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बुधवार, सितंबर 30, 2026

कहानी - 85 ब्लैक विडो - हरकीरत कौर चहल

 प्रवासी पंजाबी कहानी 

                     ब्लैक विडो    

 

              0  हरकीरत कौर चहल

 

                अनुवाद - नीलम शर्मा ‘अंशु’

 

       अक्तूबर का आधा महीना गुज़र चुका था। पतझड़ के इस मौसम के आते ही पूरा वैंकूवर शहर रंग-बिरंगे पत्तों वाले पेड़ों से इस तरह खिल उठता था, मानो किसी चित्रकार ने अपनी कल्पना के रंगों से पूरी कायनात को ग़ज़ब का हुस्न बख्शा हो।

         “वाह! यह है कनाडा, जिसकी खूबसूरती ने हमारे पंजाब ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को दीवाना बना रखा है।” प्रकृति के नज़ारों का लुत्फ़ लेते हुए गुरिंदर, जो स्टूडेंट वीज़े पर कनाडा आकर अब गैरी बन चुका था, इन्हीं विचारों में खोया पैदल चला जा रहा था। उसे 57 एवेन्यू और किंग एडवर्ड स्ट्रीट से दो ब्लॉक पैदल चलकर कैंबी स्ट्रीट से डाउनटाउन जाने वाली बस लेनी थी। सप्ताहांत पर मिली नई-नई सिक्योरिटी की जॉब रात आठ बजे शुरू होनी थी, इसलिए वह किराए पर लिए गए बेसमेंट से लगभग साढ़े छह बजे ही निकल पड़ा था।

         हैलोवीन के त्योहार के लिए लोगों ने अपने घरों को डरावनी वस्तुओं से सजा रखा था। इस कारण सड़कें भी किसी हॉरर हाउस से कम नहीं, बल्कि किसी भुतहा मोहल्ले का आभास देती थीं। कई घरों के मुख्य द्वार पर जगमगाते पंपकिन लैंटर्न बेहद खूबसूरत लग रहे थे, जिन्हें गैरी ने पहली बार देखा था। कई घरों के सामने इंसानी कंकाल और खोपड़ियां झूम-झूमकर नाच रही थीं। उनमें लगे बिजली के यंत्रों के कारण वे ख़ौफ़नाक ठहाके, चीखें और दानवों जैसी डरावनी आवाज़ें भी निकाल रही थीं। गैरी को अचानक अपने गाँव का श्मशान याद हो आया, जहाँ बचपन में उसने अपने हमउम्र बच्चों से चुड़ैलों और भूतों के बसेरे के बारे में न जाने कितनी डरावनी और मनगढ़ंत कहानियां सुन रखी थीं।

         “हैलोवीन, कैसा अजीब सा त्योहार है! मुझे तो लगता है कि इन गोरों की बुद्धि ही भ्रष्ट हो गई है। बेवजह ही डर और नकारात्मकता को जान-बूझकर अपने घर आमंत्रण दे रहे हैं। हम लोग तो ईश्वर की असीम कृपा पाने के लिए पूजा-पाठ करते हैं, धूप-बत्तियां जलाते हैं। अपने आस-पास का वातावरण पवित्र रखने के लिए कभी गुग्गुल की धूनी देते हैं, तो कभी कच्चे दूध का छिड़काव करते हैं। कहीं किसी दुष्ट आत्मा का साया या अपशकुनी नज़र का असर हमारे बसे-बसाए घर पर न पड़े, इसलिए घरों की मुंडेरों पर नज़र-बट्टू भी लगाते हैं। और, ये गुरु-घंटाल लोग तो उस गाने वाली बात को सच करते प्रतीत होते हैं—

                           जट्ट श्मशान से गुज़रा चुड़ैल मिल गई,

                           यानी बड़ी सुंदर भूतनी मिल गई

                           बोली, ओ जट्ट!  मुझसे डरकर सिकुड़ जा,

                           नहीं तो ऐसा कर दूँगी, वैसा कर दूँगी,

                           तुझे यहीं खड़े-खड़े को स्वाहा कर दूँगी

                           जट्ट बोला, ऐवें बातों में समय न गंवा,

                           आ जा गले लग जा... आ जा गले लग जा।

         गीत गुनगुनाते हुए गैरी पर अचानक कहीं दूर से आती रंग-बिरंगी लेज़र लाइट पड़ी, तो वह डर कर तुरंत चुप हो गया। उसने सोचा कि खुशी, ग़म, डर और उल्लास तो हमारे त्योहारों से भी जुड़े हैं। गाँव में दीवाली के दिनों में उसकी माँ अक्सर कहा करती थी, वक़्त-बेवक़्त घर से बाहर मत जाना,  कोई बूढ़ी माई बाल काट लेगी। मरघट और चौराहों पर जगह-जगह नारीयल, कलावा और सिंदूर से किए गए टोटके पड़े दिखाई देते थे। बचपन में गैरी उनसे इतना डरता था कि उन दिनों रात को अपनी माँ से चिपटकर ही सोता था। यौवन और मर्दानगी की दहलीज़ बेशक वह कब की पार चुका था, लेकिन डर आज भी उसके भीतर कहीं साँप की तरह कुंडली मारे बैठा था।

