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रविवार, मई 22, 2011

धारावाहिक बांग्ला उपन्यास – 10


(यहां प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम से उनका लेखन जन-जन तक पहुंचे।)

गोधूलि गीत


0 समीरण गुहा

बहुत पहले से ही पक्षियों का कलरव शुरू हो गया था। आसमां मे पूरब की तरफ हल्की लालिमा नज़र आ रही थी लेकिन इतनी सुबह लगता है किसी की नींद नहीं खुली। हाँ शमीक की नींद खुलने का तो सवाल ही नही। जग कर ही उसने सारी रात गुज़ार दी। एक व्यक्ति के लिए मूल्यबोधों का क्या महत्व है - ऐसी खूबसूरत पत्नी के करीब रहकर भी अरुण गांगुली ज़िंदगी भर के लिए कितनी दूर हो गए सिर्फ विश्वास की मर्यादा को धूल-धुसरित होते देख। सचमुच सोचा भी नहीं जा सकता। बासंती गांगुली ने भी यौवन के स्वर्णिम समय में पति के अनुराग के स्पर्श से वंचित रह दुबारा शिकायत नहीं की। उसका यह इंतज़ार क्या कम है? और आज भी तिरतालीस-चवालीस साल की उम्र में भी उसी धैर्य की परीक्षा दिए जा रही हैं। कोई और युवती होती तो अब तक विद्रोह का बिगुल बजा दिया होता। बासंती गांगुली अवश्य उनसे भिन्न हैं। अपने अपराध के महत्व को समझते हुए खामोशी से उन्होंने इसे शिरोधार्य कर लिया। लेकिन आशाएं-आकाक्षाएं मर  चुकी हों तो आदमी कैसे जिंदा रह सकता है? अपनी सज़ा की अवधि समाप्त होने के सुखद क्षण की प्रतीक्षा में ही बासंती ममी का जीवन गुज़ार रही हैं। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि एक तरह से बासंती ही अरुण गांगुली को सज़ा दे रही हों। किसी की किसी आकांक्षा को ही सच साबित कर वे कहीं चली भी नहीं गई। एक दिन के लिए भी बरेली में अपने माता - पिता, काका से मिलने नहीं गईं। इस कठिन जीवन को वे ख़ामोशी से गुज़ारते हुए भी मानसिक रूप से पल-पल घायल होती रहीं - इसका मूल्यांकन कौन करेगा? इतने दिनों तक शमीक को कुछ भी पता नहीं था। अरुण गांगुली के प्रति उसके मन में कमज़ोरी है लेकिन अब उसे बासंती गांगुली से सहानुभूति है। लेकिन चुमकी के बारे में सोच कर उसे बहुत तकलीफ हुई। उसके पास सब कुछ होते हुए भी कुछ भी नहीं था। माता-पिता में स्वभाविक संबंध न देख एक लड़की कितनी स्वभाविक रह सकती है? चुमकी ठीक ही कहती है - ‘मैं पागल नहीं हो गई, और मैंने आत्महत्या नहीं कर ली, यही बहुत है।’
     चुमकी कुछ बढ़ा-चढ़ा कर नहीं कहती - ज़्यादती अगर कुछ है तो वह है चुमकी का मिज़ाज।
     वह किसी को को भी पछाड़ सकती है। जैसे आज के वाक्ये को ही लें।
     वैसे आजकल शमीक के साथ चुमकी का रवैया बहुत अच्छा है परंतु अचानक वह क्या कर बैठती है - उसकी वजह खोजना भी मुश्किल है। साढ़े-बारह बजे पावर प्लांट से घर आए शमीक और अरुण गांगुली। हाथ-मुंह धोकर खाने के टेबल पर बैठते ही छोटा सा तूफान उठ खड़ा हुआ। अति शीघ्रता से वहाँ आ चुमकी ने सबसे पहले पिता की तरफ फिर शमीक के मुँह की तरफ देख क्रोध से पूछा - ‘आप में से किसी ने मुझे खाने के लिए क्यों नहीं बुलाया?’
     अरुण गांगुली अपनी बेटी को अच्छी तरह ही जानते हैं। ये बात कहाँ तक जा पहुँचेगी यह बताने की क्षमता उनकी भी नहींय़ और ग़लती तो सचमुच हुई है। अत: ग़लती स्वीकार कर लेना ही उचित होगा। अरुण गांगुली ने शर्मिंदगी के स्वर में कहा - ‘तुम घर पर  ही हो पता नहीं था। आज तुम कॉलेज नहीं गई?’
      ‘कॉलेज खुला होता तो आपके साथ खाने में कोई शामिल होना चाहता?’ ये रही चुमकी।  नहीं कहने से ही बात ख़त्म हो जाती। फिर भी मानो ये ताना मारना ज़रूरी था। वह पिता को भी नहीं छोड़ती। बासंती ने अनमने से बेटी की तरफ देखा। पति और शमीक को खाना वे ही परोस रही थीं। स्थिति को संभालने के लिए उन्होंने शांत स्वर में कहा, ‘हम दोनों बाद में खाएंगें।’ 
      ‘जोड़-तोड़ वाली बातें तुम बिलकुल नहीं करोगी।’
      विषादयुक्त दृष्टि से बेटी की तरफ देखती रहीं बासंती।
     ‘नहीं तो क्या?’ चिल्लाकर चुमकी ने जानना चाहा, ‘बाद में क्यों खाऊंगी, क्या मैं बाहरी व्यक्ति हूँ?’
     बहुत उदासीन होकर बासंती ने कहा, ‘नहीं मैं ही बाहरी व्यक्ति हूँ।’
     मैंने यह नहीं कहना चाहा था - ‘मेरा मतलब था कि हम चारों एक साथ भी तो खा सकते थे।’
     ‘ये तो बहुत ही अच्छा होता। इतनी देर बाद बोलने का मौका मिलते ही शमीक ने चुमकी के चेहरे की तरफ देख कर कहा, बार-बार परोसने का झंझट न कर सभी मिलकर.....’
     ‘तुम चुप रहो। अब तक तो कुछ बोल नहीं पाए, डर से जान निकल रही थी क्या?’
     शमीक ने धीमे स्वर में उत्तर दिया, ‘मर कर आदमी बात नही कर सकता।’
     चुमकी ने दो मिनट शमीक को देखा। माता और पिता पर आया गुस्सा तब तक पूरी तरह से शमीक पर आ बरसा। तीखे तेवरों से उसने शमीक को हुक्म सुनाया - ‘सुनो, लंच के बाद पावर प्लांट वगैरह जाने की कोई ज़रूरत नहीं, मेरे साथ चलोगे।’
     एक साथ खाना न खाने पर चुमकी को अवश्य गुस्सा आ सकता। गुस्से से दु:ख। लेकिन लंच के बाद उसे साईट पर जाने से रोकने के साथ इसका क्या संबंध? शमीक कुछ समझ नहीं पाया। सामजंस्यरहित इस गुस्से का क्या मतलब? शमीक ने अनुनय के स्वर में कहा - ‘मुझे क्यों रोकती हो? मैंने क्या किया है?’
     ‘कहा न मेरे साथ चलोगे।’
     ‘कहाँ?’
     ‘तुम्हें यह पता होना चाहिए कि मैं कैफियत नहीं देती।’
     शमीक ने और भी विनम्रता से कहा - ‘नहीं, नहीं, मैं कैफयित नहीं माँग रहा। मेरी तो डयूटी भी है न। जब-तब इस तरह......’  
‘तबीयत ख़राब हो जाए तो क्या करते?’ 
     करुण स्वर में शमीक ने जवाब दिया - ‘नहीं जाता’।
     ‘तो तुम्हारी तबीयत ख़राब है।’    
असह्य दृष्टि से शमीक ने एक बार बासंती की तरफ और फिर अरुण गांगुली की तरफ देखा। यानी अपनी बेटी को अब आप लोग ही संभालें। मेरी मुसीबत और न बढ़ाएं।
     ‘आप में से किसी ने भी मुझे खाने के लिए नहीं बुलाया। चुमकी ने चाहे कितने क्रुद्ध स्वर में यह क्यों न कहा हो, अरुण गांगुली ने उसके दु:ख को महसूस किया। ग़लती उनकी भी है।   बेटी घर पर है, यह उन्हें पता ही नहीं चला। पूछ तो सकते ही थे। बेटी पिता के साथ खाना चाहती थी, पिता बेटी के बगैर ही खाने बैठ गए। इस विपरीत छवि ने ही अरुण गांगुली को अन्यमनस्क कर दिया। उन्होंने ज़्यादा समय नहीं लिया।  शमीक की ख़ामोश नज़रों से उन्होंने तय किया कि बेटी के पक्ष में कुछ करना चाहिए। शमीक के बारे में भी सोचना होगा। शांत स्वर में कहा - ‘चुमकी जब कह रही है तो उसकी बात मान लो। तुम्हारे इन्कार की वजह समझ रहा हूँ। प्रशासनिक दृष्टि से मुझ निरपेक्ष होना चाहिए। तुम कल ऑफिस जाकर आधी छुट्टी का फार्म भर कर मेरे टेबल पर जमा दे देना।’
     लंच के बाद घंटा-डेढ घंटा आराम करने के बाद वे निकल पड़े। पाणीकर को छुट्टी देकर महरुन फिएट का जिम्मा अब चुमके के हाथों में है। साथ शमीक है। वह काफी ग़ंभीर होकर सीधे रास्ते की तरफ देख रहा है। दोनों तरफ मकई के खेतों और संतरों के बागों को पीछे छोड़ते हुए चुमकी ड्राईवर से पायलट बनने लगी। हाथों में स्टीयरिंग थामते ही उदंड हो जाना शमीक को पसंद नही। अब उसने कुछ नहीं कहा। जैसे मर्ज़ी चलाए।
     चुमकी को गाड़ी रोकनी पड़ी। सामने रेलवे फाटक था, तुरंत उसने विरक्ति से कहा -‘यही एक ग़लत बात है - गाड़ी कब आएगी पता नही, आधा घंटा पहले से ही फाटक बंद कर रख देते हैं। जिससे कहा था, वह तो निर्विकार था। शमीक खिड़की से बाहर दूर खेतों में काम करने वालों को देख रहा था। चुमकी ने ज़रा ज़ोर से पूछा - ‘बात क्या है, बोलो तो?’
     ‘क्या हुआ?’
     ‘गूंगे की तरह चुपचाप क्यों बैठे हो?’ ज़रा हंसकर चुमकी ने फिर कहा - ‘मुझे गंभीर प्रकृति के लड़के बिलकुल पसंद नहीं।’
वह तो तुम्हारी ही वजह से। अब मौन की बर्फ पिघलनी शुरू हो गई थी। शमीक ने शांत स्वर से जानना चाहा - ‘तुम्हें क्या हो जाता है बताओ तो?  गुस्सा किया किसी पर और निकाला मुझ पर। तिस पर दफ्तर गोल। किसी भी बात का दूसरी के साथ कोई ताल-मेल नहीं। शुक्र है मैंने तुम्हारा कहना माना वर्ना मेरा जो हश्र होता। इस तरह कितने दिनों तक चलेगा यही सोच रहा था। जो मिज़ाज़ हैं, किसी भी दिन अनायास ही कह दोगी पटरी पर कूद कर आत्महत्या कर डालो, वर्ना मुझे बहुत गुस्सा आएगा।’
     खिलखिला कर हँस पड़ी चुमकी। तुमने भी मौका देखकर मुझे बहुत बातें सुना दीं। देखो - ‘मैंने ज़रा भी बुरा नहीं माना।’ चुमकी ने फिर हँसते हुए कहा - ‘दरअसल क्या है कि सुबह से ही तुम्हारे साथ अम्माजारी लेक जाने का मन कर रहा था।’
     ‘वह तो तुम मुझसे कह ही सकती थी।’
     ‘सो कब कहूँ?’ तीव्र क्रोध से फुफकारते हुए चुमकी ने कहा, ‘सुबह नींद से जगते ही सुनने में आता है कि झाड़-पोंछ करने ऑफिस चले गए हो। इतनी सुबह जाकर क्या करते हो, यह तो तुम ही जानो। दोपहर को कहूँ - उससे पहले ही देखती हूँ तुम लोग खाने बैठ गए हो।  फिर मेरा दिमाग ठीक-ठिकाने रहता है भला?’
     ‘यही एक बात बढ़िया कही है तुमने।’ शमीक ने हंसते हुए कहा, ‘तुम्हारा दिमाग जो ठीक नही रहता, यह तुम अच्छी तरह ही समझती हो, है न?’
     ‘जो जी में आए कहो, आज तुम पर गुस्सा नहीं करूंगी।’
     ‘यानी आज का कोटा ख़त्म।’
     ‘तुम निरीह दिखते हो, दरअसल, तुम बहुत ख़तरनाक लड़के हो।’ चुमकी इतनी मासूमियत से मुस्कराई जो सिर्फ़ उसी को जंचती है।

