पंजाबी कहानी
नर-मेध यज्ञ
जतिंदर हाँस
अनुवाद - नीलम शर्मा ‘अंशु’
नगन गिरि, जिसकी कुटिया में किसी स्त्री को जाने की अनुमति नहीं थी। उसकी कुटिया में जल रही
अखंड-ज्योति का प्रकाश पूरे डेरे और आस-पास के सभी नगरों में फैल रहा था।
गंगा की कुटिया में भी ज्योति जल रही
थी, पर उसे सारा संसार अंधकारमय प्रतीत होता। उसके स्तनों से अपने आप दूध बहने लगता, जो उसके गेरुए चोले को भिगो देता। चोला सूखकर अकड़ जाता। गंगा बेचैन मन को शांत
करने के लिए शांति पाठ करने लगती—
उस दिशा शांति,
अंतरिक्ष शांति,
पृथ्वी शांति।
पर गंगा के मन की तार तो वहीं तरंगित
होती रहती— “मेरा बच्चा ज़िंदा है… ज़िंदा है, मेरा बच्चा।”
गंगा मन को समझा कर संतों के चरणों
से जोड़ना चाहती थी, परंतु ममता छलक पड़ती-कभी आँखों से, कभी स्तनों से। उसकी एकाग्रता भंग हो जाती। वह फिर ऊँचे स्वर में पाठ करने लगी :-
…………
शांति माँ-माँ,
शांति ऋद्धि,
ओम् शांति–शांति जय।
आधी रात गुज़र गई। गंगा को नींद नहीं
आई। गुरु नगन गिरि की कुटिया से शिशु रूदन का स्वर उसके दिल को दहला रहा था। कभी लगता
यह शिशु का रूदन नहीं, बिल्ली का रूदन है। शिष्य महंत गिरि ने उसे समझाया भी
था, “कोई शिशु नहीं रो रहा देवी, यह तुम्हारे मन का भ्रम है।”
बेचैन गंगा मानो जलते अंगारों पर लोट रही हो। वह शांति पाठ करती। अपनी कुटिया में टहलने लगती। आले में जल रही ज्योति के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। फिर दरवाज़ा खोलकर उधर चल पड़ी, जिधर से शिशु के रोने की आवाज़ आ रही थी। इस डेरे में स्त्रियां रात्रिवास नहीं कर सकती थीं। केवल गंगा को ही डेरे के एक कोने में कुटिया में रहने की अनुमति मिली थी। आगे काफ़ी दूर शिष्य महंत गिरि और शिष्य लकड़ दास की कुटियां थीं। उनसे आगे बड़े हॉल में कई साधु बाहर से आकर ठहरे हुए थे। सब सो रहे थे।
गुरु नगन गिरि की कुटिया इन सब से बहुत
दूर, बाबा निगाहे की समाधि से आगे थी। चलती हुई गंगा पर ‘पवन’आ गई। सर को घुमा-घुमा कर खेलने से बाल खुल गए। जब ‘पवन’आती, वह शरीर को तोड़-मरोड़ कर रख देती और गंगा सुध-बुध खो बैठती।
सुबह जब गंगा की आँख खुली — ईश्वर जाने उसे कुटिया
में किसने पहुँचाया था, या वह खुद ही आ गई थी। ‘पवन’आने के बाद उसे कुछ भी याद नहीं था। उसका चोला भी बदला हुआ था। उसके पाँव दक्षिण
दिशा की ओर थे। उसे गुरुजी के प्रवचन याद हो आए- “दक्षिण की ओर पाँव करके नहीं सोना चाहिए, उधर यम का वास है। राक्षसी बुद्धि वाला ही दक्षिण की ओर पाँव करके सोता है।” कुटिया में लेटे-लेटे उसे डेरे में अजनबी स्वर सुनाई दिए।
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शिष्य महंत गिरि ने अमृत बेला में उठकर स्नान
किया। बाबा निगाहे की समाधि की ओर धूप-बत्ती करने और अखंड ज्योति में देसी घी डालने
निकला। वह ठोकर खाकर गिरते-गिरते बचा। आँखें फैलाकर पास जाकर देखा — किस चीज़ से टकराया
