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गुरुवार, जून 09, 2011

कहानी श्रृंखला - 12 (पंजाबी)




पापा तुम कब आओगे ?
         
   दिलीप कौर टिवाणा



प्यारे पापा,
  
आप मेरा ख़त पढ़कर हैरान तो होंगे ही। कई बार जी चाहा कि आपको ख़त लिखूं परंतु फिर यह ख़याल आया कि यदि बीजी को पता चल गया तो वे दु:खी होंगीं। बहुत बार दिल चाहा कि उनके और आपके बारे में कुछ पूछूं परंतु जब भी मैं बात शुरू करती हूं तो वे खफ़ा हो जाती हैं और मैं बात वहीं छोड़ देती हूं।
           
पापा, बीजी कभी भी आपको बुरा नहीं कहतीं, वे खुद भी बहुत अच्छी हैं। फिर...फिर !


पापा, आप तो अब तक मुझे भूल भी गए होंगें। बहुत छोटी सी थी, जब आप और बीजी हमेशा के लिए अलग हो गए। अब तो मैं बहुत बड़ी हो गई हूं। कुछ दिनों पहले एक महिला हमारे घर आई थीं। जब मैं कॉलेज से लौटी तो देखा बीजी उससे बातें करते हुए रो रही थीं। मुझे देखकर वह महिला बोली, यह तो बिलकुल अपने पिता जैसी दिखती है। पापा, क्या सचमुच मैं आप जैसी हूं ?’
   

मेरा बहुत जी चाहा कि उस महिला के साथ आपके बारे में ढेर सारी बातें करूं। आपके बारे में बहुत कुछ पूछूं, परंतु बीजी ने मुझे चाय बनाने भेज दिया। फिर भी बहाने से, आते-जाते मुझे सुनाई दे गया कि आप पटियाला के कॉलेज में पढ़ाते हैं। पटियाला से लुधियाना का केवल दो घंटों का ही तो सफ़र है। कितने साल गुज़र गए हैं पापा, परंतु आप ये दो घंटे लांघकर कभी हमारे पास नहीं आए। बीजी के साथ आपकी लाख नाराज़गी होगी, परंतु पापा, क्या आपको मैं कभी याद नहीं आई? क्या मेरी हमउम्र किसी लड़की को देखकर आपको कभी ख़याल नहीं आता कि मेरी बेटी भी कहीं है? पर पापा मुझे तो आप बहुत याद आते हैं।

       
कई महीने पहले हम दो लड़कियां अपनी एक प्रोफेसर के साथ पटियाला के कॉलेज में पंजाबी बाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने गई थीं। क्या उसक वक्त आप वहां थे? मुझे बहुत दु:ख हो रहा है कि काश! उस वक्त मुझे पता होता कि आप वहां है। मैं खुद आकर आपसे बात कर लेती।
        
कई बार कहीं गाड़ी में, सड़क पर या सिनेमा में जब किसी अच्छे से व्यक्ति को देखती हूं तो ख़याल आता है - शायद मेरे पापा ऐसे हों - शायद यही मेरे पापा हों और उस वक्त बड़ा ही जी चाहता है कि उस अजनबी व्यक्ति के गले जा लगूं। परंतु, ऐसा करना तो गलत होता है न, पापा! इसी तरह शायद एक व्यक्ति को मैं काफी देर तक निहारती रही थी। बस से उतरते वक्त आहिस्ता से वह मेरे हाथ में एक चिट थमा गया। लिखा था, शाम को घंटाघर के पास तुम्हारा इंतज़ार करूंगा। कितनी बेहूदा बात है। मुझे तो आपको बताते हुए भी शर्म आती है। बीजी ठीक ही कहा करती हैं कि ज़माना ख़राब है। उस दिन मुझे बहुत ही रोना आया। शायद, वह जानता था कि हमारे घर में उसकी पिटाई करने वाला कोई नहीं है, तभी तो इतनी हिम्मत हुई उसकी। परंतु, शक्ल से तो काफ़ी उम्रदराज़ लगता था।
        
अरे, हां पापा, मेरी क्लास की एक लड़की आपके कॉलेज से आई है। मैं उससे आपके शहर के कॉलेजों की ढेर सारी बातें पूछती रही। सोचा था, वह आपका भी ज़िक्र करेगी। उसने बताया कि पढ़ाते वक्त आप बहुत डांटते हैं। दूसरों की बेटियों का आप इतना ख़याल रखते हैं, कभी आपको अपनी बेटी याद नहीं आती?
        
पापा, वह लड़की बता रही थी कि आपकी एक छोटी सी बेटी और एक बेटा है। मैंने उन्हें कभी देखा तो नहीं परंतु कई बार बहुत जी चाहता है कि मेरे भी छोटे भाई-बहन हों। कभी वे मुझसे सवाल समझें। कभी मैं उन्हें स्कूल के लिए तैयार करूं। कभी-कभी हम सभी मिलकर सिनेमा देखने जाएं।
        
पापा, कहते हैं दूसरी शादी करते वक्त आप ने उन लोगों से वादा किया था कि आप अपनी पहली पत्नी और बेटी से कोई संबंध नहीं रखेंगे। पापा, दूसरी बीजी कहीं मेरे इस ख़त को देखकर ही नाराज़ तो नहीं हो जाएंगी?
      
