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रविवार, जुलाई 18, 2010

कहानी श्रृंखला – 7

पंजाबी कहानी

रक्तपात
     

 कुलदीप सिंह बेदी



वह उस दिन जब मिली तो बहुत उदास थी। अभी कुछ दिन पहले ही उसकी सगाई हुई थी। सगाई तो मेरी भी हो चुकी थी। यह उसे भली-भाँति मालूम था। जब कभी भी मैं उसके घर जाता तो उसकी माँ मुझे कहती- ‘कोई लड़का ढूंढ़ों इसके लिए भी।’ मैं पूछ बैठता, ‘लड़का कैसा होना चाहिए?’ तो माँ के बोलने से पहले ही वह बोल उठती, ‘कोई प्रोफेसर, डॉक्टर या वकील।’ कई बार ऐसी बातें होती रहतीं। मैं जब उसके घर से निकलता तो मुझे लगता कि न तो मैं प्रोफेसर हूँ, न डाक्टर, न ही वकील। मुझे याद है जब वह चंडीगढ़ में कोई कोर्स कर रही थी, तो मैं उसके बहुत कहने पर एक बार वहाँ उससे मिलने गया था। उसकी सहेलियों ने उसकी तरफ शरारत भरी निगाहों से देखा था और उसने मेरी तरफ देख कहा था, ‘नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं।’
‘क्या कह रही थीं लड़कियां ?’
‘लड़कियां तो कुछ न कुछ कहती रहती हैं।’
‘फिर भी ?’
‘कह रही थीं- तूने अच्छा मोर्चा मारा है। जैसी खुद ऊंची-लंबी हो, वैसा ही....।’
‘हां, तो फिर तुमने कहा नहीं कि तुम्हें तो किसी प्रोफेसर, डाक्टर या वकील की ज़रूरत है।’
‘आपको बातें बनानी तो बहुत आ गई हैं। मुझे तो आप बहुत पंसद हैं परंतु क्या करूं। मेरे पिता और चाचा नहीं मानेंगे। मम्मी को सब मालूम है कि मैं आपको कितना चाहती हूँ, लेकिन वे अकेली भला क्या कर सकती हैं?’
और फिर उस दिन शाम को जब रॉक गार्डन घूमने जाने के लिए तैयार हुए तो उसकी रूम मेट ने उसे आलिंगन में लेकर कहा था - ‘ला काला टीका लगा दूं। इतनी सुंदर जोड़ी को मेरी ही नज़र लग जाएगी।’ उस वक्त पता नहीं क्यों उसकी आँखें भर आईं थीं। बाहर निकले तो उसने कहा, ‘ओह हो, आपने हील वाले जूते क्यों पहन रखें हैं? रुकिए, मैं भी हील वाले सैंडिल पहन कर आती हूँ।’ और वह दौड़ कर कमरे में चली गई।

शायद उसकी इसी आदत ने उसे कैरियरिस्ट बना दिया था। हील वाले सैंडिल पहन कर जब वह मेरे साथ रॉक गार्डेन में घूम रही थी तो बहुत खुश नज़र आ रही थी। उसने बताया, ‘अब कोर्स ख़त्म होने में लगभग तीन महीने रह गए हैं, फिर लुधियाना लौट जाना है। फिर जल्दी-जल्दी मिला करेंगे।’

अगले दिन सुबह मुझे लौटना था। मैंने जब उससे साथ चलने का आग्रह किया तो वह बिना हील हुज्जत के राजी हो गई। रूम मेट को एक दिन की अर्ज़ी थमाई। उस दिन शनिवार था और अगले दिन छुट्टी थी। बड़े चाव से वह तैयार हो रही थी। रूम मेट कहने लगी, ‘बड़ा चाव है, मानो मुकलावे जा रही हो।’
‘चुप! इस तरह शोर नहीं करते। रवि के साथ कौन सा रोज़-रोज़ इस तरह जाने का मौका मिलता है।’

हम बस स्टैंड की ओर जा रहे थे। ‘कभी मैं तुम्हें इसी तरह ले जाऊँगा।’ रिक्शा में बैठे हुए उसने मेरे कंधे पर हाथ रख लिया, ‘अब भी तो ले ही जा रहे हैं।’
‘नहीं, इस तरह जाने और उस तरह जाने में बहुत फ़र्क है, उस वक्त तुमने गुलाबी पोशाक पहन रखी होगी। बाँहों में लाल चूड़ा, सजा-संवरा चेहरा और आँखों में एक अजीब सी प्यास।’
‘बस कीजिए! काफ़ी प्यारी कविता है यह।

