0 हमदर्दवीर नौशहरवी
अनुवाद - नीलम शर्मा ‘अंशु’
मेरा नाम गीता है। मैं टेलिफोन एक्सचेंज में ऑपरेटर हूँ। कन्या उच्च महाविद्यालय से मैंने हायर सेकैडरी पास की। उन्हीं दिनों टेलिफोन ऑपरेटर की रिक्तियां निकलीं। मैंने भी आवेदन कर दिया। प्रशिक्षण के लिए मुझे चुन लिया गया। प्रशिक्षण के पश्चात् मेरी तैनाती स्थानीय टेलिफोन एक्सचेंज में हो गई। एक्सचेंज घर से काफी दूर था। रिक्शा में जाना पड़ता था। मेरी मम्मी मेरी बहुत चिंता किया करती थीं। अकेली जवान बेटी मर्द की रिक्शा पर... कुछ दिनों तक तो वे मुझे पहुँचाने जाती रहीं, परंतु यह सिलसिला ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सकता था। वे खुद भी तो नौकरी करती थीं।
‘बेटा किसी वृद्ध रिक्शा वाले की रिक्शा पर ही सवार होना। वह अगर पूरबीया हो तो और भी अच्छा है। सीधे घर ही आना। कहीं रुकना नहीं। घर आकर, भीतर घुसते ही दरवाज़ा भीतर से बंद कर लेना। अगर कोई दरवाज़ा खटखटाए भी तो बिना नाम-पता पूछे दरवाज़ा नहीं खोलना। पहले दरवाज़े की झिर्री में से देख लेना कि बाहर कौन खड़ा है। अगर किसी से बात भी करनी हो तो कम से कम बोलना है। सिर्फ़ हाँ जी, नहीं जी ही कहना है। हर सवाल का जवाब ‘मुझे तो पता नहीं जी’कह कर ही देना है। नज़रें झुकाए रखनी हैं। हँस कर बात नहीं करनी। आजकल के लोग हँसी का गलत अर्थ लेते हैं।’
मम्मी लगभग रोज़ ही मुझे ऐसी हिदायतें दियाकरती थीं, परंतु मैं तो टेलिफोन ऑपरेटर हूँ, बोलना और सुनना मेरा पेशा है। मैं रोज़ अनेक अजनबियों की आवाजों का जवाब देती हूँ। हैलो कहती हूँ। दो व्यक्तियों को आपस में मिलवाती हूँ। मैं एक सेतू हूँ। दूर स्थित दो किनारों के एक पुल पर आपसी प्यार मुहब्बत करने वालों को मेरे अस्तित्व का अहसास ही नहीं होता। काश मेरा भी कोई अपना किनारा हो। आम तौरपर अमन की डयूटी मेरे साथ ही होती है। वह मेरे साथ ही ऊँची कुर्सी पर बैठता है। जवान है, सुंदर है। तारों के घेरे में मेरे दिल की तार शायद उस तक नहीं पहुँचती। आवाज़ों के जंगल में शायद उसकी आवाज़ मुझ तक नहीं पहुँचती। मुझसे अगर उसे कोई बात करनी हो तो वह भी फोन के माध्यम से ही करता है। बहुत परेशान है, माँ बीमार है। और, कोई है नहीं। वक्त का पता नहीं चलता कैसे सरकता जाता है. परतु हम चलते ही नहीं...... मैं उसे फोन करने में कभी पहल नहीं करती। डर सा लगता रहता है। सोचती हूँ कभी उससे कहूँ कि इयरफोन उतार कर भी कोई बात सुनो। माउथ पीस हटा कर भी कभी कोई बात किया करो।
जब कोई प्यारा सा स्वर मुझे फोन मिलाने के लिए कहता है और उधर फोन न मिले या फोन ख़राब हो या एंगेज हो तो मुझे बहुत दुःख होता है। पता नहीं बेचारे का कितना अरजेंट मैसेज था।
हाँ, मेरा भी बहुत अरजेंट मैसेज है परंतु यह मैसेज किसे दूं? पिता बीमार हैं। दीदी खड़े-खड़े बूढ़ी हो गई है। उसे खुद से ज़्यादा हमारी फिक्र है।
