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शनिवार, जुलाई 24, 2010


कहानी श्रृंखला – 8पंजाबी कहानी
पठान की बेटी

सुजान सिंह


ग़फूर पठान जब भी शाम को अपनी झोपड़ी में आता तो उन झोंपड़ियों में रहने वाले बच्चे ‘काबुलीवाला’ - ‘काबुलीवाला’ कहते हुए अपनी झोंपड़ियों में जा छुपते। एक छोटा सा सिक्ख लड़का बेखौफ वहाँ खड़ा रहता और उसके थैले, ढीली-ढाली पोशाक, उसके सर के पटे और पगड़ी की तरफ देखता रहता। गफ़ूर को वह बच्चा बहुत प्यारा लगता था। एक दिन उसने लड़के से पठानी लहज़े वाली हिंदुस्तानी ज़बान में पूछा - ‘तुमको हमसे डर नहीं लगती बाबा ?’

बच्चे ने मुस्कराकर सिर हिला दिया। ग़फूर के सुर्ख चेहरे पर और भी लाली दौड़ गई। उसने बड़ी कोमलता और प्यार भरे जज़्बे से अपनी दोनों बाँहें बच्चे की तरफ बढ़ाई। बच्चा पठान की टाँगों से लिपट गया। ग़फूर ने उसे बाँहों से पकड़ कर अपने सर से ऊपर उठा लिया और इधर-उधर हिलाते हुए प्यार करने लगा। सामने वाली झोंपड़ी से बच्चे की बहन बाहर निकली, जो लगभग आठ साल की होगी। भाई से पठान को दुलार करते देख वह भी पास आ खड़ी हुई। पठान बड़ी ज़ोर-ज़ोर से खिल-खिलाकर हँस रहा था और वीरो का भाई अजमेर पाँवों की ठोकर से पठान की पगड़ी गिराना चाहता था। अंतत: एक ठोकर से उसकी पगड़ी नीचे जा गिरी। ग़फूर ज़ोर से हँसा और अजमेर को नीचे उतार कर बोला - ‘बाबा, तुम जीता!’
जब पठान ने वीरो को अपने पास खड़ी देखा तो उसने अजमेर से पूछा - ‘क्या ये तुम्हारा बहिन है ?’


अजमेर ने होंठ भींचकर मुस्कराते हुए कहा - ‘हूं...!’
काबुलीवाले ने एक हाथ से वीरो और दूसरे हाथ से अजमेर को कमर से पकड़ लिया और ज़ोर से चक्कर लगाने लगा। बच्चे खिल-खिलाकर हँसते थे और ग़फूर ज़ोर-ज़ोर से हूं.....ऊं.....हूं.....ऊं....... करता जाता था। इस हूं....ऊं...... को सुनकर छोटी बेटी को गोद में उठाए उनकी माँ तेज़ी से बाहर निकली और अपने बच्चों को ग़फूर से हिलोरें लेते देख डर सी गई पर पंजाबियों सा हौंसला करके बोली - ‘वे अजमेर ! अरी वीरो !’

ग़फूर वहीं का वहीं खड़ा हो गया और बच्चों की माँ की चढ़ी हुई त्यौरी और तनी हुई आँखें देख कर उसने दोनों को उतार दिया और खुद बड़ी मुश्किल से गिरते-गिरते बचा। तेजो ने बच्चों को डांटते हुए कहा - ‘आ लेने दो आज तुम्हारे बापू को।’

वीरो तो झट से भीतर जा घुसी परंतु अजमेर डटकर खड़ा हो गया और फौजियों की तरह कमर पर हाथ रखकर बोला - ‘आ लेने दो फिर।’

तेजो ने आगे बढ़कर अजमेर को बाँह से पकड़ लिया और उसे घसीटते-घसीटते अपनी झोंपड़ी में ले गई। ग़फूर काफी देर तक अजमेर का रोना-धोना सुनता रहा। अंतत: वह अपनी झोंपड़ी में गया और अपने झोले से शीशा निकालकर अपना मुँह देखने लगा। उस दिन उसने खाना भी नहीं बनाया और ऐसे ही सो गया।