था? उसके होश उड़ गए। खून से लथ-पथ मनुष्य की एक टाँग थी। आगे दूसरी टाँग और एक बाँह
पड़ी थी। पूरा मानव शरीर टुकड़ों में बिखरा पड़ा था।
किसी ज़ालिम ने डेरे में अधर्म कर दिया था। पास
ही गुरु नगन गिरि की खड़ाऊँ पड़ी थीं। वह घबराकर चिल्लाया- “किसी ने गुरुजी की हत्या कर दी है!” फिर वह संभल गया। उसने न जाने क्या
देख लिया था। वहाँ दिखाई दे रहे सबूत मिटाने लगा।
जिन्होंने भी नगन गिरि की लाश देखी, उन्होंने सोचा — कहीं यह गुरुजी की लीला तो नहीं। पहले
भी कई बार रात में उनके शरीर के अंग डेरे में बिखरे पड़े मिलते थे। सुबह देखते तो वे
बैठे धूनी ताप रहे होते। नगन गिरि के चमत्कारों की कहानियां उसके गाँव आने के साथ ही
फैल गई थीं। गाँव के बाहर ढक्की (तंग घाटी) की ओर बड़े-बुज़ुर्ग बाबा निगाहे की समाधि थी। वहाँ मन्नतें मानी जाती थीं। घर की बनी कच्ची शराब और बताशों का प्रसाद चढ़ता था। वहीं शरीर पर राख मलकर, पूर्ण नग्न, मौन धारण किए एक साधु आ बैठा। वह ज्येष्ठ-आषाड़ के दिनों में भी धूनी सेकता। गाँव में भिक्षा माँगने न जाता। श्रद्धालु भोजन उसके पास पहुँचा देते। ज़रूरत होने पर वह थोड़ा-बहुत ग्रहण कर लेता। गाँव में चर्चा फैल गई- “बाबा गंगोत्री
धाम, हिमालय से तपस्या
करके आया है।”
पाखर टिड्डा
और उसकी टोली, जो बाबा निगाहे की समाधि की देखभाल
करती थी, वहाँ चढ़ावे में आई चीज़ें - ख़ास तौर पर घर की बनी कच्ची शराब खुद ही रोज़ पीते और मस्त रहते। नगन के वहाँ आ जाने से
मानो उनके पेट पर लात पड़ गई हो। उन्होंने नगन को धमकाया- “चला जा साधु, बाइज्ज़त चला जा। यह इज़्ज़तदार
बहन-बेटियों वाला गाँव है। यहाँ तेरा लुच्चापन नहीं चलेगा। जिन धूनियों को रमा कर तू
तापता है न, उनमें ही तुझे झोंक कर इहलीला
समाप्त कर देंगे। जा चला जा, बाइज्ज़त चला जा।”
उन्होंने नगन का पिछला इतिहास खोज
निकाला। लोगों के सामने उसका कच्चा-चिट्ठा ले बैठते - “यह पाखंडी नंगा साधु किसी गंगोत्री
धाम से नहीं आया। यह मालवा का है। दो भाई हैं ये। ज़मीन थोड़ी थी। शादी हुई नहीं। बड़ा
भाई ऐय्याश था। इसे खरीदी हुई औरत का झाँसा देकर इसके हिस्से की ज़मीन बिकवा दी। दोनों
भाई दोआबा से औरत लाने चले। नशेड़ी भाई ने एक बदमाश को साथ मिला लिया। योजना बनाई कि
इससे पैसे लूटकर इसे नदी में बहा देंगे। नदी के पास इसने उनके इरादे भाँप लिए। उनको
चकमा देकर भाग निकला। वे दोनों पीछे दौड़े। जब पास आते, यह रुपए फेंक देता। वे रुपए बटोरकर फिर इसके पीछे दौड़ते। आख़िर हारकर जब इसने
कपड़े भी उतार फेंके और पूरी तरह नग्न होकर भागा, तब कहीं उन्होंने इसकी जान बख्शी। भई इस नंग-धड़ंग से अब और क्या लेना। कई
रातें इसने श्मशान में काटीं। वहीं से राख मलकर यहाँ आ गया। यह स्त्री-लालसा का मारा
हुआ है। अब धूनियां रमा कर, मौन-व्रत धारण किए बैठा है। किसी
गंगोत्री-वंगोत्री से नहीं आया। मान भी लें गंगा से हो आया, तो क्या - कुत्ता अगर कपास से गुज़र भी जाए, तो रजाई तो नहीं भरवा लाया न?”
