सुस्वागतम्

"संस्कृति सेतु" पर पधारने हेतु आपका आभार। आपकी उपस्थिति हमारा उत्साहवर्धन करती है, कृपया अपनी बहुमूल्य टिप्पणी अवश्य दर्ज़ करें। -- नीलम शर्मा 'अंशु'

बुधवार, फ़रवरी 21, 2018

कहानी श्रृंखला - 20 / (पंजाबी कहानी) खौदा चाचा - चंदन नेगी

                                                     
                             

 पंजाबी कहानी                 खौदा चाचा       
                            
                                                              
                                                          चंदन नेगी                                           
                              अनुवाद -  नीलम शर्मा अंशु


      पाकिस्तान से लोग विस्थापित होकर काफ़िलों में आए थे। कुछ पैदल, कुछ बैलगाड़ियों पर, कुछ गाड़ियों में।  हर शहर में हर जगह लोग ही लोग नज़र आते थे। स्कूलों-कॉलेजों, गुरुद्वारों, खाली मैदानों में सरों के झुरमुट, लोगों का रोना-धोना, बच्चों-बुजुर्गों का भूखे तड़पना, कैसे जिंदगी थी यह ? कैसे दिन और कैसी रातें ?  लहू से लथ-पथ समय साँप की भाँति रेंगते हुए, घिसट कर गुज़र रहा था। समय को मानो पक्षाघात हो गया था। समय तो सरक भी नहीं सकता था, समय के गुज़रने की बात तो दूर थी। कैंप में हर तरफ एक जैसी बातें। किसका कौन, कैसे मारा गया, कौन बच गया, कौन कुछ थोड़ा बहुत पैसा-धेला लेकर आया है?  कौन तन पर पहने कपड़ों सहित खाली हाथ, नंगे पाँव।
      धीरे-धीरे लोग कैंपों से तितर-बितर होना शुरू हो गए। स्वाभिमानी लोगों ने तो लंगर खाने की बजाय अपने टैंटों के बाहर चूल्हा बनाया, छाबड़ियां लगाईं और रोज़ी-रोटी कमा कर खाने लगे। शहरों में लोगों ने कमरे किराए पर ले लिए।  कईयों ने मुसलमानों के घरों के ताले तोड़े और घुस गए। ज़िंदगी धीरे-धीरे सरकते हुए आगे बढ़ने लगी।  लोगों को एक दूसरे से, रेडियो और अखबारों की ज़रिए अपने रिश्तेदारों की खोज-ख़बर मिलने लगी। एक-दूसरे से मिल-मिलाकर बिछड़ों के लिए आँसू बहा कर शाँत हो गए थे। और बचे-खुचों की ख़ैर मनाते हुए पेट पालने लगे थे।
       बस में बैठे मरदान मामा जी को किसी तरह मेरे पापा जी को भी गर्दन में गोली लगने का पता चला था और भापा जी मुझे साथ लेकर जम्मू से पटियाला की ओर रवाना हो गए थे।
        मामाजी के घर पर एक बहुत बड़ा आदमी आया था, साढ़े छह फुट की उसकी कद-काठी, गोल बड़ा सा चेहरा, चेहरे का रंग सिंदूरी, माथे और गर्दन पर ढेर सारा माँस, बड़ी चौड़ी सी छाती, मिचमिची सी छोटी-छोटी आँखें, मोटे होंठ, हाथ में चाँदी के शेर की गर्दन वाली लंबी सी लाठी।
      मेहर साईं की, चाचा पैरीपैणा ”, मामी जी ने थोड़ी सी गर्दन झुका कर लंबे से घूँघट में से कहा। मैं हैरान थी, इस चाचा को तो कभी देखा नहीं था। दूधो नहाओ, पूतो फलो, सदा सुखी रहो उसने मामी जी की तरफ हाथ उठा कर आशीष दी थी। 
      मैं मामी जी के पीछे छुप गई थी। मौसी जी के दुपट्टे के छोर दोनों हाथों में कसकर पकड़ लिए थे। डर गई थी कि यह कैसा मर्द है ?  न चेहरे पर मूँछ और दाढ़ी, न बाँहों पर मर्दों जैसे बाल, गले की चमड़ी भी नरम-नरम मुलायम सी दिख रही थी।
      यह लड़की कौन है”? उसने मेरी तरफ देख कर पूछा। मेरी तो जान ही सूख गई।  मुझे लगा राजकुमारी और दानव की कहानी वाला दानव है। रात को सोते समय मामा जी कहानी सुनाते थे तो मैं अपने आप को राजकुमारी या परी मान लेती थी। मुझे लगता था कि  वह दानव मुझे भगा कर पहाड़ियों, गुफाओं में कैद कर देगा और जो राजकुमार मुझे छुड़ाने आएगा उसे भी वह मार डालेगा।
      मैं कनखियों से उसे सर से लेकर पाँव तक बार-बार देखती रही थी और डर से काँपती रही थी। मामा जी ने उसके चेहरे की तरफ देखते हुए कहा, हमारी बहन संत कौर जो पेशावर में ब्याही हुई थी और जो छोटे-छोटे बच्चे छोड़ गुज़र गई है उसी की बेटी है यह।
            उस आदमी ने मेरे सर पर हाथ फेरा, सत्गुरु रक्षा करे।  सर पर उसके हाथ के स्पर्श से मैं पूरी की पूरी सिकुड़ गई थी। उसकी घुटनों तक लंबी खुले घेर वाली बोस्की की कमीज़, उलटे प्लेटों वाली खुली सलवार, रेशमी मुशद्दी पगड़ी, काली पठानी चप्पलें, मुझे वह बहुत ही अजीब सा लगा।
      चाचा कहवा पीसे (पीओगे ) ?”  मामा जी ने पूछा।
      लै लैसां ( ले लूंगा)......  सुनकर मेरी तो हालत ख़राब। उस आदमी ने दोनों बाँहें उठाकर ज़ोर से अंगड़ाई ली। मुझे लगा इस आदमी की बाँहें आसमान के पेट में घुस जाएंगी।
       बहू भला हो तुम्हारा, तुम्हारे बच्चे जिएं, सदा सुखी रहो। मुझे इतने दिन अपने घर रखा। बहुत ही ख़याल रखा मेरा।
            अब बात यह है कि मैंने यहीं गली में एक अलग कमरा ले लिया है। तंदूर से दोनों वक्त की रोटी का इंतज़ाम भी कर लिया है। दु:-सुख के वक्त आप लोग तो पास हैं ही। बहुत सेवा की है आप लोगों ने मेरी। नहीं तो आजकल इस मुसीबत में कौन किसी को पूछता है? ”