         अंधविश्वासों, वहमों और भूत-प्रेतों से जुड़े इस डर का दोष वह अपने घरवालों और दोस्तों की उन बातों को देता था, जिन्हें सुन-सुनकर बचपन से ही उसका दिल कमजोर पड़ गया था।

         तेज़-तेज़ चलते हुए अचानक गैरी के एक जूते का फीता खुल गया और पैरों में उलझने लगा। वह सड़क किनारे एक घर के सामने बने पत्थर के बेंच पर अपना बैग रखकर फीता बाँधने लगा। तभी एक बड़ी-सी काली मकड़ी रेंगती हुई उसके पैर पर चढ़ने लगी। घबरा कर गैरी चीख पड़ा और झटके से पीछे हट गया। उसकी आवाज़ सुनकर सामने वाले घर की खुली खिड़की से खुले काले बालों वाली एक लड़की खिल-खिलाकर हँस पड़ी और बोली, “इटस् हैलोवीन!”

         घबराए हुए गैरी ने उसकी तरफ़ एक नज़र डाली। घर के भीतर जल रही रोशनी में उसका चेहरा भी धुंधला-सा ही दिखाई दिया, परंतु आवाज़ और अंदाज़ से वह लड़की इंडियन ही लगी।

         जल्दी-जल्दी क़दम बढ़ाते हुए गैरी बस-स्टॉप पर पहुँचा तो बस भी ठीक समय पर आकर रुकी। डर के मारे उसकी टाँगें अभी भी काँप रही थीं। अपने वॉलेट में रखा मासिक बस-पास ड्राइवर को दिखा कर गैरी बस में चढ़ गया।

         पहली सीट पर खुले बालों वाली एक चीनी मूल की युवती ज़ोर-ज़ोर से फोन पर बातें कर रही थी। उसके साथ वाली खाली पड़ी सीट को जान-बूझकर नज़र-अंदाज़ करते हुए गैरी बस के बीचो-बीच बैठे एक पंजाबी बुजर्ग के साथ जा बैठा।  सत श्री अकाल कह कर अभिवादन करते हुए वह ऐसे मुस्कुराया मानो बड़ी मुश्किल से उसे किसी अपने बड़े-बुज़ुर्ग का सहारा मिल गया हो।

         “वेलिंगटन मॉल में ड्यूटी है तुम्हारी, नौजवान?” सिक्योरिटी की वर्दी पहने बुज़ुर्ग ने मुस्कराते हुए बात-चीत का सिलसिला शुरू करते हुए पूछा।

         “नहीं अंकल जी, डाउनटाउन की हाउवी स्ट्रीट पर मल्टी-स्टोरी अपार्टमेंट बन रहे हैं, वहीं काम मिला है।” गैरी ने जवाब दिया।

         “शिफ्ट और पैसा ठीक-ठाक मिल जाता है?” उनका अगला सीधा-सपाट सवाल था।

         “जी, बहुत अच्छा तो नहीं चल रहा, फिर भी रात आठ से सुबह आठ बजे तक की एक शिफ्ट मिल गई है। अच्छी बात यह है कि पैसे भले कम हैं, लेकिन वहाँ भीतर बैठकर पढ़ाई भी हो जाती है।” गैरी ने कहा।

         “हाँ, ये सिक्योरिटी कंपनी वाले कंस्ट्रक्शन साइटों के ठेके ले लेती हैं और मोटा कमीशन खुद डकार जाती हैं। तुम्हारे जैसे स्टूडेंटों से मनमर्ज़ी का काम भी करवाती हैं। खैर, जाने दो। कभी तो पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी मिल ही जाएगी।”

         “जी अंकल अच्छे दिन आएंगे, बस यही सोचकर लगा हुआ हूँ।”  गैरी बोला।

         “अब हमारे जैसे लोग तो बरसों से यहाँ पक्के हो चुके हैं। कंपनियों का सारा भेद जान गए हैं और अपनी पसंद का काम करते हैं। हमारे साथ ये लोग ज़्यादा धोखाधड़ी नहीं कर सकते। मेरी यह कंपनी भी बहुत नामी है - ब्लैकबर्ड सिक्योरिटी। गोरों की है, सारा काम लीगल तरीके से करती है।”

