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शनिवार, जनवरी 10, 2026

कहानी 72 फ्लैट नंबर 13 (पंजाबी)

                                          


                                0 सिमरन धालीवाल

    

                           अनुवाद -  नीलम शर्मा ‘अंशु’



तेरह नंबर फ्लैट में कोई आया है दीदी!
अच्छा तो?
एक महिला हैं। अकेली रहती हैं, दीदी।
तो क्या हुआ, गीता?
दीदी! मुझे तो नीचे वाली पम्मी आंटी से पता चला है कि हमारे बाबू जी के साथ खूब बन रही है उनकी।
दोनों देवरानी-जेठानी बड़ी गंभीरता से बातें कर रही थीं।
अच्छा! गीता की आवाज़ में आश्चर्य था।
हाँ दीदी! इस उम्र में अब बाबूजी कौन से रंग दिखाएंगे?  मेरी तो निशांत से बात करने की भी हिम्मत नहीं हुई।
फिर अचानक गीता के घर की डोर बेल बजी।
दीदी, अब बाद में बात करूंगी। देखती हूँ कौन आया है। गीता ने फोन बंद कर दिया।

 

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     पुरुषोत्तम दास, सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर फ्लैट नंबर बारह के बाहर यह सुनहरे रंग की नेमप्लेट लगी है। जिसकी चमक वक़्त के साथ थोड़ी फीकी पड़ गई है। खुद पुरुषोत्तम दास जी की चमक भी वक़्त के साथ काफ़ी फीकी पड़ चुकी है। बीपी में उतार-चढ़ाव रहने लगा है। बहुत सारे बाल झड़ चुके हैं। कभी-कभी तो टखने और घुटने में भी दर्द होने लगता है। और भी न जाने क्या-क्या है, जिसे वक़्त ने उनके जीवन से हमेशा के लिए जड़ से ख़त्म कर दिया है या हमेशा के लिए जोड़ दिया है।

     बिस्तर के सिरहाने दवाओं ने जगह बना ली है। स्वाद फीके पड़ गए हैं। शोख रंग सफेदी में बदलने लगे हैं। आजकल बाबू पुरुषोत्तम दास जी ज़्यादातर सफेद कुर्ता-पायजामा पहनते हैं।

     कभी-कभी पुरुषोत्तम दास आईने के सामने खड़े होकर खुद को निहारते हैं। उस वक़्त आईने के माध्यम से उन्हें अपना अतीत नज़र आता है।

     यौवन का जोश। उँचा-लंबा कद। गोरा रंग। तिस पर बैंक में नौकरी। पुरुषोत्तम दास के पिता  खैराती लाल अकड़ से चलते।

     खूबसूरत बीवी मिली थी। ट्रक भर कर दहेज मिला था। पूरे प्रेमनगर में चर्चा थी।

     बूढ़ी औरतें आपस में बतियाती हैं :
     अरी! पुरुषोत्तम दास की बीवी तो बहुत सुन्दर है।
     बहन, वह तो हाथ लगाए मैली हो जाए।
     दहेज से भरा ट्रक लेकर आई है।
     पास से ही किसी और ने कहा, तो पुरुषोत्तम खुद कमतर है क्या? पूरी मंडी में ऐसा लड़का नहीं होगा।
     अरी, तेरी बड़ी नज़र है मंडी के लड़कों पर? किसी और का व्यंग्य वाण चला।
     इस तरह पुरुषोत्तम की बीवी की चर्चा कई दिनों तक चलती रही। पुरुषोत्तम दास की नई-नई नौकरी लगी थी। वे सुरूर में रहते। बैंक में लोगों से हंसते-बोलते। बीस मील का सफ़र वे मानो उड़ कर ख़त्म कर लेते। जैसे झट से जाते वैसे ही पट से बीवी के पास आ पहुँचते। दिन अच्छे गुज़र रहे थे…
     कौशल्या ने अपने पहले पुत्र को जन्म दिया। उस समय खैराती खुद जीवित थे। उन्होंने पोते का नाम रखा था मोहन। देसी घी के लड्डू बाँटे थे। घर मानो रोशनी से भर उठा था।
     खैराती फूले नहीं समा रहे थे। पुरुषोत्तम दास का नूर मानो दुगुना हो गया था। घर में कौशल्या का मान-सम्मान चौगुना हो गया था। परिवार खुश था। घर में खूब सुख-समृद्धि थी। जब दूसरा बेटा निशांत पैदा हुआ तो खैराती राम भगवान को प्यारे हो गए थे। दादी पार्वती ने नन्हें निशांत को खूब लाड़-प्यार दिया। निशांत तब दूसरे साल में था जब पार्वती भी चली गईं।
     पुरुषोत्तम जी को लगता मानो उनके घर को किसी की नज़र लग गई है। व्यक्ति को हमेशा अपने माता-पिता की ज़रूरत होती है।