किसी को पता नहीं था कि ग़फूर क्या काम करता है। कोई कहता कि हींग, जीरा और सालब बेचता है। कोई कहता कि इससे बचकर रहना, ये लोग बच्चों को उठाकर ले जाते हैं। झोंपड़ियों में ओड़िया, बंगाली, बिहारी मज़दूर रहते थे। किसी-किसी का ही परिवार साथ रहता था। उनके बच्चे तो बच्चे, वे खुद भी पठानों से डरते थे। झोंपड़ियों के आमने-सामने की कतारों के सिरे पर अजमेर और पठान के घर थे। अजमेर का पिता रिजर्व में आया हुआ फौजी था और पास की ही मिल में चौकीदार का काम करता था।

तेजो ने आते ही अपने पति के खूब कान भरे। दिन चढ़ते ही अजमेर के बापू ने ग़फूर की झोंपड़ी का टीन का दरवाज़ा खटखटाया। कुछ देर बाद ग़फूर नंगे सिर, आँखें मलता हुए बाहर निकला और उसे सामने देख कर कहने लगा -‘क्या बात है सरदार?’
वीरो के बापू ने टूटी-फूटी हिंदुस्तानी ज़बान में कहा - ‘देख भाई, तू मुसलमान है खान, और हम सिक्ख। तू हमारे बच्चों के साथ..... ’

‘सिक्ख है कि मुसलमान, बच्चा तो सबका एक है, सरदार! खुदा तो सबका एक है।’
जमादार ने गर्म होते हुए कहा - ‘एक-वेक कोई नहीं। तू हमारे बच्चों के साथ मत खेला कर। अगर तू पठान है तो मैं सिक्ख हूं।’

पठान ने अपने क़ौमी स्वभाव के विपरीत और भी नरमी से कहा - ‘सब बच्चा हमसे डरती है, तेरा बच्चा हमसे नहीं डरती। हमको वो अच्छा लगी थी। तुम अपना बच्चों को मना कर दो हमारा पास आने को। हम किसी को नहीं बुलाती। हम तो इधर अकेला रहती।’

‘बस-बस, फैसला हो गया।’ जमादार ने कहा।

बच्चे अक्सर नज़र बचाकर ग़फूर के सामने आते थे, पर ग़फूर उन्हें त्योरियां दिखाते हुए यह कह कर भगा देता कि तुम्हारा बापू मारेगा। फिर भी कई बार ग़फूर का दिल पसीज जाता था और वह उन्हें चोरी-छिपे काबुल का सरधा या कंधार का अनार दे देता था और कहता कि चोरी-चोरी खाकर घर जाना। बच्चे भी ऐसा ही करते।

