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सोमवार, जुलाई 04, 2011

यादों के आईने में - अमृता प्रीतम ।


पंजाबी के जाने-माने लेखक बलवंत गार्गी ने अपने दोस्तों पर बहुत से खूबसूरत रेखा चित्र लिखे हैं। प्रस्तुत है अमृता प्रीतम पर लिखा उनका रेखा चित्र, पुस्तक निम्म दे पत्ते से साभार। आज ये दोनों ही लेखक हमारे बीच नहीं रहे।

       

 (मैंने कहा, ‘तुम्हें आप कह कर संबोधित करना बहुत पराया सा लगता है। मैं कौन सा कोई पब्लिशर हूँ जो ‘आप-आप’ कह्कर पुकारूं। मेरा नाता तो एक साथी लेखक का है। और, यह् सांझेदारी बहुत गहरी और विशाल होती है। मैं इस दोस्ती में ‘आप’ की पराई दीवारें नहीं खड़ी करना चाह्ता। यदि मैं ‘आप’ कहूँ तो ऐसा लगेगा जैसे मैं झूठ बोल रहा होऊं। लेखक के रिश्ते का अपना ही स्तर है, अपनी ही बिरादरी है, जो अलौकिक और आत्मिक है। मैं उसे ‘आप’ शब्द से अपवित्र नहीं करना चाह्ता। मैं मुल्क़ राज आनंद, कृष्ण चंदर, मंटो, प्रोफेसर मोहन सिंह और बलराज साहनी को ‘तुम’ कह्कर ही पुकारता हूँ। यदि कहो तो आगे से तुम्हें ‘आप’ कहा करूं।’
उसने कहा, ‘आप कहें तो अच्छा रहेगा। कम-से-कम लोगों के सामने ज़रूर कहें’।
मैंने बात मान ली। रास्ते में एक सज्जन मिल गए। मैं अमृता को ‘आप’ कह कर संबोधित करता रहा। ‘आप-आप’ कह्ते हुए मेरे दिमाग पर बोझ सा पड़ा था। जब वह लेखक चला गया तो मैंने कहा, ‘अब तो मैं तुम्हें ‘तुम’ कह सकता हूँ?’
‘हाँ।’ उसने उत्तर दिया।
और उस दिन कॉफी पीते-पीते मैंने उसे लगभग सत्तर बार ‘तुम’ कह कर उस ‘आप’ की कसर पूरी कर दी।)

.........आगे पढ़ें-




        उन दिनों अमृता प्रीतम अमृत कौर हुआ करती थीं।
        1943 में फाल्गुन के सालाना मेले के मौके पर मैं प्रीतनगर गया हुआ था। लंगर के बाहर नवतेज मिला तो उसने यह् ख़बर सुनाई :
              ‘इस बार कवि दरबार अच्छा रहेगा, अमृत कौर भी आई हुई है।’
              ‘अमृत कौर कौन?’  मैंने पूछा।
              ‘बहुत सुंदर लड़की है, और बहुत बढ़िया कविता लिखती है।’  नवतेज ने मोटे शीशों वाले चशमे में से ऑंखें झपका कर कहा।
              ‘सुंदर लड़कियां सुंदर कविताएं कम ही लिखती हैं।’ मैंने अपनी शंका व्यक्त की।
        नवतेज बोला, ‘पर अमृता तो कमाल है। इस वक्त दार जी के पास बैठी है। अभी  इधर आएगी तो तुम से मिलवाउंगा। प्रीतलड़ी में उसकी कविताएं अक्सर छपती रह्ती  हैं। जज़्बों से भीगी, प्यार से सराबोर  कविताएं। खुद भी बहुत सुंदर है।’
        अमृता मिली। उसने आँखों में काजल लगा रखा था, जिसके डोरे कानों तक जाते थे।  पतले होंठ। मंझोला कद। उसके चेहरे पर एक सजग नारी का नखरा था जिसे लोगों  ने सुंदर, सुंदर कह्कर सर चढ़ा रखा हो।
        मैंने कहा, ‘भई नवतेज मुझे तो यह लड़की कोई ख़ास सुंदर नहीं लगी।’
              ‘क्यों ?’
       ‘बहुत आम सी है।’

        शाम को कवि सम्मेलन था। बहुत से लोगों ने अपनी-अपनी कविताएं पढ़ीं। अमृता ने बंगाल के अकाल पर एक नज़्म पढ़ी, काफी कुछ फालतू सा।
        उसने बड़ी अदा से वह कविता जो छंदरहित थी, सुनाई।
        लोगों ने तालियां बजाईं। नवतेज मेरे पास ही बैठा था। मैंने उसकी तरफ देखा और  कहा, ‘बड़ा बनावटीपन है इस कविता में। मुझे तो बिलकुल भी अच्छी नहीं लगी।’
        नवतेज बोला, ‘बंगाल के महा अकाल से संबंधित है।’
        मैंने कहा, ‘महा अकाल के विषय में लिखने से कोई कविता महा कविता नहीं हो जाती।’
       ‘मुझे तो यह बहुत पराई-पराई और फालतू-फालतू सी लगी। दिल पर इसने कोई  खरोंच नहीं डाली।’
        प्रीतनगर में  जिसे भी देखो, अमृता के ही गुण गा रहा था। जैसे चाय के प्याले में कोई गुड़ की भेली घोल दे, ऐसी ही तारीफ थी। बल्कि मुझे इससे कुछ चिढ़ सी हो गई।
        अगले दिन अमृता ने अपनी किताब ‘बद्दलां दे पल्ले विच’ मुझे दिखाई।
        एक-एक पृष्ठ पर चार पंक्तियां। युद्ध का ज़माना था। क़ाग़ज़ का अभाव था। दो गुना, तीन गुना पैसे देकर भी नहीं मिलता था। मोटे एंटिक काग़ज़ का प्रयोग कर आगे-पीछे काफ़ी हाशिया छोड़कर उसकी कविताओं की यह किताब तैयार की गई थी।
        मैंने पृष्ठ पलटते हुए कहा, ‘काफ़ी कुछ फालतू!’
        उसके माथे पर त्योरी सी खिंच गई और काजल के डोरे और भी बहुत गहरे हो गए।
               ‘कवर सुंदर है, काग़ज़ बढ़िया है, पर कविताएं - बहुत सी का वज़न ग़लत है।’  मैंने   बेह्द शुष्क से लह्ज़े में कहा।
       ‘क्या आप कविताएं लिखते हैं?’ उसने ताना दिया।
               ‘नहीं, परखता हूँ।’
               ‘प्रीतलड़ी में तो कभी किसी ने इनके वज़न की ख़ामी नहीं निकाली।’
         मैंने उत्तर दिया - ‘प्रीतलड़ी के कर्ता-धर्ताओं को कविता के पैमाने की कम ही    समझ है।’
       ‘मैंने नवतेज से बात की है। उसे कविता के ख़याल की परख है, पर सौंदर्य की नहीं। और ख़याल अपने आप में कितना ही महान क्यों न हो, सौंदर्य के बिना साकार नहीं हो सकता। जिस कविता का वज़न ग़लत हो वह उस घड़ी की भांति है जो ग़लत वक्त देती हो। घड़ी है, सूईयां हैं, चाबी है, यह् टिक-टिक भी करती है, परंतु जब वक्त ही ग़लत बताए तो ऐसी घड़ी का क्या फ़ायदा?’
               ‘मैं अपनी कविता को परंपरागत वज़न और छंदों के अनुसार नहीं ढालती। मैं नए छंदों में प्रयोग कर रही हूँ।’
               ‘पहले आप पुराने अलंकारों और छंदों को ग्रहण करें। जो पुराने छंदों पर हावी नहीं, वह नए प्रयोग भी नहीं कर सकता।’
               ‘क्यों, मेरी कविता नए विचारों को, नए जोश को प्रकट करती हैं, इस लिए इनकी  चाल तथा नक्श अलग प्रकार के होंगे।’
               ‘आप बिलकुल अलग वज़न चुनती हैं, पर सिर्फ़ अलग वज़न चुनने से ही कविता में  वह बात नहीं आ सकती, जो आप सोचती हैं, आपके पैमाने में कच्चापन है, जैसा  कच्चे बर्तन में होता है। ज़रा सा टंकार कर देखने पर इसमें टंकार पैदा नहीं होती।  यदि मैं कुम्हारिन की यह् तुलना जारी रखूं तो इस प्रकार कहूंगा कि आपने चाक पर  बैठकर संयम नहीं रखा। इसी कारण आपकी झज्झरों, सुराहियों के किनारे टेढ़े-मेढ़े है।  इनमें एक निपुण कुम्हारिन की उंगलियों का स्पर्श नहीं है। आपकी कविता के शब्द  एक-दूसरे से टकरा कर घर्षण पैदा नहीं करते, उनमें से चिंगारियां नहीं निकलतीं।’
       उसने गरूर से कहा, ‘चिंगारियां तो निकलती हैं, परंतु मह्सूस करने की बात है।’
       मैंने व्यंग्य से कहा, ‘जी हां, मह्सूस करने की।’
       उसने फिर सर उठाया, ‘आप कभी कविता मत लिखिएगा, वर्ना आपकी कविता की चिंगारियां लोगों को जला देंगी।’
       जब नवतेज आया तो हमारी बातों से चिंगारियां फूट रही थीं। वह अपनी कविता के विषय में जितनी सफाई देती, मैं उतना ही ज्यादा तेज वार करता।
        वे दोनों खाना खाने चले गए। मैं बाहर बाग में टहलता रहा।

