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रविवार, फ़रवरी 11, 2018

वृहनल्ला: ग्लानि, गाली या लैंगिक विकृति ?

                                                                                      डॉ. मुक्ता टंडन







चेहरे पर भरपूर रंगरोगन, होंठों पर चटक लाली, तन पर रंग बिरंगी भड़कीली साड़ी, आकर्षक केश सज्जा, गहनों से सजा शरीर, ख़ुशी के हर मौके पर नाचते गाते और विशेष करतल ध्वनि से लोगों का ध्यान आकर्षित करते व्यक्ति जिन्हें लैंगिक सन्दर्भ में हिजड़ा, उभयलिंगी, नपुंसक, किन्नर, क्लीव, थर्ड जेंडर या ट्रांस जेंडर आदि नामों से पुकारा जाता है। धर्म या जातिगत विभेद इनमें नहीं होता। भारतीय समाज में यह लैंगिक वर्ग उपेक्षित व हास्य का पात्र रहा है तथा किसी पुरुष की मर्दानगी को उक्त संबोधनों से व्यंग्यात्मक लहजे में संबोधित किया जाता है। शरीर के किसी भी अंग में विकृति होने पर संतान को त्यागा नहीं जाता पर जननांग का विकास न होने पर ऐसे अबोध बच्चों का त्याग एवं समाज द्वारा की जाने वाली अनदेखी इनके आत्मसम्मान को सदैव ठेस पंहुचाते हैं।

संतानोत्पत्ति की धुरी पर ही समाज की सोच टिकी है।ऐसे में लैंगिक विकृति से ग्रस्त बच्चे व युवा समाज की मुख्यधारा से हमेशा कटे रहते हैं। अभिभावक भी इनका त्याग कर समाज के प्रति जवाबदेही निभाते हैं। भावनात्मक रूप से इस प्रकार के बच्चों  को ज्यादा स्नेह की आवश्यकता होती हैं इसके विपरीत इन से जीने का हक ही छीन लिया जाता है। न ये स्त्री है न पुरुष इसमें स्वयं का कोई दोष न होते हुए भी तिरस्कार का दंश आजीवन ये भोगते हैं। किन्नर समुदाय का रहन सहन रीति रिवाज अलग थलग होता है। इनका जीवन स्त्रीयों व दलितों से भी निकृष्ट कोटि का हैं।निस्संदेह इस समुदाय पर पर साहित्यिक विमर्श अपेक्षित है।

इन विसंगतियों के अतिरिक्त कभी कभी जबरन किन्नर बनाये जाने की घटनाएँ भी संज्ञान में आती है।कई बार माता पिता से बलात इन विशेष बच्चों को उक्त समुदाय के जाता है।इतना ही नहीं किन्नर होने की आड़ में गुंडागर्दी और शारीरिक शोषण भी होता है। रहस्यमयी वातावरण से घिरे किन्नर समुदाय के तिलिस्म पर डॉ.एम.फीरोज़ खान द्वारा सम्पादित 'हम भी इंसान हैं' पुस्तक प्रकाश डालती है। डॉ. खान ने किन्नर समुदाय से जुडी 21 कहानियों का एकत्रीकरण कर संपादन किया है। जिनमें नए सन्दर्भ की आशा, नकारात्मक दृष्टिकोण, स्वावलंबन, स्वाभिमान,नाटक, छल आदि अनेक रूपक हैं ,जिनसे उक्त वर्ग के सभी पहलूओं पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

