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बुधवार, मई 18, 2011

धारावाहिक बांग्ला उपन्यास - 5

 
(प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम से उनका लेखन जन-जन तक पहुंचे।)
गोधूलि गीत

0 समीरण गुहा

      बंबई की ट्रेन जब हावड़ा स्टेशन के नौ नंबर प्लैटफॉर्म पर रुकी तब पौने तीन बजे होंगे।  ट्रेन सात घंटे लेट थी। देश की एक मशहूर ट्रेन का अगर यह हाल है तो और क्या कहा जा सकता है। फिर भी कहना होगा, देश महान है। देश उन्नति कर रहा है।
      स्टेशन से बाहर निकल टैक्सी के लिए लाइन में आ खड़े हुए शमीक और चुमकी। उनके आगे साठ - पैंसठ लोगों की लाइन थी यानी टैक्सी मिलने में ज़रा समय लगेगा। शमीक की कमीज़ की पीठ पर कुछ गंदगी लगी हुई थी, उसे हाथ से झाड़कर चुमकी ने कोमल स्वर में जानना चाहा, ‘हम न्युबैरकपुर कैसे जाएंगे? मतलब ये टैक्सी मिल जाने के बाद फिर चढ़ने-उतरने का चक्कर तो नहीं है?’
‘चढ़ना-उतरना मतलब सियालदह स्टेशन पर टैक्सी छोड़ वहाँ से हम लोकल ट्रेन पकड़ न्यु बैरकपुर पहुँच जाएंगे। स्टेशन से लगभग सटा हुआ हमारा घर है।’
      ‘टैक्सी से ही क्या नहीं जाया जा सकता?’
 शमीक ने मासूमियत से हँसते हुए कहा, ‘क्यों नहीं जाया जा सकता? बहुत किराया लग जाएगा।’
      ‘अरे भई जो लगेगा सो लगेगा। डेढ़ सौ, दो सौ, तीन सौ रुपए - तुम्हें वह सब फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं।’ बरसात में मोर जिस तरह पंख फैलाकर नाच उठता है उसी तरह होठों पर मुस्कान बिखेरते हुए चुमकी ने कहा, ‘आते समय पिताजी ने कितने रुपए दिए हैं पता है? सुनकर तुम अनायास मुझे लेकर भाग सकते हो। भागोगे क्या? माता-पिता ने तुम्हें एक अच्छा मौक़ा .......’ गंगा से बहती आ रही हवा में चुमकी के चिकने और कोमल बाल उड़ रहे थे। उन्हें संभालते-संभालते वह अपनी रसिकता में बहती चली। लाइन में खड़े लोग जींस और शर्ट पहने, खुले बालों वाली बाला की उन्मुक्त हँसी की आवाज़ सुनकर कौतुहलवश उधर ही देखते रहे। ऐसी उन्मुक्त हँसी वाली लड़की की तरफ देखे बिना भला रहा जा सकता है? हमेशा प्रेमी की निगाहों से ही देखा जाए, इसका क्या मतलब है?
     शमीक ने पूछा, ‘कलकत्ते में क़दम रखते ही तुम्हारी हँसी बहुत बढ़ गई है। तुम्हें क्या कोई विशेष मुक्ति पत्र मिला है?’
      ‘ये जो तुम्हें पल्लू से बाँध रखने का मुक्ति पत्र।’ 
‘जींस की पैंट में पल्लू है कहाँ?’ शमीक ने हैरान होकर पूछा।
      ‘हाँ, सही कहा तुमने। फिर एक ज़ोरदार ठहाका। उस ठहाके को सुनकर अस्वभाविक रूप से लेट ट्रेन के यात्री लाइन में लगे टैक्सी मिलने में हो रही देर से तनिक भी विरक्त नहीं हुए।  ठहाका लगाने वाली की तरफ वे देखे जा रहे हैं। शमीक की पीठ पर उंगलियां चुभोते हुए चुमकी ने कहा, ‘मुझे लेकर भागने का क्या हुआ? ऐसा मौक़ा भला कोई छोड़ता है?’
      ‘मैं छोड़ता हूँ।’
      ‘तुम तो नीतिबागीश हो!’ खिलखिला कर हँस पड़ी चुमकी। उसके बाद आवाज़ को मोटा करते हुए पुरुष की भंगिमा में बोली, ‘विश्वास, मर्यादा, शालीनता-सभ्यता, नीति और आदर्शों के फेस्टून सीने से चिपका सर ऊँचा उठाकर घूमना ही तो पसंद करते हो तुम। धत्त, तुम्हारे साथ कौन भागना चाहेगा? तुम्हारे साथ भाग कर कोई सुख नहीं है। मन की गहराई में कोई हिलोर ही नहीं उठती।’
      लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। चुमकी और शमीक से आगे लगभग पंद्रह लोग थे।  कितनी टैक्सियां चैनल में घुस रही हैं कितनी नहीं, उस पर नज़र रखे हुए भी वह उन्मुक्त मज़ाक के लहज़े में बोल उठा - ‘भागने की क्यों पड़ी हुई है? कितनों के साथ भागोगी? इसके बाद सुनील शिवलकर तुम्हारे पाँवों में लोहे के जूते पहना देगा।’
      ‘वेल सेड शमीक, वेल सेड। ठीक कहा किंतु...’ चुमकी ने दबे स्वर में कहा, ‘अगर मैं तुमसे प्यार कर पाती तो कौन मेरे पाँवों में बेड़ियां डालेगा और कौन लोहे की जंजीरों वाले जूते पहनाएगा इसकी परवाह ही नहीं करती।  लेकिन.... बताओ तो मैं क्यों तुम्हें चाह नहीं सकी?’
      ‘क्योंकि मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ।’
      ‘धत्त। प्रेम, चाहत...’ चुमकी इतना ही कह पाई थी कि शमीक ने उसे आगे करके सामने खड़ी टैक्सी में धकेल कर कहा, ‘प्यार को रहने दो, पहले चढ़ लो।’ और टैक्सी ड्राइवर गंतव्यस्थल का नाम सुनते ही खुशी से स्पीड बढाकर हावड़ा ब्रिज अर्थात् रवीन्द्र सेतु के लगभग बीचोबीच पहुँच गया। गंगा की तेज़ ठंडी हवा में पीछे वाली सीट पर टेक लगाते हुए शमीक ने नए सिरे से पूछा, ‘हाँ, प्यार और चाहत की क्या बात कर रही थी?’
      ‘कहना चाह रही थी कि प्यार और चाहत में कौन कितना योग्य है यह बड़ी बात नहीं होती।’ चुमकी ने स्पष्ट कहा, ‘तुम्हारी ऑंखें, नाक और ठुड्डी बहुत हद तक मेरे पिताजी जैसी हैं, इसीलिए तुमसे कभी मुहब्बत नहीं कर पाऊंगी। तुम मेरे दोस्त ही बने रहोगे। पिता-पिता जैसा व्यक्ति ख़ैर दोस्त भी नहीं हो सकता - लकिन मैं तुम्हारी इज्ज़त करती हूँ तुम्हारे बड़े बनने की आकांक्षा को देख।’
      महात्मा गाँधी रोड के विशाल ट्रैफिक जाम में गाड़ियों के निर्जीव से खड़े हो जाने पर भी शमीक को कोई जल्दबाजी नहीं है। टैक्सी की खिड़की से सिर निकाल कर वह अपने कलकत्ता शहर को देख रहा है। अपने शहर को देख रहा है। यह इलाका उसका बहुत परिचित हो ऐसी बात भी नहीं है। यहाँ ज्यादा से ज़्यादा वह चार बार आया होगा फिर भी आज घर लौटने की खुशी में सारा शहर ही बहुत अच्छा लग रहा है। दिल में घर पहुँचने की जल्दी हमेशा से ही थी। इतने दिनों बाद घर लौटने पर वह जल्दबाजी न रहे, ऐसा हो सकता है क्या? मां, नानू और सेवा को तो उसके आने का पता ही नहीं। अचानक पहुँचने पर कितनी खुशी होगी। शमीक उसी खुशी की तस्वीर दिल में बना रहा था।
      एयरपोर्ट को दाहिनी तरफ छोड़ टैक्सी जशोर रोड की तरफ सीधे दौड़ रही थी। चुमकी ने हँस कर जानना चाहा, ‘तुम लोग क्या पृथ्वी के अंतिम छोर पर रहते हो?’
      ‘लगभग !’ शमीक ने बहुत धीमे से कहा, ‘कलकत्ता खत्म। अब उत्तर चौबीस परगना शुरू हो गया। ये सब भी कलकत्ता ही है - तुम तो कलकत्ता समझती हो बालीगंज और जादबपुर को।’
      ‘मैंने कम से कम यहीं तक क़दम रखे हैं और इतना ही जानती हूँ।’
      अचानक याद आ जाने की भंगिमा में उसने एक ही सांस में कहा, ‘शमीक इस बार मुझे चिड़ियाखाना दिखाओगे? इतनी जगहों के होते सिर्फ़ चिड़ियाखाना?’ शमीक को ज़रा हैरानी हुई।
      ‘तुम दिखाओगे या नहीं, बोलो?’ कहकर ही हंस पड़ी चुमकी। कानो में कहने के अंदाज़ में फुसफुसाते हुए बोली, ‘जानते हो सुनु मौसी के घर पर हमारी ही उम्र का एक लड़का है। उसका नाम मुझे याद नहीं रहता। पर मैं मन ही मन उसे भैबलाकांत कहती हूँ। जानते हो क्यों?’  अचानक ज़ोरदार ठहाका लगाते हुए लगभग शमीक पर गिर ही पड़ी चुमकी। ‘एक बार मुझे याद ही नहीं आ रहा था कि मैंने चप्पलें कहाँ खोली थीं और मेरी चप्पलें कहाँ हैं,                                                                         कहाँ है शोर मचाने पर वही पढ़ा लिखा लड़का भैबलाकांत हाथों में चप्पलें उठाए आया और मेरे पैरों के सामने टिका दीं। उसी भैबला से अगर एक बार चिड़ियाखाने चलने की बात कहूँ तो उसे तो मानो स्वर्ग ही मिल जाएगा बल्कि......’ बात पूरी ही नहीं कर पाई चुमकी। हँसते-हँसते बुरा हाल था उसका।