       उन दिनों अमृता ज़्यादातर प्यार, पीड़ा, बादल, चांद, रात, अंधेरे और पौ फटने के गीत गाया करती थी। अम्मड़ी दा वेहड़ा, त्रिंझण, धुआँ, बुत्तघाड़ा अच्छी कविताएं थीं। लोकगीतों के आधार पर लिखी हुईं। कुछ चीज़ों में आगे आने वाली कविता का आभास मिलता था। परंतु वह कविता के सौंदर्य तथा छंदों के नाजुक मिज़ाज से अनभिज्ञ थी।  इसी कारण कविता में झटके लगते थे। बहुत से दोस्तों, स्नेहियों का ध्यान इन त्रुटियों की तरफ नहीं था।  बुरी कविता में कोई सुंदर छंद आ जाए तो वह चमकता है, अच्छी कविता में ख़राब छंद चुभता है। मैंने अमृता के साथ इसी चुभन की कसक निकाली।
       यह मेरी पहली मुलाक़ात थी। इसके बाद काफ़ी मुद्दत तक मैं अमृता से नहीं मिला।
       मैंने लाहौर रेडियो स्टेशन पर नौकरी कर ली। वहाँ दुग्गल ने बताया, ‘पहले कभी-कभी अमृता प्रोग्राम देने आती थी, पर अब उसने आने से इन्कार कर दिया है।’
              क्यों?
              ‘पता नहीं।’
       एक दिन साह्त्यिकारों की बैठक थी। हमने अमृता को आमंत्रण भेजा। वह न आई। फिर एक बैठक मेरे घर पर हुई। उसने कहलवा भेजा, ‘कोशिश करूंगी।’
       शाम को टेनिस खेलकर लौटते हुए साईकिल पर वह मेरे घर बताने आई कि कल वह बैठक में शामिल नहीं हो सकेगी। उसे ज़रूरी काम है। मैंने उसे बैठने को कहा। वह अपरिचितों की तरह् बैठ गई। नौकर चाय लाया।
              ‘चाय लेंगी?’
              ‘चाय तो कम ही पीती हूँ।’
              ‘आज एक घूंट पी लीजिए।’
       मैंने केतली से प्याले में चाय उड़ेली। अच्छा बताईए,  ‘आप बैठक में क्यों नहीं आ रही हैं?’
              ‘मैं बहुत सी बैठकों में जाना पसंद नहीं करती।’
              ‘सुना है, पहले आप रेडियो पर प्रोग्राम दिया करती थीं।’
              ‘हाँ, मैंने सितार वादन के कुछ प्रोग्राम किए हैं पर अब मुझे रे     डियो अच्छा नहीं लगता।’
              ‘रेडियो या रेडियो के लोग?’
              ‘दोनों। एक महिला के लिए घर और समाज में कुछ ऐसी मजबूरियां होती हैं कि वह ऐसे बेतहाशा खुले माहौल को पसंद नहीं कर सकती। लोग पान खा रहे हैं - सिगरेट के धुएं छोड़ रहे हैं। चाय की प्यालियां डकार रहे हैं – हा-हा-हू-हू का शोर मच रहा है। मुझे इस तरह पुरुषों में बैठकर काम करना अच्छा नहीं लगता।  इसी लिए मैंने रेडियो स्टेशन जाना छोड़ दिया।’
              ‘यही वजह है या और भी?’
              ‘और भी होंगी। शायद कोई और ही कारण हो और मैंने आपको बहलाने के लिए ये कारण गढ़ लिए हों, क्या पता। पर रेडियो स्टेशन जाना पसंद नहीं करती।’
       बात समाप्त हो गई।
              ‘क्या लिख रहीं हैं आजकल ? कोई कविता सुनाईए।’
       ‘किसी दिन हमारे घर आईए तो सुनाऊंगी। मैं कविता सुनाने लोगों के पास नहीं जाती।’
              ‘ठीक है आऊंगा किसी दिन।’
       कुछ दिनों बाद मैं अमृता के घर गया। उसने गुमटी बाज़ार वाला मकान बदल कर अनारकली में एक फ्लैट ले लिया था। फ्लैट में चार-पांच कमरे थे, जालीदार पर्दे, तस्वीरें, सोफे। उसने तथा उस की ननद ने मेरा स्वागत किया। तकल्लुफ से कुर्सी पर बिठाया।
       हमने चाय पी। कविता कोई नहीं पढ़ी। कविता के बारे में बातें कीं। मैंने अपनी ज़द्दो-ज़ह्द की बात चलाई और अमृता ने अपनी जद्दो-ज़हद की बात छेड़ी।
              ‘आप कैसी जद्दो-ज़ह्द कर रही हैं?’ मैंने हैरानी से पूछा।
       उन दिनों मेरे लिए जद्दो-ज़हद का अर्थ केवल आर्थिक जद्दो-ज़ह्द था। मैंने लाहौर में तीन साल बेकार रह कर जगह-जगह टयूशनें कर के आख़िर रेडियो स्टेशन पर सौ रुपए की नौकरी ढूंढ ली थी। अमृता कैसा संघर्ष कर रही थी?
       उसने कुछ सोचकर कहा, ‘आर्थिक जद्दो-ज़हद।’
              ‘यदि आपको भी आर्थिक परेशानी है तो एक आम आदमी की परेशानी क्या है?’ मैंने परेशान होकर कहा।
        ‘आर्थिक परेशानी, सामाजिक, आत्मिक सभी प्रकार की परेशानियां हैं मुझे। परेशानियों के अंबार उड़ते हैं मेरे इर्द-गिर्द। जितने मिलने वाले आते है, दो-चार के सिवा वे भी परेशानियों के पिटारे होते हैं।’
       मैंने अपनी तरफ ताका।
              ‘आप नहीं।’  उसने कहा।
              ‘मैं पास बैठा हूँ शायद इसलिए मेरा लिहाज़ कर रही हैं?’
              ‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। मैंने यूं ही कह दिया। वास्तव में आजकल कुछ चिढ़ी-चिढ़ी सी रह्ती हूँ। इस लिए हर वह जो चीज़ सामने आती है, अक्सर उसे अपने गुस्से का निशाना बनाने को जी चाह्ता है। वास्तव में लक्ष्य से उकता जाने वाले का यही हाल होता है। मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं लक्ष्य से उकता गई हूँ। निशाना, मंज़िल, आरंभ, अंत- इनके बारे मैंने इतना कभी नहीं सोचा जितना आजकल सोच रही हूँ। ज़्यादा सोचने के कारण बीमार हूँ।’
               ‘आप बीमार रही हैं?’
       ‘हाँ, अब भी बीमार हूँ। हर चीज़ खोखली सी लगती है। कई बार ऐसा लगता है कि कविता लिखना भी बस यूं ही मन बहलाने समान है। क्या रखा है इसमें। मैं अपनी पिछली कविता पर नज़र दौड़ाती हूँ - छह किताबें! ऊंह! मुझे इन पर कोई ख़ास गर्व नहीं। पता नहीं कैसे लिख डालीं इतनी कविताएं। अब एक भी कविता नहीं सूझती। मानो मैं थम कर सोच-विचार में डूब गई होऊँ। इसी तरह मेरी कविता भी थम गई है। जिंदगी कहीं रुकती नहीं, थमती नहीं, दौड़ती रह्ती है। मैं थम गई हूँ इसी लिए कुछ थकी-टूटी सी लगती हूँ - माफ कीजिएगा, मैं भी कैसी बातें ले बैठी।’
       मैंने देखा, अमृता में थकान थी। उसके चेहरे पर पीलापन छाया हुआ था। उसका चेहरा खिंचा सा था जैसे तनावों से उसका सारा वजूद कस दिया गया हो। उसके चेहरे पर से फालतू माँस छंट गया था। चिंतन में से फिजूल बातें छंट गई थीं। फिजूल मुलाक़ातों और फिजूल सामाजिक फर्जों की परतें उतर गईं थीं। काफ़ी कुछ फिजूल सा झर गया था। मैं उसके मन को देख सकता था जो सोने की डली की भाँति सोनार की भट्ठी में आग के नीचे दहक रहा था।
       ज़िंदगी के बारे, समाज के बारे, कलाकार की होनी के विषय में बातें होती रहीं। बीच-बीच में इधर-उधर की बात भी टपक पड़ती। चाय बनाते हुए उसने पूछा, ‘आपको प्याज के पकौड़े अच्छे लगते हैं या मिर्च के?’
              ‘मिर्च के।’
              ‘पुरुष तो मिर्चों से कतराते हैं। आप मिर्चें कैसे खा लेते हैं?’
             ‘छुटपन से मैंने मां की कड़वी गालियां खाईं हैं। ये मिर्चें उनसे ज़्यादा तीखी नहीं। भला आपको मिर्चें क्यों अच्छी लगती हैं?’
              ‘इसलिए कि मैंने इतनी मीठी चीज़ें खाई हैं कि अब कड़वी चीज़ अच्छी लगती है। यही हाल प्रशंसा का है। मुझे ज़्यादा प्रशंसा अच्छी नहीं लगती। एक-दूसरे की प्रशंसा से इन्सान की बात का स्तर एक ख़ास सतह से ऊपर नहीं उठता। मुहब्बत और नफरत जज़्बों के दो शिखर, दो गहराईयों - ज़िंदगी के सीधे तथा उल्टे दोनों पक्षों को दर्शाते हैं।’
              ‘आप मुहब्बत में यकीन करते हैं या नफ़रत में?’
           ‘नफ़रत भी इतनी नफ़रत योग्य चीज़ नहीं। मुहब्बत का उलटा पक्ष ही तो है। फुलकारी का सीधा पक्ष मुहब्बत और उलटा पक्ष जहाँ आपको टांके तथा सिलाई नज़र आए, नफ़रत है। कई लड़कियां फुलकारी को सीधी तरफ से काढ़ती हैं और कुछ उलटी तरफ से।’
              ‘आप कविता की फुलकारी को किस तरफ से काढ़ती हैं?’
              ‘आजकल मैं इस फुलकारी को उलटी तरफ से काढ़ रही हूँ, नफ़रत की सूई से।’
       उसके चेहरे पर खिंचाव और भी पसर गया तथा उसकी नाक सूई की भांति तीखी-तीखी सी लगने लगी।
        हम दो घंटे बैठे रहे। चाय ठंडी हो गई। उसने दुऱारा चाय मंगवाई।
       मैं चाय के लिए कभी इन्कार नहीं करता। मेरे कारण उसे भी कई प्याले पीने पड़े।
       मैंने कहा, ‘आज ऐबट रोड पर छुरेबाजी की दो वारदातें हुईं हैं। दो आदमी मारे गए। कई दोस्त लाहौर छोड़ने की बात सोच रहे हैं। फ़सादों में आप कहाँ जाएंगी?’
              ‘कहीं भी नही।’
              ‘कहाँ रहेंगी?’
              ‘लाहौर में ही। फ़साद तो कुछ लोगों का उन्माद है। नफ़रत का फोड़ा फूट गया है, गंदा खून बह रहा है। इसके बाद सब ठीक हो जाएगा। मैं लाहौर नही छोड़ूंगीं। लाहौर से मेरी यादें जुड़ी हुई हैं। यहाँ की गलियों के मोड़, अनारकली, रावी, लॉरेंस बाग – हर चीज़ से मुझे प्यार है। लाहौर छोड़कर मैं नहीं जाऊंगी।’
       शाम गहरी हो गई थी। अनारकली में बिजली के बल्ब जगमगा उठे। मैं चलने के लिए उठ खड़ा हुआ।
              ‘अच्छा फिर कभी मिलेंगे तो कविता सुनाऊंगी, इस वक्त मेरे पास कोई अच्छी कविता नहीं है।’ उसने अलविदा कहा।
       दंगे-फ़साद बढ़ते गए। लोग लाहौर छोड़कर भागने लगे। 12 अगस्त को मैं भी लाहौर से चला आया। बठिंडा पहुंचा तो वहां भी दंगों की आग धधक रही थी। जब यह आग थोड़ी धीमी हुई तो मैं दिल्ली आ गया। रेडियो पर काम करने लगा।

