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शनिवार, जनवरी 27, 2018

कहानी श्रृंखला -17 (पंजाबी) / कपास की ढेरियां - परवेज संधु

पंजाबी कहानी


कपास की ढेरियां

                                                                       0  परवेज संधु

                   पंजाबी से अनुवाद नीलम शर्मा अंशु



अक्सर ही रात के अंधेरे में सारा घर जब  गहरी नींद के आगोश में होता है तब मेरे भीतर मेरा गाँव जाग रहा होता है। मेरा गाँव, गाँव की गलियां.......खेत....पगडंडियां.... गाँव का गुरुद्वारा.....गाँव के घर चौबारे..... और उन घरों के चौबारों में बसते वे लोग जिनसे बिछुड़े युगों बीत गए हैं परंतु फिर भी गाँव मेरी रूह के किसी कोने में ज्यों का त्यों ही बसता है। इतने बरसों में वो पहले वाला हेरवा नहीं रहा परंतु फिर भी मेरे दिल में गाँव अभी भी धड़कता है। वहाँ रहते लोग, रिश्तेदार, दोस्त, सहेलियां कभी-कभार धड़कन बनकर साँसों में आ बसते हैं।
      छोटा सा गाँव। एक छोर से आवाज़ दो तो दूसरे छोर में सुनाई दे जाए। एक ही गुरुद्वारा..... हर इतवार को गुरुद्वारे के रास्ते में रंग-बिरंगे दुपट्टे उड़ते नज़र आते। हँसते-खेलते लोगों को मानों  हर  इतवार का मेले की भाँति इंतज़ार रहता। बचपन में हर गहरे रंग से मुहब्बत हो जाती है परंतु हल्के
रंगों की उदासी के रहस्य को समझने की परिपक्वता नहीं होती। ऊँचे चौबारों में रहने वाले बच्चों को कच्ची कोठरियों में बसते बचपन के दर्द का अहसास नहीं होता। बचपन क्या जाने भला बुढापे की डंगोरी की मजबूरी को परंतु कुछ तो था जो तब भी मेरे भीतर सुलगता था जब मेरा बचपन उस गाँव की राहों पर बेखौफ़ दौड़ता फिरता था।
गाँव में एक ही गुरुद्वारा था परंतु एक ही गाँव में दो शमशान थे।
ज़िंदा व्यक्ति एक ही गाँव में रहते हैं और मरने के बाद अलग शमशान में क्यों जाते हैं? एक शमशान में गाँव के सिर्फ़ एक वर्ग के लोगों की अर्थी जाती है और दूसरे में गाँव के दूसरे वर्ग और मृत पशुओं को क्यों ले जाया जाता है?     
जब से मेरे बालमन ने अपने आस-पास को समझना शुरू किया था, इन बातों के सवाल-जवाब रूपी झंझावात मेरे भीतर उठने लगे थे और मुझे आज भी याद है कि गाँव के बड़े शमशान के पास से गुज़रते वक्त मेरा दम निकल जाता था परंतु गाँव के बाहर वाले शमशान से मुझे कभी भय नहीं लगा था । परंतु वहाँ से गुज़रते वक्त कुछ सवाल मेरे भीतर ज़रूर उठते.... इस शमशान को हड्डरोड़ी क्यों कहते हैं ? हर बार मेरे भीतर से सवाल उठता......इन सवालों के बारे सोचते वक्त मैं शायद डर नाम की चीज़ को भूल जाती थी।
शायद इन सवालों का बीज-वपन मेरे भीतर मेरे बापू ने किया था। जाति-धर्मों को न मान कर हर गरीब ज़रूरतमंद के साथ खड़े होना मेरे बापू के असंख्य गुणों में से एक बड़ा गुण यह भी था। यह मेरा बापू ही था जो सुबह-सुबह खेत जाते वक्त अपने कामगारों को बुलाने जाता तो उनके घरों पर चाय पी लेता था और कई बार इस बात का बतंगड़ बना कर हमारे पड़ोसी ब्राह्मण परिवार की बुजुर्ग महिला मेरे बापू से लड़ने आ जाती और मेरा बापू हँस कर कह देता,
बुढ़िया! चाय मैंने पी है, पर पता नहीं तुम्हारे पेट में क्यों दर्द होने लगता है।
और फिर बडबड़ाती हुई वह अपने घर जा घुसती। उस वक्त मुझे अपने बापू में किसी हीरो की छवि नज़र आती।
बचपन वाली बुद्धि धीरे-धीरे परिपक्व होती जा रही थी और उम्र के साथ-साथ ऐसे सवाल और भी सर उठाने लगे थे। इतना अंतर क्यों था ?  यह कभी समझ नहीं आया....बचपन चला गया परंतु गाँव की नुहार नहीं बदली। गाँव छोड़े युगों बीत गए।
सुना है अब गाँव बदल गया है। गाँव के लोग बदल गए हैं।