वीरो तथा अजमेर से छोटी और गोद वाली लड़की से बड़ी एक बेटी और थी तेजो की। वह घर से बहुत कम निकलती थी। छोटी बेटी के पैदा होने से पहले वह बड़ी दुलारी थी। अब मां का ध्यान नई बच्ची की तरफ होने के कारण वह अनजाने ही प्यार की कमी महसूस करती थी। अक्सर मामूली सी बात पर ही रो पड़ती और ज़िद किया करती थी। तेजो उसे डांटा करती थी। वह रोती तो उसे और ज़्यादा मार पड़ती। बच्ची के प्रति तेजो की उपेक्षा देख वीरो और अजमेर भी उसे पीट लिया करते थे और जब वह रोती तो ‘ऐसे ही रोये जाती है’ कहकर वे उसे तेजो से और पिटवा दिया करते। लड़की उपेक्षित सी हो गई और अपने बचाव के लिए उसने झोंपड़ी से बाहर घूमना-फिरना शुरू कर दिया। बड़े भाई-बहन फिर भी उसका पीछा न छोड़ते। ग़फूर रोज़ यह सब देखता था, पर कुछ कह नहीं पाता था। बड़े बच्चों के लिए उसके दिल से प्यार घटता गया और ज़ालिमों को छोड़ मजलूम के प्रति उसके मन में हमदर्दी बढ़ने लगी। बहुत दिनों तक पंजाबियों के बीच रहने के कारण वह काफी हद तक उनकी भाषा भी समझ लेता था और छोटी लड़की को तेजो द्वारा दी जाने वाली गालियां सुन कर दुखी भी होता था। इन्हीं दिनों किसी कारण दो महीनों के लिए जमादार की नौकरी भी छूट गई थी। फिर तो लड़की की शामत ही आ गई। जो भी आए, उसे ही पीटे। तेजो कहा करती - ‘ये कंबख्त रोती रहती थी इसलिए हमारी नौकरी भी गई।’ महीने की तनख्वाह से बमुश्किल रोटी की गुज़र होती थी। बड़ी मुसीबत आन पड़ी। मजलूम की रहम ने ग़फूर के दिल में रहम का जज़्बा पैदा किया। उसने एक दिन जमादार को बुलाया और कहा - ‘सरदार, तू मेरा भाई है। मैं जानती तुम तंगी में है। मैं तेरा मदद करना चाहती, तुम न नहीं बोलती।’ सरदार खामोश था और ग़फूर ने पंद्रह रुपए उसकी हथेली पर रख दिए। घर में ज़रूरत थी, पठान से मदद नहीं लेना चाहता था दिल, परंतु फिर भी उसने पंद्रह रुपए रख लिए। सोचा, नौकरी लग जाएगी तो सूद समेत लौटा देगा। जाते वक्त जमादार को फिर बुलाकर अपनों की तरह कंधे पर हाथ रखकर ग़फूर ने कहा - ‘सरदार, तुम्हारी घरवाली और दोनों बड़ा बच्चा छोटा लड़की को मिल कर मारता रहता है, नादान बेकसूर है। उसको मत मारो। हमको बड़ा तकलीफ होता है। देखो, वह बहुत कमज़ोर है, मर जाएगा।’ काफी देर तक पठान की विनती भरी आँखें जमादार को याद रहीं। उसने तेजो से कहा कि वह लड़की को न मारा करे परंतु तेजो और बच्चों की तो आदत बन चुकी थी। जब सरदार को नई जगह से पहली तनख्वाह मिली तो पहले वह ग़फूर की कोठरी में आया। पंद्रह रुपए के साथ-साथ पठान का सूद भी गिनकर उसने पांच रुपए का नोट और थमा दिया। ग़फूर नोट देख कर हैरान हुआ और बोला - ‘सरदार, ये क्या ?’

सरदार ने कहा - ‘तुम्हारा रुपया और सूद।’
‘हम मुसलमान पठान है सरदार!’ पठान ने रोष से कहा। ‘हम सूद को हराम समझता।’
ग़फूर का तमतमाया चेहरा देखकर जमादार ने कहा - ‘मुझे पता नहीं था कि कोई पठान सूद भी नहीं लेता, अच्छा हुआ पता चल गया। पर यह लो अपने रुपए।’
यह तो मदद था। ग़फूर ने चेहरे पर मुस्कान बिखेर कर कहा - ‘बच्चा सबका एक है सरदार।’

जमादार ने उसकी एक न सुनी और रुपए ज़बरदस्ती उसे देकर घर आया। दरवाज़े पर छोटी बेटी रो रही थी। वीरो और अजमेर उसे तंग कर रहे थे। और तेजो बिना देखे रसोई से उसे गालियां दे रही थी। जमादार ने अजमेर को डपट लगाई, वीरो को एक तमाचा जड़ा और लड़की को गोद में उठाए मुँह पोछता हुआ रसोई के पास पहुंचा। कुछ कहना ही चाहता था कि तेजो की नज़र उस पर पड़ी और बोली - ‘आई बड़ी लाडली! खसम नूं खाणी को गोद उठा लिया। सारा-सारा दिन रोती रहती है मनहूस।’