       ‘इसमें ऐसी क्या बात है? शमीक चुमकी की ऑंखों की तरफ देखता ही रहा।
      ‘यहाँ तक कि बाघ के खाली पिंजरे में अगर भैबला को ही बाघ बनने को कहूँ तो भी वह खुशी-खुशी तैयार हो जाएगा।’  ऑंखों के दोनों कोणों को नचाते हुए चुमकी बोल उठी, ‘हाँ तुम्हें इतना करने की ज़रूरत नहीं है। सिर्फ़ ले चलना। अच्छा शमीक.....’
       ‘कहो।’
      ‘तुम्हारे घर पर तो सूचित नहीं किया गया है। मुझे देखकर कोई पत्नी तो नहीं समझ बैठेगा न?’
      ‘मेरी पत्नी जींस और शर्ट पहने नहीं होगी इस बात से न्युबैरकपुर के विज्ञान घोष इलाके के सारे लोग परिचित हैं। मैं ठहरा कलमी साग, आलू के छिलके के पकौड़ों के साथ लाल चावलों का भात खाने वाला लड़का। घुटनों तक ऊंची साड़ी पहने बुरी तरह भीग कर तालाब - तालाब घूमकर ‘शैपला’ तोड़ने वाली लड़की होगी मेरी पत्नी।
       ‘नागपुर में पता ही नहीं चला कि तुम इतने रोमांटिक भी हो.!’
      ‘मैंने भी नहीं सोचा था कि तुम इतनी आसानी से ज़मीं पर उतर आओगी।’ उसके बाद ही शमीक ने भारी आवाज़ में कहा - ‘ये देखो चुमकी आम के पेड़ के बीच की खाली जगह पर हमारा छोटा सा घर नज़र आ रहा है। सफेद पोशाक पहने रस्सी पर जो कपड़े सूखने डाल रही हैं, वे मेरी माँ हैं।’
      घर के सामने टैक्सी रुकते ही अंजली ने मुड़ कर देखा। शमीक तब तक उतर चुका था।  खुशी से ‘नानू, सेवा जल्दी आओ’ कह कर आवाज़ देते हुए अंजली लगभग दौड़ती हुई बेटे की तरफ बढ़ीं। खुद शमीक ने भी दौड़ते हुए आकर माँ को गोद में उठा लिया। ‘भईया तुम।’ कहते हुए नानू और सेवा भी तालाब में छलाँग लगाने की भाँति माँ और भाई पर गिर पड़ीं। परिणाम जो होना था वही हुआ। एक दूसरे से लिपटे हुए परिवार के चार सदस्य ऑंगन में लोट-पोट हो रहे थे।
      अपनों से, प्रिय व्यक्तियों से मिलन का यह रूप पहले कभी नहीं देखा था चुमकी ने।  स्नेह और ममता मिश्रित ऐसी तस्वीर की उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। ऑंखों में ऑंसुओं की बूंदे झिलमिला रही थीं। खुद को संभाल लिया चुमकी ने।
      अंजली ने भी खुद को संभाल लिया। इक्यावन वर्षीया शुभ्रता की प्रतीक उस प्रौढ़ महिला ने अब अपने सामने खड़ी लड़की की तरफ देखा, फिर शमीक की तरफ देखा तो मुस्कुराते हुए शमीक ने कहा, ‘माँ, ये चुमकी है!’
      ‘और बताने की ज़रूरत नहीं।’
      तब तक चुमकी ने झुक कर उनके चरण स्पर्श किए ही थे कि उसे सीने से लगाते हुए अंजली रो पड़ीं। रूँधे स्वर में ही कहा, ‘तुम्हारे पिता, तुम्हारे परिवार ने हमारे पूरे परिवार को बचा लिया। अरुण गांगुली न होते तो... कहाँ-कहाँ बिखर गए होते हम। ज़िंदगी से ही खो गए होते।  नानू, सेवा की पढ़ाई बंद हो गई होती। भविष्य में घर-घर काम करने वाली लड़कियों की संख्या में दो और लड़कियों की बढ़ौतरी हो गई होती। तुम लोगों ने ही हमें जीवनदान दिया है। कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मेरे पास आज शब्द नहीं है। तुम्हारे पिता हमारे लिए इंसान के रूप में देवता हैं।’
शर्म से ज़मीन में गड़ी जा रही थी चुमकी।  फंसी हुई आवाज़ में उसने कहा, ‘जो भी किया है, पिताजी ने किया है। अत: पिता जी के कृतित्व का श्रेय कृपया मुझे मत दें। मैं भी आपकी सेवा और नानू जैसी एक बेटी ही हूँ।’
      नानू और सेवा की ऑंखों में खुशी चमक रही थी। दोनों मासूम किशोरियां मानों चुमकी की इसी एक बात से पराजित सी हो गईं। उनके स्वत:स्फूर्त व्यवहार से ही स्पष्ट था कि चुमकी ने उनका दिल जीत लिया है। चुमकी की कमर से लिपट नानू और सेवा जैसे ही उसके सीने से लगीं नागपुर निवासी ने दोनों बाँहें फैला कर उन्हें आलिंगन में ले लिया।
     शमीक के घर के ठीक पीछे एक बहुत बड़ा तालाब है। स्वच्छ पानी। पक्का बना घाट।  विज्ञान घोष के निवासी यहीं स्नान करते हैं।  नागरिक समिति ने एक नोटिस लगा रखा है, यह तालाब आपका है। इसे साफ़-सुथरा रखने की जिम्मेदारी भी आपकी है। तरह-तरह से तैरते हुए उसी तालाब में उछल-कूद कर रहा है शमीक। नानू, सेवा और चुमकी किनारे पर बैठी देख रही हैं।  दो बार तालाब के बीचो-बीच तैरते हुए पक्के घाट के पास आकर शमीक ने खुद को डुबो दिया।
      चारों तरफ अब शाम गहरा रही थी। कृष्णचूड़ा और राधाचूड़ा वृक्षों की गहरी परछाई पानी पर भी पड़ रही थी। रेल गाड़ियों की आवाजाही से पानी में मछलियों की उछल-कूद भी कई गुणा बढ़ जाती है। घाट पर उस समय स्नान करने वालों की तादाद बहुत ही कम थी। शमीक ने मुँह से फव्वारे की तरह पानी फेंकते हुए कहा, ‘चुमकी पोखरी में नहाओगी?’                                                                                             
      ‘मुझे तैरना जो नहीं आता।’ नानू और सेवा की तरफ देखते हुए चुमकी ने शर्माते हुए हँसकर कहा। ‘जो काम न आता हो वहां मैं कभी बहादुरी नही दिखाती।’
      ‘तुम डूबोगी नहीं इतना कह सकता हूँ। आओ। और अगर सीखने की इच्छा हो तो दो दिन भी नहीं लगेंगे।’ इसके बाद शमीक ने प्यार से धौंस लगाई बहनों को। ‘क्यों री नानू, ओ सेवा तब से मंद-मंद मुस्कराए जा रही हो। कह नहीं सकती, भईया की पीठ पर चढ़ हाथ-पाँव मारते हुए सिर्फ़ दो घंटों में तैरना सीख लिया था। बताओ तो सही चुमकी को।’
      ‘बताने-वताने की कोई बात नहीं, मैं तैराकी नहीं सीखने वाली।’ थोड़ा ज़ोर से ठहाका लगाते हुए चुमकी ने कहा, ‘अब मैं जाकर बाथरूम के चौबच्चे में तैरूंगी।’ कहकर चुमकी नानू और सेवा को ले उठ खड़ी हुई। फिर शमीक से कहा, ‘और नहीं, बहुत हो गया स्नान। अब निकलो पानी से।’
      लगभग शाम के समय दोनों खाना खाने बैठे। भले ही नानू और सेवा दोनों को घेरे हुए थीं पर खाना परोस रही थीं अंजली ही। सुबह जगते ही क्या सोचा था कि आज इस तरह बेटे को बिठाकर स्नेह-ममता से खाना खिलाएंगी। आज की यह अकस्मात उपलब्धि बहुत ही अनमोल है।  क्या इसे कह कर अभिव्यक्त किया जा सकता है? अंजली ने जो परोसा उसमें था, बक फूल के पकौड़े, मसूर की दाल, गंधराज नींबू, आलू, कद्दू, करेले, प्याज की चड़चड़ी और पिसी सरसों वाली मछली का शोरबा। शमीक और चुमकी दोनों को जबर्दस्त भूख लगी थी यह उनको खाते देख ही समझ आ रहा था। अंजली चुमकी की थाली में और भात तथा मछली का शोरबा परोसने लगी तो चुमकी ने मना कर दिया। साफ़-साफ़ कहा - ‘एकदम अच्छी तरह पेट भर गया है। और नहीं।  कल दोपहर को भी ऐसा ही खाना खाने के बाद ही जादबपुर के लिए रवाना होऊंगी।’
      अंजली ने मृदु मुस्कान से कहा, ‘तुम यहाँ ठहर कर और खाओ न, बेटा तुम्हें किसने रोका है? यह सब तो तुम लोगों का ही दिया हुआ है।’
     ‘आप बार-बार ऐसी बातें मत कीजिए।’ शर्म से लाल होते हुए किसी तरह चुमकी ने जवाब दिया। ‘अरी नानू, सेवा तुम दोनों मुँह उठाए चुपचाप क्या सुन रही हो? दीदी की हिमायत नहीं कर सकती? बेटी के समक्ष क्या माँ को इस तरह कृतज्ञता जतानी चाहिए? बोलो तुम दोनों?’
     ‘बेटी अगर इस लायक हो तो किया ही जा सकता है।’ और सांवली रंगत वाली अत्यंत बुद्धिमति नानू ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘इससे बेटी का मान बढ़ता ही है। और बेटी को सही मर्यादा मिलती है।’