अगर मैं कभी आपके शहर आऊं और आपसे मिलने आपके घर आ जाऊं। क्या दूसरी बीजी आपसे गुस्सा करेंगी? फिर क्या आप मुझे डांटकर लौटा देंगे? पापा, अगर कभी एक बार, बस एक बार, आप मुझे गले से लगा कर प्यार करेंगे, फिर चाहे आप कहीं भी रहें, मुझे यकीन हो जाएगा कि आप मुझे प्यार करते हैं।
       
पापा, मैं यह कभी नहीं चाहती कि आपके घर में कोई कलह हो, परंतु फिर भी दिल चाहता है कि आप दूसरी बीजी से पूछकर ही सही, एक बार मुझसे मिलने आ जाएं। वे भी तो एक औरत हैं, एक मां है। सिर्फ एक बार, पापा!
        
मैंने एक बार बीजी से कहा, बीजी, पापा से मिलने को मेरा बड़ा जी चाहता है। वे रो पड़ीं और बोलीं - जिनके पिता मर जाते हैं, उनका भी तो गुज़ारा हो ही जाता है....... मेरा दिल कांप उठा। मैं काफी देर तक मन ही मन भगवान से विनती करती रही कि हे रब्बा, मेरे पापा को तो कभी कुछ न हो।
       
एक बार हमारे पड़ोसियों की लड़की ने मुझसे पूछा कि तेरे पापा कहां रहते हैं, क्या करते हैं? वे कभी तुम लोगों से मिलने क्यों नहीं आते? मुझे कोई उत्तर न सूझा। पता नहीं उसे सचमुच ही कुछ नहीं मालूम या कई बार लोग जान-बूझकर भी ऐसी बातें छेड़ बैठते हैं। बेशक मैं समझती हूं कि रोज़-रोज़ की खिट-पिट से तो यही अच्छा है कि अगर न निभे तो रास्ते अलग कर लेने चाहिए, परंतु फिर भी जब कोई पूछ लेता है तो बहुत ही बुरा लगता है।
       
पता नहीं क्यों पापा, अक्सर बीजी बेवजह ही गुस्सा होने लगती हैं। जी तो अपना ठीक नहीं होता और गुस्सा मुझ पर निकाल देती हैं। एक तो उनके स्कूल की हेडमास्टरनी भी बड़ा तंग करती है। अगर आप हमारे साथ होते फिर भला उन्हें नौकरी करने की क्या जरूरत पड़ती? कई बार मेरा बड़ा जी मचलता है किसी चीज़ के लिए। बीजी लेकर नहीं देती। अगर ले भी देती हैं तो बक्से में रख देती हैं और कहती हैं कि मेरी शादी पर दी जाएगी। मेरी शादी पर तो आप आएंगे न? एक दिन जब किसी जगह लड़का देखने जाना था, बीजी अंदर से कुंडी लगाकर बक्से में से आपकी तस्वीर निकाल कर काफी देर रोती रहीं। मैंने झिर्री में से देखा था। अगर बीजी ने शादी पर न बुलाया तो मैं ख़त लिख दूंगी। पापा! आप ज़रूर आ जाना, वरना लोग क्या कहेंगे?
 
पापा, आप हमारे शहर में तबादला क्यों नहीं करवा लेते? भले ही हमारे घर कभी मत आना। हमसे कभी बात मत करना, पर आपकी कुशलता का तो पता चलता रहेगा। पापा! परमात्मा की कसम, आप मुझे बहुत ही प्रिय हैं। क्या ख़त का जवाब देंगे? पापा......? कई बार तो मुझे आप पर बहुत गुस्सा आता है कि बीजी के साथ भले ही आपके लाख गिले-शिकवे हों, परंतु मैंने तो आपका कुछ नहीं बिगाड़ा था। मैं तो आपकी बेटी हूं। फिर भी आपने मुझे कभी याद नहीं किया। कभी मुझसे मिलने भी नहीं आए। कितने निर्मोही हैं आप? परंतु बेटियों को तो सदा माता-पिता की ज़रूरत होती है। मैं कैसे गुज़ारा कर लूं?