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     अम्माजारी लेक के झिलमिलाते पानी के बीचोबीच एक कृत्रिम पहाड़ है। पानी के चारों तरफ बाँध की भाँति चौड़ा रास्ता है। दाहिनी तरफ बच्चों के लिए सुंदर सा पार्क है। और एक तरफ छोटा सा चिड़याघर है। चिड़ियाघर और पार्क के साथ हैंगिग ब्रिज अटूट बंधन में बंधा हुआ।  उस तरफ जाते ही नज़र आता है मौसूमी फूलों का बगीचा। सब को पीछे छोड़ते हुए सामने के हरे जंगल की तरफ बढ़ चली चुमकी। पीछे-पीछे शमीक।
     इस तरफ बैठने की व्यवस्था है और लोग आकर बैठते भी हैं। फिर भी जंगल मानों जंगल ही रह जाता है। लोगों के आवागमन से उसकी निर्जनता तनिक भी ख़त्म नहीं होती। जो लोग आते हैं वे ही ख़त्म करना नहीं चाहते।
      एक युक्लिपटस के पेड़ के साथ टेक लगाकर बैठते हुए चुमकी ने कहा, ‘बैठो यहाँ। तुमसे बात करनी है।’
     बाध्य होकर शमीक ने चुमकी के सामने बैठते हुए पूछा, ‘क्या बात?’
     ‘निश्चित रूप से प्यार-मुहब्बत की बात तो नहीं ही।’
     ‘उसके लिए तो सुनील शिवलकर है ही।’ हँसते हुए शमीक ने जवाब दिया, ‘तुम यहाँ घूमने-फिरने नहीं आई हो, यह मैं जानता हूँ। कोई प्रॉब्लम?’
     ‘ठीक समझे।’ अचानक खुद को समेटते से हुए चुमकी ने कहा, ‘मैं तुमसे कुछ परामर्श करना चाहती हूँ।’ शमीक उसके मुँह की तरफ देखे जा रहा है। चुमकी ने धीरे-धीरे कहा - ‘मेरे माता-पिता के मामले में तुमने कुछ सोचा है? मेरे कहने का मतलब है पिताजी तुम्हें बहुत चाहते है। तुम्हारी कोई भी बात वे टाल नहीं सकते।’
     ‘मुझसे मध्यस्थता करने को कह रही हो।’
     ‘हाँ।’
     ‘बहुत ही बचकाना प्रस्ताव है तुम्हारा।’ बहुत देर बाद ज़रा गंभीर होकर उन्मुक्त रूप से शमीक ने कहा, ‘कुछ कहने का मुझे कोई हक़ ही नहीं है। इससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँच सकती है और इसे मेरा दु:साहस समझा जाएगा, जो मैं अपने होश-ओ-हवास में किसी क़ीमत पर भी नहीं कर सकता। मैं तुमसे माफी चाहता हूँ चुमकी।’
     ‘एक व्यक्ति का आत्मसम्मान ही तुम्हारे लिए बड़ी चीज़ हो गया। मेरी माँ का पक्ष नहीं देखोगे? सारा जीवन एक मरुस्थल में अकेले गुज़ार दिया, तुम क्या कुछ भी समझ नहीं पा रहे?’
     ‘यही बात तो तुम्हारे पिता के लिए भी कही जा सकती है। उन्हें भी हर चीज़ से वंचित होना पड़ा है। मैं जो कहना चाहता हूँ - चुमकी तुम मुझे ग़लत मत समझना।’ बहुत ही शांत स्वर में शमीक ने कहना शुरू किया - ‘मैं किसी का भी पक्ष लेकर बात नहीं कर रहा। तुम्हारे माता-पिता की तकलीफ़ को मैंने महसूस किया है इसलिए मुझे भी तकलीफ़ होती है। मुझमें अगर क्षमता होती तो दोनों के पैर पड़कर मेल-जोल की व्यव्स्था करता। यहाँ मामला बिलकुल भिन्न है। मैं एक व्यक्ति को उसके आदर्शों से दूर कैसे कर सकता हूँ? नीति के लिए जिन्होंने खुद निर्वासन स्वीकार किया है.... ’
     नीति, नीति और नीति... काफ़ी धैर्य से शमीक की बातें सुन रही थी, चुमकी।
     ‘अब वह जल उठी, एक लड़की को होटल में अकेली पाकर...मेरे पिता हैं इसलिए किसी तरह की रियायत करते हुए बात नहीं कहूँगी।’
     ‘तुमने जैसी व्याख्या की, क्या मामला ठीक वैसा ही है? उन पर विश्वास न करने की कोई वजह ही नहीं थी। संदेह का अपमान सहकर बहुत से लोग हंसते-खेलते हुए पूरी ज़िंदगी गुज़ार देते हैं। कुछ लोग नहीं कर पाते। अरुण गांगुली विरले व्यक्ति नहीं है। कम से कम मैं तो यही समझता हूँ। साफ-साफ शब्दों में यूं कहा जाए, इतनी खूबसूरत पत्नी पाकर भी जिसने खुद को नहीं खो दिया, इन्सान की मर्यादा का सम्मान करते हुए पाक-साफ रहे, और जो भी हो वह साधारण व्यक्ति नहीं हो सकता। मैं जानता हूँ, इसके बाद शायद लोग उन्हें पागल क़रार दें, कोई मूर्ख कहेगा, मेरी नज़रों में वे एक पवित्र व्यक्ति हैं। जिसके सीने में विश्वास का बीजमंत्र हो एकमात्र वही इतना कठोर हो सकता है।’  
     काफ़ी देर तक पता नहीं क्या सोचती रही चुमकी। फिर उदास से स्वर में धीरे-धीरे कहा - ‘हाँ, पिताजी पर विश्वास करना चाहिए था। परिवार के लोग स्वभाविक रूप से नहीं कर पाए, पर माँ तो पिताजी को गहराई से जानती थीं, पहचानती थीं। फिर पिताजी को भी समझना चाहिए था कि माँ ने अविश्वास घर वालों के दबाव पर किया था।’ गहरी साँस लेकर चुमकी फिर कहने लगी,  ‘माँ के लिए बहुत दु:ख होता है। कभी-कभी तो मेरा दिमाग ही काम नहीं करता। जी चाहता है कि सब कुछ तोड़-फोड़ कर उलट-पलट कर डालूं।  जितनी ज़्यादा तकलीफ़ होती है माँ से उतना ही ज़्यादा तर्क करती हूँ।’ चुमकी के स्वर में आक्षेप था, ‘लेकिन परिणाम क्या हो रहा है बोलो?’
     लौटते समय चुमकी ने फिर तूफान के वेग से गाड़ी चलानी शुरू की। अब शमीक ने बहुत ही शांत स्वर में कहा, ‘इतना तेज़ क्यों चलाती हो? ऐक्सीडेंट हो सकता है।’
     ‘जान छूटेगी तब। जल्दी मर जाऊंगी।’   
‘जो मौत की बात करते हैं जिजीविषा उन्हीं में ज़्यादा होती है।’
     ‘मैं उनमें से नहीं हूँ। सचमुच ही मैं मरना चाहती हूँ।’
     बातचीत बहुत गंभीर रूप लेती जा रही थी - अत: शमीक ने सर्दियों की मीठी धूप की भाँति हँसी बिखेरते हुए कहा, ‘ज़िंदादिली से लड़ते हुए जीना ही ज़िंदगी है यानी ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है। मैं उसी जीवन का स्पर्श पाना चाहता हूँ। जो डरपोक हैं वे ही पलायन कर जीना चाहते हैं......तुम अब कभी डरपोक नहीं बनोगी।’
     ‘तुम्हारी बात को ध्यान में रखूंगी।’ अब चुमकी हँस पड़ी। हँसते ही वह चुमकी नहीं लगती। 
     बातें करते हुए चुमकी को ध्यान ही नहीं रहा। सीताबलदी इलाका काफ़ी पीछे छूट गया था। ध्यान आते ही तुरंत गाड़ी वापस घुमाई। अब क्या हुआ? पूछना चाहते हुए भी शमीक ने ख़ामोश रहना ही उचित समझा। यद्यपि इस वक्त चुमकी बहुत ही शांत है और हज़ार कोशिशों के बावजूद झगड़ने के लिए वह कोई सूत्र नहीं तलाश पाएगी अत: अनायास ही उसे यह बात कही जा सकती थी। फिर भी शमीक चुप ही रहा। फिर सोचा, एक बार पूछ कर देख ही लिया जाए। ऐसी भी क्या विस्फोटक स्थिति होगी। उसके विचारों-विशलेषण से चुमकी कहां तक सहमत हो सकी है, यह जानने कि लिए ही शमीक पूछ बैठा, ‘गाड़ी क्यों घुमाई? ’
     सड़क पर सतर्क दृष्टि रखते हुए चुमकी ने जवाब दिया, ‘मैं इतनी क़ैफियत नहीं दे सकती।’
     मन ही मन हँसा शमीक। चुमकी, चुमकी ही है।
सीताबलदी इलाका ही क्यों, पूरे नागपुर शहर में सर्वश्रेष्ठ मिठाई की दुकान है - ‘आनंद भंडार।’ वहाँ जाकर गाड़ी रोकी चुमकी ने। शमीक को मिठाई बहुत पसंद है। यह उसे मालूम है।  इसलिए आज शुरू से ही उसने सोच रखा था कि उसे जी भरकर मिठाई खिलाएगी। अत: और भी कितना आगे क्यों न निकल जाते, चुमकी यहाँ लौटकर आती ही।
     दुकान पर आवश्यक निर्देश दे शमीक को ले चुमकी एक कोने में जा बैठी। पाँच मिनट गुज़रे होंगे। उसके बाद ही शमीक की हैरानी की सीमा नहीं रही। धीमे स्वर में दिया गया चुमकी का निर्देश इतना विशाल था यह वह समझ ही नहीं पाया। चार बड़ी-बड़ी प्लेटें तरह-तरह की मिठाई से भरी हुई उसे घेरे हुई थीं। चुमकी के सामने छोटी सी प्लेट में सिर्फ़ दो मिठाईयाँ। शमीक ने तुरंत पूछा - ‘ये क्या बात हुई?’
     ‘मिठाई खाने से मोटी हो जाऊंगी। तुम तो जानते हो इस डर से मैं खाती नहीं।’
     ‘वह सब बकवास है। तब तो दुनिया का सबसे मोटा व्यक्ति मुझे होना चाहिए। पर अब  ये सब बातें रहने दो। तुमने मुझे क्या पेटू समझ रखा है। कोई इतना खा सकता है भला?’
     ‘तुम्हें तो पसंद है।’
     ‘‘तो क्या हुआ?’
     ‘मैं इतनी बहस नहीं कर सकती। खाना है खाओ, वर्ना फेंक दो।’
     ‘अच्छा इस तरह भला कोई खा सकता है ? तुम्हारे गले से विनम्र स्वर नहीं निकलता क्या ?’
     ‘बहुत बड़ी गलती हो गई।’ हँस पड़ी चुमकी, ‘प्लीज़ ये थोड़ी से मिठाई आप ग्रहण करें।’
     ‘बहुत भारी मज़ाक हो गया ये।’ पहले वाली हँसी की लोर शमीक के होंठों पर छाई रही।
     ‘मज़ाक नहीं - पूरे अपनत्व से कह रही हूँ, थोड़ी सी कोशिश करो, हो जाएगा।’
     शमीक ने संभव कर दिया। खाना ख़त्म होते ही सोचा था कि शायद अभी चुमकी कुछ कहेगी। लेकिन आश्चर्य, मजाक के तौर पर भी उसने कुछ नहीं कहा। बल्कि चुमकी के चेहरे पर संतोष झलक रहा था। कोई किसी को खिलाकर इतनी खुशी का अनुभव कर सकता है, यह शमीक ने पहली बार महसूस किया। और, चुमकी एक रहस्यमय द्वीप की बाशिंदा ही लगती रही।