वह ख़ामोश हो गई और फिर कहीं दूर देखते हुए कहा, ‘सिर्फ़ दिखावे वाली वस्तुओं की ही कमी है। मेरा दिल तो आपका हो चुका है। मुझे तो अब भी यही महसूस होता है कि हम शादी-शुदा हैं। सामाजिक मान्यता नहीं मिली तो न सही।’ फिर उसके बाद मेरा तबादला पठानकोट हो गया।

एक दिन मेरे दरवाज़े पर दस्तक हुई। नीली जीन्स पहने और काला चश्मा। मुस्कान बिखेरते हुए बोली, ‘उड़ गए न होश! यदि आज्ञा हो तो अंदर आ जाऊं!’
मैं चुपचाप उसे देखता रहा, वह झट-पट अंदर चली आई। पीछे-पीछे मैं। ‘एक गिलास पानी तो पिला दीजिए।’ चश्मा उतारते हुए उसने कहा।
‘तुम कैसे.....?’
‘क्यों? मैं नहीं आ सकती?’ सैंडिल उतार कर वह चारपाई पर सिकुड़ गई। उसने बताया कि वह यहां एक कैंप पर आई है। मैंने चाय बनाई। हमने मिलकर चाय पी। वह जाने के लिए उठते हुए बोली चलती हूं, ‘कैंप में सात बजे से पहले पहुंचना चाहिए। हाज़िरी लगती है।’
और उसका यह कैंप सात दिनों तक चला। दोपहर या शाम को कुछ समय के लिए वह मेरे पास आ जाती। अंतिम दिन वह कैंप से विदा होकर सुबह नौ बजे ही घर आ गई। कंधे पर उसका एयर-बैग था।
‘आज दफ्तर न जाएं, कोई फिल्म देखते हैं।’
उसने मुझसे आग्रह किया। जब भी वह ऐसा कुछ कहती तो मैं आज्ञाकारी की भाँति चुपचाप तैयार हो जाता। किनारा फिल्म देखते हुए वह सुबक-सुबक कर रो रही थी। शायद मेरा भी अंत ऐसा ही होगा।

फ़िल्म देखने के पश्चात् हमने ढाबे में खाना खाया। शाम को हम दोनो शापिंग करते रहे। वह छोटी-मोटी चीज़ें खरीदती रही। मैं उसके साथ चलता रहा। अचानक मोहन मिल गया। ‘भाभी है?’ उसने सवाल दागा। वह सर झुकाए आगे निकल गई।
घर लौटते वक्त वह फिर सुबक रही थी। मुझे समझ नहीं आता कि मैं आपके साथ क्यों घूमती हूँ। आपके यार दोस्त भी भला क्या सोचते होंगे। उसने कहा।
‘सोचना क्या है। मोहन अभी ही कह रहा था, माल तो अच्छा है, काबू कर ले।’
‘मुझे पुरुषों की यही बात पसंद नहीं। लड़की देखी नहीं कि उस पर कब्जा कर लेना चाहते हैं।’
रात को हम एक ही कमरे में थे। मेरे पास एक ही चारपाई थी। एक बिस्तर नीचे लगा दिया। वह नीचे वाले बिस्तर पर लेट गई। मैंने उसे चारपाई पर लेटने को कहा। पर उसने कहा, ‘यह कैसे हो सकता है?’ अंतत: मैंने कहा, ‘इस तरह हम दोनों ही नहीं सो पाएंगे। आ जाओ, चारपाई पर लेट जाओ।’
‘तुम्हारा क्या ख़याल है, मेरे दिल में खोट हो तो क्या मैं नीचे नहीं आ सकता?’
‘मुझे मालूम है, आप इतने बुरे नहीं।’
‘आ जाओ यहां।’ वह धीरे से उठकर मेरे साथ लेट गई।
‘अब क्यों आई हो?’
‘मेरे दिल ने कहा है कि आप ऐसा-वैसा कुछ नहीं कर सकते। आप एक वफादार दोस्त हैं।’