जमादार ने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई और वह मुँह फुलाकर एक कोने में जा बैठी।
तेजो ज़िद से लड़की को और मारने लगी। लड़की ज़िद्दी और ढीठ बन गई। ग़फूर लड़की की शामत आते रोज़ देखता था। उसे अकेली धूप में गिरती-पड़ती देख उसका दिल दहल जाता था।

पठान की आँखों में आँसू आ गए। वह दबे पाँव बाहर निकल कर फल की दुकान की ओर बढ़ा। उसने वहाँ से तीन किस्म के फल खरीद कर बच्ची को थमाए। लड़की हड़बड़ाई हुई कभी एक को दाँत से काटती तो कभी दूसरे को। ग़फूर की आह निकल गई। उसने सोचा, इसकी माँ, बड़े भाई-बहन और सरदार इसे मार कर दम लेंगे। इसे बचाना चाहिए। उसने झोले वाली थैली टटोली, दो की चिल्लर थी। सोचा भागकर कोठरी से पैसे ले आऊं। वहां तो मेरे पास हज़ार से ज़्यादा रुपए हैं। पर फिर सोचा, लड़की को बचाने का मौका छिन जाएगा। उसकी माँ शोर मचा देगी, हो सकता है सरदार के साथ झमेला हो जाए। वह घर न लौटा। उसने एक मुसलमान का तांगा पकड़ा और स्टेशन पहुँचकर कहीं की टिकट कटाई।

उधर शोर मच गया, ‘काबुलीवाला लड़की को उठा ले गया।’
कोई बोला, ‘देखा, सरदार डरता नहीं था।’ किसी ने कहा, ‘पठान मौका तलाश रहा था, ले उड़ा।’ तरह-तरह की बातों से सरदार के मन में ग़फूर के प्रति कड़वाहट भर गई। थाने रपट लिखवाई गई। तेजो रो-रो कर बेहाल हो रही थी और पठान के बच्चों को बददुआएं दे रही थी। पुलिस हैरान थी कि पठान इतना रुपया और कोठरी का दरवाज़ा खुला छोड़कर क्यों भागा ?

पूरे एक महीने के बाद जमादार को शिनाख्त के लिए थाने बुलाया गया। लड़की हथकड़ियों में जकड़े ग़फूर की गोद में थी। पिता की आवाज़ सुनकर लड़की ने एक बार पिता की तरफ देख मुँह मोड़ लिया। तेजो की भी एक न चली। लड़की बेहद सेहतमंद लग रही थी और पठान कमज़ोर। जमादार, तेजो और अन्य पड़ोसियों ने शिनाख्त की। पठान टुकुर-टुकुर उनकी तरफ ताक रहा था। आख़िर जब पुलिस पठान से लडकी लेकर जमादार को देने लगी तो लड़की की चीखें और पठान के विलाप से कमरा गूंज उठा।

पठान कह रहा था - ‘ज़ालिम को बच्ची नहीं देने का। बचाओ! बचाओ! ये लोग मार डालेगा। मेरा बेटी को, ये जालिम.....कसाई।’

थानेदार कड़क कर बोला, ‘तो तू इसको बचाने के लिए उठा कर ले गया था?’ चारों तरफ हंसी का ठहाका गूंज उठा। कोई कह रहा था, ‘शैदाई है।’ कोई कह रहा था, ‘बनता है।’ परंतु ग़फूर रोए जा रहा था।



अनुवाद – नीलम शर्मा ‘अंशु’


साभार – राष्ट्रीय महानगर(दीपावली विशेषांक), कोलकाता, 2004

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