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बुधवार, सितंबर 30, 2026

कहानी - 86 कुड़ा - महिंदर रिसम

पंजाबी कहानी                                      

                                                           कुड़ा           

 

                                              0          महिंदर रिसम


                        अनुवाद - नीलम शर्मा ‘अंशु


          सेक्टर सत्रह में कपड़ों का एक बड़ा शो-रूम था। दरवाज़े से भीतर प्रवेश करते ही सामने यू-शेप में दोनों तरफ़ काउंटर और बीच में खुली जगह। ग्राहक जिस तरफ़ चाहें, काउंटर पर खड़े होकर अपनी पसंद के कपड़े देख-खरीद सकते थे।       

          जब गिन्नी अपनी पड़ोसन-सहेली के साथ शो-रूम में दाख़िल हुई, तो बाईं तरफ़ काउंटर पर दो-तीन मॉडर्न सी युवतियां कपड़े देख रही थीं। उनकी पीठ की तरफ देखते हुए गिन्नी दूसरी तरफ़ के काउंटर पर खड़े सेल्स-ब्वॉय की तरफ़ मुड़ गई। उस काउंटर वाले सेल्स-ब्वॉय ने थोड़ा आगे बढ़कर धीमी आवाज़ में कहा -  ‘बताइए मैडम, क्या दिखाउं..?’

          इससे पहले कि गिन्नी कुछ कहती, ख़ामोश से शो-रूम में एक मर्दाना आवाज़ गूँजी - ‘नहीं, ऐसा नहीं। हमारी माँ के लिए सूट लेना है, हमारी माँ छोटी बूटियों वाले सूट पहनती हैं, खिले-खिले रंग पर अलग-अलग बूटियां अच्छी लगती हैं। वे ऐसे मटमैले रंग नहीं पहनतीं।’

       ऊँची आवाज़ पूरे शो-रूम में फैल गई। न कोई सेल्स-ब्वॉय कुछ बोला, न ही किसी ने हैरानी ज़ाहिर की। लेकिन गिन्नी एकदम पीछे मुड़ी। यह देखने के लिए कि ग्राहकों में तो यहाँ तीन युवतियां खड़ी थीं। दो सूट पहने हुए और एक जींस-टॉप, ब्वॉय-कट, घुंघराले बालों वाली। फिर यह मर्दाना आवाज़… जिमी की?  वह भी जिमी की आवाज़…?  जिमी... ? उफ़! यहाँ चंडीगढ़ में?

       क़रीब चौबीस साल बाद भी इस आवाज़ ने गिन्नी को एकदम अपनी ओर खींच लिया। लेकिन वहाँ कोई मर्द नहीं था। ...और यह आवाज़ उन्हीं तीनों में से जींस-टॉप पहने, ब्वॉय-कट घुंघराले बालों वाली युवती की थी… युवती या…!!?

       आवाज़ जिमी की थी… गिन्नी के पति जिमी की। गिन्नी पीछे मुड़ दो क़दम उस युवती की ओर बढ़ी। लेकिन कुछ सोचते ही उसे अचानक चक्कर आ गया। चेहरे का रंग उड़ गया, हाथ एकदम माथे की ओर गया। उसे अपनी आँखें मुंदती सी प्रतीत हुईं।  

       गिन्नी गिरने ही वाली थी कि उसकी सहेली ने उसे कंधे से पकड़ते हुए कहा - ‘गिन्नी, क्या हुआ? गिन्नी, तुम्हें चक्कर आ रहा है? गिन्नी, गिन्नी...’ जब तक दो सेल्स-ब्वॉय काउंटर से बाहर आकर उसे संभालते, वह धड़ाम से फ़र्श पर गिर पड़ी। शो-रूम में शोर मच गया। काउंटर वाले सभी लड़के दौड़कर गिन्नी के पास आ गए। तब तक वे तीनों लड़कियां भी कपड़े छोड़कर गिन्नी की ओर मुड़ गईं।

       गिन्नी को क़रीब से देखकर उन तीनों ने एक-दूसरे की तरफ़ हैरानी से देखा। उनमें से जिस युवती ने माँ के लिए सूट की पसंद बताई थी, उसकी हालत अजीब हो गई। वह लगातार गिन्नी को देखती रही और पसीने से तर-बतर हो गई। हू-ब-हू एक से नैन-नक्श! उस जैसा ही खिला हुआ रंग-रूप। कुछ अधपके बाल, माथे पर घुंघराले छल्ले… साथ वाली दोनों युवतियों ने उसे वहाँ से परे हटाने की कोशिश की। लेकिन वह बेहोश गिन्नी पर झुककर उसके चेहरे को हल्के से थपथपाते हुए कह रही थी, ‘उठिए… उठिए मैडम… क्या बात है?’

       सबने देखा कि गिन्नी पर झुकी उस युवती की शक्ल हू-ब-हू गिन्नी जैसी थी, बारीक़ नैन-नक्श, घुंघराले बाल, कद-काठी सब कुछ, परंतु आवाज़…!! गिन्नी ने अपने घुंघराले बाल पीछे की तरफ रबर बैंड से बांध रखे थे। गिरने से बाल थोड़े ढीले हो गए और कुछ माथे पर बिखर गए। उम्र का फ़र्क होते हुए भी ऐसा लग रहा था मानो वे बड़ी-छोटी सगी बहनें हों!