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     समय कितनी तेज़ी और ख़ामोशी से सरकता जा रहा है इसका हिसाब शायद कोई नहीं रख रहा था। जबकि समय के बहाव में बहकर घटनाएं ठीक घटती जा रही हैं। चुमकी बी. ए. पास कर  एम. ए. में दाखिला ले चुकी है। शीघ्र ही अरुण गांगुली बोर्ड के चेयरमैन बन जाएंगे।  ऐसा ही सुनने में आ रहा है। इतनी बड़ी ख़बर पर भी इस व्यक्ति की प्रतिक्रिया को समझ पाना मुश्किल है। उनकी बातों या आचरण से उच्छवास की तनिक भी अभिव्यक्ति नहीं दिखती। इस बीच शमीक को भी कन्फरमेशन लेटर मिल चुका है। अब वह प्रशिक्षु नहीं रहा। महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड का एक असिस्टेंट इंजीनियर है।
     और एक व्यक्ति में भी परिवर्तन हो रहा है। वे हैं बासंती गांगुली। उनका परिवर्तन मानसिक है। समझाना मुश्किल है लेकिन महसूस किया जा सकता है कि वे व्याकुल सी हो गई हैं। कन्फरमेशन लेटर मिलने के बाद शमीक ने उनका चरण स्पर्श किया था। बासंती ने उसका हाथ पकड़ कर रोका था, ‘रहने दो, रहने दो, कितनी बार प्रणाम करोगे।’ उनकी पकड़ का दबाव क्या ज़रूरत से ज़्यादा नहीं था? सिर्फ यही नहीं, सिर झुका कर खाते समय शमीक यदि अचानक सिर उठाता, बासंती को बड़े ध्यान से अपनी तरफ देखते पाता। यहाँ आने के बाद एक बात शमीक ने बहुत बार सुनी है। अरुण गांगुली की इक्कीस वर्ष की उम्र के चेहरे से शमीक की शक्ल काफी मिलती-जुलती है। अरुण गांगुली की उस वक्त की कई तस्वीरें शमीक ने देखी हैं। बात झूठी नहीं है। बासंती उसकी तरफ देख कर किसे तलाशती हैं?
      बहुत रात हो गई हो ऐसी बात नहीं है. साढ़े दस। खा-पीकर सभी सो गए हैं। आगामी दिनों में शमीक की परीक्षा है। अत: उसके पास सोने का वक्त नहीं है। कम से कम साढ़े बारह या एक बजे तक तो वह पढ़ेगा ही। पढ़ते-पढ़ते एक बार उसकी नज़र दरवाज़े तक जाकर अटक गई।  संगमरमर की प्रतिमा बन बासंती वहाँ खड़ी हैं। नज़रें मिलते ही उन्होंने कहा, ‘शमीक, ज़रा सुनो तो।’
     बासंती के चले जाने के बाद शमीक ज़रा चिंतातुर हो गया। वे क्यों बुलाने आई थीं? सुनील शिवलकर और चुमकी के बारे कुछ कहेंगी क्या? उनकी घनिष्ठता के विषय में तो सभी जानते हैं। नया कहने को क्या है।  अरुण गांगुली के बारे में कुछ? हाँ, वह भी हो सकता है। अम्माजारी लेक पर चुमकी ने उसे कुछ ऐसा ही आभास दिलाया था।
     बासंती अपने कमरे में बिस्तर पर बैठी थीं। शमीक को देखते ही पलंग से उतर कर खड़ी हो गई। धीमे-धीमे कदमों से उसकी तरफ बढ़ीं। लड़के ने उसे ज्वालामुखी पर खड़े कर रखा है।  उसे देखते ही बासंती को बरेली के सुनहरे दिनों की याद हो आती है। दो महीने पहले भी ऐसी बात नहीं थी। अब चिंताओं के दबाव में कभी-कभी शमीक और अरुण को एक कर बैठती हैं।  उम्र का व्यवधान तब बड़ी बात नहीं रह जाती। बासंती चाहे जितना ही रौशनी में लौट आना चाहती हों - उनकी सूक्ष्म बुद्धि संवेदनाहीन होकर उनके दिमाग को उतना ही अक्षम बना देती है।
     शमीक की चमकती ऑंखों के सिवा उन्हें और कुछ नज़र  नहीं आता। ये तो वही ऑंखें हैं।  इतने सालों में भी उनकी चमक रत्ती भर कम नहीं हुई। ऐसी सुंदर कांतिमय ऑंखें क्या दो व्यक्तियों की हो सकती हैं? शमीक और अरुण मिलकर एक हो गए हैं। बासंती ने शमीक के कंधों पर अपने हाथों का दबाव डाल अपनी तरफ खींचा। असपष्ट स्वर में कहा, ‘आओ।’
     बासंती की स्थिर निगाहों के सामने शमीक मानो जलने लगा। ऐसा होना क्या संभव है? शमीक को एक बार तो लगा मानो सपना देख रहा है। बड़ी हैरानी से वह बासंती के चेहरे के तरफ देखता रहा।
     बासंती के दरवाज़ा बंद करते ही शमीक मानो जमीन पर आ टिका। बासंती की उपस्थिति को नकार कर वह अरुण गांगुली के बारे सोचने लगा। मनुष्य पर विशवास करके जो जीना चाहते हैं - अमानुष ही उनकी हत्या कर सकते हैं। इस व्यक्ति के समक्ष शमीक छोटा  नहीं बनेगा। जो व्यक्ति अब भी मूल्यबोधों को जकड़े हुए है उसे चोट पहुँचाना अन्याय ही नही - पाप है। शमीक ने सिर्फ इतना ही कहा,  ‘नहीं।’
     गहरी सांस छोड़ते हुए बासंती ने कहा, ‘अब लौटने का कोई चारा नहीं।’
     ‘ऐसा न कहें।’ शमीक मानों बहुत ही गंभीर हो गया हो।
     ‘बगैर कहे उपाय क्या है? मेरा चेहरा अब बेपर्दा हो गया है।’
     ‘फिर भी मैं आपको  ऐसा नहीं समझता। सोच भी नहीं सकता - लेकिन मुझे कम से कम इस एक व्यक्ति के सामने सिर उठाकर खड़ा होने दें।’
     ‘तुम सभी महान बनना चाहते हो। लेकिन - नहीं शमीक, और नहीं हो सकता। आओ...’
     ‘आप इस वक्त आपे में नहीं हैं। बाद में आप भी कम लज्जित महसूस नहीं करेंगी।’
     ‘लज्जा!’ एक अजीब भंगिमा में हँसी बासंती। ‘लज्जा शेष बची है? लेकिन तुम्हारी एक बात बिलकुल सच है, मैं बीमार हूँ।’
     इस तरह बासंती के साथ बात बढ़ाकर कोई फायदा नही। जो उचित है, वह है इस वक्त कमरे से निकल जाना। ऐसा करने में ही शमीक को रुकावट आईं। बासंती ने कहा, ‘नहीं जाओगे।’
     शमीक को अपने पास खींच कर अस्पष्ट स्वर में पता नहीं क्या कहने लगीं ठीक समझ नहीं आया। शमीक ने अलग होकर निकल जाने की कोशिश करते हुए अनुभव किया कि वे उससे ज़्यादा शक्तिशाली हैं।
     अरुण गांगुली की नींद खुल गई थी। बिस्तर पर लेटे-लेटे ही उन्हें लग रहा था कि बासंती के कमरे में कुछ गड़बड़ हो रही है। क्या हो सकता है? इस तरह चुपचाप लेटे रहना ठीक नहीं। बासंती पर कोई मुसीबत तो नहीं आई? अनजानी आशंका से अरुण गांगुली ने जल्दी-जल्दी उस कमरे की तरफ कदम बढ़ाए।
      इसे क्या कहा जाए, परिवर्तन या रूपांतर? या नाटकीयता? अरुण गांगुली को कमरे में आते देख दौड़ कर उनके पास जाकर फूट-फूट कर रोने लगीं बासंती। फफकते - फफकते हुए एक ही बात कहने लगीं जिसका अभिप्राय: यह था कि परिस्थिति का फ़ायदा उठाकर दु:साहसिक काम करने आया था शमीक।
     शमीक ने अरुण गांगुली की तरफ नहीं देखा। वह सिर्फ़ बासंती को देख रहा है। पकड़े जाने पर ही इन्सान सबसे ज़्यादा निष्ठुर और झूठा बन जाता है। बासंती ने भी यही साबित किया।  कहने को कुछ भी नहीं है क्योंकि इस वक्त कोई भी उस पर यकीन नहीं करेगा।
     टकटकी लगाकर शमीक को देख रहे थे अरुण गांगुली। उसे देखते-देखते उनका चेहरा कैसे बदलने सा लगा। दोनों जबड़े क्रमश: भिंच गए। दोनों मायावी ऑंखें मानो आग उगल रही थीं।  दोनों हाथों की मुट्ठियां भींचकर मानों वे सारी शक्ति इक्ट्ठी कर रहे थे। ये अरुण गांगुली बिलकुल भिन्न व्यक्ति थे उन्हें पहचाना ही नहीं जा रहा था। उनके दिमाग में एक ही बात घूम रही थी, यह दुनिया अगर ऐसी ही कठोर हो सकती है तो भला वे क्यों न निष्ठुर बने। जो विश्वासघाती हैं उन्हें क़तई माफ नहीं किया जा सकता। शमीक को सज़ा भुगतनी ही होगी। अरुण गांगुली शमीक पर टूट ही पड़े। थप्पड़, लात, घूँसों की बौछार। पूर्ण उन्माद में वे मारते जा रहे हैं। ताबड़तोड़ पिटाई से बहे खून से शमीक का चेहरा नहा गया।
     अपने कमरे में आकर कुर्सी पर धम्म से बैठ गए अरुण गांगुली। उनके माथे की नसें  दपदपाते हुए उनकी पीड़ा को बढ़ा रही थी। बहुत थकावट सी लग रही है। ज़रा सो लेते तो अच्छा होता, पर नींद है कहाँ? आज तो किसी कीमत पर नींद नहीं आएगी। भीतर दबी उत्तेजना ने उन्हें  स्हस्त्र चिंताओं के आवर्त में डुबो दिया है। सीने में बहुत पीड़ा हो रही है। इस दु:ख को किसी के साथ बाँटा नहीं जा सकता। इसीलिए तो तकलीफ़ ज़्यादा हो रही है। दाहिने हाथ से मुँह को ढक कर शिथिलता से बैठे ही रहे अरुण गांगुली। कुछ ही क्षण। किसी की पदचाप सुनाई दी। नज़रें उठा कर देखा। खून से सना चेहरा लिए शमीक कमरे में आ खड़ा हुआ। अरुण गांगुली के चेहरे की तरफ एक टक देखता रहा।  फिर धीरे-धीरे गंभीर स्वर में कहा, ‘आपने मुझे बेवजह मारा है, ज़्यादती की है। आप इस पर विश्वास कर सके? चुमकी को लेकर जब कलकत्ते गया था मौक़ा तो तभी अच्छा था। तब यदि आपके सम्मान, विश्वास की मर्यादा रख सका तो आपके घर पर ही रहकर इतनी घिनौनी हरकत कर सकता हूँ, यह कैसे सोच लिया आपने? जब मैंने अरुण गांगुली के आदर्शों पर चलकर एक और अरुण गांगुली बनना चाहा तो आपने ही मुझ पर अविश्वास कर मुझे इतना नीचे उतार दिया। आपने मुझे मारकर ज़्यादती की है। मार के घाव एक दिन सूख जाएंगे लेकिन मुझ पर किए गए अविश्वास के घाव ज़िंदगी भर मेरे शरीर पर लगे रहेंगे। मैं क्या हूँ और किस चरित्र का व्यक्ति हूँ, मेहरबानी करके चुमकी से पूछ लीजिएगा। आप एक बात और जान लीजिए कि आपने मुझ पर हाथ उठाकर ज़्यादती की है, ज़्यादती की है.....’
     महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के कोराडी सुपर थर्मल के जनरल मैनेजर अरुण गांगुली के आवास पर ये ही शमीक के आख़िरी शब्द थे। उसके बाद उसने एक पल भी इंतज़ार नहीं किया।  उस आधी रात को आहत शरीर को घसीटते-घसीटते जब वह नागपुर स्टेशन पर पहुँचा उस समय आकाश में पूरब की ओर हल्की-हल्की पौ फटनी शुरू हुई थी। प्लेटफार्म पर एक ट्रेन खड़ी थी।  उस तरफ बढ़ते ही शमीक चौंक उठा। यही वह जगह है जहाँ पहले दिन बासंती गांगुली स्नेह भंडार लिए उसका इंतज़ार कर रहीं थीं। उस दिन शमीक की ऑंखों में सपने थे। जिजीविषा के सपने। और आज? उसी बासंती गांगुली के कारण आज वह असहाय है। राहगीर। हाँ, आज इस मुसीबत की घड़ी में भी शमीक की ऑंखों में पहले वाले ही सपने हैं। मायूस होने से नहीं चलेगा।  उसे मजबूत बनना होगा। घर पर तीन-तीन असहाय सदस्य उस पर निर्भर हैं। उनका जीना-मरना भी इसी के हाथ है। अत: उसे उठना ही होगा। शमीक खुद ही खुद को उत्साह दे रहा था। पीठ थपथपा कर कहा, ‘हार मत मानना। हार मानने से नहीं चलेगा।’ भीतर से कोई आवाज़ निरंतर आ रही थी, तुम सच्चे हो, विश्वसनीय, साहसी, परिश्रमी हो और तुममें योग्यता भी है। तो तुम दुबारा दृढ़ कदमों से नहीं चल पाओगे? हाँ, क़िस्मत बहुत बड़ी बात होती है। क़िस्मत तो साहसियों का ही साथ देती है। उसी क़िस्मत को जीतना होगा। तुम सकोगे। ज़रूर सकोगे। 
     पूरा शरीर दर्द से कुनमुना रहा था। माथे पर बाँई तरफ काफ़ी सूजन है। वहाँ रह-रह कर दर्द हो रहा है। ठुड्डी के नीचे से काफी खून निकल रहा है। वहाँ थोड़ा सा खिंचाव भी महसूस हो रहा है। चलने में भी तकलीफ हो रही है लेकिन शरीर की चोटों की परवाह न करते हुए शमीक धीमे-धीमे क़दमों से खड़ी ट्रेन की तरफ बढ़ा। 
     खिड़की के पास बैठे लोगों से ही पूछा, ‘भाई साहब ये कौन सी ट्रेन है? कहाँ जाएगी?’
     ‘ये तो पैसेंजर ट्रेन है। मुंबई जाएगी।’
     विशुद्ध मराठी लोग बंबई नहीं कहते। मुंबई कहते हैं। कौन क्या कहता है,क्या नहीं, इस वक्त शमीक को इससे कोई मतलब नहीं। वहाँ खड़ी ट्रेन बंबई जा रही है, उसके लिए इतना जान लेना ही काफ़ी है। लेकिन वह क्या करे?  नए सिरे से पाँव न जमने तक कलकत्ते लौटना संभव नहीं। और इस वक्त कलकत्ते लौट कर जाने का मतलब है पराजय को आमंत्रण देना। शमीक ऐसा नहीं करेगा। नागपुर में उसने अपना साम्राज्य खोया है। खोया है बहुत कुछ ही। अत: यहाँ के किसी दूसरे इलाके में भी रहने का सवाल नहीं उठता। नए सिरे भाग्य की तलाश के लिए बंबई ही ठीक है। वहाँ काफी मौके हैं। एक बार खुद  को जमा ले तो फिर प्रतिष्ठा अर्जित करना कोई बड़ी बात नहीं। इसी आत्मविश्वास को ले ट्रेन छूटने से पहले शमीक बंबई जा रही पैसेंजर ट्रेन के सेकेंड क्लास के एक कूपे में चढ़ संडास के पास के कोने में फर्श पर लेट जो सोया तो उसी नींद में बंबई पहुँचने वाला है। उसकी नींद जब टूटी तब ट्रेन इगतपुरी छोड़ बंबई की तरफ बढ़ने के लिए अपनी गति बढ़ाने में वयस्त थी।
     सामने वाली लंबी सीट पर बैठ एक कम उम्र की बहू काफी बड़े से टिफिन करियर से कागज़ की प्लेटों में सब्जी, पूरी, अचार और कई तरह की तली हुई चीज़ें सजाकर परिवार के लोगों को दे रही थी। वे संतोषपूर्वक चाट-चूट कर खा रहे थे और आपस में बात-चीत कर रहे थे।  केमछो, सारुछे, आपो आदि शब्द सुनकर समझ में आया कि वह गुजराती परिवार था। वह कोंकणी, मराठी जो भी हों उससे शमीक को क्या? वह तो सिर्फ़ खाने वालों की तरफ बार-बार देख रहा था। दरअसल शमीक को भी बहुत भूख लगी हुई थी। वह भूख इतनी तीव्र थी कि शायद वह उन लोगों से खाना मांग भी बैठे। शायद माँग ही लेता। लेकिन मन के भीतर कहीं एक दुविधा सी भी थी, क्या वे लोग उसे भिखारी समझ लेंगे? क्या इस डेढ़ दिन की अवधि में उसका चेहरा ऐसा हो गया है?
     अन्नपूर्णा की नज़र शमीक पर थी। चार-पाँच बार नज़रें मिली भी। शायद वह समझ रही थी कि लड़का भूख से बिलबिला रहा है। लेकिन माँगना संभव नहीं। इज़्ज़त का सवाल है।  इसीलिए नज़रें क्रमश: इसी तरफ है। पति, सास, ससुर, देवर को भोजन देते-देते अन्नपूर्णा चंचल हो उठी। लेकिन क्या सीधे-सीधे लड़के के हाथ में प्लेट थमा देना संभव था भला? और अंतत: उसका क्या मतलब निकाला जाएगा? परिवार के लोगों के सामने ऐसा करना कहाँ तक शोभनीय होगा, यह भी सोचने का विषय है।
     बाथरूम जाने या हाथ धोने के बहाने सहसा अन्नपूर्णा उठ खड़ी हुई। शमीक की छठी इन्द्री सजग हो उठी। और देखा कि उस युवा वधु की साड़ी  की तह से खाने का एक पैकेट शमीक की गोद में आ गिरा। साथ ही दबे स्वर में  मनुहार थी, खा लेना। काम बहुत ही छोटा था लेकिन इसमें इतने दु:साहस की ज़रूरत है यह कौन समझेगा? अन्नपूर्णा की तरफ कृतज्ञ नज़रों से देखते हुए शमीक ने क्षण भर में ही पूरा खाना ख़त्म कर दिया।
      क्या शमीक को फिर से नींद आ रही है? थक कर चूर होकर, मानसिक रूप से टूट चुके और बर्बाद हो जाने पर पेट भर कर खाना मिल जाने के बाद नींद आने को बाध्य है। लेकिन नींद की जड़ता क्रमश: कम होती जा रही है। चिंताओं का पहाड़ सिर पर है। महाराष्ट्र इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की इंजीनियर की नौकरी कैसे बरकरार रखी जा सकती है, शमीक यही सोच रहा था। महाराष्ट्र इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के केन्द्र तो केवल नागपरु, कोराडी में ही नहीं हैं - पूरे राज्य में फैले हुए हैं।  भुसावल, पारस, नासिक, पुणे, कल्याण। बंबई खाबारखेता आदि शहरों में भी हैं। अत: सबको घूम-फिरकर सभी जगहों पर रहना पड़ता है। ट्रांसफर के उस नियम के चलते शमीक कोराडी अर्थात् नागपुर से अन्यत्र कहीं भी बदली करवा सकता है, अवश्य करवा सकता है। लेकिन जिस अरुण गांगुली से असम्मान का यह आघात मिला है, उन्हीं की दी हुई नौकरी का दामन थामे रखना शमीक को तनिक भी सम्मानजनक नहीं लगा। शमीक यह नौकरी नहीं करेगा। उसने निश्चय किया कि जब विद्युत परिषद का प्रधान कार्यालय बंबई में ही है और वह बंबई ही जा रहा है तो पत्र द्वारा या खुद उपस्थित होकर वह नौकरी छोड़ने के निर्णय से अवगत करवा देगा।  अरुण गांगुली के पास यह सूचना यथासमय पहुँच जाएगी और इससे एक बात साबित हो जाएगी कि शमीक सिर्फ़ सच्चा ही नहीं चारित्रिक और मानसिक हर दृष्टि से कुछ ज़्यादा ही सच्चा है।
     ट्रेन तब कल्याण जंशन छोड़ बंबई वी. टी. यानी विक्टोरिया टरमिनस की तरफ दौड़ लगा रही थी। दोनों तरफ असंख्य छोटी-बड़ी फैक्टरियां और आफिस थे। साईनबोर्ड पर कंपनियों के नाम चमक रहे थे। वह एक इंजीनियर है। कर्म की इस विशाल नगरी में क्या उसे एक नौकरी नहीं मिलेगी? ऐसा हो सकता है भला? हो सकता भाग्य सहायक होने में ज़रा देर लगे। यह भिन्न सवाल है। भिन्न सवाल। क्या सचमुच यह भिन्न सवाल है? इस वक्त शमीक के लिए यही असली सवाल बन गया है।
      न्युबैरकपुर के विज्ञान घोष बगान इलाके के छोटे से मकान के तीन प्राणी उसके द्वारा भेजे गए रुपयों के लिए महीने के पहले दिन से ही आस लगाए बैठे रहते हैं। इन तीनों को किसी भी कीमत पर वंचित नहीं किया जा सकता। हर महीने वहाँ निर्दिष्ट राशि भेजनी होगी। कहाँ से आएंगे वह रुपए? कम से कम छह महीनों के लिए इस तरफ से निश्चिंत हो सकता तो वह इस बंबई शहर में संघर्ष के लिए अंतिम प्रयास के तौर पर मिट्टी धूल फाँक कर भी गुज़ारा कर लेगा। लौट जाने से बात नहीं बनने वाली। हार मान लेने से कैसे चलेगा? शमीक को तो हर हाल में जीतना ही होगा।
      नौकरी की तलाश शुरू हो गई। शमीक को लगा कि यह बहुत कठिन जगह है। यहाँ कोई किसी के लिए आसानी से जगह नहीं बना देता। जगह खुद ही बनानी पड़ती है। सारा दिन घूमना, भिन्न-भिन्न कंपनियों में जाकर मिलना-जुलना, साक्षात्कार देने का सिलसिला क्रमश: चलता रहा। फुटपाथ की दुकानों से रोटी-सब्जी खाकर फुटपाथ पर ही लेट कर अगली सुबह का इंतज़ार करना।  नींद तो आसानी से आती नहीं। आती हैं तरह-तरह की चिंताएं, योजनाएं। नौकरी ज़रूर मिलेगी।  लेकिन कब, और कितनी देर, यह तो पता लगाना संभव नहीं। अत: खर्च का एक हिसाब-किताब बना लिया जाना ज़रूरी है। परिवार की तरफ से निश्चंत हो जाने पर इधर का वह संभाल लेगा।  इसीलिए शमीक अब कुछ और सोच रहा है। वह है, कलकत्ते में विकास चौधरी को एक ख़त लिखना ताकि अगले छह महीनों तक वे अपने इस प्रिय छात्र के घर वालों को हर महीने एक हजार रुपए भिजवा दिया करें। ये रुपए लेना कारुणिक तो है ही लेकिन वापसीयोग्य भी हैं। छह महीनों के ये रुपए सर को वापिस लेने ही होंगे। और इन छह महीनों में बंबई में पड़े रहकर शमीक जांच लेना चाहता है कि अरब सागर का जल कितना खारा है? क्या यही खारा पानी अमृत नहीं बनता? नहीं बन सकता क्या?
    यह दुनिया सचमुच बड़ी अजीब है। इन्सान के मन की सूक्ष्म-जटिलता, प्यार-मुहब्बत, स्नेह-ममता, कामना-वासना कितने ही रहस्यों का रोज पर्दाफ़ाश होता है। कौन इसकी खोज-ख़बर के चक्कर में पड़ता है। दिन आते हैं, गुज़र जाते हैं। ज़िंदगी जिस रूप में आती है बहुत से लोग उसे उसी रूप में स्वीकार करते हैं। कुछ लोग नहीं करते।