     कौशल्या और पुरुषोत्तम ने बच्चों का पालन-पोषण किया। सब कुछ बढ़िया चल रहा था। पुरुषोत्तम दास तरक्की करते रहे। बेटे पढ़ाई करते रहे। मंडी से बड़े शहर, बड़े शहर से और भी बड़े शहर। दोनों लड़के पढ़ाई में अव्वल निकले। दोनों को अच्छी नौकरियां भी मिल गईं। एक दिल्ली चला गया तो दूसरा पुणे।

     बेटों की शादियों तक पुरुषोत्तम दास तरक्की पाकर बैंक मैनेजर बन चुके थे और सेवानिवृत्ति के क़रीब थे।

     बेटों के लिए योग्य लड़किय़ां ढूँढी गईं। अच्छी सुशिक्षित..... और फिर शादी के बाद धीरे-धीरे दोनों बेटों ने बहुओं को अपने पास बुला लिया। पीछे प्रेमनगर वाले पुश्तैनी घर में कौशल्या और पुरुषोत्तम अकेले रह गए। पंद्रह मरले का घर और प्राणी केवल दो। लंबा-चौड़ा आँगन काट खाने को दौड़ता। 

     कभी-कभी पति-पत्नी दोनों बैठे-बैठे दु:खी भी होते। सोचते, हमने अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर काबिल बना दिया, परंतु हम अकेले रह गए। बच्चों के साथ घर में रौनक होती हैं। उन्हें अपना समय याद आता। जब मोहन और निशांत का जन्म हुआ था। उनके पिता मानो मोहन की पैदाइश पर फिर से जवान हो गए थे। बड़े बुजुर्ग ऐसे ही तो नहीं कहते कि मूल से ब्याज प्यारा होता है। लेकिन उनके बेटों ने अभी बच्चे पैदा करने से इन्कार ही कर दिया था।

     बड़े शहरों में अपना गुज़ारा ही नहीं होता, बच्चे पैदा करके तो और सौ तरह के खर्चे बढ़ जाते हैं, अभी तो काफ़ी समय है। दोनों प्राणी अपने बच्चों के निर्णयों के समक्ष भला कर भी कर क्या सकते थे।   जब बड़े बेटे मोहन की बेटी होने वाली थी, तब दिल का दौरा पड़ने से कौशल्या परलोक सिधार गई थीं। लाखों मन्नतों के बाद यह दिन आया था परंतु देखना नसीब न हुआ।

     कौशल्या को विदा करने के बाद पुरुषोत्तम दास अकेले रह गए। पत्नी की अंतिम अरदास तक वे असमंजस की स्थिति में रहे। उन्होंने सोचा, अब मैं अपने बेटे-बहुओं के साथ चला जाऊंगा। कभी सोचते, पराई जगह दिल भी कहाँ लगता है?  जन्मभूमि के प्रति मोह बहुत प्रबल होता है। कभी सोचते,  कौशल्या की यादों से भरे इस घर को कैसे खाली छोड़ सकता हूँ?
     वे मन ही मन योजनाएं गढ़ते रहे परंतु बेटों ने साथ चलने के लिए नहीं कहा। बड़े मोहन ने बस इतना ही पूछा, बाऊजी! रोटी-पानी का क्य़ा बनेगा?
     रोटी-पानी का क्या है बेटा! कोई काम वाली बना जाया करेगी। बूढ़ी हड्डियों को दो रोटी ही तो खानी होती हैं।
     पुरुषोत्तम जी ने हँसकर टाल दिया।
     कभी-कभी जब बेटों को याद आता तो वे पिता का हाल-चाल पूछ लेते। वे हँस कर बोलते। न कोई शिकवा, न शिकायत। न कोई ख़्वाहिश, न ज़रूरत। वे अपने घर में खुश तो पुरुषोत्तम दास अपने घर खुश।
     फिर एक बार दीवाली के मौक़े पर दोनों बेटे मंडी आए।

     मंडी वाला मकान बेचने की बात चल निकली।

     एक बार तो पुरुषोत्तम दास तड़प उठे। पहले तो काफ़ी देर चुप रहे, फिर आह सी भर कर कहा, बेटा, यह घर थोड़े ही है। यह तो मेरे पिता की निशानी है। आपकी माँ और मेरा संजोया हुआ सपना है। बेचना क्यों है।