       कुछ महीनों बाद मुझे इत्तेफाक से देहरादून जाने का मौक़ा मिला। मिलिटरी में मेरे एक मित्र थे, जिन्हें पंजाबी साह्त्यि से प्यार था। मैं उनके यहाँ ठहरा हुआ था। देहरादून के इर्द-गिर्द बागों तथा खेतों का विशाल झुरमुट है, साथ लगी हुई पहाड़ियां। उन्होंने कहा, आज पिकनिक पर चलेंगें।
       मुझे यह प्रस्ताव पसंद आया।
       उन्होंने कहा, ‘अमृता प्रीतम यहीं रह रही हैं। यदि उन्हें बुला लिया जाए तो कविता का मज़ा ही आ जाए।’
              ‘वे यहाँ हैं?’
              ‘हाँ।’
              ‘आप उनका घर जानते हैं?’
              ‘हाँ’
              ‘पहले वहीं चलिए। मैं उनसे मिलना चाह्ता हूँ।’
       उन्होंने जीप अमृता के घर की तरफ मोड़ दी। दूर एक गैर-आबाद इलाके में एक छोटा सा पक्का दो मंज़िला मकान था। नीचे कोई दुकानदार रह्ता था।
       मैंने उससे पूछा, ‘यहाँ अमृता प्रीतम रह्ती है?’
              ‘आप किसे पूछते हैं साहब?’  उसने कहा।
              ‘अमृता प्रीतम - वे लेखिका हैं, कवि.....’
              ‘यहाँ तो एक सरदार साहब रह्ते हैं,’ उसने शुष्क से लह्ज़े में बात समाप्त की।
       मैंने कहा - ‘ठीक!’
       ऊपर सीढ़ीयां चढ़कर दरवाज़ा खटखटाया।
       अमृता ने दरवाज़ा खोला। सर पर दुपट्टा नहीं था। हाथ दाल से सने थे।
       शायद वह उड़द की दाल धो रही थी।
       मुझे देख वह अवाक हो गई, ‘आईए।’
       मैंने कहा - ‘कल ही आया था। पता चला आप यहाँ हैं, अत: मिलने चला आया। आज यहाँ एक पिकनिक का प्रोग्राम है। शायद कविता का प्रोग्राम भी हो। चल सकेंगी?’
       इतने में एक नन्हा सा बच्चा आकर उसकी टांगों से लिपट गया। अमृता ने हाथ झाड़े, जिन पर अब तक धुली दाल के दाने जमे हेए थे और बच्चे को गोद में लेते हुए कहा, मेरी कविता तो यही है। यहाँ घर पर कवि दरबार लगा रह्ता है। मैं नहीं जा सकूंगी, बेशक जी तो बहुत चाह्ता है कि चलूं और दिल्ली वासी दोस्तों के बारे में पूछूं तथा लाहौर की कुछ बातें करूं।’
              ‘आप लाहौर से कब आईं?’
              ‘जब आप।’
       मुझे बैठने के लिए पीढ़ी देकर उसने बच्चे को गोद में लिटाया और दाल धोने लगी।
             ‘मेरे दोस्त मेरा इंतज़ार कर रहे हैं। मैं चलता हूँ।’
              ‘यदि फुर्सत मिले तो आईएगा।’
              ‘अच्छा।’
              ‘कब आएंगे?’
              ‘कल।’ और मैं चला आया।
       अगले दिन मैं उससे मिलने गया। उसने लाहौर के सभी दोस्तों के बारे पूछा।  कौन कहाँ है? अचला सचदेव रेडियो स्टेशन पर काम करती है। सरदार गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी मेहरौली आ गए हैं। हरचरण सिंह ने पंजाब कॉलेज खोलकर लड़कों को ज्ञानी पढ़ाने का काम शुरू कर दिया है। सभी दिल्ली में बस गए हैं या समझिए कि दिल्ली इनसे बस गई है। प्रिंसीपल तेजा सिंह बंबई में हैं। सुरेन्द्र कौर की शादी हो गई है। जीवन सिंह जौली, लाहौर बुक शॉप को लुधियाना ले आया है।
       वह हंसी, ‘लाहौर ऱुक शॉप! यानी पहले तो उसने लाहौर को बुक शॉप में बंद किया। फिर इसे चौंक घंटा घर में ले आया। शहर कौन से पेड़-पौधे हैं जिन्हें इस धरती से उखाड़कर वहाँ लगा दिया जाए। शहर और दरिया उखाड़े नहीं जा सकते। बस हम इन शहरों की समृतियों को उठाए फिरते हैं। यहाँ भी दो रिफ्यूजियों ने रावलपिंडी टेलरिंग हाउस तथा पेशावर होटल खोल लिए हैं। अच्छा, आप आजकल दिल्ली में हैं ?’
              ‘हाँ। आप यहाँ एक अलग सी जगह् पर आकर क्यों रह रही हैं, दिल्ली क्यों नहीं आ जाती ?’
       उसके होठों पर एक उदास सी मुस्कान खेल गई - ‘क्यों नहीं आते! हा हा !’
              ‘क्यों नहीं?’
              ‘कौन सा पक्षियों की भांति उड़कर आ सकते हैं। इसके लिए एक वस्तु जिसे घर कह्ते हैं, उसकी ज़रूरत है। घर और फिर रोज़गार। आप अपना घर हमें दे दीजिए, हम आ जाएंगे। साथ ही कोई नौकरी भी।’
              ‘आपको नौकरी की क्या ज़रूरत है?’
              ‘क्यों नहीं?’
              ‘कहाँ?’
              ‘मुझे तो रेडियो का ही र्तजुबा है या कविता लिखने का। कविता को कोई पूछता नहीं। यहाँ देहरादून में लीची बिकती है या टींडे - कविता नहीं बिकती।’
              ‘आजकल क्या लिख रही हैं?’
              ‘ढेर सारी कविताएं। अकेली रह्ती हूँ। सरदार जी काम पर चले जाते हैं। बाद में घर का सारा काम-काज करती हूँ जब बच्चे सो जाते हैं तो मैं उनके चेहरों की तरफ निहारती रह्ती हूँ, सपने बुनती रह्ती हूँ और कविता लिखती हूँ - जैसे कोई फुलकारी काढ़ रहा हो। मेरे ख्याल से हमारे गांवों की लड़कियां फुलकारियां काढ़ती हुई इसी तरह सपने देखती होंगी और गीत गाया करती होंगी।’
              ‘आजकल किस सूई से फुलकारी काढ़ रही हैं?’
              ‘नफ़रत से नहीं।  नफ़रत मुझे अन्य चीज़ों से है।’
              ‘मसलन?’
              ‘एक तो मुझे नफ़रत से नफ़रत है, दूसरे -’
              ‘दूसरे?’
              ‘फ़सादों से। फ़सादों ने मेरे दिल पर गहरा प्रभाव डाला है - जैसे किसी तीखे चाकू से मेरे दिल पर लकीर खींच दी हो, लहू भरी लकीर।’
              ‘कुछ सुनाएंगी?’
        उसने चूल्हे पर पानी की केतली रख दी और ट्रंक से काग़जों का पुलिंदा निकाला।
              ‘ये सब कविताएं हैं?’
              ‘हाँ।’ वह पृष्ठ पलटने लगी और पृष्ठों को जोड़कर पढ़ना शुरू कर दिया :
                 अज्ज आखां वारिस शाह नूं                     
कितों कबरां विच्चों बोल
    ते अज्ज किताब-ए इश्क दा
   कोई अगला वरका फोल।’