         जैसे ही बुज़ुर्ग ने ब्लैकबर्ड कहा, गैरी की नज़र तुरंत उनके काले जैकेट की सफेद जेब पर बने काले कढ़ाईदार लोगो पर पड़ी। उसे काली मकड़ी याद आ गई। अपना ध्यान बंटाने के लिए उसने जेब से मोबाइल निकाला और इंस्टाग्राम पर मज़ेदार वीडियोज़ देखने लगा।

         बस के ब्रेक ने चीखती हुई आवाज़ के साथ हवा छोड़ी तो गैरी ने बाहर देखा। उसका स्टॉप सामने आ चुका था। वह फटाफट बैग कांधे पर लटकाकर बस से उतरा और कंस्ट्रक्शन साइट की ओर चल पड़ा। चलते-चलते वह बार-बार पीछे मुड़कर ऐसे देख रहा था, मानो देख रहा हो कि कोई उसका पीछा तो नहीं कर रहा। मन ही मन अपने बेवजह के डर को धिक्कारते हुए वह दृढ़ कदमों से काम पर पहुँच गया। उसने शिफ्ट के लिए एंट्री रजिस्टर भरा। साइट के मुख्य द्वार पर ताला लगाया और गश्त के लिए पिछवाड़े तथा पार्किंग की ओर बढ़ गया। काली रात में ठंडी हवा चल रही थी।  कंस्ट्रक्शन साइट पर लगे सेफ्टी रिफ्लेक्टर आज पता नहीं क्यों उसे नारंगी की जगह गहरे लाल दिखाई दे रहे थे। हवा के झोंकों से इमारत पर लगा वॉल-पेपर फड़फड़ा रहा था। हालाँकि सड़क पर गुजरते वाहनों की लाइटें रात के सन्नाटे को कुछ हद तक कम कर रही थीं।

         गैरी ने सर्चलाइट जलाकर बैठने के लिए एक पक्का कोना तैयार किया।

         “शुक्र है यहाँ घास नहीं है, बैठने के लिए पक्की जगह तो है। कीड़े-मकोड़ों का क्या भरोसा! बेगाने देश के जानवरों के बारे में भी मुझे कुछ नहीं पता।” सोचते-सोचते उसके मन में अजीब-अजीब डरावने से विचार उमड़ने लगे।

         कुछ दिन पहले स्टैनली पार्क में एक खूंखार क्उटी द्वारा व्यक्ति पर हमला कर उसे मार डालने की घटना याद आते ही वह अनायास बोल उठा, “लोग कहते हैं कि यह सुरक्षित देश है, यहाँ अपराध कम है। इन्हीं दो-चार बातों पर भरोसा करके हम परदेसी बेफिक्र होकर रात-बिरात की शिफ्टें करने की हिम्मत लेते हैं। आदमी और समाज के सभ्य होने की बात तो मान सकते हैं, लेकिन इन जानवरों को भला कौन सभ्य बना सकता है! और वह काली मकड़ी... शायद नकली ही रही होगी, रिमोट से चलने वाली। नहीं तो घर के अंदर खड़ी उस लड़की को कैसे पता चला कि अँधेरे में वह मेरे पैर पर चढ़ रही है?” अब उसे पूरी बात समझ आ गई थी। अपनी ही अज्ञानता पर उसे तरस भी आया, प्यार भी और हँसी भी।

         आज ड्यूटी का समय भी मानो चींटी की चाल से चल रहा था। क़रीब आधी रात को गश्त के लिए लगया मोबाइल का डरावना अलार्म बजा तो उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। ऐसा लगा मानो सीने से उछलकर बाहर निकल आएगा। उसने तुरंत अलार्म की एक मधुर रिंगटोन सेट की और फिर बिल्डिंग का चक्कर लगाने निकल पड़ा।

         हवा पहले से कहीं तेज़ हो चुकी थी। उसके अपने कपड़े ही फड़फड़ाकर उड़ रहे थे और बीच-बीच में हवा से सीटी और शूकने की आवाज़ सुनाई देने लगती थी। जैसे-तैसे एक चक्कर लगाकर वह फिर कोने में बिछाई हुई चादर पर आ बैठा।