     बाबू जी! इतनी जगह हमें क्या करनी है। हमारा जहाँ दाना-पानी लिखा है भगवान ने, हमें तो वहीं रहना पड़ेगा। फिर इतना बड़ा घर, चोरी-चकारी का डर। उसके बहुत पैसे मिल जाएंगे। मेन रोड पर जगह होने का यही तो फ़ायदा होता है। एक छोटा सा फ्लैट ले लेते हैं शहर में। आप वहाँ रहें, हमारे पास आए-जाएं और निशांत को भी तो पुणे में सर पर छत चाहिए। किराए पर आख़िर कब तक गुज़ारा होगा आप जानते ही हैं।

     पुरुषोत्तम सब समझ गए। यह हिस्से में आती माया का मामला था।

     उनका मन उखड़ गया। सोचने लगे कैसी औलाद है, बाप की अर्थी तो उठ लेने देते, फिर तो सब कुछ तुम लोगों का ही होना था।  

     टूटे दिल और दु:खी मन से उन्होंने किसी भी बात में न हाँ या न नहीं की। मोहन ने खुद ही सब कुछ किया। घर बिक गया। पैराडाइज़ सोसायटी में एक फ्लैट खरीदा गया और बची-खुची रकम दोनों भाइयों ने जेब के हवाले की।

     पुरुषोत्तम जी से पेंशन के पैसे ही ख़त्म न होते। पिता के पास काफ़ी धनराशि जमा है यह दोनों बेटे भी जानते थे।

     12 नंबर फ्लैट के दरवाज़े पर नेम प्लेट लग गई थी, जिस पर आज भी लिखा चमकता है। बेशक पहले से फीका है - पुरुषोत्तम दास, सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर।

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     पुरुषोत्तम दास सारा दिन घर पर ही रहते। इस बड़ी सोसायटी में उन्हें परायेपन का अहसास होता। बस सुबह-शाम टहलने के लिए पार्क में जाते थे। कभी किसी दिन जी चाहता या ज़रूरत होती, तो सोसायटी में बने डिपार्टमेंटल स्टोर पर चक्कर लगा आते। स्टोर वाले सोढी के साथ बातें करते। ज़रूरत की कोई चीज़ खरीद लेते। दो-दो घंटे दुनिया भर की बातें करते और फिर कभी दो-दो महीने उधर का रुख ही न करते। किसी चीज़ की ज़रूरत होती तो मेड से कह देते। वह पैसे लेती और सामान ला देती।

     एक दिन सुबह-सुबह डोर बेल बजी। बाहर दरवाज़े पर उनकी हमउम्र महिला खड़ी थी।

     सॉरी, आपको इतनी सुबह-सुबह तकलीफ़ दी। दरअसल मेरा गैस सिलेंडर ख़त्म हो गया है, अगर आपके पास एकस्ट्रा पड़ा हो तो... दोपहर तक आ जाएगा। मैंने बुक कर दिया है।

     पुरुषोत्तम दास ने उन्हें पहले कभी नहीं देखा था परंतु पड़ोसी होने के नाते मदद करना ज़रूरी समझा।

     मैं लाता हूँ जी। वे भीतर गए। स्टोर रूम से खींच कर सिलेंडर बाहर दरवाज़े तक ले आए।

     बुला लीजिए किसी को घर से। उन्होंने कह तो दिया परंतु इस बात का अर्थ था कि सिलेंडर वजनी है, आप तो ले नहीं जा सकेंगी।

     घर पर मेरे सिवा कोई है ही नहीं। उस महिला ने झिझकते हुए कहा।

     चलिए मैं छोड़ आता हूँ। किधर...

     पुरुषोत्तम दास के अधूरे वाक्य को वे समझ गईं। सामने तेरह नंबर में।

     पुरुषोत्तम जी ने सिलेंडर को धकेलते हुए उनके दरवाज़े के सामने जा रखा।

     दरवाज़ा खोल वे भीतर चली गईं। भीतर खूबसूरत मार्बल पर सिलेंडर खींचा नहीं जा सकता था।

     पुरुषोत्तम जी ने एक हाथ से सिलेंडर उठाया तो कमर दूसरी तरफ झुक गई। उन्हें परेशानी में देख महिला ने कहा, लाइए मैं भी पकड़ती हूँ। इससे पहले कि पुरुषोत्तम जी के मुँह से हाँ या न कुछ निकलता उन्होंने दूसरी तरफ से सिलेंडर पकड़ लिया। वजन बंट गया। पुरुषोत्तम जी ने सिलेंडर फिट किया और गैस ऑन कर दी।