गाँव कैसे बदला होगा ?  वहाँ के लोग कैसे बदले होंगे ?
शायद वहाँ के हर अमीर-गरीब घरों की छतों के रंग एक से होंगे  ?  
या फिर गाँव के शमशान में जाति-पाति, धर्म नहीं देखे जाते होंगे ?     
या फिर शायद मेरे गाँव की कपास चुनने वाली औरतों के बच्चे भारी, फूलदार, मंहगी और गर्माहट वाली रजाईयों में सोते होंगे।
अक्सर बेतुके सवालों के जवाब अपने भीतर ढूंढती मैं बचपन की यादों में खो जाती हूँ जब मेरी माँ गरीब औरतों के झुंड के साथ कपास चुनने जाया करती थी। माँ की वे साथिनें सारा दिन सहेलियों की भाँति हँसती, खेलती, गीत गाती माँ के साथ पीठ पर झोले लटकाए कपास चुना करतीं। और दिन के अंत में अपने-अपने झोले की कपास को माँ के आँगन में ढेर करके खुद दूर जा बैठतीं। यही औरतें जो सारा दिन मेरी माँ के साथ मिलकर हँसती और मज़ाक करतीं परंतु दिन के आखिर में दूर ऐसे क्यों बैठ जाती हैं मानों वे मेरी माँ को जानती तक न हों। अपने दुपट्टों की बुक्कलों को संभालती चुपचाप कभी वे माँ को तकती और कभी कपास को घूरतीं।......और मेरी बचकानी नज़र को यह अच्छा न लगता।
मेरी माँ हर झोले की कपास के दो-दो हिस्से बना देती। देखत-देखते हर झोले में से दूध सी सफेद कपास का एक बड़ा ढेर बन जाता और एक छोटी सी ढेरी कपास चुनने वाली के झोले में डाल दी जाती। बड़ा ढेर मेरी माँ के आँगन में रखा रहता। वे औरतें जो सारा दिन माँ के साथ मेहनत करतीं, पसीने से तरबतर होतीं वे कपास की छोटी सी ढेरी उठा कर माँ को दुआएं देती हुईं अपनी-अपनी राह चल पड़तीं और मुझे कपास की ढेरी के पीछे बैठी मेरी माँ बहुत ही बेईमान लगती।

यह अंतर मुझे समझ न आता......और मेरी माँ को मेरे सवालों के जवाब कभी न सूझते।
और आज मेरे गाँव वाले कह रहे हैं कि गाँव बहुत बदल गया है.......जब गाँव के बदलाव के बारे सोचती हूँ तो लगता है शायद अब कपास की ढेरियां बराबर हो गई हों पर अब भी जब बरसों बाद गाँव जाती हूँ तो कुछ नए सवाल और दर्द सूटकेस में भर कर ले आती हूँ। मेरा गाँव अभी भी ज्यों का त्यों ही है। गाँव में प्रवेश करते ही अभी भी मेरा सर हड्डारोड़ी के सामने ही झुकता है। हर मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारे और गाँव के शमशान जहाँ हमारे गाँव के बड़े बुजुर्ग बसते हैं उस जगह शीश झुकाकर गुज़रना मेरे बापू ने ही मुझे सिखाया था जो इतने बरसों बात भी मैं नहीं भूली। गाँव में प्रवेश करते ही यह पहली जगह है जिससे मेरा सामना होता है.....जहाँ अभी भी एक तरफ पशुओं के पिंजरों को गिद्धों ने घेर रखा होता है और थोड़ी दूर किसी इन्सान की बुझी चिता की राख।
मैँ इस गाँव की बेटी हूँ ?
जहाँ इन्सानों, भैंसों, कटुओं, बैलों का एक ही शमशान में दाह संस्कार किया जाता है और मैं वहाँ से गुज़रते वक्त शर्मसार ज़रूर महसूस करती हूं। कहते हैं गाँव के गुरुद्वारे का अहाता संगमरमर का बना दिया गया है।
  