         साँय-साँय करते अधबने, खाली कमरों की ओर देखा तो उसे “वैंकूवर सन” अख़बार में प्रकाशित उन भुतहा घरों की सूची याद आ गई, जिन्हें पूरे पते सहित सिटी काउंसिल ने आधिकारिक रूप से घोषित किया था। 41 एवेन्यू और फ्रेज़र स्ट्रीट पर बना कब्रिस्तान उसे पहली बार देखने पर किसी सुंदर कंपनी बाग जैसा लगा था, लेकिन बाद में जब पता चला कि वह कब्रिस्तान है, तो कब्रों पर लगी पत्थर की पट्टियां उसे मृतकों की परछाइयों जैसी लगने लगीं। “मुश्किल घड़ी में रब का नाम लेना” माँ की कही बात याद करके फिर “वाहेगुरु... वाहेगुरु...” का जाप कर मुश्किल से उसने रात काटी।

         सप्ताह में गैरी को इस साइट पर केवल सप्ताहांत में ही ड्यूटी करनी होती थी, क्योंकि स्टूडेंट वीज़ा होने के कारण वह केवल बीस घंटे ही काम कर सकता था। सप्ताह के बाकी दिनों में उसे एक रेस्तरां में लगभग चार घंटे का काम नकद मिल गया था।

         जब वह ग्राहकों को खाना परोसता और उनके जूठे बर्तन उठाता, तो उसे अपने गाँव की शान-शौकत और ठाठ-बाट बहुत याद आते। “कर्म ही मनुष्य का धर्म है, इसमें कोई शर्मिंदगी नहीं होती” यह बात तो उसने कनाडा आने के लिए खुद ही अपने पिता को समझाते समय कही थी।

         वह मन ही मन सोचने लगा, “गाँव में तो माँ मेरे दूध जैसे सफेद कुर्ते-पायजामे पर ऐसी कड़क इस्त्री करती थी कि उसकी क्रीज़ बिल्ली के कानों की भाँति खड़ी रहती थी। ऊपर से मेरी बुलेट मोटरसाइकिल की गड़गड़ाहट मुझे धरती पर पैर तक रखने नहीं देती थी। वक़्त-वक़्त की बात है, गुरिंदर सिंह! अच्छा होता अगर घर-परिवार की ज़िम्मेदारी उठाकर पिता का बोझ हल्का करता। लेकिन तूने तो आवारा मलंग दोस्तों के पीछे लगकर न घर की हालत सुधरने दी, ऊपर से देस-निकाला गले डाल लिया।”

         अगले सप्ताह हैलोवीन की रात गैरी फिर सिक्योरिटी ड्यूटी के लिए घर से निकला। आज उसे फिर उसी रास्ते से होकर जाना था। डर के साथ-साथ खुले बालों वाली उस लड़की को फिर से देखने की उत्सुकता भी उसके मन में थी।

         घर का नंबर 444 था जिसके सामने रंग-बिरंगे परिधानों में सजे बच्चे टिक्कर ट्रीटिंग के लिए झुंड बनाकर खड़े थे। काले रंग के लंबे गाउन में खुले बालों वाली एक लड़की कैंडीज़ और चॉकलेट बाँट रही थी। उसके परिधान पर लंबी लाल जीभ, बड़े-बड़े सफेद दाँत और पीछे एक मोटी सी पूँछ लटक रही थी। उस वेशभूषा में उसे पहचान पाना लगभग असंभव था। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र गैरी पर पड़ी, वह तुरंत मुस्कराकर बोली, “आज ब्लैक स्पाइडर नहीं है। उसे अंदर रख दिया है। डरो मत, आ जाओ... तुम भी कैंडीज़ ले लो।”

         “नो थैंक्स, मैं कौन-सा बच्चा हूँ।” गैरी ने क़दम धीमे करते हुए कहा, मानो वह उससे कुछ और बातें करना चाहता हो।

         “बच्चे ही तो हो, जो एक नकली मकड़ी से डर गए थे। सॉरी यार, लेकिन तुम्हें डरते देखकर बहुत मज़ा आया था। दो डॉलर की खरीदी थी डॉलर स्टोर से। बाय गॉड, पूरे पैसे वसूल हो गए।” लड़की बोली।

         गैरी को उसका चुलबुला और शरारती स्वभाव अच्छा लगा और उसके पास जाकर उसकी टोकरी से एक लॉलीपॉप उठाकर चूसने लगा।

         “हैप्पी हैलोवीन! यू लुक वेरी इंट्रेस्टिंग। कनाडा में नए-नए आए लगते हो?” लड़की ने कहा।

         गैरी ने बिना कुछ बोले ही हाँ में सर हिलाया।

         “मेरा नाम सैंडी है। ग्लैड टू मीट यू। हम यहाँ कई लड़कियां साथ रहती हैं। इस शहर में हमारे बहुत-से दोस्त हैं। कभी मन उदास हो या घर की याद आए, तो अपना ही घर समझ कर तुम हमारे पास बेझिझक आ सकते हो।”

         “श्योर।”  इतना कहकर गैरी अपने रास्ते चल पड़ा।

         पूरे रास्ते वह उसी के बारे में सोचता रहा कि बड़ी अजीब लड़की है! राह चलते एक अजनबी को घर आने का निमंत्रण दे रही है। भारत में तो हम लड़कियों का इधर-उधर देखना तक पसंद नहीं करते। लेकिन जैसा माहौल हो, इंसान को वैसा ही ढलना पड़ता है। यहाँ काम-काज के कारण चार दीवारों में कैद होकर भी तो ज़िंदगी नहीं काटी जा सकती। और आज की पढ़ी-लिखी औरत घर और बाहर काम करते हुए अब वह पुरुषों से किस बात में कम है?”