      दुकान में मौजूद बाकी लोगों को समझ आया हो या न आया हो, लेकिन वह और उसकी सहेलियां सब समझ गई थीं। इसलिए वे दोनों अपनी इस सहेली को वहाँ से ले जाना चाहती थीं। पर वह युवती ज़िद पर अड़ी थी कि पहले यह महिला होश में आ जाए, तभी वह जाएगी।

      उसने सोचा - ‘कहते हैं दुनिया में एक जैसे चेहरे वाले तीन-चार लोग होते हैं लेकिन मेरा मामला कुछ अलग है। हो सकता है यह मेरी बहन ही हो। और अगर नहीं भी हुई, तो आख़िर इंसानियत भी तो कोई चीज़ होती है। दोपहर का समय है, इनके साथ दूसरी भी एक अकेली महिला है। अगर इनकी तबीयत ज़्यादा बिगड़ गई तो वह क्या करेगी? दुकान में कोई दूसरी महिला ग्राहक भी नहीं है।’

      युवती अपने अंदरूनी डर को दरकिनार कर यही चाहती थी कि यह महिला एक बार होश में आ जाए, तभी वह जाए।

       ठंडे पानी के छींटे गिन्नी के चेहरे पर मारे गए। सहेली गिन्नी की हथेलियों की मालिश कर रही थी। गिन्नी को होश में आने में पाँच-सात मिनट लग गए। जैसे ही उसने आँखें खोलीं, उसी युवती ने उसका सिर अपने हाथों में उठाकर पानी का गिलास उसके मुँह से लगाया। आधा गिलास पानी पीने के बाद गिन्नी ने पूरी आँखें खोलीं। अपने सामने अपने ही यौवन जैसे चेहरे को देखकर उसे अजीब-सी दहशत हुई।

      उस युवती ने पूछा - ‘मैडम, आप ठीक हैं?’

       गिन्नी के कानों में फिर जिमी की आवाज़ गूँज उठी...उफ़…!

      इतने से समय में गिन्नी न जाने क्या-क्या सोच चुकी थी। उसके मुँह से बस इतना ही निकला - ‘तू ज़िंदा है?’

       गिन्नी की नज़रें उस युवती के चेहरे पर गड़ गईं। अगले ही पल वह फिर उसके हाथों में बेहोश हो गई।

       उस युवती ने पीछे खड़ी अपनी सहेलियों से कहा - ‘टैक्सी बुलाओ, इन्हें डॉक्टर के पास ले जाना पड़ेगा।’

      फिर वह गिन्नी की सहेली की ओर मुड़ी और बोली - ‘मैडम, घबराइए मत। हम आपके साथ चलते हैं। आप घर फोन कर दीजिए किसी को। तब तक हम इन्हें पास के किसी अस्पताल ले चलते हैं।’

       गिन्नी की सहेली बहुत संकोच में थी। अब तक वह समझ चुकी थी कि ये तीनों किन्नर हैं। उन पर भरोसा करना उसे मुश्किल लग रहा था। वह बोली - ‘नहीं, आप रहने दीजिए। मैं घर से किसी को बुला लूँगी। थोड़ी देर में यह ठीक हो जाएगी, नहीं तो मैं खुद डॉक्टर के पास ले जाउंगी।’

       ‘नहीं आंटी, ये एक बार होश में आकर फिर बेहोश हो चुकी हैं। इनकी सेहत के लिए ख़तरा हो सकता है। कहीं हार्ट-अटैक ही न हुआ हो। इंतज़ार करने का रिस्क क्यों लेना? आप घर फोन कर दीजिए। अगर कोई घर पर है तो आ जाए, तब तक हम इन्हें अस्पताल पहुँचा देते हैं।’

      उस युवती ने ‘मैडम’ की जगह ‘आंटी’ शब्द इस्तेमाल करके अपनी सच्ची हमदर्दी जताने की कोशिश की।

       अस्पताल पहुँचने तक गिन्नी की सहेली ने अपने घर फोन करके, कॉलेज से लौटे अपने बेटे को अस्पताल पहुँचने के लिए कह दिया। गिन्नी का चेकअप होने तक वे तीनों वहीं रहीं। डॉक्टर ने बताया कि उसे कोई गहरा सदमा लगा है। उसे होश में आने में समय लग सकता है और शायद एक-आध दिन अस्पताल में भी रखना पड़े।

      घुंघराले बालों वाली ब्वॉय-कट युवती ने गिन्नी की सहेली से उसका पता पूछा तो सहेली हिचकिचा गई। युवती ने भरोसा दिलाया कि वह सिर्फ गिन्नी के स्वास्थ्य का हाल पूछने आएगी। नहीं तो फोन नंबर ही दे दीजिए, फोन पर ही हाल-चाल पूछ लेगी। सहेली ने असमंजस में गिन्नी का लैंडलाइन नंबर दे दिया - सोचा, यही ठीक है कि नंबर ले ले, लेकिन घर न आए।

       गिन्नी के स्ट्रेचर के पास खड़ी उसकी सहेली ने उन तीनों के जाने पर राहत की साँस ली। उनके भारी, मर्दाना स्वर सुनकर वार्ड में मौजूद लोग हैरानी से उन्हें देख रहे थे। मानो हर नज़र पूछ रही हो -‘ये किन्नर आपके साथ हैं? आपके रिश्तेदार...?’

      एक-दो ने तो धीरे से पूछ भी लिया - ‘ये किन्नर आपके साथ कैसे…?’