 मुझे कुछ बदलाव नहीं दिखता। कुछ बेबस चेहरे, कुछ मजबूर नक्श मेरी रूह के कोनों में बस जाते हैं। उन लोगों का तंगहाल जीवन देख भरे मन से गाँव से लौट आती हूँ। कुछ ऐसे ही लोग मेरी रूह में तब तक लुकाछिपी खेलते रहते हैं जब तक वे मेरे अक्षरों में नहीं ढल जाते।
      वे लोग बचपन में भी वहीं थे। उनके घुटन भरे जीवन भी वहीं थे परंतु तब इन सब बातों को सोचने की मेरे पास बुद्धि नहीं थी.... तब कपास की छोटी-छोटी ढेरियों के पीछे का कड़वे सच की समझ नहीं थी। बचपन में जिन चीज़ों का अहसास भी नहीं होता, बड़े होने पर उन्हीं बातों के अर्थ बदल जाते हैं। बड़ों की जिन बातों पर तब हंसी आ जाया करती थी, उन बातों के अर्थ अब समझ में आते हैं और फिर दिल कहीं गहरी उदासी में डूब जाता है।

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      इस बार गाँव गई तो लौटते वक्त कितना ही बोझ साथ उठा लाई। माँ के साथ कपास चुनती वे औरतें याद आईं....कपास की छोटी-बड़ी ढेरियां कई बार मेरे आँखों के समक्ष आकर खिलखिला कर हंसी और कई बार उदास हो गईं। वैसे गाँव में कुछ तो बदला था। कच्चे घर पक्के घरों में तब्दील हो गए थे।  लोगों ने अपने घरों के लोहे के गेट और भी बड़े कर लिए थे।
      बड़ी-बड़ी कारों और कोठियों को देख कर एक पल के लिए तो लगा कि मानो अब इस गाँव में सभी बराबर होंगे... अधिक नहीं तो कुछ तो बदला होगा। कितने ही दिनों तक सोचती रही थी।
      गाँव में बहुत से नए चेहरे देख मुझे अपना चेहरा बेगाना सा जान पड़ा। नई पीढ़ी के लिए मैं कोई पुरानी सी ख़बर थी। गाँव की वे गलियां जहाँ मैं बिना नागा दौड़ती-फिरती रहती थी.... पड़ोसियों के द्वार जो कभी मेरे लिए बंद नहीं हुए थे अब मेरे हाथों की दस्तक से दहल जाते। कुछ पिंजर बने उम्रदार बुजुर्गों के काँपते हाथों ने जब मेरा सर सहलाया था तो मेरा रो पड़ने को जी चाहा था। और उन्हीं पुराने चेहरों में से एक बचपन के कुछ भोले-भाले नक्श मेरे सामने आ खड़े हुए और एक पल के लिए मुझे वह सारा गाँव अपना सा लगने लगा।.... वे नक्श थे रानी के, मेरी बचपन की सहेली... हमारे गाँव के राजा की बिटिया रानी.....वह नन्हीं सी बच्ची जिसके साथ मैं पता नहीं कितनी बार गलियों, आँगन में खेली होऊंगी। एक-दूसरे के साथ घर-घर खेलते हुए कितनी बार लड़े होंगे.....
      रानी ने मुझे गले से लगा लिया, बरसों की बिछुड़ी। बचपन की कुछ बातें सांझा कीं। बहुत कुछ भूला हुआ याद किया।
      रानी की माँ को हम चाची कहा करते थे। साँवली सी रंगत वाली इस चाची के सर पर मटमैला सा दुपट्टा होता, अधढका सा चेहरा, आधा घूंघट, दुपट्टे का एक कोना सख़्ती से होठों में भींचा हुआ। कई बार पुराने सूट के साथ रंगीला दुपट्टा लेकर मुहल्ले के घरों के दरवाज़े खटखटा कर वह गाँव के ब्याह-शादियों और सगाई के दिनों में लोगों को निमंत्रण देती।
मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने कभी चाची को पास से चुपचाप गुज़रते देखा हो। जिधर से गुज़रती दुपट्टा संवारती आने-जाने वालों के दुआएं देती।