उक्त संग्रह की कहानियों में किन्नर होने का दर्द समाहित है।  एक किन्नर अपने जीवन की इस अपूर्णता का दंश जीवन के अंतिम क्षण तक भुगतता है। जिस बच्चों को इस अक्षमता का भान ही नहीं होता उनके सत्य को जान कर जब समाज मखौल उड़ाता है तो यही प्रतीत होता है कि क्लीव हम हैं जो इस सामाजिक अनाचार को स्वीकारने हेतु विवश हैं। समय के साथ कहीं न कहीं सोच में परिवर्तन आना जरुरी है। किन्नर होने का ये अर्थ  नहीं है कि वे इस त्याज्य भाव को नियति मानकर स्वीकार कर ले अपितु उन्हें अपने अस्तित्व के स्थायित्व के लिए संघर्षरत रहना चाहिए। संग्रह की पहली कहानी 'कुकुज़ नेस्ट' ऐसी ही कहानी है जिसमें किन्नरों के सामाजिक अधिकारों एवं बुनियादी जरूरतों की विस्तृत विवेचना की गई है। 'समाज में शारीरिक व मानसिक रूप से विकलांग लोग भी होते हैं वे अपने श्रम और उत्साह से सामान्य जीवन जी सकते हैं। फिर हम क्यों नहीं?...लैंगिक विकृति की इतनी बड़ी सजा क्यों?'सिर्फ नाचना-गाना कर जीवन यापन करने के बजाय इन्हें भी व्यवसायिक प्रशिक्षण देकर सुविधा मिल सकती है और मुख्यधारा में लाने का प्रयास भी हो सकता है परन्तु फिर भी ऐसा नहीं हो पाता इन्हें अपनी पहचान छुपा कर ही सफलता मिलती है।

'कबीरन' कहानी भी हृदयस्पर्शी है जहाँ घर वापसी के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं। मुख्यधारा में आने का दिवास्वप्न टूटने का कारण यही है कि किन्नरों को सामान्य जीवन जीने को नहीं मिलता बल्कि संवेदनहीनता का परिचय दिया जाता है। इस कहानी की पंच लाइन है 'समय ने रिश्ते के दरिया को सुखा दिया है। उसके सामने केवल मरुस्थल है।'कबीरन की इस दशा का उत्तरदायी कौन है परिवार या समाज?अस्तित्व की लड़ाई के इस जद्दोजहद में कबीरन का चरित्र निखर कर सामने आया है। अपने भाई से वह घर वापसी के विषय में स्पष्ट मना कर देती है क्योंकि पुन: वह मानसिक व शारीरिक दंश भोगना नहीं चाहती।

'गली आगे मुड़ती है' नील की कहानी है जिसने सबसे अपनी  असली पहचान छुपाई और मुंबई में फैशन डिजाइनर बना इतना ही नहीं उसने   समाज की सताई  रायना को भी पहचान दिलाई मन ही मन दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे लेकिन नील ने उसे भी अपनी सच्चाई नहीं बताई। अपने घर से दूर बनाई गई पहचान से वो खुश था इसलिए डरता भी था। रायना पर उसका राज जाहिर हुआ तो वो दूरी बनाने लगा लेकिन रायना ने उसके साथ दोस्त की तरह खड़े रहने का फैसला लिया वह जानती थी नील को सहानुभूति की नहीं साथ की ज्यादा जरुरत है। जिसके लिए किसी रिश्ते में बंधने के वो मोहताज नहीं हैं।

'मैं फूलमती और हिजड़े' कहानी स्त्री शोषण की कहानी है। सीमा स्वाभिमानी स्त्री है जो विवाह के बाद नौकरी छोड़ने की सोचती है। फूलमती से मिलने पर उसे अपने जीवन के ही एक पक्ष का दर्शन होता है। दोनों स्त्रियों ने जिन पुरुषों को पति के रूप में चुना था वे पुरुष के नाम पर कलंक हैं जिनके लिए स्त्रियाँ अपने स्वार्थ के लिए सौदे की चीज़ हैं। फूलमती को बिहारी धन के लिए और सीमा  को मयंक अपनी तरक्की के लिए अस्त्र बनाते हैं। फूलमती को एक किन्नर इस कीच से बाहर निकालता है पर फूलमती को जिल्लत उठानी पड़ती है लेकिन वो इन सबका सामना करने को तैयार है।  इससे सबक लेकर सीमा भी मयंक की जिद के आगे झुकने से इनकार कर देती है। प्रश्न ये उठता है कि इस नीच कर्मों से पुरुष का पुरुषत्व खंडित नहीं होता वह फिर भी मर्द है और पुरुषत्व का प्रदर्शन करने वाला किन्नर क्लीव। वास्तविकता तो ये हैं बिहारी और मयंक जैसे पुरुष वास्तव में नपुंसक हैं जो स्त्री को भोग की वस्तु की तरह इस्तेमाल करने से भी नहीं हिचकते।