 चाचापैसे खर्चा ? कहाँ से करोगे ? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है।
      “”अब फिक्र की कोई बात नहीं। मुझे सभी कह रहे हैं कि मैं दिल्ली जाकर नेहरू से मिलूं। तुमने नेहरू की जान बचाई है – नेहरू अब आज़ाद हिंदुस्तान का बादशाह हैचाचा तू जाकर नेहरू से मिल। हुआ यूँ कि आज़ादी की लड़ाई में हम सवात (नो मैन लैंडस् के एक शहर का नाम) में रहते थे। मेरा पिता नवाब साहब का पक्का दोस्त था। और मैं अपने पिता की इकलौती औलाद।  पैसा भी बहुत आया। पठान दोस्तों की बड़ी पलटन से दो-चार बार किन्नर भी मुझे लेने आए। उन्होंने बहुत शोर-शराबा भी किया। सरकारी दरबार में जाकर शिकायतें कीं। मुझे सवात के नवाब ने उनसे बचा लिया। उन दिनों हिंदुस्तान में आज़ादी का बड़ा शोर मचा हुआ था। बहुत से लोगों को फाँसी दी गईज़िंदा जलाया गयाकाले पानी की सज़ा दी अंग्रेज सरकार ने।
      मामी जी ने पीछे की तरफ मुँह फेरकर कहा,  खौदा चाचा किन्नरजो बेटे की पैदाईश और ब्याह के वक्त नाचने-गाने आते हैंवे गाते हैं रिमझिम बरसे बदरवा मस्त बहारें।
      मैंने खौदा चाचा को सिर से पैर तक एक बार फिर देखा और लगा यदि यह औरतों वाले कपड़े पहनकर हार-श्रृंगार कर के गहने पहनकर नाचे तो कैसा लगेगा ? इतना बड़ा किन्नर और खुद-ब-खुद  मुझे हँसी आ गई।
      खौदा चाचा बहुत ही रसूख वाला और दबंग था। सरकारी दरबार में उसकी पहुँच थी। अजीब सी उसकी पतली सी आवाज़ थी। सभी को उसके किन्नर होने के बारे में पता था परंतु किसी की भी उसके मुँह पर किन्नर कहने की हिम्मत नहीं हुई थी। वह लोगों के अनेक काम संवार देता। किसी लड़ाई- झगड़े के वक्त उसका फैसला पत्थर की लकीर होता। वह जहां से गुज़रता लोग असलाम-ए-लेकुम कह कर खड़े हो जाते थे।  हर दु:ख-तकलीफ़ में लोगों की मदद करता था। गरीब परिवार की लड़कियों के निक़ाह और आनंद कारज की जिम्मेदारी सदा खौदा चाचा की होती थी। बिरादरी की बहुएं बित्ते भर लंबा घूँघट निकालकर दु:ख-सुख चाचा के साथ सांझा कर लेती थीं। जड़ी-बूटियों के पुराने नुस्खों से वह बीमारियों का इलाज करता था। अपने सवात में वह एक केंद्र बिंदु थाजिसे हर छोटे-बड़े का फिक्र थी। उसके काफ़िले को पठान पेशावर के बॉर्डर तक छोड़ कर गए थे।
      चाचाफिर वापस आना।
      तब जवाहरलाल नेहरू आज़ादी की लड़ाई का बड़ा लीडर था। आज़ादी की लड़ाई और अंग्रेजो यहाँ से निकल जाओ हमें आज़ादी चाहिए। हर शहरहर सूबे में लेक्चर देता था। बहुत बार अंग्रेजों ने उसे गिरफ्तार भी किया और नाभा जेल में भी रखा था।  नेहरू पेशावर से दीरसवात शबजौड़ भी आया था। मैं भी नेहरू का भाषण सुनने आया। जवाहर लाल नेहरू जब जलसे में आया तो कई पठानों ने उस पर हमला कर दिया और उसे मारने लगे। नेहरू ज़मीन पर गिर पड़ा। मैं इतना ऊंचा लंबा सीधा शहतीर की भाँति नेहरू के ऊपर लेट गया। भीड़ ने मारा। मेरी पूरी पीठ पर नीले निशान पड़ गए। माथे से लहू बहा परंतु मैंने नेहरू को बचा लिया। आज़ादी के लिए लड़ रहे लोगों ने हमें बचाया।