       

       पापा, एक बार बस एक ही बार मिलने आ जाईए!
                                              

                                 आपकी बेटी रजनी






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ख़त लिखकर रजनी कई दिनों तक इसी उधेड़बुन में रही कि ख़त पोस्ट करे या नहीं, परंतु एक दिन साहस जुटा कर, धड़कते दिल से वह अपनी बीजी से चोरी-चोरी ख़त डाल आई। खत डालते ही उसे डर सा लगा कि पता नहीं पापा क्या करेंगे। पता नहीं बीजी कितनी गुस्सा होंगी। उसके दिल ने चाहा कि किसी न किसी तरह खत रास्ते में ही गुम हो जाए परंतु फिर भी बड़ी उतावली से ख़त के जवाब का इंतज़ार करने लगी। कभी दरवाज़े पर दस्तक होती, वह चौंक उठती कि कहीं पापा ही न आए हों। कभी कौवा कांव-कांव करता, वह सोचती कहीं उसके पापा के आगमन का संदेसा लेकर आया हो। कभी परात से आटा उछल जाता तो वह एक आदमी के हिस्से की ज़्यादा रोटी बना लेती कि कहीं उस वक्त बनाने में देर न हो जाए।
        
सुबह-शाम दोनों वक्त अब वह घर को झाड़ती-पोंछती रहती। बैठक के भारी पर्दे भी उसने खुद ही घर पर धो डाले कि अगर धोबी समय पर न दे पाया तो? बीजी के बडबड़ाने के बावजूद वह नया टी सेट ले आई।

       
सोते-सोते नींद में उसे सपना आता कि सोने की बग्घी में बैठकर उसके पापा आए हैं। उसके लिए बहुत से रेशमी कपड़े, मोतियों का हार, सुंदर किताबें लाए हैं। कभी सपना आता कि उन्होंने दो सिपाहियों को हुक्म दिया है कि इस लड़की ने मेरी नींद ख़राब की है, ले जाओ इसे पकड़ कर। कभी वह बहुत खुश होती और कभी बहुत बेचैन।
        
इंतज़ार करते-करते एक दिन कॉलेज में उसके नाम ख़त आया। खत थामते ही उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। छुट्टी लेकर वह घर आ गई। बीजी स्कूल गई हुई थीं। जल्दी-जल्दी उसने ख़त खोला। लिखा था.....

         
प्यारी बेटी रजनी,

तुम्हारा खत मिला। बेटी, तुम मुझे बेहद प्रिय हो। तुम्हारी याद भी बहुत आती है, पर रानी बिटिया, तुम मेरी मजबूरियों को नहीं समझती, तभी तो शिकवे करती हो।

कुछ गलतफहमियों या दुर्भाग्य के कारण ही तुम्हारी बीजी और मेरी राहें अलग हो गईं। तुम्हारी बीजी चली गई। शायद नाराज़ होकर। वे तुम्हें भी साथ लेती गईं। जब गुस्से-गिले की गर्मी दिमाग से उतरी तो मुझे पता चला कि मेरी दुनिया सूनी हो गई थी। मैं बहुत दुखी हुआ। एक-दो व्यक्तियों की मार्फत् तुम्हारी बीजी को संदसे भेजे कि गुस्से-गिले भूलकर लौट आएं। उन्होंने औरतों वाली ज़िद ठान ली और चाहते हुए भी मैं उन्हें खुद लेने नहीं जा पाया। फिर नफ़रत बढ़ती गई और अंतत: मेरे घर वालों ने दूसरी शादी के लिए ज़ोर डाला। इस प्रकार मुझे तुम्हारी नई बीजी के घर वालों से कुछ वादे भी करने पड़े। 

बड़ी अच्छी हैं तुम्हारी ये बीजी। मैं उनके साथ दगा नहीं कर सकता। मैं उस महिला का बहुत ऋणी हूं। वे मेरी मुश्किलों को समझती हैं और मुझे सहारा देती हैं। मैं कभी उसे दुख पहुंचाने वाला काम नहीं कर सकता।इस तरह के और ख़त लिखकर तुम परेशान मत करना और न ही अपनी बीजी से उनकी पिछली ज़िंदगी के बारे में पूछ-पूछ कर उन्हें दुखी करना।

हां, तुम्हारी शादी के बारे में उन्होंने कह दिया है कि मैं चला जाऊं। जो भी सामर्थ्य हो, कुछ दे आऊं। परंतु केवल एक बार। अत: बिटिया, मैं तुम्हारी शादी पर ही आऊंगा।   


          

            ढेर सारे प्यार सहित,

                                  तुम्हारा पापा
                                           
                                       
    
ख़त पढकर एक बार तो रजनी की रुलाई फूट पड़ी, परंतु फिर वह मुस्करा उठी। उस शाम बड़े ही चाव से उसने अपनी बीजी से पूछा, बीजी आप मेरी शादी कब करेंगी?’

बीजी पल भर के लिए आश्चर्य से उसे निहारती रहीं और फिर हंस पड़ी।



   पंजाबी से अनुवाद - नीलम शर्मा 'अंशु'
   साभार - जनसत्ता, कोलकाता।


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2 टिप्‍पणियां:

  1. क्या लिखूँ कुछ समझ नहीं आ रहा। बहुत ही संवेदनशील कहानी। अनुवाद कर हम लोगों तक पहुंचाने के लिए आभार।

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