'नवाब' अत्यंत मार्मिक कहानी है जिसमें एक किन्नर के ममत्व को प्रस्तुत किया गया है कुछ वर्ष पहले परेश रावल अभिनीत तमन्ना फ्लिम की पृष्ठभूमि यही थी। फर्क इतना है कि नवाब बच्ची जया के लिए वो जिन्दगी छोड़ देता है रिक्शा चलाता है उसे पालता है पर उसके इस संवेदात्मक पक्ष का मजाक उड़ता है। जया को अपनी किडनी देकर उसके प्राण बचाता है। उसे हॉस्टल मिलने नहीं जाता ताकि उसका भविष्य ख़राब न हो उसके विवाह के समय आशीष देने के लिए वह वही रूप धारण करता है। और जया को खुश देखकर अंतिम यात्रा पर चल देता है। एक सामान्य पिता से बढकर वह अपनी सभी जिम्मेदारियां बखूबी निभाता है।

'मन मरीचिका' ट्रांसजेंडर की लिंग परिवर्तन की कथा है जहाँ विज्ञान का सहारा लेकर सुलोचना मानव को कुंठित जीवन से बचाकर मनु के रूप में परिवर्तित देखकर प्रसन्न होती है। संघर्ष यहाँ भी अधिक था पर मानव का भीतरी रूप ही उसका वास्तविक  रूप था लेकिन समाज व परिवार के आगे इसे स्वीकार कर पाना मानव के लिए कठिन था।  सुलोचना और ऋचा उसे मनोवैज्ञानिक स्तर पर तैयार करती हैं ताकि वो घुट घुट के न जिए। जिस तथ्य को मानव के अभिभावकों ने जरुरी नहीं समझा उसका मित्र मण्डली ने न केवल संज्ञान लिया अपितु मानव को इस नए परिवर्तन के लिए तैयार भी किया।

'मैमूना, मोमिना और मैनू' एक ऐसे घर की कहानी है जहाँ एक बच्ची को छोड़ कर शेष सभी बच्चे किन्नर हैं। बड़ा होने पर मैमूना,मोमिना और मैनू अपने भांजे अशरफ को पालते हैं पर जब समाज के आगे रिश्ते स्वीकार करने की बात आती है अशरफ अपने पिता के पास चला जाता है। भले ही मजबूरी में वे तीनों अपने दिल पर पत्थर रख अपनेपन का घाव सह लेते हैं। स्वार्थ का रिश्ता यहाँ वर्णित है।

'ज्योति सूना नयन' उन अधूरे एहसासों की कहानी है जो सामाजिक पूर्णता के मोहताज नहीं हैं। दो अपूर्ण भी प्रेम  व स्नेह से अपने जीवन को पूर्ण कर सकते हैं। समाज में शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों को सामान्य दायरे से बाहर ही रखा जाता है। भावनात्मक तौर पर उनकी अनदेखी की जाती है। जब अपने ही जैसे किसी व्यक्ति से उन्हें स्नेह  मिलता है तो जीवन संघर्ष सरल हो जाता है। अगर विकास के पास दृष्टि होती और सामान्य डील डौल होता तो कल्पना की अपूर्णता उसे मान्य न होती। अंतर्मन की ज्योति से कल्पना जैसे साथी को पाकर वह अपने जीवन में सफलता के चरण चूमता है। यदि मन में हौसला हो और आगे बढने की ललक हो कोई भावनात्मक सहारा दे तो अक्षमता पैरों की बेडी नहीं बन सकती।