      ‘और इसमें तो माँ की आंतरिक संतुष्टि छुपी होती है। इसे दबाना ठीक नहीं।’ गोरी रंगत, गोलमटोल और चपटी नाक वाली सेवा के इतना कहते ही चुमकी बोल उठी, ‘अच्छे गवाह चुने मैंने। तुम सब मिल कर मुझे अकेली पाकर मेरी ऐसी की तैसी कर रहे हो। चलो एक बार हमारे नागपुर के कोराडी में। संतरों में बिठाकर तुम लोगों को अगर सड़ा नहीं दिया तो फिर चुमकी मेरा नाम नहीं।’ फिर तिरछी नज़र से शमीक की तरफ देख भरपूर नज़रों से अंजली की तरफ देखा.  हँसते हुए पूछा, ‘मासी माँ, कल आप मुझे एक चीज़ खिलाएंगी?’
      ‘क्या खाओगी बोलो।’ अंजली खुशी से मदमस्त होकर चुमकी की तरफ देखती रहीं। चुमकी को कुछ कहते न देख, नानू, सेवा दोनों ने कहा, ‘क्या खाओगी बोलो?’
      ‘कलमी साग और शापला.  क्या मुझे पोखरी से शापला लाना होगा? ’
      ‘अरे ! कैसी बात करती हो? तुम क्यों शापला लाने जाओगी? ’ अंजली हैरानी से अपनी दोनों बेटियों की तरफ देखती रही। दरअसल वे समझ नहीं पाईं कि शापला खाने के इज़हार के साथ उसे लाने का क्या संबंध है।  ज़्यादा कुछ समझने की कोशिश न करते हुए उन्होंने सहज स्वर में कहा - ‘हमारे स्टेशन के बाज़ार में भला शापला की कोई कमी है? कल दोपहर को ही तुम्हें इसकी पातुरी बना कर खिलाउंगी।’
      गर्दन झुकाए मंद-मंद मुस्कराती रही चुमकी। बाद में धीमे-धीमे स्वर में रुक-रुक कर कहा, ‘कल मैं जींस या सलवार कमीज़ नहीं पहनूंगी। नानू की साड़ी ज़रा ऊंची करके पहनूंगी और आपके साथ रसोई के काम में लग जाऊंगी। और मासीमां आपको भी आप-आप कहकर नहीं बुलाउंगी। तुम ही कहूंगी, ठीक है न?’  (बांग्ला भाषा में अपनत्व से बड़ों को भी तुम कह कर संबोधित करते हैं)।
      ‘ठीक है इसमें संकोच की क्या बात है?’ अंजली ने अगाध स्नेह से जवाब दिया, ‘तुम्हारा जैसे जी चाहे वैसे ही बुलाना लेकिन रसोई के काम में क्यों लगोगी बेटी? दो दिनों के लिए आई हो, हंसो, खेलो, घूमो। इसीमें मुझे खुशी होगी।’
      शाम के बाद चुमकी जल्दी मचाकर नानू, सेवा और शमीक को ले निकल पड़ी.  उद्देश्य था ज़रा न्युबैरकपुर घूमना। चुमकी के भीतर एक इच्छा और सिर उठा रही थी। यहाँ वह सब मिल जाए तो अच्छी बात है वर्ना बालीगंज, जादबपुर या न्युमार्केट से ही खरीददारी निपटा लेगी।  स्टेशन रोड की तरफ थके-थके क़दमों से घूमने निकली चुमकी एक बार तो बोल ही उठी, ‘मैंने नानू को साक्षी रखा, मासीमां का इस तरह बार-बार कृतज्ञता व्यक्त करना ठीक नहीं है। अरे! वह लड़की उल्टे मुझे और भी गौरवान्वित कर बैठी। माँ के सिंहासन पर माँ को तो रखा ही। तुम तो बहुत ही सजग और तीक्ष्ण बुध्दि वाली हो नानू। तुम तो साहित्य की छात्रा हो न? स्वभाविक है।  मैं कहती हूँ तुम ज़रूर कॉॉलेज की मास्टरनी बनोगी और ये सेवा, सेवू दीदी तुम भी कम हाज़िर जवाब नहीं हो।’
      न्युबैरकपुर जैसे उपनगर में इतनी बड़ी-बड़ी एवं चकाचौंध वाली हर तरह की दुकानों, शो रूम आदि को देख बहुत मुग्ध हुई चुमकी। रौशनी से जगमगाती साड़ी और कपड़े-लत्ते की एक बड़ी दुकान में प्रवेश कर चुमकी ने राजसी अंदाज़ लेकिन नम्र स्वर में नानू और सेवा दोनों से कहा, ‘तुम दोनों दो-दो साड़ियां पसंद कर लो। किसी तरह के संकोच का सवाल ही नही। यह याद रखो कि यह सब तुम्हें मैं नहीं दे रही हूँ। यह सब अरुण गांगुली का उपहार है। मैं तो सिर्फ़ निमित्त मात्र हूँ।’ नानू, सेवा के चेहरों पर दुविधा और जड़ता के चिहन् उभरते ही उन दोनों के कंधों पर प्यार से हाथ रखते हुए कहा, ‘यह सब स्वीकार करने पर ही अरुण गांगुली का सही सम्मान होगा। अत: नानू और सेवू दीदी पसंद के लिए अब तुम दोनों तलाश शुरू कर दो। और मैं मासीमाँ के लिए पसंद करूंगी। वे कितने चौड़े बॉर्डर वाली साड़ी पहनती हैं और बॉर्डर का रंग ज़रा मुझे बता देना।’
      चुमकी को देख-देख शमीक हैरान हो रहा था। उसमें इतना बदलाव सोच से परे की चीज़ थी। नागपुर के शुरुआती दिनों की वह जिद्दी, गर्म मिजाज़ लड़की कलकत्ते में क़दम रखते ही बड़ी विनम्र और मृदुभाषी हो गई है कि सोचा भी नहीं जा सकता। नागपुर से ही गुस्से की बर्फ़ पिघलनी शुरू हो गई थी। हाँ, ट्रेन से कलकत्ते आते वक्त मानो उसने एक अज्ञात द्वीप का सिंह द्वार खोल दिया हो। एक ही झटके में एक अज्ञात कहानी का पटाक्षेप कर दिया था। परंतु, अगली सुबह से ही उसने ऊँचे स्वर में बात नहीं की। बिल्कुल सहज और स्वभाविक। ट्रेन में बैठे-बैठे ही शमीक सोच रहा था यह कौन सी चुमकी है? जैसा कि अब न्युबैरकपुर के स्टेशन रोड के एक बड़े से शोरूम में खड़ा चुमकी को देख-देख सोच रहा है यह ममतामयी कौन है? क्या ये नागपुर की चुमकी है?
      शमीक ने दबी हँसी से धीरे से कहा, ‘सबकी खरीददारी हो रही है, मैं ही छूट गया?’
      ‘हाँ अवश्य।’
      ‘मेरा क़सूर?’
      ‘फिर पूछ रहे हो? मेरा गुस्सा मत बढ़ाओ शमीक।’ चुमकी ने खुलकर हँस कर कहा, ‘मेरे गुस्से से परिचित नहीं हो?’
      ‘वह तो नागपुर में। न्युबैरकपुर में? यहाँ बैठ भी मैं तुम्हें बर्बाद कर सकती हूँ। मुझसे डरता न हो ऐसा कोई है? देखा नहीं, सुनील शिवलकर जैसा छैला भी पालतू बिल्ली की भाँति मेरे क़दमों में  घूमता है।’
      ‘मैंने सब देखा है, सब जानता हूँ’। शमीक हँस पड़ा, ‘लेकिन ज़रा सा भी नया धागा न मिलने का क़सूर क्या है, यही तो पता नहीं चला। कम से कम एक गंजी तो खरीद दो।’
      ‘तुम भिखमंगे हो क्या, जो दो-दो लगा रखी है?’ शमीक की ऑंखों की तरफ देखते हुए धौंस दिखाई चुमकी ने। नानू, सेवा को चिंतामुक्त करते हुए बिना किसी दुराव-छिपाव के चुमकी ने बता डाला, ‘तुम्हारे इस भईया के लिए नागपुर का एक सुपर मार्केट ही उठा लाए थे अरुण गांगुली। क्या-क्या नहीं खरीद कर दिया? जूते, मोजे, टुथ ब्रश से लेकर पैंट-कमीज़ यहाँ तक कि सूट भी। और सुनोगी? उस दिन पिताजी ने मुझे एक रूमाल तक खरीद कर नहीं दिया था। वह गुस्सा क्या कभी इतनी आसानी से क़ाफूर हो सकता है? बाहर का लड़का आकर दोनों बाँहे फैलाए चीज़ें ले रहा है यहाँ तक कि लदा हुआ है और मेरा कोटा बिल्कुल खाली। वह नाराज़गी मेरी आज भी बरकरार है।’ चुमकी खिलखिला कर हँस पड़ी। मज़ाक के लहज़े में कहा, ‘नागपुर लौट कर मेरी शिक़ायत करना। उम्मीद है एक सुपर मार्केट और तुम्हारे कमरे में अट जाएगा।’ 
      जैसा होता है वैसा ही हुआ। माँएं साधारणत: जिस तरह कहा करती हैं उससे भी ज़्यादा लज्जा भरे अंदाज़ में अंजली ने कहा - ‘नानू, सेवा के लिए खरीदा ठीक है। इसमें कोई दो राय नहीं, पर बेटा मेरे लिए क्या ज़रूरत थी?’
      ‘मासी माँ, यह मैंने नहीं खरीदा।’ अच्छा ख़ासा रोब जमाते हुए चुमकी बोल उठी, ‘यह अरुण गांगुली ने खरीदा है आपके लिए।’    
      ‘तुम और अरुण गांगुली क्या अलग-अलग हो? देखो तो लड़की क्या कहती है।’
      ‘ऐसा भी नहीं है। यह भी तो सही है मासी माँ हम कितने भी अपने क्यों न हों, हमारे रिश्ते का बंधन कितना भी अटूट क्यों न हो, एक जगह हम सभी एक-दूसरे से भिन्न हैं। पूरी तरह भिन्न।’
      ‘बेटा मैं तो ज़्यादा पढ़ी लिखी नहीं हूँ।  तम सबकी तरह अच्छी तरह बात न कह पाऊँ फिर भी इतना कह सकती हूँ..... ’ इक्यावन वर्षीया सूनी मांग वाली अंजली अत्यंत स्नेहिल स्वर में धीरे-धीरे बोलीं, ‘हम में से कोई भी भिन्न नहीं है बेटा, कोई भी नहीं। भिन्न होता है मन।  मन की इस गर्मजोशी के कारण ही दूर का व्यक्ति क़रीबी बन जाता है। क़रीबी प्रिय व्यक्ति क्रमश: अजनबी होते-होते दूर-दूर चले जाते है। मन को ठीक से वश में कितने लोग रख पाते हैं?  जितनी भी गड़बड़ी है वह इस मन के कारण ही तो है।’
                                                                                                 ......जारी।