     रसोई से बाहर आ वॉश-बेसिन पर हाथ धोए।

     अच्छा जी। उन्होंने इजाज़त के लहज़े में कहा।

     प्लीज़ बैठिए, मैं चाय बनाती हूँ। उन्होंने बहुत विनम्रता से कहा।

     नहीं, नहीं चाय की ज़रूरत नहीं।

     चाय की ज़रूरत भी क्या होती है यह तो मेहमान नवाज़ी की रस्म है।

     नहीं जी, मेहमान नवाज़ी भी कैसी, हम तो पड़ोसी हैं।

     तो पाँच मिनट बैठिए। ऐसे अच्छा नहीं लगता। मैंने बहुत तकलीफ़ दी आपको। उस महिला की आवाज़ पहले से भी ज़्यादा विनम्र थी।

     चलिए मैं बैठता हूँ। पुरुषोत्तम जी ने चाय का फैसला मन में कर लिया था। वह उन्हें बहुत सम्मान से सिटिंग एरिया में ले आईं।

     आप बैठिए, मैं अभी आई। वे किचन की तरफ मुड़ गईं।

     पुरुषोत्तम जी बहुत संकोचवश बैठ इधर-उधर देखते रहे। घर में संगीत के साज़ों की कई तस्वीरें थीं। एक कोने में पुराना ग्रामोफोन रखा था। सामने वाली दीवार पर वीणा लटक रही थी। सब कुछ सलीके से सजा था।

     चाय आई। टेबल पर सज गई।

     चीनी नॉर्मल या बिलकुल फीकी?’

     चीनी के बहाने चारों तरफ पसरा सन्नाटा ख़त्म हुआ।

     बस नाममात्र।

     और फिर दोनों चाय पीने लगे।

     चाय पीते हुए पुरुषोत्तम जी का ध्य़ान फिर उस वीणा की तरफ चला गया।

     आप गाती है?’ वे पूछे बिना रह न सके।

     नहीं-नहीं। मैं गाती तो नहीं परंतु म्युज़िक सिखाती थी। आई मीन मैं म्युज़िक टीचर थी।

     वाह! बहुत बढ़िया। परंतु मैंने पहले तो आपको यहाँ नहीं देखा, जब से मैं यहाँ शिफ्ट हुआ हूँ।

     जी मैं अपने बेटे के पास यू. के. गई थी। दो हफ्ते पहले ही लौटी हूँ, वैसे भी मैं ज़्यादा बाहर नहीं निकलती। इन जगहों की ज़िंदगी भी बस है भी तो ऐसी ही। बाहर निकल कर करना भी क्या है? मिलना भी किससे हैं? इस बार उन्होंने काफ़ी बातें कर लीं। 

     जी बिलकुल सही कहा आपने।

     चाय का प्याला खाली हो गया। पुरुषोत्तम जी ने प्याला मेज़ पर रखा उठ खड़े हुए।

     अच्छा जी। उन्हें कहने के लिए और कोई शब्द नहीं सूझा।

     जी शाम तक सिलेंडर आ जाएगा। महिला की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि पुरुषोत्तम जी पहले ही बोल पड़े, अरे कोई बात नहीं आ जाएगा। वे सहजता से चलते हुए बाहर निकल आए पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।

     उसी दिन दोपहर बाद सिलेंडर वाला लड़का सिलेंडर सीधे उनके स्टोर में रख गया। पुरुषोत्तम जी ने अब कई दिन देखा सामने वाले फ्लैट का दरवाज़ा फिर नहीं खुला था। न कोई उधर आता-जाता था। बस एक चमकते अक्षरों वाली नेम प्लेट दरवाज़े के बाहर लटकी थी जिस पर लिखा था सरगम निवास।

     शायद उस महिला का नाम सरगम हो पुरुषोत्तम जी ने सोचा।

     उनका जी चाहा कि वे फिर से उस महिला से मिलें। इतना एकाकीपन, इतनी ख़ामोशी, शाँति। यह साधारण नहीं थी परंतु बारह नंबर से तेरह नंबर फ्लैट का सफ़्रर आसान नहीं था।

     बिना मतलब कैसे किसी के घर जाया जा सकता था। वे सोचने लगे, पहले का वक़्त भी खूबसूरत था। तब बंद दरवाज़ों को लोग बुरा मानते थे। किसी के घर जाने के लिए न तो इजाज़त की ज़रूरत होती थी न किसी विशेष बहाने की।