       पाकिस्तान बना। मर्दाना पहुंचा। वहाँ कैंपों में पैसा न धेलाकई दिन भूखा रहा पर अमृतसर गुरु की नगरी में आप लोग मिल गए। मुझे लोगों ने सलाह दी कि मैं दिल्ली जाकर जवाहरलाल नेहरू से मिलूं। बहुत झिझकता रहा कि क्या कहूं उसे जाकर ? बड़ा आदमी बन गया हैप्राइम मिनिस्टर। कोई मिलने भी देगा ? एक तो लोग मुझे देख कर चलते बनते हैंमैं किसी को क्या कहता हूँ ? मैं तो खुद ही किसी के साथ बात नहीं करतालोग मेरी कद-काठी से डरते हैं।
      करम सिंह माल लेने दिल्ली गया तो मैं भी साथ चल दियायह सोच कर कि क्या पता जवाहर लाल नेहरु को सब याद हो और मुझे पहचान ले। मुझे देख कर लोग दूर-दूर क्यों हो जाते हैं ?  मैं क्या किसी को कुछ कहता हूँ ?”
      रब ने इतना बड़ा बनाया इसमें मेरा क्या कसूर है ? जहाँ जाता हूँ लोग दूर भागते हैं।“”
      अच्छा पूछते-पुछाते हम जवाहर लाल नेहरू के घर के पास पहुँचे। हाय रब्बाजितना बड़ा घर उतनी ही बड़ी पुलिस मानो चोरों के बड़े गिरोह को पकड़ना हो। मैं करम सिंह के साथ बड़े गेट के बाहर खड़ा हो गया। बहुत से और लोग भी खड़े थे। दूर से एक जीप दिखी तो लोगों में शोर-गुल शुरू हो गया। लोग जीप की तरफ दौड़े।  मैंने गेट से बाहर खड़े-खड़े ही ज़ोर से नेहरू जिंदाबाद कहा।  जीप मेरे पास आकर रुकी।  नेहरू ने मुझ मुझे देख कर हाथ हिलाया और जीप से उतर आया। मेरे पास खड़ा छोटा सा नेहरू सिर उठाकर मेरी तरफ बढ़ता रहा। उसने दो बार पठान सवात सवात कहा।
      पठान नहीं,  मैं सिक्ख हूँ गुरु गोविंद सिंह जी का। जवाहर लाल ने किसी आदमी से कुछ कहा। उस आदमी ने पुलिस ऑफिसर के साथ मुझे नेहरू के घर भेज दिया। दो घंटे वहाँ बैठा रहा। बहुत ख़ातिरदारी हुई। नेहरू पर लेट कर उसे पठानों की मार से बचाने वाली कहानी कई बार सुनानी पड़ी।
      दो घंटों बाद नेहरू बड़े लोगों से घिरा आयाबड़े तपाक से मिला। इस पठान ने सवात में मेरी जान बचाई थी। उसने सारा हालचाल पूछा और मेरी पाँच सौ रुपए महीना पेंशन लगा दी। बहुत पैसे हैं मेरे पास। अब गुज़ारा भी हो जाता है और आज़ादी भी मिल गई है। नेहरू ने यही पूछाओ पठान तुम ठीक तो हो ? कुछ चाहिए तो मुझे बताना इतना बड़ा जवाहर लाल नेहरु और मुझे पहचान लियाभला होअब मैं आप लोगों पर और बोझ नहीं बनूंगा। कुछ ज़रूरत हो तो मुझसे मांग लेने में शर्माना मत अच्छा ?”   
       और खौदा चाचा ने अपनी छोटी सी गठरी मामा जी के कमरे से उठा ली 500 रुपए महीना।  खौदा चाचा बहुत अमीर हो गया था। अपने शहर सवात में उसने मस्ज़िद में मौलवी जी से उर्दू लिखनी-पढ़नी सीखी थी और  गुरबाणी का शुद्ध पाठ उसने गुरुद्वारे के भाई जी से सीखा था। नितनेम की गुरबाणी उसने अपने बड़े बुजुर्गों से कंठस्थ की थी।