                                                           ..........जारी ।

बांग्ला से अनुवाद – नीलम अंशु


उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,
राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन,
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ से प्रकाशित (2009)।


शनिवार, मई 21, 2011

धारावाहिक बांग्ला उपन्यास - 9


(प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम से उनका लेखन जन-जन तक पहुंचे।)
गोधूलि गीत

0 समीरण गुहा

     एक साल कैसे गुज़र गया किसी को भी पता नहीं चला। इस एक साल में ही बरेली सिविल लाइन्स के चटर्जी परिवार के महीतोष, अलकनंदा और उमाप्रसाद तीनों इस दृढ़ निश्चय पर पहुंचे कि इस उम्र के लड़कों जैसी चंचलता और व्यग्रता अरुण में नहीं है। पूर्ण विश्वास से वह इस परिवार से जुड़ गया है। बासंती के चेहरे की रौनक हमेशा बरकरार रहेगी - इस प्राप्ति पर वे खुश हैं। अरुण जैसे लड़के कहाँ होते हैं। उसकी विवेचन शक्ति ही अलग है। परिवार के सम्मान के प्रति वह काफ़ी सजग है.। उसकी हर बात में इस विश्वास की झलक मिलती है। इससे ज़्यादा उन्हें क्या चाहिए।
     अक्तूबर महीने का दूसरा सप्ताह है। बीते कल दुर्गापूजा खत्म हुई है। आज विजयदशमी यानी दशहरा है। गोमती नदी में प्रतिमा विसर्जन देखने का अपना ही मज़ा है। बासंती ने पहले से ही अरुण से कह रखा है, इस दिन शाम के बाद कोई कार्यक्रम न रखे। मैं आकर तुम्हें विजयघाट ले चलूंगी।  वहाँ से प्रतिमा विसर्जन का बड़ा शानदार नज़ारा दिखता है।
     काफी पहले शाम गहरा गई है। बासंती अभी तक नहीं पहुंची। होटल बरेली क्लब के अपने कमरे में चुपचाप लेटा हुआ है अरुण। बेमन से एक पत्रिका के पन्ने पलटने लगा। पढ़ने की इच्छा नहीं है, यह उसे बार-बार दरवाजे की तरफ देखते देख ही समझा जा सकता है। दरअसल वह बासंती के इंतज़ार में घड़ियां गिन रहा है। मज़े की बात है कि बासंती से रोज मिलने के बावजूद उसके मन का एक कोना शिकायत सी करता रहता है। प्रिय से इतने कम समय के मिलन का मतलब ही है खुद को वंचित करना। अरुण ने कुछ और ही समझा। बासंती का आना तो निश्चित है - आज सारी रात उसके साथ बातें की जाएं तो कैसा रहे। लेकिन सोच और वास्तविकता में तो बहुत अंतर है। ऐसा भला हो सकता है? इसके सिवा और कुछ सोच नहीं पाया अरुण। उसके कमरे में घने हरे जंगल की हरियाली पसर आई. सिर्फ़ हरियाली और हरियाली.  बारिश में नहा चुकी प्रकृति का वह रूप मानो बासंती के समक्ष पराजित हो गया हो। उसने गहरे हरे रंग की साड़ी पहन रखी थी। केले के पत्तों जैसे हल्के हरे रंग का ब्लाउज। दोनों पतली भौंहों के बीचो-बीच हरे रंग की बड़ी सी बिंदी। उसकी छाया में मानों बासंती के दोनों गाल भी हरे हो उठे हों। सबसे बड़ी बात ये कि बासंती के नाक के लौंग में जड़ा नगीना भी हरे रंग का था। अन्य दिनों वह सफेद नगीने वाला लौंग पहनती है। सिर्फ़ लौंग? बासंती के कान के टॉप्स में भी हरी आभा है। दोनों बाँहों में कम से कम चौदह-पंद्रह चूड़ियां पहन रखी हैं।
     बासंती कमरे के बीचो-बीच थी। उसके पूरे शरीर से मानो हरी रौशनी निकल रही हो। इस रौशनी से ऑंखें चौंधियाती नहीं बल्कि ऑंखों में सपनों का काजल लगा देती है। पत्रिका को एक किनारे फेंक बिस्तर पर उठ बैठा अरुण। बासंती की ऑंखों की तरफ देखता रहा।
     ख़ामोशी भी बहुत कुछ कह जाती है। ये पल भी उसी खामोशी के पल हैं। बासंती की दोनों ऑंखों में मदहोशी का ख़ुमार सा छाया हुआ है। अरुण को इस तरह मुग्ध दृष्टि से देखते उसने पहले कभी नहीं देखा लेकिन आवाज़ के शोर से इस खामोशी को भंग करने को जी नहीं चाहा।
     बिस्तर छोड़ धीरे-धीरे उतर आया अरुण। बासंती के सामने खड़े होकर सिर्फ़ जानना चाहा, ‘क्या वन की भी कोई देवी है? ’
     ‘मैं ही वह देवी हूँ।’
     ‘तुम !’
     ‘मैं ही हूँ।’
     ‘इतनी हरितिमा तुम्हें कहाँ मिली ?’
     ‘मैंने ही सृष्टि की है।’
     ‘तुमने !’
     ‘हाँ, मैंने ही। और क्या सुनना चाहते हो बोलो?’ बासंती ने अपने दोनों कोमल हाथ अरुण के चौड़े कंधों पर फैला दिए। बासंती के उस कोमल स्पर्श में अरुण थोड़ा-थोड़ा मानों बहने लगा। समंदर के हरे पानी में मानों वह अभी ही डूब जाएगा। बचाव के लिए तिनके के सहारे की भाँति अरुण ने बासंती की कमर को पकड़ होंठ, गले एवं सीने पर निश्चिंतता से अपना मुँह रख मुक्ति की गहरी सांसे लेने लगा।
     अभी रात के लगभग आठ बज रहे होंगे। वे लोग गोमति नदी में प्रतिमा विसर्जन देखने नहीं गए। दोनों स्निग्ध दृष्टि से एक-दूसरे को देख रहे थे। हरे-भरे वन में तूफान उठ आया था। बासंती की बाँहों की चूड़ियों में से एक भी साबुत नहीं बची। हरी बिंदिया सारे माथे पर फैल गई थी।
     बासंती ने फुसफुसा कर कहा, ‘आज हमने यह क्या किया अरुण !’
     ‘तुम डर रही हो ?’
     ‘दीदी का चेहरा बार-बार याद आ रहा है।’
     ‘छी। तुम्हें मुझ पर इतना ही विश्वास है? बासंती, मेरे जीवन में यह मैंने पहली बार किसी लड़की को स्पर्श किया है, इन हाथों से दुबारा और किसी को नहीं छुऊँगा। मैं आवेग में बात नहीं कर रहा। भविष्य ही प्रमाण देगा।’
     ‘तुम्हारी बातें कितनी अच्छी हैं।’
     ‘ज़िंदगी भर अच्छा बनकर ही तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ।’
     कोई जवाब नहीं सूझा बासंती को। कितनी सहजता से, कितनी अच्छी तरह से बातें करता है अरुण।