रोज़ ही आकर सीधे अपने कमरे में चली जाती हूँ। बिस्तर पर गिर पड़ती हूँ, किसी से कोई भी बात करने को जी नहीं चाहता। वैसे बात करने के लिए होता ही कौन है ? कभी-कभी लेटे लेटे ही खुद से बातें करती हूँ तो लगता है कि यह तो मेरी आवाज़ ही नहीं। मानो कोई और ही बोल रहा हो। अपनी सारी आवाज़ तो मैं टेलिफोन एक्सचेंज में ही छोड आती हूँ। पिताको मेरे घर आने का पता तो चल जाता है परंतु मेरे कमरे में प्रवेश करने के फौरन बाद ही वे मुझे आवाज़ नहीं देते। पंद्रह-बीस मिनट बाद आवाज़ देते हैं। उन्हें सदा अहसास होता है कि काम से लौट कर मुझे साँस लेने के लिए भी कुछ समय चाहिए। पिता जी के सदा ऐसे ही शब्द सुनने पड़ते है। अब तो इन शब्दों की आदी हो गई हूँ मैं। पता ही नहीं चलता। सिर्फ़ उस बात का पता चलता है जो पिताजी ने बगैर किसी माँग के की हो ‘पुतर अपना ख़याल रखा करो। जल्दी मत मचाया करो। थोड़ा सब्र किया करो। यह अख़बार तो पकड़ाना ज़रा। सुबह से अख़बार देखी ही नहीं।’परतु, आज तो पिताजी बोले ही नहीं। देखूं तो सही।
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मेरा नाम बिमला है। मैं एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका हूँ। बी. ए. पास हूँ। अच्छे अंक पाए हैं। बी. एड. में दाखिला तो मिल गया था परंतु मैने बी. एड. नहीं की। दीदी पर मैं और बोझ नहीं बनना चाहती थी। काम करके दीदी का हाथ बँटाना चाहती थी। अंग्रेजी माध्यम का स्कूल है। ऑक्सफोर्ड पब्लिक स्कूल। तीन कमरे हैं, पाँच कक्षाए हैं। छोटे-छोटे बच्चे, भारी-भारी बस्ते। हर विषय को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाना आवश्यक है। मैं अंग्रेजी पढ़ाती हूँ। ज़ोर-ज़ोर से बोल-बोल कर रटवाती हूँ। सप्ताह के सात दिनों के नाम, शरीर के सात अंगों के नाम, सात फलों के नाम, सात सब्जियों के नाम। बच्चे न समझें तो मैं पंजाबी में अग्रेजी पढाती हूँ। स्कूल के नियमों का उल्लंघन करती हूँ, परंतु बच्चे खुश हैं। बच्चे समझते हैं, बच्चे सात फलों का स्वाद पूछते हैं परंतु फल दूर हैं, स्वाद खट्टा है।
सुबह से लेकर शाम तक काम ही काम है परंतु तनख्वाह कुछ भी नहीं। बी. एड. पास टीचर को ढाई सौ रुपए मिलते हैं। बी.ए. पास को दो सौ रुपए और बी.ए. से नीचे वालों को डेढ सौ रुपए। हम छह टीचर है, चार महिलाएं या यूँ कहें कि लड़कियां हैं और दो पुरुष या लड़के। सभी जैसे एक दूसरे से रूठे हुए हों। शायद खुद से भी नाराज़ हैं, हूँ-हाँ से ज़्यादा कोई बात नहीं करता। कोई हँसता नहीं। सभी मानो निराश हैं, विवादग्रस्त हैं। हर कोई यहाँ से भागने की कोशिश में है परतु उड़ने लिए यहाँ कोई आसमां ही नहीं, मजबूर है सभी।