      अरी बिट्टो, तू राजा के घर जाए......रब तुझे झोलियां भर-भर दे, दूधों नहाए पूतों फले।‘’
और अगर कोई परदेस से लौटी मिल जाती तो उसकी आशीष भी बदल जाती।
      नी तू सुंदर देश की रानी, तू सुंदर-सुंदर पोशाकें पहने, वाहगुरु तुझे ढेरों दे... बिटिया जाते वक्त अपना ये पुराना सूट इस गरीबड़ी को देते जाना, रब तुझे सुखी रखे।
      और पता नहीं क्या-क्या कहती वह अपना काम करते जाती जैसे उसके भीतर आशीषों का भंडार हो। मैं और रानी एक साथ खेलते। तब अमीरी और गरीबी का पता नहीं था परंतु इतना ज़रूर पता था कि रानी के पास वैसी फ्रॉकें नहीं थी जैसी बाकी बच्चों के पास होतीं। उसकी चोटियां बाकी लड़कियों की भाँति सुंदर रंगीन रिबनों से न गूंथी होतीं। और ब्याह-शादियों पर जब मेरे जैसे बच्चे सुंदर पोशाकें पहन कर खेलते तो रानी अपनी माँ के साथ शादी वाले घर में बर्तन मांज रही होती या अपनी माँ का हाथ बंटा रही होती।
      और रानी का पिता रिश्तेदारों को दिन-बार के संदेसे देकर आता। शादी-सगाई वाले दिनों में वह गुलाबी पगड़ी बांधे साइकिल पर दसूती कढ़ाई वाला सफेद झोला लटकाए चलता-फिरता अक्सर नज़र आता। हम बच्चों के लिए वह चाचा था परंतु गाँव वालों का वह राजा था उसकी शक्ल-सूरत या रहन-सहन किताबों वाले राजाओं से नहीं मिलता था परंतु सारा गाँव उसे राजा ही कहता था। मुझे यह अंतर कभी समझ नहीं आया था कि वह किस रियासत का राजा था।
      यह अंतर क्यों था ? तब इतनी समझ नहीं थी। इतना ज़रूर पता था कि कुछ तो है जो ठीक नहीं था। ब्याह-शादियों में कुछ लोग बाहर आँगन में नीचे बैठ कर खाना क्यों खाते हैं ? उनके बर्तन क्यों अलग हैं रानी की माँ जैसी औरतें सारा दिन घरों में काम करती हैं परंतु दिन के अंत में घर की मालकिन कड़छी थामें पतीले के पास खड़ी होती है और उनके बच्चों के चेहरों पर एक अजीब सी मासूमियत होती। वे अपने हमउम्र बच्चों की तरफ बेचारगी से देखते....उनकी सुंदर पोशाकों को देखते। यह एक अंतर था जो मुझे तब अखरता था। मैं अपनी माँ से अक्सर सवाल पूछा करती जिनके जवाब मेरी माँ को कभी पता न होते।
ज़िंदगी तब बहुत ही छोटी थी बचपन की भाँति। और बचपन कब आया और कब चला गया पता ही नहीं चला। सालों बीत गए, गाँव की यादों के साथ गाँव के लोग भी आते और चले जाते। जब भी गाँव जाती तो मेरे साथ की लड़कियों में से कोई न कोई मायके आई मिल जाती। बाकियों से मिलने की आकांक्षा लिए मैं खुद से दुबारा मिलने का वादा कर गाँव से लौट आती।
और इस बार मेरे सामने रानी आ गई अचानक ही.....।
गाँव के गुरुद्वारे की रसोई में सुबह-सुबह प्रवेश किया तो अचानक मेरी आँखें खुली की खुली रह गईँ। वही नक्श, सर पर मैला सा दुपट्टा, वही साँवला रंग, वही बेबसी चेहरे पर.....मुझे पल भर के  लिए लगा मानो चाची साक्षात् मेरे सामने आ गई हो परंतु यह चाची नहीं थी, यह मेरे बचपन की सहेली रानी थी, हमारे गाँव के राजा की बेटी जिसका नाम रानी था।....वह दूर से दौड़ी आई और मेरे करीब आकर रुक गई....मानो मुझे आलिंगन में लेने से झिझक रही हो।
