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रविवार, सितंबर 26, 2010

कहानी श्रृंखला - ( 9 ) पंजाबी कहानी


     हिरणी की आँख 
                         
    0 मोहन भंडारी




उस दिन शनिवार ही था, शायद! हाँ, शनिवार ही। छुट्टी थी न! अरे नहीं, छुट्टी दी गई थी। वर्ना यह हादसा क्यों होता? मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा हो जाएगा। मैं डरा नहीं, हाँ, घबरा ज़रूर गया था। और, घबराहट में इन्सान को दिन, वार याद ही कहाँ रहता है? हालात ही ऐसे थे। मेरे दिमाग में तनाव था। तनाव और धुंधलापन। मैं कुछ और ही सोच रहा था। क्या सोच रहा था? क्या बताऊं ?

चारों ओर दहशत छाई हुई थी। मन भटका हुआ था। उस वक्त जो भी मिलता, यही कहता, यह क्या हो गया? कब हो गया यह? कोई कहता कि इंसान मारा जाए तो सब्र कर लेना चाहिए। होश ठिकाने न हों तो कोई क्या करेउस वक्त यही हुआ। होश मारी गई! और, दिन तथा तारीख सब कुछ भूल गए मुझे।

अब चेतना लौट रही है धीरे-धीरे। घटनाएं याद आ रहीं हैं, एक के बाद एक। मन पूरी तरह ठीक नहीं है। अभी भी अशांत है। एक मिनट..... एक मिनट रुकिए। असली बात पर आ रहा हूं। असली बात। नवंबर का महीना था। शुरू ही हुआ था अभी। पहला सप्ताह। सप्ताह के पहले दिन........ दो या तीन तारीख....... दिन शनिवार ही था। शनिवार की रात, जब यह मनहूस घटना घटी थी।

इंदिरा गांधी के कत्ल के बाद शहर में दंगे भड़क उठे थे। उनका कत्ल क्या हुआ। कत्ल, कत्ल, कत्ल........ कत्ल होने लगे........बस कत्ल-ए-आम शुरू हो गया। आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी बेशक पुलिस की थी पर हमें अलर्ट रहने का आदेश हो गया। और, हम हो गए अलर्ट! क्या मालूम, कब क्या आदेश मिल जाए। दो दिन गुज़र गए। कोई आदेश नहीं। आदेश नहीं तो कोई एक्शन नही। एक्शन नहीं तो दंगे जारी। हम अनुशसन में बंधे हुए थे। अजीब बोरियत के दिन थे। साला! दिन-रात जगे रहना.

तीसरे दिन शाम को कॉल आई।  आदेश था - जवान लोग बैरक में रहेंगे। अफसर साहिबान, अब आराम करें। टिल फर्दर ऑर्डरस्....... यह टिल फर्दर ऑर्डरस्.... हमारे दिमागों में हथौंड़ों की तरह बज रहे थे। टिल फर्दर ऑर्डरस्।

मैं सचेत रहकर आराम करने के लिए कोठी में चला गया। डिफेंस कॉलोनी में। यह इलाका ख़तरे से बाहर था। यूं तो फौजियों के लिए ख़तरे से बाहर का कोई अर्थ नहीं होता। टिल फर्दर ऑर्डरस् में आराम के क्या मायने? ख़ैर! हम ऐसे आदेशों के आदी हो चुके हैं। अत: कैसी तकरार और कैसा गिला। साले! ये जो शब्द हैं न क्यों, कैसे किंतु, परंतु,… ये हमारे शब्द-कोश में हैं ही नहीं।

मेरी बीवी और बच्चे बाहर गए हुए थे। सब के सब। पूरे एक महीने से घर में मैं अकेला था। खाता, पीता, सो जाता। और क्या करता? परेड! बहुत हो गई। पहले तो...... ये पहले और बाद की बातें छोड़िए। बस विघ्न पड़ गया। पिछले दिनों। अच्छी मरी! कहीं भी चैन नहीं। दिन-रात अलर्ट। और तिस पर यह साला! टिल फर्दर ऑर्डरस्........