'एक किन्नर की लव स्टोरी' प्रेम की पराकाष्ठा और धोखे दोनों को व्यंजित करती है। किन्नर भी प्रेम भावना रखते हैं जब कोई उनसे प्रेम की भावना को अभिव्यक्त करता है तो वे भी सामान्य स्त्री की तरह विश्वास में सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं लेकिन ये प्रेम जब छलावा बन जाता है तब उन्हें अपनी इस अंधी प्रेम भावना का मूल्य प्राण देकर चुकाना पड़ता है।

'समर से सुरमई' समाज की वह सच्चाई है जिसमें एक माँ अपनी संतान को किन्नर होने के सामाजिक अभिशाप से नहीं बचा पाती क्योंकि स्वयं उसका पति ही अपने घर की लाज बचाने के लिए अबोध संतान को शोषण के अंध कूप में पहुचाता है। असली नपुंसक तो वह पिता है जो अपनी संतान के अधिकार व सुरक्षा का दायित्व निर्वाह नहीं कर पाया।

'अँधेरे की पर्ते' भी एक माँ के ऐसे ही असफल संघर्ष को व्यक्त करती है। एक माँ की दृष्टि में उसके बच्चे दुनिया में विशेष होते हैं। निशा ने जिस जन्म दिया वह विशेष ही था इतना विशेष की उसके पिता ने किन्नर समुदाय में देने का निश्चय कर लिया ऐसे में निशा संरक्षक की भूमिका निभाती है पर समाज की दृष्टि से परेश को बचा नहीं पाती। जिस जीवन को वह रक्षित करती रही उसे और अपनी सांसों दोनों को खो दिया।

'नियति' रीतेश के रितु बनकर उसी आँगन में  खड़े होने की कहानी है जहाँ उसने अभिशप्त जीवन बिताया था। पुन: घर वापसी को वो नकार देता है। अब उसका समुदाय ही उसका परिवार है। माता पिता का प्रेम भले ही उसे पिघला देता पर समाज की सोच को नहीं बदल सकता था इसलिये अपनी नियति दूसरों की ख़ुशी में तलाशता है।
'अपना दर्द' कहानी में किन्नर समुदाय के भीतर होने वाले शोषण और आगे बढ़ने की ललक के जुझारूपन पर प्रकाश डाला गया है।सिर्फ नाचना,गाना,गाली सुनन,लूटपाट या शारीरिक भोग ही किन्नरों की नियति नहीं है यदि सही मार्गदर्शन मिले और कुछ कर गुजरने की इच्छा हो तो समाज प्रदत्त दंश से काफी हद तक मुक्ति मिल सकती है।

'भूमिजा' एक प्रेरणादायी कहानी है उन अभिभावकों के लिए जिन्हें अपने बच्चो को भाग्य भरोसे छोड़ने के बजाय मेडिकल साइंस का सहारा लेकर जन्मजात विकृति का इलाज कराकर मुख्य धारा में जोड़ दिया। भूमिजा को उसके माता पिता जमीन में गाड़ देते है लेकिन फूलमतिया उसे लेकर अपने मालिक-मालकिन के पास जाती है जो उसे पालते हैं और इलाज करवा कर सामान्य जीवन जीने में सहायता करते हैं। इस प्रकार का इलाज मंहगा होने से अधिकांश बच्चे किन्नर का अभिशप्त जीवन बीताने को विवश हैं। इस प्रकार की लैंगिक चिकित्सा यदि सस्ती दरों पर मिले तो अधिकांश बच्चे इस पीड़ादाई जीवन से बच सकते हैं।

'पद्मश्री थर्डजेंडर'  उन अभिभावकों व बच्चों के लिए प्रेरणादायी कहानी है जो सामाजिक अनदेखी को झेलते और संघर्ष की राह पर चलते हुए कुछ ऐसा कर जाते हैं जिससे समाज में उनकी प्रतिष्ठा बनती है। महीधर  पर्वतारोही बन कर ये सिद्ध करता है कि हौसला और अपनों का साथ हो तो ये विशेष बच्चे भी क्या कुछ नहीं कर सकते।