बांग्ला से अनुवाद – नीलम अंशु

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,
राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन,
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ से प्रकाशित (2009)।



सोमवार, मई 16, 2011

धारावाहिक बांग्ला उपन्यास - 4

(प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम से उनका लेखन जन-जन तक पहुंचे।)
गोधूलि गीत

0 समीरण गुहा

      इस घटना के बाद से ही शमीक का दिल धीरे-धीरे टूट गया था परंतु असहाय होकर चुपचाप पड़े रहने के सिवा और कोई चारा भी नहीं। अरुण गांगुली के पास जाकर चुमकी के विरुद्ध कुछ कहना उसके लिए संभव भी तो नहीं। यह उसके उसूलों के विरुद्ध है। और फिर इसी पल इस घर को छोड़कर चले जाना भी तो बचकानी हरकत होगी। सबसे बड़ी बात थी, कि अरुण गांगुली को चोट पहुँचाने को जी नहीं चाह रहा था। जो व्यक्ति उससे इतना स्नेह करता है, इतना चाहता है उसे अशांत करके क्या फ़ायदा? और क्या वे बहुत शांति में हैं? दिन भर के बाद नाम के वास्ते घर को आते हैं। परंतु घर के स्नेह की घनी छाया ने उन्हें कभी शीतलता प्रदान नहीं की। कम से कम शमीक ने तो नहीं देखा। समस्या का समाधान जब होना ही नहीं है तो उस व्यक्ति को और तकलीफ़ न देकर खामोश रहना ही बेहतर है। चुमकी जो मर्ज़ी कहती रहे, शमीक अपने असीम धैर्य की परीक्षा देगा। कम से कम अरुण गांगुली के लिए इतना तो उसे करना ही होगा।
      पर कौन किसके लिए करेगा इसका हिसाब-किताब पहले से सोच रखने के बावजूद ऊपर वाले का विधान अलग होता है। अरुण गांगुली के लिए कुछ भी करने को शमीक हमेशा तत्पर रहता है, यद्यपि उसके करने के लिए कुछ है नहीं। अरुण गांगुली ही मन-प्राण से बार-बार तत्पर रहते हैं। एक बार फिर वे आगे आए। सिर्फ़ आगे आना ही नहीं बल्कि शमीक को उन्होंने नई ज़िंदगी दी। 
      काम में डूबे रहने वाले इंजीनियर के रूप में इसी बीच शमीक ने काफी लोकप्रियता  अर्जित कर ली है। श्रमिकों के साथ बराबर रूप से काम करता है। कोई अगर भारी माल उठा नहीं पा रहा है, तो शमीक ने वहाँ भी हाथ लगाया। यहाँ तक कि नेकेड बॉयलर
ऐंगल - बीम के ऊपर से चलकर वहाँ जाकर भी काम-काज देखा। ऐसा ख़तरा मोल लेने को बहुत से इंजीनियरों ने उसे मना किया था। शमीक ने लेकिन उनकी बात नहीं सुनी। लोगों की नज़रों में बड़ा बनने या दिखावे की बात नहीं है - शमीक का यही सीधा-सादा तर्क है कि श्रमिकों की भी तो जान है। वे यदि ऐसा ख़तरा उठा सकते हैं तो वह क्यों नहीं?
      इस बीम के ऊपर से काम-काज देखने जाते समय ही एक दिन पैर फिसल जाने की वजह से शमीक नीचे गिर गया। तीस-पैतींस फुट ऊपर से गिरने के बावजूद कोई ख़तरनाक बात नहीं होती लेकिन उसका सर गैस सिलिंडर के लोहे के कैप से जा टकराया। तुरंत वह बेहोश हो गया और काफी ख़ून भी बह गया।
      पलक झपकते ही भीड़ इकट्ठा हो गई। सारे श्रमिक काम छोड़कर दौड़े आए। जो नीचे थे उन्होंने ही मिलकर उसे गोद में उठा लिया। कुछ गाड़ी बुलाने के लिए दौड़ पड़े। जितनी जल्दी हो सके नागपुर के सदर अस्पताल पहुँचाना होगा।
      अरुण गांगुली अपने चेंबर में डी. ई. एवं सुपरिनटेंडेस के साथ मीटिंग में थे। उन तक समाचार पहुँचते ही वे उठ खड़े हुए। एक डिविज़नल इंजीनियर पर मीटिंग की जिम्मेदारी सौंप गाड़ी ले वे सीधे अस्पताल की तरफ दौड़े।
      बावन घंटे गुज़र चुके हैं। अभी भी शमीक बेहोश है। कल दो बोतल ख़ून दिया गया था।  आज भी हाथ की नस में सैलाइन और नाक में ऑक्सीज़न की नली लिए वह ख़ामोश मौत से जूझ रहा है। 
      सबसे ज़्यादा अरुण गांगुली टूट चुके हैं। लड़का उनके भरोसे ही माँ और बहनों की ज़िंदगी के लिए इतनी दूर आया है और आज वह खुद ही ज़िंदगी के लिए संघर्ष कर रहा है। उसे ठीक होना ही होगा। वर्ना ताउम्र अरुण गांगुली को एक ज़ख्म टीसता रहेगा। विषलेषण कर दूसरों को समझाना संभव नहीं -  दरअसल शुरू से ही शमीक के प्रति उनके मन में लगाव कुछ ज़्यादा ही था। शमीक के चेहरे की तरफ देखते ही अरुण गांगुली कैसे उदास से हो जाते हैं। शमीक को वे औलाद के सिवा कुछ सोच ही नहीं सकते। ये सब युक्ति और तर्क की बातें नहीं हैं - स्नेह और आवेग ने यहाँ रिश्ते को मजबूत बना दिया है। कुछ बुरा न हो उसी उम्मीद से अरुण गांगुली  बावन घंटों से शमीक के सिरहाने बैठे हैं। महाराष्ट्र इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के अन्य अधिकारी और श्रमिक तो हैं ही, बासंती और चुमकी भी हैं। परंतु कोई भी अरुण गांगुली को अस्पताल से एक क़दम भी दूर नहीं हटा पाया। उनकी बस यही एक बात थी, ‘आप सब मुझसे अनुनय न करें। यह सिर्फ़ शमीक ही नहीं मेरी भी ज़िंदगी का सवाल है।’ इसके बाद भी कईयों ने उनसे कहा लेकिन जब उन्हें अस्पताल के केबिन से हिलना ही नहीं तो फिर किसी ने उन्हें तंग नहीं किया।  घर से टिफिन कैरियर में खाना आता। हाँ खाना इतना बेस्वाद लग सकता है यह अरुण गांगुली ने पहली बार महसूस किया।
      कोराडी सुपर थर्मल के जनरल मैनेजर के तौर पर अस्पताल में अरुण को लगभग सभी जानते है। हाँ, डॉ. खादिलकर के साथ उनका रिश्ता दोस्तों जैसा है। दोनों लगभग हमउम्र हैं।   डॉ. खादिलकर ही शमीक को देख रहे हैं।  हालत तीव्रता से बिगड़ती जा रही है। अत: शमीक को इंटेंसिव केयर यूनिट में लाया गया है। डॉक्टरों और नर्सों के चेहरे  की चमक क्रमश: क्षीण होती जा रही है। लेकिन डॉ. खादिलकर दूसरी ही प्रकृति के हैं। अंतिम क्षण तक वे संघर्ष जारी रखते हैं और निराशा नाम का कोई शब्द उनके कोश में नहीं है। अत: वे जिस लगन से कोशिश का संकल्प लिए अग्रसर हो रहे हैं वह कई बार ईश्वर के सम्मान को ठेस पहुँचाती है। ईश्वर से डॉक्टर बड़ा है  - यह एक बार फिर देखने के लिए अरुण गांगुली उम्मीद लगाए बैठे हैं।
      डॉ. खादिलकर जैसे ही बाहर निकले आगे बढ़कर अरुण गांगुली उनके सामने जा खड़े हुए।   कुछ भी नहीं कहा यानी बोल ही नही पाए। डॉ. के दोनों हाथों को थाम सिर्फ़ मूक दृष्टि से देखते रहे। इस वक्त अगर कोई देखे तो यही कहेगा कि अरुण गांगुली नामक व्यक्ति शायद गूंगा है। वर्ना कुछ भी बोले बगैर कोई इस तरह ऑंखों से कहने की कोशिश करता है भला ?
       इन बावन घंटों से चिंतामग्न हैं। अन्य कार्य नियमित रूप से करने के बावजूद मूलरूप से वे शमीक के लिए फ़िक्रमंद हैं। इस थोड़े से समय में उनकी अरुण गांगुली के साथ कई बार मुलाकात हुई है। परंतु वह सिर्फ़ मुलाकात भर ही थी।  इस क्षण डॉ. खादिलकर ने महसूस किया कि अरुण गांगुली काफ़ी वृद्ध हो गए हैं। इन बावन घंटों में यह आदमी बहुत कुछ खो बैठा है।   डॉ. खादिलकर उनकी ऑंखों की तरफ देखते रहे लेकिन बहुत देर तक नहीं। बर्बाद करने के लिए बाद में समय बहुत मिलेगा। उन्होंने सिर्फ़ कहा, ‘खून चाहिए। बहुत! ’
      अरुण अरुण गांगुली ने शांत स्वर में कहा, ‘मेरे शरीर में बहुत खून है डॉक्टर।’ 
      कुछ सोचते-सोचते डॉ. खदिलकर ने कोमल स्वर में कहा- ‘मेरे साथ आईए।’
      बावन घंटों में ये पहली बार अरुण गांगुली निश्चिंत हुए। दरअसल शमीक के ब्लड ग्रुप के साथ अरुण गांगुली के ब्लड ग्रुप मैच हो जाने की खुशी ने उन्हें घेर रखा है। लेकिन ब्लड ग्रुप का मैच हो जाना ही क्या सब कुछ है? हताशा के क्षणों में तिनके का सहारा भी मिल जाए तो उसके सहारे ही इन्सान मंजिल तक पहुँचना चाहता है। अरुण गांगुली के मामले में भी वही बात है। 
      इसके बाद और बानवे घंटे गुज़र गए अर्थात् एक सौ चवालीस घंटों में भी शमीक को होश नहीं आया। डॉक्टर और नर्सों के दल ने मानो इसे एक चुनौती के रूप में लिया हो। सहज ही हार मानने का सवाल ही नहीं उठता। अंतिम क्षण तक संघर्षरत रहने की ठान कर हर कोई एक अदम्य आकांक्षा से मानो कूद पड़ा हो। शमीक को बचाने के लिए नए-नए सोच-विचार और परिकल्पनाओं में डूबे हुए हैं वे सभी,  परंतु अरुण गांगुली की स्थिति कुछ भिन्न है। अस्पताल की चारदीवारी में उन पर क्या गुज़री यह शायद वे खुद भी ठीक तरह से न बता पाएं। शमीक नामक एक लड़के की मंगल-कामना में वे सारी दुनिया को भूल चुके हैं।
      अंतत: वह दिन भी आ पहुँचा। कहा जा सकता है कि एक प्रकाशमय दिन। अस्पताल के एक निर्दिष्ट केबिन में बैठ बड़ी संतुष्टि से दोपहर का भोजन किया अरुण गांगुली ने। सब के साथ हँस कर बात की। अचानक काम की बात याद हो आने पर उपस्थित अधिकारियों को काम के निर्देश दिए। जो श्रमिक डयूटी के बाद भी अस्पताल में शमीक का हाल-चाल पूछने आते उन्हें वे अलग नज़र से देखने लगे। और डॉक्टरों तथा नर्सों के प्रति उनकी कृतज्ञता की तो कोई सीमा ही नहीं।
      कितनी असाधारण कोशिश! निश्चित मृत्यु के हाथों से वे शमीक को लौटा लाए हैं। ऐसे दिन अरुण गांगुली खुश नहीं होंगे तो और कौन होगा। इस खुशी का कोई अंत नहीं। बच्चों की भाँति एक बार तो वे सोच ही बैठे कि आगामी कल अगर पूरे पॉवर प्लांट में छुट्टी दे दी जाए तो कैसा रहे? आवेग की भावधारा से बाहर निकल अरुण गांगुली मन ही मन हँस पड़े। यह कैसे संभव है? फिर डॉ.खादिलकर को देख स्निग्धता से हँस कर कहा, ‘सदा के लिए आपका गुलाम हो गया मैं।’
      ‘प्लीज़ मिस्टर गांगुली, इतना बढ़ा-चढ़ाकर मत कहें।’
      ‘आपने आसाध्य परिश्रम किया है।’
      ‘मेरा तो यही काम है। मरीज़ जब तक अंतिम साँस नहीं लेता तब तक हमें भी साँस लेने की फुर्सत नहीं मिलती।’ ख़ैर जो भी हो, डॉ. खादिलकर ने आत्मीयता से कहा, ‘मरीज़ों के अभिभावक तो इस ज़िंदगी में बहुत देखे हैं लेकिन आप जैसा एक भी नहीं मिला। सचमुच लड़के यानी शमीक के लिए आपने जो किया उसकी कोई तुलना नहीं।’
      ‘सच में क्या बहुत ज़्यादा किया?......’  हँसकर अरुण गांगुली ने कहा, ‘एक इन्सान होने के नाते दूसरे इन्सान के प्रति इतना तो करना ही चाहिए’।