     कितना संकुचित हो गया है इन्सान। कितना संकोच है अब रिश्तों में। इतनी बड़ी इस बिल्डिंग में कितने ही फ्लैट हैं और उनके भीतर कितने ही लोग हैं परंतु किसी का किसी के साथ कोई नाता नहीं।

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     सर्दियों का मौसम था।

     ठंड जमी हुई थी। उदास सी।

     डोर बोल बजी। दरवाज़ा खोला। सामने वही महिला खड़ी थीं।

     पूरे एक माह और छह दिन बाद।

     साग बनाया था, सोचा आपको दे आऊँ।

     पुरुषोत्तम जी समझ नहीं पाए कि उनके चेहरे पर संकोच है या विश्वास है या क्या है, परंतु साग-सब्ज़ी की उम्मीद तो उन्हें ज़रा भी नहीं थी।

     भीतर आ जाइए। पुरुषोत्तम जी ने झिझकते हुए कहा।

     वे बिना कुछ कहे भीतर आ गईं।

     आप बैठिए, मैं इसे किचन में रख कर आता हूँ।

     और लौट कर बात का बहाना ढूँढते हुए कहा, चाय लेंगी या कॉफी?

     कुछ भी नहीं। दरअसल मैंने मेडिसिन ली है। आधा-पौना घंटा कुछ भी नहीं खाना होता।

     चलिए आधा घंटा रुक कर ले लीजिएगा। पुरुषोत्तम जी मानो उन्हें रुकने बैठने के लिए कह रहे हों। वे कह तो गए फिर कुछ झेंप भी गए।

     कोई फॉर्मैलिटी वाली बात नहीं है। उन्होंने सहजता से जवाब दिया।

     आपके डोर पर सरगम निवास लिखा देखा। बहुत सुंदर नाम रखा है आपने घर का। संगीत का घर। पुरुषोत्तम जी ने घर के नाम से शायद उस महिला का नाम जानना चाहते थे।

     सरगम मेरी पोती का नाम है। वह दूर रहती है, तो उसे इस तरह अपने पास महसूस कर लेती हूँ।

     उन्होंने बताया तो पुरुषोत्तम जी हँस पड़े। मैं तो सोच रहा था कि आपका नाम है।

     हमारे समय में भला ऐसे नाम कहाँ हुआ करते थे। मेरा तो नाम अजिता है। उन्होंने बिना किसी औपचारिकता के अपना नाम बता दिया।

     पोती के पास क्यों नहीं रहती?’ पुरुषोत्तम जी ने संभवत: मुनासिब सवाल नहीं किया था। उन्हें बाद में अहसास हुआ।

     मेरे बस की बात नहीं। मुझसे घुट-घुट कर नहीं रहा जाता है। और मैं उनकी निजता में कोई ख़लल नहीं डालना चाहती। अजिता जी ने गंभीरता से जवाब दिया।

     वैसे कैसा वक़्त आ गया है। माता-पिता बच्चों के लिए खलल बनने लगे हैं। पुरुषोत्तम जी चिंतित हो गए।

     इस बात के भी कई पहलू हैं। बच्चों को भी अपनी ही दुनिया है। सो जो है सो ठीक है।

     अजिता जी ने ठंडी साँस छोड़ते हुए कहा।

     बात-चीत का लहज़ा बहुत संज़ीदा हो गया था।

     पुरुषोत्तम जी ने माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए फिर से चाय कॉफी की बात छेड़ ली।

     चाय बनाऊँ या कॉफी।

     आप खुद बनाएंगे तो कुछ भी नहीं। अजिता जी ने मुस्कुरा कर कहा।

     मेड आज ज़रा लेट आएगी। बेफ़िक्र रहे। मैं चाय-कॉफी ठीक-ठाक बना लेता हूँ। पुरुषोत्तम जी भी हँस पड़े।

     ठीक है, तो फिर चाय ही ठीक है।

     चाय बिस्कुट ट्रे में रखकर पुरुषोत्तम जी अजिता जी के सामने आ बैठे।

     पता नहीं मुझे पूछना चाहिए या नहीं। परंतु आप इस तरह... चाय का कप उठाते हुए अजिता जी ने कहा।

     मुझे लगता है कि कई लोगों के हिस्से में एकाकीपन होता है। पुरुषोत्तम जी ने एक टक उनकी तरफ देखते हुए कहा, बीवी गुज़र गई। बच्चे अपने-अपने कामों में मसरूफ़ हैं। उन्होंने कभी साथ रहने के लिए कहा नहीं। मैंने भी खुद कभी कहा नहीं।