       कविता मिर्ज़े क़ी तर्ज़ पर थी। लंबी तान थी जैसे कोई ज़ोर-ज़ोर से ललकार भरी मिन्नतें कर रहा हो :
           गलियों टुट्टे गीत फिर ......2
     तक्कलियों टुट्टी तंद
        त्रिंझणों टुटियां सहेलियां
     चरखड़े घूकर बंद।’

       वह कविता पढ़ रही थी, उसके चेहरे पर कविता में उतरते चित्रों की परछाईयां थीं। एक कविता के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी। उसने नफ़रत का गीत सुनाया। प्रीत के कोमल चेहरे पर नफ़रत के दाग थे। मज़हब के माथे से कौन धोएगा खून?

       इससे पहले मैंने ‘बदलां दे पल्ले विच्च’ तथा ‘संझ दी लाली विच्च’ की कुछ कविताओं को सराहा था। अम्मड़ी दा वेह्ड़ा, त्रिंझण, हरीयां गोलां, धुआं में नई आ रही शायरी की  चिंगारियां फूट रही थीं। पहले की कविताओं का स्तर यह नहीं था, उनमें उसके मन की झांकियां मिलती हैं।
       उसने कविता की कॉपी एक तरफ रखी। चाय की केतली उबल-उबल कर परेशान हो गई थी।
              ‘इसमें कुछ पानी बचा भी है?’  मैंने पूछा।
       उसने ढक्कन उतारा। भाप उड़ रही थी। केतली का आधे से अधिक पानी सूख गया था।
              ‘फिर?’
              ‘अब चाय की क्या ज़रूरत है?’ मैंने कहा।
              ‘मसखरी कर रहे हैं? मैं चाय बनाती हूँ।’ और उसने फिर केतली चढ़ा दी।
              ‘आप दिल्ली क्यों नहीं आती?’ मैंने पूछा।
              ‘कहा तो यदि वहाँ कोई जगह हो तो ज़रूर आ जाऊंगी।’

       कुछ महीनों बाद अमृता दिल्ली आ गई। मुझे पता चला कि उसके पति सरदार प्रीतम सिंह को सदर बाज़ार में दुकान मिल गई थी। अमृता ने रेडियो में पंजाबी प्रोग्राम ले लिया।उसने पंजाबी प्रोग्राम में गीतों, टप्पे, फीचर कविता और अन्य चीजों को सुंदर बनाया। उसने ढेर सारे गीत लिखे हैं। कविताएं, कहानियां, उपन्यास।

        फ़सादों के दौरान लाहौर में उसका घर लूटा गया। उसकी किताबें, ह्स्तलेख, मसौदे तथा अन्य कई बहुमूल्य वस्तुएं। वहीं छूट गईं, पर वह लाहौर से ढेर सारा प्यार और दर्द ले आई। बड़े-बड़े ठेकेदारों, दुकानदारों ने दिल्ली आकर मकान और प्लॉट अपने नाम अलॉट करवाए। अमृता ने केवल प्यार और दर्द को अपने नाम अलॉट किया।
              ‘कणकां दा गीत’ मैंने पंजाब के कल्चरल स्कवॉयड को मंचित करते देखा है। ‘आखां वारिस शाह नूं’ सीमा लांघकर लाहौर पहुंचा और आज चेकस्लोवेकिया, रूस और अन्य देशों में जा पहुंचा है। यह गीत बिना पासपोर्ट, वीसे के बगैर जगह-जगह घूमा-फिरा है और पंजाब की आवाज़ बन गया है।

        सावन का महीना था। बादलों के सुरमई आँचल नीचे-नीचे झूल रहे थे मानो किसी बूढ़े आकाश की पगड़ी बिखर गई हो। ऐसा लग रहा था मानों अभी ही बारिश शुरू हो जाएगी। मैं अमृता के घर बैठा था। उसने कहा- ‘कालीदास ने ठीक ही बादल को दूत बनाकर भेजा था। मुहब्बत का पैगाम सरकारी डाकिए नहीं ले जा सकते। पहले के समय में यह काम कबूतर करते थे, और उससे भी पहले बादल। बादल अब भी पैगाम लेकर जा सकते हैं। यदि कोई उन्हें अपना पैगाम दे सके। मैं अपना पैगाम इन बादलों को ही देना चाह्ती हूँ। चोर की मां की भांति इनका हृदय बहुत विशाल होता है। ये महबूब का सारा भेद छुपा कर ले आते हैं तथा ले जाते हैं।’
        झट से मैंने उससे सवाल किया, ‘तुम किससे मुहब्बत करती हो?’
              ‘खुद से।’
              ‘झूठ।’
       वह कुछ देर ख़ामोश रही। फ़र्श पर अपने पैर का अंगूठा खुरचती रही। कुछ देर बाद सर उठाया और हंसने लगी। फिर एक दम गंभीर हो गई और उसकी बड़ी चमकदार आँखें गहरी हो गईं।
              ‘मेरा प्यार दिल से उफनकर बाहर नहीं गिरता। यह स्थिर है शांत, खामोश, पहाड़ियों से ढकी हुई किसी गहरी झील की भांति। मर्दों का प्यार मधुमक्खियों की हांडी के उछाल की भांति उफन पड़ता है। मैं ऐसी मुहब्बत को बहुत अच्छा नहीं समझती। मर्द अपनी मुहब्बत की शेखी बघारता है। स्त्री उसे छुपाती है। मर्द इसे चौराहे पर रखकर लोगों को दिखाकर खुश होता है, स्त्री अपने ऑंचल में संभाल कर रखती है और रात के अंधेरे में जब कोई नहीं होता तब वह इसे निहारती है। इसके साथ खेलती है, जैसे सांप आधी रात को मणि के साथ खेलता है - इसकी रोशनी में मस्त होकर।  यदि कोई आ जाए तो झट से इसे मुंह में डालकर खामोश हो जाती है’।
        और वह खामोश हो गई।