      अस्पताल के कक्ष में तब ढलती शाम की अंतिम रोशनी में शमीक बिस्तर पर लेटा हुआ है। ठीक लेटा हुआ नहीं, अधलेटा सा। आपदा पूरी की पूरी टल गई है। क्रमश: स्वस्थ हो रहा है। कल अरुण गांगुली से सुना था कि अगले हफ्ते उसे छुट्टी मिल जाएगी। अरुण गांगुली नाम याद आते ही अचानक शमीक की ऑंखे भर आईं। कई दिनों से तो वह सुन रहा है। क्या नहीं किया अरुण गांगुली ने? डॉक्टरों और नर्सों ने तो किया ही है लेकिन अरुण गांगुली ने अपना खून देकर संबंधहीन शमीक को असीम ममता से बचाया है, वह सोचने से एक बार क्यों हर बार ऑंखें भर आएंगी। 
      बीते कल अरुण गांगुली शमीक के बिस्तर पर ही बैठे बात-चीत कर रहे थे। उसके सिर पर हाथ फिराकर कहा, ‘तुमने तो ऐसा डरा दिया था कि मैं कुछ भी सोच नहीं पा रहा था।’ 
      शमीक बहुत देर तक उनके मुँह की तरफ देखता रहा। इतना कुछ करने के बावजूद यह व्यक्ति अपने प्रति इतना उदासीन है। बातचीत में भी अपने को ज़ाहिर करने की ज़रा भी व्याकुलता नहीं है। कितने साधारण तौर पर कहा, तुमने तो मुझे डरा दिया था। यानी वे विशेष कुछ कर ही नहीं पाए - सिर्फ़ फ़िक्र में कुछ दिन गुज़ारे हैं।
      धीरे-धीरे शमीक की ऑंखें फिर छलछला आईं। और अंतत: शमीक खुद पर काबू नहीं रख सका। अरुण गांगुली नामक व्यक्ति तब उसके लिए एक देवता समान था। उनके चरणों पर हाथ फिराते हुए श्रद्धानत हो शमीक ने एक ही बात कही, ‘इस जीवन में आपका ऋण चुकाने की बात सोच भी नहीं सकता।’
      दूसरी बार शमीक के सिर पर हाथ फिराया अरुण गांगुली ने। स्नेह से भरे कोमल स्वर  में कहा, ‘तुम मामले को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर देख रहे हो। दरअसल ऐसा कुछ भी नहीं है। मेरा बेटा होता तो भी इतना सा काम तो मैं ही करता न। तुम मेरे बेटे नहीं हो, इसलिए नहीं करूंगा। ऐसा हो सकता है भला?’
      अस्पताल के बिस्तर पर लेटे-लेटे शमीक बहुत कुछ सोच रहा था। बीमारी की हालत में माँ की बहुत याद आती है। नानू और सेवा के लिए भी कभी-कभी दिल में हूक सी उठती है। ऑंखें बंद कर उनके बारे में सोचते वक्त बहुत बार ऐसा महसूस होता है मानो ऑंखें खोलते ही उनको सामने पाएगा। ये बचकाने सोच-विचार शमीक को कभी हँसाते है तो कभी रुलाते हैं।
      अरुण गांगुली आए। उनके पीछे-पीछे बासंती और चुमकी भी। तीनों को इकट्ठे देखकर शमीक को बहुत खुशी हुई है, यह उसके चेहरे से ही स्प्ष्ट है। खुशी में वह बिस्तर पर उठ बैठा।  और तुरंत चुमकी की डाँट भी खाई।
      ‘तुम्हें उठने की कोई ज़रूरत नहीं। लेटे रहो।’  
‘सारा दिन तो लेटा ही हुआ था।’
      ‘और लेटे रहकर विश्राम करना होगा।’ चुमकी ने एक सूक्ष्म व्यंग्य सा करते हुए कहा, ‘पूरी तरह विश्राम लेने की ही तैयारी थी तुम्हारी। तुम्हें किसने कहा था उन पतले-पतले बीमों पर चलकर काम-काज देखने को? या ट्रॉपिज का यह खेल न दिखाने पर तुम्हें वेतन नहीं मिलने वाला था? किसी और इंजीनियर ने हद से बाहर ऐसा किया?’                    
      ‘हद से बाहर?’
      ‘और नहीं तो क्या?’
      ‘अपने काम के प्रति ईमानदार होना अगर हद से बाहर जाना है तो -’
      ‘रहने दो, ईमानदारी की बातें और मत करो।’ चुमकी सहजता से ही कहने लगी, ‘पॉवर प्लांट में मैं कभी गई नहीं क्या। पिता जी के अतिरिक्त दूसरा कोई और ईमानदार व्यक्ति मेरी नज़र में नहीं आया। लेकिन क्या वे लोग काम नहीं करते? ज़रूर करते हैं। वर्ना कोराडी सुपर थर्मल का काम आगे कैसे बढ़ रहा है? मेरे कहने का मतलब है शुरू से ही काम का इतना दबाव लेने की ज़रूरत क्या है? चार उंगली चौड़े बीम के ऊपर से जाने पर भी तनख़्वाह मिलेगी, नहीं जाने पर भी मिलेगी। महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रीसिटी बोर्ड तुम्हें इसके लिए अतिरिक्त तनख़्वाह नहीं देगा’।
      चुमकी की हर बात बड़े ध्यान से सुनी शमीक ने। दरअसल आज वह चुमकी का दूसरा ही  रूप देख रहा था। आज उसकी किसी बात ने चोट नहीं पहुँचाई। जो भी कहा है सब शमीक की भलाई के लिए ही। ऐसी मुसीबत भविष्य में फिर कभी न आए इसीलिए तो इतना सब कहा है।  शमीक ने अब चुमकी को एक नई दृष्टि से देखना शुरू किया। उसके रूखेपन की ओट से ऐसा एक हृदय निकल कर सामने आएगा यह तो कल्पना से परे की बात थी। उसके भीतर यह जो ममता समाई हुई है क्या इसे ज़्यादा दिनों तक समेट कर नहीं रखा जा सकता?
शमीक चुमकी के मुँह की तरफ देखता ही रहा। लड़की आज सचमुच बहुत ज़्यादा अनुभूतियों के साथ आगे बढ़ी है। फिर भी शमीक को आशंका है शायद अब चुमकी पहले वाली चुमकी में बदल जाए, शायद अब आक्रमण कर बैठे। पर नहीं।  वैसा कुछ भी नहीं हुआ।   चुमकी प्यार से मुस्कराई। कोमल स्वर में बोली, ‘सुना है थोड़ा सा और स्वस्थ्य होते ही तुम फिर साइट पर दौड़े जाओगे। वो सब छोड़ो। एक महीने से पहले तुम घर से नहीं निकलोगे, याद रखना।’ 
      इन्सान में लालच बहुत बुरी चीज़ है। थोड़े में संतुष्ट ही नहीं होना चाहता। चुमकी की बातों ने आज बार-बार शमीक के मन को छू लिया। अत: वह और देखना चाहता है, सुनना चाहता है, इसके बाद चुमकी और क्या-क्या कह सकती। शमीक ने एक गहरी उम्मीद से कहा, ‘अभी तो मैं ट्रेनी हूँ। इतनी छुट्टियां जब नहीं मिलेगीं तो साइट पर तो जाना ही पड़ेगा।’
      ‘तुम जाकर तो देखो, बताती हूँ।’
      ‘तुम तो मेरी बॉस नहीं हो।’
      ‘तो क्या हुआ?’ चुमकी हँस पड़ी। ‘किसकी बेटी हूँ कम से कम यह तो तुम्हें याद रखना चाहिए।’ ऐसा कहते समय चुमकी ने एक बार पिता की तरफ देखा तो अरुण गांगुली ज़रा सा हँसे। वह शमीक की नज़रों से नहीं छुपा। मानसिक शांति की एक शीतल बयार ने इस समय उसे तृप्त कर दिया। ऐसी हँसी अरुण गांगुली हमेशा क्यों नही हँसते? शमीक की ऑंखें हर क्षण इसी तस्वीर को तलाशती फिरती हैं।
            अरुण गांगुली को आज हुआ क्या? गंभीरता की दीवार को तोड़ वे क़दम - दर - क़दम आगे बढ़े। शमीक की ऑंखों की तरफ देख एक बार चुमकी की मुँह की तरफ भी देखा। शांत स्वर में कहा, ‘चुमकी ने कुछ ग़लत नहीं कहा। छुट्टी के मामले में तुम्हें फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं। और यह तो एक्सीडेंट का मामला है। बोर्ड के नियमानुसार तुम्हें सभी सुविधाएं मिलेंगी। ऐसे में कौन ट्रेनी है और कौन सीनियर, ऐसी कोई बात ही नहीं है।’ थोड़ी देर चुप रहकर अरुण गांगुली ने फिर कहा, ‘तुम क्यों इतनी फ़िक्र करते हो? मैं तो हूँ न।
वह सब मुझे सोचने दो।’
      फिर भी शमीक पता नहीं क्या सोच रहा था। समय समाप्त हो गया था। वे लोग अब उठेंगे। शमीक मन ही मन खाली-खाली सा महसूस करने लगा। यद्यपि वे लोग कल फिर आएंगे।  कलकत्ते से आते वक्त भी ऐसा ही हुआ था। नानू, सेवा और माँ की रुलाई को याद कर सारा रास्ता वह भी रोता रहा था। 
      ‘इतना क्या सोच रहे हो?’ उठते समय बासंती ने स्नेहपूर्वक जानना चाहा।
      ‘कल आप लोग आएंगे तो न?’
      ‘क्यों नहीं आएंगे?’ बासंती ने मुस्करा कर कहा, ‘तुम जब तक यहाँ हो, हम रोज़ आएंगे।’
      ’कल आते वक्त....’ अचानक शमीक रुक गया।
      आते वक्त क्या ?  बासंती ज़रा हैरान होकर शमीक के मुँह की तरफ देखती रहीं.
      शमीक ने बहुत धीमे से कहा, ‘मेरे कमरे के टेबल पर माँ, नानू, सेवा की तस्वीरें हैं। कल यदि उनको लेते......’
      ‘ज़रूर लाऊंगी।’
      चुमकी ने कहा, ‘जी भर कर देखना। कॉलेज से सबसे पहले मैं ही यहाँ आऊंगी। मेरे साथ तस्वीरें होंगी। खुश हो तो।’
      पत्नी और बेटी की बात-चीत में अरुण गांगुली ने खुद को लगभग सिकोड़ रखा था। उन दोनों ने शमीक के साथ इतनी अच्छी तरह बातें करके उसे अपना बना लिया था। इस समय कौन कहेगा कि शमीक एक बाहरी व्यक्ति है। मानो एक ही परिवार के सुख की गर्मीहट से सभी साथ-साथ हैं।
      अरुण गांगुली बहुत ज़्यादा देर तक यह सब सोच नहीं पाए। शमीक की अंतिम बात मानो उनके कानों में गूंजती रही। मेरे कमरे के टेबल पर माँ, नानू और सेवा की तस्वीरें हैं। वे भी तो इसी उम्र से ही नौकरी के सिलसिले में बाहर-बाहर ही रहते थे। माँ तो पहले ही गुज़र गई थीं। पिता को देखने के लिए मन दिन गिना करता था। उन दिनों की बातें अरुण गांगुली नहीं भूले।  भूल न पाने के कारण ही वे बार-बार अपनी जगह छोड़ शमीक की जगह चले जा रहे थे। इस लिए उसकी ऑंखों की मूक भाषा वे सहज ही पढ़ पा रहे थे। भर्राए स्वर में कहा, ‘यद्यपि इस हफ्ते के अंत में तुम्हें यहाँ से छुट्टी मिल जाएगी परंतु उसके बाद भी तो तुम्हें आराम की ज़रूरत है। और वह आराम अगर न्यु बैरकपुर में माँ, नानू और सेवा के पास हो तो?’
      खुशी से चमक उठीं शमीक की दोनों ऑंखें। उसके चेहरे पर कृतज्ञता झलक उठी। बड़ी हैरानी से वह अरुण गांगुली के मुँह की तरफ देखता रहा। 
      अरुण गांगुली उसकी मनोदशा समझ गए। तुरंत कहा- ‘क्या, यकीन नहीं हो रहा?’ 
फिर और भी सहजता से कहा - ‘मेरा खयाल है कि तुम्हें एक बार घर से हो आना चाहिए। अगर पंद्रह दिनों के लिए जाना चाहो तो व्यवस्था कर सकता हूँ। हाँ तुम्हें अकेले नहीं छोड़ा जा सकता।  किसी को साथ भेजना होगा।’
      ’पिताजी, यह जिम्मा आप मुझ पर छोड़ सकते हैं।’ 
      बेटी के मुँह की तरफ देख अरुण गांगुली ने कहा, ‘तुम अगर जाना चाहती हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है।’
      ’मैं बहुत दिनों से कलकत्ते नहीं गई।’ 
      ‘ठीक है, तो तुम ही जाओ। लेकिन शमीक को संभाल कर ले जा सकोगी तो?’             ‘आप जिम्मेदारी देकर तो देखें।’
      ‘जिम्मेदारी देकर मैं सब पर ही विश्वास करना चाहता हूँ। कितने लोग उसका पालन कर पाते हैं बताओ?’ आखिर की बातें इस तरह कही मानो खुद को ही सुना रहे हों। या किसी और को सुनाना चाहा। मामला ठीक से समझ नहीं आया।
                                                                               जारी।