         इन्हीं विचारों के घोड़े पर सवार गैरी लड़की को हर दोष से मुक्त करते हुए कब बस में चढ़ा, कब उतरा और कब काम पर पहुँच गया, आज उसे पता ही नहीं चला था।

         उस रात सैंडी से हुई मुलाकात और उसकी बातों में उलझा गैरी डर से मानो कोसों दूर जा चुका था।

         अब अक्सर वह लड़की अपनी सहेलियों के साथ गाहे-बगाहे गैरी को मिल जाती। कभी बस-स्टॉप पर, कभी शॉपिंग मॉल में, तो कभी ग्रोसरी स्टोर पर सामना हो जाता। हर मुलाक़ात के साथ उनकी दोस्ती और गहरी होती गई और एक दिन तीनों लड़कियों सैंडी, सुमन और दीपी के बार-बार कहने पर गैरी ने उनके घर जाने का मन बना लिया।

         बातों-बातों में गैरी अपने घर-परिवार, पढ़ाई और जीवन की दूसरी बातों के बारे में इस तरह खुलकर बताने लगा, मानो एक खुली किताब हो।

         धीरे-धीरे उसकी दोस्ती केवल सैंडी ही नहीं, बल्कि दीपी और सुमन से भी उतनी ही गहरी हो गई।

         एक रात डिनर के बाद, जब सब लोग लिविंग एरिया में बैठे थे, तो सैंडी ने कहा, “यार, यह ज़मूरा मेरे तो नहीं, बल्कि दीपी के काम का है।”

         दीपी लगभग पैंतीस वर्ष की एक विडो थी, जो देखने में मुश्किल से चौबीस-पच्चीस की ही लगती थी। उसके पति ने एक शाम कमरे की छत से फाँसी लगाकर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ली थी। हालाँकि वह उसके लिए अच्छा-खासा बैंक बैलेंस छोड़ गया था, फिर भी उसकी धन की लालसा अभी भी पूरी नहीं हुई थी। पति की मृत्यु के केवल छह महीने बाद ही वह भारत से एक संपन्न परिवार के युवक से विवाह करके उसे कनाडा ले आई। शादी का सारा खर्च लड़के वालों ने इस शर्त पर उठाया था कि लड़का कनाडा पहुँच जाएगा। दीपी ने लगभग तीस-पैंतीस लाख रुपये ऐंठ लिए और फिर आपसी अनबन का बहाना बनाकर तलाक़ के कागज़ों पर हस्ताक्षर करवा लिए। इस तरह वह उससे मुक्त हो गई। ऐसा कारोबार वह अब तक तीन बार कर चुकी थी। वह रोज़ जिम जाती, अपने तन को चुस्त-दुरुस्त रखती और अतीत को दफ़नाकर नए शिकार की तलाश में निकल पड़ती। अब उसे शिफ्टों में काम करना निरर्थक और फिज़ूल लगता था, क्योंकि इस तरह से नाजायज़ कमाया गया धन ही उसकी ज़रूरतों से कहीं अधिक था। मुँह को लगा खून उसे अब टिकने नहीं दे रहा था।

          “बट यार  यह ज़मूरा तो तेरा शिकार है, तू इसे दीपी को क्यों दे रही है?”  सुमन ने पूछा।

         “यू नो माई प्रेफ़रेंसेज़। मेरे लिए पैसा-वैसा बिलकुल मायने नहीं रखता। मुझे तो रिलेशनशिप में जुनून और रोमांच वाला पार्टनर चाहिए। टोटली इममैच्योर, इनोसेंट बट वाईब्रेंट। यह गैरी तो बिल्कुल देसी सा  सीधा-सादा लड़का है।”  सैंडी ने कहा।

         “लेकिन तुझे कैसे पता?  क्या तूने कोई थर्मामीटर लगाकर देखा?”  दीपी हँसते हुए बोली।