कुछ ही दिनों में पाखर टिड्डे की
दूध देती भैंस मर गई। उसके साथियों के परिवार वाले बीमार हो गए। वे आकर नगन के चरणों
में गिर पड़े। बाबा निगाहे की समाधि से कुछ हटकर उसकी कुटिया बना दी गई। गाँव से चंदा
इकट्ठा कर जलेबियों, पूरियों और घर की बनी कच्ची शराब
का लंगर कई दिनों तक चलता रहा। तब कहीं जाकर उनका भला हुआ।
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नगन गिरि ने मौन-व्रत खोला और प्रवचन
करने लगा- “संत शब्द सत्य से बना है… मैं किस बात का संत?”
“नगन नवजात शिशु का, महादेव का ही स्वरूप है। जैसे बच्चे का मन निर्मल होता
है—छल-कपट, काम-क्रोध, लोभ जैसे विकारों से रहित।” “
- “ईश्वर मनुष्य को वस्त्रहीन ही भेजता है। फिर मैं उसके हुक्म की अवज्ञा क्यों करूं?”
- “स्त्री नरक का द्वार है। जो नारी मेरी कुटिया की ओर आएगी, राम-रेखा लांघेगी-वह सर्पिणी की योनि पाएगी…।”
उसने अपनी खूंडी(मुड़ी हुई लाठी) से
कुटिया के चारों ओर राम-रेखा खींच दी थी। वह धूनियां तापता और ऐसे ही प्रवचन करता रहता।
उसकी महिमा पूरे इलाके में फैल गई। जिसे संत जी गाली दे देते, उसका कुल तर जाता। लात मार देते, तो उसकी सात पीढ़ियों का उद्धार हो जाता। शिष्य महंत गिरि और लकड़ दास डेरे का सारा प्रबंध संभालते।
अन्य साधु भी आकर कई-कई दिन डेरे में ठहरते। संगतों का तो कोई सीमा ही नहीं थी।
सब हैरान थे - इतने करामाती संत को किसने मार दिया? इतना बड़ा पाप! घोर पाप! कैसे पार पाएंगे हम? महंत गिरि ने सरपंच
को बताकर लकड़ दास और अन्य साधुओं को थाने में सूचना देने भेज दिया।
डेरे का बुरा समय तब शुरू हुआ, जब ‘स्त्री को नरक का द्वार’ कहने वाला नगन गिरि गंगा को डेरे पर
ले आया। नगन गिरि आधी रात को नहर में स्नान करने जाता। उस समय रास्ते में न कोई आदमी
होता, न परिंदा, न जानवर — कोई भी उसके सामने
न आता। लोग कहते, “नगन गिरि नहर के पानी पर चल लेता है, कभी पानी पर समाधि लगाए बैठा रहता है - यह डूबता नहीं।”
स्नान करने गए नगन की तन्मयता तब भंग
हुई, जब किसी के नहर में कूदने की ‘छपाक’ सुनाई दी। चाँदनी में उसने देखा - नहर में एक स्त्री डूब-उतरा रही है।
वह धर्म-संकट में पड़ गया—डूबती स्त्री को बचाए या अपना धर्म बचाए। आख़िरी बार जब वह पानी से ऊपर उछली, नगन ने बालों से पकड़कर उसे किनारे खींच लिया। मन में सोचा - जान बचाने से बड़ा धर्म और क्या हो सकता है?