     उस रात बासंती को उसके घर पहुँचाकर होटल बरेली क्लब लौटकर अरुण पिता को ख़त लिखने बैठा। ख़त का वक्तव्य यही है कि बासंती को छोड़ वह किसी और से शादी नहीं करेगा। अत: पिता की राय और आशीष दोनों ही वांछित हैं। बीच के कुछ दिन ख़ामोशी से कटे लेकिन पिता का जवाब उच्छवास भरा ही आया। उन्होंने बेटे की रज़मंदी में ही अपनी रज़मंदी जता आशीर्वाद भेज दिया था। साथ ही एक शर्त भी रख दी थी। शादी के एक हफ्ते के भीतर पुत्रवधु को दिखाना होगा। बार-बार ख़त को पढ़ा अरुण ने। उसकी ऑंखें खुशी के ऑंसुओं को बाँधे न रख सकीं। लेकिन बासंती को कैसे सूचित किया जाए। वह लखनऊ गई है अपनी ननिहाल। मंगलवार लौटेगी, यानी अभी भी आठ दिन बाकी हैं। असंभव !  इतनी बड़ी खुशखबरी को दिल में दबाए कम से कम आठ दिन तो नहीं गुज़ारे जा सकते। लखनऊ पहुँचने तक दो-चार घंटे ख़ामोश रहा जा सकता है। उससे ऊपर एक मिनट भी नहीं।
     नहीं, लखनऊ जाना संभव नहीं हो पाया। एक दिन के लिए भी छुट्टी नहीं मिली। सिर्फ़ काम और काम? काम से अरुण को भी लगाव है। लेकिन इस तरह? अपनी खुशी के क्षणों में चाहते हुए भी एक छुट्टी न ले सके। जो नौकरी करते हैं उनकी दु;ख-तकलीफों को उच्चाधिकारी समझना नहीं चाहते। वे सिर्फ़ मौत के समाचार या गंभीर बीमारी का समाचार आने पर ही छुट्टी मंजूर कर सकते हैं। पावरहाउस की नौकरी करनी ही नहीं चाहिए थी। यहाँ रोज ही एमरजेंसी रहती है। और मन में अगर तनिक भी खुशी न हो तो क्या मशीन की भाँति मुँह बंद किए काम करना संभव है? पहले अरुण कर लेता था, अब नहीं होता। और बासंती भी वैसी ही है। ननिहाल जाने का और वक्त नहीं मिला। दुनिया में मानो उसी अकेली की ही ननिहाल है।
      लखनऊ में बासंती के मंगलवार तक रहने की बात थी। वह उससे दो दिन पहले ही बरेली लौट आई थी। दरअसल उसका भी वहाँ मन नहीं लग रहा था।  विजयादशमी के बाद ननिहाल जाना पड़ता है, इसलिए गई थी - अरुण के बगैर रहने की तकलीफ भी भली-भाँति समझ गई है। बासंती को एक बात समझ नहीं आई, इसके बाद अगर उसके बगैर रहने की बात आए तो वह क्या करेगी?

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     ट्रेन एक घंटे से भी ज़्यादा लेट थी। लखनऊ स्टेशन पर सोचने के बाद बासंती ने पल भर भी इंतज़ार नहीं किया। सीधे बस डिपो जाकर बरेली की बस पकड़ ली। झाँसी चौंक पर उतर कर एक टैक्सी ले सीधे होटल बरेली क्लब जाए या पावर हाउस यह तय करने में ज़रा सा समय लगा। शाम के चार बज गए थे। रविवार को साधरणत: इस वक्त अरुण पावर हाउस में नहीं होता। उससे पहले ही होटल लौट आता है। अत: बासंती ने ड्राईवर को होटल चलने का निर्देश दिया।
     थोड़ी देर पहले अरुण पावर हाउस से लौटा है। सिर्फ़ जूते और मोजे खोले हैं, कपड़े नहीं बदले।  इसी हाल में बिस्तर पर लेट गया।
     कमरे में प्रवेश कर बासंती ने उसे एक नज़र देखा। अरुण शायद सो रहा है। सूटकेस को धीरे से फ़र्श पर रख धीरे-धीरे अरुण की तरफ बढ़ी। इन दस दिनों तक उससे दूर रहकर बासंती अब खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाई। वह उसके शरीर पर लपक ही पड़ी। खुशी से ऑंखे खोल अरुण ने जैसे ही देखा,बासंती सुखद अनुभूति से रो ही पड़ी। तुम्हें एक दिन के लिए भी छोड़ कर नहीं जा पाउंगी, बिलकुल नहीं। इन कुछ दिनों में बहुत तकलीफ़ हुई है अरुण। बहुत...
     रुलाई भी छूत की तरह होती है। ममतापूर्वक बासंती के ऑंसू पोंछते हुए अरुण की ऑंखें भी डबडबा आईं। उसने खुद पर यथासंभव नियंत्रण रख भारी आवाज़ में कहा, ‘जानती हो मैंने तुम्हारे पास लखनऊ जाने के लिए एक दिन की छुट्टी माँगी थी। जब नहीं मिली तो सोचने लगा कि लोगों की ननिहाल क्यों होता है?’
     ‘बातूनी लड़के !’ बासंती की हँसी सारे कमरे में फैल गई।
     तकिए के नीचे से पिता का ख़त निकाल कर अरुण ने बासंती के हाथ में थमाते हुए कहा, ‘इसे पढ़ो।’
     ‘किसका ख़त है?’
     ‘अरे पढ़ो न...’
     बासंती को पढ़ने में शायद पाँच मिनट का समय लगा। अरुण की पैनी निगाहें उसके चेहरे पर टिकी थीं। दरअसल बासंती के चेहरे पर खुशी के जो चिहन् आ रहे थे उन्हें अरुण अपने मन के पिटारे में कैद रखना चाहता था ताकि एकांत में कभी उनमें झांक सके।
     इंसान शायद ज़्यादा खुश होने पर ही ज़्यादा रोता है। ख़त पढ़कर बासंती की रुलाई के फूट पड़ते ही अरुण ने उसे सीने से लगा लिया, ‘तुम सिर्फ़ मेरी हो। सिर्फ़ मेरी।’
     बासंती ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया। नन्ही बच्ची की भाँति थोड़ी देर पुचकारे जाने के बाद बोली - ‘पिताजी से मिलने की बड़ी इच्छा हो रही है।’
     ‘और यह काम जल्दी होना चाहिए। तुम्हारी फाईनल परीक्षा कब है?’
     ‘अभी तीन महीने बाकी हैं।’
‘इन तीन महीनों बाद ही घर पर अनुष्ठान की तैयारी के लिए कह दो।’ बासंती की नाक से छेड़-छाड़ करते हुए अरुण ने हँस कर कहा - ‘समझी कुछ?’
     ‘समझ गई शादी काफ़ी विषम चीज़ हैं।’ बासंती की हंसी में संगीत सी खनक थी और उसी वक्त अरुण की नज़र पड़ी कमरे के बीचो-बीच पड़े सूटकेस पर। तुरंत पूछा - ‘वह किसका है?’
     ‘तुम क्या अभी ही चली आई हो?’ अरुण ने ज़रा उसे चिढ़ाने की कोशिश की।
     ‘मैं इतनी बेशर्म नहीं हूँ।’ बासंती उसके चक्कर में नहीं आई। ग़ज़ब की हंसी हंसते हुए जवाब दिया -  ‘देखो, तीन महीने से पहले मैं अब कभी भी तुम्हारे पास नहीं आऊँगी।’ थोड़ी देर बाद फिर बोली - ‘अभी तक घर नहीं गई, लखनऊ से सीधे तुम्हारे पास आई हूँ।’
     बेहद कृतज्ञता से अरुण पहले तो कुछ नहीं बोल पाया।
     अरुण चुपचाप उसके पाँव सहलाने लगा।
     ‘क्या कर रहे हो? पाँवों को कोई हाथ लगाता है भला? ’ 
     ‘क्यों पाँव तुम्हारे शरीर के अंग नहीं है - मैं उतना सोच-विचार नहीं करता। तुम्हारा सब कुछ मुझे प्रिय है।’
     ‘अच्छा?’ बासंती की भौंहें एक अनजान रहस्य से काँप उठी। कमर तक फैले उसके घने-लंबे बालों में अपना मुँह छुपाकर अरुण ने सिर्फ़ कहा -‘तुम इन पंद्रह दिनों में बहुत शरीर हो गई हो।’