मैंने मेजर वी. के. मल्होत्रा को फोन किया - हलो! मेजर चङ्ढा, दिस साइड ...... हलो!.......हां....माईसेल्फ.....ओह नो! कम ऑन यार रात गुज़ारनी है..... दो घड़ी बैठेंगे.......हां, मेजर दुबे को भी लेते आना, बस आप लोग आ जाईए मैं अकेला बोर हो रहा हूं, यार!  येस टिल फर्दर ऑर्डरस्! हंसते हुए मैंने फोन का रिसीवर रख दिया।

थोड़ी देर बाद वे दोनों आ गए। मेजर वी. के. मल्होत्रा और पी. आर. दुबे। दोनों दोस्त हैं। दोनों ही अविवाहित। हम तीनों की जुंडली तिकड़ी के नाम से मशहूर है। दो और दोस्तों को मैंने अपने पड़ोस से बुला लिया।

शामें तो हमारी पहले भी एक साथ गुज़रती थीं। परंतु यह शाम कुछ भिन्न थी। घुटन भरी। हम पाँचों दो-दो पेग लेकर कोठी की छत पर चले गए। हम अभी खड़े ही थे कि मुझे धक्का सा लगा। गिरने ही लगा कि मुंडेर को थाम लिया। मल्होत्रा ने पूछा, क्या हुआ? मेरे मुंह से निकला, भूकंप! भूकंप आ गया। मुझे कोठी की छत अभी भी हिलती हुई प्रतीत हुई। मेजर दुबे रोनी सूरत बना कर हंसा। बोला, नो, नो..... दिस कांट हैपन! तुम्हारा वहम है.....शीयर इलियूज़न! बी स्टेडी मैन, डोंट लूज हार्ट!!
   दुबे उखड़ा-उखड़ा सा हमें देखता रहा। शहर से आग की लपटें उठ रहीं थीं।
   हम वहां ज़्यादा देर तक न रुक पाए। सीढ़ियां उतरे। और भीतर जाकर बैठ गए।
   जल्दी-जल्दी पीने लगे। हम पाँचों में से अगर कोई बात छेड़ता तो बाकी लोग हूं, हाँ कह कर ख़ामोश हो जाते। कोई ढंग की बात नहीं हो रही थी। बस खामोशी का पहरा था। मुझे लगा मानो हम व्हिस्की न पीकर ख़ामोशी को पी रहे थे। चुप-चाप। ऐसा पहली बार हो रहा था। साली दारू का नशा भी नहीं चढ़ रहा था।

उस वक्त, वक्त ने भी क्या शोर मचाना था? बस सुईयां सरकती रहीं.......दस......साढ़े दस.......ग्यारह...... अलार्म लगा देना चाहिए। मैं सोच रहा था। अचानक दरवाज़े की घंटी बज उठी। बहुत ही धीमे से। फिर पल भर का सन्नाटा। घंटी फिर बजी।
   मैं घबरा कर दरवाज़े की ओर बढ़ा। पूछा - कौन? बाहर से किसी का स्वर नहीं सुनाई दिया। मैंने फिर कहा, कौन है भई?
     जी मैं, मक्खन सिंह...... दरवाज़ा खोलिए साब जी! आवाज़ दबी सी थी। पर मैंने पहचान ली। हमारा पहले वाला नौकर था, मक्खन. इस वक्त! कहकर मैने दरवाज़ा खोल दिया वह बाहर खड़ा था। साथ में एक महिला। अधेड़ उम्र की जान पड़ी। मैंने इशारे से उन्हें भीतर बुला लिया। पहले मक्खन अंदर आया। पीछे-पीछे महिला। दोनों कांप रहे थे। शायद ठंड से। महिला दीवार से सट कर खड़ी हो गई। नज़रें झुकाए। मैंने ध्यान से देखा। भरपूर जवान थी। देखने में सुंदर। गोल चेहरा। ठुड्डी पर तिल। रंग पीला। उड़ा हुआ।
   मैंने भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया।
  
मक्खन सिंह ने मुझे एक तरफ ले जा कर धीरे से कहा, साब जी, इसके घर वाले को मार डाला...... और इसके बेटे को भी। दंगाईयों का हजूम आ गया साब जी। यह किसी तरह बचकर आ पहुंची मेरे पास। वहाँ ख़तरा है जी.....अभी मुझे यह देख कर छोड़ गए। उसने अपने मोने सर (कटे हुए बाल) पर हाथ फेर कर बताया। मैं इसे यहाँ इसलिए ले आया, ताकि बच जाएगी....आपके रहते किसी की हिम्मत नहीं होगी......’  कहते-कहते उसका गला रूंध गया और आँखों से खुद-ब-खुद आंसू बह निकले।
    