      उसके पास समय नहीं था कि वह किसी को जवाब दे सके। वह चाहती थी कि उसके बेटे के आने से पहले वे वहाँ से चली जाएं और माहौल सामान्य हो जाए, ताकि वह गिन्नी के बारे में सोच सके। लेकिन वे तीनों फोन नंबर लेकर भी उसके बेटे के आने के बाद ही गईं।

       गिन्नी की सहेली सोच रही थी - ‘क्या इस वर्ग को भी आम लोगों की फिक़्र होती है? जबकि कहते हैं कि किन्नरों को किसी के दु:ख-सुख से कोई मतलब नहीं होता। शायद आजकल के युवा किन्नर कुछ अलग सोचते हों…’

       गिन्नी होश में आ गई, लेकिन उसके चेहरे की रंगत पहले जैसी सामान्य नहीं हुई। एक दिन अस्पताल में रखकर अगले दिन दवा देकर घर भेज दिया गया। पाँच दिन बाद फिर बुलाया गया था।

       घर में गिन्नी अकेली थी। उसकी पड़ोसन-सहेली ने उसकी पूरी देख-भाल की। शारीरिक रूप से वह ठीक थी, लेकिन दिल में कहीं कुछ गहरा चुभ गया था, जिसकी पीड़ा वह किसी से साझा नहीं कर पा रही थी - न सहेली से, न ही विदेश में रहने वाले अपने इकलौते छोटे भाई से, जो रोज़ एक बार फोन ज़रूर करता था।

       गिन्नी की तबीयत ख़राब होने के बाद से वह दिन में दो-तीन बार फोन पर दवा के बारे  पूछता। उसके खाने, फल, जूस सब कुछ के बारे में छोटे भाई का पूरा परिवार ही चिंतित था। माँ-बाप के बाद यह भाई ही...। लेकिन गिन्नी को यह अजीब-सी पीड़ा किसी से भी साझा करनी मुशकिल लग रही थी। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि दिन में कई बार उसका दिल क्यों कांप उठता है। दिल ऐसे बेचैन हो उठता जैसे वही उसका आख़िरी पल हो। पंद्रह-बीस मिनट की बेचैनी उसके पूरे तन को निढाल कर देती थी।

       गिन्नी बिल्कुल ख़ामोश हो गई। अब वह सहेली से भी ज़्यादा बात न करती, कहीं आती-जाती नहीं थी। सारा दिन बिस्तर पर पड़ी कुछ सोचती रहती। सहेली हैरान थी - न बुखार था, न कोई दर्द, फिर गिन्नी इतनी चुप सी क्यों हो गई है?  उस दिन इसे हुआ क्या था? डॉक्टर कहते हैं सदमा है… और वह... चेहरे के नैन-नक्श तो सारे बिल्कुल इसके जैसे थे।

       पांचवें दिन चेकअप के लिए गिन्नी सहेली के साथ अस्पताल गई। डॉक्टर ने उसे अस्पताल के बड़े मनोचिकित्सक के पास भेज दिया।

       उस डॉक्टर ने गिन्नी की सहेली को बाहर बैठने को कह, गिन्नी को सामने कुर्सी पर बैठाया और पूछना शुरू किया - ‘हाँ मैडम, आपकी तबीयत कैसी है?’

       ‘ठीक है डॉक्टर साहब...।’

       ‘कैसे गुज़रे ये पांच दिन...?’

      ‘ठीक ही…’

      ‘नींद ठीक आई…? और भूख…?’

      गिन्नी की निगाहें ज़मीन की तरफ झुकी हुई थीं। पता नहीं क्यों, वह डॉक्टर के चेहरे की ओर देखने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी। मानो यह उम्रदराज़ डॉक्टर उसकी आँखों में छुपी हुई कोई बात ही न पढ़ ले।

      ‘नींद…! हाँ, आई… भूख भी…’

      ‘आप क्या सोचती रहती हैं…? अगर नींद ठीक आती है, तो क्या इन दिनों कोई सपना आया?’

      ‘नहीं… सपना…?  नहीं… नींद ही नहीं…’

      ‘तो फिर क्या सोचती रहीं थीं?’

      डॉक्टर इतनी सहजता से, धीमे मीठे स्वर और अपनेपन से पूछ रहा था कि गिन्नी की झुकी आँखों में पानी भर आया। किसी ने इतने प्यार से उससे सपनों के बारे में कभी पूछा ही नहीं था।

      ‘नहीं… सोचना तो… क्या कहूँ... बस…!’

      ‘मैडम, वह सब आप मुझे बताइए जो कुछ आप किसी और से नहीं कह सकतीं... जो आज तक किसी को नहीं बताया...मुझे बताइए...। आपके दिमाग में जो उलझन है, मुझे बताइए। मैं आपकी उलझन सुलझाने में आपकी मदद करूँगा...।’ बुजुर्ग डॉक्टर ने इतने प्यार से कहा कि गिन्नी की नम आँखें अचानक बरस पड़ीं।

      मेज़ पर रखा पानी का गिलास गिन्नी को देते हुए डॉक्टर ने कहा, ‘उस दिन जो तीन युवतियां आपकी सहेली के साथ आपको लेकर आई थीं, क्या आपको उनकी याद है...?’

      ‘जी डॉक्टर साहब… एक की शक्ल तो मेरे जैसी…’  गिन्नी खुल गई।

      ‘हाँ… शक्ल तो किसी की भी किसी से मिल सकती है। मुझे पता चला है कि शादी के बाद आप अपने माता-पिता के पास वापस आ गई थीं और पिछले कई सालों से बिलकुल अकेली रह रही हैं, आपकी फैमिली...? क्या आप अपने वैवाहिक जीवन के बारे में कुछ बता सकती हैं? आपको देखकर नहीं लगता कि आपकी शादीशुदा ज़िंदगी में कोई समस्या रही होगी। खूबसूरती में आप अब भी बहुत खूब हैं, मायके लौट आने की आख़िर वजह क्या रही होगी?’