     हर तरफ यही स्थिति है। हर घर की यही कहानी है।

     और दोनों के बीच ख़ामोशी छा गई।

     आप बोर नहीं होती... पुरुषोत्तम जी ने फिर से ख़ामोशी भंग करते हुए कहा।

     हो जाती हूँ कभी-कभी। मन तो मन ही होता है। थोड़ी बहुत तरलता तो इसमें रह ही जाती है। उन्होंने ऐसे जवाब दिया मानो पत्थर का कोई बुत्त अभी-अभी जी उठा हो।

     सैर के लिए आ जाया कीजिए।

     मैं रोज़ शाम को निकलता हूँ लगभग सात बजे। आस-पास घूम लेता हूँ। वर्ना यहाँ तो शहतीर भी नहीं जिनकी आदमी गिनती कर सके।

     मैं बस कभी खुद से बाहर नहीं आ सकी। अजिता जी ने खाली कप देबल पर टिकाते हुए कहा।

     कोशिश करके देखिएगा। पुरुषोत्तम जी समझ गए। बहुत कुछ है दबा हुआ अजिता जी के मन में। बाहर आने के लिए उतावला है।

     अब मैं चलती हूँ। उन्होंने बस इतना ही कहा और उठकर बाहर की तरफ चल दीं। पुरुषोत्तम जी साथ आए। विदा किया। दरवाज़ा बंद किया। लेट गए। आँखें बंद कर लीं।

     जब आँख खुली तो सैर पर जाने का वक़्त हो गया था, परंतु पुरुषोत्तम जी बहुत थकान महसूस कर रहे थे। उन्होंने बाहर जाने का ख़याल छोड़ दिया तथा टीवी का स्विच ऑन कर दिया।

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     पुरुषोत्तम जी सोसायटी के पार्क में टहल रहे थे। उन्होंने दूर से अजिता जी को अपनी तरफ आते देखा। और उनका इंत़ज़ार करने लगे।

     आख़िर आप बाहर आ गईं। पुरुषोत्तम जी ने ज़रा दूर से पूछा और थोड़ा मुस्कुरा दिए।

     मैंने सोचा मैं भी आस-पास देख आऊँ।

     बहुत अच्छा किया। खुद को जकड़ कर रखना और खुद को कष्ट देने समान होता है।

     पुरुषोत्तम जी अब और क्या कष्ट होगा भला? इस उम्र में भी हम अकेले बैठ ठोकरें खा रहे हैं।

     चलिए, निराश नहीं होते।

     निराश होते तो ऐसे थोड़े ही जी रहे होते। मैं तो खुश हूँ अपने साथ। दोनों साथ-साथ चलने लगे।

     मेरा बेटा तब अभी छोटा था जब मेरे पति गुज़रे। पाला-पोसा, पढ़ाय़ा। मैंने अपनी ज़िंदगी उस पर वार दी। उम्मीद थी इसी के सहारे भविष्य गुज़ार लूंगी। शादी की। बहू आई। बेटा अपनी दुनिया में खोया परदेस जा बैठा।

     यह हमारे समाज में मौजूदा समय की कठिन समस्या है। थोड़ा सा चलकर वे दोनों आकर आमने-सामने के बेंचों पर जा बैठे। पुरुषोत्तम जी को समझ नहीं आ रहा था कि अब और क्या कहें?

     बहुत साल ऐसे ही गंवा दिए। जब वह पास था, मैं तब भी अकेली थी। अब तो इस एकाकीपन की आदत हो गई है। अकेली बैठी खुद से बातें कर लेती हूँ। जब वह यहाँ था तब मैं ख़ामोशी को जीती थी। मेरे बोलने, कुछ कहने का न घर में असर था न कोई पसंद करता था।

     वे और उदास हो गए। चेहरा और भी गंभीर हो गया।

     फिर मन में कुछ आया। हल्का सा मुस्कुराकर कहा, चलिए छोड़िए। आपकी सैर का मज़ा भी ख़राब कर दिया मैंने।

     नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं। बातों से मन हल्का हो जाता है। अब तो बल्कि हमारी सुनने वाला भी कोई नहीं है। पुरुषोत्तम जी ने बड़ी विनम्रता से कहा।