पवन एम.ए.बी.एड. है। कभी-कभी निराशा के दो शब्द बाँट लेता है। मैं कोई हुंगारा नहीं देती। डरती हूँ कहीं हमारे दो शब्दों से स्कूल का अनुशासन ही न भंग हो जाए। सोचती हूँ, पवन को घर पर बुलाऊँ। हिम्मत नहीं होती। मम्मी का साया तो अब सर पर रहा नहीं। बड़ी सख्त मिजाज़ थीं मेरी मम्मी। बात-बात पर रोकना, टोकना, मनाही, अकेले बाहर नहीं जाना, यह नहीं करना, वह नहीं करना। उस वक्त मम्मी बहुत बुरी लगती थीं। कई बार बहुत गुस्सा आता था परंतु अब... अब मम्मी की बहुत याद आती है।
स्कूल से थकी-हारी लौटती हूँ। आते ही अपने कमरे में आ जाती हूँ। मेरा कमरा अलग नहीं एक ही कमरे में पेटी और संदूक रखकर उसके दो हिस्से बनाए गए हैं। इस कमरे का एक हिस्सा मेरे पास है और दूसरा कमला के पास। कमरे में घुसते ही कुछ मिनटों बाद पिताजी की आवाज़ आती है। घर आतेही मुझे पिताजी की आवाज़ का इंतज़ार रहता है मानो यह आवाज़घर आने पर मेरा स्वागत करती हो,‘पुत्तर, तू बहुत थक गई होगी। अगर मैं काम करने योग्य होता तो तुझे और पढ़ाता। तू किसी अच्छे स्कूल मेंपरमानेंट टीचर होती। तुझे पूरे ग्रेड मिलते।’बड़ी अजीब बात है। मुझे आए हुए आधा घंटा हो गया है। पिताजी की आवाज़ आई ही नहीं। पिताजी का हुक्म है कि जब तक वे न बुलाएं तब तक कोई उनके कमरे में न जाए। बिना बुलाए कोई उन्हें बेआराम नहीं करेगा परंतु आज अब तक पिताजी ने कुछ कहा नहीं। जाकर देखूं ती सही।
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मेरा नाम कमला है मैं सरकारी प्रसूति अस्पताल में सेविका हूँ। जब तक मुझे अपना नाम समझ आया, मेरा नाम खो चुका था। मुझे सभी डायन कह कर पुकारते थे। मैं चार बहनों में सबसे छोटी हूँ। मेरे पैदा होते ही मेरी माँ गुज़र गईं।
जब मुझे यह बात समझ आई कि मेरी माँ मेरे आते ही क्यों चली गई तो मुझे इस अपनी पैदाईश पर पश्चाताप हुआ। दाई ने कहा बेटी हुई है।
‘फिर बेटी!’ ये मेरी माँ के अंतिम शब्द थे और मेरी माँ गुम हो गई। सदा के लिए मौन। पत्थरबन गई। निर्जीव पत्थर।
दीदी ने मुझे पाला है। शायद माँ जैसा ही प्यार दिया है। माँ की कमी मुझे महसूस नहीं होने दी।
बड़ी बहनें पहले तो भाई की उम्मीद पूरी न होने के कारण बहुत उदास रहीं। मुझे अक्सर बुरा-भला कहतीं, धीरे-धीरे दिल को समझा लिया था परंतु गली-मुहल्ले वालों की छींटाकशी देर तक मेरा पीछा करती रही।
मैं अक्सर सोचती हूँ - ‘क्या कसूर था मेरा?क्यों मुझे घृणा का पात्र बनाया गया?’
मैं प्रसूति अस्पताल में काम करती हूँ। रोज़ ही मेरी आँखों के सामने दो-चार बच्चे पैदा होते हैं। अब कई बार डॉक्टर मुझ से ही दाई का काम करवा लेती हैं। जब भी लड़की पैदा होती है, अपने साथ मायूसी लेकर आती है। सबसे पहले निराशा की कालिमा नवजात बच्ची की माँ के चेहरे पर उतरती है। मैं भी उदास हो जाती हूँ। सोचती हूँ कि क्या कसूर है इस मासूम का ?
