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शनिवार, जुलाई 31, 2010

कविता श्रृंखला - 3 ( बांग्ला )


श्री शंकर पात्र


अनुवाद - नीलम शर्मा 'अंशु'





1)


आज की सहस्त्र कुंतियां





आज की सहस्त्र कुंतियां
पुरुष का स्नेह चाहती हैं
मन की तृप्ति के लिए नहीं,
पेट की ज्वाला के लिए ।
पार्क के बगल में खड़ी है नमिता
सिनेमा हॉल के सामने कावेरी
इस शताब्दी की कोई वधु, कोई कुमारी।


तृप्ति नहीं
आशा नहीं
कावेरी के संग ज़िंदा हूँ
रात के अंधेरे में टटोल कर देखती हूँ
शबरी का तकिया भीग गया है
कुमारी जननी रो रही है
सांत्वना की भाषा नहीं आती
तभी तो आँखें मूंदे पड़ी हूँ
मैं उसकी वैध जननी।


कुंती एक बार रोई थी ज़िंदगी में
सूर्य के अवैध प्रणय को मिटा देने के लिए
आज की सहस्त्र कुंतियां बार-बार रोती हैं
फिर भी खड़ी रहती हैं
पुरुष का स्नेह चाहती हैं
मन की तृप्ति के लिए नहीं,
पेट की ज्वाला के लिए ।





2)


माँ बनना कठिन है.....


बहुत कुछ तो सुना था
वसंत के आगमन से पूर्व
वसंत में फूल खिलते हैं, पक्षी चहचहाते हैं
सपने हक़ीकत में बदलते हैं
बहुत दिनों के बाद जब वसंत आया
तब क्या हुआ.....

वसंत की रात को फूल डरता है
दाँत होठों को चबा जाना चाहते हैं
फाल्गुनी रातों में कालबैसाखी के तूफान में
पंखुड़ियां बिखर जाती हैं
बाईस वर्षीया विधवा युवती की भाँति
तन आज कुछ देना चाहता है, कुछ पाना चाहता है
सीधे रास्ते से कुछ नहीं होने वाला
इसलिए चोर रास्ते पर चलती जाती है
खाना न मिलने पर ज़हर खाती है
कभी-कभी विद्रोही मन
कह उठता है
ज़हर नहीं खाना मांगो
चुरा लो, छीन लो
लेकिन सोच कर क्या फ़ायदा
सपने कभी हक़ीकत नहीं बनते।


जो फूल अच्छा लगता है
क्या उसे पाना चाहते हो ?
तो उड़ते-उड़ते
फटाक से एक बार बैठ जाओ
फल लगेंगे, फूल सूख जाएंगे
पिता बनना क्या सहज़ नहीं है ?
लेकिन माँ बनना कठिन है
फिर भी माँ बनती हैं
माँ बनना पड़ता है।

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