         “ओह स्वीटहार्ट! मैं तो उड़ते पंछी के पर गिन लेती हूँ। मेरी मान, इसे अपने जाल में फँसा ले। अच्छा-खासे संपन्न परिवार है। बेचारा सरदार लड़का है, यहाँ ठंड में दिहाड़ी कर रहा है, रहम करके इसे पक्का करवा दे। इतना पक्का कि फिर हिल भी न सके।” सैंडी की यह बात सुनकर कमरे में लड़कियों का ठहाका गूँज उठा। दीपी ने सिगरेट सुलगाई और लंबा कश लेकर धुआँ छत की ओर छोड़ते हुए अपने भविष्य की तस्वीर बनाने लगी।

         अब दीपी हर बात में गैरी की हमदर्द बन गई। वह जान-बूझकर उससे अकेले मिलती, उसे छोटे-मोटे उपहार देती और कपड़े पहनने का ढंग तथा रहन-सहन का सलीका सिखाती। गैरी भी उसकी फेंकी हुई डोर की ओर खिंचता चला गया। लड़की की सोहबत में अब वह बन-संवर कर रहता था, हँसता-खेलता रहता। उसके चेहरे की रौनक और लालिमा दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। एक दिन सोची-समझी योजना के तहत् दीपी ने गैरी को घर में अकेले बुला कर रिश्ते की अंतिम मर्यादा भी पार कर ली।

          अगली रात इस खुशी में जश्न मनाने के लिए लड़कियों ने पार्टी रखी। दो-एक पैग पीने के बाद सुमन ने पूछा, “सैंडी, अगर पैसा तेरी प्राथमिकता नहीं है, तो फिर ज़िंदगी में तुझे और क्या चाहिए?” ।

         “देख सुमन, हम तीनों अपनी-अपनी भटकनों में जी रही हैं। हमारी आत्माओं की प्यास अलग-अलग है। दीपी को धन-दौलत चाहिए, तुझे नशा और आवारागर्दी. जो कि सबसे ख़तरनाक है। देखना, कहीं किसी दिन हेस्टिंग्स स्ट्रीट की ही होकर न रह जाना।” सैंडी बोली।

         “मेरी छोड़ यार, तू अपनी बता।”  सुमन ने गिलास खाली करके मेज़ पर रखते हुए कहा।

         “लो, एक पैग और डालो। आज यह राज़ भी खोल ही देती हूँ। तुम दोनों से भला क्या पर्दा?”

         इतना कहकर सैंडी ने बिना पानी मिलाए पूरा पैग एक ही साँस में गटक लिया और बोली, “मेरी प्यास देह की ज्वाला है। मुझे उस धधकती हुई ज्वाला को भस्म कर देने का नशा है। इसी वजह से मैं तीन घर पहले ही राख कर चुकी हूँ। आई कांट चेंज माई हैबिट।” सैंडी ने कहा।

         “ओह गॉड... यार, फिर तो मैं ही तुमसे अच्छी हूँ।”  दीपी ने कहा।

         “कोई फ़र्क नहीं, हम तीनों एक जैसी ही हैं। मुझे यह लत बचपन से ही है। मे बी इटस् इन माई ब्लड और हार्मोनज़। जवान होते ही तेरह साल की उम्र में मैंने हमारे घर के नौकर जो मुझसे तीन साल छोटा था, का जी भर कर शोषण किया। फिर कॉलेज में अपने से जूनियर एक लड़के को अपने पीछे लगाए रखा। बाद में उसे छोड़कर मैं चुपचाप शादी करके कनाडा आ गई। वह मेरी मिन्नतें करते-करते थक गया और अंतत: सल्फ़ास खाकर मर गया। शुक्र है  रब का कि बला टली गई और मेरे घर-परिवार पर कोई आँच नहीं आई। फिर मेरा पति भी मुझसे ज़्यादा दिन झेला नहीं गया। जब उसने मुझे मेरे गोरे बॉयफ्रेंड के साथ अपने ही घर में रंगे हाथों पकड़ लिया, तो उसी रात ग़ुस्से और स्वाभिमान में उसने फ्रेज़र नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। शुक्र है रब का कि मुझ पर किसी को ज़रा भी शक नहीं हुआ।” सैंडी ने बताया।

         “यू आर सो क्रूएल, मैन!”  सुमन ने सिगरेट का लंबा कश खींचते हुए कहा।

         “आई कांट कीप सच डेड रिलेशनशिप। दैटस् इट। चल, अब तू भी अपने बारे में कुछ बता।” सैंडी ने सुमन से कहा।

                        “ठुकराओ अब कि प्यार करो, मैं नशे में हूँ...

                        जो चाहो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ...”