 बांग्ला से अनुवाद – नीलम अंशु
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,
राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन,
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ से प्रकाशित (2009)।

रविवार, मई 15, 2011

धारावाहिक बांग्ला उपन्यास - 3


(प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम से उनका लेखन जन-जन तक पहुंचे।) 
अब तक आपने पढ़ा कि किस तरह पिता की मृत्यु के पश्चात् पढ़ाई छोड़ परिवार की गुज़र-बसर के लिए नौकरी की तलाश में शमीक कलकत्ते से नागपुर पहुंचता है। उसके प्रोफेसर के मित्र अरुण गांगुली द्वारा नौकरी का आश्वासन पा वह नागपुर की सरज़मीं पर कदम रखता है। अब आगे पढ़े.....
गोधूलि गीत

0 समीरण गुहा

शमीक की नौकरी का आज पहला दिन है। इस बीच वह कई बार पॉवर प्लांट गया है परंतु उसमें और आज के जाने में बहुत अंतर है। आज वह महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड का एक ट्रेनी इंजीनियर है। जिस उम्मीद से माँ और छोटी दोनों बहनों को छोड़ सर की चिट्ठी को सहारा मान न्युबैरकपुर से नागपुर दौड़ा चला आया था, आज पूरी हुई। हाँ, इस परिपूर्णता के पीछे जिसने ख़ामोशी से परिपूर्ण कार्य किया है, वे हैं अरुण गांगुली। ज़िंदगी भर शमीक उनका यह ऋण नहीं चुका पाएगा।
      ऑफिस जाने से पहले अरुण गांगुली के चरण स्पर्श करते वक्ते फूट-फूट कर रो पड़ा शमीक। उन्होंने उसे सीने से लगाकर सर पर हाथ फिराया। गंभीर स्वर में कहा - ‘पीछे मुड़कर कभी मत देखना। अब से सिर्फ़ आगे बढ़ने के ख़्वाब देखो। तुम्हें ऊपर उठना होगा, वह संभावना तुम में है। और एक बात शमीक, माँ-बहनों का साथ देने के लिए जिस पढ़ाई को तुमने छोड़ा है उसे फिर से शुरू करना होगा। एल. एम. ई. कोर्स शुरू कर दो। मौका और समय दोनों का एक साथ मिलना भाग्य का बात होती है। याद रखना, ‘मैन इज़ द आर्किटेक्ट ऑफ़ हिज़ ओन फेट’।  अपने भाग्य का निर्माण अब तुम खुद ही कर डालो।’
      उसी दिन रात को घर लौट कर शमीक ने माँ को बड़ी सी चिट्ठी लिखी। सेवा और नानू को भी चिट्ठी लिखी। छोटी बहनों से अलग रहने में जो तकलीफ़ हो रही है वह सिर्फ़ शमीक ही जानता है। लिखते-लिखते एक बार तो वह रो ही पड़ा। परिणामस्वरूप चिट्ठी ख़राब हो गई।  ऑंखें और मुंह पोंछकर शमीक ने खुद को संयत करते हुए फिर से लिखा। फिर हिसाब लगाने लगा आगामी कल चिट्ठी पोस्ट करने पर नयुबैरकपुर पहुँचने में कितने दिन लगेंगे?  कम से कम तीन दिन लग सकते हैं। चिट्ठी मिलते ही उसी दिन या अगले दिन अगर जवाब दें तो एक दिन लग गया और तीन दिन नागपुर आने में।  यानी कम से कम उसे सात दिन इंतज़ार करना होगा। 
       ठंड ख़त्म होते-होते अब बिल्कुल ग़ायब हो गई है।  हवा में अब वह बर्फीला स्पर्श नहीं है। सख्त गर्मी से अब नागपुर जल रहा है।  लू की चपेट से पूरा शहर क्लांत हो गया है।  परंतु किसी भी चीज़ के लिए कोई काम नहीं रुका हुआ है। सबकुछ स्वभाविक रूप से चल रहा है।  महाराष्ट्र इलेक्ट्रीसिटी बोर्ड के काम और एल. एम. ई. कोर्स की पढ़ाई में अब शमीक बहुत ही व्यस्त है। अरुण गांगुली अक्सर एक बात कहते हैं,  ‘अब से सिर्फ़ आगे की तरफ बढ़ते जाओ।  पीछे मुड़कर देखने का अब समय नहीं है। और हमेशा तो आदमी को मौक़ा नहीं मिलता।’ ये बातें सुनकर शमीक को नए सिरे से प्रेरणा मिलती है।  बड़ा बनने का ख्वाब देखता है।
      उस दिन छुट्टी की शाम थी। थोड़ी देर पहले थोड़ी सी बारिश हो चुकी है। गर्मी का ताप ज़रा भी घटा नहीं। बल्कि उमस बढ़ ही गई है। लॉन की मुलायम घास बारिश के पानी से धुलकर और हरी हो गई है। वहीं बेंत की कुर्सी पर बैठ बासंती से बातें कर रहा है शमीक। बासंती ने  थोड़ा सा मुस्करा कहा, ‘काम के प्रति समर्पित इंजीनियर के रूप में इसी बीच तुम काफ़ी मशहूर हो गए हो।’ बड़े बनने की मामूली सी आकांक्षा में शमीक ने ज़रा सी स्वीकृति पानी चाही, ‘उन्होंने कुछ कहा?’ तुरंत बासंती का पूरा चेहरा स्याह पड़ना शुरू हो गया। वे निष्प्राण सी हो गईं। उनके दमकते चेहरे का अपनापन क्रमश: गायब होने लगा। बात समझने में शमीक को ज़्यादा देर नहीं लगी। दरअसल उसने भावावेश में यह बात कह दी थी। अरुण गांगुली के साथ बासंती के समझौते में एक बड़ी बाधा है यह सोचकर उसने नहीं कहा था जबकि उसकी बात से अवश्य बासंती को दु:ख पहुँचा है। 
      बासंती ने खुद को संयत किया। अचानक एक सूक्ष्म आघात से मन के भीतर  उथल-पुथल शुरू हो गई थी लेकिन तुरंत उन्होंने उस पर काबू पा लिया। आश्चर्यजनक रूप से खुद को संयत कर थोड़ा सा हँसकर जवाब दिया, ‘उनसे कुछ नही सुना। उनके पास बोर्ड के जो लोग आते हैं, वे ही कह रहे थे।’
      सुनकर शमीक भी थोड़ा सा हँसा। धीरे-धीरे कहा - ‘देखिए ऐसी कोई बात नहीं है। सभी जानते हैं कि  अरुण गांगुली जी ने ही मुझे यह नौकरी दी है। अब मुझे यह साबित करना है कि उन्होंने ग़लत लड़के को नौकरी नहीं दी। मेरे काम के साथ उनकी प्रतिष्ठा का सवाल भी है।’
      ‘कोई इतना सोच-विचार कर भी काम करता है?’
      ‘कोई न कोई तो अवश्य करता है।’
      ‘उसका क्या हिसाब-क़िताब है?’
      ‘हम सभी अगर अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वहन करें तो हिसाब-क़िताब का सवाल ही नहीं उठता। आप ही बताईए, ठीक है कि नहीं?’
      ‘तुम्हारी हर बात सही है। मैं भी उससे सहमत हूँ।’ बासंती बेंत की कुर्सी पर और अच्छी तरह बैठ गईं। फिर सहज रूप से ही सीधी बात कह डाली, ‘परंतु हम में से कोई भी अपनी भूमिका का निर्वहन नहीं करता। उम्मीद है तुम भी इससे सहमत होगे, क्योंकि तुमने खुद ही कहा है कि यदि हम सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वहन करें - यानी ‘यदि’ का सवाल है। इस ‘यदि’ की उपेक्षा कर हम सहज और स्वच्छंद रूप से आगे नहीं बढ़ सकते। वक्तव्य या भाषण में ही हमारा कर्तव्य विद्यमान होता है। ख़ैर जो भी हो, व्यतिक्रम तो होता ही है। जैसे कि तुम।  बासंती ने स्नेहपूर्वक और कहा, आजकल के लड़कों से तुम भिन्न हो - बहुत भिन्न। तुम्हारा विवेचन बोध बहुत ज़्यादा परिणत है। अत: तुम्हें आशीष देती हूँ शमीक, तुम बड़े बनकर सही अर्थों में एक इन्सान बन......’ बासंती अपनी बात पूरी नहीं कर पाईं। उसके पहले ही शमीक ने उनका चरण-स्पर्श कर स्पष्ट आवाज़ में कहा, ‘आप मुझे आशीष दें, बड़ा बनकर आप लोगों को भूल न जाऊं। आप लोगों के साथ कभी बेईमानी न करूं।’
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      सुनील शिवलकर अपना राजदूत चला कर सीधे लॉन के सामने आर रुका। मोटरसाईकिल से उतर कर बासंती और शमीक के बीच वाली कुर्सी पर फटाक से बैठ ज़रा हँस कर पूछा, ‘हैलो, शमीक तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?’
      ‘ठीक-ठाक।’
      ‘नौकरी के बाद पढ़ाई की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता। तुम तो दोस्त सचमुच अच्छे लड़के हो। जब देखो हाथ में एक न एक क़िताब रहती ही है। पाँच मिनट का समय मिलते ही बैठ जाते हो क़िताब लेकर, फिर भी कहते हो ठीक-ठाक। वास्तव में पढ़ना ही तुम्हारा शौक है, परीक्षा में फर्स्ट आओगे।’