मैंने आगे बढ़कर उसे आलिंगन में ले लिया और मेरे मुँह से माय गॉड निकल गया।
रानी की आँखों में आँसू थे।
बहन पहचान लिया ? बहना आँखें तरस गई थीं तुझे देखने को, जिस दिन से पता चला कि बहन आई है उसी दिन से सोच रही हूँ कि इस बार बहन से ज़रूर मिलूंगी।
मुझे लगा मानो मेरे सामने रानी नहीं कोई बुजुर्ग महिला खड़ी हो। यह वह रानी नहीं थी जिसके साथ मैं बचपन में खेला करती थी....यह तो कोई मेहनत-मशक्कत से टूट चुकी और मजबूरियों के टोकरों से दबी हुई उम्र से पहले ही बूढ़ी हो गई कोई औरत थी जिसे मैं पहली बार देख रही थी। और अखंड-पाठ के तीन दिनों में हम दोनों ने बहुत कुछ सांझा कर लिया। जब कभी मैं रसोई घर में जाती वह दौड़ कर मेरे लिए पीढ़ा ले आती और लंगर वाला साफ-सुथरी थाल एक बार फिर से पोंछ देती।  मेरे साथ बातें करते-करते दुपट्टे के छोर से अपने चेहरे के पसीने को पोछती और बातें करते-करते सलवार का पहुँचा ऊँचा करके टाँग और टखने को खुजलाने लगती। ..... उसमें एक भी वह बात नहीं थी जो उस उम्र की औरतों में होनी चाहिए। मेरे सामने मानों कोई बुजुर्ग महिला घूम-फिर रही हो जिसे मैंने कहीं देखा था परंतु कभी जाना नहीं था।
और एक दिन मैंने हिम्मत करके उससे उसकी ज़िंदगी के बारे पूछ ही लिया। उसने बताया कि वह शादीशुदा है और उसके बच्चे भी हैं।  एक जवान हो रही बेटी है जो पढ़ने में बहुत ही होशियार है और बेटी की बातें करते वक्त उसका चेहरा दमक उठा।
बहन मेरी बिटिया पढ़ाई में बहुत अच्छी है। मैं सोचती हूँ कि मेरा तो जो बनना था बन गया, आगे बेटी की ज़िंदगी बन जाए....हमारी तो आधी गुज़र गई ऐसे ही......पहले माँ यही करती थी अब मैं ससुराल से आ जाती हूँ जब कभी गाँव में कोई ब्याह-शादी होती है.....अभी पिछले हफ्ते आई तो अमुक की शादी थी। मैंने सोचा माँ से भी मिल आती हूँ और ब्याह भी निपटा लूं....बस तुम जैसे भाई-बहनों के सहारे ज़िंदगी कट जाएगी। जीती-बसती रहो तुम सुंदर मुल्क की रानी....रब तुझे झोलियां भर-भर कर इतना दे कि तू संभालते-संभालते थक जाए.... बहन एक बात और...... और उसकी आवाज़ पहले से धीमी हो गई थी।
गुरुद्वारे वालो ने हमारा नेग तय कर रखा है, बहन कुछ नहीं बनता इतने से.....पर क्या करें कोई नहीं सुनता.... मेरी बहन जाते वक्त कुछ ज़रूर दे जाना.... किसी से कहना मत, कमेटी वाले गुस्सा करते हैं अगर हम किसी से कुछ माँग लें तो या फिर अगला अपनी मर्ज़ी से कुछ दे जाए तो।
मैं हैरान थी।  गुरुद्वारे की दो मंजिलें और बन गई थीं। संगमरमर के फर्श के साथ सरोवर का फर्श भी गहरे नीले पत्थर का बना लिया गया था। घर वालों ने बताया था कि करोड़ों के हिसाब से गुरुद्वारे का पैसा बैंक में रखा है। आखिरी मंज़िल पर एक लाइब्रेरी भी बना दी गई थी जिस में धार्मिक किताबें भी पढ़ने को मिलती हैं। मैं सोच रही थी कि हमारे गुरु नानक ने तो मानुष की जात सभै एको पहचानबो की बात घर-घर पहुँचाई थी परंतु फिर भी यह विभाजन क्यों ?