जब युवती होश में आई, नग्न व्यक्ति को देखकर घबरा गई। बाँह छुड़ाकर नहर की ओर भागने लगी- “तुम लोग… तुम लोग न जीने देते हो, न मरने। क्यों बचाई… क्यों बचाई मेरी जान?”
नगन ने कसकर उसकी कलाई पकड़ ली और मानो घसीटता
हुआ डेरे की ओर ले चला। ‘नगन गुरु स्त्री का साया भी नहीं पड़ने देता’— यह ताज उसके सिर सजा था। वही नगन, पानी से भीगी स्त्री को कलाई से पकड़ डेरे की ओर जा रहा था। उसकी वर्षों की तपस्या भंग होती जान पड़ी। युवती वस्त्रहीन पुरुष को देखकर डरी हुई थी, परंतु पकड़ इतनी मज़बूत थी कि पीछे-पीछे चलने के सिवा कोई चारा भी नहीं था। वह
चुप-चाप चलती रही — शायद उसने सोच लिया था कि जीवन में जो उसके साथ हो चुका है तथा मौत से भयावह और
क्या हो सकता है।
नगन गिरि ने डेरे पहुँचकर महंत गिरि
को जगाया और कहा— “यह कन्या माँ - गंगा ने भेजी है, इसका ख़याल रखना।”
फिर अलग बुलाकर समझाया- “पता करो, यह कौन है और कहाँ से आई है।”
महंत गिरि अचंभित रह गया था। गुरु जी का यह कैसा
करिश्मा! जिनके पास आने वाली स्त्री भस्म हो जाए, वही पानी से भीगी स्त्री की बाँह पकड़े
खड़े हैं।
“सत्य वचन,” कहकर वह युवती को कुटिया में ले गया। तब तक युवती सब समझ चुकी थी और शांत थी।
नगन गिरि फिर नहर पर स्नान करने चला गया।
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…“गुरु जी, युवती कुंवारी है। उसकी कोख में उसके प्रेमी के प्यार की निशानी पल रही है। प्रेमी
भी उसी के गाँव का है। जब उसे युवती के गर्भवती होने का पता चला, वह गाँव से भाग गया। युवती को चारों ओर अँधेरा नज़र आया। वह नहर में कूदकर जीवन-लीला
समाप्त करना चाहती थी। गुरु जी, न तो वह अपना नाम बताती है, न ही गाँव का।… लगता है हमने मरा हुआ साँप गले में
डाल लिया है।… क्या करें, कहाँ भेजें?”
शिष्य महंत गिरि ने नगन गिरि को सारी गाथा बता
दी।
नगन बहुत देर तक बेचैन घूमता रहा, मानो फिर से मौन-व्रत धारण कर लिया हो। फिर वह कुटिया में जाकर बैठ गया।
शाम को महंत गिरि ने सुना - नगन गिरि किसी से
गिड़गिड़ा रहा था - “ईश्वर का वास्ता मान जाइए।”
“वह देवी है, माँ गंगा ने भेजी है।”
“मान जाइए, जब तक इसके ठौर-ठिकाने का पता नहीं चलता, तब तक इसे यहाँ रखने की अनुमति दे दें।”
“मान जाइए, मान जाइए … मैं हाथ जोड़ता हूँ।”
महंत ने सोचा, कुटिया में गुरु जी के सिवा कोई नहीं। वह गंगा को डेरे
में रखने की अनुमति खुद से ही माँग रहा है।
नगन बेहाल सा कुटिया से बाहर आया और
महंत से कहा - “गंगा नाम है इसका। इसे डेरे में रखने की अनुमति मिल गई है। डेरे के
एक कोने में इसकी कुटिया बना दो।”
गंगा के लिए अलग कुटिया का प्रबंध कर
दिया गया।
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गंगा धीरे-धीरे डेरे के माहौल में ढलने
लगी थी। उस पर ‘पवन’ आ जाती। वह सिर घुमाते हुए खेलने लगती।
उसके बाल खुल जाते। मानो कोई अदृश्य शक्ति उसके शरीर को उठा-उठा फेंक रही हो। फिर वह
बेसुध होकर गिर पड़ती।
एक दिन इसी तरह ‘खेलते’ हुए उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। महंत