      डॉक्टर ने नरम लहजे में एक साथ कई सवाल पूछ लिए, मानो यह सोचा हो कि अब वह अपनी सुविधानुसार जिसका चाहे जवाब दे।

       ‘सुंदर थी, तभी तो सतरह-अठारह की उम्र में मेरी शादी हो गई थी। उन्होंने माँग कर रिश्ता लिया था…’ गिन्नी अतीत में उतरते हुए बोली।

       ‘फिर...?’  डॉक्टर ने रुई के फाहे जैसी नरमी से छोटा-सा सवाल आगे बढ़ाया।

       ‘मैं तो अपने छोटे भाई के बारहवीं में टॉपर होने की खुशी में रखी पार्टी के मौक़े पर मायके आई थी।’

       ‘फिर?’  

       ‘मुझे यह कहकर अकेले ही भेजा गया था कि एक हफ्ते बाद वे मुझे लेने आएंगे।’

       ‘तो?’  

       ‘जब इंतज़ार बहुत लंबा हो गया, उस घर के फोन की घंटी भी बज-बजकर अपने आप ख़ामोश हो जाती, तो मेरा भाई पता करने गया। वहाँ घर में मेरी जगह किसी और ने ले ली थी।’ गिन्नी की आवाज़ छलकते पानी की भाँति कांप रही थीं।

       ‘भाई ने आकर क्या बताया?’ डॉक्टर की आँखें गिन्नी के चेहरे पर टिकी हुईं थीं।

       ‘बस यही कि वहाँ…!  उसके बाद घर में किसी ने मुझे वहाँ भेजने की बात ही नहीं की।’

      गिन्नी की आवाज़ में आज भी आश्चर्य स्पष्ट ज़ाहिर हो रहा था, जैसे वह अब भी असमंजस में हो - कि पता नहीं क्यों?

       ‘जब आप ब्याह कर उस घर में गई थीं, उस घर-परिवार का माहौल कैसा था?’ डॉक्टर ने सामान्य सा सवाल किया।

       ‘जब मेरी शादी हुई, हम यहाँ पास के एक गाँव में रहते थे। छोटी उम्र में जब मैं ब्याह कर इतने बड़े शहर में गई, तो मैं खुद को बहुत भाग्यशाली समझती थी। खुले विचारों वाला, संपन्न परिवार। घर में जेठ-जेठानी और सास-ससुर सभी मुझे सर आँखों पर बिठाते थे क्योंकि जिमी उनका बहुत लाडला था। सबका चहेता, सबका प्यारा। लंबा, सुंदर, नौकरीशुदा, महज़ चौबीस बरस का।

पीछे मैं और मेरा एक छोटा भाई। मुझे यह भी नहीं पता था कि ससुराल जाकर ज़्यादा बेबाक नहीं होते। थोड़ी-बहुत शर्म भी करनी पड़ती है…’

       ‘यह तो कोई बड़ी बात नहीं। हर बात की समझ उम्र के साथ आती है। और फिर आप कहती हैं कि वे खुले विचारों के थे, तो सोचने की क्या बात थी?’

       गिन्नी ने नज़रें झुकाए-झुकाए हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, ‘डॉक्टर साहब, हमारी शादी के चौथे दिन जब किन्नर नाचने आए, तो आप मानेंगे नहीं कि उनकी ताल पर मैं और जिमी खूब नाचे। मुझे समझ नहीं थी, मैं जिमी को नाम से पुकारती थी। जिमी को नाचने-गाने का शौक़ था और नाचना मुझे भी अच्छा लगता था। किन्नरों ने अभी दो-तीन बधाई गीत ही गाए थे कि जिमी ने उनसे ‘ओ मजनूँ के नाना... मेरे पीछे न आना… जा प्यार करने वाले...’ गीत गाने को कहा और ढोलक पर थाप पड़ते ही मेरा हाथ पकड़ मुझे अपने साथ नाचने के लिए किन्नरों के बीच ले गया। बस फिर तो... हमने पीछे मुड़कर देखा ही नहीं। बहुत देर तक हम किन्नरों के साथ नाचते रहे। एक के बाद एक गीत, जिमी की फरमाइश पर...। मम्मी-पापा बहुत कहते रहे -‘जिमी बस करो। जिमी क्या कर रहे हो? लड़की को नज़र लग जाएगी। बस करो अब... इन्हें भी नाच लेने दो, जिन्हें नेग लेना है।’ पर नहीं जी… जिमी में तो जैसे किसी फिल्मी हीरो की रूह घुस गई थी। मैं भी उससे हारने वाली नहीं थी। जेठ-जेठानी हँस-हँस कर दोहरे हो रहे थे, और सारा मोहल्ला दांतों तले उंगलियां दबा रहा था - ‘इस बहू को तो ज़रा भी शर्म-ओ-हया नहीं, इसे ससुराल और मायके में कोई फर्क़ ही नहीं दिखता, बहू को बहू की तरह रहना चाहिए।’ उसी दिन सबने हमें ‘चाँद और चकोर’, ‘तोता और मैना’, ‘लैला-मजनूं’ कहना शुरू कर दिया था। उस दिन जिमी ने ‘एक डाल पे तोता बोले, एक डाल पे मैना’ गीत चार-पाँच बार गाया और नाचा भी बहुत।’

      ‘तब तो आपकी जोड़ी वाकई कमाल की रही होगी।’ डॉक्टर ने जैसे कमरे में एक जादुई-सा माहौल बना दिया। गिन्नी सहज ही अपने दिल की गिरह खोलती चली गई।

      ‘कमाल की तो थी ही, सबको रश्क था हम पर। रात को जब हम सैर के लिए गली से निकलते, तो मुहल्ले की युवा लड़कियां और बहुएं हमें ऐसे देखती थीं जैसे हम कोई हीरो-हीरोइन हों। लेकिन…’ कहते-कहते गिन्नी फिर बुझ सी गई।

      ‘लेकिन क्या, गिन्नी मैडम?’