और अचानक मुझे महसूस हुआ यह रानी नहीं थी.....यह चाची का कोई नया रूप मेरे सामने था... वही नक्श....वही आवाज़...वही दुआएं। और मैं उसके मुँह की तरफ देखते हुए उदास हो गई थी। मुझ से पाँच-सात साल छोटी लड़की किसी बुजुर्ग की भाँति मुझे आशीषें दे रही थी। यह हमारे गाँव के राजा की बेटी है....इसे तो राजकुमारियों की भाँति होना चाहिए था.... इस लड़की का बचपन भी लोगों की उतरन पहन-पहन कर गुज़रा....जवानी भी और आने वाले दिनों की तस्वीर भी इसके चेहरे से साफ़ झलक रही थी....।
ज़िंदगी ऐसी नहीं होनी चाहिए थी......।
मेरा मन उदास हो गया था। और मैं सोच रही थी कि गाँव नहीं बदला था....गाँव के लोग नहीं बदले....और ये लोग किस बदलाव की बात करते हैं ? गाँव के बाहर बने प्रवासियों के बंगलों के बदलाव की बात करते हैं या अमीरों के चौबारों पर बनी रंग-बिरंगी पानी की टैंकियों की ?
और फिर रानी ने आस-पास की औरतों की तरफ देखा और पहले से भी धीमे स्वर में कहा,
और कुछ नहीं तो अपना ये पुराना सूट ही दे जाना, मेरी बेटी पहन लेगी, तुझे दुआएं देगी, जीती-बसती रहो बहन....बुढसुहागन हो.....बहन मेरा रोम-रोम तुझे आसीसें देगा..... सुंदर देस की रानी रब तुझे बहुत दे।
पता नहीं अचानक मेरे मुँह से कैसे निकल गया....
हाय रानी तू तो बिलकुल चाची की तरह बातें करने लगी है.....ये बातें तूने कैसे सीख लीं ?
रानी ने दुपट्टे के छोर से आँखों की नमी पोंछी।
बहन ये पापी पेट सब कुछ सिखा देता है......
और एक आह उसके सीने से निकल कर मेरी रूह को चीर कर निकल गई।
अब जब कभी भी रात के अंधेरे में मेरे इस देश की दुनिया बेसुध सो रही होती है तो मेरे ज़ेहन में गाँव के लोग जीते-जागते मेरे साथ लुका-छिपी खेल रहे होते हैं और आँगन में बैठी मेरी माँ कपास की छोटी-बड़ी ढेरियां बना रही होती....पता नहीं मुझे क्यों लगता रहता है कि मेरी माँ के हिस्से की कपास वाला ढेरी पहले से भी ज़्यादा ऊँची हो गई है और रानी के हिस्से की ढेरी सिकुड़ कर छोटी सी हो गई लगती है......।




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साभार - कथादेश (मासिक) अगस्त, 2017





लेखक परिचय 




 परवेज संधु - 

1978 से अमरीका में निवास।  मुट्ठी भर सुपने, टाहणीओं टुट्टे, कोड ब्लयु नामक तीन पंजाबी कहानी संग्रह प्रकाशित। 12 वर्ष की आयू में प्रथम कहानी प्रकाशित।




 नीलम शर्मा अंशु- हिन्दी से पंजाबी,  पंजाबी, बांग्ला से हिन्दी में अनेक साहित्यिक पुस्तकों के अनुवाद। अनेक लेख, साक्षात्कार, अनूदित कहानियां-कविताएं स्थानीय तथा राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। स्वतंत्र लेखन। लंबे समय तक आकाशवाणी कोलकाता के एफ. एम. से बतौर रेडियो जॉकी जुड़े रहने के बाद अब आकाशवाणी दिल्ली एफ. एम. रेनबो इंडिया में रेडियो जॉकी। संप्रति केंद्रीय सरकार सेवा, दिल्ली में कार्यरत।      
सम्पर्क rjneelamsharma@gmail.com

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