       अमृता ने मुहब्बत की कविता लिखी है, गोर्की की उस लड़की की भांति जिसे एक अलौकिक अद्भुत प्रेमी की ज़रूरत थी। और जो दोनों पक्षों की तरफ से खुद ही ख़त  लिखा करती थी, खुद ही पोस्ट करके खुद ही पढ़ लेती और खुश हो जाती थी। अमृता की यह मुहब्बत मुझे उसकी तरह की प्रतीत हुई। परंतु नहीं। अमृता की मुहब्बत में गोर्की की उस मुहब्बत की भूखी लड़की की भां ति अनादिकाल की लालसा थी, साथ ही चतुर्मास में भरे हुए सरोवर की मस्ती और परिपूर्णता। इस मुहब्बती जज़्बे का इष्टदेव एक व्यक्ति था, कोई ख़याली देवता नहीं। एक इन्सान।

       एक दिन जब मैं उसे मिलने गया तो एक और सज्जन भी बैठे थे। पाकिस्तान की शायरी के विषय में बातें होती रहीं। एक पंजाबी कवि सम्मेलन ऐसा भी होना चाहिए जो सही अर्थों में पंजाबी हो। सीमा का कोई बंधन न हो। दोनों तरफ के कवि एक मंच से मुखातिब हों। अमृता ने कहा, ‘लाहौर देखे मुद्दत हो गई है।’
              मैंने पूछा, ‘अमृता तुम लाहौर क्यों नहीं जाती?’
              ‘कोई हीला-वसीला हो तो जाएं भी, कोई मुशायरा हो तो ज़रूर जाऊं।’
        मुझे भूख लगी थी, मैंने पूछा, ‘अमृता तुमने खाना खा लिया?’
              ‘खा तो लिया है, परंतु आपके लिए बना देती हूँ।’
       उसने परांठे और चाय बना दी। हम चार बजे तक बातें करते रहे। फिर उसे रेडियो  स्टेशन जाना था। इकट्ठे ही हमने बस पकड़ी और नई दिल्ली आ गए।
        अलग होते वक्त उसने कहा, ‘आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।’
              ‘किस बात का?’
              ‘आने के लिए शुक्रिया।’
              ‘शुक्रिया?’
       पांच-छह दिनों के पश्चात् वह सिख पब्लिशिंग हाउस पर मिल गई। हम दोनों ने कुछ किताबें लीं और बाहर निकल आए। बेशक गुलमोहर के वृक्षों पर शोलों जैसे फूल चमक रहे थे परंतु हवा में शाम की थकी-हारी सांस थी। हम दोनों चलते गए।
        मैंने पूछा, ‘कॉफी चलेगी?’
              ‘कॉफी, अच्छा यदि पिला दें।’
              ‘आप क्या पियेंगे?’
       थोड़ी सी बात-चीत के पश्चात् मैंने मह्सूस किया कि वह मुझे आप-आप कह रही है और मैं उसे तुम-तुम।
              ‘क्या बात है अमृता? क्या तुम इस ‘तुम’ शब्द को बुरा मानती हो?’
       उसने कहा, ‘शायद मैं यही बात किसी दिन आपसे कह्ती। अच्छा हुआ आपने खुद ही बात छेड़ दी। उस दिन आपने मुझे लोगों के सामने कई बार तुम कहा। इससे लोगों के दिलों में भ्रम से पैदा हो जाते हैं। आप तो सहज स्वभाव से ही ‘तुम’ कह्ते हैं,  कुछ लोग इसे पता नहीं क्या समझ बैठें?’
        मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा।
            ‘हाँ, किसी को क्यों मौका दूं कि वे मेरे बारे में बातें बनाएं।’ उसने दृढ़ता से कहा।  पहले भी लोग मेरे बारे में तरह-तरह की बातें गढ़ते रह्ते हैं। बहुत बुरा लगता है।’
        मैंने कहा, ‘तुम्हें आप कह कर संबोधित करना बहुत पराया सा लगता है। मैं कौन सा कोई पब्लिशर हूँ जो ‘आप-आप’ कह्कर पुकारूं। मेरा नाता तो एक साथी लेखक का है। और, यह् सांझेदारी बहुत गहरी और विशाल होती है। मैं इस दोस्ती में ‘आप’ की पराई दीवारें नहीं खड़ी करना चाह्ता। यदि मैं ‘आप’ कहूँ तो ऐसा लगेगा जैसे मैं झूठ ऱोल रहा होऊं। लेखक के रिश्ते का अपना ही स्तर है, अपनी ही बिरादरी है, जो अलौकिक और आत्मिक है। मैं उसे ‘आप’ शब्द से अपवित्र नहीं करना चाह्ता। मैं मुल्क़ राज आनंद, कृष्ण चंदर, मंटो, प्रोफेसर मोहन सिंह और बलराज साहनी को ‘तुम’ कह्कर ही पुकारता हूँ। यदि कहो तो आगे से तुम्हें ‘आप’ कहा करूं।’
        उसने कहा, ‘आप कहें तो अच्छा रहेगा। कम-से-कम लोगों के सामने ज़रूर कहें’।
     मैंने बात मान ली। रास्ते में एक सज्जन मिल गए। मैं अमृता को ‘आप’ कह
    कर संबोधित करता रहा। ‘आप-आप’ कह्ते हुए मेरे दिमाग पर बोझ सा पड़ा था।
    जब वह लेखक चला गया तो मैंने कहा, ‘अब तो मैं तुम्हें ‘तुम’ कह सकता हूँ?’
       ‘हाँ।’ उसने उत्तर दिया।
       और उस दिन कॉफी पीते-पीते मैंने उसे लगभग सत्तर बार ‘तुम’ कह कर उस ‘आप’ की कसर पूरी कर दी।
      
      मेरी पंद्रह सालों की अच्छी मित्रता में एक बार अमृता प्रीतम बहुत नाराज़ हुई -
     उस पर लिखे मेरे एक आलेख को लेकर।  यह आलेख साहित्य समाचार के विशेष
      अमृता प्रीतम अंक में छपा था। जीवन सिंह जौली ने छह अंक अमृता प्रीतम पर
      प्रकाशित किए। यह इस बात का प्रमाण है कि अमृता एक मशहूऱ शायरा है। यह
      अंक जिसमें ढेर सारे घटिया विषय छपे थे, उसके नाम की बदौलत बिक गए।
      इनमें कई लेखकों ने जी’ की बेह्द तारीफ की और साहित्यिक नाते से बढ़कर    
      रिश्तेदारी जोड़ने का बहुत प्रयास किया। मेरे आलेख पर इन कुछ सज्जनों ने
      इतना शोर मचाया कि अच्छा-खासा फ़साद खड़ा कर दिया। पंजाबी में शुद्ध
      साहित्यिक लेख या कलमी चित्रों का अभी चलन नहीं हुआ। वोट लेने की भाँति
      ही मतदाता की राजनीतिक दयानतदारी को प्रेरित करते बल्कि नाते-रिश्तेदारी
      का हवाला देकर उससे वोट प्राप्त करते हैं। मेरे लेख ने मेरे और अमृता के बीच
      कुछ समय के लिए फ़िज़ा में धूल बिखेर दी। फिर यह धूल खुद ही बैठ गई         और हम एक दूसरे का सामना फिर उसी अपनत्व भाव से करने लगे।

      दिल्ली में रह्ते हुए हम कम ही मिलते थे - कभी दूसरे महीने या कभी पूरे साल बाद। पर जब भी मिलते, वह मुलाकात बड़ी आत्मीय होती। एक ही मुलाकात हम साहित्य, मौसम, पैरिस, कॉनफ्रेंस, नई टिकटों, नई कहानियों, नई कविताओं, नई सैंडिलों और आसमान के तारों से लेकर हरनाम सिंह शान तक की कर डालते। एक दिन उसने मुझे अपनी ताज़ी कविता सुनाई :

                ‘ जिंद चरखड़ा कित्थे डाहिए
                  रात कुड़ी अज्ज कत्तण आई
                  ओह सुपने जो कल असां
                  पच्छी विच्च रक्खे।
                  अंबर रुख नरेल दा
                  चिट्टा चन्न गरी दा टोटा
                  किस ने खोपा तोड़ेया
                  अज्ज पाणी चक्खे।’
      