     यह न सुनने वाली बात बहुत दु:ख देती है, आपको पता है न। मुझे कुछ नहीं चाहिए था। बस यह ज़रूर चाहती हूँ, परिवार पास बैठे। बातें करें परंतु बहुत से लोग है जो उम्र के इस पड़ाव पर आकर एकाकीपन झेलते हैं।

     हाँ, मैं सहमत हूँ। बस सुनने वाला कोई तो होना चाहिए। और वे ख़ामोश हो गए। जैसे कोई बात ही न बची हो। काफ़ी देर वे चुप रहे।

     चलती हूँ। आप सैर कीजिए। अजिता जी उठ कर खड़ी हो गईं।

     बस हो गई सैर तो। पुरुषोत्तम जी रुकने के लिए कहना चाहते थे परंतु कह नहीं पाए।

    

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     पुरुषोत्तम दास का फ़ोन बज उठा।
     स्क्रीन पर अजिता नाम चमक रहा था।


     हाँजी! फ़ोन उठाते हुए उन्होंने कहा।
     मैं दो दिन से देख रही हूँ कि आप सैर के लिए नहीं आए?
     तबीयत ख़राब थी। बुखार, खाँसी। बुरा हाल है।
     क्या कोई दवा ली है?
     जी हाँ, दवा तो खा रहा हूँ।
     आप बता देते। किसी चीज़ की ज़रूरत...।
     नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। मेड तो आ रही है। बल्कि कुछ भी खाने को जी नहीं चाहता।    

     आजकल मौसम कुछ ऐसा ही है। कुछ खाना हो तो बताइए। मैं...
     जी ही नहीं चाहता।
     मैं दलिया बना देती हूँ। गुनगुना सा खा लीजिएगा। अच्छा रहेगा।
     इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। क्यों तकलीफ़ करती हैं...
     बताइए भला इसमें क्या तकलीफ़। मैं लेकर आती हूँ।
     फोन बंद हो गया।
     डोर बेल बजी।

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     आप तो काफ़ी बीमार हैं। लगता है आपको ठंड लग गई है। पुरुषोत्तम दास की हालत देखकर अजिता जी ने अंदाज़ा लगाया।
     मैं तो वैसे काफ़ी ध्यान रखता हूँ। उन्होंने कहा। गला थोड़ा बैठा हुआ था।
     दरअसल, इस उम्र में ध्यान रखने वाला कोई तो होना चाहिए। पुरुषोत्तम दास ने कुछ नहीं कहा।
     कुछ क्षणों के लिए दोनों के बीच ख़ामोशी छा गई।

     लेट जाइए जाकर, मैं दलिया प्लेट में डाल कर लाती हूँ।

     आपको बेकार ही तकलीफ़ दी।

          दलिया खाकर खाली प्लेट टेबल पर रखते हुए पुरुषोत्तम दास फिर से अजिता जी से बोले -

     दरअसल तकलीफ़ जैसा कुछ नहीं है। आदमी ही आदमी का सहारा होता है। न आपका यहाँ कोई बैठा है देखभाल करने वाला न मेरा।

     अजिता जी ने ठंडी आह भरी।

     शायद यह भी किस्मत की बातें हों।

     ...और किस्मत पर बात ख़त्म कर दोनों बुजुर्ग अपनी बातों में खो गए। वे बातें जिनमें न बच्चों की बातें थीं, न घर जायदाद की।

     तमाम उम्र गृहस्थी की गाड़ी खींचने वाले वे बस दो व्यक्ति थे। इस वक़्त उनके चेहरे पर न ज़िंदगी से न कोई गिला था न शिकवा।

     अजिता जी ने चाय बनाई, दोनों ने पी। बर्तन धोए।

     जाते समय उन्होंने कहा, मेड को शाम को आने के लिए मना कर दीजिए। रात का खाना मैं ही दे जाउंगी।

     पुरुषोत्तम जी ने जवाब में कुछ नहीं कहा।

     दोपहर ढलने लगी थी।

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     पतली सी दाल के साथ पतली-पतली चपातियां थीं।

     खाना खाकर पुरुषोत्तम दास को ऐसा लगा, मानो चपाती बरसों बाद खाई हों। उन्हें स्वास्थ्य पहले से अच्छा लगा रहा रहा था।

     उन्होंने खाने की तारीफ़ की।

     अजिता जी मुस्कुराईं।

     खाना काम समझ कर नहीं बनाते, वर्ना स्वादिष्ट भी नहीं बनता और न ही खाने वाले को तृप्ति होती है।

     वे फिर से गंभीर बातें करने लगे। करते रहे। बीते कल की। वर्तमान की। एकाकीपन की, ख़ामोशी की।