अच्छा किया, अच्छा किया। कहने को तो मैंने कह दिया, पर अंदर ही अंदर असमंजस में पड़ गया था। मुझे खुद पर गर्व भी हुआ कि मक्खन सिंह ने मुझे पर भरोसा किया है। उसके इस भरोसे को मैं कैसे तोड़ देता? अगर कोई इस तरह शरण में आ जाए तो ख़तरा मोल लेकर भी अपना फर्ज निभाना चाहिए।
   मेरे अंदर का फौजी जाग उठा।
     मुझे वापस जाना होगा, कहकर कुंडी खोलकर पता नहीं कब वह बाहर निकला और वापस भी चला गया।
   ऐसी स्थिति में मुझे उसे नहीं जाने देना चाहिए था। परंतु क्या करतामैं तो खुद सोच-विचार में उलझा हुआ था।
  
मैंने हिम्मत बटोर कर उस महिला को पुकारा, दिलासा दी। परंतु वह बोली तक नहीं। सर झुकाए खड़ी रही। ख़ामोश। ख़ामोशी तो मुझे पहले ही भारी पड़ रही थी। मैंने खुद को आफ़त में फंसा महसूस किया। कुछ नहीं सूझ रहा था। करूं तो क्या करूं?
  
मैं अपने साथियों के पास गया। नपे-तुले शब्दों में सारा किस्सा कह सुनाया। और कोने में खड़ी उस महिला की तरफ इशारा किया। वे तो पहले ही उसे घूर रहे थे। उनमें से दो, मेरी बात सुनकर मुस्कराए। उनका यूं मुस्कराना मुझे अच्छा नहीं लगा। फिर वे चारों चुपचाप उठे। दरवाज़े की तरफ बढ़े। कुंडी खोली और बाहर निकल गए।(यह सब कुछ इतनी तेजी से हुआ, मानो वे चल कर नहीं गए हों)।
  
तभी मैं जल्दी-जल्दी उनके पीछे गया। दोनों अविवाहित दोस्तों से मैंने अनुरोध भरे लहज़े में कहा, तुम लोग तो यहाँ रुको। तुम लोगों को किस बात की जल्दी है? यहां मैं अकेला....? बोल मेरे होठों पर लरज़ गए।
   वे दोनों ठहाका मार कर हँसे। दुबे बोला - ओह नो, मेजर चङ्ढा! सो.....गुड लक.....माई चैप!
   उसके शब्द मुझे ज़हर जैसे लगे। वे लोग चले गए।


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क्या नाम है आपका? मैंने उस महिला से पूछा।
   वह काँप उठी। कुछ न बोली।
     नाम बताने में क्या हर्ज़ है?
   वह हिली। उसके होंठ कांपे। फिर भी उससे कुछ न बोला गया।
     घबराइए मत.....बताइए! बताइए!!’  मैंने और भी नरमी से कहा।
     नसीब......नसीब कौर। उसने डरते, झिझकते हुए कहा।
    
कुछ खा लीजिए आप। भूख लगी होगी। मैं उसे सहज स्थिति में लाना चाहता था। उसने इन्कार में सर हिलाया। मेरे अगले प्रश्नों का भी उसने कोई जवाब नहीं दिया। इस वक्त उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। सदमे की मारी है। सुबह विस्तार से सारी बातें पूछूंगा। यह सोचकर मैंने उसे अपने शयन-कक्ष में भेज दिया। कुछ देर बाद देखा। वह सिकुड़ी पड़ी थी, गठरी की तरह।  घुटने पेट में सिकोड़े हुए। मैंने अलमारी से कंबल निकाल कर उस पर डाल दिया। खुद बाहर आ गया।
  
बाहर आकर अचानक मुझे ख़याल आया कि मेरा रिवॉल्वर अंदर रह गया है। ऐसी स्थिति में यह महिला कुछ भी कर सकती है। यह सोचकर मैं एक दम उठ खड़ा हुआ। अंदर गया। अलमारी खोली। रिवॉल्वर उठाकर ऊपर की तरफ उठाया।
  
मेरे हाथ में रिवॉल्वर देख वह काँप उठी। डरी-सहमी, मोटी-मोटी, फैली हुई आँखों से उसने मेरी तरफ ताका। और हाथ जोड़ कर होंठों ही होंठों में कुछ बड़बड़ाई मानो कह रही हो मुझे मत मारो।
  
बस इतने में ही मुझ पर कहर टूट पड़ा।  मेरी तरफ ताक रही उसकी बांई, मोटी तथा फैली हुई आँख में एक आँसू उभरा और धीरे से नीचे की ओर लुढ़क गया। कैसी आँख थी! बेबस! लाचार! हिरणी की आँख जैसी।
  