जब किसी के बेटा पैदा होता है, मुझे कोई खुशी नहीं होती। बेशक पैदा होने की खुशी में उसके घर वालों की तरफ से मुझे बीस-तीस रुपए मिल जाते हैं और लड्डू भी। मुझे इस दुनिया से अजीब सी चिढ़ हो गई है। एक नफ़रत है। गुस्सा है। मैं इस गुस्से को किस पर निकालूं समझ नहीं आता।
इस दुनिया में मेरे पिता ही एकमात्र ऐसे शख्स हैं जिन्होंने मेरी पैदाईश पर मुझसे घृणा नहीं की। शायद थोड़े से उदास हुए हों परंतु उन्होंने मुझे महसूस नहीं होने दिया। कितने मजबूर हैं मेरे पिता जी। बिस्तर से उठ नहीं सकते। मेरे घर लौटते ही हाल-चाल पूछते हैं। अक्सर कहा करते हैं,‘तू मेरा बेटा है। बेटा तू ही सबसे बाद तक मेरे पास रहेगी। तेरी शादी के बाद ही इस संसार को अलविदा कहूंगा।’
आज काम कुछ ज़्यादा ही था। चार केस एक साथ निपटाने पड़े। पता ही नहीं चला मैं कब विस्तर पर आ लेटी और मुझे नींद आ गई। शायद पिताजी को किसी चीज़ की ज़रूरत हो। देखूं तो सही। पिताजी ने अभी तक आवाज़ क्यों नहीं दी ?
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मेरा नाम सीता है। मैसूर साड़ी सेंटर में मॉडल हूँ। परिवार की बड़ी लड़की हूँ। अब लड़की तो रही नहीं, तीस की हो गई हूँ। अब तो मैं औरत हूँ, शायद संपूर्ण महिला भी नहीं हूँ। मेरे पैदा होने पर घर वालों ने खुशी मनाई थी। घर में सीता-सावित्री आई थी। कक्षा दसवीं तक पहुँचते-पहुँचते घर में बारी-बारी से तीन बहनें आ गईं। मम्मी सदा के लिए चलती बनीं। दसवीं के बाद मेरी पढ़ाई ख़त्म हो गई। घर की सारी ज़िम्मेदारी मुझ पर ही थी। बहनों की परवरिश, पढ़ाई-लिखाई, मेहमानों की आव-भगत, बिरादरी में उठना- बैठना, सारे काम मेरे जिम्मे थे।
पिताजी दाना
मंडी में गुप्ता सेठ की आढ़त की दुकान पर मुनीम थे। मुनीमी करते-करते वे बूढ़े हो
गए। उनकी आँखें कमज़ोर हो गई थीं। उन्हें पक्षाघात हो गया था। मुझ पर अब बाप की
बीमारी की बोझभी आन पड़ा।
बहनें बड़ी हुईं। उनकी शादियों की फ़िक्र भी मुझे ही करनी थी। शादियों पर खर्च भी काफ़ी होना था। घर में तो कुछ भी नहीं था। पिताजी ने थोड़ा-बहुत जो बचाया था यह उनकी कलमुँहीबीमारी पर लग गया। उनकी कौन सी कोई सरकारी नौकरी थी जो बीमारी के इलाज के लिए खर्च मिलता या कोई मुआवजा मिलता। ऐसी प्राइवेट नौकरी की कोई पेंशन भी नहीं मिलती।
आढ़तीये गुप्ता
सेठ के एक बेटे की मेन बाजार में बड़ी दुकान है मैसूर साड़ी सेंटर। पिताजी के
अनुरोध पर उसने मुझे अपनी दुकान में नौकरी दे दी है। मेरा काम दुकान के प्रवेश
द्वार पर एक तरफ बने शीशे के केबिन में मॉडल बन कर खड़े रहना है। मेरी ड्यूटी दो
बजे से शुरू होती है क्योंकि ज़्यादातर ग्राहक दोपहर से आना शुरू होते। मैं जाते
ही दुकान के पीछे बने छोटे से कमरे में जा घुसती और कोई नए फैशन की साड़ी फैलाए,
शीशे
के केबिन में आ खड़ी होती हूँ। ज़रूरत पड़ने पर ही मुझे कुछ शब्द बोलने पड़ते हैं-
‘आइए, अंदर आइए! पसंद कीजिए!’‘सुंदर,
अति
सुंदर।’
मैं सोचती हूँ, चमकीली साड़ियों के वजन तले छुपी एक औरत को भी कोई देखेगा, कोई पसंद करेगा? कहीं इसी तरह न सारी उम्र गुज़र जाए। काश! साड़ी पसंद करने आया कोई युवक मुझे भी पंसद कर ले जाए। परंतु कौन आएगा ?