       ‘लेकिन यह सब इतनी जल्दी सपना बन जाएगा, मैंने कभी सोचा भी नहीं था। महज़ डेढ़ साल…!’ गिन्नी की आवाज़ जैसे बहुत दूर से आ रही हो।

            ‘क्यों?’ डॉक्टर के इतने छोटे से सवाल का बहुत बड़ा जवाब सामने आया।

      ‘जाते वक्त किन्नर बहुत खुश थे। हम दोनों की बलैयां लेते हुए मेरी सास से कह रहे थे - ‘मम्मी… ओ मम्मी, तुम्हारे बेटे-बहू तो बहुत रंगीले हैं। साल बाद फिर आएंगे हम, काके (मुन्ने) की बधाई लेने। अब हमें खुश करके विदा करना, मम्मी। तुम्हारी बड़ी बहू ने तो शादी के तीन साल बाद बुलाया था, अब देर नहीं होगी... मम्मी याद रखना... साल बाद इन्हीं दिनों।’ हम दोनों शर्माकर कमरे के भीतर भाग गए थे।

      ‘उनकी बात सच हो गई - सिर्फ़ सवा साल बाद ही...। हम बहुत खुश थे। पूरा घर जैसे महक रहा था। जेठानी और सास ने मेरा बहुत ध्यान रखा था। मुझे मायके भी नहीं भेजा गया। जब तक प्रसव नहीं हो जाता, सास मुझे अपनी निगरानी में रखना चाहती थी।’

      ‘मैडम, यह तो सचमुच बहुत खुशी का समय था…’ डॉक्टर आगे सुनना चाहता था, ताकि वह गिन्नी के मन की उलझन तक पहुँच सके।

      ‘जब मुझे अस्पताल ले जाया गया, तो सब बहुत खुश थे। लेकिन दो दिन बाद जब मुझे होश आया, तो सब चुप थे। किसी ने मुझे कुछ नहीं बताया। मैंने सामने बिस्तर की ओर देखा। फिर दाएं-बाएं देखा - न ही कोई पालना था, न ही किसी की गोद में कोई सोता-जागता बच्चा। सास और जेठानी उदास सी एक तरफ बैठी थीं। कमरे में जिमी कहीं नज़र नहीं आया। मैंने सास से पूछा था -‘मम्मी, मेरा बच्चा कहाँ है?’

       ‘बच्चा मरा हुआ था।’ पत्थर जैसा जवाब मेरी कोख पर आकर लगा।

       ‘मैं भी पत्थर बन गई। लेकिन किसी ने मुझे ढाढ़स बढ़ाने की कोशिश नहीं की। मेरे मम्मी-पापा को भी ख़बर नहीं दी गई थी। मैंने तो सोचा था कि बच्चे के बाद मम्मा को बताउंगी... लेकिन सब कुछ उलट हो गया।

       ‘घर में सब कुछ बदल गया था। जिमी अब कम ही कमरे में आता, अक्सर अपने पापा के पास ही सोता। मैं हर समय सोचती रहती - आख़िर क्या हो गया, बच्चा कैसे…? मैंने तो बहुत ध्यान रखा था। पता नहीं कैसे। घर में कोई कुछ नहीं बताता था।

       ‘एक महीना हो गया था, लेकिन मुझे अब भी घर का काम करने की मनाही थी। मैं सोचती थी शायद सवा महीने बाद…’

       ‘एक दिन जब जेठानी कमरे में खाना देने आईं, तो मैंने अपने दिल की बात पूछी - ‘भाभी जी, मुंडा(लड़का) था या कुड़ी (लड़की)?’

       जेठानी ने मेरे सामने थाली पटकते हुए कहा - ‘हूँह!... कुड़ा था...।’

       मैं जेठानी की ऊंची आवाज़ सुनकर कांप ही गई थी। लेकिन मुझे कभी भी समझ ही नहीं आया कि उन्होंने क्या कहा था।

       ‘सच जानिए डॉक्टर साहब, इतने सालों बाद उस दिन मुझे समझ आया कि मेरी जेठानी ने क्या कहा था, जिस दिन सेक्टर सतरह के शो-रूम में उस युवती का चेहरा मेरे चेहरे पर झुका हुआ था।’ गिन्नी ने गहरी साँस छोड़ी। कमरे में आने के बाद पहली बार उसने आँखें उठाकर डॉक्टर की ओर देखा।

       डॉक्टर साहब अपनी कुर्सी से उठे, गिन्नी की कुर्सी के पास आए और उसका कांधा सहलाते हुए कहा - ‘बी ब्रेव बेटी। तुम तो बहुत जल्दी नतीजे पर पहुँच गई हो। सिर्फ़ तुम्हारे साथ शक्ल मिलने की वजह से ही तुमने सोच लिया कि वह…?’

      डॉक्टर अब गिन्नी को अतीत से निकालकर वर्तमान में लाना चाहते थे।

       सब कुछ कह देने से गिन्नी का दिल-दिमाग हल्का हो गया। उसने पूरी तरह चेतन होते हुए खुद को संभाला। पूरे यक़ीन के साथ कहा - ‘नहीं डॉक्टर साहब, सिर्फ़ उसकी शक्ल ही मुझसे नहीं मिलती, उसकी आवाज़ भी बिल्कुल जिमी जैसी है। वही आवाज़ सुनकर ही तो मैं पीछे मुड़ी थी। इतना बड़ा संयोग नहीं हो सकता। यक़ीनन वह मेरी औलाद है। लेकिन उसका ‘न लड़का न लड़की’ होना ही मेरा गुनाह बन गया। अगर मुझे सच बता दिया जाता, तो आज उसे ज़िंदा देखकर मुझे तकलीफ़ नहीं, बल्कि खुशी होती!’