गिरि गाँव से दाई को ले आया। लेकिन उसके पहुँचने तक बच्चे का जन्म हो चुका था। जब गंगा
को होश आया, तो वह अपने बच्चे को ढूँढ़ने लगी। महंत गिरि ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसे
दिलासा दिया, “देवी, मृत शिशु जन्मा था... डेरे में शव रखने की अनुमति नहीं है... इसलिए उसे समाधि दे
दी गई।”
गंगा की ममता कहाँ मानने वाली थी। उसने पहले
तो पूरा डेरा छान मारा। फिर उसने नगन गुरु से विनती की। गुरु ने हाथ आसमान की ओर उठाकर
कहा, “सब दाता की लीला है। जिसका था, वह ले गया।”
गंगा को पहली बार नगन पर गुस्सा आया। उसने मन
ही मन सोचा, “ “भक्तों की पुकार तो भगवान भी नहीं टालता... एक मासूम बच्चे को भी नहीं बचा सका?... कैसा गुरु है तू?” “
गंगा को लगा कि नगन गुरु झूठ बोल रहा है। उसका
शिशु उसी की कुटिया में है। उसे बार-बार ऐसा महसूस होता कि कुटिया के भीतर से शिशु
का रूदन उसके कानों में पड़ रहा है। गंगा को यह भी लगा कि जब गुरुजी ने कहा था, “जिसका था, वह ले गया,” कहकर उन्होंने कुटिया की ओर इशारा किया था।
वह चीखती, “पापियो! वह मेरी जान है। पापियो! कम-से-कम मुझे मेरे कलेजे के टुकड़े का मुँह तो
दिखा देते... मेरा शिशु भूख से बिलख रहा है। मेरे गाँव के लोग और मेरे अपने माँ-बाप
तो पहले ही उसकी जान के दुश्मन थे। अब तुम लोगों ने भी छीन लिया। मैं अभागिन तो उसका
मुँह भी नहीं देख सकी। आखिर पूरी दुनिया उस मासूम की जान की दुश्मन क्यों बन गई?”
एक रात जब नगन गुरु नहर में स्नान करने गया, तब गंगा ने उसकी कुटिया के पास जाने का ‘गुनाह’ कर ही डाला। उसने कुटिया के चारों ओर कई चक्कर लगाए। उसके कानों में गुरुजी के
प्रवचन गूँजते रहे, “जो स्त्री राम-रेखा लांघेगी, वह भस्म हो जाएगी... अगले जन्म में सर्पिनी बनेगी।”
जैसे ही उसने राम-रेखा पार करके कुटिया में प्रवेश
करने की कोशिश की, उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। उसे ‘कुछ-कुछ’ होने लगता। रोते-रोते न जाने कैसे
वह अपनी कुटिया में वापस आ गई। बहुत देर तक वह ‘खेलती’ रही। सुबह तक बेसुध पड़ी रही।
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डेरे में इन दिनों भारी उथल-पुथल थी।
अचानक नगन गिरि ने ‘यज्ञ’ का ऐलान कर दिया। आस-पास और दूर-दराज़
के डेरों के साधु-संतों को निमंत्रण भेजे गए। इलाके के हज़ारों श्रद्धालु नतमस्तक होने
पहुँचे। संगत को संबोधित करते हुए गुरुजी ने कहा, “जब मैं यह देह त्याग दूँ, तो मुझे समाधि दे देना। इसके अलावा कोई और रस्म मत करना।”
उनकी यह बात सुनकर सभी हैरान रह गए।
वे तो चंगे-भले हैं।
सारा दिन हवन और पूजा चलती रही। देसी
घी की जलेबियां, दिन में भोलेनाथ का प्रसाद ‘भांग’ और शाम को बाबा निगाहे की समाधि पर चढ़ाई गई घर की बनी शराब को ‘प्रसाद’ के रूप में वितरित किया गया।
कव्वाल नगन गिरि की महिमा में कव्वालियां
गा रहे थे—
“...तेरे सिंहासन को कोई आँच न आए,
तेरा
नगन गुरु अब गरजे।
अब
प्रकट हो जाओ,
मेरे
भोले बाबा,
दर्शन
देकर
नैया
पार लगा दो...”