     ... और जब रात को अजिता जी अपने घर जाने लगीं, पुरुषोत्तम दास जी का जी चाहा कि वे कहें कि यहीं रुक जाइए। परंतु वे कह न सके।

     अजिता जी का भी जी चाहता था कि वे वहीं रुक जाएं परंतु वे रुक न सकीं।

    

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     उन्हीं दिनों चर्चा छिड़ी।

     ऊपर से नीचे। नीचे से ऊपर। पूरी सोसायटी में फैली।  किसी ने बात को पंख लगाए। बात गीता के पास पहुँची। गीता के पास से बड़ी बहू के पास। दोनों बेटों के पास। बेटे परेशान हुए, हैरान हुए। सोचने लगे बाबू जी यह सब क्या कर रहे हैं जग हँसाई का विचार उन्हें दु:खी करता।... और फिर कुछ माह के बाद ही पुरुषोत्तम जी पुणे चले गए। बेटे ने कहा था, बाबू जी हम दोनों प्राणी काम पर निकल जाते हैं। बेटी पीछे आया के भरोसे छोड़ जाते हैं। नौकरों का क्या भरोसा है। यहाँ आ जाएंगे तो आपका भी दिल लगा रहेगा।

     पुरुषोत्तम दास जी ने पहले तो ना-नुकुर की। परंतु पोती का मोह था। बेटे की मजबूरी।

     उन्होंने बैग तैयार कर लिया। जाते समय अजिता जी से मिल आए। उदास थे। ख़ामोश थे। फिर एक कहानी सुनाने लगे।

     किसी लड़के और लड़की में प्यार था। लड़के ने लड़की को शादी के लिए कहा। लड़की बोली, पहले अपनी माँ कि दिल निकाल कर लाओ, मैं तब शादी करूंगी। लड़के ने ऐसा ही किया। माँ का सीना चीर कर माँ कि दिल निकाल कर चल दिया। भागा जा रहा था कि ठोकर खाकर गिर पड़ा। बेटे को गिरा देख, माँ के दिल से आवाज़ आई, बेटा कहीं चोट तो नहीं लगी? माता-पिता तो ऐसे ही होते हैं। पूत कपूत हो जाते हैं परंतु माता-पिता ऐसा नहीं करते।

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     कई माह गुज़र गए।

     पुरुषोत्तम दास पुणे में थे। बड़े शहर में बहुत कुछ पराया सा था। उन्हें बारह नंबर फ्लैट याद आता। फिर तेरह नंबर फ्लैट याद आता।

     अजिता जी का बेटा आया।

     माँ से यू. के. साथ चलने के लिए झगड़ता रहा। अजिता जी नहीं मान रही थीं। वह तल्ख़ होने लगा।

     हम वहाँ हैं आप यहाँ किसके लिए बैठी हैं। चार दिन से कह रहा हूँ, कोई असर ही नहीं हो रहा आप पर।

     ...फिर गुस्से में उसके मुँह से निकल गया, अब तो वह बारह नंबर वाला भी दफ़ा हो गया।

     अजिता जी को मानो कुछ चुभा हो। उन्होंने बहुत क्रोध से देखा।

     बेटा और भी ख़फ़ा हो गया।

     जो जी चाहे कीजिए। मैं कल वापस जा रहा हूँ। सड़ती रहें अकेली यहीं पर।

     वह बोलता, कुढ़ता बाहर चला गया। मुड़ते समय पैर दरवाज़े से टकराया। टीस सी उठी। मुँह से हाय निकला।

     अजिता जी ने देखा।

     बेटा कहीं चोट तो नहीं लगी?’

     इन शब्दों को बड़ी मुश्किल से अपने होठों पर आने से रोका।

     ...और करवट बदल ली।

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      लेखक परिचय


                                      सिमरन धालीवाल

 

पंजाबी की युवा पीढ़ी के चर्चित कहानीकार। उनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक मिजाज़ का प्रधान्य। पंजाब के तरनतारन ज़िले से संबद्ध सिमरन धालीवाल गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के स्थानीय कैंपस में सहायक प्रोफेसर। अब तक चार कहानी संग्रह तथा तीन बाल कहानी संग्रह सहित सात पुस्तकें प्रकाशित। आस अजे बाकी है कहानी संग्रह के लिए भारतीय साहित्य अकादमी के युवा पुरस्कार तथा उस पल कहानी संग्रह के लिए ढाहां अंतर्राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार (कैनेडा) से सम्मानित।





                                                             

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