अब फिर उसने करवट बदल ली थी। मुझे याद है कि उस रात न तो वह सोई थी, न मैं। बस हम दानों की चिताएं अलग-अलग जल रही थीं। एक दीवार ऐसी थी जिसे हम चाहते हुए भी न लाँघ सके थे। जब सुबह उसने विदा ली तो उसकी आँखें अंगारों की भाँति सुलग रही थीं। फिर काफ़ी अरसे तक वह मुझसे नहीं मिल सकी। इस दौरान मुझे ख़बरें मिलती रही कि उसकी माँ उसके लिए कोई लड़का तलाश रही है। इस बार तीन साल बाद वह फिर कैंप पर पठानकोट आई थी। दफ्तर से मैं लौट रहा था कि उसने रिक्शा रोक कर आवाज़ दी। रिक्शा वाले को पैसे देकर उसने छोड़ दिया। मैंने उसे मुबारकबाद दी और उसने मुझे। उस वक्त मुझे अहसास हुआ कि ऐसे मौकों पर मुखौटे कितने ज़रूरी हो जाते हैं। फिर भी उसकी मुस्कराहट का जवाब मैंने मुस्कान से ही दिया। उसकी इस, मुस्कराहट ने मेरे शरीर में पल भर के लिए सिहरन सी पैदा कर दी थी। उसका एयर-बैग उसके कंधे पर था।
‘तुम बेहद खुश हो न। बड़े अच्छे लड़के से तुम्हारी सगाई हुई है! ’
‘सुना है आपको भी अच्छी लड़की मिल गई है।’ उसने मुस्करा कर कहा।
‘यह अंगूठी सगाई की है?’ अब हम कमरे में बैठे थे। अंगूठी देखने के बहाने उसने मेरा हाथ थाम लिया।
‘हाँ।’ मैंने उसके गंदुमी चेहरे को निहारते हुए कहा।
‘मुझे भी उन्होंने सगाई की अंगूठी भेजी है।’ मुझे सर से पाँव तक देखते हुए उसने कहा। ‘पर अंगूठी पहनने से मेरी अंगुली पर छाले पड़ गए हैं।’
‘सच्ची?’ छाले देखने के बहाने मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी पतली-पतली उंगलियों को मैं चूमना चाहता था। पर मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो अंगूठी मुझे अंगूठा दिखा रही हो। फिर मैं उसकी अंगुलियों को अपने हाथों से सहलाने लगा। वह कितनी ही देर तक शून्य दृष्टि से मुझे देखती रही।
‘आपकी मंगेतर कैसी है?’ कुछ देर बाद वातावरण की ख़ामोशी तोड़ते करते हुए उसने कहा।
‘सांवली सी है, परंतु उसका कद मुझसे बहुत छोटा है।’ उसकी तरफ देखते हुए मैंने कहा।
‘तुम्हारा मंगेतर कैसा है?’
‘उसका कद भी छोटा है।’

फिर अचानक मुझे गुज़रे पलों की याद हो आई। जब वह कहा करती थी, ‘रवि जब हम साथ-साथ चलते हैं तो लोग हमें बड़ी हसरत भरी निगाहों से देखते हैं।’
कई बार तो वह कहा करती थी, ‘आपके साथ चलने का तो मज़ा ही आ जाता है। लोग कहते तो हैं कि कितनी सुंदर जोड़ी है।’
अचानक पता नहीं उसे क्या सूझा कि कहने लगी, ‘हम क्यों न ऐसा करें, आप अपनी मंगेतर की शादी मेरे मंगेतर से.....।’
‘तो?’
‘हां फिर,फिर....!’ मोती जैसे चमकीले दाँतों से वह अपना निचला होंठ काटती रही और एक दीर्घ निश्वास लेकर ख़ामोश हो गई।
‘इन्सान की हर ख़्वहिश पूरी नहीं होती!’
‘आईए। कहीं बाहर चलें यहां तो आज दम घुट रहा है।’

हम दोनों कॉफी हाउस में जा बैठे। मद्धम रोशनियां मानो किसी का मातम कर रही थीं। ‘शादी पर आएंगे न?’ वह मानो मुझे घर आने का निमंत्रण दे रही थी।
‘देखूंगा।’
‘क्या देखूंगा ?’
‘यही कि मैं गया तो लोग क्या कहेंगे?’
‘यदि आप नहीं गए तो लोग क्या चुप रहेंगे?’
‘तुम्हारी डोली विदा होते मुझसे नहीं देखी जाएगी।’
‘कोई मुश्किल नहीं देखने में। आप डोली को अर्थी समझ लीजिएगा बस!’ जब उसने यह बात कही तो उसकी आंखें छलछला आईं थीं।
‘आज मेरे साथ बाजार चलिए।’ वह अचानक उठ खड़ी हुई।
‘अब हम कब तक यूं एक दूसरे से मिलते रहेंगे?’
‘शायद आज अंतिम बार।’ उसने बुझे स्वर में कहा।
‘अंतिम बार, पर ऐसा तो तुम कई बार कह चुकी हो।’
‘आपको पता नहीं, आज क्या है?’
‘करवाचौथ!’
‘तो?’
‘मैंने आज व्रत रखा है। इसलिए इतनी दूर से चलकर आपके पास आई हूँ।’

हम बाज़ार की तरफ चल पड़े। बाज़ार में करवाचौथ क़ी काफी गहमा- गहमी थी।
‘मुझे चूड़ियां खरीद दीजिए।’ अचानक वह एक दुकान के सामने रुक गई।
‘चूड़ियां?’
हां, चूड़ियां!’
‘ये सुहाग का प्रतीक होती हैं।’
‘परंतु मैं... मैं कैसे खरीद दूं? यह मेरा हक नहीं।’ मैंने उसकी दुबली पतली कलाइयों को देखा।
‘क्यों? आज तो आप ही को लेकर देंगे। अगली बार पता नहीं...।’ उसका स्वर भर्रा गया था। शायद इसलिए वह आगे कुछ न बोल पाई।
‘देखिए तो कौन सी फबेगी मुझ पर?’
‘तुम खुद ही देख लो।’
‘नहीं, ये चूड़ियां तो आपकी पसंद की ही पहनूंगी।’ मैंने हरे रंग की चूड़ियों की तरफ इशारा किया। उसने वही पहन लीं।
‘पैसे दे दीजिए।’ उसने बीवी की भाँति आदेश दिया और मैंने एक आज्ञाकारी पति की भाँति पैसे निकाल कर पकड़ा दिए।
‘आज ऐसा महसूस हो रहा है, मानो मेरी शादी हो चुकी हो। यदि मैं आने वाले दिनों को याद न करूं तो मैं आज कितनी खुश हूँ।’
एक बाग में प्रेवश करते हुए उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। बीती यादों के प्रतीक मेरी आँखों के समक्ष उजागर हो गए। फिर हम बाग में एक बेंच पर बैठ गए। उसने अपना सिर मेरी गोद में रख दिया और लेट गई। मानो आज वह बीती बातों को दफ़न कर देना चाहती हो। ‘काश! ज़िंदगी आज की रात में ही ख़त्म हो जाती।’
‘परंतु ऐसा तो कभी नहीं होता।’
‘यह भटकन... अब और कितने जन्मों तक चलेगी?’ वह अजंता-अलोरा की टूटी मूर्तियों की भाँति पड़ी-पड़ी बुदबुदा रही थी। और मैं अंधेरे में से कुछ तलाशने की कोशिश कर रहा था। अचानक वृक्षों की ओट से चाँद दिखाई दिया। वह उठ बैठी।
‘चाँद निकल आया है। अब मुझे अर्घ्य देना है।’
फिर हम बाज़ार की रोशनियों से गुज़र रहे थे। उसने हलवाई की दुकान से कच्चा दूध लिया और चाँद को अर्घ्य दिया। शांत वातावरण में हम भी ख़ामोश चल रहे थे। माल रोड भी सुनसान थी। फिर एक ऐसा दोराहा आया, जहां हमें एक दूसरे से अलग होना था। वह मेरे गले से लिपट गई और सुबक-सुबक कर रोने लगी। मिट्टी बना मेरा हाथ उसकी पीठ सहला रहा था। कुछ क्षणों के पश्चात् मैंने खुद को उसके आलिंगन से मुक्त किया और चुपचाप पुल की तरफ बढ़ गया। पुल पर पहुंच कर मैंने पीछे मुड़कर देखा। वह बिजली के खंभे से लगकर अभी भी सिसक रही थी। अगले ही पल उसने चूड़ियों वाली कलाइयां बिजली के खंभे पर दे मारी। चूड़ियों के टूटने की आवाज़ मेरे कानों से टकराई। टूटी चूड़ियां मानो मेरे दिल को लहूलुहान कर गईं। अब मैं पुल की ढलान से उतर रहा था और वह अपनी टांगे घसीटते हुए दूसरे पुल पर चढ़ रही थी।


अनुवाद – नीलम शर्मा ‘अंशु’
साभारअक्षर भारत, नई दिल्ली, 18 नवंबर, 1996

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