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शनिवार, जून 26, 2010

पुस्तक समीक्षा

काबुलीवाले की बंगाली बीवी (फ्लैश बैक - 2)

साभार - हंस, अप्रैल, 2002

वध-स्थल से छलांग

० दूर्वा सहाय


इन दिनों बांगला में बेहद चर्चित सुष्मिता बंद्योपाध्याय का उपन्यास ‘काबुलीबाले की बंगाली बीवी’ पढ़ कर लगा मानो बैटी महमूदी का ‘नॉट विदाउट माई डॉटर’ उपन्यास का भारतीय रूपांतरण ही पढ़ रही हूँ। दोनों पात्रों की विडंबनाओं और यातनाओं के भौगोलिक क्षेत्र अलग हैं दोनों ही इस्लामी धर्मांधता की शिकार हैं मगर स्वतंत्रता की तड़प और विषम परिस्थतियां एक जैसी हैं।

सुष्मिता कलकत्ते में रहने वाले एक अफ़गानी युवक जांबाज खां के प्रेम में पड़ जाती है और कुछ समय के लिए उसके साथ अफ़गानिस्तान चली जाती है। पति वापस कलकत्ते आ जाता है। पीछे रह जाती है सुष्मिता – कष्ट भोगने, उधर नॉट विदाउट माई डॉटर में बैट्टी और उसका पति डॉ. सैय्यद नॉज़ोर महमूदी उसे ईरान लेकर जाता है और वहाँ लगभग कैद कर ली जाती है। उसे अमेरिका से ईरान दो हफ्ते की यात्रा के आश्वासन पर ले जाया गया है मगर समय गुज़रते ही बैट्टी को पता चलता है कि वह और उसकी चार साल की बेटी अजनबी देश में एक अत्याचारी और क्रूर व्यक्ति द्वारा बंधक बना लिए गए हैं। अब वह कभी भी अपने घर अमरीका नहीं जा सकती। वहाँ अधविश्वास, धार्मिक जड़ताएँ, अस्वास्थकर रहन-सहन, पश्चिम निवासियों मुख्यत अमेरिकियों के प्रति घृणा और वहाँ की औरतों की गुलामी दखकर भयमीत लेखिका जल्द से जल्द अमरीका लौटने के लिए लिए बेचैन हो जाती है। मुक्ति की दिशा में लिए गए दुस्साहसी प्रयासों की कहानी है यह उपन्यास। डॉ। महमूदी और उसके परिवार के इरादे भांपने में उसे समय नहीं लगता। महमूदी हर वक्त या तो खुद या परिवार के किसी दबंग सदस्य को उसकी पहरेदारी के लिए छोड़ जाता है। उसके बावजूद पति और उसके डरावने गुप्तचरों की आँखों में धूल झोंककर बैट्टी ऐसे लोगों से मिलती है जो खुमैनी के बर्बर शासन के खिलाफ़ हैं। अपने हमदर्दों के साथ मिलकर वह कई बार भागने की योजना बनाती है लेकिन हर योजना के तहत् उसे अपनी पुत्री को छोड़ने की समस्या का सामना करना पड़ता है, इसलिए वह तैयार नहीं होती। डेढ़ वर्ष तक वह ईरान में पति के चंगुल में फंसी रहती है, अंतत: उसे एक ऐसे व्यक्ति का पता चलता है जो उसके बेटी को लेकर अमरीका वापसी की जोखिम भरी यात्रा करने के लिए तैयार है। इस दु:स्वपनभरी वापसी के प्रयत्नों में वे किस तरह विस्मयकारी बर्फीले तूफान में घिर जाते हैं। इस रोमांचकारी अभियान से गुज़रकर लगता है मानो खुद हम एक भयानक दु:स्वपन के बीच हैं। यहाँ कुछ रास्ते गाड़ी से तय होते हैं तो कुछ बर्फीली पहाड़ियों में रात के समय घोड़े की पीठ पर।