'ट्रांसजेंडर' उन व्यक्तियों की मनोदशा को व्यक्त करता है जिनमें लैंगिक दोष नहीं होता पर आचरण से वे समलैंगिक होते हैं। यह समस्या मनोवैज्ञानिक होती है और इसका उपचार संभव है परन्तु इस प्रक्रिया में समर्पण,धैर्य और प्रेम की आवश्यकता होती है।किशोरवय संतानों की इस पीड़ा को यदि अभिभावक नहीं समझेंगे तो बच्चे  किससे अपनी समस्या कहेंगी? जेंडर ट्रांसप्लांट को गलत समझना सही नहीं है कुमुद के पिता इस सत्य को स्वीकार न कर सके और बीमारी से ग्रस्त हो वे मृत्यु को प्राप्त हुए ।कुमुद की माँ ने अपनी संतान की मनोभावना को समझा और उसका साथ दिया।

उक्त संग्रह की पांच कहानियां अनूदित हैं एक एक उर्दू व बांग्ला और तीन पंजाबी भाषा से गृहीत है। 'मृत्यु के बाद किन्नर का अपनी माँ को ख़त' एक मार्मिक कहानी है जिसमें किन्नर पुत्र का दर्द अपनी माँ के नाम वर्णित है। माँ का हृदय संतान के लिए दुनिया से भिड़ जाता है पर कठिन चुनाव तब होता है जब उसे अपने सुहाग और किन्नर संतान में से किसी एक को चुनना होता है। जन्म के सम्बन्ध भी तब झूठे सिद्ध हो जाते है। वह संतान सारी शिकायत और व्यथा माँ से कह सकती है और ये अपेक्षा करती है की क़यामत के दिन उसकी अम्मी खुदा के सामने अपनी संतान का पक्ष ले सके। क्या विडंबना है अपंग बच्चों को माटा पिता और समाज सहज स्वीकार करता है पर इन अपूर्ण बच्चो के लिए अपना कोई फ़र्ज़ नहीं निभाता।

'वृहनल्ला' अर्चना नाम की किन्नर की कहानी है जिसकी भेंट मऊ और सुवर्णा से लोकल ट्रेन में होती है। मऊ उससे सामान्य व्यवहार करती पर सुवर्णा को उसकी हरकतें एवं बातें सही नहीं लगती अर्चना से शुरू हुई नोक झोक में सुवर्णा उसे अभद्रता से इस सत्य से अवगत कराती है कि वह स्वयं को स्त्री समझने की भूल न करे। हंसी मजाक में शुरू हुआ किस्सा घातक सत्य पर जाकर समाप्त होता है।

'खामोश महाभारत' पौराणिक प्रतीक पर रचित कहानी है।महाभारत में अरावन नामक पात्र का वर्णन है जिसकी बलि से ही पांडव विजयी हुए अरवल की एक शर्त थी कि उसका विवाह हो परन्तु एक दिन की सुहागन बनने के लिए कौन स्त्री तैयार होती। ऐसे में कृष्ण ही स्त्री का रूप धारण करते हैं और बलि के बाद विलाप भी करती हैं। चेन्नई के निकट कुमागम में अरावन का मंदिर है जहाँ किन्नर उनसे विवाह कर अगले जन्म में ऐसा दंशमयी जीवन उन्हें न मिले। निरंजना भी यही  आस लिए  अरावन से विवाह कर अपने इस जीवन से मुक्ति चाहती है। किन्नरों को अपना सारा जीवन उसी विलाप की तरह बिता होता है जैसा विलाप कृष्ण ने अरावन की पत्नी के रूप में किया था।

'खौदा चाचा' में जवाहर लाल नेहरु के प्राण बचाने वाले  किन्नर खौदा चाचा का भले ही ऐतिहासिक महत्त्व न हो पर इतना तो तय है कि उन्होंने सामान्य मनुष्य से ज्यादा बहादुरी दिखाई। उन्होंने अपना जीवन समाज सेवा के नाम कर दिया। एक ऐसी पीढ़ी तैयार करने लगे जो जागरूक  और स्वावलंबी हो।