इसके बाद नगन गिरि रंग-तमाशे से अलग
होकर अपनी कुटिया में चला गया। महंत गिरि भी उसके पीछे-पीछे कुटिया
में जा पहुँचा। भावुक होकर वह गुरुजी के चरणों में गिर पड़ा और बोला, “तो क्या आप सचमुच हमें छोड़कर चले जाएंगे?”
“नगन गुरु ने उसके सिर पर स्नेह से हाथ
फेरते हुए कहा, “मैं जाऊँगा भी तो कहाँ जाऊँगा? इस शरीर रूपी चोले की कैद से निकल जाना
कहीं जाना थोड़े ही होता है। मैं अभी जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हुआ हूँ। आगे
सब करतार की लीला है... अब तुम जाओ और आयोजन की व्यवस्था संभालो।”
महंत गिरि आँखें पोंछता हुआ वहाँ से
निकलकर फिर कव्वालों के पास चला गया।
वे गा रहे थे,
…“मेरे भोले बाबा,
मेरी
नैया पार लगा दे।
ज़िंदगी
मेहमान पल भर की है,
यम
की मार—
मुझसे
सही न जाए।
मेरे
भोले बाबा…”
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समाधि तो पूरे शरीर को कब्र में बैठाकर
दी जाती है। पोस्टमार्टम के बाद तो नगन गिरि के टुकड़े आए थे, फिर भी उन्हें सफ़ेद कपड़े में पूरे शव की तरह बाँध दिया गया था।
महंत गिरि सोच रहा था— “गुरु जी, आपके वचन कैसे पूरे करें?”
पुलिस ने डेरे को घेर रखा था। किसी को बाहर नहीं
जाने दिया जा रहा था। महंत गिरि, लकड़ दास, गंगा और डेरे में रह रहे श्रद्धालुओं से पूछ-ताछ करके अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ हत्या
का मामला दर्ज कर लिया गया।
हत्यारे को ढूँढने के लिए पुलिस कई बिंदुओं से
जाँच कर रही थी।
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डेरे की गद्दी का मसला भी उठ खड़ा हुआ। कई दावेदार
सामने आ गए। शिष्य महंत गिरि को उसके माता-पिता बचपन से ही डेरे में चढ़ा गए थे। वही सारा प्रबंध सँभालता था। उसका हक़ बनता था। शिष्य लकड़ दास डेरे
के सारे धार्मिक कर्मकांड—हवन, पूजा—करता था। वह भी दावेदार था। पाखर खुंग भी दिन
में ज़्यादातर डेरे में ही रहता। बाबा निगाहा, जिनकी समाधि की पूजा होती थी, उनका बड़ा-बुजुर्ग था। इसलिए पाखर भी गद्दी चाहता था। आस-पास के शक्तिशाली डेरों के साधु, जिन्होंने भंडारों में डेरे की महिमा और धन-वर्षा होते देखी थी, वे भी कब्ज़ा करना चाहते थे। कोई किसी को फूटी आँख नहीं भाता था। तनाव इतना था
कि लगता था अब और क़त्ल हो जाएगा।
उस दिन के बाद गंगा कुटिया से बाहर नहीं निकली।
उसे अब भी नगन गिरि की कुटिया से शिशु रूदन की आवाज़ सुनाई देती रहती थी।
कई दिनों तक गद्दी का मामला उलझा रहा। आख़िर
साधुओं के प्रतिनिधियों और पंचायत ने गंगा को डेरा प्रमुख घोषित कर कलह टाल दिया। एक ऐसा फ़ैसला जिसे
सबको स्वीकार करना पड़ा।
महंत गिरि के सीने में टीस सी उठी- क्योंकि उसने गंगा
को फाँसी के तख़्त से बचाकर डेरे की गद्दी पर बैठा दिया था। उसने एक लंबी आह भरी और
डेरे से बाहर चला गया।
साध्वियां बुलाई गईं। उन्होंने गंगा
को भभूत मल दी, गेरुए वस्त्र पहनाए, चंदन का तिलक लगाया। नारियल और अन्य सामग्री के साथ बाबा
निगाहा की समाधि पर माथा टेका गया।
साधु हवन कर रहे थे। प्रमुख डेरों के मुखिया
साधु सवा पाँच गज़ लंबी गेरुया पगड़ियां लेकर आए। वे गंगा के सिर पर बाँध सर पर हाथ रखकर पुकारते- “गंगा देवी।”
“हाँ जी,” वह जवाब देती।
साधु तब तक पगड़ियां बाँधते रहे, जब तक उसे सुनाई देना बंद न हो गया। वे पुकारते-
“गंगा देवी?”