       कविता सुनकर मैंने पूछा, ‘तुम्हें नारीयल का ख़याल कहाँ से आया?’
              ‘नारीयल का ख़याल..... ’  वह सोचने लगी।
              ‘भला तुम क्या सोच रही थी जब यह गीत लिखा?’
              ‘मैं उस वक्त बंबई के बारे में सोच रही थी। बंबई याद आ रहा था..... मुझे बंबई अच्छा लगता है।’  
              ‘क्यों?’
              ‘वहाँ मेरे दोस्त हैं....शायद मैंने बंबई के समुद्र के रेतीले तट पर उगे नारीयल के वृक्ष देखे थे और उनमें से झांकता चांद का टुकड़ा। इस प्रकार के अक्स मेरे मन पर चित्रित हो गए थे - उनका ख़याल आ रहा था....’
       मैंने कहा - ‘ठीक, परंतु मुझे इस गीत में एक पुरुष और स्त्री के गहरे प्यार की झलक दिखाई देती है। अंबर पुरुष का प्रतीक है, और धरती स्त्री का। तुमने अंबर को ललकारा है और इसे नारीयल का वृक्ष कहा है। नारीयल का ऊँचा वृक्ष पुरुष का प्रतीक है। तुमने चांदनी और सफेद गरी का उल्लेख किया है जो स्त्री का प्रतीक है। हर त्योहार पर शुभ काम करते वक्त पहले नारीयल तोड़ते हैं और इसकी गरी तथा पानी को चखते हैं - नारीयल का टूटना पुरुष और स्त्री के प्रथम मिलन का प्रतीक है। तुम्हारा गीत स्त्री-पुरुष के गहरे मानसिक, आत्मिक और शारीरिक आनंद का वर्णन करता है।’
       वह सोचने लगी....
       उसने यह सब नहीं सोचा था। उसने सिर्फ जज़्बे को मह्सूस किया था। उसने चेतन मन में बेशक सिर्फ़ बंबई के समुद्र का तट, नारीयल का वृक्ष और चांद था, परंतु उसके अवचेतन मन में एक भरपूर स्त्री और पुरुष के उफनते हुए आवेग थे।
       हम दोनों ख़ामोश हो गए।
              ‘अगली कविता पढ़ो।’ मैंने कहा।
              ‘इसका भावार्थ भी इसी तरह करेंगे?’
              ‘पता नहीं सुनूंगा तो मेरे मन में जो विचार आएगा, कह दूंगा।’
       उसने दूसरी कविता पढ़ी। यह किसी प्रिय के ख़त के ज्वाब में लिखी गई थी।
      
उसके बहुत से गीत दिल का रह्स्य हैं - कभी आह, कभी हंसी, कभी रंज की टीसें और कभी खुशी की किरणें। कभी वह शिकायत करती है, कभी वह गर्व करती है, कभी वह याद करती है, कभी वह सपने लेती ही। ये सब गीत आपबीती है। इसलिए इनमें दर्द भी है और असर भी।
        मैंने कुछ देर रुक कर पूछा, ‘अमृता तुम्हें मुहब्बत ने बहुत दु:ख दिया है?’
               ‘बहुत।’
               ‘बहुत?’
               ‘हां - दु:ख और सुख भी। मुहब्बत का विरह दु:ख है, परंतु इसकी जड़ों में सुख है। इसी तरह सुख की कोख से दु:ख जन्म लेता है। मैं दोनों का मिश्रण कर देती हूँ।  ऐसा लगता है मानों दुपट्टे के दो छोर हों - एक दु:ख और एक सुख - मैंने यह दुपट्टा सर पर ओढ़ लिया है और इसके दोनों छोर अपने दांतों तले दबा लिए हैं।’

      उन दिनों मैंने उसकी एक और कविता उसकी डायरी से पढ़ी।  एक छंद मेरे दिमाग में फंस कर रह गया। यह गीत उसने किसी दोस्त के साथ इंडिया गेट की सैर करते हुए लिखा था और डायरी में नोट कर लिया था। उसके पहले के गीतों में ओस से धुले फूलों, बादलों के आंचल से सांझ की लालिमा का वर्णन था। जऱे की झाग का बयान था, आग का नहीं। उस वक्त वह विह्वल थी और किसी अनजाने प्यार के अनजाने तथा आस्वादित रस का ज़िक्र कर रही थी। ‘लम्मीयां बाटां’ में उसने थकी-टूटी स्त्री का ज़िक्र, मांस की गुड़िया तथा घरेलू ज़िंदगी के चक्र-व्यूह को चित्रित किया - मुहब्बत और जिस्मानी रिश्तों के बारे बताया - परंतु पर्दे की ओट में।

       उसे धीरे-धीरे ढोंग, झूठी शाम, सामीजिक पैगंबरों से चिढ़ होने लगी। समाज क्या है? बहुत से लोगों का बनाया हुआ कानून जिसे वे खुद नहीं मानते, पर अंधाधुंध दूसरों पर लागू करना अपना धर्म समझते हैं सबसे बड़ी वस्तु इन्सानियत है, मुहब्बत है, सच्चाई है।
       उसने अपने दिल की गहराईयों में दृष्टिपात किया। मुलम्मे जैसी झूठी शान उतर गई। एक दम आकाश ऊंचा-ऊंचा प्रतीत होने लगा, धरती चौड़ी-चौड़ी और वृक्षों, पानी तथा सूरज और तारों का नया रूप दृष्टिगोचर होने लगा....
       इसके बाद वह बंबई चली गई और महीनों मुझसे मुलाक़ात न हुई।

       जब दुबारा दिल्ली आई तो वह खोयी-खोयी और उदास थी। मानों कोई चीज़ कहीं छूट गई हो।
       कुछ दिनों पश्चात् वह मुझे मिली। मैंने कहा, ‘आकाश कितना उन्मुक्त है।’
              ‘होगा।’ उसने कहा।
              ‘धूप कितनी गर्म है।’
              ‘होगी।’
              ‘घास कितना हरा है।’
              ‘होगा।’
       कुछ दिन हुए मैं उससे मिलने गया। जब मैं पहुंचा तो वह बिस्तर पर लेटी थी, बाल खुले, चेहरे पर उदास हंसी। आँखों के गिर्द काले स्याह घेरे। फीकी-फीकी छाया ने सारे चेहरे को ढक  रखा था।
              ‘बहुत तकलीफ़ है बलवंत! उसने कहा। गर्दन में, पीठ में, सारे वजूद में। सुना है कल बेगम ज़ैदी हंसती-खेलती चल बसी। उसे हृदय रोग नहीं था। मेरे दिल में कसक सी उठती है, मुझे क्यों कुछ नहीं होता।’
       उसके सामने कुछ काग़ज़ पड़े थे।
              ‘तुम लिखती रही हो? क्या लिखा है?’ मैंने पूछा।
              ‘दो दिनों से इसी तरह पड़ी हूँ। लेटे-लेटे सपने आते हैं। उलझी-उलझी सी झाड़ियां सी और फिर ये खुद-ब-खुद चित्र बन जाते हैं। सपनों में जबान कम होती है, और चित्र ज़्यादा। मैं इन चित्रों को एकत्र कर लेती हूँ... उड़ती हुई तितलियों को जैसे कोई लड़की पकड़ कर आंचल में डाल ले और फिर उनके रंग-बिरंगे पंखों को अपनी कताऱ में सूई से सी ले। कई बार मुझे अपनी ये कविताएं मृत तितलियों की तरह प्रतीत होती है....  कितना कठिन है जीते-जागते विचारों को मृत समझना। मुझे तो यह जुल्म सा प्रतीत होता है।
              ‘तुम बीमारी की हालत में लिखती रही हो?’
              ‘एक नज़्म लिखी है।’
             ‘मैं तो इस तरह कभी न लिख पाऊं। मुसीबत में मैं नहीं लिख सकता और न ही ज़्यादा सुख में। मैं तब लिखता हूँ जब रुपयों की कमी हो या किसी का इंतज़ार कर रहा होऊं।’
              ‘इंतज़ार में तुम कैसे लिख सकते हो?’
             ‘इंतज़ार में - एक बार मैं एक लड़की का इंतज़ार कर रहा था। उसे छह बजे आना था, आठ बजे आई। दो घंटे मैं कहानी लिखता रहा।’
              ‘उस के विषय में?’
              ‘नहीं, एक निहंग सिंह के बारे में। तुम अच्छी बीमार होती हो, कहानियां लिखती हो, कविताएं लिखती हो।’
              ‘पर कोई इस लिए थोड़े ही बीमार होता है ताकि उसमें से कविता का सृजन कर सके। ज़िंदगी में तकलीफ़ें और बीमारी तो यूं ही बहुत हैं। इसे घेर कर, बहलाकर अपने पास लाने की ज़रूरत नहीं।’
       मैंने काग़ज़ उठा लिए। यह कविता किसके बारे लिखी है?’
              ‘नए साल के बारे में। नया साल मुबारक हो... मुबारक हो उसे नया साल।’
              ‘किसे?’
              ‘उसे।’
       मैंने उसकी आंखों में देखा। उनमें एक ठंडा शोला भड़का।
              ‘तुम अब भी उसके बारे में सोचती हो?’
              ‘हाँ, पता नहीं क्यो, हलांकि मैं समझती हूँ कि अब उसके साथ मेरा कोई रिश्ता नहीं रहा। पर मेरी रगों में रह-रहकर खून में उसकी सांसें हैं। पता नहीं, किस तरह ज़हर सा वह मेरे लहू में घुल गया है.....उससे मुझे कोई लगाव नहीं, कोई प्यार नहीं। बल्कि नफ़रत है.......या शायद नफ़रत भी नहीं। फिर ये कैसा जज़्बा है? एक बेबस सा, कड़वा जज़्बा.....  जैसे अधपका आम तोड़कर खा लिया हो, और फिर उस आम की कोंपल का कसैला सा रस मुंह में रह जाए। कुछ अजीब सा स्वाद है जीभ पर।’
              ‘तुम उसे इतना याद क्यों करती हो?’
              ‘बिलकुल नहीं। मुझे वह याद नहीं आता। मैं सोचती हूँ। अच्छा हुआ जो यह अध्याय मेरी ज़िंदगी से ख़त्म हो गया।’
              ‘जब भी मैं तुम्हें मिलता हूँ, तुम उस की बातें क्यों करती हो? यदि तुम्हें कोई लगाव नहीं तो क्यों उसे याद करती हो?  तुम्हारी नई कहानी ‘मल्लाह् दा फेरा’ उसी से संबंधित है। पर नाम भी शायद उसी से संबंधित हो।’
              ‘हां। मैंने फ़सादों के बारे भी लिखा है, और उस लाहौर के बारे में भी जो मुझसे छीना गया, और नफ़रत के बारे, गरीबों के बारे, इच्छाओं के बारे जिनका गला घोंटा गया। मैं फ़साद, नफ़रत, गरीबी से प्यार नहीं करती, फिर भी इनके बारे लिखती हूँ।’
        यह कह कर उसने मुझे कविता सुनाई।
              ‘इसका शीर्षक क्या रखा है?’
        वह सोचने लगी।
              ‘साल मुबारक। यह शीर्षक ठीक रहेगा। इसमें जो बात मैं कहना चाह्ती हूँ, आ जाती है।’
              ‘तुम माज़ी के फटे चोले को उतार क्यों नहीं फेंकती?’
              ‘मैं इसे उतार कैसे फेकूं, मैं तो खुद एक फटा हुआ चोला हूँ।’ वह फिर ख़ामोश हो गई और कुछ सोचने लगी। छत की तरफ देखती रही।
        ज़रा सा रुक कर कहा - ‘मैं विचारों से स्वतंत्र होना चाह्ती हूँ। न अच्छे विचार, न बुरे।  मेरे विचार स्वतंत्र नहीं। एक शाखा से मेरे विचारों के पांव बंधे हुए हैं। तुम आज़ाद हो।’
              ‘कहाँ?’
              ‘नहीं, बलवंत तुम आज़ाद हो।’
              ‘मैं उस पंछी की भांति हूँ जो खुले आकाश में उड़ रहा है। थक कर कभी मेरे जैसा आज़ाद पंछी धरती पर ही आ गिरता है। लोग कह्ते हैं, अरे मर गया, अभी तो यह हंस रहा था।’