अगर कोई आया तो क्या मैं चली जाऊंगी?
मेरी तो अभी कई जिम्मेदारियां बाकी है।
रात को नौ बजे मैं घर पहुँचती हूँ। छोटी बहनें रसोई का काम ख़त्म कर अपने-अपने कमरों में कोई सिलाई-कढ़ाई या पढ़ने-पढ़ाने में मग्न होती हैं। पिताजी अपने कमरे से आवाज़ देते हैं- ‘सीता बेटी, आ गई? नौकरी तो एक एक्टिंग होती है। बेटा, ध्यान से यह एक्टिंग करना। गुप्ता सेठ ने नौकरी देकर मुझ पर बहुत अहसान किया है। सामान की अधिक बिक्री तुम्हारी नौकरी की कन्फरमेशन है।’
आज मेरा खाना खाने की इच्छा नहीं हो रही। पिताजी से पूछ लूं अगर उन्हें कुछ खाना है तो गर्म करके दे दूं। नहीं तो. जो कहेंगे बना दूंगी। मेरे हाथों की ही बनी खिचड़ी उन्हें पसंद आती है। आज पिताजी ने कोई आवाज़ ही नहीं दी। मुझे तो आए हुए काफ़ी समय हो गया। कहीं बहुत ज़्यादा ही तबीयत न ख़राब हो गई हो। चलकर खुद देखती हूँ।
तीनों बहनें
फर्श पर बैठी हैं। चुपचाप। हमेशा की तरह पिताजी अडोल बिस्तर पर लेटे हुए हैं।
परंतु, हमेशा से विपरीत आज उन्होंने चादर सर पर ओढ़ रखी है।
खुद-ब-खुद मेरे मुँह से चीख निकली है - ‘पितीजी!’तीनों बहनें दौड़ कर मेरे गले आ लगती हैं।
‘दीदी। पिताजी नहीं रहे।’
वे ज़ोर-ज़ोर से रो रही हैं, ‘अब कौन हमें सहारा देगा ?’
मैं पिताजी की चारपाई की पाटी पकड़ कर बैठ जाती हूँ।
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लेखक
परिचय
हमदर्दवीर
नौशहरवीं
1 दिसंबर, 1937 अमृतसर ज़िले के नौशहरा पन्नुआं में जन्म,2 जून 2020 को निधन।। मूल नाम – बूटासिंह पन्नू। पंजाबी, इतिहास और राजनीति विज्ञान में एम. ए.। 10 वर्षों तक वायु सेना में कार्यरत रहने के पश्चात् लगभग 32 वर्ष मालवा कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर रहे। लगभग 14 कहानी संग्रह और 7 काव्य संग्रह सहित पंजाब संकट पर आधारितनिर्वाचित कहानी संग्रह तीहले अते आल्हणां का संपादन। अनेक पुरस्कारों से सम्मानित। आरंभ से ही समाज में नई और स्वस्थ धारा के संचार के हिमायती रहे और उन्हें नव शब्द से इतना लगाव रहा कि उन्होंने अपनी संतानों के नाम भी नवसंगीत किरण, नवकविता सवेर, नवमार्ग सफ़र और नवचेतन वेग रखे।
साभार - पगडंडी संख्या - 6, अक्तू. दिसंबर 2024