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     घर वालों को एक दिन पता चल ही गया। फाईनल परीक्षा तब सिर पर थी।  रात-रात भर जग कर पढ़ाई करनी पड़ रही थी। अलकनंदा हर दिन उसके कमरे के टेबल पर खाना रख जाती।  उस दिन अलकनंदा को हिलने तक का समय नहीं मिला। उनके सामने ही बासंती ने कै कर दी।  रात भर जग कर पढ़ाई करने के कारण ही ऐसा हुआ है। अलकनंदा ने स्वभाविक तौर पर ही फ़िक्र की लेकिन उसके बाद बेटी की तरफ देख माँ का मन शंकित हो उठा। वे सदा से शांत स्वभाव की महिला थीं। बहुत ज़्यादा शोर-गुल वे कभी नहीं कर पाती थीं। फिर भी कहा, ‘ये क्या किया?’ प्रश्न सुनकर बासंती ज़रा भी नहीं घबराई और डर की कोई बात भी तो नहीं। परीक्षा के बाद ही तो अरुण से उसकी शादी होने वाली है।
     फ़िक्र और डर से अलकनंदा तब तक बेचैन हो उठी थीं। बासंती का भविष्य क्या हो सकता है एक साथ हज़ारों काली तस्वीरें मानों पैशाचिक नृत्य कर उठी हों। उन तस्वीरों को देखते-देखते अलकनंदा की दोनों ऑंखों की रोशनी मानों क्रमश: ख़त्म हो गई हो। पहली बार अलकनंदा ने बेटी के साथ ऊँची आवाज़ में बात की। हाँ, बासंती ने भी माँ के साथ तर्क शुरू कर दिए।
     घर के अन्य दो व्यक्तियों की नींद टूट गई थी। माँ और बेटी की तेज-तर्रार बातचीत दरवाज़े के बाहर खड़े सुन पा रहे थे। असहाय नज़रों से उमा प्रसाद और महीतोष दोनों एक - दूसरे का मुँह देख रहे थे।
     बासंती के छोड़ बाकी तीनों ज़रूरी मीटिंग में थे। यद्यपि वे काफी निश्चिंत थे फिर भी सब कुछ ठीक-ठाक न हो जाने तक चैन कहाँ। अरूण पहले ही शादी की बात कह चुका है। बासंती की परीक्षा के बाद की दो-तीन तारीखें हैं। पहली ही तारीख को उनकी शादी निपटा देनी होगी। तब तक चुप रहना ही उचित होगा।..............
     बासंती ने परीक्षा ख़ामोशी से दी। दरअसल परिवार के अन्य तीन सदस्यों को उसकी परीक्षा के विषय में कोई उत्साह ही नहीं है।  शादी को लेकर ही वे चिंतित हैं।  ज़्यादा समय भी नहीं है। इसी दैरान सारे काम निपटाने होंगे। शादी हो जाने के बाद तीनों तीर्थ पर जाएंगे। मन पर इतना दबाव लेकर और कितना सहा जा सकता है।
     अंतत: वही मानसिक दबाव फिर आ पड़ा। शादी से दो दिन पूर्व अरुण पागलों की भाँति बासंती के घर आया तो उसे देख बासंती आगे बढी। उसके सूखे मुंह को देख पूछा - ‘क्या हुआ है तुम्हें?’
     अरुण ने उसके हाथों में टेलिग्राम देते हुए कहा - ‘पिता मृत्यु शय्या पर हैं। मुझे आज ही जाना होगा।’ बासंती के सीने में तनिक भी कंपन नहीं हुई। उसने स्वभाविक स्वर में ही कहा - ‘शादी के मुहुर्त तो बाद में भी बहुत मिलेंगें, तुम पिताजी को देख आओ।’
     ‘नहीं, अरुण नहीं जाएगा। उमाप्रसाद ने गंभीर स्वर में कहा।
     अरुण ने सजल ऑंखों से उमा प्रसाद की तरफ देखा। विनीत स्वर में कहा - ‘आप समझ नहीं रहे हैं, आज न जाने पर शायद पिताजी को......’
     विपदा में मनुष्य शायद ऐसा ही निष्ठुर बन जाता है। इसी बीच उमा प्रसाद को तूफान के आगमन का अहसास हो गया। अत: उन्हें कठोर बनना ही होगा।  उन्होंने कहा - ‘तुम किसी के  दर्शन कर पाए या नहीं कर पाए, यह देखना मेरा काम नहीं। बासंती से शादी किए बगैर तुम यहाँ से एक कदम भी नहीं हिल सकते।’
     ‘आप मुझ पर अविश्वास कर रहे हैं। अपमान से अरुण का चेहरा स्याह पड़ गया। शंका-अविश्वास आप ही कर ही सकते हैं परंतु शक का जहर आप ग़लत जगह उड़ेल रहे हैं।  मैं फिर कहता हूँ’ - अरुण का गला रूंध सा गया - ‘मेरे बारे में आप जैसा सोच रहे हैं, मैं वैसा नहीं हूँ। इस तरह मेरी बेइज्जती मत करें। बासंती से शादी न करने का तो सवाल ही नहीं है।  वह मेरी ज़िंदगी में सब कुछ है  - लेकिन ऐसी स्थिति में पिताजी के पास नहीं गया तो ........’
      ‘तो किस बात का सवाल है?’ अरुण के स्वर में विनीत भाव नहीं था लेकिन उसकी बात को किसी ने महत्व नहीं दिया। अपमान की ज्वाला से वह भीतर ही भीतर सुलग रहा था।  असहायता की स्थिति में ख़ामोश रहने के सिवा और कर ही क्या सकता था?  अरुण ने काफी ज़ोर देकर कहा - ‘मेरा इरादा ग़लत होता तो मैं आप लोगों के पास दौड़ा क्यों आता? क्यों ?’
     उमा प्रसाद ने कहा - ‘सारा काम तुमने विश्वासयोग्य करके.................. ’
     ‘अब आप विश्वास शब्द का उच्चारण न करें।’ अरुण ने उत्तेजित होकर काँपते हुए कहा - ‘आप जब मुझ पर विश्वास नहीं कर सके तो यह शब्द आपकी ज़बान पर शोभा नहीं देता।’ बात ख़त्म करते ही वह बासंती की ओर बढ़ा। धीमे शांत स्वर में कहा - ‘पिताजी से शायद यह अंतिम मुलाकात हो। क्या तुम भी जाने नहीं दोगी?’
     बासंती की ऑंखें तब नम हो गईं। होंठ काँप रहे थे। वह कुछ कहने ही वाली थी कि उससे पहले ही उमा प्रसाद उसे दूसरे कमरे में खींच ले गए। पूरे आधे घंटे बाद जब बासंती अरु ण के पास दुबारा लौट कर आई तो वह बिलकुल भिन्न थी। बासंती ने स्पष्ट शब्दों में कहा - ‘शादी हो जाए, उसके बाद ही तुम जाना।’
     ‘लौटने के बाद शादी नहीं हो सकती क्या ?’
     ‘नहीं।’ बासंती मानो पत्थर की मूरत हो।
     एक नई दृष्टि से अरुण बासंती की तरफ देखता रहा। बासंती ज़्यादा देर तक उन नज़रों का सामना न कर, सकी, नज़रें हटा लीं। अरुण ने सिर्फ ऌचना ही कहा - ‘यही तुम्हारा मर्यादाबोध है?’
एक इन्सान पर कितना अविश्वास और उसे कितना नीचा दिखाया जा सकता है - बासंती के परिवारवालों ने भी वही किया। अरुण ने एक टेलिग्राम करने के लिए बाहर जाना चाहा तो एक अपरिचित अधेड़ से व्यक्ति ने साफ-साफ क़ह दिया कि ‘जो भी काम हो, हमें कहें।’ यानी अरुण को बंदी बना लिया गया था। पिता के लिए चिंतित तो था ही तिस पर ऐसा मानसिक आघात वह सहन नहीं कर पाया। एक शिशु की भाँति अरुण के मन में बासंती के प्रति अभिमान सा जाग उठा। वह बासंती के पास दौड़ा। ‘क्या तुम लोगों ने मेरे साथ यह ठीक किया? अब भी वक्त है जाकर पिताजी को देखकर आ सकता हूँ। तुम मुझे इजाज़त दो।’
     तोते की तरह बासंती ने रटा-रटाया एक ही जवाब दिया - ‘शादी किए बगैर तुम नहीं जा सकते।’
     अरुण सारी रात सो नहीं सका। एक असह्य पीड़ा से वह भी क्रमश: ज़िद्दी होता गया। आगामी कल उसकी शादी है लेकिन शादी के नाम पर होगा सिर्फ एक आयोजन - जहाँ विश्वास की मौत हो गई हो वहाँ प्यार किसी कीमत पर भी ज़िंदा नहीं रह सकता।
     इन्सान कितना बेरहम हो सकता है - अरुण एक-एक कर हर चीज़ पर ग़ौर कर रहा था। पहले तय हुआ था कि शादी का अनुष्ठान ख़त्म होते ही वह पिता को देखने जाएगा। अब कहा जा रहा है कि ऐसा कैसे हो सकता है? सुहागरात के बगैर क्या शादी पूर्ण होती है भला? इसके अतिरिक्त और भी कई रस्में हैं। शादी बच्चों का खेल तो है नहीं। अरुण सोच नहीं पाया कि, ये कैसे लोग हैं? एक बूढ़ा व्यक्ति मृत्यु शय्या पर पड़ा बेटे से मिलने की उम्मीद लिए तड़प रहा है और ये लोग उस बेटे को नियमों की बेड़ियों में जकड़ आनंद में मग्न हैं। इन लोगों से उसे और कोई उम्मीद भी नहीं है? अरुण ने लाचार होकर खुद को खुद के हाल पर छोड़ दिया। जो समय बर्बाद होना था, वह तो हो ही गया था। इस घर के लोग अब चाहें जो करे.......
     टेलिग्राम मिलने के छह दिन बाद जब अरुण कोलकाता के जादबपुर में अपने घर पहुँचा तो सब कुछ ख़त्म हो गया था। अपना कहने के लिए अरुण का कोई नहीं रह गया था। दूर के कुछ रिश्तेदार थे। हाँ, वे ज़रूर अपनों से कम नहीं थे। अरुण को देख सुधेन्दु मामा धीरे-धीरे आगे बढ़े।  उसे सीने से लगा भर्राए स्वर में कहा - ‘बहुत देर कर दी रे। तीन दिन पहले भी आ जाते तो एक बार पिता को देख लेते। इतनी देर क्यों हो गई रे?’
     सुधेन्दु मामा के सीने में मुँह छुपाए पड़ा रहा अरुण। टेलिग्राम मिलते ही अगले दिन ही तो वह पहुँच सकता था। क्यों देर हो गई, क्या जवाब दे उसका? उसके जीवन का सबसे अंधकापूर्ण समय तो यही है।
     सुधेन्दु मामा ने कहा - ‘मृत्यु से तुम्हारे पिता को भय नहीं था - उन्हें समय की फिक़्र लगी रहती थी। उनका शक सही निकला। हर पल यही पूछते रहे - अरुण आया क्या? आए तो लेकिन.....’