‘काबुलीवाले की बंगाली बीवी’ में लेखिका कलकत्ते के अफगानी पठान जांबाज खां की मुहब्बत में पड़ जाती है और बिना सोचे-समझे उसके साथ अफगानिस्तान चल पड़ती है। वह हर विषम परिस्थिते में पति के साथ खुश है। कभी जब उसका मन वापस घर आने के लिए व्याकुल होता है रो-धोकर चुप हो बैठती है। यहाँ पति किसी तरह की कोई ज़्यादती नहीं करता बल्कि अक्सर वही जांबाज को बुरी तरह मारपीट बैठती है, नोंच लेती है, दाँतों से काटकर लहुलूहान कर देती है। पति चुपचाप सब कुछ सहता है। ज़रूरत पड़ने पर युद्ध के माहौल में भी जान जोखिम में डाल कर तालिबानों से बचते-बचाते शहर ले जाकर इलाज भी करवाता है। ऐसा तीन साल तक चलता है और एक रात वह वापस नहीं लौटता। काफ़ी रोने-धोने के बाद वह समझ जाती है कि उसे उसी नरक में छोड़कर उसका पति कलकत्ता भाग गया है। हाँ, वह कलकत्ते से लगातार अपने समाचारों से भरे ऑडियो कैसेट और रुपए भेजता रहता है। शादी से पहले भी पैसे कमाने के लिए वह कलकत्ता रह रहा था। पति के चले जाने के बाद यहाँ शुरू होती है उसके कठिन जीवन की यातनाएं। तान-चार वर्षों तक यंत्रणाएं सहने, देवरों से मार खाने के बाद वह भागकर पाकिस्तान के रास्ते हिंदुस्तान लौट आती है। घर से भागने से पहले वह अपनी गोद ली हुई पुत्री तिन्नी को भी अपने साथ लाती है जिसे पाकिस्तान में उसके देवर ज़बरदस्ती छीन लेते हैं। अपनी बेटी के साथ बैट्टी की दुस्साहसिक यात्रा और तिन्नी के साथ सुष्मिता की यात्राओं में अजीब समानता है।


सही है कि उपन्यास की नायिका सुष्मिता दुस्साहसी नारी है। बिना दुस्साहस के तो ऐसी परिस्थितियों में रात-बेरात भूख-प्यास सहना संभव नहीं होता। मगर एक जगह तालिबानों पर मशीनगन तान लेना और यह धमकी देना कि ‘तुम लोग मुझे जाने दो, वरना मैंने अपने देश में ख़बर भेज दी है कि यहाँ मुझे ज़बरदस्ती बंदी बनाकर अत्याचार किए जा रहे हैं। अगर मुझे कुछ हो गया तो यह भी जान लो कि हिंदुस्तान में एक भी खान ज़िंदा नहीं बचेगा,’ जैसे फिल्मी डॉयलॉग या तो चमत्कारी लगते हैं या अविश्वसनीय। बैट्टी महमूदी(अमेरिकी) का डेढ़ साल में ही पलायन और सुष्मिता बंद्योपाध्याय (हिंदुस्तानी) का लगभग छह सालों तक असहनीय प्रवास दोनों देशों की औरतों की सहनशीलता पर टिप्पणी है। पीढ़ी-दर-पीढी लगातार कष्टों को सहने की आदत दो अलग मानसिकताएं बनाती हैं। अफगानिस्तान और हिंदुस्तान की औरतों की गुलामी के स्तर में 19-20 का फ़र्क है। काबुली वाले...... में लेखिका बार-बार इस दुर्भाग्य के लिए खुद को दोष देती है और पछताती है, ‘हाय री अभागी लड़की, अनजाने में तुमने कौन सा जीवन चुन लिया। अगर इसी जीवन की तुम्हें चाह थी तो सभ्यता और संस्कृति की खुली हवा को अपनी साँसों में क्यों बसा लिया था.... ’ नॉट विदाउट माई डॉटर में लेखिका रोती है पर पछताती नहीं है। इसके विपरीत अपनी बुद्धि और अपनी समझ को बरकरार रखते हुए लगातार भाग छूटने की तिकड़में जारी रखती है। पहली दफा घर से भागकर जब वह स्विस दूतावास पहुँचती है और वहाँ की कर्मचारी हेलेन को दु:खभरी कहानी सुनाती है तो हेलेन का प्रश्न था, ‘आई डू नॉट अंडरस्टैंड वाई अमेरिकन वूमेन डू दिस?’ (समझ में नहीं आता कि आख़िर अमरीकन औरतें यह सब क्यों करती हैं?)