‘मुझे इस यायावर पंछी का भी पता है। जिंदगी में कितनी मजबूरियां हैं। कई बार ऐसा लगता है कि इन मजबूरियों की सख्त धरती को फाड़ कर ही ज्वालामुखी निकलता है। ज़्यादातर कविता इसी तरह सीने से निकलती है।’

अ      अमृता आज जो कविता लिख रही है,वह सुंदर है, गंभीर है, दिल को छूती है अमृता की कविता भी खूबसूरत है और अमृता खुद भी खूबसूरत है।

-       बलवंत गार्गी
पंजाबी से अनुवाद – नीलम शर्मा 'अंशु'
साभार – निम्म दे पत्ते।
))0((

गुरुवार, जून 09, 2011

कहानी श्रृंखला - 12 (पंजाबी) पापा तुम कब आओगे ? 0 दिलीप कौर टिवाणा




पापा तुम कब आओगे ?
         
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प्यारे पापा,
  
आप मेरा ख़त पढ़कर हैरान तो होंगे ही। कई बार जी चाहा कि आपको ख़त लिखूं परंतु फिर यह ख़याल आया कि यदि बीजी को पता चल गया तो वे दु:खी होंगीं। बहुत बार दिल चाहा कि उनके और आपके बारे में कुछ पूछूं परंतु जब भी मैं बात शुरू करती हूं तो वे खफ़ा हो जाती हैं और मैं बात वहीं छोड़ देती हूं।
           
पापा, बीजी कभी भी आपको बुरा नहीं कहतीं, वे खुद भी बहुत अच्छी हैं। फिर...फिर !


पापा, आप तो अब तक मुझे भूल भी गए होंगें। बहुत छोटी सी थी, जब आप और बीजी हमेशा के लिए अलग हो गए। अब तो मैं बहुत बड़ी हो गई हूं। कुछ दिनों पहले एक महिला हमारे घर आई थीं। जब मैं कॉलेज से लौटी तो देखा बीजी उससे बातें करते हुए रो रही थीं। मुझे देखकर वह महिला बोली, ‘यह तो बिलकुल अपने पिता जैसी दिखती है। पापा, क्या सचमुच मैं आप जैसी हूं ?’
   

मेरा बहुत जी चाहा कि उस महिला के साथ आपके बारे में ढेर सारी बातें करूं। आपके बारे में बहुत कुछ पूछूं, परंतु बीजी ने मुझे चाय बनाने भेज दिया। फिर भी बहाने से, आते-जाते मुझे सुनाई दे गया कि आप पटियाला के कॉलेज में पढ़ाते हैं। पटियाला से लुधियाना का केवल दो घंटों का ही तो सफ़र है। कितने साल गुज़र गए हैं पापा, परंतु आप ये दो घंटे लांघकर कभी हमारे पास नहीं आए। बीजी के साथ आपकी लाख नाराज़गी होगी, परंतु पापा, क्या आपको मैं कभी याद नहीं आई? क्या मेरी हमउम्र किसी लड़की को देखकर आपको कभी ख़याल नहीं आता कि मेरी बेटी भी कहीं है? पर पापा मुझे तो आप बहुत याद आते हैं।

       
कई महीने पहले हम दो लड़कियां अपनी एक प्रोफेसर के साथ पटियाला के कॉलेज में पंजाबी बाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेने गई थीं। क्या उसक वक्त आप वहां थे? मुझे बहुत दु:ख हो रहा है कि काश! उस वक्त मुझे पता होता कि आप वहां है। मैं खुद आकर आपसे बात कर लेती।

        
कई बार कहीं गाड़ी में, सड़क पर या सिनेमा में जब किसी अच्छे से व्यक्ति को देखती हूं तो ख़याल आता है - शायद मेरे पापा ऐसे हों - शायद यही मेरे पापा हों और उस वक्त बड़ा ही जी चाहता है कि उस अजनबी व्यक्ति के गले जा लगूं। परंतु, ऐसा करना तो गलत होता है न, पापा! इसी तरह शायद एक व्यक्ति को मैं काफी देर तक निहारती रही थी। बस से उतरते वक्त आहिस्ता से वह मेरे हाथ में एक चिट थमा गया। लिखा था, शाम को घंटाघर के पास तुम्हारा इंतज़ार करूंगा। कितनी बेहूदा बात है। मुझे तो आपको बताते हुए भी शर्म आती है। बीजी ठीक ही कहा करती हैं कि ज़माना ख़राब है। उस दिन मुझे बहुत ही रोना आया। शायद, वह जानता था कि हमारे घर में उसकी पिटाई करने वाला कोई नहीं है, तभी तो इतनी हिम्मत हुई उसकी। परंतु, शक्ल से तो काफ़ी उम्रदराज़ लगता था।
        
अरे, हां पापा, मेरी क्लास की एक लड़की आपके कॉलेज से आई है। मैं उससे आपके शहर के कॉलेजों की ढेर सारी बातें पूछती रही। सोचा था, वह आपका भी ज़िक्र करेगी। उसने बताया कि पढ़ाते वक्त आप बहुत डांटते हैं। दूसरों की बेटियों का आप इतना ख़याल रखते हैं, कभी आपको अपनी बेटी याद नहीं आती?
        
पापा, वह लड़की बता रही थी कि आपकी एक छोटी सी बेटी और एक बेटा है। मैंने उन्हें कभी देखा तो नहीं परंतु कई बार बहुत जी चाहता है कि मेरे भी छोटे भाई-बहन हों। कभी वे मुझसे सवाल समझें। कभी मैं उन्हें स्कूल के लिए तैयार करूं। कभी-कभी हम सभी मिलकर सिनेमा देखने जाएं।
        
पापा, कहते हैं दूसरी शादी करते वक्त आप ने उन लोगों से वादा किया था कि आप अपनी पहली पत्नी और बेटी से कोई संबंध नहीं रखेंगे। पापा, दूसरी बीजी कहीं मेरे इस ख़त को देखकर ही नाराज़ तो नहीं हो जाएंगी?
      