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     बरेली सिविल लाइन्स के उस मकान में तब भी रौनक थी। बासंती की शादी पर जो रिश्तेदार आए थे, अंतिम परिणति देखे बगैर कोई भी वहाँ से हिला नहीं। अरुण कलकत्ते गया था, उसके लौटने के कौतुहलवश सभी रुक गए थे। कई लोग कई तरह की बातें कर रहे थे। विवाह का बंधन ही क्या सब कुछ है?  अरुण का यदि पलायन का मन होगा तो वह भाग ही जाएगा। पिता की बीमारी सिर्फ बहाना है। अब वह नहीं लौटने वाला। किसी ने कहा - ‘जो भी हो, एक बार शादी जब हो गई तो जाएगा कहाँ ? यहाँ न भी आए तो भी वह ठीक ही पकड़ में आ जाएगा।’
     अरुण को पकड़ने के लिए किसी को जाना नही पड़ा। वह खुद ही बरेली लौट आया। उसे देख कर सब ने चैन की साँस ली, बासंती खुद को अपराधी समझ रही थी। उसके नंगे पाँव, हाथ में आसन और तन पर सफेद वस्त्र देख बासंती धीरे-धीरे फर्श पर ही बैठ गई। खड़े होने की सामर्थ्य उसमें नहीं  थी। मन की शक्ति तो बहुत पहले ही ख़त्म हो चुकी थी।
     यह घर अब अरुण के लिए एक दु:स्वप्न है। यहाँ से चले जाने के बाद क्या रिश्ता रह जाएगा। अत: बात बढ़ाने से क्या फायदा? दोषारोपण? वह भी अरुण किसी पर नहीं करेगा। क्या फायदा? पिता को खोने का दर्द गहराई में उतर कर धीरे-धीरे जम कर पत्थर बन गया। जब उस पर किसी ने विश्वास नहीं किया, तनिक भी सहानुभूति नहीं दर्शाई, तब खद ही खुद पर काबू पाना होगा। अरुण चुपचाप बासंती के सामने जा खड़ा हुआ। उससे अब बात तक करने में नफरत हो रही थी।  हाँ, नफरत ही तो। किंतु कोई चारा भी तो नहीं था। बासंती उसकी पत्नी है। उसे रोक कर कितनी शान-शौकत से विवाह का अनुष्ठान किया गया - इसके बाद उसे कैसे अस्वीकार किया जा सकता है? गंभीर स्वर में अरुण ने सिर्फ इतना ही कहा - ‘चलो। छलछलाती ऑंखों से बासंती ने जैसे ही अरुण की तरफ देखा, अरुण ने दुबारा कहा - इसी वक्त।’
     बासंती को लेकर अरुण जब निकल रहा था, अलकनंदा, महीतोष और उमाप्रसाद तीनों में से कोई भी न कह सका कि तुम लोग मत जाओ। वह हिम्मत तीनों पता नहीं कहाँ गंवा बैठे थे।  विस्मय की खुमारी छंट जाने के बाद सिर्फ यही महसूस किया कि घर लोगों से भरा होते हुए भी कैसा खालीपन सा महसूस हो रहा है।
     सिविल लाइन्स के घर से बरेली क्लब होटल आए बासंती को पूरे चौबीस घंटे हो गए हैं। इस दौरान अरुण ने उससे एक बार भी बात नही की। बासंती से यह सहन नहीं हो रहा था। मन से लड़ते हुए तब वह थक चुकी थी। उसके बाद अरुण के पाँवों पर गिर रोते हुए गिड़गिड़ाने लगी - ‘मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हें छूकर .......’
     ‘ज़रूरत नहीं। दृढ़ स्वर में अरुण ने कहा - जीवन भर तुम्हारी नज़रों में अविश्वासी ही बने रहना चाहता हूँ। तुम मुझे अब कभी स्पर्श नहीं करोगी - कभी नहीं। मैं भी तुम्हें नहीं छुऊंगा। कभी नहीं।’
     भीष्म की प्रतिज्ञा के मुकाबले अरुण गांगुली की वह छोटी सी प्रतिज्ञा किसी भी मायने में छोटी नहीं थी। एक साधारण नवविवाहित तरुण होकर भी अपने आदर्श और विश्वास से बिंदु मात्र भी न भटक उन्होंने जिस तरह सिर्फ सुंदर पत्नी ही नही बल्कि अपने ही हृदय के दूसरे अंश से जिस तरह ख़ामोश दूर हो गए, वह सचमुच आश्चर्य की बात है। यह भी क्या संभव है? एक ही घर में रहकर दिन, महीनों, और वर्षों बाद भी इस तरह बिना स्पर्श किए रहा जा सकता है क्या? जीवन की प्राकृतिक ज़रूरतों से में शरीर की प्रधान भूमिका होती है। पति-पत्नी का मिलन उसी प्यार-मुहब्बत की सांसारिक समृद्धि है। अरुण गांगुली ने कभी भी उस सुख-समृद्धि का स्पर्श करना नहीं चाहा। संकल्प की तेजस्विता इंसान को कितने कठिन मोड़ पर ले जा सकती है, उसी की मिसाल बन गए अरुण गांगुली। बासंती के साथ एक बिस्तर पर सोना तो दूर, उसे फिर कभी स्पर्श ही नहीं किया। मानो वे भले ही अपनी पत्नी हो। पत्नी होते हुए भी बासंती ने अविश्वास का जो बीज बोया था वह आज अरुण गांगुली के हृदय में विशाल बट-वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। नहीं, बरसती रात में कभी-कभार नींद टूट जाने पर भी अरुण गांगुली ने भयानक हवा के सुखद झोंके की भाँति पल भर के लिए भी कुछ अलग सा महसूस नहीं किया। उनके शरीर में कोई तरंग नहीं है। कोई ख़्वाहिश नहीं है। समुद्र की गहराई जहां अधिक हो वहाँ का पानी भी उतना ही शांत होता है।  अरुण गांगुली भी उसी तरह शांत, गंभीर और विवेचनाबोध लिए समुद्र बने हुए हैं।
     इन चौबीस-पच्चीस वर्षों में बासंती ने चार बार माफी माँगी थी। व्याकुल होकर रोते हुए कहा था - ‘मेरे एक दिन के अपराध के लिए तुम जीवनभर के लिए दीवार खड़ी कर दोगे। यही एक दिन सब से बड़ा हो गया। और वह दिन, जब तुम पर विश्वास कर बरेली क्लब होटल के कमरे में खुद को पूर्णत: तुम्हारे हवाले कर दिया था, उसका कोई महत्व नहीं? बोलो, बोलो, इतना ख़ामोश मत रहो, मुझसे और सहन नहीं होता।’ ये दबाव सहन न कर पाते हुए मैं और भी छोटी होती जा रही हूँ। अरुण गांगुली ने गंभीरता से एक बात कही - ‘तुम अपने कमरे में जाओ।’ आधी रात को भी बासंती एक-दो बार अरुण गांगुली के कमरे में आई थीं लेकिन वे अपने ही ख़्यालों में खोए हुए थे। मग्नता के उस आसन से वे नहीं लौट पाए।  ज़रा भी टस से मस नहीं हुए। ध्यान में मग्न ऋषि की भाँति जवाब दिया -‘आधी रात को किसी के कमरे में प्रवेश करना ठीक नहीं।’
     उसके बाद अरुण गांगुली ने कई बार सोचा, कहीं वे बासंती के साथ ज़्यादती तो नहीं कर रहे?  खुद ही खुद को मुजरिम के कठघरे में खड़े कर हज़ारों सवाल किए। बार-बार एक ही जवाब मिला कि कोई ज़्यादती नहीं की। जिस आस्था को लेकर बड़े हुए तरुण और सजीव जीवन को बासंती ने बिलकुल स्तब्ध कर दिया था और एक मरणासन्न पिता की अंतिम इच्छा का अपमान किया, इन दो ज़िंदगियों की तुलना में ये सज़ा कोई बहुत बड़ी नहीं है। यह सज़ा उसे ज़रूर मिलनी चाहिए।  
     तो क्या अरुण गांगुली में प्यार नाम की कोई चीज़ शेष नहीं है? क्या इसीलिए वे इतने उदासीन हैं? ऐसा कहना होगा ग़लत होगा। अरुण गांगुली के सीने में वह प्यार बहुत मात्रा में है। शादी के बाद के अध्याय की बासंती को वे नहीं जानते। पत्नी के तौर पर उस बासंती के साथ उनका पैबंद सा रिश्ता है। उस टूटे रिश्ते के बारे में वे तनिक भी सिर नही खपाते। पूर्णत: उदासीन हैं। लेकिन शादी से पहले वाली बासंती? वही युवती तो अरुण गांगुली के दिल की साम्राज्ञी बनी हुई है। हर रात वे उस युवती के साथ जी भर कर बातें करते हैं। कुमारी बासंती की स्पर्श करते हैं। उसके बालों की, शरीर की महक यहाँ तक कि पसीने की महक को भी सीने में भर कर बार-बार पहुंच जाते हैं होटल बरेली क्लब के कमरे में। दिन था विजय दशमी यानी दशहरे का। उस दिन दोनों के मिलकर एक हो जाने का वह घनिष्ट दृश्य ही अरुण गांगुली जी भर कर देखते हैं, चित्रित करते हैं और फिर शुरू से उस आवर्त में वे मन ही मन खोए रहते हैं। यह बासंती हर रात उनके सीने पर लेटी रहती है। अरुण गांगुली जी भर कर बासंती चटर्जी को स्पर्श करते हैं, बासंती गांगुली को नहीं। उनके लिए बासंती गांगुली की कोई भूमिका नहीं। इसी कारण अरुण गांगुली ने अपनी पत्नी को कभी छूकर नहीं देखा, स्नेह का हाथ बढ़ा कभी भूल कर भी स्पर्श नहीं किया।
                                                    .....जारी।

बांग्ला से अनुवाद – नीलम अंशु

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,
राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन,
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ से प्रकाशित (2009)।



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