        

         “बस, यही मेरी कहानी है, लड़खड़ाती आवाज़ में गुनगुनाते हुए सुमन ने कहा। कमबख्त ज़िंदगी को होश कभी पसंद ही नहीं। मेरा पति कहता था कि ख़ानदानी औरतें यह सब नहीं करतीं। वे तो ऐसी होती हैं, वैसी होती हैं। मैंने उससे कहा कि अब मैं तुमसे ज़िंदगी जीना सीखूँ? निकलो यहाँ से! पहले इन अनपढ़ों को पक्के करवाओ, और फिर ये हमारे ख़ानदानी होने की परख करें? आई सेड गेट आउट राइट नाउ। आई नीड गुड पार्टनर, गुड ड्रिंक ऐंड फैंसी स्टफ ऐंड समोक। बड़ी मर्दानगी का भ्रम पालते दो तो ओवरडोज़ से ही खल्लास हो गए... हा... हा... हा... उनसे तो मैं ही स्ट्राँग हूँ। है कि नहीं?” नशे की हालत में सुमन लगातार बोलती जा रही थी।

         कुछ और बातें करने के बाद नशे में धुत्त होकर तीनों लड़कियां लिविंग रूम में ही सो गईं।

         उधर दीपी ने इशक़ के नाम पर गैरी को पूरी तरह अंधा कर रख था। मीठी-मीठी बातों से उसने उसके सामने सपनों के महल खड़े कर दिए। उसने उसे कनाडा की पी. आर. (स्थायी नागरिकता) और स्टूडेंट वीज़ा की अहमियत और उससे मिलने वाली सुविधाओं का एहसास करवाया।     

         धीरे-धीरे गैरी को पढ़ाई निरर्थक लगने लगी। उसने कॉलेज जाना भी छोड़ दिया, क्योंकि उसके मन में यही बैठ गया था कि वह यह सब आखिर कैनेडियन बनने के लिए ही तो कर रहा है। वह अपनी सारी कमाई दीपी पर लुटा देता। एक दिन भावुक होकर उसने दोनों की तस्वीर अपने घर भेज कर शादी की तैयारी करने के लिए भी कह दिया। भोले-भाले माता-पिता भी बेटे की खुशी के लिए तुरंत राज़ी हो गए।

         गैरी और दीपी दोनों शादी के लिए इंडिया चले गए। अपने माता-पिता के बारे में पूछे जाने पर दीपी ने बहाना बना दिया कि वे इस प्रेम-विवाह के लिए सहमत नहीं थे और मैंने गैरी के प्रेम के लिए अपने परिवार को छोड़ दिया है। दीपी की यह मनगढ़ंत कहानी सुनकर उलटे गैरी के माता-पिता उसे और भी अधिक चाहने लगे।

         इंडिया पहुँचकर गैरी फिर से सरदार बन गया। थार जीप में घूमता। परिवार से ज़िद करके शानदार विवाह रचाया और दीपी को भरपूर ज़ेवर भी दिलाए।

         दुल्हन के रूप में सजी दीपी ऐसी लग रही थी मानो कोई परी अंबर से उतर आई हो। ऐसा प्रतीत होता था जैसे उबटन और मेहंदी के पहले स्पर्श ने उसके अंगों को और भी अनुपम बना दिया हो। गैरी अपनी सुंदर और कैनेडियन पत्नी का पानी भरते न थकता था।

         नवविवाहित जोड़े ने पूरे एक सप्ताह शिमला के एक बड़े और महंगे होटल में हनीमून मनाया। वे तरह-तरह के महंगे व्यंजन मंगाते और खुलकर पैसे खर्च करते। दीपी भी महंगे शॉपिंग मॉलों से जमकर खरीदारी करती। उसे खुश देखकर गैरी को पैसे की बिलकुल परवाह नहीं रहती थी।

         पूरा एक महीना भारत में मौज-मस्ती करने के बाद दोनों कनाडा लौट आए।

         एयरपोर्ट पर उतरते ही दीपी ने बड़े समझदारी भरे ढंग से गैरी को नया घर लेकर साथ रहने के लिए मना लिया, क्योंकि गैरी जिस बेसमेंट में रहता था, वहाँ उसके साथ एक और छात्र दूसरे कमरे में रहता था। गैरी को यह सब थोड़ा अजीब और असुविधाजनक तो लगा, लेकिन दीपी की बात की दलील उसे उचित भी लगी।

         उधर जब दीपी घर पहुँची, तो सैंडी के साथ उसका नया साथी रिचर्ड था। रिचर्ड कम उम्र का एक गोरा लड़का था, जो मैकडॉनल्ड्स में काम करता था। मुफ्त में रहने की सुविधा के लिए उसने सैंडी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था और उसके साथ रहने लगा था।