शारीरिक कष्टों और असुविधाओं के बीच दोनों उपन्यासों की नायिकाओं में हमेशा एक-सा डर समाया रहता है कि कहीं वे वहाँ की औरतों के जैसे तो नहीं बनती जा रहीं हैं? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि एक दिन वे अपनी शिक्षा-दीक्षा, ज्ञान-बुद्धि सबको तिलांजलि देकर उन्हीं में एक बनकर रह जाएंगी? दोनों ही देशों में इनके लिए अख़बार, रेडियो, टीवी कुछ भी तो नहीं है और जो कुछ है वह उनकी अपनी ज़बान में नहीं है इसलिए कहीं कोई जानकारी नहीं मिलती कि बाहरी दुनिया में कहाँ क्या हो रहा है। दोनों ही देश भयंकर, अंधविश्वास, जड़ता और मध्यकालीन धार्मिक कट्टरताओं के जीवित नरक हैं। सोलहवीं सदी के इस्लामी कानूनों से संचालित।


काबुलीवाले......में लेखिका के पति का व्यवहार उसके प्रति उस समय अच्छा और प्यारभरा रहा जब-जब वह उसके साथ होती है। उधर नॉट विदाउट में उसका पति दस वर्षों से अमेरिका में रह रहा था। चार वर्षों से डॉक्टरी के पेशे में था और उससे भी पहले दो वर्ष इंग्लैंड में बिता चुका था, मगर अपने देश ईरान लौटकर परिवार वालों के बीच धीरे-धीरे उसमें जो परिवर्तन हुए उन्हें आश्चर्यजनक ही कहा जाएगा। वह भयानक शक्की हो उठता है और चौबीसों घंटे उसकी पहरेदारी करता रहता है कि कहीं वह छोड़कर न भाग जाए। छोटी-छोटी बातों पर उसे जान से मारने की धमकी देता है। मारता-पीटता है जैसे उसने कभी बाहर की कोई दुनिया देखी ही न हो। वह बैट्टी को इस बुरी तरह मारता है कि वह सप्ताह भर बिस्तर से उठने लायक नहीं रहती। फिर एक बार उसे सज़ा देने के लिए बेटी को उससे अलग कर देता है और लंबे समय तक उससे मिलने नहीं देता। जैसे ही स्थिति सामान्य होती है लेखिका का पलायन प्रयास शुरू हो जाता है। वह बेटी को समझाती है, चलो अमेरिका लौट चलें यहां अपनी गुज़र नहीं है। डॉक्टर होने के बावजूद महमूदी उसे नौकरी करने की इज़ाजत भी नहीं देता। अमेरिकन डिग्री का वहाँ कोई मतलब नहीं रह गया था। पति जानता था कि अगर वह वापस लौट आया तो अमेरिकन पत्नी डाइवोर्स ले लेगी और बच्ची भी उसे नहीं देगी। तब किस पर अपनी हुकूमत चलाएगा। राजा को तो हमेशा प्रजा चाहिए वर्ना राजा होने का क्या मतलब है। काबुलीवाले...... की बीवी भी छोटी-मोटी डॉक्टर है और वहाँ के साधनों से आस-पास के बीमारों का इलाज करने की कोशिश करती है। हाँ भागने की यात्राओं का बैट्टी वाला वर्णन जिस तरह रोमांचक और साँस-रोक लगता है सुष्मिता के लिए वैसी कोई दिक्कतें नहीं हैं। हर जगह सहयोगी, सहायक, धन, साधन मिलते चले जाते हैं। साफ़ है या तो इसमें कल्पना का बहुत अधिक पुट है या ऐसा कुछ है जो छिपाय जा रहा है। हो सकता है बंगाली भावुकता के चलते बहुत कुछ का रोमानीकरण कर दिया गया हो।