      ‘फर्स्ट, सेकेन्ड से मतलब नहीं।’ ज़रा सा मुस्करा कर शमीक ने कहा, ‘बस कोशिश कर रहा हूँ।’
      ‘तुम्हारी कोशिश की बात मुझे पता है। कितनी बार कहा है, ज़रा पिक्चर चलते हैं या कहीं घूमने चलते हैं, पिकनिक का प्रोग्राम बनाया  - किसी में भी तुम नही गए। रिकॉर्ड की सुई एक ही जगह अटकी रही, मुझे पढ़ाई करनी है। इतनी पढ़ाई करने का बाद भी कहते हो, कोशिश कर रहा हूँ। अच्छा शमीक, अपनी उच्चाकाक्षांओं का तनिक सा अंश मेरे भीतर नहीं डाल सकते?’
      ‘बकवास मत करो।’
      शमीक ने हँसते-हँसते ही कहा, ‘पढ़ाई-लिखाई में तुम भी कम नहीं हो। रैंकिंग वाले स्टुडेंट हो न, विनम्रता भी अच्छी सीखी है।’
       ‘ख़ैर छोड़ो ये सब बातें’ - सर के बालों में उंगलियां फिराते हुए सुनील कुछ सोचने लगा, बासंती की तरफ देखते हुए अचानक पूछ बैठा, ‘चुमकी घर पर है तो?’
      ‘वह तो बहुत पहले ही निकल गई। शायद तुम्हारे ही घर.... ।’
      ‘नहीं। हमारे घर नहीं गई। मेरी ही यहाँ आने की बात थी - वो कैसे चली गई समझ में नहीं आता। जो भी हो कल तो कॉलेज में उससे मुलाकात होगी ही। अब आपसे जो कहना है वह है मिसेज़ गांगुली अगले शुक्रवार कहीं कोई प्रोग्राम मत रखिएगा। उस दिन मेरी बर्थ डे पार्टी में आप सबको आना है।’
      बासंती ने स्नेहपूर्वक हँसते हुए कहा - ‘अवश्य जाएंगे।’
      सुनील ने शमीक की तरफ देख प्यार से उसके पेट पर चपत लगाते हुए कहा, ‘क्या तुम्हें अलग से कहना पड़ेगा।’
      ‘नहीं, उसकी ज़रूरत नहीं है - लेकिन शायद जा न सकूं।’
      ‘पढ़ना है, यही तो? वह सब छोड़ो - अच्छे लड़के एक दिन न भी पढ़ें तो रिज़ल्ट ख़राब नहीं हो। तुम्हें जाना ही पड़ेगा।’
      ‘कोशिश करूंगा। नहीं जा सका तो प्लीज़ बुरा मत मानना।’
      ‘तुम्हारी कोशिश के प्रति मेरी आस्था है।’ हँसकर यह कहते हुए सुनील के उठ खड़े होते ही बासंती हैरान हुई।  कहा - ‘कुछ भी तो खाया नहीं, जा रहे हो मतलब?’     
      ‘आप के घर आकर बगैर कुछ खाए कब गया हूँ मिसेज़ गांगुली? लेकिन आज और नहीं रुक सकता। बहुत से काम करने हैं। चलूं मैं।’ राजदूत स्टार्ट कर पल भर में सुनील ऑंखों से ओझल हो गया।
      शुक्रवार का दिन भी आ पहुँचा। अभी शाम के पौने छह बजे हैं। बासंती एक बार शमीक को कह गई हैं, ‘जल्दी तैयार हो जाओ, सुनील के घर जाना है।’
      इस जाने में ही तो शमीक को आपत्ति है। वैसे सुनील एक बहुत ही अच्छा दोस्त है।  उसके जन्मदिन पर न जाने की कोई वजह भी तो नहीं। समस्या कुछ और है। चुमकी साथ होगी। और वह ऐसी चुभती हुई बातें कहती हैं कि हजारों लोगों के सामने शर्मिंदा होना पड़ता है। बहुत ही बुरा लगता है तब। सबसे बड़ी बात है चुमकी कब किसे क्या कह बैठेगी, यह वह खुद भी नहीं जानती। और जिसे कहेगी, वह भी कुछ समझ पाने से पहले ही शर्म और बेईज्जती से मुँह छुपाना चाहता है। ऐसी स्थिति में उसके साथ जाना कितना सुविधाजनक है, यह सोच रहा है शमीक। कल ही चुमकी ने ऐसी एक बात कही थी।
      बात कुछ ख़ास नहीं। पाणीकर आस-पास के घरों के ड्राइवरों के साथ जमकर गप्प-शप्प कर रहा था। कौन कितनी मील की गति से गाड़ी चलाता है, किसने कितने एक्सीडेंट किए हैं, किसने एक भी नहीं किया। किसने कितने लोगों को गाड़ी चलानी सिखाई है, ऐसी ही बातें।  शमीक उस समय पॉवर प्लांट से लौट रहा था। घर के गेट के सामने ड्राइवरों की यह मजलिस देख वह ठिठक कर रुक गया। पाणीकर ने हँसकर मासूमियत से कहा, ‘घबराने की कोई बात नहीं साब। ये अपन ड्राईवरों की बात-चीत चल रही है। फिर अचानक याद आ जाने की स्थिति में बड़े ज़ोश से बोला, मैंने एक कम, सौ लोगों को ड्राइविंग सिखाई है। आपको भी दो घंटे में ड्राइविंग सिखा दूंगा। और आज ही मैं सेंचुरी पूरी कर लूंगा।’
      गहरे मेहरून रंग वाली फिएट में ही शमीक की ट्रेनिंग चल रही थी। पाणीकर बड़ी अच्छी तरह सब कुछ समझा रहा था। ऐसे में ही अचानक चुमकी कमरे से बाहर निकल आई। उसे देखकर ही शमीक समझ गया था कि वह ज़रूर कुछ न कुछ कहेगी। चुमकी ने ताना सा देते हुए कहा, ‘पिताजी ने कहा है, समय और मौक़े का सही सदुपयोग करना चाहिए। देख रही हूँ वैसा ही कर रहे हो।’ इतने सारे ड्राइवरों के सामने यह बात नहीं कहनी चाहिए थी।
      अत: पहले शमीक ने सोचा था कि सुनील के जन्मदिन पर चाहते हुए भी नहीं जाएगा।  और फिर अकेले-अकेले जाना भी उचित नहीं होगा। वह और भी बुरा लगेगा। जबकि बासंती ने जिस अपनत्व से जल्दी मचाई थी, उसके बाद न जाना भी उचित नहीं होगा। लेकिन वहाँ जाकर चुमकी की बातें नहीं सुननी पड़ेगी इसकी गारंटी कौन देगा?  वैसे लड़की बहुत अच्छी है लेकिन कभी-कभी चिढ़कर ऐसी बातें सुनाती है कि सीना छलनी हो जाए, शर्म से सर कट जाए। और चुमकी शमीक को सहन भी नहीं कर पाती। उसके पिता शमीक से स्नेह करते हैं, प्यार करते हैं। उनके इतने क़रीबी होने के कारण ही शायद वह इतना चिढ़ती है। लेकिन इसमें शमीक का क्या क़सूर है? और उस पर गुस्सा करके क्या फ़ायदा? बेटी होकर भी चुमकी अपने पिता से इतनी कटी-कटी सी क्यों रहती है? वह भी क्या शमीक की ख़ातिर?
      नागपुर के अभिजात्य इलाके धर्मपेट के एक शानदार दोमंजिले मकान के सामने आकर गहरे मेहरून की फियेट रुकी। पाणीकर ने जैसे ही पिछला दरवाज़ा खोला बासंती नीचे उतरीं।  उनके साथ-साथ चुमकी भी। शमीक पाणीकर के बगल में बैठा था। वह पहले ही उतर गया था।  मुख्य द्वार पर सुनील के पिता किरण और माँ दशमी ने उनका स्वागत किया। शमीक को देखते ही मानो नाच सा उठा सुनील। माता-पिता के साथ शमीक का परिचय करवाकर ही वह बोल उठा, ‘तुम्हें चाहे कितनी ही पढ़ाई क्यों न करनी हो, मुझे पता था, तुम मेरी बात ज़रूर मानोगे। रियली शमीक मुझे बहुत खुशी हुई।’ ऐसे में चुमकी ने मज़ाक से कहा, ‘तुमने क्या सिर्फ़ अकेले शमीक को ही आमंत्रित किया है? सारी बातें उसी से निपटा ले रहे हो।  हम भी हैं’। उसकी इस बात पर सभी हँस पड़े। गहरी साँस छोड़ते हुए शमीक ने सोचा, तो चुमकी को ठिठोली करनी भी आती है।
      दोस्त-मित्रों और रिश्तेदारों की भीड़ से सुनील के घर में काफ़ी गहमा-गहमी है। जन्मदिन का उत्सव इतने बड़े पैमाने पर हो सकता है, शमीक को यह अंदाज़ा नहीं था। तीन सौ के लगभग लोगों की उपस्थिति मानो शादी के उत्सव को मात दे रही हो। शमीक के साथ एक लड़की का परिचय हुआ। उसका नाम है सागरिका सलूजा। नागपुर के कस्तूरीबाई वुमेन कॉलेज में बी. ए. में पढ़ती है। शमीक को बंगाली समझ वह खुद ही परिचय करने के लिए आई थी।  सागरिका ने वह बात कही भी, ‘आप को देखकर ही समझ गई थी कि और चाहे जो भी हों आप मराठी नहीं है। सुनील मेरा फुफेरा भाई है। उससे जब सुना कि आप बंगाली हैं तो परिचय करने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पाई।’ स्पष्ट स्वीकारोक्ति थी सागरिका की, ‘दरअसल मैं बंगालियों को बहुत पसंद करती हूँ।’
      ‘ज़रा सा मुस्करा कर शमीक ने पूछा, क्यों?’
      ‘वजह जान कर हँसेंगे तो नहीं न?’ सागरिका खुद ही हँस पड़ी।
      ‘आप जब तक हँसेंगी तब तक अवश्य मैं नहीं हँसूंगा।’
      ‘बड़ी अच्छी बातें कर लेते हैं आप?’ सागरिका सलूजा मानो हँसी के सागर में तैरने लगीं।  हँसी थमने पर फुसफुसाने के लहज़े में उसने कहा, ‘मेरी एक मौसी की बंगाली से शादी हुई है। मौसा जी मौसी को बहुत चाहते हैं।’