      खौदा चाचा का शाह-गुमाश्ती का काम तो सवात में ही रह गया था। अब वह खाली थाअपना घर थापैसे थे। किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। उसने गली में खाली घूमते बच्चों को इकट्ठा किया और नितनेम की बाणी का पाठ सिखाने लगा।  प्रसाद आदि के लालच में बच्चे इकट्ठे हो जाते। कई तरह की टॉफियांगोलियांसौंफ के पैकेट बांटता। मंगलवार बर्फी बांटी जातीइतवार को लड्डू। कई बच्चों के हाथों में खर्च के लिए टका-टका भी थमा देता और बच्चे खुशी से नाचते उछलते।
      खौदा चाचा काम में लग गया।  लोगों के पक्के ठिकाने बने हुए थे। स्कूलों का पता-ठिकाना नहीं था।  खाने के लालच में ही सही अब खौदा चाचा का कमरा बच्चों से भरा रहता। बच्चे उसका छोटा मोटा काम भी कर देते। एक दूसरे को जपुजी साहब का पाठ सुनातेपौड़ियां रटते-रटते याद करते तो खौदा चाचा की रुंड-मुंड ठुड्डी मंद-मंद मुस्कुराती। उसकी छोटी-छोटी आँखों में अजीब सा सरूर भर जाताउसका बड़ा सा सर अजीब से ख़ुमार में हिलने लगता। खौदा चाचा बेहद खुश हो जाता वह एक नई पौध तैयार कर रहा था।
      
                         


                                    ====

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें