस स्टैंड पर लौटती। साथ में एक-दो सहेलियां होती। सपनों की भाँति दिन गुज़र रहे थे। यह रविवारीय सम्मोहन छह महीनों तक चला था। इसके बाद अचानक सब कुछ बंद हो गया था। वह रविवार की ही घटना थी। रोज़ की भाँति आदित्य रास्ते के मोड़ पर खड़ा था। समयानुसार लड़की बस स्टैंड पर लौटी। साथ में थी आदित्य के घर से दो घर छोड़कर रहने वाली रीमा। रीमा हर दिन उसे बस में चढ़ाती। संभवत: उस लड़की की इस कोचिंग में यह बेस्ट फ्रेंड थी। आदित्य का जी चाहा कि वह रीमा से खुलकर कहे। लड़की के बस में चढ़ते ही उसने रीमा को पुकारा।


क्या बात है आदित्य दा ?’

वो पीली सलवार और सफेद दुपट्टे वाली तुम्हारी सहेली है .. ?’

आदित्य दा, मैं इस बारे में तुमसे बात करने की सोच ही रही थी। रोज़ तुम इस समय उसके लिए ही खड़े रहते हो न? मानसी को तुम भूल जाओ। हमारे कोचिंग के सौरभ का उससे अफेयर है। वे लोग एक साथ बहुत सी जगहों पर घूमने भी गए हैं। मिलेनियम पार्क, नलबन – दे लव ईछ अदर वेरी मच। सौरभ को तुम जानते तो हो ? उस मुहल्ले में रहता है। तुम्हारे दोस्त सौगत का भाई।

हाँ जानता हूँ।

घर लौटकर शीशे के सामने खड़ा हुआ था आदित्य। शीशे में मुंहासों से भरा अपना चेहरा देखा, कौवे के घोंसले जैसे बालों पर नज़र पड़ते ही मानो चेतना लौट आई हो उसकी। समझ गया था कि मानसी के लिए सौरभ जैसा हैंडसम लड़का ही ठीक है। उसके जैसे काला, पिचके गालों वाला नहीं। उसके बाद वह कभी भी रविवार की सुबह रास्ते के मोड़ पर नहीं खड़ा हुआ। कभी भी किसी के लिए सुबह-सुबह उसकी नींद नहीं टूटी।


माँ फिर पुकार रही है। आदित्य ने देखा घड़ी में सात बीस हो रहे थे।

क्या हुआ ? आज मंगलवार है न ?’

तेरा फोन है।

हड़बड़ा कर उठ बैठा आदित्य। इतनी सुबह-सुबह किसने फोन किया। दौड़ कर रबीन की दुकान पर जा उसने फोन रिसीव किया।  कहीं अमित तो नहीं है ?

हलो।

हलो, आदित्य मैं अमित बोल रहा हूँ.....

फोन पर बात करते हुए आदित्य का चेहरा खिल उठा था।

घर आकर माँ से लिपट गया वह। उसे लगा बाईस साल के इस जीवन में कभी भी उसने इतनी रोशनी अपनी खिड़की से भीतर आती नहीं देखी थी।

 

 

  

                            3

  

 

आदित्य की लगभग महीना भर पहले बस में अमित से मुलाक़ात हुई थी। अमित उसका सहपाठी और बचपन का दोस्त है। साउथ सबर्बन स्कूल में पाँचवी से बारहवीं तक दोनों साथ-साथ पढ़े हैँ। काफ़ी गहरी दोस्ती थी। उसके बाद जो होता है, आदित्य का घर टालीगंज में था और अमित का बेहाला में होते हुए भी कॉलेज में जाने के बाद वैसा संपर्क नहीं रह पाया। बहुत दिनों के बाद बस में मुलाक़ात हुई थी। अमित इसी बीच जीवन में अच्छी तरह स्थापित हो गया था। पिता के मोटरपंप के बिजनेस को और भी बढ़ाने की कोशिश कर रहा था।  हल्दिया में शीघ्र ही वे लोग एक ऑफिस खोलना चाहते हैं। आदित्य को अभी तक नौकरी नहीं मिली जानकर अमित ने कहा – ग्रेट! तो तू ही उस ऑफिस का ज़िम्मा ले ले। हमें तो वैसे भी किसी न किसी को रखना ही पड़ेगा। तू रहेगा, यानी समझ ही रहे हो, विश्वासी आदमी न हो तो....वहीं माँ को लेकर रहना। हमारा तो हल्दिया में भी घर है। नो प्रॉब्लम। अपना फोन नंबर दे। मैं पिताजी से कंसल्ट करके तूझे सूचित कर दूंगा।