      सागरिका की इस बात के जवाब में शमीक कुछ कहने ही जा रहा था कि उसके पहले ही चुमकी उन दोनों के सामने जा खड़ी हुई। ‘सागरिका उससे ज़रा सी बात-चीत कर, आती हूँ’ कहकर आगे बढ़ गई। चुमकी ने एक बार आपादमस्तक शमीक को देखकर धीमे स्वर में कहा, ‘समय और मौक़े का सदुपयोग कर रहे हो?’ सुनते ही बेहद आहत होकर शमीक ने उसकी तरफ देखा। फिर धीरे-धीरे कहा, ‘इस तरह  बात करने का क्या मतलब है? मुझे अपमानित करना ही तुम्हारा मकसद है?’ कहकर शमीक और वहाँ नहीं रुका। चुमकी के साथ तर्क-वितर्क करने में उसे बहुत आपत्ति है।
      सुनील के यहाँ आनंदोत्सव के प्रोग्राम का जो आलम था उसमें रात ग्यारह बजे से पहले निजात नहीं मिलने वाली। अभी तो सिर्फ़ पौने सात बजे हैं। यानी चार घंटे से भी ज़्यादा समय के लिए यहाँ रहना होगा। स्वभावत: शमीक को छटपटाहट होने लगी। एक तो चुमकी की बातों से उसका दिल ही टूट गया। दूसरे सिर्फ़ जन्मदिन के अनुष्ठान में इतना समय न गुज़ार कर पढ़ाई करना बेहतर होता। शमीक ने पहले बासंती के समक्ष ही जाने की इच्छा व्यक्त की। बासंती ने आपत्ति नहीं की। शमीक को वे जानती हैं। वह पढ़ाई के लिए छटपटा रहा है। इसके अलावा वह खुद को यहाँ एडजस्ट भी नहीं कर पा रहा था। सबसे तो उसकी जान-पहचान है नही। खुद पहल करके वह बात-चीत कर नहीं पाता। अत: घर जाने के लिए शमीक की छटपटहट स्वभाविक ही थी।
      घर लौटने की बात सुनकर सुनील ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया। शमीक के चेहरे की तरफ अपलक निहारते हुए अंतत: उसने आश्चर्यपूर्ण स्वर में कहा, ‘जल्दी घर जाना है, क्यों?   तब तो दोस्त, तुम्हें आना ही नहीं चाहिए था। मैं तुम्हारा कोई बहाना नहीं सुनने वाला। एक दिन न पढ़ने से तुम जहाँ हो वहीं रहोगे। बेकार ही हमारा मज़ा क्यों किरकिरा करते हो?’
       सहजता से मुस्कराकर शमीक ने कहा, ‘तुम लोग मज़े करो।’
      ‘सिर्फ़ कहने से नहीं होता, खुद को भी शामिल होना पड़ता है। ख़ैर एक बार जब तुमने घर लौटने का निश्चय कर ही लिया है तो मैं रोकूंगा नहीं। सिर्फ़ एक ही विनती है बगैर खाए मत जाना।’
     झमेला तो हुआ। लेकिन उसके बाद खा-पीकर शमीक ने पहले सुनील के माता-पिता से आज्ञा ली। फिर बासंती के पास जा खड़े होते ही उन्होंने कहा, पाणीकर से कहो तुम्हें छोड़कर फिर आए। अंत में सुनील को शुभकामनाएं दे जब वह गहरे मेहरून रंग की फियेट में बैठने ही वाला था कि लगभग दौड़ते हुए वहाँ पहुँचकर सागरिका सलूजा ने हैरानी से पूछा, ‘आप जा रहे हैं?’
      ‘हाँ।’
      ‘इतनी जल्दी?’
      ‘घर पर ज़रा काम है।’
      ‘समझ गई कि काम के मामले में आप काफ़ी सजग हैं लेकिन यहाँ अटैंड करना भी क्या काम नहीं है?’
      ‘अटैंड तो किया न।’ शमीक के चेहरे पर एक स्निग्ध मुस्कान थी। उसी मुस्कान को झरने की तरह बिखेरते हुए सागरिका ने कहा, ‘लेकिन यह तो सिर्फ़ औपचारिकता ही हुई।’
      ‘कई बार हम इतनी औपचारिकता भी नहीं निभा पाते। है न?’
      ‘आपको बातें बनाने का मौक़ा देकर मैं हारने के लिए तैयार नहीं हूँ। ख़ैर जो भी हो आप तो कोराडी जा रहे हैं। मुझे सदर में उतार दीजिएगा। घर जाकर एक बार फिर यहाँ आना पड़ेगा।’
      ‘ठीक है, चलिए’ - गाड़ी का दरवाज़ा अभी शमीक ने खोला ही था कि वहाँ चुपचाप जो लड़की आ खड़ी हुई, वह चुमकी थी। कम से कम शब्दों में व्यक्ति की किस तरह उपेक्षा की जा सकती है ठीक वैसी ही मुस्कान चुमकी के होंठों पर थी। अपनी विशेष भंगिमा में खींच-खींच कर लेकिन अस्पष्ट स्वर में कहने लगी, ‘समय और मौके का फिर सदुपयोग कर रहे हो। सचमुच, पिताजी की बात का तुम्हारी तरह और किसी ने इस तरह अक्षरश: पालन नहीं किया। तो क्या इसीलिए इतनी जल्दी घर लौट रहे हो?’
      ‘तुम्हारे हृदय में कहीं भी तनिक कोमलता नहीं है। तुम ऐसा सोच ही सकती हो।’ 
      ‘मैं क्या कर सकती हूँ, क्या नहीं, वह मेरा मामला है। पर तुम क्या कर रहे हो?’ व्यंग्य के लहज़े में चुमकी ने कहा, ‘पिताजी का कहा मान रहे हो, अच्छी बात है, उसके साथ-साथ उनकी इज्ज़त का भी ख्याल रखने की कोशिश करना।’
      चुमकी की इस आख़िरी बात पर ही मानो शमीक का दिमाग़ गरम हो गया। वह तो मानो आपा खो बैठा था। चुमकी की बात का अभिप्राय: स्पष्ट है। उसे इतना तुच्छ समझने की मानसिकता उसकी हुई कैसे? और इतना अपमान सहना उसके लिए कष्टदायक है। इसी बीच सागरिका पता नहीं क्या सोच कर घर के अंदर चली गई थी। शमीक समझ गया कि यह कुछ नहीं बस स्थिति को संभालने जैसे बात थी। परंतु वह क्यों बेवजह समझौता करे? चुमकी ने जो कहना चाहा वह सिर्फ़ अन्याय ही नहीं - बहुत बड़ा अपराध है। इन्सान की बेइज्जती करने के उस के एकाधिकार का दमन करना उचित होगा। यद्यपि शमीक अंदर से बहुत उत्तेजित था फिर भी उसने अपने आपको संयत कर पूछा - ‘तुम्हारी इन बातों का क्या मतलब निकलता है वह सोचा है कभी? हरेक को हर बात कहने का हक़ तुम्हें नहीं दिया गया है।’
      ‘कहने का मौक़ा तो तुम ही दे रहे हो।’
      ‘कैसे?’ अंदर के क्रोध को दबाकर शमीक ने चुमकी की तरफ देखा।
      ‘निमंत्रण पर आकर इतनी जल्दी तुम्हारे घर लौटने का क्या मतलब है?’ चुमकी के फूले हुए दोनों गाल मानो और फूल गए। होंठ भी मानो धरथरा रहे थे। नथुने भी काँप रहे थे। ऑंखें ऐसी थी मानो जिधर भी नज़र जाएगी, सब कुछ भस्म कर देंगी। भौंहे माथे पर जा चढ़ी थीं। वह इस वक्त बहुत गुस्से में है, यह स्पष्ट था। शमीक उसे इस तरह चुभती हुई बातें कहेगा, कह सकता है,  यह उसकी कल्पना से परे की बात थी। अब तक वह बहुत ही निरीह सा जान पड़ा था, परंतु वह इस तरह जाग्रत हो सकता है यह तो उसने सोचा भी नहीं था। उसके सम्मान को उसने लगभग चूर-चूर कर दिया था। चुमकी उसकी ऑंखों की तरफ देखते हुए चीख ही पड़ी - ‘तो यहाँ आए ही क्यों? न आते।’ 
      ‘मुझे जिसने आमंत्रित किया था उसे क़ैफ़ियत दे सकता हूँ - तुम्हें नहीं। तुम मुझसे
सवाल नहीं कर सकती।’
      ‘तुम मेरे साथ बहस मत करो शमीक। अच्छा नहीं होगा।’
      ‘तुम मुझे डरा ही सकती हो, जो जी चाहे कह भी सकती हो, क्योंकि वह तुम्हारा हक़ है लेकिन सच्ची बात कहना, बहस करना हो गया? ’
      चुमकी ने ऑंखे दिखाते हुए कहा, ‘तुम में कृतज्ञता बोध नाम की चीज़ नहीं है?’      
यह सुनते ही एक साथ बहुत से जवाब सूझे। शमीक ने कोई जल्दबाजी नहीं की। किसे कौन सी बात कहनी चाहिए, कौन सी नही - अंत तक वह शब्द भंडार की सोच में डूब गया।  उसे फिजूल बातें करना बिलकुल पसंद नहीं। चुमकी की क्रोधित नज़रों के उत्ताप का शमीक पर ज़रा भी असर नहीं पड़ा। उसने उसकी ऑंखों की तरफ देखते हुए सहजता से जवाब दिया, ‘अपनी कृतज्ञता मैं सही जगह पर ही प्रकट करता हूँ।’


                                                              ......जारी।

बांग्ला से अनुवाद – नीलम अंशु


उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,
राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन,
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ से प्रकाशित (2009)।



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