राजनैतिक स्थितियां दोनों में काफी विस्तार से हैं- सुष्मिता के यहाँ कुछ अधिक ही हैं। दोनों ही उपन्यासों में उन दिनों को लिया गया है जब युद्ध छिड़े हुए हैं। वर्षों से चले आ रहे मोर्चे, मुठभेड़ और युद्ध तथा उनके परिणामों का चित्रण भयावह और जीवंत है। महमूदी के उपन्यास में उस इस्लामी आंदोलन का वर्णन है जब जन-विद्रोह के कारण शाह रज़ा पहलवी को देश छोड़कर फ्रांस भगना पड़ा और पश्चिमीकरण के खिलाफ़ आयतुल्ला खुमैनी ने मुल्क़ की बागडोर संभाली। वैसे 1952 में मुसद्दी के मरने के बाद से ही वहाँ अराजकता के दौर शुरू हो गए थे। लगातार उबरने वाले शिया-सुन्नी झगड़े और इराक के साथ चलने वाले सीमा-विवाद तो लगे ही थे। उधर अफगानिस्तान में पहले रूसी सैनिक, फिर गृह युद्ध, फिर तालिबानी हुकूमत अर्थात् कट्टरता का वह दौर जब दाढ़ी न रखने पर, मस्ज़िद जाकर नमाज़ न पढ़ने पर हत्या कर दी जाती थी। औरतों को ऊपर से नीचे तक बुर्कों में धकेल कर ज़िंदा ताबूतों की शक्लें दे दी गई थीं। औरत के शरीर का कोई भी हिस्सा दिखाई देने पर सीधे गोली मारी जा सकती थी। नौकरी करने या बाहर जाने का तो सवाल ही नहीं था। वहाँ न तो फिल्में देखी जा सकती थीं, न टीवी और न रेडियो। मुझे लगता है इस लोमहर्षक वातावरण को सुष्मिता उतनी गहराई से नहीं पकड़ पाई है जितना बैट्टी ने पकड़ा है। मगर दोनों जगहों की घुटन, हताशा, अत्याचार में अधिक अंतर नहीं है। हालत तो यह है कि जब सुष्मिता अफगानिस्तान से भागकर पाकिस्तान आती है तो उसे लगता है जैसे एक बंद गुफा से निकल कर खुले में आ गई हो, जहां रेडियों, टीवी और खुले में घूमती औरतें हैं, आधुनिकता की हवाएं हैं, हलाँकि इस्लामिक कट्टरता पाकिस्तान को भी अफगानिस्तान बनाने की ओर धकेल रही है।

दोनों
उपन्यासों का एक उत्साहवर्धक पहलू यह है कि नायिकाएं या तो भगवान पर विश्वास रखती हैं या फिर किसी चमत्कार पर निर्भर हैं। अनजाने ही भगवान पर विश्वास करते-करते वे खुद पर ही इस प्रकार विश्वास करने लगती हैं कि बेहद साधारण औरतें होने के बावजूद मुक्ति के विस्मयकारी और रोमांचक चमत्कार को साकार करके दिखा देती हैं। दोनों ही स्त्री के साहस और संकल्प की प्रेरणादायक कहानियां हैं जो स्त्री को हर कैद से मुक्ति का अश्वासन देती हैं। आख़िर हर भारतीय स्त्री अपने घर-परिवार के अंधेरों में छोटे-छोटे ईरानों और अफ़गानिस्तानों में ही तो साँस ले रही हैं।

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