मैं दरवाज़ा बंद करके बाहर आ गया।
   हिरणी की आँख! अब सीधे मेरी तरफ ताक रही थी। बाहर बैठा मैं काफ़ी देर तक सोचता रहा। आँख मेरी तरफ ताकती रही। मेज से, छत में से। हर उस वस्तु में से जिसकी ओर मैं देखता था।
  
बचपन में बीता एक हादसा मुझे याद हो आया। तब दस-बारह बरस उम्र रही होगी मेरी। एक दिन कुछ लोग गाँव से बाहर शिकार खेलने गए। गर्मियों के दिन थे। मैं भी साथ हो लिया। दिन भर कोई शिकार न मिला। न खरगोश, न तीतर, न बटेर। कोई भी शिकार सामने नहीं आया। शाम गहरा रही थी। थके-हारे से हम टीले पर से होते हुए गांव को लौट रहे थे। अचानक टीले की आड़ से एक हिरणी कुलांचे भरती हुई सामने आ गई। शिकारियों की खुशी का ठिकाना न रहा। राईफल वाले ने घुटनों के बल बैठ कर निशाना साधा। हिरणी फिर छलांग लगाकर एक तरफ हो गई। जीवन और मृत्यु की यह आँख-मिचौनी कुछ देर तक जारी रही। अंतत: वह हमारे सामने आ खड़ी हुई। अनजान सी। और ठांय की आवाज़ से एक गोली चली। हमारे देखते ही देखते वह टीले पर गिरी और तड़पने लगी। शिकारी उछलते-कूदते उसकी तरफ बढ़े। मैं भी उसके समीप जा खड़ा हुआ। थोड़ा सा हटकर। वह अभी भी तड़प रही थी। मेरी तरफ देख रही थी। उसकी मोटी-मोटी आँखें और भी फैल गई थीं। फिर मेरी तरफ तकती उसकी बाईं, मोटी और फैली हुई आँख से आँसू निकला और उसके बांए कपोल पर लुढ़क गया।


          O          O              O


   आँख अब भी मुझे तक रही थी। मेरे कमरे की हर चीज़ में से। बाहर बैठा मैं काफ़ी कुछ सोचता रहा। मेरी हालत राईफल वाले उस शिकारी जैसी थी। मैं जो भी चाहता, कर सकता था। जो भी ! मेरी कोठी के शयन-कक्ष में एक महिला लेटी हुई थी। अबला, बेबस तथा लाचार। उस हिरणी जैसी।
  
ज़ेहन में कितने ही ख़याल आए उस रात। पाप के, पुण्य के। सोचते-सोचते कब मेरी आँख लग गई पता ही नहीं चला।

सुबह मेरी आंख देर से खुली। शयन-कक्ष का दरवाज़ा बंद था। मैं
नहाया-धोया। कमरे की वस्तुओं को इधर-उधर सहेजता रहा। दरवाज़ा अभी भी बंद था। पता नहीं कितनी रातों से वह सो नहीं पाई होगी। अब, अंदर गहरी नींद सो रही है। उठेगी तो साथ-साथ चाय पीयेंगें। बातें करेंगे। सुख-दु:ख आपस में बांटेंगे। बात कैसे शुरू करूंगा। मैं सोचता रहा। अंतत: चाय बना ली।

   धीरे से दस्तक दी मैंने दरवाज़े पर। फिर ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया। न ही उसने आवाज़ दी और न ही दरवाज़ा खुला। मैंने धीरे से धक्का देकर दरवाज़ा खोला।  अंदर झांका। वह लेटी हुई थी। सीधी। आँखें खुली हुईं थीं। मैं घबरा गया।

   बाहर आकर पागलों की तरह चक्कर काटने लगा। फिर हिम्मत जुटा कर मेजर मल्होत्रा को फोन किया। दुबे और वह दोनों आ गए। पड़ोसियों को भी बुला लिया। अंदर गए। मल्होत्रा ने आगे बढ़कर उसकी खुली तथा फैली हुई आँखों को बंद कर दिया।

   मृत्यु का समाचार उसी वक्त मुख्यालय को दिया गया।
   अब वे समझते हैं कि यह गुनाह मैंने किया है। मुझे इस बात की परवाह नहीं कि वे मुझे सज़ा देंगे या बरी कर देंगे। परंतु एक बात से मैं जीते जी कभी मुक्ति नहीं पा सकता। अपने अंतर्मन के गुनाह के अहसास से। और वह, यह कि उस रात मैं उसके पास ही क्यों नहीं लेटा। अगर ऐसा करता तो शायद वह बच जाती।



 अनुवाद - नीलम शर्मा "अंशु'
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