      डॉक्टर ने गिन्नी के कंधे पर एक बार फिर थपकी दी और अपनी कुर्सी पर वापस बैठते हुए कहा - ‘हो सकता है गिन्नी तुम ठीक कह रही हो कि वह तुम्हारी ही औलाद हो, लेकिन इसमें तो चिंता की कोई बात नहीं है। यह कुदरत का काम है - किसे कौन-सी योनि देनी है, क्या बनाना है, किस की कोख के माध्यम से इस दुनिया में भेजना है। वह जिस अवस्था में है, उसमें न तो तुम्हारा कोई कसूर है, न ही उसका। हाँ, समाज इस तीसरे लिंग को स्वीकार करने से इंकार करता है, जबकि वे हमारे ही समाज का अंग हैं। हममें से ही कोई उन्हें जन्म देता है, लेकिन जैसे ही पता चलता है कि वे कुछ और हैं, उन्हें बेगाना कर दिया जाता है, त्याग दिया जाता है। इस बारे में समाज को बहुत कुछ सोचने की ज़रूरत है। इसके लिए कानून भी होना चाहिए कि जो माता-पिता ऐसे बच्चों को अपने पास रखना चाहें, रख सकें - कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती न की जाए…’

       ‘फिलहाल तुम एक जीते-जागते, इस दुनिया में विचरते बच्चे की माँ हो, जननी हो, तुम्हें यह सोचकर खुद पर गर्व होना चाहिए।’ काग़ज़ पर कुछ लिखते हुए डॉक्टर ने फिर कहा -‘गिन्नी, तुम बहुत हिम्मत वाली हो। कोई ग्लानि या पश्चाताप मत करो। मैंने तुम्हारे लिए दवा लिखी है, रात को अच्छी नींद आएगी। पूरी नींद लेने से तुम अपने आप को बेहतर महसूस करोगी। हम आठ दिन बाद फिर मिलेंगे। ठीक है…!’ कहते हुए डॉक्टर उठकर गिन्नी के पास आए और अपना हाथ उसके सर पर रखते हुए कहा - ‘माँएं हमेशा बहादुर होती हैं। पहला, दूसरा या तीसरा—कोई भी लिंग हो, लेकिन उसने तुम्हें माँ बनाया है। समाज कुछ भी कहे - अगर वह फिर कभी ऐसे ही मिले, तो उसे दिल से लगाना, भरपूर प्यार करना। उन्हें भी माँ के प्यार की ज़रूरत होती है।’

       ‘जी डॉक्टर साहब, मैं भी उससे मिलना चाहती हूँ।’

      गिन्नी ने नज़र भरकर डॉक्टर की ओर देखा और कमरे से बाहर आ गई।

       पता नहीं डेढ़-दो महीने से चल रही दवाओं का असर था या हर बार डॉक्टर के साथ होने वाली बातों का, गिन्नी को अपना मन और शरीर दोनों ठीक होते हुए जान पड़े थे। उदासी छंट गई थी। ज़िंदगी फिर से सामान्य चल रही थी। हाँ, सामान्य लगते हुए भी गिन्नी के भीतर एक बेचैनी थी, एक इंतज़ार था। उसकी सहेली ने बताया था कि वह गिन्नी का फोन नंबर ले गई है, उसके स्वास्थ्य का हाल जानने के लिए। गिन्नी को उसके फोन का इंतज़ार था, फिर से उस आवाज़ को सुनने का, वही आवाज़, जो कभी उसके लिए दर्द भरी थी, लेकिन अब वह उसी आवाज़ में सुकून तलाशने की कोशिश कर रही थी।

       तीन महीने बाद एक दोपहर फोन बजा। गिन्नी ने फोन उठाया तो कुछ पल कोई आवाज़ नहीं आई। गिन्नी ने एक बार, दो बार, जब तीसरी बार ‘हैलो’ कहा तो सामने से एक शांत, मर्दाना-सी आवाज़ उभरी - वही जिमी जैसी आवाज़ - ‘मैडम, आपकी तबीयत अब कैसी है?’

        ‘हाँ… हाँ, मैं ठीक हूँ, पर तुम इतने दिनों बाद...?’ गिन्नी ने खुश होते हुए कहा।

       ‘काफी दिन हो गए फोन करके आपकी ख़ैरियत पूछनी थी, पर वक्त ही नहीं मिला। मुझे खुशी है कि आप ठीक हैं।’ ऐसा लगा जैसे उधर से बस इतना ही जानने की दरकार थी।

       ‘कभी वक्त निकालकर मुझसे मिलने आओ... मुझे बहुत अच्छा लगेगा। शायद तुम्हें भी…!’

फोन कटने से पहले गिन्नी ने झट अपने दिल की बात कह दी।

       ‘चलिए, अगर वक्त मिला तो आने की कोशिश करूंगी। आने से पहले आपसे पता पूछ लूंगी। पर शायद आपको दिक्कत…’

       ‘नहीं, मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी। जब मर्ज़ी आओ, मैं तुम्हारी माँ जैसी ही हूँ। माँ, जिसके लिए उस दिन तुम दुकान पर सूट देख रही थी…’

      उधर से एक ज़ोरदार हंसी गूँजी थी... बिल्कुल जिमी के ठहाके जैसी!