अगर मैं कभी आपके शहर आऊं और आपसे मिलने आपके घर आ जाऊं। क्या दूसरी बीजी आपसे गुस्सा करेंगी? फिर क्या आप मुझे डांटकर लौटा देंगे? पापा, अगर कभी एक बार, बस एक बार, आप मुझे गले से लगा कर प्यार करेंगे, फिर चाहे आप कहीं भी रहें, मुझे यकीन हो जाएगा कि आप मुझे प्यार करते हैं।
       
पापा, मैं यह कभी नहीं चाहती कि आपके घर में कोई कलह हो, परंतु फिर भी दिल चाहता है कि आप दूसरी बीजी से पूछकर ही सही, एक बार मुझसे मिलने आ जाएं। वे भी तो एक औरत हैं, एक मां है। सिर्फ एक बार, पापा!
        
मैंने एक बार बीजी से कहा, ‘बीजी, पापा से मिलने को मेरा बड़ा जी चाहता है।’ वे रो पड़ीं और बोलीं - ‘जिनके पिता मर जाते हैं, उनका भी तो गुज़ारा हो ही जाता है.......’ मेरा दिल कांप उठा। मैं काफी देर तक मन ही मन भगवान से विनती करती रही कि ‘हे रब्बा, मेरे पापा को तो कभी कुछ न हो।’
       
एक बार हमारे पड़ोसियों की लड़की ने मुझसे पूछा कि ‘तेरे पापा कहां रहते हैं, क्या करते हैं? वे कभी तुम लोगों से मिलने क्यों नहीं आते?’ मुझे कोई उत्तर न सूझा। पता नहीं उसे सचमुच ही कुछ नहीं मालूम या कई बार लोग जान-बूझकर भी ऐसी बातें छेड़ बैठते हैं। बेशक मैं समझती हूं कि रोज़-रोज़ की खिट-पिट से तो यही अच्छा है कि अगर न निभे तो रास्ते अलग कर लेने चाहिए, परंतु फिर भी जब कोई पूछ लेता है तो बहुत ही बुरा लगता है।
       
पता नहीं क्यों पापा, अक्सर बीजी बेवजह ही गुस्सा होने लगती हैं। जी तो अपना ठीक नहीं होता और गुस्सा मुझ पर निकाल देती हैं। एक तो उनके स्कूल की हेडमास्टरनी भी बड़ा तंग करती है। अगर आप हमारे साथ होते फिर भला उन्हें नौकरी करने की क्या जरूरत पड़ती? कई बार मेरा बड़ा जी मचलता है किसी चीज़ के लिए। बीजी लेकर नहीं देती। अगर ले भी देती हैं तो बक्से में रख देती हैं और कहती हैं कि मेरी शादी पर दी जाएगी। मेरी शादी पर तो आप आएंगे न? एक दिन जब किसी जगह लड़का देखने जाना था, बीजी अंदर से कुंडी लगाकर बक्से में से आपकी तस्वीर निकाल कर काफी देर रोती रहीं। मैंने झिर्री में से देखा था। अगर बीजी ने शादी पर न बुलाया तो मैं ख़त लिख दूंगी। पापा! आप ज़रूर आ जाना, वरना लोग क्या कहेंगे?
 
पापा, आप हमारे शहर में तबादला क्यों नहीं करवा लेते? भले ही हमारे घर कभी मत आना। हमसे कभी बात मत करना, पर आपकी कुशलता का तो पता चलता रहेगा। पापा! परमात्मा की कसम, आप मुझे बहुत ही प्रिय हैं। क्या ख़त का जवाब देंगे? पापा......? कई बार तो मुझे आप पर बहुत गुस्सा आता है कि बीजी के साथ भले ही आपके लाख गिले-शिकवे हों, परंतु मैंने तो आपका कुछ नहीं बिगाड़ा था। मैं तो आपकी बेटी हूं। फिर भी आपने मुझे कभी याद नहीं किया। कभी मुझसे मिलने भी नहीं आए। कितने निर्मोही हैं आप? परंतु बेटियों को तो सदा माता-पिता की ज़रूरत होती है। मैं कैसे गुज़ारा कर लूं?


       

       पापा, एक बार बस एक ही बार मिलने आ जाईए!
                                              

                                 आपकी बेटी रजनी






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ख़त लिखकर रजनी कई दिनों तक इसी उधेड़बुन में रही कि ख़त पोस्ट करे या नहीं, परंतु एक दिन साहस जुटा कर, धड़कते दिल से वह अपनी बीजी से चोरी-चोरी ख़त डाल आई। खत डालते ही उसे डर सा लगा कि पता नहीं पापा क्या करेंगे। पता नहीं बीजी कितनी गुस्सा होंगी। उसके दिल ने चाहा कि किसी न किसी तरह खत रास्ते में ही गुम हो जाए परंतु फिर भी बड़ी उतावली से ख़त के जवाब का इंतज़ार करने लगी। कभी दरवाज़े पर दस्तक होती, वह चौंक उठती कि कहीं पापा ही न आए हों। कभी कौवा कांव-कांव करता, वह सोचती कहीं उसके पापा के आगमन का संदेसा लेकर आया हो। कभी परात से आटा उछल जाता तो वह एक आदमी के हिस्से की ज़्यादा रोटी बना लेती कि कहीं उस वक्त बनाने में देर न हो जाए।
        
सुबह-शाम दोनों वक्त अब वह घर को झाड़ती-पोंछती रहती। बैठक के भारी पर्दे भी उसने खुद ही घर पर धो डाले कि अगर धोबी समय पर न दे पाया तो? बीजी के बडबड़ाने के बावजूद वह नया टी सेट ले आई।

       
सोते-सोते नींद में उसे सपना आता कि सोने की बग्घी में बैठकर उसके पापा आए हैं। उसके लिए बहुत से रेशमी कपड़े, मोतियों का हार, सुंदर किताबें लाए हैं। कभी सपना आता कि उन्होंने दो सिपाहियों को हुक्म दिया है कि इस लड़की ने मेरी नींद ख़राब की है, ले जाओ इसे पकड़ कर। कभी वह बहुत खुश होती और कभी बहुत बेचैन।

        
इंतज़ार करते-करते एक दिन कॉलेज में उसके नाम ख़त आया। खत थामते ही उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। छुट्टी लेकर वह घर आ गई। बीजी स्कूल गई हुई थीं। जल्दी-जल्दी उसने ख़त खोला। लिखा था.....

         
प्यारी बेटी रजनी,

तुम्हारा खत मिला। बेटी, तुम मुझे बेहद प्रिय हो। तुम्हारी याद भी बहुत आती है, पर रानी बिटिया, तुम मेरी मजबूरियों को नहीं समझती, तभी तो शिकवे करती हो।

कुछ गलतफहमियों या दुर्भाग्य के कारण ही तुम्हारी बीजी और मेरी राहें अलग हो गईं। तुम्हारी बीजी चली गई। शायद नाराज़ होकर। वे तुम्हें भी साथ लेती गईं। जब गुस्से-गिले की गर्मी दिमाग से उतरी तो मुझे पता चला कि मेरी दुनिया सूनी हो गई थी। मैं बहुत दुखी हुआ। एक-दो व्यक्तियों की मार्फत् तुम्हारी बीजी को संदसे भेजे कि गुस्से-गिले भूलकर लौट आएं। उन्होंने औरतों वाली ज़िद ठान ली और चाहते हुए भी मैं उन्हें खुद लेने नहीं जा पाया। फिर नफ़रत बढ़ती गई और अंतत: मेरे घर वालों ने दूसरी शादी के लिए ज़ोर डाला। इस प्रकार मुझे तुम्हारी नई बीजी के घर वालों से कुछ वादे भी करने पड़े। 

बड़ी अच्छी हैं तुम्हारी ये बीजी। मैं उनके साथ दगा नहीं कर सकता। मैं उस महिला का बहुत ऋणी हूं। वे मेरी मुश्किलों को समझती हैं और मुझे सहारा देती हैं। मैं कभी उसे दुख पहुंचाने वाला काम नहीं कर सकता।इस तरह के और ख़त लिखकर तुम परेशान मत करना और न ही अपनी बीजी से उनकी पिछली ज़िंदगी के बारे में पूछ-पूछ कर उन्हें दुखी करना।

हां, तुम्हारी शादी के बारे में उन्होंने कह दिया है कि मैं चला जाऊं। जो भी सामर्थ्य हो, कुछ दे आऊं। परंतु केवल एक बार। अत: बिटिया, मैं तुम्हारी शादी पर ही आऊंगा।   


          

            ढेर सारे प्यार सहित,


                                  तुम्हारा पापा                                           
                                       
    
ख़त पढकर एक बार तो रजनी की रुलाई फूट पड़ी, परंतु फिर वह मुस्करा उठी। उस शाम बड़े ही चाव से उसने अपनी बीजी से पूछा, ‘बीजी आप मेरी शादी कब करेंगी?’

बीजी पल भर के लिए आश्चर्य से उसे निहारती रहीं और फिर हंस पड़ी।



   पंजाबी से अनुवाद - नीलम शर्मा 'अंशु'
   साभार - जनसत्ता, कोलकाता।


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