वह आगे से, “हरिओम… हरिओम…” कहते जाती।
“अब ठीक है। गंगा देवी! आज से किसी की
बात नहीं सुननी। अपनी ही कहनी है।” मुख्य साधु ने सीख दी।
गंगा ने वह सीख भी नहीं सुनी। वह बस- “…हरिओम… हरिओम…” कहती रही।
डेरा “हर हर महादेव” के जयकारों से गूँज उठा।
गंगा ने धरती को नमस्कार किया और उठ खड़ी हुई।
इतने पगड़ियां बंध जाने पर भी उसके कानों में शिशु के रूदन की आवाज़ पड़ती रही। वह
नगन गिरि की कुटिया की ओर चल पड़ी।
“…देवी,” लकड़ दास ने हाथ जोड़कर विनती की। गंगा ने नहीं सुना।
देवी! गुरु नगन गिरि ने कुटिया के चारों
ओर राम-रेखा खींची है। उधर मत जाइए,” उसने ऊँची आवाज़ में कहा।
गंगा राम-रेखा लाँघकर कुटिया में जा
घुसी- जिसे लाँघने पर नगन
गिरि ने सर्पिणी की योनि में पड़ने का श्राप दिया था। गंगा ने पूरी कुटिया छान मारी।
वहाँ जलती अखंड-ज्योति के सिवा कुछ भी नहीं था जिसका प्रकाश पूरे इलाके में फैला था।
कुटिया के बाहर साधुओं की भीड़ लग गई। लकड़ दास
ने हाथ जोड़कर आगे बढ़कर देखा- गंगा देवी उसी आसन पर विराजमान थी, जहाँ नगन गुरु जी विराजते थे।
कुछ देर बाद वह नगन गिरि की खूँडी लेकर बाहर
निकली। खूँडी से कुटिया के चारों ओर रेखा खींचती हुई बोली- “अगर कोई पुरुष राम-रेखा लांघेगा, तो सर्प योनि में जाएगा… हरिओम… हरिओम…”
साधुओं ने हाथ जोड़कर उसका आदेश स्वीकार कर लिया।
गंगा “…हरिओम… हरिओम…” कहते हुए फिर कुटिया में चली गई। उसकी
ममता छलकी;
स्तनों से दूध और आँखों से पानी बहने लगा।
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लेखक परिचय - जतिंदर हाँस
छह कहानी संग्रह, एक उपन्यास, चार संपादित पुस्तकें। अनेक कहानियां विभिन्न विश्व विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल। अनेक कहानियों का नाट्य मंचन तथा फिल्मांकन। एक कहानी संग्रह तथा उपन्यास हिन्दी में अनूदित तथा एक कहानी संग्रह अंग्रेजी में अनूदित-प्रकाशित।
पुरस्कार - अंतर्राष्ट्रीय ढाहां
पुरस्कार 2019 सहित विभिन्न पुरस्कारों तथा सम्मानों से समादृत।
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साभार - कृति बहुमत, सितंबर, 2026



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