'किन्नर' कहानी में वर्णित है कि कभी कभी पुरुष भी किन्नर का भेष धर कर शारीरिक शोषण भी करते हैं तेरह वर्षीय बच्ची जब अपनी माँ से किन्नर और संतानोत्पत्ति विवाह सम्बन्धी प्रश्न पूछती है तो माँ ये कह कर चुप करा देती है कि बड़ी हो जाओगी तब पता चलेगा। ऐसे में मरियम उसे नीलू किन्नर से मिलाती है और नीलू वास्तव में पुरुष है और दोनों लड़कियों का शोषण करता है। जब तक इस बात का पता चलता है तब तक बहुत देर हो जाती है।

कहते है कि भगवान शिव ने प्रकृति व पुरुष के सम्मिलन और सामंजस्य को सिद्ध करने के लिए भृंगी ऋषि के पुरुषवादी अभिमान को नष्ट करने हेतु शिव शक्ति का मिश्रित अर्द्धनारीश्वर रूप धारण किया था। आधा पुरुष आधा स्त्री का यह मिश्रण हम धार्मिक तौर पर पूजते हैं पर जब वही गुण  एक मनुष्य में अनुवांशिक दोष  से आता है तो उसे मुख्य धारा से पृथक कर एक अभिशप्त जीवन जीने को बाध्य कर देते हैं । वास्तव में नपुंसक तो हमारा  मनोग्रन्थि व मर्दानगी के दंश से युक्त समाज है जो इस प्रकार का दोहरा व्यवहार करता है जबकि देवता भी ललित कला सीखने किन्नरों के पास जाते थे। श्री राम ने किन्नरों को वरदान दिया कि कलयुग में इन्हें व्यापक सम्मान मिलेगा। महाभारत काल में  शिखंडी के सामने भीष्म पितामह ने अस्त्र रख दिए और श्राप को  स्वीकार किया। वृहनल्ला के रूप में अर्जुन ने अपना पुरुषत्व गर्व खंडित कर अज्ञातवास पूरा किया। समाज में इस वर्ग के प्रति जो धारणा है वह नकारात्मक है बावजूद इसके कुछेक मात्रा में किन्नर अपने आत्मसम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए संघर्षरत हैं। हिंदी साहित्य वर्ग इनके संघर्ष में कदमताल मिलाने को तत्पर है यह संतोषप्रद स्थिति है। श्री राम के वरदान को अभी फलीभूत होने में काफी समय है।किन्नर समाज को धीरे धीरे पहचान मिल रही है 'अन्य' के कॉलम से 'थर्ड जेंडर ' तक पंहुचने में कई वर्ष लग गए। सामाजिक न्याय, राजनीति तथा कानून की त्रयी ही उन्हें मुख्य धारा में स्वाभिमान से जीना सिखा सकती है। इसके साथ ही पारिवारिक सहयोग भी अपेक्षित है। पुरुषत्व से जुडी रूढीवादी सोच में बदलाव आवश्यक है ।  लैंगिक विकृति के साथ जन्मे बच्चे अभिशप्त  नहीं होते हैं उनके भी वही मौलिक अधिकार हैं जो सामान्य बच्चों को प्राप्त हैं। किन्नर भी इंसान है, उनका दमन नहीं वरन उत्थान आवश्यक है। नारी और दलित विमर्श के उपरान्त अब किन्नर विमर्श पर हो रही चर्चाओं से स्पष्ट है कि धीरे धीरे  ही सही किन्नर वर्ग की जिजीविषा को कलम का साथ मिलने लगा है और उनके जीवन -रहस्य से पर्दे उठने लगे हैं।

सं. डॉ. एम. फीरोज खान, हम भी इंसान है
 (किन्नरों पर केन्द्रित कहानियां)
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द्वारा श्री जय किशन टंडन, 130, सुभाष नगर, गोंडा (उ.प्र.)
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साभार प्रस्तुति  :   नीलम शर्मा 'अंशु'






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