हमारे तो फोन है ही नहीं, साथ वाली दुकान....

वही दे दो।

आदित्य ने सोचा नहीं था कि अमित फोन करेगा। अभी भी नौकरी पाकर उसे यकीन नहीं हो रहा था।

परसों वे कलकत्ते से निकल पड़ेंगें। उससे पहले सभी ट्यूशन एक-एक कर छोड़ दिए, हर छात्र के घर जाकर सूचित कर दिया। अब वह शिंजिनी के घर पर था।

बहुत मुश्किल हो गई। अब नया मास्टर तलाशना.... तुम्हारे साथ तो एडजस्ट कर लिया था।

तो मैं चलूं।

ठीक है। अपनी छात्रा से नहीं मिलोगे ?’

हाँ अवश्य।

शिंजिनी के कमरे में कोई नही था। टेबल पर डायरी खुली पड़ी थी। शिंजिनी बरामदे में खड़ी थी। आदित्य ने पुकारा, शिंजिनी !’ गर्दन घुमा कर शिंजिनी ने देखा। हल्का सा मुस्कराई। कुछ बोली नहीं। आदित्य भी चुप रहा। अभी-अभी नज़र से गुज़रे शिंजिनी की डायरी में लिख रखे दो वाक्य उसके दिमाग में कौंध रहे थे। उसने गंभीर स्वर में पूछा – तो चलूं ?’ जवाब की प्रतीक्षा किए बिना ही उसने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाए। शिंजिनी ने कहा – भूगोल का गणित बाकी रह गया। वह अक्षांश और देशांतर का मामला। आदित्य हँसा – वह तुम कभी भी खुद-ब-खुद सीख जाओगी।

तेज़ी से सीढ़ियां उतरने लगा आदित्य, दिमाग में दो पंक्तियां लिए। दो वाक्य – चले जा रहे हैं, और फिर लौट कर नहीं आएंगे। शिंजिनी की डायरी में लिखा था, जिस डायरी में अक्सर शिंजिनी को कुछ न कुछ लिखते देखा था।

घर से बाहर आकर पता नही क्या सोचकर एक बार पीछे मुड़ कर देखा आदित्य ने।

दूसरी मंज़िल की खिड़की से एक साया सा सरक गया। वह आगे बढ़ता गया। मन ही मन कहा, भूगोल का गणित सब जगह नहीं होता शिंजिनी....देशांतर, अक्षांश... ये सब बिलकुल काम नहीं आते। मेरे काम आए क्या ? कुछ साल पहले की वह पीली सलवार और सफेद दुपट्टे वाली अब किस अक्षांश और कितने डिग्री देशांतर पर है मैंने जानना चाहा था। मन ही मन सोचने पर मैं रविवार की उन सुबहों तक पहुँच जाता हूँ। तुम भी पहुँच जाना अपनी उन शामों में जिन्हें तुम भूलना नहीं चाहती। जान लो उन सब पलों का हिसाब कभी भी किसी भूगोल के गणित के काम नहीं आता।



साभार - ककसाड़ मासिक पत्रिका (दिल्ली), अगस्त - 2022

 

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                लेखक परिचय



                              विश्वदीप दे  




पेशे से पत्रकार। साथ-साथ नियमित साहित्यिक चर्चा। उच्च कोटि की बांगला  

                

पत्रिकाओं में बहुत सी कहानियां व आलेख प्रकाशित। दो कहानी संग्रह प्रकाशित।


संपर्क - 9163358533


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