       ‘हाँ… माँ...! हमारी माँएं पता नहीं होती भी हैं या नहीं! मुझे तो लगता है हम शायद आसमान से ही गिरते हैं! वही हमारी पालनहार है, जिसके लिए उस दिन सूट…। अब बुजुर्ग हो गई हैं, खुद खरीदारी करने नहीं जा सकतीं, हम ही उसके लिए…।  आउंगी मैं , कभी आपसे मिलने।’

 

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       …और एक शाम वह कितनी ही बेचैनियां और सवाल अपने भीतर समेटे, गिन्नी से मिलने आई। अकेली। गिन्नी ने दरवाज़े पर ही उसे कसकर गले से लगा लिया। कितनी देर तक उसके दिल की धड़कन सुनती रही। उसे लगा जैसे यह जिमी के दिल की धड़कन हो।

       कमरे में बैठी गिन्नी की नम-सी नज़र देर तक उसके चेहरे से नहीं हटी, तभी उस युवती ने अजीब-सा सवाल किया - ‘मैं आपको क्या कहकर बुलाऊं? दीदी...? आपको मैडम या आंटी कहने को जी नहीं चाहता।’

       गिन्नी का दिल उछलकर मुँह को आ गया - ‘हाय... मैं सदके जाऊं...! तू मुझे माँ कह। माता, बीजी, मम्मी, अम्मी कह। मैडम-आंटी छोड़, दीदी भी क्यों...!’

       ‘हैं… क्या सचमुच?’ युवती की आँखें फैलकर और भी बड़ी हो गईं, साथ ही नम भी। वह उछल कर गिन्नी के गले से लिपट गई। अब वह गिन्नी के दिल की धड़कन ऐसे सुन रही थी जैसे आज पहली बार बेटी, माँ के सीने से लगकर रोई हो।

       सालों से धधकते दोनों सीने आँसुओं से शीतल हुए, तो गिन्नी ने पूछा - ‘तुम्हारा नाम क्या है...? मतलब सभी तुझे क्या कहकर पुकारते हैं?’

      ‘सभी मुझे कविता कहते हैं। बेगाने तो कुछ भी नाम रख देते हैं, बच्चे का नाम खुशी से तो माँ-बाप ही…!’ कविता की आँखों में बहुत कुछ मचल रहा था।

      ‘हाँ… सच में…!’ गिन्नी की आह कमरे में पसर गई थी।

 

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      उस दिन वह आधे घंटे बाद ही चली गई थी।

      लेकिन खिंचाव दोनों तरफ था, दो-ढाई महीने बाद वह कभी-कभी गिन्नी से मिलने आ जाती। जब गिन्नी ने उसे अपनी आशंका बताई तो वह खिलखिलाकर हँस पड़ी।

      ‘अरे माँ…! कोई तो हमें भी जन्म देती ही है। हाँ, हम किसी के बेटा-बेटी नहीं होते। चलो मान लिया, आप ही मेरी माँ हैं, पर अब मेरी दुनिया आपकी दुनिया से अलग है।’

      ‘चलो ठीक है कविता, तुम्हारी दुनिया अलग है, परंतु ज़रा सोचो तो अगर तुम किसी की बेटा-बेटे नहीं भी होते, तब भी माँ को प्रसव पीड़ा उतनी ही होती है। विछोह का दर्द भी माँ के लिए सज़ा ही होता है। माँ होते हुए भी जब माँ की झोली खाली रह जाती है, उस पीड़ा का कहीं कोई हिसाब है?’ गिन्नी ने अपनी उम्र भर की पीड़ा आज बेटी के सामने उंड़ेल दी थी।

      ‘हाँ, आप भी ठीक कहती हैं। लेकिन आपको बताऊँ, आपसे मिलने की इजाज़त मुझे बहुत मुश्किल से अपने गुरु महंत जी से मिली है। वह भी यहाँ की बड़ी बुज़ुर्ग माँ के कहने पर। हमें किसी से कोई रिश्ता जोड़ने का हुक्म नहीं है। जब मैं पहली बार आपसे मिलने आई थी, तो मैंने अपनी जन्म दायिनी माँ की सौगंध खाकर महंत जी को यक़ीन दिलाया था कि मैं अपने क़सब (पेशे) के प्रति हमेशा वफ़ादार रहूंगी। उस समाज के किसी इंसान से रिश्ता नहीं जोड़ूंगी जिसने मुझे जन्म देकर ठुकरा दिया था। मैंने उनसे कहा था कि मुझे बस आपकी शक्ल-सूरत अच्छी लगती है, इसलिए आपसे मिलने का दिल करता है। साथ वालों ने बता दिया था कि आपकी शक्ल मुझसे हू-ब-हू मिलती है। इसलिए वे मुझे आने नहीं देते थे कि कहीं मैं…’

      ‘यह दुनिया भी दोधारी तलवार है। न इधर जीने देती है, न उधर। जन्म के वक़्त तुम लोगों को दूर करते समय माँओं से पूछता कौन है? पता लगते ही लेने वाले दरवाज़े उखाड़ लेते हैं। फिर यह भी कहा जाता है कि माँ-बाप ने ठुकरा दिया।’

      ‘लेकिन मुझे एक बात बताइए...?’ कविता की आँखें गिन्नी के चेहरे पर ऐसे गड़ी थीं जैसे कोई थानेदार पूछताछ कर रहा हो।

      ‘पूछो।’ गिन्नी सोच भी नहीं सकी कि कविता के दिल में किस बात ने तूफ़ान मचा रखा था।

      ‘आपका वह सवाल - ‘तू ज़िंदा है?’ मुझे रातों को सोने नहीं देता। अगर कोई अपना बिछड़ा हुआ अचानक मिल भी जाए, तो उसे ज़िंदा देखकर कोई इतना परेशान हो जाए कि बेहोश ही हो जाए?’ गिन्नी के लिए कविता की आँखों की तपिश सहना मुश्किल हो गया।