         गैरी और दीपी दिन में अक्सर मिलते रहते थे, क्योंकि अभी तक उन्हें एक साथ रहने के लिए ऐसा किराए का घर नहीं मिला था, जिसका खर्च गैरी आसानी से उठा सके।

         लेकिन एक रात काम से लौटते समय गैरी को दीपी की बहुत याद आई। रात के लगभग दस बजे थे।

         उधर तीनों लड़कियां फ़िल्म देखते हुए शराब के जाम छलका रही थीं। रिचर्ड कालीन पर बैठा सैंडी के पाँव दबा रहा था।

         अचानक डोरबेल बजी। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी रात गए गैरी बिना बताए उनके घर आ सकता है।

         दीपी ने दरवाज़ा खोला। गैरी को सामने देखकर वह घबरा गई और बोली, “तुम इस वक़्त बिना बताए यहाँ कैसे?”

         “क्यों? मैं तुम्हारा पति हूँ। जब चाहूँ, आ सकता हूँ।”  गैरी ने सहज भाव से कहा। उनकी बात-चीत सुनकर नशे में धुत्त सोफ़े पर पड़ी सुमन बोली, “हू इज़ दिस ब्लडी बास्टर्ड?”

         “तुम कौन होती हो मुझसे पूछने वाली? मैं अपनी वाइफ से मिलने आया हूँ!” वह ऊँची आवाज़ में बोला।

         “हा हा हा। कम ऑन यंग मैन, नो वाइफ लिव्स हेयर। वी आर नॉट वाइव्स। वी आर ब्लैक विडो स्पाइडर्स, ट्रू विडोज़।” सुमन ज़ोर-ज़ोर से बोल रही थी। आज उसने शराब के साथ कोई और नशा भी कर रखा था।

         “तुम यहाँ से चले जाओ। इस समय मैं तुमसे कोई बात नहीं कर सकती।” दीपी ने गैरी से कहा। उसकी आवाज़ में छिपी थरथराहट गैरी भी भाँप गया था। सारा मंज़र देखकर उसके होश उड़ गए। पाँव तले ज़मीन खिसकने लगी। उसका सिर चकराने लगा। वह समझ चुका था कि दाल में सिर्फ़ कुछ काला नहीं है, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

         रात क़ाफ़ी हो चुकी थी। वह किसी तरह ग्यारह बजे वाली आख़िरी बस पकड़कर अपने बेसमेंट वाले कमरे तक पहुँचा। डेड मोबाइल को चार्जिंग पर लगाकर फटाफटक सर्च बॉक्स में  ब्लैक विडो स्पाइडर टाइप किया।

         जवाब मिला कि यह कनाडा में पाई जाने वाली एक विषैली काली मकड़ी है, जो अपने चारों ओर सिलिंडर जैसा जाला बुनती है। उस में फँसे नर से संभोग करने के बाद वह उसे मारकर खा जाती है।

         गैरी को उस रात अपने पैर पर चढ़ी काली मकड़ी अब पूरे शरीर पर रेंगती प्रतीत हुई। उसे अपने विवाह के निर्णय से घृणा होने लगी। काली रात उसके सामने किसी दानव की तरह खड़ी थी। खुद को गुनाहगार समझते हुए कभी उसे अपने खाली हाथ रह गए पिता का चेहरा दिखता, कभी शुभ शगुन करती उसकी भोली माँ का, और कभी अपनी छोटी बहन ज्योति का मासूम चेहरा, जो दीपी को “चाँद जैसी भाभी” कहकर खुशी से नाचती फिरती थी।

         अगली सुबह जब उसके कमरे का दरवाज़ा नहीं खुला, तो घर के सामने एम्बुलेंस और आर.सी.एम.पी. (रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस) की भीड़ जमा थी जो मीडिया को बस किसी अनहोनी की आधी-अधूरी ख़बर ही दे रही थी। परंतु साप्ताहिक इंडो-कैनेडियन अख़बार की सुर्खियों में पहले की भाँति ही एक आम-सी ख़बर थी कि साइलेंट हार्ट अटैक से एक और भारतीय छात्र की मृत्यु।

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                                लेखक परिचय

हरकीरत कौर चहल - पंजाब कृषि विश्व विद्यालय से शिक्षा। विगत 21 वर्षों से कैनेडा में  निवास। भारत और कैनेडा में अध्यापन किया। कहानी, उपन्यास सहित 15 पुस्तकों की रचयिता जो हिन्दी, सिंधी, अंग्रेजी, उर्दू तथा शाहमुखी भाषाओं में अनूदित हुईं। उनके साहित्य पर पाकिस्तान में छह और भारत में एक एम. फिल. शोध।

            संपर्क - harkirat_chahal2000@yahoo.com


                साभार - मधुमती, सितंबर 2026 (उदयपुर)





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