      ‘ओ मेरी जान… तुम्हारी शक्ल और आवाज़ सुनकर तुझे अपनी औलाद न मानने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। तुम्हारे जन्म के समय मुझे बताया गया था कि मृत बच्चा पैदा हुआ है। तुझे अचानक अपनी आँखों के सामने देखकर खुशी में मुझे पता ही नहीं चला कि मैं क्या कह गई…’

गिन्नी ने जैसे अपना जुर्म कबूल कर लिया हो।

      ‘उफ़...! मरा हुआ…! मरा हुआ बच्चा माँ को सब्र दे देता है न...!’ लगा कविता की सिसकी आँसुओं में भीग गई थी।

      ‘पर चलो… अब सच्चाई यही है कि हम दोनों चाहे किसी भी रिश्ते से हों - आपकी दुनिया अलग है, मेरी दुनिया अलग है। यह भी कम नहीं कि हम अचानक मिल गए। इतना ही काफ़ी है कि मैं दो-तीन महीने में घंटे भर के लिए आपसे मिलने आ सकती हूँ। मुझे डर है कि अगर आपके यहाँ गली-मुहल्ले में कोई शिकायत हुई तो मुझे दूसरे शहर भेज दिया जाएगा।’

      ‘नहीं, मेरे गली-मुहल्ले वाले मुझसे बहुत प्यार करते हैं। इतने अरसे से यहाँ इज़्ज़त से माँ-बाप के दर पर बैठी हूँ तो इन अच्छे लोगों की वजह से ही। तुम्हारी शक्ल मुझसे मिलती-जुलती होने के कारण वे तुझ पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते। कोई तुझे मेरी बहन कह देता है, कोई भाई, कोई बेटी, कोई कहता है - ‘गिन्नी, तेरा दोस्त/सहेली आई है।’ गली वालों को मेरी सहेली ने ही बताया है कि जब कपड़ों की दुकान पर मेरी तबीयत अचानक खराब हुई थी, तो तुम ने ही मुझे अस्पताल पहुँचाने में उसकी मदद की थी। तुम मेरी फ़िक्रमंद हो। अगर तुम्हारे ‘सज्जन’ मना करते हैं, तो तुम आना-जाना ज़रा कम कर दो, परंतु देखो आना बंद मत करना। बाकी ज़िंदगी मैं तुम्हारे आने-जाने के इंतज़ार में ही गुज़ार लूंगी!’

      ‘सज्जन…?’  कविता ने ज़रा हैरानी से पूछा।

      ‘हाँ, हाँ, बेटी, वे तुम्हारे सज्जन ही हैं बेटी। जिस किसी ने भी मेरे बच्चे के मुँह में निवाला डाला, स्नेह से पाला, वही तेरा सज्जन है। आज भी उन्हें तुम्हारे काम की चिंता है। वे जानते हैं कि यह समाज तुझे स्वीकार नहीं करेगा, पर पेट तो तुम्हारे साथ जुड़ा है, तू खाएगी कहाँ से...? मेरी बच्ची, अब तो चाहकर भी मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती! मेरे बाद तुम्हारा कौन…!’ माँ के अरमानों से लदी गाड़ी जैसे भरे बाज़ार पलट गई हो…

       ‘कोई बात नहीं माँ, आप अब मेरे लिए क्यों कुछ करें? जवान तो मैं हूँ, कुछ करना मेरा फ़र्ज़ बनता है। आपने जन्म दिया है, यह क्या कम है? बाकी मेरी किस्मत थी। आप मुझे अपने घर नहीं रख सकती थीं, मुझे तो आपके पास आने की कोई मनाही नहीं है। आप तो माँ हैं… माँ की सेवा करने, प्यार करने और पूजा करने का दुनिया के हर इंसान को पूरा हक़ है। मुझसे कौन छीन सकता है यह अधिकार?’ कविता की दृढ़ आवाज़ गिन्नी के कानों में गूँज गई।

      कविता की नहीं, जिमी की... जिमी की नहीं, ... कुड़े की! उफ्फ... !

      ‘ओ मेरी भोली बिटिया… मेरी बच्ची, अगर कर सकती है, तो बस इतना कर कि मुझसे मिलने आते रहना। जब तक मैं ज़िंदा हूँ...! इस जन्म में तू ही मेरी एकमात्र …!’ गिन्नी की आवाज़ भर्रा गई।

      कविता ने गिन्नी के हाथ अपने हाथों में लेकर दुलारा और दर्द भरी आवाज़ में कहा - ‘हाँ, मैं आती रहूँगी।’

      गिन्नी ने खुद को मजबूत बनाते हुए फिर कहा - ‘बस एक काम और,  मेरे मरने पर मुखाग्नि तुम…’

      हैरान कविता माँ के मुँह की तरफ़ देखती ही रह गई…!! यह कैसी अजीब चाहत थी, कैसी लालसा थी, ख़्वाहिश थी…?

      औलाद के हाथों मुखाग्नि पाने का सुख सिर्फ़ एक माँ ही जानती है।

       ‘मैं लिखकर रखूँगी, सबको बताउंगी कि तू मेरी औलाद है! समाज-लोग चाहे तुझे लड़का कहें, लड़की कहें या ‘कुड़ा’, मेरे लिए तू मेरे रक्त-माँस का टुकड़ा है। मेरे इस जन्म की एकमात्र पूँजी…!’

 

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                                    लेखक परिचय

महिंदर रिसम - तीन कहानी संग्रह, अंग्रेजी से पंजाबी में एक अनूदित पुस्तक प्रकाशित। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं  में कहानियां, कविताएं, आलेख नियमित प्रकाशित। मोहाली, चंडीगढ़ में निवास।


                साभार - साहित्य सरस्वती, जुलाई - सितंबर 2026





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